आइए हाथ उठाएँ हम भी

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Location: हैदराबाद, तेलंगाना, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Saturday, May 03, 2025

लाग की आग

(अकार-70 में प्रकाशित)

'आह, मुझे पी ले

कि खुशी की इंतहा में थिर शराब सा

तिलिस्म बन तेरे पैमाने में मौजूद रहूँ' - [मिस्ट्री (तिलिस्म) – डी एच लॉरेंस]


ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना करते हुए अपने शरीर से मनु और स्वरूपा को जन्म दिया था, या रब ने मिट्टी से आदम बनाया, फिर उसकी साथी हव्वा बनाई, और फिर साँप ने गड़बड़ कर दी। आदम और हव्वा सही-ग़लत के इल्म वाले सेव के दरख्त का फल खा बैठे, और हम यहाँ पहुँच गए। आज हर कोई जानता है कि जीवन की दीगर जटिल हरकतों की तरह सेक्स की पहचान जीन्-स का खेल है। अंडा-माँ, बीज-बाप को क़ैद करती है और पूरी क़वायद होती है कि बीजाणुओं को टुकड़ों में बाँटो, फिर मेल करवाते हुए उनको खास तरह से जोड़ो। इसी से अपनी खास यौनिक पहचान लिए संतान जन्म लेती है। जैविक विकास से उसे यहाँ तक पहुँचने में खरबों साल लगे हैं। इस दौरान अणुओं के तोड़-जोड़ के अनगिनत प्रयोग होते रहे।

सेक्स की अहमियत इस बात में है कि सेक्स के बगैर जीन्-स का टूटना, जुड़ना मुमकिन न होता और प्रजातियों का विकास न हुआ होता। हमारे जैसे रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों, मछलियों की प्रजातियों में, तक़रीबन चार करोड़ साल पहले, नियमित सेक्स होता था। ज़्यादातर प्रजातियों में यह जैविक हरकत बन कर रह गया, पर वानरों और खासकर इंसान ने इसे अपनी चेतना का अहम हिस्सा बना लिया। हमारे लिए सेक्स और बच्चे पैदा करने में जो नाता है, वह और जानवरों से इस मायने में अलग है कि हमारे वयस्क जीवन का बड़ा हिस्सा इस फ़िक्र में बीतता है कि बच्चे पैदा हों या न हों, अगर हों तो उनके बारे में क्या कुछ सोचा जाए, परिवार कैसे बसाएँ, बच्चे को कैसे पालें, आदि। इससे भी बढ़कर यह कि किन दो के यौनिक संबंध से बच्चे पैदा हों, या न हों, इसके भी सामाजिक नियम बने और इस आधार पर समुदायों में लोग बँटे। इसके बावजूद तरह-तरह के यौनिक रूप और स्वभाव हमेशा मौजूद रहे। लंबी अवधि के रिश्तों से अलग एक बार की हम-बिस्तरी से लेकर, कुछ दिनों या सिर्फ कुछ महीनों तक के यौन-संबंध होेते रहे हैं। शादी के बाद बेवफ़ाई, बहुविवाह आदि आम बातें हैं। हालाँकि ज़्यादातर आधुनिक समाजों में स्थाई मोनोगामी या एक-संगमन को मान्यता मिली हुई है, पर यह इतना आम नहीं है, जितना कि मान लिया जाता है। इससे अलग प्रथाएँ भी कई समाजों में मौजूद हैं। भारत समेत कई देशों में पुरुषों में बहुविवाह आम बात थी, जिस पर अब रोक है। एक स्त्री का एक से ज़्यादा पति होना भी कई इलाक़ों में देखा जाता है, जैसे उत्तराखंड के कुछ इलाक़ों में है। आदिवासियों में भी ऐसी विविधता आम है। सेक्स को लेकर कई जटिल ख़याल हैं, जिनमें समाज में मान्य रिश्तों से अलग और बातें भी शामिल हैं। मशहूर मानव-शास्त्री ए के रामानुजन ने दिखाया है कि सोफोक्लिस के ग्रीक त्रासदी-नाटक 'ईडीपस रेक्स' में अपनी माँ से संबंध करने वाले पितृहन्ता ईडीपस जैसी कहानी उत्तरी कर्नाटक क्षेत्र की एक लोक-कथा में मौजूद है। एक लड़की को जन्म से यह शाप है कि वह अपने बेटे से शादी करेगी और इससे उसे बेटा पैदा होगा। शाप से बचने के लिए वह जंगल भाग जाती है, पर वहाँ एक राजा के वीर्य से भीगे आम खाने पर उसे बेटा पैदा होता है, जिसे वह नदी में फेंक देती है। बच्चा पानी में बहकर पास के राज्य तक जाता है, जहाँ उसे उठा लिया जाता है और उसकी परवरिश होती है। बड़ा होकर लड़का जंगल में शिकार करने आता है और अंजाने में अपनी माँ से मिल कर उससे शादी कर लेता है। उनका बेटा पैदा होता है और रिवाज़ के मुताबिक बाप के बचपन के अँगोछे में उसे बाँधा जाता है। औरत देखते ही पहचान लेती है कि यह अँगोछा दरअसल उसकी साड़ी का पल्लू है, जिसमें बाँधकर उसने अपने बेटे को नदीं में फेंका था। आखिर नवजात को बेटा, पोता और देवर का संबोधन कर लोरी गाते हुए वह खुदकुशी कर लेती है। ऐसे 'ईडिपस कॉंप्लेक्स' या इसी की तरह बेटी और बाप में संबंध के 'इलेक्ट्रा कॉंप्लेक्स' की मिसालें पश्चिमी अदब में खूब पाई जाती हैं। ऐसा नहीं है कि ये वहीं तक सीमित हैं। मिस्र के नोबेल पुरस्कार विजेता नग़ीब महफ़ूज़ के एक उपन्यास (अंग्रेज़ी में 'द मिराज' – सराब) का अंतर्मुखी नायक कामिल रुबा लाज़ अपनी माँ के प्रति खिंचा रहता है, जो उसे अपनी जकड़ में रखे हुए है। उसके लिए उसकी माँ ही उसकी ज़िंदगी है। माँ की ख़ूबसूरत शक्ल से इतर उसके तसव्वुर में और कुछ नहीं होता। उसके प्यार और नफ़रत में हर कहीं माँ ही है। नतीजतन वह अपनी बीवी के साथ संभोग नहीं कर पाता है। इन बातों का ऐसा असर मिस्र के बौद्धिकों पर था कि 1951 में एक अध्यापक ने शादी से पहले मनोविज्ञानिक जाँच का प्रस्ताव रखा ताकि बाद में दंपति को मुश्किलों से बचाया जा सके। यानी यौन-मनोविज्ञान की ऐसी कई मिसालें हैं, जिनकी व्याख्या आसान नहीं है। मशहूर निर्देशक आल्फ्रेड हिचकॉक की सबसे ज़्यादा चर्चित फिल्मों में एक 'साइको' (1960) का कथानक ऐसे ही जटिल रिश्ते पर केंद्रित है। नायक नॉरमन माँ के प्रेमी से रीस करते हुए माँ और उसके आशिक दोनों का क़त्ल कर देता है, पर माँ के प्रति उसका मोह इतना है कि वह उसकी लाश को दफनाता नहीं और उसे ज़िंदा मानकर उससे बातें करता है। हालाँकि सोफोक्लिस की त्रासदी-रचनाओं के साहित्यिक महत्व पर खूब चर्चाएँ होती हैं, सच यह है कि हम इसके केन्द्र में मौजूद माँ-बेटे के संबंध पर ही ज़्यादा सोचते हैं। यानी इंसान के ज़ेहन पर यौनिकता का असर इतना गहरा है कि कहीं भी जगह दिखे तो हमारी सोच इस ओर मुड़ जाती है। कइयों का मानना है कि रति के लिए साथी चुनते हुए ज़ेहन में माँ (मर्द के लिए) या बाप (औरत के लिए) की तलाश रहती है। सौ साल पहले सिगमुंड फ्रॉएड ने ऐसे कॉँप्लेक्स का संबंध 'अचेतन' से दिखाने के लिए सपनों पर शोध करने की कोशिश की थी। कला और अदब पर फ्रॉएड की खोजों का गहरा असर पड़ा, आज तक है, पर उसके जीते रहते ही उसके काम पर सवाल उठने लगे और वैज्ञानिकों और दार्शनिकों ने इसे गैर-वैज्ञानिक करार कर दिया। आखिर क़रीबी रिश्तेदारों में यौन-संबंधों पर मनाही क्यों है? आम समझ यह है कि ऐसे संबंधों से पैदा हुए बच्चों में खतरनाक आनुवंशिक बीमारियाँ हो सकती हैं। यह बात आज के ज़माने में बेमानी हो जाती है, क्योंकि कोई ज़रूरी नहीं कि यौन-संबंध से बच्चे पैदा करने ही हैं, और अगर प्रजनन हो तो भ्रूण में ही बीमारियों की पहचान कर इलाज़ आज मुमकिन है। यह एक सदी पुरानी बहस है कि क़रीबी रिश्तों को खारिज करने के पीछे सामाजिक वजहें ज़्यादा अहम रही हैं या विकास और प्रजाति की निरंतरता। जीन्-स में विविधता ही सबसे अहम बात होती तो जाति या समुदाय के आधार पर शादियाँ न होतीं। जिस्मानी खासियत में समानता की चाहत से ही समुदाय के अंदर विवाह की रस्म उभरी हो सकती है, ताकि आगे पैदा होते बच्चों में कुछ हद तक आनुवंशिक एकरूपता हो। हमारे यहाँ के कई समुदायों समेत दुनिया भर में कई इलाक़ों में क़रीबी रिश्तेदारों में शादियाँ होती हैं।

