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बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Wednesday, March 26, 2025

लोकधर्म को नमाज़ अदा करने को तड़पता फिल्मकार

- 'समयांतर' के फरवरी अंक में प्रकाशित

- ‘नमाज़ आमार होइलो ना आदाय ओ आल्लाह'


ऋत्विक घटक के बारे में ज़्यादातर बातें फिल्मों के संदर्भ में होती है - बहुत अच्छे फिल्म निर्देशक थे, बहुत ही कम पैसों में उम्दा फिल्में उन्होंने बनाईं; फिल्म बनाने का उनका अनोखा नज़रिया था, जो पिछली सदी के फिल्मकारों में सबसे अनोखा था, आदि। दरअसल ऋत्विक घटक एक फिल्मकार ही नहीं, बीसवीं सदी के सबसे अनोखे हिंदुस्तानियों में एक है। बांग्ला के मशहूर लोक-संगीत आलोचक कालिका प्रसाद भट्टाचार्य ने एक साक्षात्कार में यह बताया कि बंगाल के विभाजन की जो पीड़ा बुद्धिजीवियों में है, उसमें सबसे ज्यादा ईमानदारी दो लोगों में दिखती है - एक थे लोक-संगीत को सर्वहारा वर्गों की ओर मोड़ने और आधुनिक जामा पहनाने वाले हेमांगो बिश्वास, और दूसरे ऋत्विक घटक थे। कहा जाता है कि कहीं फिल्म की शूटिंग करने जाते हुए हवाई जहाज से नीचे बहती पद्मा नदी को देखकर ऋत्विक घटक चीख-चीख कर रोने लग गए थे। हेमांगो बिश्वास के एक गीत का मुखड़ा है - आमार मन कांदे रे - पोद्दार पारे लाइगा ओ गृही मन कांदे रे - मेरा जी रो रहा है, पद्मा नदी के लिए ओ गृही रे, जी रोता है।

उनकी फिल्म 'जुक्ति, तोक्को आर गप्पो' (तर्क, बहस और गल्प) में कोलकाता शहर में गंगा नदी के किनारे एक फकीर को गाते हुए दिखाया गया है। वैसे यह कोई बड़ी बात नहीं है, पर गौरतलब यह है कि जब यह फिल्म बनी थी, कोलकाता बंगाली हिंदू अक्सरियत का शहर था और गंगा नदी के किनारे तमाम क़िस्म के सनातनी साधु संत मौजूद होते हैं। ऋत्विक ने चुनकर एक बाउल फकीर को दिखाया, जो यह गीत गा रहा है कि मुझे किसानी और गाँव की मजबूर और मसरूफ ज़िंदगी में इतना वक्त नहीं मिला कि मैं पाँच में से किसी वक्त की नमाज पढ़ पाऊं, हे अल्लाह! इस फिल्म पर चर्चा करते हुए अक्सर लोग उन की सोच पर वेद-उपनिषदों के प्रभाव वगैरह की बात करते हैं, पर इस पर कोई चर्चा नहीं होती कि ऋत्विक एक घोर धर्म निरपेक्ष शख्स था। वह एक ऐसा शख्स था, जिसे इंसानियत को सबसे पहले सामने रखकर अपनी बात करनी थी।

