<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss'><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440</id><updated>2009-11-06T04:36:46.468-08:00</updated><title type='text'>आइए हाथ उठाएं हम भी</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default?start-index=26&amp;max-results=25'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>179</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-986897209390840183</id><published>2009-11-03T22:03:00.000-08:00</published><updated>2009-11-03T22:14:28.926-08:00</updated><title type='text'>अधूरे चिट्ठे</title><content type='html'>अक्सर मैं चिट्ठा लिखने की सोचते ही रहता हूँ। पूरा नहीं कर पाता। यह कोई महीने भर पहले लिखा था। अधूरा ही रह गया: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://beta.thehindu.com/opinion/op-ed/article22199.ece"&gt;द हिंदू में तनवीर अहमद का अपनी नानी के भाई बहन के साथ मिलन पर मार्मिक आलेख&lt;/a&gt; पढ़ा। ऐसी न जाने कितनी कहानियाँ पढ़ते सुनते रहे हैं, कितनी कितनी बार मन दहाड़ें मार कर रोने को होता है, पर दुनिया जैसी है, वैसी है और हम अवसाद के बवंडर में अगले दिनों की ओर चलते रहते हैं। तनवीर ने कहा है कि हालांकि काश्मीर के लोग अब एक साथ होने को तैयार हैं, पर पंजाब के लोग अभी भी ऐसा नहीं होने देंगे। इससे मुझे एक तो जरा असहमति है, साथ ही कई पुरानी बातें याद आ गईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोखरन-कहूटा परमाणु विस्फोट और कारगिल युद्ध के बाद हम लोगों ने चंडीगढ़ में साइंस ऐंड टेक्नोलोजी अवेयरनेस ग्रुप के नाम से हिरोशिमा नागासाकी पर तैयार किया एक स्लाइड शो दिखाना शुरु किया था। इसका प्रत्यक्ष उद्देश्य नाभिकीय युद्ध से होने वाले ध्वंस के बारे में लोगों को जागरुक करना था। पर इस मुहिम में शामिल हर कोई जानता था कि बी जे पी सरकार के शुरुआती दिनों में के पाकिस्तान के प्रति नफरत फैलाना सांप्रदायिक ताकतों के एजेंडे में था और हम इसके खिलाफ काम कर रहे थे। अब याद नहीं कितने स्कूलों में, कितने सामुदायिक केंद्रों में हमने वह स्लाइड शो दिखाया। प्रसिद्ध लोक नाटककार भ्रा गुरशरण सिंह जी ने शो के स्क्रिप्ट के आधार पर एक नाटक तैयार किया और वह भी चंडीगढ के सेक्टर १७ पलाजा से लेकर पंजाब के कई गाँवों में दर्जनों बार खेला गया। मैं दर्जनों अतिशयोक्ति में नहीं लिख रहा हूँ। मुझे कई बार यह सोचकर तकलीफ होती है कि हमारे मुल्क में जनांदोलनों की गतिविधियों के दस्तावेज तैयार नहीं किए जाते और कितने लोगों की अकथ्य मेहनत इतिहास के पन्नों में गुम हो जाती है। बहरहाल हम तो एक बहुत बड़े सांप्रदायिकता और युद्ध विरोधी आंदोलन का एक छोटा हिस्सा मात्र थे, जो सन् २००० तक शिखर पर पहुँचने लगा था। धीरे धीरे मुख्यधारा के राजनैतिक दलों को यह समझ में आने लगा था कि  आम पंजाबी यह नहीं चाहते कि सरहद के दोनों ओर लोगों में कोई वैमनस्य रहे। विश्व स्तर पर इधर के और उधर के पंजाबियों में सांस्कृतिक स्तर पर मेलजोल के प्रयास होने लगे थे। पर यह एक उफान की तरह उमड़ कर आएगा, ऐसी कल्पना शायद किसी ने तब भी न की थी। १९९९ में मैं पंजाब विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का सचिव बना।  चंडीगढ़ का पंजाब विश्वविद्यालय डेढ़ सौ साल पुराने लाहौर के पुराने पंजाब विश्वविद्यालय का ही हिस्सा माना जाता है, हालांकि लाहौर वाले ऐसा नहीं मानते हैं। दोनों  के अंग्रेज़ी नामों में जरा सा फर्क है। चंडीगढ़ की यूनिवर्सिटी के नाम में पंजाब को Panjab लिखा जाता है, जबकि लाहौर में Punjab। बहरहाल मैंने इस खयाल का फायदा उठाते हुए प्रयास शुरु किए कि लाहौर के  पंजाब विश्वविद्यालय के शिक्षक संघ के साथ संगठन के स्तर पर संपर्क किया जाए।  मैंने लाहौर कैंपस के कुलाधिपति, जो कोई सैन्य अधिकारी था, से संपर्क करने की कोशिश की। और मैं पूरी तरह असफल रहा। अध्यापक संघ के दूसरे पदाधिकारी मेरे कैंपस से बाहर की गतिविधियों से बहुत ज्यादा वास्ता तो न रखते थे, पर उनका कोई विरोध भी न था। साथ ही अध्यक्ष प्रोफेसर पी पी आर्य ने पूरी छूट दी हुई थी कि मैं तरक्कीपसंद खयालों के मुताबिक कुछ भी करुँ तो वह मेरे साथ थे। खैर वह साल बीत गया और मैं संगठन के पद का अपने इस उद्देश्य के लिए फायदा न उठा पाया। पर इसी बीच मैं और दोस्तों से बातचीत करता रहा और किसी तरह परवेज हुदभाई से संपर्क हुआ। परवेज पाकिस्तान का विश्व स्तर पर प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक शास्त्री है और साथ ही शांति आंदोलन में बहुत बड़ा नाम भी है। भारत के जन विज्ञान आंदोलन की ओर से परवेज को कलिंग पुरस्कार दिया जाना था, पर भारत और पाकिस्तान दोनों सरकारें इस में अड़चन बनी हुईं थीं।   अब याद नहीं कि किस स्टेज पर परवेज ने लिखा कि वह तो आ नहीं सकता (बाद में २००५ में परवेज आया था और उसे तीन साल बाद वह पुरस्कार दिया गया), पर लाहौर यूनिवर्सिटी के मैनेजमेंट साइंसेस (LUMS) के सरमद अब्बासी को कहा जाए तो शायद सरकारों को उसके हिंदुस्तान आने पर आपत्ति न होगी। इसी बीच चंडीगढ तो नहीं पर दिल्ली से कई सक्रिय साथी शांति यात्राओं में  सक्रिय हो रहे थे और दिल्ली विश्वविद्यालय से एक अध्यापक अपने विद्यार्थियों के साथ पाकिस्तान घूम आया था। तो मैंने सरमद से संपर्क किया। २००३ में शिक्षक संगठन का अध्यक्ष चुना गया और तुरंत मैंने सरमद अब्बासी को चंडीगढ़ लाने की तैयारी शुरु की। आखिर  सरमद और लम्स के छः विद्यार्थी चंडीगढ़ पहुँचे। &lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद लिख नहीं पाया, जबकि इसके बाद की बहुत सारी बातें हैं जिन्हें लिखा जाना चाहिए। हो सकता है कोई और दोस्त जो इस प्रकिया में शामिल थे, इस पर लिखें।&lt;br /&gt;---------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले हफ्ते एक और चिट्ठा लिखना शुरु किया था - वह तो दो लाइनों से आगे भी नहीं पहुँचा। वह भी द हिंदू की ही एक खबर पर था जिसमें लिखा था कि छत्तीसगढ़ में पुलिस वालों या सलवा जुडुम वालों ने एक आदिवासी बच्चे की उँगलियाँ काट दी हैं ताकि उसके माँ बाप माओवादियों के बारे में सूचना दें। बेचारे माँ बाप डर के मारे कुछ बतलाना नहीं चाहते और मारे मारे भाग रहे हैं कि कहीं फिर कोई उन पर हमला न कर बैठे। ऐसी खबरों को पढ़ कर आश्चर्य होना चाहिए, पर होता नहीं है। सम्पन्न वर्गों की क्रूर उदासीनता में जी रहे हम लोग इस बात से बेखबर से हैं कि सरकार ने जनता के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया है। गृह मंत्री इसे युद्ध कहना नहीं चाहता, क्योंकि यह ऐसा युद्ध है, जिसमें सभी मानव अधिकारों को तिलांजलि दे दी गई है। अब नागरिक अधिकार संस्थाओं की रीपोर्ट आई है, जिसमें खनिज खुदाई और व्यापार से जुड़े पूँजी मालिकों के हित में सरकार द्वारा छेड़े इस युद्ध की सच्चाई का पूरा ब्यौरा है। मध्यवर्ग के लोगों को  नागरिक अधिकार या मानव अधिकार जैसे शब्दों से एलर्जी होती है, क्योंकि अपनी सच्चाइयों से रुबरु होने में हमें तकलीफ होती है। इसलिए भाइयो, &lt;a href="http://blogs.intoday.in/index.php?option=com_myblog&amp;contentid=61536&amp;show=Why-a-Operation-green-hunta-will-fail.html&amp;blogs=2"&gt;इंडिया टूडे में आकाश बनर्जी का  यह&lt;/a&gt; पोस्ट पढ़ लो। इसकी कुछ पंक्तियाँ उद्धृत कर रहा हूँ - &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;First Question- Will 'Operation Green Hunt' be successful?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;Honestly the answer is a big NO. Call me a Naxal sympathizer, but like me, if you ever face the brutal wrath of the local police in heartland India - your world view will witness a paradigm shift within seconds. I was in West Bengal last July - covering the offensive launched by the state administration to counter the Naxals in Lalgarh. It was here, during one of the shoots that my cameraperson and I were chased down a road in Midnapore district by the West Bengal police and hit with sticks.