यह जटिलता, जिसे सेक्स कहते हैं, कुदरत में यह क्यों पनपी? यौनिकता की पहचान आज भी दुनिया में मौजूद किसी जानवर से नहीं शुरू हुई, बल्कि यह खरबों साल पहले से चली आ रही है, जब इंसान का कोई वजूद धरती पर नहीं था। धरती पर सबसे सरल और प्राचीन बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मतम जीव महज दो भागों में विभाजित होकर प्रजनन करते हैं। इनके बनिस्बत पेड़-पौधे और जानवर बहुत बड़ी और जटिल कोशिकाओं से बने होते हैं, जिनमें सलीके से तय की गई आणविक मशीनरी और झिल्लीदार भूलभुलैए भरे होते हैं। बहुत कम प्रजातियों में अलैंगिकता दिखती है, और ये सब विकास के साथ विलुप्त हो जाती हैं। सेक्स कई मायनों में महंगा है। अजीबो-ग़रीब कसरतों की माँग रखता है, लेकिन प्रजाति के वजूद को बनाए रखने के लिए ज़रूरी है। वैज्ञानिक इस पर सर खपाते रहे हैं। लंबे अरसे से एक समझ यह रही कि सेक्स से विविधता पैदा होती है और इस तरह परिवेश के साथ अनुकूलन में आसानी रहती है। सेक्स की वजह से जीन्-स में लगातार हो रहे थोड़े-थोड़े बदलावों से तरह-तरह के परजीवियों (बैक्टीरिया-वाइरस आदि) से बचने की क़ाबिलियत बढ़ी है और जीन्-स में गड़बड़ी यानी विकृतियों से भी बचाव मुमकिन हुआ है। जैविक विकास में प्रजाति के बने रहने के लिए सफल प्रजनन और कामयाब जीन्स का मौजूदा आबादी में कायम रहना लाज़िमी है। इस समझ में खतरा यह है कि इसके मुताबिक - 'पसंद का साथी के लिए जीन’, 'पार्टनर बनाने के लिए जीन', 'बहुविवाह के लिए जीन', यानी हर तरह के ऐसे स्वभाव को जायज़ ठहराया जा सकता है, जो दरअसल सामाजिक पूर्वाग्रहों से पनपा है। वानर प्रजाति में हमारे क़रीब के चिंपांज़ी जैसे जानवरों में यौनिकता से लेकर परिवार और कुनबा बनाने जैसी कई बातों को कुदरती चयन जैसे जैविक सिद्धांतों को आधार बनाकर समझा जा सकता है, पर इंसान महज एक वानर नहीं है। यह विड़ंबना ही है कि खालिस कामेच्छा को पशु-जैसी फितरत भी कह दिया जाता है और इसे शादी जैसे लंबे रिश्ते से अलग माना जाता है। इंसान को और जानवरों जैसा मानना या दीगर जानवरों में इंसान जैसी हरकतें ढूँढना - एक ओर ये बातें कामेच्छा का ठोस आधार सामने लाती हैं, दूसरी ओर अक्सर नस्ली या जाति जैसे पूर्वाग्रहों से इनमें कुतर्क जोड़ दिए जाते हैं। मर्द एक से अधिक यौन-संबंध रखे तो इसे अधिक बच्चे पैदा करने से जोड़ कर समझाया जाता है, पर औरतें भी एक से ज़्यादा मर्दों के साथ संबंध रखती हैं, लेकिन इससे बच्चों की तादाद में बढ़त नहीं होती।

'काम' पर नियंत्रण के लिए समाज ने क्या-क्या नियम नहीं बनाए – आज भी कई जगह बहुत छोटी उम्र में विवाह करवा दिए जाते हैं या तय कर दिए जाते हैं। वयस्क हो जाने पर अपनी इच्छा से शादी करना भी दरअसल सामाजिक पूर्वाग्रहों से नियंत्रित होता है। ऐसा नहीं है कि संभोग के बाद ही हम बच्चा पैदा करने के बारे में सोचते हैं, दरअसल हमारे अवचेतन में नस्ल को आगे बढ़ाने की सोच गहरी है और संभोग के लिए साथी चुनना भी इसी सोच से नियंत्रित होता है। दूसरे जानवरों में संभोग से पहले बच्चा पैदा करने की सोच, यानी गर्भावस्था या बच्चे पैदा करने के बारे में भौतिक या आध्यात्मिक खयाल, या कि वे बच्चों के साथ गर्भ से पहले से ही कोई नाता रखते हों, इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है, पर इंसान में यह बात हमेशा ज़ेहन में हावी होती है। यानी वात्स्यायन का शास्त्र अपनी जगह पर है, पर वहाँ तक पहुँचने के लिए प्रजनन की मशीनरी अपना काम करती है, जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की हक़ीक़तें गड्डमड्ड होती हैं।

शिकारी मानव का खेतीबाड़ी की ज़िंदगी में ढलना ऐसा पड़ाव था, जहाँ किसानों ने समझ लिया होगा कि अगली पीढ़ी के पौधों और जानवरों के लिए परागण और संभोग ज़रूरी है, और इससे वे बाग़वानी और पशुपालन में माहिर हो गए होंगे। पुरापाषाण काल के लोगों के पास भी प्रतीकों में समझने लायक भाषा और जानवरों और पौधों के व्यवहार का व्यापक ज्ञान था। इसमें निश्चित रूप से यौनिकता और प्रजनन की समझ शामिल होगी। प्रजनन, यानी बीज पिता और अंडा माँ के मिलन की समझ आग और पंछियों के अंडे पकने से बनी हो सकती है। कम से कम एक लाख सालों से प्रजनन की समझ इंसान में है। इसी के साथ तमाम सामाजिक रीति-रिवाज़ बनते चले, जिनमें दहेज, अंगूठी, मालाएं लेन-देन आदि हैं।

लगभग दो अरब साल पहले बैक्टीरिया की एक प्रजाति ने एक और सरल कोशिका - आर्कियोन - के साथ घनिष्ठ सहजीवी साझेदारी बनाई। यह मेल इतना गहरा था कि साथ निभाने आए बैक्टीरिया ने अंततः अपने साथी के अंदरूनी हिस्से में डेरा जमा लिया और धीरे-धीरे वे हमारी कोशिकाओं के ऊर्जा पैदा करने वाले अणुओं में बदल गए। इस तरह से नई बनी संकर कोशिका बढ़ी और फलती-फूलती चली। दोनों साझेदारों की आनुवंशिक सामग्री और नए बने ऊर्जा स्रोत का इस्तेमाल कर अभूतपूर्व जटिलता वाली एक कोशिका बनी, और विकास की इस यात्रा में जो अनगिनत खासियत पनपीं, उनमें सेक्स भी शामिल था। अरबों सालों तक चले इस सफर में कोशिकाएँ जुड़ती-टूटती रहीं। यह एक तरह का यौनिक खेल था। सूक्ष्म जीवाणुओं से जटिल जीवों यानी पौधों या जानवरों तक कई प्रजातियाँ आई-गईं। अंत में कुदरती चयन और परिवेश में अनुकूलन में सबसे दुरुस्त (फिट) प्रजातियाँ बची रह गईं। इन सब में सेक्स की अहम भूमिका रही। जैविक विकास के नज़रिए से देखने की एक सीमा यह है कि इसमें समलिंगी काम की हसरत की व्याख्या मुमकिन नहीं है। प्राकृतिक चयन प्रजनन के माध्यम से संचालित होता है, और इसलिए जाहिर है कि प्रजनन के साथ जुड़ा सेक्स किसी भी व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। लेकिन इंसान हमेशा विषमलिंगी नहीं होता है। इसलिए कामेच्छा की समझ में समलिंगी संभोग की चाहत की व्याख्या भी होनी चाहिए। आमतौर पर समलिंगी सेक्स को हमारी विषमलैंगिक फितरत के बाई-प्रोडक्ट सा देखा गया है। इस नज़रिए की कई सामाजिक वजहें हैं। यह विवरण समलैंगिकता को एक तरह से सॉफ़्टवेयर की गड़बड़ी के रूप में पेश करता है - जिसे विकास ने ठीक करने की ज़हमत नहीं उठाई क्योंकि यह इतनी गंभीर नहीं है कि पूरे प्रोग्राम को तबाह कर दे। लेकिन समलिंगियों को ऐसी व्याख्या क़तई सही नहीं लग सकती और जाहिर है कि वे ऐसे शोध के बुनियाद पर सवाल उठाते हैं। मानव-इतिहास में कुछ वयस्कों में समलिंगी कामेच्छा हमेशा ही मौजूद रही है, और हर परंपरा में, खास तौर से कला, संगीत, साहित्य में यह मुखर रही है, पर बिड़ंबना यह कि इसे अक्सरीयत ने कभी स्वीकारा नहीं है। प्राचीन भारतीय कलाकृतियों में और हाल की सदियों में उर्दू शायरी में यह दिखता है। ग़ज़ल में आशिक और माशूक दोनों के लिए अक्सर पुलिंग क्रियापदों का इस्तेमाल होता है और ज़्यादातर ग़ज़लें पुरुषों की लिखी होती हैं। ग़ज़ल की शुरूआत अरबी और फारसी ज़बानों में हुई और इसके बावजूद कि रूमी जैसे महान सूफियों ने समलिंगी साथी बनाए, वहाँ समाज ने मर्दों के बीच यौनिक रिश्तों को नपुंसकता और विकृति माना। खास कर इस्लाम के आने के बाद यह कट्टर खयाल बन गया।