सिनेमा को कविता की तरह कैसे पेश किया जाए, इसकी सबसे खूबसूरत मिसाल फिल्म 'मेघे ढाका तारा' - बादलों में छिपा तारा - है। पंजाब और बंगाल का विभाजन हाल की सदियों में दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी त्रासदी है। करोड़ों घर उजड़े, लाखों हत्याएं हुई, स्त्रियों और बच्चों पर बेइंतहा जुल्म हुए। पंजाबी अदब में रोमांटिक कवि माने गए शिव कुमार बटालवी ने लिखा, 'माए नी माए, मेरे गीतां दे नैणा विच बिरहो दी रड़क पवे, अद्धी अद्धी रातीं उठ, रोण मोए मित्तरां नीँ, माए सानूँ नींद ना आवे' -ओ माँ, मेरे गीतों की आँखों में विरह की किरचें हैं, आधी रातों को उठ कर मर चुके साथियों की याद में रोते हैं, मुझे नींद नहीं आती। यह क्रंदन ऋत्विक की फिल्मों में हर कहीं है। ऐसी एक चीख इस ज़मीन से निकली, वह गगन भेदी चीख एक ओर अमृता प्रीतम की 'अज्ज आक्खां वारिस शाह नूँ' कविता में दिखती है, तो दूसरी ओर बंगाल के कला और अदब में कभी मानिक बंद्योपाध्याय की कथाओं में तो कभी ऋत्विक घटक की फिल्मों में दिखती है। 'मेघे ढाका तारा' में यह पीर फिल्म के परदों से उतर कर इंसानियत के बड़े कैनवस पर छा जाती है। गहराई से देखा जाए तो ऋत्विक ने वाक़ई इस फिल्म के जरिए एक महाकाव्य रचा है, जो हज़ारों सालों तक पढ़ा जाएगा। 1960 में बनी 'मेघे ढाका...' तीन फिल्मों की कड़ियों में पहली है - इसके बाद कोमल गांधार 1961 और सुबर्नो-रेखा 1962 में बनीं। बँटवारे की तड़प और पीर, को इतनी गहराई से देखना और दिखाना, बेबसी की ऐसी चार-फाड़ इससे पहले कभी नहीं हुई। इस पीर को साफ कह पाना मुमकिन नहीं है, इसीलिए तो मंटो तबाह हो गया, सथ्यू की 'गरम हवा' आज तक सवाल बन खड़ी है। ऋत्विक का कहना था कि उम्दा फिल्म हमें हँसने-रोने से परे नई दिशाएँ दिखलाती है और गहराई तक जाया जाए तो ऐसी अंजान जगह ले जाती है, जहाँ कुछ कह पाना मुमकिन नहीं रहता। हम देखते हैं कि एक कहानी है, प्यार है, धोखा है, दिलो-जाँ की बातें हैं, पर अचानक ही हम पूछने लगते हैं कि क्यों, कैसे। ऋत्विक मिथकों का इस्तेमाल करते हैं, पर ऐसे कि उनके नए मायने सामने आते हैं। वह मानो प्राक-आधुनिक और उत्तर आधुनिक सभ्यताओं के सह-अस्तित्व मे दरारें ढूँढते फिर रहे थे। सर्रीयल फिल्म-कला में उनकी महारत लाजवाब थी। उनकी फिल्मों के संगीत निर्देशकों में बहादुर खान जैसे शास्त्रीय संगीत के उस्ताद थे, तो साथ ही रवींद्र-संगीत का भरपूर इस्तेमाल भी था। 'मेघे ढाका तारा' में एक पारंपरिक गीत की चार पंक्तियाँ बार-बार दुहराई गई हैं, जिसमें सतही तौर पर माँ बेटी को विदा करने से पहले विलाप करती है, पर यह विलाप फैलता जाता है और अंजाने ही वक्त की त्रासदी की सुगबुगाहट बन जाता है।

बांग्ला अदब में हाल के वक्त में सबसे प्रभावशाली और अराजक उपन्यास लेखक नबारुण भट्टाचार्य ने ऋत्विक घटक की याद में व्याख्यान देते हुए यह कहा था कि कुछ आलोचक ऋत्विक की फिल्मों में कला का व्याकरण नहीं ढूंढ पाए। नबारुण ने नाराज़गी जताते हुए कहा था - अरे सालो, वो फिल्म का ग्रामर बना रहा है। यह ग्रामर सीखो। ... घिनौनी तबाह हो चुकी किसी चीज़ को खूबसूरत नहीं बनाया जा सकता। ... इंसान के प्रति विश्वसनीय होना, ग़रीब के प्रति ईमानदार होना, यह कला की शर्त है। पैसे-वालों के साथ खुशमिज़ाजी से कला नहीं बनती।...’ नबारुण का ऋत्विक के साथ पारिवारिक संबंध था। उसके पिता बिजन भट्टाचार्य – महाश्वेता देवी के पति - ने ऋत्विक के नाटकों और फिल्मों में अभिनय किया था।