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Our crime??? We had dared to shoot the police breaking down doors and hauling up village youngsters for 'questioning'. (What happens in these 'questionings' I don't need to tell you) When journalists could be treated like dogs by the police - I began to grasp the plight of the local villagers who don't have a voice - or redressal system of any sort. The moral of the story is very simple - between the two evils of Naxalism and Police, the tribals choose the former. At least Naxals don't rape, maim and kill without reason.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे यह तो बहुत बड़ा आश्चर्य है ही कि सूचना-क्रांति के इस युग में निरंतर अन्यायों व अत्याचारों से भरपूर हमारे जैसे समाज आज भी टिके हुए हैं।  पर इतिहास यही बतलाता है कि बड़ी सी बड़ी भी दमनकारी ताकतें भी विरोध को हमेशा के लिए खत्म नहीं कर पातीं और इंसान है ही ऐसा जंतु कि बार बार विद्रोह के लिए उठ खड़ा होता है। &lt;br /&gt;*************************************************&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक मित्र ने जेम्स ब्राइडल के A New THEORY of&lt;br /&gt;AWESOMENESS and MIRACLES शीर्षक एक रोचक व्याख्यान पर &lt;a href="http://shorttermmemoryloss.com/menace/ "&gt;यह लिंक&lt;/a&gt; पोस्ट किया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-986897209390840183?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/986897209390840183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=986897209390840183' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/986897209390840183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/986897209390840183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='अधूरे चिट्ठे'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-1543496844080827395</id><published>2009-10-12T22:26:00.000-07:00</published><updated>2009-10-12T22:32:23.909-07:00</updated><title type='text'>एक कहानी कुछ विचार</title><content type='html'>मैं इन दिनों 'रीडिंग्स फ्राम हिंदी लिटरेचर' नामक कोर्स पढ़ा रहा हूँ। 'हंस' पत्रिका के युवा लेखन पर आधारित अगस्त अंक में प्रकाशित दो कहानियाँ पढ़ी गईं। इन पर विषद् चर्चा हुई। एक छात्र (शशांक साहनी) द्वारा संयोजित कुछ टिप्पणियाँ नीचे हैं। दूसरी कहानी (तबस्सुम फातिमा की 'हिजाब') मुझे ज्यादा बेहतर लगी थी, उस पर कम चर्चा हुई, और शशांक को शायद कोई भी टिप्पणी याद नहीं रही। शायद बाकी छात्र इस ब्लाग पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए दूसरी कहानी पर भी कुछ लिखें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बकौल शशांकः&lt;br /&gt;हमने हिंदी की कक्षा में हंस पत्रिका में प्रकाशित एक कहानी " प्रार्थना के बाहर " (गीताश्री) पर चर्चा की । हमारे साथ हैदराबाद विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग के शोध छात्र राजीव भी थे । उन्होने सभी छात्रों से इस कहानी के बारे में अपने-अपने विचार पूछे तो सभी ने कई अलग अलग विचार प्रस्तुत किये । उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं -&lt;br /&gt;-&gt; प्रार्थना इतनी पढ़ी लिखी होने के बावजूद ऐसी गलतियाँ कैसे कर सकती थी ?&lt;br /&gt;-&gt; पिछले विचार पर ये बात उठी की हम किन चीजों को गलत मानते हैं ? समाज में जो सही कहा जाता है क्या हम उसे ही सही मानेंगे ?&lt;br /&gt;-&gt; प्रार्थना जो कुछ भी करती थी वो उसकी मर्ज़ी थी वो किसी का बुरा तो नहीं करती थी तो हम उसे गलत क्यों कहते हैं ?&lt;br /&gt;-&gt; कई लोगो के मन में ये विचार थे की क्या रचना जैसे ईमानदार लोगों को सफलता नहीं मिलती और प्रार्थना जैसे अपनी मर्ज़ी से जीने वाले लोग सफल हो जाते हैं ?&lt;br /&gt;-&gt; चर्चा की शुरुआत में सबको लगा था कि प्रार्थना लोगों से शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बावजूद भी पढ़कर अच्छा रैंक ले आई परन्तु तब राजीव ने कहानी कि कुछ पंक्तियाँ वापिस पढ़कर बताया जिनसे साफ़ पता चलता था कि वो परिणाम उसके दिल्ली आने से पहले की मेहनत से आया था | तो इससे ये बात तो सबको साफ़ हो गई थी कि कहानी कहीं से भी प्रार्थना के विचारों को प्रगतिशील नहीं कहती है ।&lt;br /&gt;-&gt; सभी इसी मत में थे कि प्रार्थना के विचार एक आधुनिक महिला के ख्याल थे और पुरुष प्रधान समाज को चुनौती देते थे ।&lt;br /&gt;-&gt; और तब राजीव ने इस बात की तरफ इशारा किया कि वो वही सब कर रही ही जो पुरुष करते हैं तो एक तरह से वो पुरुष प्रधान समाज के ही नक्शे कदम पर चल रही थी । अगर उसे इस पुरुष प्रधान समाज से लड़ना था तो उसे पुरुष बन कर नहीं बल्कि स्त्री बन कर लड़ना चाहिए ।&lt;br /&gt;-&gt; फिर राजीव ने कहानी के दूसरे पहलू पर सबका ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि प्रार्थना की रूममेट रचना को एक आम भारतीय नारी की तरह दर्शाया गया है । उसके जीवन की परेशानियाँ एक आम भारतीय नारी जैसी होती हैं ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-1543496844080827395?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/1543496844080827395/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=1543496844080827395' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/1543496844080827395'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/1543496844080827395'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/10/blog-post_12.html' title='एक कहानी कुछ विचार'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-453218389596819061</id><published>2009-10-12T00:20:00.000-07:00</published><updated>2009-10-12T02:28:20.177-07:00</updated><title type='text'>सोचना यह है कि हम आज कहाँ हैं।</title><content type='html'>लंबे समय से दिमाग में बातें चलती रहीं कि ब्लाग में डालना है।  &lt;a href="http://beta.thehindu.com/opinion/op-ed/article22199.ece"&gt;'द हिंदू' में तनवीर अहमद का अपनी नानी को उनके भाई बहन से मिलवाने पर यह मार्मिक लेख &lt;/a&gt;पढ़ कर थोड़ा सा लिखा भी, फिर छूट गया। लेख पढ़ कर अपने और साथियों के कुछ प्रयासों की याद आ गई, जो सीमा के दोनों ओर के आम लोगों के बीच संबंध स्थापित करने की दिशा में थे। वह फिर कभी पूरा लिखा जाएगा। फिर हाल में दो खबरें ज्यादा ध्यान खींच गईं - एक तो human development index (मानव विकास सूची) में भारत और पाकिस्तान का क्रमशः १३४वें  और १४१वें स्थान पर होना, और इस खबर के दूसरे ही दिन भारतीय मूल के वैज्ञानिक को रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा होनी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके कुछ ही दिन बाद संस्थान में आए एक वक्ता द्वारा मानव के पूर्णता की ओर जाने बातचीत करते हुए यह कहना कि दो सौ साल पहले विश्व स्तर पर घरेलू सकल उत्पाद  में भारत का हिस्सा २६% था (वक्ता ने कहा कि चीन का हिस्सा इससे कम था) और आज वह 0.८६% है, यह सब बातें दिमाग में चल रही थीं।  आँकड़ें सही होंगे; अक्सर इस तरह की बातें ऐसे कही जाती है कि सोचो कभी सोचा था तुमने? सोचने पर दरअस्ल बात इतनी बड़ी निकलती नहीं जितनी बनाई गई होती है। आखिर औद्योगिक क्रांति के पहले पश्चिमी मुल्कों में लोग काफी फटेहाल थे, यह कौन सी नई बात है। पर हम आज की तुलना में अधिक समृद्ध नहीं थे, हम तब उनकी तुलना में कम फटेहाल थे। राजा महाराजाओं के पास लूट का माल यहाँ भी था, वहाँ भी था। आम लोग वहाँ के बनिस्बत यहाँ कम कुदरत के मारे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानव विकास सूची में चीन अब ७१वें स्थान पर है। सोचना यह है कि हम आज कहाँ हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-453218389596819061?