यौनिकता पर समाज की पहरेदारी के बावजूद इंसान अपनी हसरत पूरी करने की राहें ढूँढता रहा है। रूसी क्रांति पर जैक रीड की किताब से प्रेरित 1981 में वारेन बीटी के निर्देशन में बनी मशहूर फिल्म 'रेड्स' में अमेरिकी उपन्यास लेखक हेनरी मिलर साक्षात्कार में कहता है - ‘You know something that I think that there was just as much fucking going on then as now. Only now, it has a more perverted quality to it. Now, there's no love whatever included, you know. Then, there was your heart, a bit of heart in it. उन दिनों (सौ साल पहले) इतनी ही संभोग क्रियाएँ चल रही थी, जितनी कि अब (पचास साल पहले) है, बस अब इसमें जरा विकृति आ गई है। अब इसमें प्यार नहीं रहा। उन दिनों दिलो-जाँ की बात होती थी।' हेनरी मिलर का ऐसा कहना गौरतलब है, क्योंकि कई सालों तक अमेरिका में उसकी किताबों (Tropic of Cancer और Naked Lunch) के छपने पर रोक लगी थी और इनके पहले प्रकाशन यूरोप में पेरिस में हुए थे। यूरोप में मध्य-युग में रूढ़िवादी सोच शिखर पर थी, और यौन-संबंधों से फैले रोगों से निजात भी आसान न था। पर उन दिनों भी वहाँ के वैद्य मानते थे कि संभोग में कमी या ब्रह्मचर्य सेहत के लिए ठीक नहीं है। अमेरिका में साठ के दशक में सेक्स पर पुराने खयालों के खिलाफ इंकलाबी लहर उमड़ आई। प्रसिद्ध उपन्यास लेखक फिलिप लार्किन ने इसे इस तरह कहा, ‘Sexual intercourse began in 1963 … between the end of the Chatterley ban and the Beatles’ first LP - यौनिक संभोग की शुरूआत 1963 में हुई, जब चैटरली (डी एच लॉरेन्स की किताब ‘लेडी चैटर्ली-स लवर’) पर से प्रतिबंध हटा और बीटल्स (रॉक संगीत का ग्रुप) का पहला एल पी (लॉंग-प्लेयिंग रेकॉर्ड) आया।’

यौनिकता को मर्द के नज़रिए से देखने पर स्त्रीवादी आलोचकों की आपत्ति मुखर रही है। यह सच है कि आज़ाद दुनिया का ख़याल तब तक बेमानी है, जब तक कि औरत के जिस्म पर मर्द ने लगाम लगा रखी है। पिछली सदियों में पश्चिमी मुल्क़ों में माली हालात सुधरने के पीछे स्त्रियों की यौनिक स्वतंत्रता का बड़ा योगदान रहा है। बच्चे पैदा करने की मशीन मान कर नहीं, बल्कि औरत की शख्सियत और क़ाबिलियत को पनपने देने से समाज आगे बढ़ता है। यह ज़रूरी है कि वह परिवार में गाय की तरह बँधी न रह कर अपनी मर्ज़ी से साथी चुने और भरपूर इंसान बन कर तरक़्क़ी की बुलंदियाँ हासिल करे। यह बात हमारे वक्त की बड़ी लड़ाई है। यह निजी दायरे की ही नहीं, समाजी और सियासी लड़ाई है। इस जद्दो-जहद में विज्ञान भी अछूता नहीं है। शोध में सवालों के चयन और विज्ञान की भाषा आदि को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। स्त्रीवादी आलोचना यह आग्रह रखती है कि वैज्ञानिक प्रयोगों को करते हुए जेंडर से जुड़े पूर्वाग्रहों पर सोचना और उनसे बचना या उनसे निजात पाना बा-क़ायदे ज़रूरी है। मसलन यह आम सोच कि प्रजनन में पुरुष के लाखों शुक्राणुओं में से कोई एक-दो स्त्री के गर्भाशय की नाल में अंडाणु को निषेचित (fertilise) करते हैं, का वैकल्पिक विवरण यह हो सकता है कि स्त्री के गर्भाशय में अंडाणु किसी एक-दो शुक्राणु को निषेचन के लिए स्वीकार करता है। भाषा सत्ता समीकरण को बदल देती है।

आज जहाँ हर कहीं पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव से यौनिकता पर खुली बातचीत होती है, वहीं एक ओर परंपरा, जाति, धर्म आदि के नाम पर तरह-तरह की रोक लगाई जाती है। पिछली सदी के आखिर में अंग्रेज़ी में 'जेंडर' शब्द का अर्थ बदल गया, या यूँ कहें कि पहले से ज्यादा व्यापक हो गया। एक ओर तो जेंडर को जैविक पहचान से अलग समाज द्वारा थोपी लिंग-पहचान माना गया, वहीं इस शब्द के मूल अर्थ को स्त्री या पुरुष की जैविक पहचान से बढ़ाकर इसमें समलिंगी और ट्रांस-जेंडर आदि पहचानें जोड़ी गईं। स्त्री की यौनिकता पर वात्स्यायन से कहीं आगे बढ़कर आज खुलकर बात होती है। पहले जो शहरों में मंडियों या कोठियों या रेड लाइट एरिया तक सीमित होता था, आज वह इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी और डेटिंग के व्यापार का बड़ा साम्राज्य बन चुका है, जिसमें करोड़ों के वारे-न्यारे होते हैं। औरत का जिस्म चीख रहा है, उसकी रूह चीख रही है कि उसे आज़ादी चाहिए, पर कहीं राज्य-सत्ता तो कहीं देह-व्यापार ने उसे ज़ंजीरों से जकड़ रखा है। कहीं गर्भ-पात पर रोक है, कहीं ज़बरन बुरखा पहनना है तो कहीं इसे पहनने की आज़ादी नहीं है। विवाह के नाम पर समाज और राज्य-सत्ता ने स्त्री की यौनिकता को ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ है। एक अजीब बात यह है कि हमारी ज़िंदा भाषाओं में यौनिकता के लिए इस्तेमाल होने वाले आम शब्द अश्लील मान लिए गए हैं और उनकी जगह संस्कृत या अंग्रेज़ी के शब्दों का प्रचलन बढ़ गया है। यह वही समाज है जहाँ खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों में रति की मुद्राओं के मनोरम मूर्ति-शिल्प हैं। हिंसा और विसंगतियों से भरी इस दुनिया में में यौनिकता के अद्भुत और इंतहाई-खूबसूरत तिलिस्म के साथ कुदरतन मिले प्यार के लिए कितनी जगह बची है, साथ ही टेक्नोलोजी ने अगली सदियों में यौनिक सुख को किस ओर मोड़ना है, ये सोचने की बातें हैं।

अंत में डेढ़ सदी पहले लिखी वाल्ट ह्विटमैन की यह कविता पढ़ी जाए -

स्त्री मेरे इंतज़ार में

स्त्री मेरा इंतज़ार कर रही है, वह भरपूर है, उसमें कुछ भी नहीं छूटा

पर कुछ भी क्या होता जो काम न होता, या कि सही मर्द का द्रव न होता



काम में सब है, बदन, रूहें,

अर्थ, प्रमाण, शुद्धताएँ, नज़ाकत, नतीजे, प्रचार,

गीत, आदेश, स्वास्थ्य, गर्व, मातृत्व का तिलिस्म, वीर्य-रस

सभी आशाएँ, खैरात, सम्मान, सभी ख़्वाहिशें, प्रेम, खूबसूरती, धरती की हर खुशी,

सारी हुकूमतें, काजी, देव, दुनिया के अनुकरणीय जन,

ये काम में हैं, उस का हिस्सा हैं और उसे सही ठहराती हैं।



जो पुरुष मुझे भाता है वह बिना लाज अपने काम-उल्लास को खुलकर स्वीकारता है

जो स्त्री मुझे भाती है वह बिना लाज खुलकर अपना काम-उल्लास स्वीकारती है।



मैं जड़ स्त्रियों से दूर चला

मैं उसके साथ रहने चला जो मेरा इंतज़ार कर रही है, और उनके साथ जिनके खूँ में ग़र्मी है और जो मुझे खुश रखती हैं

मैंने देखा है कि वे मुझे समझती हैं और मुझे खारिज नहीं करतीं,

मैंने देखा है कि वे मेरे योग्य हैं, मैं उन स्त्रियों का समर्थ पति होऊँगा।

वे मुझसे लेश भर भी कम नहीं हैं

चमकती धूप और बहती हवाओं ने उनके चेहरों में रंगत ला दी है

उनकी मांसलता में पक चुका दैवी लचीलापन और ताकत है,
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वे तैरना, नाव चलाना, घुड़सवारी, कुश्ती लड़ना, निशानेबाजी, दौड़ना, धावा बोलना, पीछे हटना, आगे बढ़ना, विरोध करना, अपनी रखवाली करना जानती हैं,