'जुक्ति, तोक्को आर गप्पो' उसकी आखिरी फिल्म (1977) है और इसमें ऋत्विक की सोच आक्रामक होकर सामने आती है। फिल्म में खुद अभिनय किया है, उसके बेटे ने भी हिस्सा लिया और साथ में उन दिनों नाटकों की सबसे मशहूर माँ और बेटी तृप्ति और साँओली मित्रा भी हैं। यहाँ आज़ादी के बाद हिंदुस्तान के हर इदारे पर, हर परिभाषा पर, खास तौर पर बंगाल की हर बौद्धिक प्रवृत्ति पर सवाल उठते दिखते हैं। मुख्यधारा के सिनेमा और अदब पर तो चोट है ही, यह एक तरह का आत्म-दाह है। उत्पल दत्त के जिम्मे दिए किरदार सत्यजित बसु के जरिए इसमें उन दिनों के शिखर माने जाने वाले बौद्धिकों पर तीखा व्यंग्य है। फिल्म की शुरूआत भुखमरी के शिकार एक ग़रीब बुज़ुर्ग से होती है, जिसकी फिल्म की कहानी में कोई जाहिरा भूमिका नहीं है, उदासीन नज़रों से वह हमारी ओर देखता है, जैसे हम और हमारा समाज अपने चारों ओर हो रही घटनाओं को उदासीन नज़रों से देखते हैं। इसके ठीक बाद काले वेष में तीन आकृतियों का आधुनिक शैली में नृत्य है, जो शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत के ताल पर है। फिल्म में एक जगह संस्कृत भाषा के एक पंडित और संथाल परगना के एक आम संस्कृति-कर्मी के बीच भाषा पर रोचक बहस है। लोक-संस्कृति के नज़रिए से संस्कृत म्लेच्छ यानी विदेशी ज़बान है, क्योंकि यह आम लोगों की ज़बान नहीं है। यानी पंडिताई – चाहे वह संस्कृत की हो या अंग्रेज़ी की गुलामी हो, ऋत्विक के लिए दोनों जनविरोधी हैं। नबारुण ने कहा था कि ऋत्विक बुद्ध की तरह अपनी कुलीनता का त्याग कर रहा था, और लोगों के बीच जगह ढूँढ रहा था। वह इप्टा का और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रह चुका था, पर मूलत: वह अराजक लोकपक्षी विचारक और संस्कृतिकर्मी था। 'जुक्ति, तोक्को आर गप्पो' में उसने मानो अपनी रूह के हर पुर्जे को खोलकर सामने रख दिया है। हर दृश्य, कहानी का हर हिस्सा गहरी समझ के साथ रखा गया है - बेरोज़गार इंजीनियर नचिकेता और बांग्लादेश से भाग कर आई बंगो-बाला, इन दो चरित्रों के जरिए बंगाल के बँटवारे की तक़लीफ और दोनों ओर समकालीन राजनीति में पिटते आम लोगों की बेबसी में खुद की तलाश करता फिल्मकार।

ऋत्विक की बनाई डॉक्यूमेंटरी फिल्म 'आमार लेनिन' (1970) पर कम चर्चा हुई है। लेनिन की शतवार्षिकी पर पश्चिम बंगाल सरकार के लिए बनाई इस फिल्म पर प्रतिबंध लग गया था। कुछ साल पहले इसे फिर से सामने लाया गया है। लोक-संस्कृति (ग्रामीण नाटक-शैली : जात्रा) के जरिए आम लोगों तक लेनिन, रूसी क्रांति और साम्यवाद के आदर्शों को लाती यह फिल्म आदर्श कलात्मक डॉक्यूमेंटरी है। बंगाल के कम्युनिस्ट नेताओं को यह बात रास नहीं आई होगी कि उनमें से किसी को न चुन कर एक सामान्य सर्वहारा को उसने 'आमार लेनिन' (मेरा लेनिन) कहा। कई लोग मानते हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों ने सक्रिय रूप से उसकी फिल्मों का बहिष्कार किया, हालाँकि इसका कोई सबूत नहीं है।

ऋत्विक का बजट बेहद कम होता था। इस वजह से अद्वैत मल्लबर्मन के उपन्यास पर आधारित 'तितास एकटि नदीर नाम' (1973) जैसी महान फिल्म उचित जगह नहीं बना पाई। फिल्म को बनाते वक्त ऋत्विक को यक्ष्मा हो गया था और इस दौरान उसकी सेहत काफी बिगड़ गई थी। इस फिल्म का कथानक बांग्लादेश के ब्राह्मण-बाड़िया इलाक़े में तितास नदी के किनारे रह रहे मछुआरों पर आधारित है। फिल्म में ऋत्विक खुद एक मल्लाह की भूमिका में आते हैं। सतही तौर पर महज आम मछुआरों की ज़िंदगी की कहानी लगती यह फिल्म दरअसल परंपरा और हाशिए पर खड़े एक समुदाय के संघर्ष की अद्भुत कहानी है। तितास नदी महज नदी नहीं, फिल्म में एक किरदार सी लगती है। ऋत्विक के निर्देशन की खूबी यह थी कि इसमें उसकी अपनी व्यापक पढ़ाई और विश्व-पटल पर हो रहे कलात्मक प्रयोगों के ज्ञान का भरपूर इस्तेमाल था। 'तितास ...’ में भी ये बातें हैं, जो पारखी दर्शकों को दिख जाती हैं। यह हिंदुस्तान की पहली (और विश्व-पटल पर पहली कुछ में से एक) 'हाइपर-लिंक' फिल्म मानी जाती है, जिसमें कई चरित्रों और कथाओं को एक धागे में बगैर किसी बँधे क़ायदे के पिरोया गया है। निर्जीव को जीवंत किरदार की तरह पेश करने की खूबी ऋत्विक की फिल्मों में हर कहीं है, खास तौर पर 'अजांत्रिक' में एक गाड़ी को किरदार बनाने का अनोखा प्रयोग है।