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/453218389596819061/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=453218389596819061' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/453218389596819061'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/453218389596819061'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='सोचना यह है कि हम आज कहाँ हैं।'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-401515959285296072</id><published>2009-09-16T23:45:00.000-07:00</published><updated>2009-09-16T23:56:41.412-07:00</updated><title type='text'>टिप्पणी का सिलसिला</title><content type='html'>कोई नई बात नहीं&lt;br /&gt;एक और आलेख &lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.timesonline.co.uk/tol/news/world/asia/article6837585.ece"&gt;एक और लिंक&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;http://www.timesonline.co.uk/tol/news/world/asia/article6837585.ece&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई &lt;a href="http://loksangharsha.blogspot.com/2009/04/blog-post_610.html"&gt;अदम गोंडवी&lt;/a&gt; लिखे फिर एक गीत&lt;br /&gt;'सौ में सत्तर आदमी जब भूख से नाशाद हो&lt;br /&gt;दिल पे रख कर हाथ कहिए &lt;br /&gt;देश क्या आज़ाद है...'&lt;br /&gt;दोस्तो, &lt;a href="http://laltu.blogspot.com/2009/09/blog-post.html"&gt;मेरे पिछले एक चिट्ठे &lt;/a&gt;पर किसी अंजान भाई की एक टिप्पणी आई ।&lt;br /&gt;निरपेक्षता का आग्रह है। मैंने एक जवाबी टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि प्रेषक की टिप्पणी न केवल प्रासंगिक नहीं, बल्कि उसके अपने पूर्वाग्रहों की ओर संकेत करती है। ऊपर Times की लिंक उसी सिलसिले में है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-401515959285296072?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/401515959285296072/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=401515959285296072' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/401515959285296072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/401515959285296072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/09/blog-post_8183.html' title='टिप्पणी का सिलसिला'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-5375709104227156158</id><published>2009-09-16T03:57:00.000-07:00</published><updated>2009-09-16T20:38:49.544-07:00</updated><title type='text'>परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए</title><content type='html'>Margaret Atwood की कविता&lt;a href="http://aqrima.blogspot.com"&gt; बेटी के ब्लॉग&lt;/a&gt; से और मेरा अनुवादः&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;We are hard on each other -- Margaret Atwood&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए - मार्ग्रेट ऐटवुड&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;i)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए&lt;br /&gt;हम अपनी बातों को साफगोई कहते हैं&lt;br /&gt;अपने पैने सच &lt;br /&gt;सावधानी से चुन फेंकते हैं&lt;br /&gt;निरपेक्ष मेज पार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो बातें हम कहते हैं, वह सच हैं&lt;br /&gt;हमारे निशानों में ही होतीं तिकड़में&lt;br /&gt;जिससे वे खूँखार बन जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ii)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच है कि तुम्हारे झूठ &lt;br /&gt;ज्यादा खुशगवार हैं&lt;br /&gt;हर बार नये जो ढूँढ लाते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तकलीफदेह और ऊबाऊ तुम्हारे सच&lt;br /&gt;बार बार कहे जाते हैं&lt;br /&gt;शायद इसलिए कि उनमें से बहुत कम हैं&lt;br /&gt;जिन्हें तुम मानते हो कि तुम्हारे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;iii)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच ज़िंदा तो है&lt;br /&gt;पर इसका ऐसा इस्तेमाल  &lt;br /&gt;गलत है। मुझे प्यार है तुमसे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सच है या औजार?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;iv)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह हिलते डुलते&lt;br /&gt;क्या शरीर झूठ बोलता है&lt;br /&gt;ये स्पर्श, केश, यह गीला नर्म संगमरमर&lt;br /&gt;जिसपर मेरी जीभ दौड़ती है&lt;br /&gt;क्या ये झूठ हैं जिन्हें तुम कह रहे हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारा शरीर कोई शब्द नहीं&lt;br /&gt;यह झूठ नहीं कहता &lt;br /&gt;सच भी नहीं कहता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस मौजूद है यहाँ&lt;br /&gt;या मौजूद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;We are hard on each other -- Margaret Atwood&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;i)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;We are hard on each other&lt;br /&gt;and call it honesty,&lt;br /&gt;choosing our jagged truths&lt;br /&gt;with care and aiming them across&lt;br /&gt;the neutral table.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;The things we say are&lt;br /&gt;true; it is our crooked&lt;br /&gt;aims, our choices&lt;br /&gt;turn them criminal.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ii)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Of course your lies&lt;br /&gt;are more amusing:&lt;br /&gt;you make them new each time.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Your truths, painful and boring&lt;br /&gt;repeat themselves over &amp; over&lt;br /&gt;perhaps because you own&lt;br /&gt;so few of them&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;iii)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;A truth should exist,&lt;br /&gt;it should not be used&lt;br /&gt;like this. If I love you&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;is that a fact or a weapon?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;iv)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Does the body lie&lt;br /&gt;moving like this, are these&lt;br /&gt;touches, hairs, wet&lt;br /&gt;soft marble my tongue runs over&lt;br /&gt;lies you are telling me?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Your body is not a word,&lt;br /&gt;it does not lie or&lt;br /&gt;speak truth either.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;It is only&lt;br /&gt;here or not here.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;© Margaret Atwood&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-5375709104227156158?