वे अपने तईं भरपूर हैं - वे शांत, साफ, अपने-आप में सुगठित हैं।

ऐ स्त्रियों, मैं तुम्हें पास खींचता हूँ

मैं तुम्हें छोड़ नहीं सकता, मैं तुम्हारा भला करूँगा

मैं तुम्हारा हूँ, और तुम मेरी हो, यह बस परस्पर के लिए ही नहीं, बल्कि औरों के लिए है

हमसे बड़े नायकों और कवियों को तुम्हारी नींद ढँके हुए है

मेरे सिवा किसी और की छुअन से वे जागेंगे नहीं।



यह मैं हूँ, स्त्रियों, मैं आगे बढ़ता हूँ

मैं सख्त, तीखा, चौड़ा हूँ, मैं हटूँगा नहीं, पर मैं तुम्हें प्यार करता हूँ

जितना तुम्हारे लिए ज़रूरी है, तुम्हें उससे अधिक तकलीफ नहीं देता,

इन राज्यों के लिए काबिल बेटे-बेटियाँ पैदा करने को मैं तुम्हारे अंदर सत्व डालता हूँ, मैं धीमी रूखी उद्दंड शिराओं से दबाव डालता हूँ

मैं खुद को मुकम्मल तैयार करता हूँ, कोई गुजारिश नहीं सुनता,

अरसे से अपने अंदर जो जमा है, जब तक उसे डाल न दूँ, मैं निकलने की ज़ुर्रत नहीं कर सकता।

तुम्हारे जरिए मैं अपनी थमी हुई नदियों को बहाता हूँ

आगे के हजारों साल मैं तुममें समेट लेता हूँ

मैं अपने और अमेरिका के सबसे प्रिय जनों के चित्र तुम पर तराशता हूँ

जिन बूँदों को मैं तुममें स्वच्छ डालता हूँ, उनसे जोशीली और चुस्त लड़कियाँ, नए कलाकार, संगीतकार और गायक जन्मेंगे,

जिन बच्चों को मैं तुम्हारे अंदर पैदा करता हूँ वे अपनी बारी में बच्चे पैदा करेंगे,

यह मेरी माँग है कि मेरे प्रेम की लागत से संपूर्ण मर्द-औरत जन्म लें,

मेरी उम्मीद है कि जैसे हम संभोग कर रहे हैं, वैसे ही वे भी औरों के साथ संभोग करेंगे,

जैसे मैं अभी खुद बरसा रहे तेज़ बौछारों से उम्मीद रखता हूँ, मुझे उनकी तेज़ बौछारों के फलों से उम्मीद रहेगी,

प्रेम में मगन जिन जन्म, जीवन, मृत्यु, अमरता को मैं अब रोप रहा हूँ, उनसे प्रेम भरी फसल की उम्मीद मैं करता रहूँगा।

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Wednesday, July 03, 2024

मृत्यु-नाद

('अकार' पत्रिका के ताज़ा अंक में आया आलेख)


'मौत का एक दिन मुअय्यन है / नींद क्यूँ रात भर नहीं आती' - मिर्ज़ा ग़ालिब

'काल, तुझसे होड़ है मेरी ׃ अपराजित तू— / तुझमें अपराजित मैं वास करूँ।

इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूँ' -शमशेर बहादुर सिंह; हिन्दी कवि


'मैं जा सकता हूं/जिस किसी सिम्त जा सकता हूं/ लेकिन क्यों जाऊं?’ - शक्ति चट्टोपाध्याय, बांग्ला कवि

'लगता है कि सब ख़त्म हो गया / लगता है कि सूरज छिप गया / दरअसल भोर 

हुई है / जब कब्र में क़ैद हो गए तभी रूह आज़ाद होती है - जलालुद्दीन रूमी


हमारी हर सोच जीवन-केंद्रिक है, पर किसी जीव के जन्म लेने पर कवियों-कलाकारों ने जितना सृजन किया है, उससे कहीं ज्यादा काम जीवन के ख़त्म होने पर मिलता है। मृत्यु पर टिप्पणियाँ संस्कृति-सापेक्ष होती हैं, यानी मौत पर हर समाज में औरों से अलग खास नज़रिया होता है। फिर भी इस पर एक स्पष्ट सार्वभौमिक आख्यान है। जीवन की सभी अच्छी बातें तभी होती हैं जब हम जीवित होते हैं। हर जीव का एक दिन मरना तय है, देर-सबेर हम सब को मौत का सामना करना है, और मरने पर हम निष्क्रिय हो जाते हैं। प्रकृति में किसी भी जीव तक काल की पहुंच है, और फिर भी हम किसी भी संभव तरीके से इससे बचना चाहते हैं। जाहिर है, सवाल उठता है - हम मरते क्यों हैं? बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारियों और उनसे निजात पाने के तरीकों पर हो रहे वैज्ञानिक शोध में हाल के दशकों में तेजी से तरक्की हुई है, पर साथ ही चूँकि बुढ़ापा हर किसी को नापसंद है और हर कोई लंबी उम्र तक दुरुस्त जीना चाहता है, इसलिए इस तरक्की के दावे भी धड़ल्ले से होते चले हैं। बेशक आधुनिक सेहत-सुविधाओं और चिकित्सा से पिछली सदी में दुनिया भर में इंसान की औसत आयु लगातार बढ़ती रही है और डेढ़ सौ सालों में इसमें सौ फीसद से ज्यादा का इजाफा हुआ है। दक्षिण एशिया में भी आज औसत उम्र 70 साल से ऊपर है, जब कि आज़ादी के वक्त यह महज 32 साल ही थी। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष और इस दौर के एक प्रमुख जीव-विज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकी रामकृष्णन ने हाल में 'हम क्यों मरते हैं: उम्र बढ़ने का नया विज्ञान और अमरता की खोज' शीर्षक किताब लिखी है, जिसमें वे उम्र बढ़ने और आखिर में मर जाने की इस चिरंतन पहेली को समझने के लिए आधुनिक विज्ञान में क्या और कैसे प्रयास किए गए हैं, इसकी कहानी विस्तार से बताते हैं।1


जैविक प्रक्रियाओं में शामिल अणुओं के आकार-प्रकार और उनमें होते बदलावों की जटिलता को किसी भी ऐसे संगठित ढाँचे में चल रही हरकतों से समझा जा सकता है, जो वक्त के साथ फलता-फूलता है और आखिरकार कभी ख़त्म हो जाता है। मसलन अतीत की सभ्यताओं में शहरों के लोग यह मानते रहे कि वे स्थाई रूप से बस गए हैं, पर हम जानते हैं कि वक्त के साथ वे विलुप्त हो गए। चूँकि एक शहर का मिट जाना एक सामूहिक अंत होता है, हम इसे अपने निजी जीने-मरने जैसा नहीं सोच सकते। दरअसल जैसे किसी नगर में वक्त के साथ आम जोड़-तोड़ चलते रहते हैं, शहर फिर भी जीता रहता है, उसी तरह इंसानी जिस्म में भी अलग-अलग अंगों में बीमारियाँ होती हैं तो वह पूरे जिस्म की मौत नहीं होती। पर एक दिन ऐसा कुछ होता है कि शरीर के तमाम अंग वाक़ई काम करने में नाक़ाबिल हो जाते हैं और हमारा अंत हो जाता है, जैसे कि इतिहास में नगरों में बसी सभ्यताओं के साथ हुआ, जब अचानक ही जंग-लड़ाई या किसी कुदरती आफत की वजह से वे ख़त्म हो गए। जिस्म तंतुओं, कोशिकाओं से बना है, और हर कोशिका में अपना संगठित ढाँचा है। छोटे-बड़े अणु हैं, जिनका काम तय है और जब ये अपना काम नहीं कर पाते तो बीमारियाँ होती हैं। जीवन-मृत्यु का विज्ञान इन अणुओं की कहानी है, जैसे किसी शहर का बने रहना वहाँ की तमाम सुविधाओं की दुरुस्ती पर निर्भर होता है। जब चारों ओर ऐसे विषयों पर बहुत अधिक बकवास चल रही है, वेंकी जैसे क़ाबिल शख्स से विज्ञान की सही जानकारी पाना काफी आश्वस्त करने वाला है। हालाँकि सफल पेशेवर वैज्ञानिक दार्शनिक या इतिहासकार नहीं होते, पर आम लोगों के लिए अपने तजुरबों पर लिखते हुए वे अक्सर खोज के संदर्भों और विज्ञान की तार्किक संरचनाओं को खूबसूरती से पेश करते हैं और हमें यक़ीन दिलाते हैं कि विज्ञान में चल रहे शोध की ताज़ा-तरीन कहानियाँ भी आम बोली में कही जा सकती हैं। इस प्रक्रिया में, वह हमें यह भी बताते हैं कि विज्ञान कैसे किया जाता है। उनके शब्दों में, "...लोग अपनी जिज्ञासाओं से प्रेरित होते हैं, और एक बात दूसरी किसी बात तक ले जाती है… प्रयोगों में दृढ़ता, अंतर्दृष्टि, प्रतिभा और दूरदर्शिता की अहमियत होती है, लेकिन साथ ही यह अचानक होती खोजों और सरासर क़िस्मत का भी खेल है।"