इस साल ऋत्विक के जन्म की शतवार्षिकी है। हिंदुस्तानी सिनेमा में उसका योगदान सदियों तक याद रखा जाएगा। उसकी फिल्मों से प्रेरणा लेकर कई भाषाओं में फिल्में बनाई गई हैं, जिनमें हॉलीउड की भी कुछ फिल्में शामिल हैं। पूना के फिल्म इंस्टीटिउट में बिताए उसके दिनों के दौरान वहाँ मौजूद कलाकारों ने अक्सर उनके अपने काम पर उसके असर के बारे में कहा है। आज इस महान शख्सियत को हम कैसे याद करें, जो 'मेघे ढाका तारा' की नायिका की ज़ुबान से कह गया कि मैं जीना चाहता हूँ - दरअसल वह बंगाल या हिंदुस्तान की पीर सुना गया कि यह मुल्क़ जीना चाहता है। इस तड़प को बयां करता वह सजदा करता रह गया, चीखता रह गया।

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Sunday, July 28, 2013

समय बीतता है


समय बीतता है और धीरे धीरे हमारे समय के लोग हमें छोड़ जाते हैं। इस महीने जिन के जाने का ग़म भारी रहा, उन दोनों को निजी रूप से मैंने नहीं जाना। शर्मिला रेगे से एक बार मिला, पर बड़ी गोल मेज के इधर उधर और ओबेद सिद्दीकी से कभी नही मिला। एकबार शायद बंगलौर विज्ञान अकादमी की सभा में देखा था।

पिछले साल यू जी सी की एक समिति में मैं और शर्मिला दोनों थे। अक्तूबर के आस-पास मैं उनसे जानना चाहता था कि प्रस्तावित फेलोशिप्स के बारे में उनकी राय क्या है और मैंने फ़ोन पर बात करने की कोशिश की। दो एक बार कोशिश करने पर भी नहीं मिलीं। उनके दफ्तर की किसी महिला ने बतलाया कि वे सुबह साढ़े सात बजे दफ्तर आती हैं और लंबी क्लास लेती हैं। डेढ़ बजे तक नहीं मिलतीं। मुझे आश्चर्य हुआ। दो एक बार कोशिश कर छोड़ दिया। एक बार मीटिंग में जब मिला था, थोड़े समय के लिए वे आईं, क्योंकि स्त्री प्रसंग पर बनी किसी और समिति में भी वे थीं। तब वे मुझे थकी हुई दिखीं। उनकी तस्वीर मैंने देखी थी, पर सामने देख कर चकित हुआ था। इतनी दुबली सी एक इंसान, जिसने इतना महत्त्वपूर्ण काम किया है! दलित और स्त्री प्रसंग पर मैंने उनके कुछ आलेख पढ़े हैं, किताबों पर समीक्षाएँ पढ़ी हैं, पर पूरी किताब कोई नहीं पढ़ी। पर जितना पढ़ा, उनसे प्रभावित हुआ। अब मुझे लगता है कि एक माह कैंसर से पीड़ित रहकर उनके गुज़र जाने की ख़बर शायद सही नहीं, शायद उनको लंबे समय से पता था कि वे बीमार हैं। इसलिए अपने आप को पूरी तरह काम में झोंक दिया होगा। एक इतने बढ़िया इंसान को और अधिक न जान पाने की तकलीफ कचोटती है।