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/5375709104227156158/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=5375709104227156158' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/5375709104227156158'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/5375709104227156158'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/09/blog-post_16.html' title='परेशान एक दूसरे से पेश आते हुए'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-5391515580477547856</id><published>2009-09-11T05:13:00.001-07:00</published><updated>2009-09-11T05:13:49.756-07:00</updated><title type='text'>हर कोई</title><content type='html'>सुबह निकलता हूँ। रात होने पर घर लौटता हूँ। जैसे हर कोई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हर कोई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर किसी की ज़िंदगी में आता है ऐसा वक्त&lt;br /&gt;उठते ही एक सुबह&lt;br /&gt;पिछले कई महीनों की प्रबल आशंका&lt;br /&gt;संभावनाओं के सभी हिसाब किताब&lt;br /&gt;गड्डमड्ड कर&lt;br /&gt;साल की सबसे सर्द भोर जैसी&lt;br /&gt;दरवाजे पर खड़ी होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर कोई जानता है&lt;br /&gt;ऐसा हमेशा से तय था फिर भी&lt;br /&gt;कल तक उसकी संभावनाओं के बारे में&lt;br /&gt;सोचते रह सकने का हर कोई&lt;br /&gt;शुक्रिया अदा करता है&lt;br /&gt;उस अनिश्चितता का जो&lt;br /&gt;बिना किसी सैद्धांतिक बयान के&lt;br /&gt;होती चिरंतन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर कोई&lt;br /&gt;होता है तैयार&lt;br /&gt;सड़क पर निकलते ही&lt;br /&gt;'ओफ्फो! बहुत गलत हुआ' सुनने को&lt;br /&gt;या होता विक्षिप्त उछालता इधर उधर पड़े पत्थरों को&lt;br /&gt;या अकेले में बैठ चाह सकता है&lt;br /&gt;किसी की गोद में&lt;br /&gt;आँखें छिपा फफक फफक कर रोना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर कोई गुजरता है इस वक्त से&lt;br /&gt;अपनी तरह और कभी&lt;br /&gt;डूबते सूरज के साथ&lt;br /&gt;लौटा देता है वक्त उसी&lt;br /&gt;समुद्र को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फेंका जिसने इसे पुच्छल तारे सा&lt;br /&gt;हर किसी के जीवन में।&lt;br /&gt;(१९९४; इतवारी पत्रिका-१९९७)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-5391515580477547856?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/5391515580477547856/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=5391515580477547856' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/5391515580477547856'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/5391515580477547856'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html' title='हर कोई'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-8028473139880483271</id><published>2009-09-08T03:06:00.000-07:00</published><updated>2009-09-08T22:09:08.230-07:00</updated><title type='text'>हम लोग सुनते रहते हैं</title><content type='html'>आखिरकार जो किसी भी स्वस्थ दिमाग के आदमी को अरसे पता था, &lt;a href="http://www.hindu.com/2009/09/08/stories/2009090856670100.htm"&gt;वही सच &lt;/a&gt;सामने आया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इशरत तो अब है नहीं, जैसे नीलोफर जान और आशिया जान नहीं हैं। जैसे न जाने कितने कितने निर्दोष गायब हो गए हैं, सिर्फ इसलिए कि बीमार दिमागों की भीड़ उन्हें पुलिस और फौज की वर्दियों में या कभी बस सादे लिबासों में आ खा गई। एक बार &lt;a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=इशरत_/_लाल्टू"&gt;अपनी लिखी कविताओं&lt;/a&gt; को पढ़ता हूँ और दो पल रो लेता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदू में आज &lt;a href="http://www.hindu.com/2009/09/08/stories/2009090854800800.htm"&gt;प्रोफेसर पनिक्कर का एक आलेख &lt;/a&gt;भी है। इसका मूल वक्तव्य हैः जबतक सार्वजनिक क्षेत्र के धर्म निरपेक्ष स्वरुप की पुनर्प्रतिष्ठा नहीं होती, जो धार्मिक स्वरुप इसने अख्तियार किया है, वह राज्य के कार्यों पर हावी होता रहेगा। (Unless the secular character of the public sphere is retrieved, the religious character that it has come to have could impinge on the functions of the state.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों मीरा नंदा हमारे यहाँ आई थी। उसने अपनी पुस्तक 'The God Market' पर भाषण देना था, जिसमें पिछले दशकों में वैश्वीकरण और उदारीकरण की सरकारी नीतियों के साथ मध्य वर्ग में बढ़ रही मजहबपरस्ती पर अपने शोधकार्य पर उसने कहना था। कुछ लोगों ने कोशिश की कि यह भाषण होना नहीं चाहिए। आखिर हुआ भी तो बहुत कम लोग सुनने आए। जो आए उनका खयाल था कि संविधान बनाने वालों को जनमानस की सुध न थी। एक दोस्त कह गया कि निजी क्षेत्र में धर्म का मकसद कल्याणकारी है। देखना यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र में भी ऐसा हो। यानी इसलिए अगर सरकारी नीतियों से धार्मिक संस्थानों को ज़मीनें और अनुदान मिल रहे हैं तो चिंता की बात नहीं। पढ़े लिखे समझदार लोग इस तरह का बकवास करते रहते हैं, हम लोग सुनते रहते हैं।  कुछ दो एक हमारे जैसे मित्र थे जिनको मीरा की चिंताएँ ठीक लगीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-8028473139880483271?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/8028473139880483271/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=8028473139880483271' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/8028473139880483271'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/8028473139880483271'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='हम लोग सुनते रहते हैं'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-8840054073352270237</id><published>2009-08-29T21:30:00.000-07:00</published><updated>2009-08-29T22:27:12.168-07:00</updated><title type='text'>कैसे दूँ उसे मौन यूँ जीवन भर दान?</title><content type='html'>अफलातून ने बतलाया कि मेरी तीन प्रेम कविताएँ उसने अपने ब्लाग पर पोस्ट की थीं, कई साथियों ने उन पर प्रतिक्रिया भेजी है। प्रेम कविताएँ होती ही ऐसी हैं कि हर कोई पसंद करता है। आधुनिक अंग्रेज़ी कविता में तीन कवियों की कविताएँ मुझे बहुत भाती हैं, जिनमें एक है सेरा टीसडेल (१९३० के दशक की न्यूयार्क की कवि)। कई मित्रों को उसकी कविताएँ पढ़वाई हैं। पहली बार उसकी कविता से परिचय हुआ रे ब्रैडबरी की कहानी 'August 2026: And There Will Come Soft Rains' ('अगस्त २०२६: आएँगी हल्की बुहारें' शीर्षक से मेरा अनुवाद १९९५ के आस पास साक्षात्कार में आया था)। कहानी में नाभिकीय विस्फोट के बाद की स्थिति का वर्णन है - यह कहानी &lt;a href="http://www.faludi.com/classes/networkobjects/readings/Bradbury_Soft_Rains_1950.pdf"&gt;नेट पर उपलब्ध&lt;/a&gt; है, ज़रुर पढ़ें. बहरहाल इस कहानी में सेरा टीसडेल की इस कविता का उद्धरण है, &lt;br /&gt;"There will come soft rains and the smell of the ground,&lt;br /&gt;And swallows circling with their shimmering sound;&lt;br /&gt;And frogs in the pools singing at night,&lt;br /&gt;And wild plum trees in tremulous white;&lt;br /&gt;Robins will wear their feathery fire,&lt;br /&gt;Whistling their whims on a low fence-wire;&lt;br /&gt;And not one will know of the war, not one&lt;br /&gt;Will care at last when it is done.&lt;br /&gt;Not one would mind, neither bird nor tree,&lt;br /&gt;if mankind perished utterly;&lt;br /&gt;And Spring herself, when she woke at dawn&lt;br /&gt;Would scarcely know that we were gone."&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम सब से अंजान बहार आएगी। बहार के बहार होने का अर्थ तो प्राण से ही है, जब प्राण ही न हो, और मानव न हो जो बहार को बहार कह सके, तो बहार के आने का क्या मतलब!