यह सामान्य ज्ञान है कि जैविक विकास के सिद्धांत और इसकी मुख्य खासियतों - कुदरती चुनाव और अनुकूलन, के बिना जीवों की दुनिया के बारे में कुछ भी समझ में नहीं आता है। पर यह बात हर कोई नहीं जानता है कि विकास यह भी बताता है कि जीवन के अणु - डी एन ए, आर एन ए, प्रोटीन और बाकी कोशिकी ताम-झाम, कैसे बने, और इन सबके पीछे का मक़सद क्या है। ज़िंदगी कब तक है और कितनी दुरुस्त है, यह हमारे जीन्-स में तय है, और ये जीन, हर कोशिका की नाभि में मौजूद डी एन ए में, कड़ियों में गुँथे हैं। एक साथ इन्हें हम जीनोम कह देते हैं। कोशिकाएँ बँटती-सँवरती रहती हैं और नई बनी कोशिकाओं में सारा जीनोम आ जाता है। कुछ कोशिकाएँ हमारे जीते-जी नया जीवन बनाने, यानी प्रजनन के काम आती हैं। ये जो भ्रूण से बढ़ती हुई पूरा एक नया प्राणी बन जाती हैं, इन कोशिकाओं में क्या खास हो सकता है? मानो ये कोशिकाएँ जीवन की घड़ी को वापस शून्य तक ले आती हैं और फिर से एक नए प्राण में टिक-टिक की रफ्तार से उम्र बढ़ती चलती है। इसी सवाल से बढ़ती उम्र के साथ होती समस्याओं को पलटने यानी बुढ़ापे को रोकने पर शोध के सिरे जुड़े हुए हैं। अगर कुदरत के इस खेल को हम जान लें और इस पर पूरा नियंत्रण हमारे हाथ आ जाए, तो शायद हम बूढ़े होने से बच जाएँ? पिछले दो सौ सालों में जो वैज्ञानिक ऐसे सवालों से जूझ रहे हैं, उनकी ज़िंदगियों के दिलचस्प किस्से हैं, जिनमें से कइयों पर वेंकी ने लिखा है। मसलन समाजवादी वैज्ञानिक जे बी एस हॉल्डेन अपने आखिरी सालों में भारत के नागरिक होकर यहीं बस गए थे। तक़रीबन सौ साल पहले रोनाल्ड फिशर के साथ मिलकर उन्होंने एक इंकलाबी खयाल पेश किया था। विकास के सिद्धांत मुताबिक कोशिका में अणुओं में हानिकारक बदलाव (म्यूटेशन) हों तो सफाई का काम कर रहे दूसरे अणु उन्हें कचरा बनाकर जिस्म से बाहर फेंक देते हैं। इस तरह ऐसे बदलावों से बचकर प्रजनन में अगली नस्ल की दुरुस्ती तय रहती है। पर बढ़ी उम्र में जब कुदरत हमें प्रजनन की हरकत के क़ाबिल नहीं रखती, तब ऐसे बदले अणु फेंके न जाते होंगे। इन पड़े रह गए बदले हुए जीन वाले अणुओं से सेहत पर होते नुकसान, यानी बुढ़ापे में होती बीमारियों में इनकी भागीदारी के बारे में हाल में ही हम जान पाए हैं (जैसे हंटिंगटन की बीमारी, जिसमें ज़ेहन की कोशिकाएं कमज़ोर पड़ जाती हैं)


यह धारणा कि केवल इंसान ही मृत्यु को समझ सकते हैं, एक सीमित सोच है, जो इंसान ने गढ़ ली है। जानवर भी उतना ही मृत्यु का अनुभव करते हैं जितना हम करते हैं और उम्र बढ़ने के बारे में हमारी अधिकांश समझ चूहों जैसे जानवरों पर किए गए शोध पर आधारित है। फलों पर मँडराती छोटी मक्खियों और तरह-तरह के केंचुए जैसे कीड़ों पर भी कई प्रयोग किए गए हैं। इस तरह चुने गए खास जानवरों पर शोध दिलचस्प बातें सामने आती हैं। छिपकली की पूँछ कट जाए तो वह वापस आ जाती है, यह हर कोई जानता है, पर ऐसा हाइड्रा जैसे और भी जानवरों के साथ होता है। एक तरह की जेली-फिश, जिसे अमर जेली-फिश कहा जाता है, बुरी तरह घायल होने पर अपनी तरुणाई की पहले के हाल में वापस लौट जाती है और इस तरह उसका जीवन फिर से शुरू हो जाता है। ये और दीगर जानवर कुदरती सीमाओं से कैसे जूझते हैं, यह समझ मिल जाए तो हमें अपनी दुरुस्ती क़ायम रखने के तरीके ढूँढने में मदद मिल सकती है। एक बात जो आम तौर पर इंसान समेत सभी जानवरों पर लागू होती है, वह यह है कि अगर हम भोजन में कैलोरी की मात्रा कम करें तो उम्र लंबी होने की संभावना बढ़ती है। ज़िंदा रहने के लिए कितनी कैलोरी की खपत हम कर सकते हैं, इस पर प्रयोगों से तरह-तरह के समीकरण पाए गए हैं। औसतन जैविक हरकतों में खपती ऊर्जा (मेटाबोलिज़्म) की दर जिस्म के वज़न के साथ दो-तिहाई के घात (पावर) का समीकरण बनाती है, यानी अगर वज़न आठ गुना बढ़ता है तो मेटाबोलिज़्म की दर चार गुने बढ़ेगी। संजोग ऐसा है कि इंसान समेत स्तनपायी जानवरों में जीवन काल में दिल की धड़कन तक़रीबन डेढ़ करोड़ तक होती है। औसत आयु में बढ़त के साथ यह संख्या भी बढ़ी है। गौरतलब बात यह है कि इससे एक नया समीकरण जीवनकाल और जिस्म के वज़न का बनता है। बहुत कम वज़न (1 कि.ग्रा.) के प्राणियों को छोड़ दें तो यह लगभग सभी के लिए सही बैठता है और इसके मुताबिक हमारी कुदरती आयु की तुलना में हम तीन-चार गुना ज़्यादा ही जी रहे हैं। बहरहाल हमारी उम्र आज की सीमा, यानी सौ साल, से और कितनी आगे बढ़ सकती है, इस पर बहस जारी है। पश्चिमी मुल्कों में, यानी बेहतरीन सेहत-सुविधाओं के साथ 100 साल से ज़्यादा की उम्र अब कोई अजूबा नहीं है। 100 साल तक की उम्र के तो कई लोग मौजूद हैं। पर औसत आयु में बढ़त हाल के सालों में कम हुई है, खास कर कोरोना महामारी के दौरान यह कमी दर्ज़ हुई। पर इसके पहले से ही ऐसा लगने लगा है कि हम 120 तक की कुदरती सीमा में बँधे हैं। साल 2001 में बुढ़ापा रोकने पर शोध करने वाले वैज्ञानिक स्टीवेन आउस्टाड ने साथी वैज्ञानिक एस जे ओलशांस्की के साथ डेढ़ सौ डालर की एक बाजी रखी कि तब (2001) धरती पर जी रहे इंसानों में से कोई एक, डेढ़ सौ की उम्र तक जिएगा। इस उम्मीद की बुनियाद शोध में तेजी से हो रही तरक़्क़ी है। खास तवज़्ज़ो इस बात पर है कि डी एन ए अणुओं को जिन भी वजहों से नुकसान पहुँचता है, उसकी मरम्मत करने वाले अणुओं की पहचान हो और उनकी तादाद कोशिकाओं में बढ़ाई जाए। इसी तरह क्रोमोज़ोम के अंत में पाए जाने वाले कुछ दुहराते जीन, जिन्हें टेलोमीयर कहा जाता है, उन पर भी काम चल रहा है, क्योंकि यह पाया गया है कि दुरुस्त कोशिकाओं में डी एन ए में टेलोमीयर जिस आकार के होते हैं, बँट चुकी कोशिकाओं में वे उससे छोटे हो जाते हैं। दूसरी ओर शरीर में चल रही प्रक्रियाओं पर सर्वांगीण दृष्टि से यह अब हर कोई मानता है कि हल्के स्तर की जिस्मानी कसरत से लंबी उम्र तक बेहतर दुरुस्ती क़ायम रहती है और जीवन-काल भी कुछ हद तक बढ़ता है। भविष्य में कभी बुढ़ापे की बीमारियों से निजात पाना मुमकिन होगा सोचकर कई लोगों ने मृत्यु के बाद अपनी देह को बहुत कम तापमान पर जमाकर रख दिया है, पर क्रायो-निक्स (कम तापमान का विज्ञान) नामक इस तकनीक को अभी तक वैज्ञानिक नहीं माना जाता। लब्बो-लुबाब यह कि बुढ़ापे की बीमारियों पर पहले से कहीं ज़्यादा बेहतर जानकारी आज मिल चुकी है, पर अब तक की बेहतरीन सेहत-सुविधाओं की मदद से उम्र की ऊपरी सीमा ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह साल बढ़ाई जा सकती है और यह भी महज अनुमान है। ज़ेहन की पुरानी कोशिकाओं की जगह नई कोशिकाएँ बड़ी धीमी गति से बनती हैं और इसलिए जल्दी ही उम्र के साथ कमज़ोर पड़ती याददाश्त में कोई बेहतरी होना दिखता नहीं है। यह तय है कि बुढ़ापे से वापस लौटकर उम्र कम कर पाना यानी फिर से जवान होना नामुमकिन है, भले ही मुनाफाखोर ऐंटी-एजिंग इंडस्ट्री ऐसे ऊल-जलूल दावे करती हो।