1987 में जब पहली बार हरदा गया था, उसके कुछ ही दिनों पहले ओबेद वहाँ आए थे। एकलव्य संस्था के स्थानीय केंद्र के प्रभारी अनवर जाफरी के वे मामा लगते थे। हरदा में उन्होंने पुरानी लाइब्रेरी में आम लोगों के लिए विज्ञान पर व्याख्यान दिया था। बाद में जब चंडीगढ़ में जब चेतन से परिचय हुआ तो पता चला कि उसने मुंबई की टी आई एफ आर (टाटा बुनियादी शोध संस्थान) में उनकी लैब में एक अरसा काम किया था। अनवर, चेतन दोनों से उनके बारे में रोचक कहानियाँ सुनी थीं। विज्ञान और वैज्ञानिक शोध में उनकी निष्ठा के किस्से, उनकी बच्चों जैसी जिज्ञासा, हर जगह इन पर चर्चे होते। अभी दो साल पहले उनके बेटे इमरान से मिला था जो स्वयं हैदराबाद के सी सी एम बी (कोशिकीय और आणविक जीवविज्ञान केंद्र) में कार्यरत प्रख्यात वैज्ञानिक हैं। अनवर और इमरान के साथ तकरीबन पूरा दिन बिताया और शाम को मेरे घर लंबी बातचीत हुई, जिसमें अक्सर ओबेद का ज़िक्र होता।

इस तरह दिन बीतते हैं। पिछले बुधवार को ओरल हिस्ट्री असोसिएशन ऑफ इंडिया (भारतीय वाचिक इतिहास संगठन) आयोजित प्रो. प्रमोद श्रीवास्तव के काला पानी कैदियों के वाचिक इतिहास पर व्याख्यान सुनने मैं अपने दो युवा सहयोगियों के साथ जा रहा था। बंगलौर में बढ़ती ट्रैफिक समस्या पर चर्चा करते हुए शांतनु ने कहा कि अभी एन सी बी एस (राष्ट्रीय जैविक-विज्ञान केंद्र) के एक बड़े वैज्ञानिक स्कूटर की टक्कर खाकर जान गँवा बैठे, मैंने नाम पूछा तो ओबेद। फिर दो एक दिनों में खबर देश भर में फैली और बड़ी तादाद में लोगों ने अफसोस व्यक्त किया।

वाचिक इतिहास संगठन ने परसों दीपा धनराज की बनाई फिल्म 'क्या हुआ इस शहर को' दिखलाई। 1984 में राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में कांग्रेस की भ्रष्ट राजनीति और बी जे पी/आर एस एस और एम आई एम की सांप्रदायिक राजनीति के शिकार आम लोगों की ज़िंदगी पर यह अद्भुत डाक्यूमेंटरी है और आज भी बहुत प्रासंगिक है। कविता के अंत में सर्वेश्वर की इस कविता की कुछ पंक्तियाँ पढ़ी जाती है (अफलातून ने 'असम' शीर्षक इसकविता के बारे में लिखा है कि '1982 में समता संगठन द्वारा आयोजित 'असम-बचाओ साइकिल यात्रा' के मौके पर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने यह कविता साइकिल यात्रियों को लिख दी थी')-
यदि तुम्हारे घर के
एक कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में सो सकते हो ?यदि तुम्हारे घर के एक कमरे में
लाशें सड़ रहीं हों
तो क्या तुम
दूसरे कमरे में प्रार्थना कर सकते हो ?यदि हां
तो मुझे तुम से
कुछ नहीं कहना है ।
देश कागज पर बना
नक्शा नहीं होता
कि एक हिस्से के फट जाने पर
बाकी हिस्से उसी तरह साबुत बने रहें
और नदियां , पर्वत,शहर,गांव
वैसे ही अपनी-अपनी जगह दिखें
अनमने रहें ।
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे तुम्हारे साथ
नहीं रहना है ।
इस दुनिया में आदमी की जान से बड़ा
कुछ भी नहीं है
न ईश्वर
न ज्ञान
न चुनाव
कागज पर लिखी कोई भी इबारत
फाड़ी जा सकती है
और जमीन की सात परतों के भीतर
गाड़ी जा सकती है।
जो विवेक
खड़ा हो लाशों को टेक
वह अंधा है
जो शासन
चल रहा हो बंदूक की नली से
हत्यारों का धंधा है
यदि तुम यह नहीं मानते
तो मुझे
अब एक क्षण भी
तुम्हें नहीं सहना है ।
याद रखो
एक बच्चे की हत्या
एक औरत की मौत
एक आदमी का
गोलियों से चिथड़ा तन
किसी शासन का ही नहीं
सम्पूर्ण राष्ट्र का है पतन ।
ऐसा खून बहकर
धरती में जज्ब नहीं होता
आकाश में फहराते झंडों को
काला करता है ।
जिस धरती पर
फौजी बूटों के निशान हों
और उन पर
लाशें गिर रही हों
वह धरती
यदि तुम्हारे खून में
आग बन कर नहीं दौड़ती
तो समझ लो
तुम बंजर हो गये हो -
तुम्हें यहाँ साँस लेने तक का नहीं है अधिकार
तुम्हारे लिए नहीं रहा अब यह संसार।
आखिरी बात
बिल्कुल साफ
किसी हत्यारे को
कभी मत करो माफ
चाहे हो वह तुम्हारा यार
धर्म का ठेकेदार ,
चाहे लोकतंत्र का
स्वनामधन्य पहरेदार ।
मुझे यह बात रोचक लगी कि 1984 के चारमीनार में वह भाग्यलक्ष्मी मंदिर कहीं नहीं दिखता जिसको लेकर हाल में छिटपुट दंगे हुए हैं। हालाँकि मुझे तो यह मालूम था, फिर भी इस मायने में यह फिल्म एक और दस्तावेज बन गई है।
हैदराबाद के हाल के इतिहास के बारे में और 1948 के पुलिस ऐक्शन (हैदराबाद राज्य के भारत में विलयन) में हुए निर्दोषों के कत्लेआम पर हाल में बनी एक बढ़िया फिल्म 'दक्खनी सोल्स' काज़ रहमान की है। मैंने पिछले साल यह फिल्म हैदराबाद विश्वविद्यालय में देखी थी। मौका मिले तो इसे ज़रूर देखिए। मैं उन दिनों वहाँ आए अतिथि प्रोफेसर रमेशचंद्र शाह को साथ ले गया था - उन्हें फिल्म अच्छी नहीं लगी थी। पर मुझे यह ज़रूरी फिल्म लगी। 