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसे पढ़ने के बाद से मैंने सेरा टीसडेल की कवताएँ ढूँढ कर पढ़ीं। मेरी प्रिय कविताएँ हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ एक कविता उद्धृत कर रहा हूँः&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;Night Song at Amalfi&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;I asked the heaven of stars&lt;br /&gt;   What I should give my love --&lt;br /&gt;It answered me with silence,&lt;br /&gt;   Silence above.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;I asked the darkened sea&lt;br /&gt;   Down where the fishers go --&lt;br /&gt;It answered me with silence,&lt;br /&gt;   Silence below.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Oh, I could give him weeping,&lt;br /&gt;   Or I could give him song --&lt;br /&gt;But how can I give silence,&lt;br /&gt;   My whole life long?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आमाल्फी में रात्रिगान (आमाल्फी इटली का छोटा शहर है)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तारों भरे नभ से पूछा मैंने&lt;br /&gt;अपने प्रिय को क्या दूँ&lt;br /&gt;उसका जवाब था चुप्पी भर &lt;br /&gt;ऊपर फैला मौन था यूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने काले सागर से पूछा&lt;br /&gt;दूर जाते मछुआरे जहाँ&lt;br /&gt;उसका जवाब था चुप्पी भर &lt;br /&gt;गहराई तक फैला मौन वहाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुदन दे सकती हूँ प्रिय को&lt;br /&gt;या दे सकती हूँ गान&lt;br /&gt;पर कैसे दूँ उसे मौन&lt;br /&gt;यूँ जीवन भर दान?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनुवाद अभी अभी किया है - अधिक सोचा नहीं है, इसलिए अंग्रज़ी को ही पढ़ें। अभी अभी अफलातून ने बतलाया कि मेरी सात कविताएँ उसने &lt;a href="http://shaishav.wordpress.com/"&gt;यहाँ&lt;/a&gt; पोस्ट की हैं। खुशी मेरी कि कम सही कुछ मित्र मुझे भी पढ़ते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-8840054073352270237?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/8840054073352270237/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=8840054073352270237' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/8840054073352270237'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/8840054073352270237'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/08/blog-post_29.html' title='कैसे दूँ उसे मौन यूँ जीवन भर दान?'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-7423508051108438590</id><published>2009-08-28T06:12:00.000-07:00</published><updated>2009-08-28T09:00:18.201-07:00</updated><title type='text'>पंखा चलता तो शहतीर काँपती</title><content type='html'>पंजाब विश्वविद्यालय में अध्यापन के दौरान यूनिवर्सिटी और कालेज अध्यापकों के लिए तरह तरह के रीफ्रेशर कोर्सों में भाषण देता था, कभी कभार साहित्य पर भी कुछ कहा है। सत्यपाल सहगल ने एम ए के हिंदी के विद्यार्थियों से शरतचंद्र पर कुछ कहने को कहा था। दो बार शरतचंद्र पढ़ा पाया हूँ। अब मुझे संस्थान में बी टेक के छात्रों को विज्ञान के अलावा हिंदी साहित्य भी पढ़ाने का मौका मिला है। पिछले साल भी पढ़ाया था और इस साल भी पढ़ा रहा हूँ। चूँकि साहित्य में मेरा औपचारिक प्रशिक्षण नहीं है, इसलिए मैं इसे रीडिंग्स या पाठ का कोर्स कहता हूँ। हमलोग कविता कहानियाँ पढ़ते हैं और उन पर चर्चा करते हैं। तुलनात्मक समझ के लिए हिंदी के अलावा विश्व साहित्य से भी कुछ सामग्री पढ़ते हैं। इस बार मैं फिल्में भी दिखा रहा हूँ। बहरहाल आज ज्ञानरंजन की कहानी 'पिता' पढ़ते हुए खूब बातें हुईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोर्स शुरु होने के पहले छात्र समकालीन हिंदी साहित्य से अपरिचित थे। पर रुचि के साथ पढ़ रहे हैं। पाँच कक्षाओं में लगातार कविताएँ पढ़ते रहे तो एक ने कहा कि अब कुछ कहानियाँ पढ़ी जाएँ। इस तरह आज ज्ञानरंजन पढ़ने लगे। पिता एक अजीब प्राणी है या पिता वह व्यक्ति है जिसकी पिछली मजबूरियों की वजह से आदतें ऐसी हो गई हैं कि अब सुविधाओं के होने के बावजूद वह असुरक्षित दरिद्र जीवन बिताता है, इस पर सब ने कुछ न कुछ कहा। मैं कुछ समय बाद पारंपरिक समाज और आधुनिकता पर भी अकादमिक चर्चा छेड़ने वाला हूँ - देखते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दौरान बहुत सी बातें इस तरह की भी हुईं कि उन दिनों रोजाना काम आने वाले सामान, जैसे पंखे, कितने महँगे थे। मुझे यह ध्यान आया कि मेरे बचपन में बिजली की सप्लाई डी सी यानी कि डिरेक्ट करेंट की होती थी। पंखा चलता था तो शहतीर काँपती थी। पंखे की कीमत होती थी दो ढाई सौ रुपए और वह बहुत समझी जाती थी क्योंकि यह किरानिओं जैसे निम्न मध्य वर्ग के लोगों की दो तीन महीनों की तनखाह के बराबर थी। मैंने जब यूनीवर्सिटी लेक्चरर की नौकरी शुरू की तो मेरी मासिक तनखाह रेफ्रिजरेटर या वाशिंग मशीन की कीमत से कम थी। यानी मध्य वर्ग में उपभोक्ता माल की कीमतें जिस गति से बढ़ी हैं, तनखाहें उससे कहीं ज्यादा रफ्तार से बढ़ी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ लोग आज भी ऐसे हैं जिनके घर बिजली नहीं है। कुछ नहीं बहुत सारे लोग। शादी ब्याह में जेनरेटर चलते हैं तो उन्हें  बिजली का पता चलता है। तो प्राक्-आधुनिक, आधुनिक और उत्तर आधुनिक का अनोखा मिश्रण जो भारतीय समाज में है, इसमें 'पिता' जैसी कहानियाँ युगों तक पढ़ी, समझी जाएँगीं और चर्चा में रहेंगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, आज एक और पुरानी कविताः- यह साक्षात्कार में प्रकाशित हुई थी, संभवतः १९८९ में। मेरे पहले संग्रह 'एक झील थी बर्फ की' में शामिल है। उन दिनों दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद वाली तानाशाही सरकार थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लड़ाई हमारी गलियों की&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किस गली में रहते हैं आप जीवनलालजी&lt;br /&gt;किस गली में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आप भी अखबार में पढ़ते हैं&lt;br /&gt;विश्व को आंदोलित होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आफ्रिका, लातिन अमेरीका&lt;br /&gt;क्या आपकी टीवी पर&lt;br /&gt;तैरते हैं औंधे अधमरे घायलों से&lt;br /&gt;दौड़कर आते किसी भूखे को देख&lt;br /&gt;डरते हैं क्या लोग – आपके पड़ोसी&lt;br /&gt;लगता है उन्हें क्या&lt;br /&gt;कि एक दक्षिण अफ्रीका आ बैठा उनकी दीवारों पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या लाशें एल साल्वाडोर की&lt;br /&gt;रह जाती हैं बस लाशें &lt;br /&gt;जो दूर कहीं &lt;br /&gt;दूर ले जाती हैं आपको खींच &lt;br /&gt;भूल जाते हैं आप &lt;br /&gt;कि आप भी एक गली में रहत हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ लड़ाई चल रही है&lt;br /&gt;और वही लड़ाई &lt;br /&gt;आप देखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुर्सी पर अटके&lt;br /&gt;अखबारों में लटके&lt;br /&gt;दूरदर्शन पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवनलालजी &lt;br /&gt;दक्षिण अफ्रीका और एल साल्वाडोर की लड़ाई &lt;br /&gt;हमारी लड़ाई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-7423508051108438590?