हाल में सूचना टेक्नोलोजी और कृत्रिम बुद्धि (ए आई – आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस) में निवेश से बड़ी जल्दी धनी हो गए लोगों की एक जमात है जो हमेशा के लिए अपनी ऐयाश ज़िंदगी जीना चाहते हैं। इन्होंने बुढ़ापे पर शोध के लिए उदारता से पैसे लगाए हैं। ए आई का बुनियादी सवाल मशीन में इंसान जैसी चेतना लाने का है, जो मूलत: संज्ञान यानी कॉग्निशन का सवाल है, और बढ़ती उम्र के साथ इंसान के ज़ेहन में बदलाव के तार भी इसी सवाल से जुड़े हैं। विज्ञान अपनी रफ्तार से चलता रहेगा, और बुढ़ापे पर शोध की रफ्तार वाक़ई अच्छी है, क्योंकि इसके लिए, खास तौर पर पश्चिमी मुल्कों में, अनुदानों और संसाधनों की कमी नहीं है। पर मौत ऐसा मौजूँ है कि कई बातें ज़ेहन में आती हैं, जो विज्ञान से इतर साहित्य, दर्शन आदि से जुड़ी हैं। एक गंभीर सवाल यह भी है कि क्या हमें वाक़ई कई सदियों तक जीवित रहना भी चाहिए। बढ़े हुए जीवन काल से नए सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मुद्दे सामने आएँगे। बढ़ती जनसंख्या, सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी, लंबी उम्र तक काम करना, युवाओं में बेरोज़गारी जैसी आम समस्याएँ तो हैं ही। पहले कंप्यूटर-साइंस का शोध कर बाद में बढ़ती उम्र के विज्ञान पर शोध (जीरोंटोलोजिस्ट) करने वाले ऑब्रे द ग्रे का यह मानना है कि बहुत लंबी उम्र तक जीने वालों के लिए जीवन में एक ही व्यक्ति से यौन-संबंध बनाए (मोनोगामी या एक-संगमन) रखने का कोई मायने नहीं रह जाएगा। अचरज नहीं कि द ग्रे ने कई स्त्रियों से रिश्ते बनाए और उस पर यौन-शोषण के इल्ज़ाम भी लगे।


मरने से ठीक पहले ज्यादातर लोग इस बात से परेशान होते हैं कि वे जैसा चाहते थे वैसा नहीं जी पाए, बल्कि ऐसे जीते रहे जैसी दूसरों ने उनसे उम्मीद रखी। इस तरह की सरल प्रकृति के से लेकर गहन अन्वेषण तक के अवलोकन ने सभी सभ्यताओं में चिंतकों को हमेशा परेशान किया है। गौतम बुद्ध ने सभी दुखों की वजह को चाहतों में चिह्नित किया, और दूसरों से समभाव रखते हुए प्यार करने और वर्तमान में रहने पर जोर दिया। राजा ययाति की कहानी हमें बताती है कि भले ही कोई व्यक्ति एक हजार साल तक युवा रह सकता है, जैसा कि उसने अपने पुत्र पुरु के साथ अपनी उम्र की अदला-बदली करके किया, लेकिन प्यास कभी नहीं बुझती है और अंततः दुख का अपना हिस्सा हर किसी को भुगतना पड़ता है। अमरता मृत्यु से भी बदतर हो सकती है। भीष्म को जब तक चाहे जीवित रहने का वरदान मिला और युद्ध में गिरने के बाद जब वे मरने को तैयार नहीं हुए तो उन्हें बाणों की शय्या पर लेटना पड़ा। 'गुलिवर्स ट्रेवल्स' (जोनाथन स्विफ्ट) में कथा-वाचक की ऐसे इंसानों से मुठभेड़ होती है जो हमेशा जीवित रहते हैं। उनकी उम्र में बढ़त कभी नहीं रुकती, अंततः खुश रहने के बजाय, वे पागल हो जाते हैं, दूसरे लोग उन्हें अपने पास नहीं आने देते हैं। एक सदी पहले, जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर ने अपना ज़्यादातर काम इस सवाल पर किया कि मौत के बारे में सचेत होना, और एक बेहतर, सुखी जीवन, में कैसा रिश्ता है। उसने इंसान को इस तरह कायनात की दीगर चीज़ों से अलग देखा कि हम जीने मरने पर संजीदगी से सोच पाते हैं। उसके काम ने ज्याँ-पॉल सार्त्र और अन्य अस्तित्ववादी विचारकों को प्रेरित किया। कहा जा सकता है कि जीवन की नश्वरता के अर्थ में मौत के बारे में सचेत होना और इस लिए बेहतर नैतिक जीवन जीना, कोई नई बात नहीं है और प्राच्य के चिंतन में यह हमेशा ही मौजूद रहा है। फ़र्क यह है कि हाइडेगर आधुनिक यूरोप में थे और उनके लिए इंसान कायनात के केंद्र में है। हालाँकि उसे भी इस बात की फ़िक्र थी कि ज़्यादातर लोग समाज के दायरों में फँसे रह जाते हैं और झुंड की मानसिकता के गुलाम होकर, मन-पसंद ज़िंदगी नहीं गुज़ारते, विड़ंबना देखिए कि खुद अपने स्वार्थ के लिए उसने हिटलर की नात्सी पार्टी की सदस्यता ले ली थी। जबकि कुछ लोग मृत्यु के बारे में जागरूक रहने को निजी ज़िंदगी में जीने के मायने खोजने के लिए एक दार्शनिक राह के रूप में देखते हैं, इससे अलग पीढ़ियों के बीच संघर्ष, इंसान में उम्र के साथ संज्ञानात्मक क़ाबिलियत में कमी, बुज़ुर्गों द्वारा फायदेमंद काम की गुणवत्ता आदि, जैसे व्यावहारिक मुद्दों के बारे में सर्वांगीण – विज्ञान और मानविकी में एक साथ, सीमाओं और सांस्कृतिक विभाजनों से परे हटकर, शोध होना ज़रूरी है। फिलहाल तो यह सही है कि उम्र के साथ हमारी नई बातें सीखने की, और जटिल सवाल हल करने की, क्षमता कम हो जाती है, हालाँकि तजुरबे का भंडार बढ़ता है, जो कई जगह कारगर साबित होता है। जो भी हो, अगर बुढ़ापा से निजात पाने के उपाय निकलते हैं, तो वह धनी-ग़रीब हर किसी को एक जैसे मिलने चाहिए। जब तक कोई काम करने के लायक है, उसे नौकरी छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यह न हो कि बड़ी उम्र तक लोग काम करते रहें तो युवाओं को नौकरियाँ न मिलें। ये बातें विज्ञान की कम और सामाजिक-राजनैतिक खित्तों की ज़्यादा हैं।


ऐसे वैज्ञानिकों और मुनाफाखोरों की कड़ी आलोचना होनी चाहिए जो इंसान की कमज़ोरी का फायदा उठाकर नीम-हकीमी का धंधा चालू रखते हैं और बिना पर्याप्त जानकारी के बाज़ार में बुढ़ापा टालने की ग़लत दवाएँ बेचते हैं। डेविड सिन्क्लेयर जैसे कुछ वैज्ञानिक बड़ी उम्र तक दुरुस्त बचने के लिए रेसवेराट्रॉल, मेटफॉरमिन और एन एम एन नामक दवाओं का भी प्रचार करते रहते हैं, जो सरासर अनैतिक है, क्योंकि इन दवाओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। सबसे अच्छे दिमाग वाले लोग भी शोहरत और महिमा के जाल में फंस जाते हैं और मुनाफाखोर कंपनियां अभी तक सिद्ध नहीं हुए इलाज और फार्मास्यूटिकल्स बेचने पर जोर देती हैं, जो अक्सर नैतिक मानदंडों का उल्लंघन करती हैं। ध्यान रहे कि राजनीतिक संरक्षण ने भारत में फार्मा कंपनियों द्वारा बड़े पैमाने पर उल्लंघन की अनुमति दी है, जिसके नतीजतन दूषित दवाएँ बेची गईं, जिससे यहां और अन्य देशों में कई मौतें हुईं, जिनमें कई छोटे बच्चे भी थे।


बेशक, मृत्यु के विषय पर सभी जिज्ञासाओं पर ठोस जानकारी हमारे पास नहीं है। मसलन एक दार्शनिक दृष्टिकोण सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत (जी टी आर – जेनरल थीओरी ऑफ रीलेटिविटी) से आता है - 'अतीत' और 'भविष्य' हर नाज़िर के सापेक्ष हैं, और इसलिए मृत्यु का कोई एक ठोस अर्थ नहीं हो सकता है। शायद किसी दिन हम जी टी आर और जैविक अणुओं के विज्ञान के बीच संबंधों के बारे में जान सकेंगे।

1Why We Die: The New Science of Aging and the Quest for Immortality, Venki Ramakrishnan, Hatchette, 2024

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Thursday, November 16, 2023

ए-आई में इंसान जैसी चेतना है या नहीं?