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Monday, January 18, 2010

ठंड के दो दिन और

इधर कुछ दिनों से चंडीगढ़ में भयंकर ठंड की मार से परेशान रहा। पिछले शुक्रवार को सीमांत अंचल के एक कालेज में भाषण का न्यौता आया तो खुशी खुशी चला। शनिवार को कोई दो तीन सौ छात्राओं से बात चीत हुई। विज्ञान, दर्शन आदि के अलावा कविता पर भी बातें हुईं। दो ईरानी फिल्में भी ले गया था - पनाही की 'आफसाइड' और मखमलबाख की 'द डे आई बिकेम अ वुमन (रोज़ी के ज़ान शोदाम)'।
रविवार को कालेज का वार्षिक मेले का उद्घाटन किया और वापस लौटा। जितना अच्छा युवाओं के बीच रहने से लगा, उतनी ही कोफ्त औपचारिकताओं से हुई। ऐसे अवसरों पर बार बार अपनी प्रशंसा सुनते हुए अजीब सा लगता है, क्योंकि हर ऐरे गैरे के लिए इसी ही तरह के प्रशंसात्मक भाषण होते हैं, यह छोटे शहर की मानसिकता है। बहरहाल इसी बहाने ठंड के दो दिन और कटे, कुछ सार्थक बातचीत हुई और अच्छा लगा कि बड़े शहरों से दूर सीमावर्त्ती इलाके में भी बौद्धिक सक्रियता है।
हुसैनीवाला चेकपोस्ट पर भी गए और वही बेवकूफी भरी रीट्रीट सेरीमोनी देखी, जिसमें नफरत का प्रदर्शन कर तालियाँ ली जाती हैं, इस बारे में पहले भी कभी लिखा है।
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मेरे पास कामरेड ज्योति बसु के साथ मेरा एक फोटोग्राफ था। करीब बीस साल पहले एक बार वामपंथी छात्रों के बुलाने पर वे पंजाब यूनिवर्सिटी आए थे। 'संस्कृति' नामक जिस संस्था का बुलावा था, उसका फैकल्टी पेट्रन मैं था। इसलिए उनके साथ ही बैठा था। आज हिंदू में उन पर लिखा वाक्य पढ़ा कि कपड़ों के मामले में 'He was immaculate in dress and bearing...' तो याद आया कि फोटो में मेरा सस्ता मोजा जिसका इलास्टिक खराब हो गया था दिखता था। इस बात से मुझे थोड़ी झेंप भी थी। मुझे याद आ रहा है कि स्टेज पर उनके साथ बैठने में मुझे झिझक तो थी ही, लड़कों के कहने पर बैठ ही गया तो थोड़ी थोड़ी देर बाद मोजा खींच रहा था। पाँचेक साल पहले सी पी एम के राज्य सचिव बलवंत सिंह ने (वे भी उस फोटो में थे - ज्योति बाबू के एक ओर मैं था - दूसरी ओर बलवंत सिंह; अब ये पार्टी में नहीं हैं) मुझसे वह फोटोग्राफ ले लिया। संस्कृति में उन दिनों जो छात्र नेतृत्व की भूमिका में थे, उनमें से एक फिल्म इंडस्ट्री में है, दूसरा अमरीका में है। ये सी पी एम के छात्र संगठन एस एफ आई से जुड़े थे। चूँकि 'संस्कृति' अपने आप में सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए बनाई गई थी, इसलिए तय हुआ था कि पार्टी के नारे नहीं लिए जाएँगे। पर जब ज्योति बाबू आए तो एस एफ आई के लड़कों ने लाल सलाम के नारों से आस्मान फाड़ दिया। इससे जो सी पी आई के छात्र संगठन ए आई एस एफ वाले और दूसरे छात्र थे, उनको बड़ी कोफ्त हुई। मैं खुद ज्योति बाबू के साथ स्टेज तक चलते हुए असमंजस में था, पर सच यह है कि आज मुझे बड़ा अफसोस है कि वह फोटो मेरे पास नहीं है।