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/7423508051108438590/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=7423508051108438590' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/7423508051108438590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/7423508051108438590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/08/blog-post_28.html' title='पंखा चलता तो शहतीर काँपती'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-3787412550578658377</id><published>2009-08-27T09:46:00.000-07:00</published><updated>2009-08-27T09:56:35.611-07:00</updated><title type='text'>सिर्फ इसलिए कि कई दिन हो गए</title><content type='html'>यह सिर्फ इसलिए कि कई दिन हो गए और चिट्ठा लिखा नहीं। जब लिखने को बेचैन होता हूँ तो वक्त नहीं होता। वक्त मिलता है तो दूसरे ब्लाग्स पढ़ने में ही चला जाता है। बहुत सारे लोग बहुत अच्छा लिख रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीच बीच में दो चार मित्र जो मुझे पढ़ते हैं कहते रहे हैं कि कुछ तो पोस्ट किया करो। तो फिलहाल इसलिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे कहने को तो बहुत बातें थीं, तड़पता भी हूँ। हाल में ही पास्तरनाक की एक उक्ति फिर से पढ़ी कि जीवन जीने के लिए है न कि जीने की तैयारी के लिए। कोई नई बात नहीं, पर पढ़ के बेचैनी बढ़ गई। तब से खुद को कह रहा हूँ कि और कुछ नहीं तो कोई पुरानी कविता ही पोस्ट कर दो। तो यह है उन दिनों की कविता जब खयाल तो नए थे पर हिंदी का मुहावरा अभी कमजोर था। यह कविता मेरे पहले संग्रह 'एक झील थी बर्फ की'  में संगृहित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुःख के इन दिनों में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे छोटे दुःख बहुत हेते है&lt;br /&gt;कुछ बड़े भी हैं दुःख &lt;br /&gt;हमेशा कोई न कोई&lt;br /&gt;होता है हमसे अधिक दुःखी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे कई सुख&lt;br /&gt;दूसरों के दुःख होते है &lt;br /&gt;न जाने किन सुख दुःखों&lt;br /&gt;के बीज ढोते हैं&lt;br /&gt;हम सब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुख दुःखों से&lt;br /&gt;बने धर्म&lt;br /&gt;सबसे बड़ा धर्म&lt;br /&gt;खोज आदि पिता की&lt;br /&gt;नंगी माँ की खोज &lt;br /&gt;पहली बार जिसका दूध हमने पिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदि बिन्दु से&lt;br /&gt;भविष्य के कई विकल्पों की&lt;br /&gt;खोज&lt;br /&gt;जंगली माँ के दूध से&lt;br /&gt;यह धर्म हमने पाया है&lt;br /&gt;हमारे बीज अणुओं में&lt;br /&gt;इसी धर्म के सूक्ष्म सूत्र हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह जानने में सदियाँ गुजर जाती हैं&lt;br /&gt;कि इन सूत्रों ने हमें आपस में जोड़ रखा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंत तक रह जाता है&lt;br /&gt;सिर्फ एक दूसरे के प्यार की खोज में&lt;br /&gt;तड़पता अंतस्&lt;br /&gt;आखिरी प्यास&lt;br /&gt;एक दूसरे की गोद में &lt;br /&gt;मुँह छिपाने की होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच है&lt;br /&gt;जब दुःख घना हो&lt;br /&gt;प्रकट होती है&lt;br /&gt;एक दूसरे को निगल जाने की&lt;br /&gt;जघन्य आकांक्षा &lt;br /&gt;इसके लिए&lt;br /&gt;किसी साँप को&lt;br /&gt;दोषी ठहराया जाना जरूरी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदि माँ की त्वचा भूलकर&lt;br /&gt;अंधकार को हावी होने देना&lt;br /&gt;धर्म को नष्ट होने देना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी उँगलियों को उन तारों पर चलने दो&lt;br /&gt;जो आँखें बिछा रही हैं&lt;br /&gt;फूल का खिलना&lt;br /&gt;बच्चे का नींद में मुस्कराना&lt;br /&gt;न जाने कितने रहस्यों को&lt;br /&gt;आँखें समझती हैं&lt;br /&gt;आँखों के लिए भी सूत्र हैं&lt;br /&gt;जो उसी अनन्य सम्भोग से जन्मे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अँधेरा चीरकर&lt;br /&gt;आँखें निकालेंगी&lt;br /&gt;आस्मान की रोशनी&lt;br /&gt;दुःख के इन दिनों में&lt;br /&gt;धीरज रखो&lt;br /&gt;उसे देखो&lt;br /&gt;जो भविष्य के लिए&lt;br /&gt;अँधेरे में निकल पड़ा है&lt;br /&gt;उसकी राहों को बनाने में&lt;br /&gt;अपने हाथ दो&lt;br /&gt;हवा से बातें करो&lt;br /&gt;हवा ले जायेगी नींद&lt;br /&gt;दिखेगा आस्मान।               (१९८९)&lt;br /&gt;**********&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-3787412550578658377?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/3787412550578658377/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=3787412550578658377' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3787412550578658377'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3787412550578658377'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='सिर्फ इसलिए कि कई दिन हो गए'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-8507644754074097470</id><published>2009-07-30T06:01:00.000-07:00</published><updated>2009-07-30T06:02:31.092-07:00</updated><title type='text'>एक दिन में कितने दुःख</title><content type='html'>एक दिन में कितने दुःख मुझे सहला सकते हैं&lt;br /&gt;मैं शहर के व्यस्त चौराहे पर देखता हूँ&lt;br /&gt;अदृश्य मानव संतान खेल रहे हैं &lt;br /&gt;गिर रहे हैं मोपेड स्कूटरों पर पीछे बैठी सुंदर युवतियों पर&lt;br /&gt;चवन्नी अठन्नी के लिए&lt;br /&gt;मैं नहीं देखता कि मेरे ही बच्चे हैं वह&lt;br /&gt;डाँटता हूँ कहता हूँ हटो&lt;br /&gt;नहीं उतरता सड़क पर सरकार से करने गुहार &lt;br /&gt;कि मेरे बच्चों को बचाओ&lt;br /&gt;मैं बीच रात सुनता हूँ यंत्रों में एक नारी की आवाज&lt;br /&gt;अकेली है वह बहुत अकेली&lt;br /&gt;कोई नहीं है दोस्त उसका&lt;br /&gt;कहता हूँ उसे कि मैं हूँ&lt;br /&gt;भरोसा दिलाता हूँ दूसरों की तरफ से&lt;br /&gt;पर वह है कि न रोती हुई भी रोती चली है&lt;br /&gt;इतनी अकेली इतनी सुंदर वह औरत&lt;br /&gt;रात की रानी सी महकती बिलखती वह औरत&lt;br /&gt;औरत का रोना काफी नहीं है&lt;br /&gt;यह जताने रोता है एक मर्द&lt;br /&gt;जवान मर्द रोता है जीवन की निरर्थकता पर कुछ कहते हुए&lt;br /&gt;भरोसा देता हूँ उसे पढ़ता हूँ वाल्ट ह्विटमैन &lt;br /&gt;'आय सेलीब्रेट माईसेल्फ....'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुग्ध सुनता है वह एक बच्चे के कवि बनने की कहानी&lt;br /&gt;एक पक्षी का रोना एक प्रेमी का बिछुड़ना&lt;br /&gt;पढ़ते हुए मेरी आँखों से बहते हैं आँसू &lt;br /&gt;हल्की फिसफिसाहट में शुक्रिया अदा करता हूँ कविता का&lt;br /&gt;चलता हूँ निस्तब्ध रात को सड़क पर&lt;br /&gt;कवि का जीवन जीते &lt;br /&gt;बहुत सारे दुःखों को साथ ले जाते हुए।   (उद्भावना २००९)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-8507644754074097470?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/8507644754074097470/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=8507644754074097470' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/8507644754074097470'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/8507644754074097470'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/07/blog-post_30.html' title='एक दिन में कितने दुःख'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-3219150393946093538</id><published>2009-07-28T20:37:00.000-07:00</published><updated>2009-07-29T02:08:04.177-07:00</updated><title type='text'>वह बच्चा</title><content type='html'>एक मित्र ने कहा कि मैं मेरा भारत महान कहकर सचमुच के देशप्रेमियों को चोट पहुँचाता हूँ। सही है, चोट पहुँचती होगी। क्या मैं चाहता हूँ कि उन्हें चोट पहुँचे? मैं जानता हूँ कि किशोरावस्था तक मुझे भी किसी के इस तरह कहने से चोट पहुँचती थी। देश नामक भ्रामक धारणा से मुक्त होने की कोई आसान राह नहीं है। इसका मतलब यह नहीं कि व्यावहारिक रुप से देश की जो धारणा है, एक बड़े जनसमुदाय का कम से कम सिद्धांततः स्वशासन में होना या अपने चुने प्रतिनिधियों के