Monday, May 08, 2017

चुपचाप अट्टहास - 32 : सुनो मेरी फुफकार


 
हर मुँह से हिस्स हिस्स


कितने मुँह मेरे

दो कि चार कि अनगिनत

पथरीली राहें मुझे घेरतीं

मुझे उछालतीं गगनचुंबी लहरें समंदरों की

बँधा मैं अँधेरी रातों से

हर मुँह से हिस्स हिस्स

ज़हर फेंकता।



बरछे भाले तोप कमान

कोई मेरे लगातार बढ़ते

ज़हरीले मुखों को छेद नहीं सकता

मैं काल का काला बादल

सुनो मेरी फुफकार



अँधेरे में मेरी लपलपाती जीभ

तुम्हें दिखती होगी

जैसे मोहिनी नायिका जाती अभिसार को।



Many mouths I have

Is it two or four or countless

Rocky roads are all around me

High tidal waves from the seas throw me upwards

I am bound to darkness

Hissing venom spits

From each of my mouths.



No spears or cannon balls

Can pierce my ever spreading venomous mouths

I am the dark cloud of Kala, the terror eternal,

Hear me erupt.



You can see my tongue

Brandishing in darkness

Like a courtesan going to union with her lover.

Sunday, May 07, 2017

चुपचाप अट्टहास - 31




'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो।'


क्या अन्न रह सकता है अनछुआ


फल अनपका


दौड़ रहा धमनियों में जो रक्त


उसकी भी चाहत


मज्जाएं जो खाई जातीं और जो मज्जाओं के पाचन पर बनतीं


कायनात भर में चाहत के समीकरण हैं


जिस्म के रहस्यों से परे उफ़्क के कोनों तक


दौड़ रही हैं चाहतें





मैंने समेट ली धरती के हर दरिया की चाहत


गंगा के बहाव में


गंगा की मैल कैसे साफ होगी



एक बार याद करें कवि को -


'हँसो, हँसो, जल्दी हँसो।'





Can a grain be left untouched?


And a fruit unripened?


Even the blood running in the veins


Desires


Marrow that is eaten and that is made with marrow 
digested


Desires prevail in equations of all the universe


From the mysteries of the body to the ends of the 
horizons


Desires racing





I gathered within me the desires of all rivers on the 
Earth


With Ganga flowing


How will Ganga ever be cleansed





Remember the poet for once


Laugh, laugh and laugh right now!”

(The quote is from a poem by Raghuveer Sahay)

Sunday, April 30, 2017

कैसे न हो यह सब

चुपचाप अट्टहास -30

कण-कण में चाहत
हर कण चाहत
दाने की चाहत कि उसे चबाया जाए
पानी की कि पीया जाए
चाहतें पूरी करने के लिए कौन क्या नहीं करता
बीज से दाना या समंदर से बारिश तक की यात्राएं चाहत हैं
मेरी चाहत कि हुकूमत करूँ
यात्रा मेरी छोटी कैसे हो सकती
बिकना-बिकाना, कत्ल और ख़ूँ के खेल
कैसे न हो यह सब

कण-कण में  चाहत
हर कण चाहत।

Desire defines every atom
Every atom is a desire
A grain desires to be devoured
Water to be drunk

We all go far to fulfill our desires
A seed becoming a grain and the ocean transforming to rains are desires
It is my desire that I must rule
Naturally it is a long journey
To buy and to sell, to kill and to play with blood
How could I not do it all

Desire defines every atom
Every atom is a desire.