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Wednesday, May 30, 2007

मरने से पहले जो पचास फिल्में जरुर देखनी हैं

मरने से पहले जो पचास फिल्में जरुर देखनी हैं - रविवार की रात टी वी पर यह प्रोग्राम था|
तकरीबन आधी मैंने देखी हैं| शुकर है कि चयनकर्त्ताओं से मैं पूरी तरह सहमत नहीं हूँ, नहीं तो चैन से न मर पाने की चिंता होती|

मैंने जो देखी हुईं थीं, उनमें एक दो को छोड़ बाकी सारी नब्बे से पहले की हैं| चूँकि चयनकर्त्ता आलोचक ब्रिटेन और अमरीका के थे, इसलिए ज्यादातर फिल्में पश्चिम की थीं|
सारी याद नहीं, इसलिए नेट से ढूँढ कर सूची निकाली है:
1 Apocalypse Now 2 The Apartment 3 City of God 4 Chinatown 5 Sexy Beast 6 2001: A Space Odyssey 7 North by Northwest 8 A Bout de Souffle 9 Donnie Darko 10 Manhattan 11 Alien 12 Lost in Translation 13 The Shawshank Redemption 14 Lagaan: Once Upon A Time in India 15 Pulp Fiction 16 Touch of Evil 17 Walkabout 18 Black Narcissus 19 Boyzn the Hood 20 The Player 21 Come and See 22 Heavenly Creatures 23 A Night at the Opera 2 4 Erin Brockovich 25 Trainspotting 26 The Breakfast Club 27 Hero 28 Fanny and Alexander 29 Pink Flamingos 30 All About Eve 31 Scarface 32 Terminator 2 33 Three Colours: Blue 34 The Royal Tenen-baums 35 The Ladykillers 36 Fight Club 37 The Searchers 38 Mulholland Drive 39 The Ipcress File 40 The King of Comedy 41 Manhunter 42 Dawn of the Dead 43 Princess Mononoke 44 Raising Arizona 45 Cabaret 46 This Sporting Life 47 Brazil 48 Aguirre: The Wrath of God 49 Secrets and Lies 50 Badlands.


कमाल यह कि कोई इतालवी (फेलिनी से बेनिनी तक), हंगेरियन (इस्तवान ज्हावो). ईरानी (मखमलबाख) फिल्म नहीं|
चीन की एक, भारत की 'लगान' (! , ऋत्विक घटक से लेकर गोविंद निहलानी सारे फेल) - यह चयन है|
और क्रम भी अजीब है - मेरी अपनी पसंद से इनमें व्हर्नर हर्त्सोघ की 'आगीरे: द रैथ आफ गाड' सबसे बढ़िया है| उसके बाद '२००१: अ स्पेस आडीसी' (आर्थर सी क्लार्क ने कहानी में कंप्यूटर का नाम हैल - HAL रखा था - उन दिनों IBM कंप्यूटर की सबसे बडी़ कंपनी थी - H I A B L M) और फिर वूडी ऐलन की 'मैनहाटन' होगी| इसके बाद मैं चायनाटाउन को रखूँगा| वैसे कई बार देश काल ज्यादा महत्तवपूर्ण होते हैं| इस तरह से पश्चिमी आलोचकों के नजरिए से 'अपोकैलीप्स नाऊ' को सबसे ऊपर रखना समझ में आता है| इसी तरह अफ्रीकी मूल के अमरीकीओं के संदर्भ में 'बायज इन ड हूड' अच्छी संवेदनशील फिल्म है| इस फिल्म की खूबी यह थी कि इसका निर्देशक जान सिंगलटन महज तेईस साल का था, जब उसने यह फिल्म बनाई थी|