द्वारा शासित होना (या राजतंत्र में अपनी इच्छा से किसी राजा के अधीन होना) - इससे भिड़ने के लिए मैं नारा दे रहा हूँ - यह जानते हुए भी कि जन्म से पहले हममें से किसी ने भी अपना देश नहीं चुना। यह भी नहीं कि भौगोलिक रुप से परिभाषित किसी देश में बाहर के घुसपैठिए आकर गड़बड़ी करें तो हम उसका विरोध न करें। तो आखिर मेरा मकसद क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम आम तौर से मान ही लेते हैं कि सबको स्पष्ट होगा ही कि मेरा भारत महान कहते हुए हम उस भारत की ओर संकेत कर रहे हैं जो एक बीमारी की तरह हमारे मन में बसा है - एक भारत जो शस्य श्यामला है, जहाँ लोग सुखी हैं, जहाँ नारी देवी है, जहाँ सब गड़बड़ियाँ बाहरी कारणों से हुईं। हम भूल जाते हैं कि कभी हम भी इसी काल्पनिक भारत में थे और विजयी विश्व तिरंगा प्यारा सुनकर गर्व से सीना फैलाते थे। मैंने अपने पोस्ट में जमीलुद्दीन की पंक्तियाँ /तेरा हर इक ज़र्रा हम को/ अपनी जान से प्यारा/ तेरे दम से शान हमारी/ तुझ से नाम हमारा/ जब तक है ये दुनिया बाकी हम देखें आजाद तुझे/ तेरी प्यारी सज धज की हम/ इतनी शान बढ़ाएँ/ आने वाली नस्लें तेरी/ अज़मत के गुन गाएँ/ लिखकर एक तरह से उसी भारत को जीने की कोशिश की है। पर समस्या यह है कि यह किसी भारतीय का नहीं, पाकिस्तानी का लिखा गीत है। इसे भारतीय गायकों ने नहीं, पाकिस्तानी गायिकाओं ने गाया है। तो मैं स्वाधीनता दिवस पर यह कैसे गा सकता हूँ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और साथ ही मैं लिखता हूँ कि मेरे भारत महान में कोई मुसलमान की पिटाई कर रहा है तो कोई मौलवी के नाम पर अखबारवालों को पीट रहा है! वाजिब सवाल है और कुछ तो समझ में आना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तालस्ताय ने कहा था कि देशप्रेम लोगों को सामूहिक रुप से हत्यारा बनाने की शिक्षा का साधन है। तो तालस्ताय गद्दार था क्या? हम व्यंग्य में मेरा भारत महान कहते हैं पर खुद को गद्दार नहीं कहते, हम नरेंद्र मोदियों और आदित्यनाथों को गद्दार कहते हैं। क्यों?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत पहले किसी पोस्ट में मैंने &lt;a href="http://edchange.org/multicultural/speeches/emma_goldman_patriotism.html"&gt;एमा गोल्डमैन के सौ साल पुराने भाषण&lt;/a&gt; का जिक्र किया था - शायद पूरा भाषण उद्धृत किया था - कुछ पंक्तियाँ दुबारा paste रहा हूँः &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;What is patriotism? Is it love of one's birthplace, the place of childhood's recollections and hopes, dreams and aspirations? Is it the place where, in childlike naivete, we would watch the passing clouds, and wonder why we, too, could not float so swiftly? The place where we would count the milliard glittering stars, terror-stricken lest each one "an eye should be," piercing the very depths of our little souls? Is it the place where we would listen to the music of the birds and long to have wings to fly, even as they, to distant lands? Or is it the place where we would sit on Mother's knee, enraptured by tales of great deeds and conquests? In short, is it love for the spot, every inch representing dear and precious recollections of a happy, joyous and playful childhood?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे खुद पढ़ो कि एमा ने क्या कहा। अरुंधती राय ने घोषणा कि की वह खुद को इस देश से अलग करती है, पर मैं उसे अव्वल दर्जे का देश के प्रति समर्पित इंसान मानता हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो एक देश है उन संकीर्ण खयालों वाले भक्तों का, जिन्हें यह बीमारी है कि उनमें सीना चौड़ा कर मर-मार कर देश की पूजा करने की चाहत है। जिन्हें गर्व है कि कारगिल में जवान शहीद हुए। हमें गर्व नहीं कि कारगिल या देश में कहीं भी फौजी हो या साधारण नागरिक या कोई गैरनागरिक भी मारा जाए। हम पाकिस्तान को नहीं, उन फौजी हुक्मारानों को कोसते हैं, जो जंग लड़ाई के अलावा दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते। मेरे लिए जो मर गया वह मर गया, उनके परिवारों के ऊपर जो भयंकर काला साया फैला वही सच्चाई है। वह मृत किसी देश का नहीं, जैसे जन्म के पहले हम किसी देश के नहीं होते। इसमें कोई गर्व नहीं कि पाकिस्तान के घुसपैठियों के साथ लड़कर कोई मारा गया। यह भयंकर तकलीफ और दुःख की बात है कि हमारी सरकारें समस्याओं का समाधान नहीं कर पातीं और इसके लिए लोगों की जानें जाती हैं - वे हिंदुस्तानी हों या पाकिस्तानी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सचमुच के देशप्रेमियों, आओ कि हम देश के नाम पर फैले झूठ को जानें - मेरा भारत महान महान नहीं है। सैंकड़ों हजारों समाजवैज्ञानिक काम कर रहे हैं और हमें लगातार बतला रहे हैं कि देश में गरीबी अशिक्षा बड़े पैमाने पर है। सांप्रदायिकता, जातिवाद सर्वव्यापत है। इनसे जुड़ी दूसरी तमाम समस्याएँ हैं और और यह भी कि कोई वजह नहीं कि ये दूर नहीं होनी चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच है कि कोई एक दिन में तो इन समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। पर क्या हमारी सरकार की नीतियों से ये सौ साल में भी दूर होंगी?&lt;br /&gt;सांप्रदायिक या जातिवादी तत्व क्या आम नागरिक को सम्मानपूर्वक जीने देंगे? तो इन असली गद्दारों से दुःखी होकर ही हम मेरा भारत महान पर व्यंग्य कर जाते हैं। बीस बाईस साल पहले मेरा भारत महान एक सरकारी नारा था और टी वी पर अकसर एक सरकारी विज्ञापन में एक बच्चे को दिखलाया जाता था जो धीरे धीरे राष्ट्रीय झंडे के साथ किसी खुशहाल दौड़ाक में तब्दील हो जाता था। इसे मेरी नादानी कह लो कि मुझे इससे चिढ़ थी। मैंने उन दिनों एक कहानी लिखी थी जो जनसत्ता में प्रकाशित हुई थी। नीचे वह कहानी paste कर रहा हूँ। मेरा मानना यह है कि जो सचमुच इस देश के लोगों के लिए समर्पित होकर कुछ कर रहे हैं उनकी चिंता भारत नाम की नहीं, न ही वह केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं के अंदर बसे लोगों के लिए है, उनकी चिंता मानव के लिए है, प्रकृति के लिए है।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई लोगों को यह परेशानी रहती है कि समस्याओं पर तो खूब बात कर ली, समाधान क्यों नहीं बतलाते। समाधान यही है कि पहले तो हम अस्लियत को स्वीकार करें और फिर अपने आस पास जो लोग बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं उनसे जुड़ें। जो जितना कर सकता है करे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;वह बच्चा  &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; शबनम ने मुंह से पेंसिल निकालकर कापी में दस खड़ी रेखाएं खींची - समानांतर। फिर दस तिरछी रेखाएँ खींचने के लिए वह तैयार हो रही थी, तभी उसने उन दोनों को आते देखा। पेंसिल वापस मुंह में रख वह उनकी ओर देखने लगी। मर्द जींस पर लाल बुशर्ट पहना हुआ था। औरत कुर्ते पाजामे और रंगीन दुपट्टे में थी। वे दोनों चुपचाप आकर कक्षा में पीछे की ओर बैठ गए। मैडम, जो एक बाँह वाली कुर्सी पर बैठी कुछ सोच रही थीं, अचानक खड़ी होकर बोलीं, अरे ! आप लोग आ गए। अभी कुर्सियां मंगवती हूं आपके लिए।&lt;br /&gt; मैडम ने थोड़ी देर पहले पान चबाया था। उनके बोलने पर सामने बैठी लड़कियों पर थूक के छींटे आ गिरे थे, पर वे इससे बेखबर अपनी कापियों और उन दोनों के बीच अपनी नजरें दौड़ा रही थीं। थोड़ी सी कानाफूसी भी शुरू हो गई थी, “कौन है रे ?”&lt;br /&gt; “अरे ! वही पिछले साल भी आए थे - विज्ञान वाले सर और मैडम ?”&lt;br /&gt; मर्द ने जैसे परेशान सा होते हुए कहा, “अरे नहीं, नहीं ! आप कक्षा जारी रखिए। हम यहीं ठीक हैं।”