 कैसे कहें कि ए-आई में इंसान जैसी चेतना है या नहीं?

- 'स्रोत' (अक्तूबर 2023) में प्रकाशित

'उसे कौन देख सकता कि यगाना है वो यकता / जो दुई की बू भी होती तो कहीं दो-चार होता' - ग़ालिब का यह शेर है तो ईश्वर के लिए, पर इसे इंसान या किसी भी चेतन प्राणी के लिए भी कहा जा सकता है। दुई या द्वैत - यानी हम दिखते तो एक ही हैं, पर हमारा चेतन मन और हमारा जिस्म या शरीर, क्या ये दोनों एक हैं? हज़ारों सालों से यह सवाल इंसान को परेशान करता रहा है। आज जब हर क्षेत्र में विज्ञान और टेक्नोलोजी का बोलबाला है, यह खयाल फलसफे के दायरे से निकलकर वैज्ञानिक शोध का एक अहम सवाल बन गया है। खास तौर पर आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस (ए आई) यानी गैर-कुदरती समझ पर हर कहीं बातचीत हो रही है, और इस चर्चा में कॉंशस-नेस या चेतना पर जोर-शोर से बहस चल रही है। आखिर एक इंसान और मशीन में फ़र्क क्या है? हम अपने परिवेश के बारे में सचेत रहते हैं, चेतन होने की एक पहचान यह है। ऐसी रोबोट मशीनें अब बन रही हैं जो परिवेश की पूरी जानकारी रखती हैं। हमारी तरह ये मशीनें सड़क पर चलते हुए सामने पड़े पत्थर से बचकर निकल सकती हैं। कुछ हद तक ये मशीनें हमसे ज्यादा ताकतवर हैं, जैसे हम पत्थर के ऊपर से छलाँग लगाकर निकल सकते हैं तो मशीन ऊँचाई तक उड़ सकती है। कहीं आग लगी है तो हम वहाँ से दूर खड़े होकर आग बुझाएँगे, कहीं पानी पड़ा हुआ है तो हम कहीं से ईंटें उठाकर कीचड़ पार करने का तरीका ढूँढेंगे, ऐसे काम मशीनें भी कर सकती हैं। किसी भी सवाल पर जानकारी पाने के लिए हम जिस तरह किताबों-पोथियों में माथा खपाते हैं, कंप्यूटर पर चल रहे चैट-जी-पी-टी जैसे बड़े भाषाई मॉडल (लार्ज-लैंग्वेज़-मॉडल) हमसे कहीं ज्यादा तेजी से वह हासिल कर रहे हैं। मशीनें जटिल सवालों का हल बता रही हैं। दो साल पहले गूगल कंपनी में काम कर रहे इंजीनियर ब्लेक लीमोइन ने यह दावा किया कि LaMDA नामक जिस चैटबॉट का वह परीक्षण कर रहे थे, वह संवेदनशील था। इसकी वजह से आखिरकार उनको नौकरी छोड़नी पड़ी। पर इस घटना ने आम लोगों को मशीन में चेतना के सवाल पर विज्ञान कथाओं से परे शोध की दुनिया में ला पहुँचाने का काम किया।आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) सिस्टम, विशेष रूप से तथाकथित बड़े भाषा मॉडल जैसे कि एल-एम-डी-ए और चैट-जी-पी-टी, वाक़ई सचेत लग सकते हैं। लेकिन उन्हें मानवीय प्रतिक्रियाओं की नकल करने के लिए बड़ी तादाद में जानकारियों से प्रशिक्षित किया जाता है। तो हम वास्तव में कैसे जान सकते हैं कि क्या मशीनें हमारी तरह चेतन हैं? दरअसल पहली नज़र में जिस्मानी तौर पर इंसान और मशीन में फ़र्क वाक़ई अब कम होता दिख रहा है, जो फ़र्क हैं, उनमें अक्सर मशीन ज्यादा क़ाबिल और ताकतवर नज़र आती है। फिर भी हम मशीन को चेतन नहीं मानते। इसकी मुख्य वजह 'दुई' से जुड़ी है। ज़ेहन के बारे में जो वैज्ञानिक समझ हमारे पास है, उससे यह तो पता चलता है कि जिस्म के बिना चेतन वजूद नहीं होता, पर अब तक यह बहस जारी है कि क्या चेतना शरीर से अलग कुछ है? जैसे अलग-अलग कंपनियों के एक कंप्यूटरों में एक ही तरह का सॉफ्टवेयर काम करता है, क्या चेतना भी उसी तरह हमारे शरीर में मौजूद है, यानी अलग-अलग प्राणियों के शरीरों में वह एक जैसा काम कर रही है, जिससे हर प्राणी को सुख-दु:ख का एक जैसा एहसास होता है। या कि वाक़ई उसका कोई अलग वजूद नहीं है और हर प्राणी के शरीर में ज़ेहन में चल रही प्रक्रियाओं से ही चेतना बनती है? चेतना और संवेदना में फ़र्क किया जाता है; ऐंद्रिक एहसास संवेदना पैदा करते हैं, पर चेतना इससे अलग कुछ है जो अपने एहसासों से परे दूर तक पहुँच सकती है।


पिछले कुछ दशकों में मस्तिष्क की जाँच पर वैज्ञानिक शोध में बड़ी तरक़्की हुई है। आम लोग इसे बीमारियों के इलाज़ के संदर्भ में जानते हैं, जैसे एम आर आई (मैग्नेटिक रोज़ोनेंस इमेजिंग) या पी ई टी (पॉज़िट्रॉन इमेज टोमोग्राफी) आदि तकनीकों से ज़ेहन में चल रही प्रक्रियाओं के बारे में अच्छी समझ बनी है और कई मुश्किल बीमारियों का इलाज इनकी मदद से होता है। चेतना के विज्ञान में भी इन तकनीकों के इस्तेमाल से सैद्धांतिक समझ बढ़ी है। कई नए सिद्धांत सामने आए हैं, जो हमारे ऐंद्रिक एहसासों को ज़ेहन के अलग-अलग हिस्सों के साथ जोड़ते हैं और इसके आधार पर चेतना की एक भौतिक (मेटेरियल) ज़मीन बन रही है। सवाल यह नहीं रहा कि चेतना जिस्म से अलग कुछ है या नहीं, बल्कि यह है कि चेतना ज़ेहन में चल रही किन प्रक्रियाओं के जरिए वजूद में आती है। तंत्रिकाओं में आपसी तालमेल का कैसा पैमाना हो, इसके पीछे कैसे बल या अणुओं की कैसी आपसी क्रिया-प्रतिक्रियाएँ काम कर रही हैं? कोई कंप्यूटरों को चलाने वाले लॉजिक-तंत्र में तो कोई क्वांटम गतिकी में इस सवाल के जवाब ढूँढ रहा है। इन तक़रीबन एक दर्जन सिद्धांतों में से किस की कसौटी पर मशीन में पनप रही समझ को हम चेतना कह सकते हैं? -आई या रोबोट मशीनों पर काम कर रहे वैज्ञानिकों के लिए यह अहम सवाल है।


हाल में वैज्ञानिक शोध के सार्वजनिक वेब-साइट आर्काइव-डॉट-ऑर्ग में छपे एक परचे में (arxiv.org/abs/2308.08708) उन्नीस कंप्यूटर वैज्ञानिकों, तंत्रिका-विज्ञानियों (न्यूरो-साइंटिस्ट्स)और दार्शनिकों का एक समूह नया नज़रिया लेकर आया है। उन्होंने चेतना की खासियत की एक लंबी जांच सूची बनाई है, यानी कुछेक बातों से ही मशीन को चेतन न कह कर इन सभी खासियत की कसौटी पर खरा उतरने पर ही मशीन को चेतन कहा जाए। जाहिर है किसी रोबोट या ए-आई मशीन में सभी विशेषताएं नहीं भी हो सकती हैं। इस हाल में देखा जाएगा कि सूची में मौजूद कितनी विशेषताओं को हम किसी मशीन में देख पाते हैं। इससे हम यह कह पाएँगे कि किसी मशीन में किस हद तक चेतन होने की संभावना है, यानी चेतन हो पाने का एक पैमाना सा बन गया है। ऐसी जाँच से अंदाज़ा लग सकता है कि मशीनी शोध में चेतना तक पहुँचने में किस हद तक कामयाबी मिली है, हालाँकि यह कह पाना अब भी नामुमकिन है कि कोई मशीन वाक़ई चेतन है या नहीं। इस सूची में शोधकर्ताओं ने मानव चेतना के सिद्धांतों पर 14 मानदंड रखे हैं, और फिर वे उन्हें मौजूदा ए-आई आर्किटेक्चर (खाके) पर लागू करते हैं, जिसमें चैट-जी-पी-टी को चलाने वाले मॉडल भी शामिल हैं।