Thursday, April 13, 2017

चुपचाप अट्टहास : 29 - बहुत देर हो चुकी होगी


मैं गाँधी का मुखौटा बनाता हूँ

कोई डरता है कि मुझे क्या हो गया है

कोई सोचता कि मैं भटक गया

या कि सुधर गया हूँ



मैं नहीं खोया

ज़मीन में गड़े मटकों सा हूँ

गल पिघल जाती है मिट्टी

मैं रहता हूँ वहीं जहाँ टिका था

मैं मैं हूँ नहीं

कैसे खोऊँ अपने आप को

इसे इश्क में वफादारी कह दो

हारूँ या जीतूँ

मुखौटा गाँधी का हो कि बुद्ध का

पैने रहेंगे मेरे दाँत

जानोगे जब गहरी नींद में होगे तुम

महसूस करोगे अपनी गर्दन पर

बहता हुआ ख़ून जो मेरी जीभ सोखेगी

जब गड़ जाएँगे दाँत

थोड़ी देर तुम्हें भी होगा उन्माद

फायदा कुछ तुम्हें भी तो है

कि अँधेरे के इस दौर में

जगमगाती है रोशनी तुम्हारे घर

तुम्हें भी यात्राओं का मिलता है सुख

जब कल्पना में ही सही उड़ लेते हो तुम मेरे साथ

जब तक तुम जानोगे

रोशनी है अँधेरे से भरी

बहुत देर हो चुकी होगी

गाँधी के पदचिह्न मिटाता अपने कदमों आता तुम्हें सहलाऊँगा

उसी गर्दन पर उंगलियाँ फेरते हुए

जहाँ से तुम्हारा ख़ून पिया था।



I make masks that look like Gandhi

Some wonder what has happened to me

Some fear that I may have gone bonkers

Some think that I have reformed myself



I am not lost

I am like clay pots buried in earth

The clay dissolves eventually

I remain where I was

How can I lose myself

when I am not myself

You may call it loyalty in love

I may lose or I may win

The mask I wear my be Gandhi or Buddha

My teeth remain sharp as ever

You will know it only when in deep slumber

you feel on your neck

Blood flowing that my tongue will suck

When the teeth will dig inside you

You will enjoy it for a while

You too gain from it a bit after all

Your house shines in this age of darkness

You too enjoy travels

When even if in thoughts you fly with me

By the time you know

That the shine is filled with darkness

It will be too late

I will erase the footprints of Gandhi

And come on my own feet to comfort you



With my fingers rubbing the same neck

Where I sucked your blood from. 

Monday, April 10, 2017

चुपचाप अट्टहास: 28 - अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर


 अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर
 
इस गर्म रात को सिरहाने से आवाज़ें आ रही हैं
 
सिरहाने पर कान रखकर बाएँ बगल पर टिककर सोता हूँ
 
पलकें मूँदते ही निकल आते हैं जुलूस
 
हुजूम चल रहा है और शोर बढ़ता आ रहा है 
  
 
वे सामने दिखती हर चीज़ को चूरमचूर करते आ रहे हैं
 
सेनापति ने योजनाएँ बनाई हैं कि कैसे इनको तबाह किया जाए
 
व्यूह वापस बुलाए हैं हमने इतिहास के पन्नों से

पुराणों में से निकाल जीवंत किए हैं अश्वमेध-आख्यान
सरकारें क्या पूरी कायनात को तबाह करने की योजना बन रही है 
  
 
फिलहाल कायनात अपनी धुरी पर है
 
शहरों में गगनचुंबी इमारतें स्थिर खड़ी हैं
 
अँधेरे में जगमगाहट दिखती है खिड़कियों से आती रोशनी से
 
अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर है
 
देख लो एक किशोरी कैसे शांत सोती है
 
उम्र ही ऐसी है कि कितनी साफ दिखती है दुनिया
 
फिलहाल लुत्फ उठाओ मशीन की ठंड में काँपते हुए
आखिरी लड़ाई होनी है कल।




This night, hot, I hear voices from my pillow


I put my ears on the pillow and lie down on my left 
side


I close my eyes, I see the marches


The crowd marching and the noise approaching





They are crushing everything in sight


My commander has planned to eliminate them


We have looked at strategies learning from history


Ancient imperial victories have come alive


We plan to demolish not just Governments, but the 
creation.




For now the creation moves on its axis


The skyscrapers in the cities are standing robust


In the dark light shines in through the windows


Look inside when all is well


Look how a young girl sleeps in calm


Such is her age that the world appears pretty


For now enjoy the cooling machine when you can




 
Tomorrow will be the last battle.  

Thursday, April 06, 2017

कोई उन्हें छू सके

उड़ते हुए

उड़ते
हुए नीचे लहरों से कहो कि

तुम्हें
आगे जाना ही है

तुम
बढ़ोगे तो तुम्हारे पीछे आने
वाले बढ़ेंगे

इसलिए
आगे बढ़ते हुए अपनी उँगलियाँ
पीछे रखो

कि
कोई उन्हें छू सके ।    (रेवांत - 2017)

Flying
When you fly
Tell the waves below

That you have to
Move forward
You
Move and then move those
Who follow you

And so
Moving ahead
Keep your fingers behind

That others
May feel them.

Tuesday, April 04, 2017

किस खिड़की पर हो तुम?


फिज़ां



सोचता था कि इतनी है ज़मीं कहाँ तक जा पाऊँगा


अंजाने


धूप खिड़कियों से अंदर आती।




देखता था खिड़की से बाहर धूप फैली अनंत तक।


अंदर बातचीत।


कुछ पुरानी, कुछ आने वाले कल की।


साथ बुनते स्वप्न गीत


हम ज़मीं पर लेट जाते। धूप हमें छूती और बादलों से रूबरू होते ही




हम हाथों में हाथ रख खड़े हो जाते।


कहाँ आ पहुँचा


गड़गड़ाते काले बादल धूप निगलते


किसके नाच की थाप से काँपती धरती


मनपाखी डरता है




ढूँढता हूँ धूप


किस खिड़की पर हो तुम? (रेवांत 2017)





The Environs


I used to wonder how far I can go in this wide world


Unknown to me


The sun came in from the windows.




From my window I saw sun spread afar beyond 
the horizons.


Inside was our chit chat.


A bit about the past, and a bit future.


We composed dream songs together


And lay down on the floor. The sun caressed us and 
the moment it met the clouds



we were up holding our hands together.


Where am I now


Thundering dark clouds consume the sun


Who dances that the Earth shivers


My soul fears





I keep looking for the sun


On which window do I find you?