मैंने 'लगान' के कुछ हिस्से देखे हैं| चयनकर्त्ताओं में से कुछ का कहना था कि ऐसी फिल्में जो नए सवाल उठाएँ, देखी जानी चाहिए| स्पष्ट है कि चयनकर्त्ता भारतीय फिल्मों से नावाकिफ ही होंगे|
'अपोकैलीप्स नाऊ' अच्छी फिल्म है, पर तकनीकी साधनों पर इतनी ज्यादा निर्भर है कि कहीं कहीं कला का गला घोंटती सी लगती है|
चायनाटाउन में जैक निकोलसन का अभिनव कमाल का है; पर अपने समय में 'मैनहाटन' ने जो तहलका मचाया था, उसकी तुलना नहीं है| स्त्री पुरुष के संबंधों को लेकर आधुनिक शहरी मध्यवर्ग और बुद्धिजीवियों के पाखंड पर यह फिल्म एक अनोखा बयान है - इसलिए इसे बहुत ऊपर रखा जाना चाहिए|

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Sunday, May 27, 2007

दो बढ़िया फिल्में

पिछले दो दिनों में दो बढ़िया फिल्में देखीं| पहली आलेहांद्रो गोन्सालेज इनारीतू की 'आमोरेज पेरोस (प्रेम एक कुतिया है)' और दूसरी जाक्स देरीदा पर किर्बी डिक और एमी त्सियरिंग कोफमान का वृत्तचित्र|

पहली फिल्म मेक्सिको की समकालीन परिस्थितियों पर आधारित तीन अलग-अलग किस्मत के मारे व्यक्तियों की कहानी है| शुरू से आखिर तक फिल्म ने मुझे बाँधे रखा - जो कि इन दिनों मेरे साथ कम ही होता है| प्रेम, हिंसा और वर्ग समीकरणों का अनोखा मिक्स, जो अक्सर मेक्सिको व दक्षिण अमरीका की फिल्मों में होता है, इसमें है| इंसानी जज्बातों और अंतर्द्वंदों को दिखलाने के लिए कुत्तों का बढ़िया इस्तेमाल किया गया है|

देरीदा पर बनी फिल्म भी बहुत अच्छी लगी| खूबसूरती यह है कि देरीदा जो कहता है उसमें अब नया कुछ नहीं लगता - लगता है यह सब तो हम लंबे अरसे से सोच रहे हैं, पर धीरे धीरे बातें जेहन तक जाती हैं और अचानक ही लगता है कि ये बातें ठीक ऐसे कही जानी चाहिए; पर पहले किसी ने इस तरह कहा नहीं| देरीदा की सबसे बडी सफलता भी यही है कि सुनने वाले को उसकी बातें सहज सत्य लगें| डीकंस्ट्रक्सन की धारणा पर देरीदा बार बार कहता है कि यह कोई बाहरी औजार नहीं जिसे किसी संवाद या कथानक पर इस्तेमाल करते हैं, कथ्य में ही विखंडन की प्रक्रिया मौजूद है| इसी को जरा और खींचें तो हम देख सकते हैं कि हमारी सोच में वह सब छिपा है जो यह महान दार्शनिक हमें बतलाता है|

महान लोगों की महानता उनकी साधारणता में है - हम जैसे साधारण होते हुए भी वे ऐसी बातें कह जाते हैं जो हमने कही नहीं है| यह 'कहा जाना' कोई चमत्कार नहीं, हमारे ही जैसे एक साधारण व्यक्ति की वर्षों की मेहनत, अध्ययन और शोध से उपजी बातें हैं| फिल्म में मुझे ऐसी बातें ज्यादा अच्छी लगीं, जिनमें हम देरीदा की साधारणता देख पाते हैं, घरेलू माहौल, उसका यह कहना कि जिस दिन घर से बाहर नहीं निकलना हो, उस दिन पाजामा पहने ही काम निकालता है, आदि|


इस प्रसंग में कह दूँ कि साधारणता को रेखांकित करना महानता के खिलाफ मेरी पुरानी लड़ाई है| बुजुर्गियत के लिए छोड़ कर किसी एक व्यक्ति के लिए 'वे' और इसके समांतर क्रियारुप से मैं परहेज करता हूँ| कईबार अटपटा लगता है, पर कोशिश यही रहती है कि 'देरीदा कहते हैं' की जगह 'देरीदा कहता है'लिखूँ| यह बात कहानियों के चरित्रों की उक्तियों के लिए लागू नहीं होती, पर चर्चा या आलोचना में यह कोशिश रहती है|

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