अमेरिका के सैन-फ्रांसिस्को शहर के ए-आई सुरक्षा केंद्र के सह-लेखक रॉबर्ट लॉंग के मुताबिक यह सूची से तेजी से बढ़ रहे इंसान जैसी क़बिलियत वाले ए-आई के मूल्यांकन का एक तरीका पेश करती है। अब तक यह बेतरतीबी से हो रहा था, पर अब एक पैमाना बन रहा है।

मोनाश यूनिवर्सिटी के कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंटिस्ट और कैनेडियन इंस्टीट्यूट फॉर एडवांस्ड रिसर्च (CIFAR) के फेलो अदील रज़ी, ने इसे एक अहम कदम माना है। हालाँकि वे भी मानते हैं कि सवालों के भरपूर जवाब नहीं मिल रहे, पर एक ज़रूरी चर्चा की शुरूआत हुई है। आज दुनिया भर में इन सवालों पर लगातार कार्यशालाएँ और विज्ञान-सभाएँ हो रही हैं और शोधकर्ता अपने काम पर परचे पढ़ रहे हैं। रॉबर्ट लॉंग और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इंस्टीट्यूट के दार्शनिक पैट्रिक बटलिन ने हाल में ही दो ऐसी कार्यशालाओं का आयोजन किया, जहाँ ए-आई में संवेदनशीलता का परीक्षण कैसे करें, इस पर चर्चाएँ हुईं।

अमेरिका के अर्वाइन शहर में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में काम कर रही एक कम्प्यूटेशनल न्यूरोसाइंटिस्ट मेगन पीटर्स जैसे कइयों के लिए इस मुद्दे का एक नैतिक आयाम है। अगर मशीन में चेतना की संभावना है तो क्या उसे भी इंसानों जैसी जिस्मानी बीमारियाँ होंगी, अगर हाँ तो इसका इलाज कैसे होगा। अब तक मानव-चेतना पर समझ शारीरिक क्रियाओं के साथ हमेशा मौजूद एक घटना सी रही है, जो बाहरी कारणों से नज़र, छुअन (या तंगनज़र होना या दर्द) आदि ऐंद्रिक एहसास तो पैदा करती है, पर एहसासों को खुद अंदरूनी तौर पर नहीं लाती; इसे फीनोमेनल कॉंशसनेस कहते हैं। इंसान की बीमारियों के इलाज के लिए एम आर आई या ई--जी (इलेक्ट्रो-एन्सेफलोग्राम) जैसी तकनीकें काम आती हैं, पर कंप्यूटर द्वारा चलने वाली मशीनों की बीमारी एल्गोरिदम में या प्रोग्राम में गड़बड़ी से होगी, तो उनकी जाँच कैसे की जाए? यहाँ एम-आर-आई या ई--जी काम नहीं आएँगे। तेल-अवीव विश्वविद्यालय के संज्ञान-तंत्रिका वैज्ञानिक (कॉग्निटिव न्यूरो-साइंस) लिआद मुद्रिक बताते हैं कि वे पहले एक सचेत होने की बुनियादी खासियत की पहचान के लिए मानव चेतना के मौजूदा सिद्धांतों की खोज करेंगे, और फिर इन्हें ए-आई के अंतर्निहित खाके में ढूँढेंगे। इस तरह से काम आने वाले सिद्धांतों की सूची बनाई जाएगी।

सूची में ऐसे ही सिद्धांत शामिल किए गए हैं, जो तंत्रिका-विज्ञान पर आधारित हैं और चेतना में हेरफेर करने वाली जाँच के दौरान मस्तिष्क के स्कैन से मिले आँकड़े जैसी प्रत्यक्ष जानकारी से जिनका प्रमाण मिलता है। साथ ही सिद्धांत में यह खुलापन होना ज़रूरी है कि चेतना जैविक न्यूरॉन्स की तरह ही कंप्यूटर के सिलिकॉन चिप्स से भी पैदा हो सकती है, भले ही वह गणना द्वारा होती हो।

छह सिद्धांत इन पैमानों में खरे निकले हैं। इनमें एक रेकरिंग (आवर्ती) प्रोसेसिंग सिद्धांत है, जिसमें फीडबैक लूप (चक्कर) के माध्यम से जानकारी पारित करना चेतना की कुंजी माना गया है। एक और सिद्धांत ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस थीओरी का तर्क है कि चेतना तब पैदा होती है जब सूचना की खुली धाराएं रुकावटें पार कर कंप्यूटर क्लिप-बोर्ड (जैसे आम कक्षाओं के ब्लैक-बोर्ड) जैसे पटल पर जुड़ती हैं, जहाँ वे आपस में जानकारियों का लेन-देन कर सकती हैं।

एच ओ टी (हॉट – हायर ऑर्डर थीओरी) या ऊँचे स्तर की थीओरी कहलाने वाले सिद्धांतों में चेतना में इंद्रियों से प्राप्त बुनियादी इनपुट को पेश करने और व्याख्या करने की प्रक्रिया शामिल है। दीगर सिद्धांत ध्यान को नियंत्रित करने के लिए तंत्र के महत्व और बाहरी दुनिया से सही-ग़लत की जानकारी पाने वाले ढाँचे पर जोर देते हैं। छह शामिल सिद्धांतों में से टीम ने सचेत अवस्था के अपने 14 संकेत निकाले हैं। कोई ए-आई आर्किटेक्चर इनमें से जितने अधिक संकेतकों को दिखलाता है, उसमें चेतना होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। मशीन लर्निंग विशेषज्ञ एरिक एल्मोज़निनो ने चेक-लिस्ट (जाँच की सूची) को अलग-अलग आर्किटेक्चर वाले कई ए-आई नमूनों पर लागू किया। जैसे इनमें तस्वीरें बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले डाल-2 नामक एआई शामिल हैं। किस पर जाँच की जाए, यह फैसला करना मुश्किल है और इसके लिए अनजान क्षेत्रों में हाथ-पैर चलाने पड़ते हैं। कई आर्किटेक्चर ऐसे थे जिन पर रेकरिंग प्रोसेसिंग सिद्धांत के संकेतकों के लिए बने खाने पर टिक ( - सही का चिह्न) लगाया गया। चैट-जी-पी-टी जैसा एक बड़ा-भाषा-(एल एल एम) मॉडल ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस की खासियत के करीब दिखा।

गूगल का PaLM -E, जो विभिन्न रोबोटिक सेंसरों से इनपुट लेता है, "एजेंसी और एंबाडीमेंट (चेतना की ढाँचे में मौजूदगी)" की कसौटी पर खरा उतरा। और एल्मोज़्निनो के मुताबिक जरा सी छूट दें तो इसमें कुछ हद तक ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस भी दिखता है।

डीपमाइंड कंपनी का ट्रांसफॉर्मर-आधारित एडेप्टिव एजेंट (ए डी ए), जिसे एक बनावटी 3-डी (तीन-आयामी) स्पेस में एक नमूना नियंत्रित करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था, वह भी "एजेंसी और एंबाडीमेंट" के लिए सही निकला, भले ही इसमें PaLM -E जैसे भौतिक सेंसर का अभाव है। ए डी ए में मानकों के अनुरूप होने की सबसे अधिक संभावना थी, क्योंकि इसमें परिवेश के भौतिक फैलाव की अच्छी समझ दिखी।

यह देखते हुए कि किसी भी ए-आई पर मुट्ठी भर खानों से अधिक पर टिक नहीं लगाए जा सकते हैं, इनमें से कोई भी चेतना के लिए एक तगड़ा उम्मीदवार नहीं है, हालांकि एल्मोज़निनो के मुताबिक इन खासियत को ए-आई के डिजाइन में डालना मामूली बात होगी।" अभी तक किसी के ऐसा नहीं कर पाने की वजह यह है कि इनकी मौजूदगी से मिलने वाले फायदें पर साफ समझ नहीं है।

परचे के लेखकों का कहना है कि उनकी चेक-लिस्ट पर काम चल रहा है। और यह इस तरह की अकेली कोशिश नहीं है। रज़ी के साथ समूह के कुछ सदस्य, सी आई एफ ए आर के अनुदान से शुरू हुई, चेतना पर बड़ी जाँच (शोध) की योजना में शामिल हैं, जिसमें तंतुओं से बने अंगों-जैसे ऑर्गेनॉएड्स, जानवरों और नवजात शिशुओं पर काम किया जा सकता है। उन्हें अपने शोध पर अगले कुछ महीनों में एक और परचा तैयार करने की उम्मीद है।

ऐसी सभी योजनाओं के लिए समस्या यह है कि अभी जो सिद्धांत हमारे पास हैं, वे मानव चेतना की हमारी अपनी समझ पर आधारित हैं। पर चेतना दीगर रूपों में आ सकती है, यहां तक कि हमारे साथी स्तनधारी प्राणियों में भी वह मौजूद हो सकती है। अमेरिकन दार्शनिक थॉमस नेगल ने साठ साल पहले कभी यह सवाल रखा था कि अगर हम चमगादड़ होते तो कैसे होते यानी एक तरह की चेतना चमगादड़ों में भी है, हम कैसे जानें कि वह हमारी जैसी है या नहीं। जाहिर है कि ये सवाल जटिल हैं और आगे इस दिशा में तेजी से तरक़्की होने की उम्मीदें बरकरार हैं।



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