Saturday, April 01, 2017

उमस बढ़ रही है


डर


मैं सोच रहा था कि उमस बढ़ रही है


उसने कहा कि आपको डर नहीं लगता


मैंने कहा कि लगता है


उसने सोचा कि जवाब पूरा नहीं था


तो मैंने पूछा - तो।


बढ़ती उमस में सिर भारी हो रहा था


उसने विस्तार से बात की -


नहीं, जैसे खबर बढ़ी आती है कि


लोग मारे जाएँगे।


मैंने कहा - हाँ।


मैं उमस के मुखातिब था


यह तो मैं तब समझा जब उसने निकाला खंजर


कि वह मुझसे सवाल कर रहा था। (रेवांत 2017)





Fear





I thought that it was getting more humid


He said don’t you feel afraid


I said well I do


He thought that I had not quite replied


Then I asked – so


My head was getting stuffy with rising humidity


He explained -


You know, we hear


that people will be killed


I said – ya


I was dealing with the humidity


It hit me when he pulled out the knife


That he was interrogating me. 

Friday, March 31, 2017

उनको उगना है जैसे जंगली पौधे



शब्द-खिलाड़ी




पागल हैं शब्दों को बाँधने वाले


शब्द तो पाखी हैं


फर फर उड़ते हैं


हम उन्हें हाथों से पकड़ते हैं


धमनियों को पगडंडियाँ बना


साथ टहल आते हैं अँधेरी कोठियों तक





फिर कागज़ पर जड़ देते हैं


कि उनसे रोशनी मिले





पागल हैं बँधे शब्दों को


देख गीत गुनगुनाने वाले


शब्दों का क्या


उनको उगना है जैसे जंगली पौधे


हम देख


हँसते हैं खिसियाते हैं या


कभी दुबक जाते हैं गहरे कोनों में





शब्दों को देते हैं नाम


जैसे कि शब्द पहले शब्द नहीं थे


पागल हैं शब्दों से खेलने वाले।  (रेवांत 2017)



The Word-gamers



Crazy who peg the words

Words are  birds

They fly flapping their wings

We hold them with hands

Move together with them on lanes made of veins

to the dark rooms



And engrave them on paper

That they may show us light



Crazy those who sing

Watching words confined

Words do not care

They grow like wild plants

We watch

and smile or shy away or

Hide in dark corners



We name the words

Earlier words were not words

Crazy who play with words.  

Thursday, March 30, 2017

वे सचमुच हक़ीक़ी इश्क में हैं

अक्सर मेरे साथ ऐसा होता है। कविताएँ छपती हैं। जीमेल से कट-पेस्ट करते 
हुए पी डी एफ फाइल से मिलान किए बिना कविताएँ एक दूसरे में गड्ड-मड्ड। 

इस पोस्ट से हाल में 'रेवांत' में प्रकाशित कुछ पुरानी कविताएँ क्रमवार लगा रहा 
हूँ -



वे सुंदर लोग



आज जुलूस में, कल घर से, हर कहीं से


कौन पकड़ा जाता है, कौन छूट जाता है


क्या फ़र्क पड़ता है


मिट्टी से आया मिट्टी में जाएगा


यह सब किस्मत की बात है


इंसान गाय-बकरी खा सकता है तो


इंसान इंसान को क्यों नहीं मार सकता है?




वे सचमुच हक़ीक़ी इश्क में हैं


तय करते हैं कि आदमी मारा जाएगा


शालीनता से काम निपटाते हैं


कोई आदेश देता है, कोई इंतज़ाम करता है


और कोई जल्लाद कहलाता है




उन्हें कभी कोई शक नहीं होता


यह खुदा का करम यह जिम्मेदारी


उनकी फितरत है




हम ग़म ग़लत करते हैं


वे


पीते होंगे तो बच्चों के सामने नहीं


अक्सर शाकाहारी होते हैं


बीवी से बातें करते वक्त उसकी ओर ताकते नहीं हैं


वे सुंदर लोग हैं।




हमलोग उन्हें समझ नहीं आते


कभी कभी झल्लाते हैं


उनकी आँखों में अधिकतर दया का भाव होता है


अपनी ताकत का अहसास होता है उन्हें हर वक्त




हम अचरज में होते हैं कि


सचमुच खर्राटों वाली भरपूर नींद में वे सोते हैं।


वे सुंदर लोग।             (रेवांत - 2017)


Pretty folks



Today it was from a march

Tomorrow it will be from home, from everywhere,

Someone is arrested, someone is released
Who cares, ashes to ashes
It is all in your fate
If man can eat goats and cows
Why can’t they eat humans?

Their love is of a higher order
They decide that a man will be killed
And they do it in a civilized way
Someone gives the orders, another finishes it off
And someone else is the hangman

They have no self-doubt
This responsibility, this divine destiny
is in their nature

We look for melting our sorrows
May be they too drink but not in front of the children
More likely you find them vegetarian
When speaking to their wives they do not look at them
They are pretty folks

They cannot understand us
Sometimes they get upset
More frequently kindness pours out of their eyes
They are always aware of how powerful they are

We wonder
that they sleep in comfort snoring away
Gosh, they are pretty folks.