&lt;br /&gt; शबनम अभी तक एकटक उस औरत की ओर देख रही थी। इतने सुंदर से चेहरे में भी कितना रूखापन है। होंठ हल्की सी मुस्कान में खुले हुए हैं, पर लग रहा है जैसे वह मन ही मन किसी को डाँट रही हो। विज्ञान वाले सर और मैडम  के बारे में शबनम और उसके साथियों को विज्ञान कम और उनके हाव भाव अधिक याद रह गए थे। आज वैसे भी वे खाली हाथ आए लग रहे थे...&lt;br /&gt; “ठीक है, तो दो मिनट पर कितनी दूरी तय हुई ?” मैडम की आवाज यूँ तैरती हुई आई जैसे अचानक घंटों बिजली जाने के बाद बत्ती पंखे चल पड़े। शबनम को याद आया कि उसे गोकुलदास के साईकिल चलाने का ग्राफ बनाना है। उसने कापी में देखा। उसने दस समानांतर रेखाएं खींची थीं - खड़ी। अब वह तिरची रेखाएं खींचने वाली थी - क्यों? पता नहीं आज उसके दिमाग में यह सवाल क्यों आया ! रोज तो चुपचाप सवाल हल करती रहती है बिना सोचे - बिना पूछे। वैसे वे हल होते न हों - यह अलग बात है। उसे उन दोनों पर गुस्सा आया। उनकी वजह से ही तो वह भूल गयी कि वह क्या कर रही थी।&lt;br /&gt; पहली तिरछी रेखा खींचते हुए उसने एक बार फिर उस औरत की ओर देखा। उसे याद आया एक बार अपनी अम्मा के साथ जब वह इन साहब लोगों के घर गई थी झाड़ू लगाने, वहां भी ऐसी ही कोई औरत आई थी भोपाल से। उसने उसे बुलाया था, उसकी पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछा था और फिर दीदी, मतलब साहब की बीबी से कुछ अंग्रेज़ी में बोलने लगी थी। यह औरत भी फर्राटे से अंग्रेज़ी में बोलती होगी। ये सब बड़े शहरों की औरतें पता नहीं कैसे अंग्रेज़ी बोल लेती हैं। यहां तो एक भी ऐसी नहीं मिलती।&lt;br /&gt; “हाँ, दो मिनट में चालीस मीटर। अब आगे देखो चार मिनट में कितनी दूरी तय हुई ?” मैडम ने बोर्ड पर बनाए ग्राफ पर एक बिंदु अंकित करते हुए कहा।&lt;br /&gt; शबनम ने समझ लिया कि अब मैडम ने काफी दूरी तय कर ली है। वह अब कुछ नहीं समझ पाएगी। उसे लगा जैसे वह मैडम की ओर ध्यान देती रहे, तो रो पड़ेगी। झट से उसने किताब के पन्ने पलटकर मानो पागलों की तरह हाथ से निकल चुकी मैडम को पकड़ने की कोशिश की।&lt;br /&gt; किताब में बने एक ग्राफ के पास एक लड़की की तस्वीर है। वह लड़की कह रही है, 'अरे वाह ! चार मिनट में साठ मीटर आ गई।' उसके मुस्कराते होंठ अजीब से बिखरे हुए हैं। चोटी सामने की ओर लटकी हुई है।&lt;br /&gt; शबनम को लगा जैसे वह तस्वीर उसकी है। अपनी शक्ल के बारे में सोचते हुए वह सड़क की ओर देखने लगी। सड़क मैदान के उस पार थी। मैदान मतलब स्कूल के साथ सटी खाली जमीन। कक्षा मकान के आंगन में ही लगती है, इसलिए जब भी जिसकी इच्छा, सड़क पर चलते लोगों को देख सकता है। मैदान खुला है, घास बिल्कुल नहीं है, वहां भी लोग आते जाते रहते हैं। शबनम ने उस चलती फिरती दुनिया को देखा और सोचा अगर यह भीड़ अचानक बेजान हो जाए, सभी लोग पत्थर की मूर्तियाँ बन जाएं, तो कैसा लगेगा। ऐसा क्यों नहीं होता कि किसी एक दिन लोग जहां हैं, वहीं खड़े रहें, निस्तब्ध, हर रोज उन्हें चलते फिरते रहना जरूरी क्यों है !&lt;br /&gt; शबनम को सड़क की ओर एकटक देखते उस मर्द ने देख लिया। उसी ने मैडम की ओर संकेत किया और मैडम ने तुरंत चीखकर पूछा, “शबनम ! चार मिनट में कितनी दूरी तय हुई ?”&lt;br /&gt; वह मर्द झेंप सा गया। शबनम को लगा जैसे मैडम का इस तरह डांटकर पूछना उसे भी अच्छा नहीं लगा। अब वे दोनों उसकी ओर ताक रहे थे। वह क्या जवाब दे।&lt;br /&gt; “साठ मीटर, मैडम”, उसके मुंह से निकला। मैडम खुश हो गई, हालांकि उनको पता भी न था कि शबनम को अभी तक यह मालूम नहीं था कि आँकड़ों की तालिका कहाँ बनी है। शबनम फिर से अपनी कापी में तिरछी रेखाएं खींचने लगी थी।&lt;br /&gt; “अच्छा तुम लोग आगे के सभी बिंदुओं को ग्राफ पर दिखाओ और ग्राफ बनाकर दिखाओ,” कहती हुई मैडम दीवार से सटकर लड़कियों का चक्कर काट कर उन दोनों के पास आई।&lt;br /&gt; “सचमुच, कैसे पढ़ा लेती हैं आप इतने सारे बच्चों को इतनी छोटी सी जगह में ?” मर्द ने कहा। वह औरत अभी भी उसी रूखेपन से मुस्करा रही थी।&lt;br /&gt; “अब देखिए, इसी में चल रहा है। कुल हमारे पास सात कमरे हैं। दो शिफ्ट में मिडिल स्कूल में बारह सौ लड़कियां और दूसरी शिफ्ट में हाईस्कूल भी साथ लगता है।”&lt;br /&gt; “हां, सरकार तो बस लड़कियों के लिए वजीफाओं की घोषणा करती रहती है, पर उनके बैठने की जगह की चिंता उनको क्यों हो ? इससे वोट थोड़े ही मिलेंगे।”&lt;br /&gt; शबनम ने वजीफे की बात पर ध्यान दिया। उसे अभी तक यह यकीन नहीं होता कि जो भी पैसे उसे मिलने लगे हैं, वह सरकार एक दिन वापस नहीं ले लेगी।&lt;br /&gt; तभी दो लड़कियां मैडम के पास अपनी कापियाँ लेकर आईं। मैडम ने गंभीर आवाज़ में कहा, “इकाई लिखो अक्षों पर। पैमाना तो दिखलाया ही नहीं तुमने...।”&lt;br /&gt; वे दोनों अपने कागज़ों में कुछ नोट कर रहे थे। अचानक उस औरत ने पूछा, “अच्छा, ये लड़कियाँ आपसे सवाल क्यों नहीं पूछ रहीं ? आपसे डरती हैं क्या ?”&lt;br /&gt; “अब क्या पता ? जिज्ञासा की प्रवृत्ति इनमें जरा कम है!”&lt;br /&gt; शबनम को यह अच्छा नहीं लगा। उसके मन में तो हजारों सवाल हैं। अगर वह पूछने लगे तो मैडम डाँट देंगी।&lt;br /&gt; मैडम घूमकर वापस बोर्ड पर आ गई थीं। वे दो अब आपस में बातें कर रहे थे - अंग्रेज़ी में। शबनम ने सोचा कि हो सकता है ये लोग मैडम के दोस्त हों, नहीं तो इस तरह नीचे थोड़े ही बैठते। पर मैडम तो कितनी साधारण सी लगती हैं और ये लोग पैसे वाले लगते हैं। वैसे अच्छे लग रहे हैं स्वभाव से। अपने आस पास बैठी लड़कियों से बातें कर रहे हैं। दो एक लड़कियों को मदद भी कर रहे हैं ग्राफ बनाने में। शबनम इसी बीच अपनी आड़ी आड़ी तिरछी रेखाओं पर मन ही मन कूदने का एक खेल खेलने लगी थी। एक घर आगे बढ़े तो बीस मीटर दो मिनटों में।&lt;br /&gt; तभी एक आदमी साइकिल पर आया और के बिलकुल पास खड़ा होकर साइकिल की घंटी बजाते हुए बोला, “आठवीं की कक्षा यहीं लगती है ?”&lt;br /&gt; मैडम ने झल्लाते हुए कहा, “हाँ, क्या बाते है ?”&lt;br /&gt; कक्षा के दूसरी ओर से तब तक रूपाली उठ खड़ी हुई थी। अच्छा, ये रूपाली के पापा होंगे, शबनम ने सोचा। रूपाली शर्माती सी चुपके से उठकर अपने जूते पहनकर पापा के पास जा खड़ी हुई।&lt;br /&gt; वह आदमी जैसे कुछ देख ही न रहा हो, इस तरह उसने कहा, “जी, बिटिया का नाम कट गया ?”&lt;br /&gt; “ओ, अच्छा ! भई, पंद्रह तारीख तक फीस देनी पड़ती है, इसने दी नहीं तो मैडम ने जैसा बोला है, वैसा हमने किया। मैडम ने कहा है कि पंद्रह के बाद फीस नहीं देने पर दो दिन तक लेट फीस लगाकर पैसे दो, नहीं तो नाम कट जाएगा।”&lt;br /&gt; मैडम की मैडम मतलब बड़ी बहनजी...बाप रे ! शबनम कांप उठी। बड़ी बहनजी आतंक की प्रतिमूर्ति हैं। चाहे सब कुछ करवा लो, पर बड़ी बहनजी के पास मत भेजो !&lt;br /&gt; रूपाली के पापा ने धीरे से कहा, “वो ऐसा है कि मैडम, उस वक्त पैसे नहीं थे..।” रूपाली सिर झुकाए खड़ी थी। शबनम को लगा कि वह रूपाली की जगह होती तो खड़ी नहीं हो पाती। शायद कहीं भाग जाती। या शायद कोई पत्थर उठाकर किसी को मार देती। पत्थर उठाने के खयाल से वह घबराई।&lt;br /&gt; “आप जाइए, मैडम से बात कर लीजिए।” मैडम का गला नर्म हो आया था। &lt;br /&gt; रूपाली और उसके अब्बा चले गए। गरीब होना कितना बड़ा झंझट है, शबनम ने सोचा। पैसे नहीं तो टाइम पर फीस नहीं दे सकते। टाइम पर फीस नहीं दी तो और पैसे दो। शुक्र है कभी शबनम ऐसी मुसीबत में नहीं पड़ी - वह तो अम्मी उनका इतना ध्यान रखती है इसलिए।&lt;br /&gt; कुछ लड़कियाँ कापियाँ लिए मैडम तक आईं, तो मैडम ने उनको उन दोनों के पास भेज दिया। उन दोनों ने ध्यान से लड़कियों के ग्राफ देखे। औरत ने मर्द से कहा कि पैमाना बनाने में बार बार गलती हो रही है। मर्द ने मैडम से कहा और मैडम क्लास को समझाने लगी।&lt;br /&gt; उस औरत ने धीरे से कहा, उस औरत ने धीरे से कहा, “होपलेस ! इस शिक्षा व्यवस्था का कोई सुधार नहीं हो सकता ?”&lt;br /&gt; “यहाँ तो परंपरागत तरीका ही चल सकता है। शिक्षक भाषण दे और बच्चे रट लें। ग्राफ भी रट लें, हा, हा,” हँसते हुए मर्द बोला।&lt;br /&gt; शबनम कुछ समझ नहीं पाई। उसे लगा कि उसे समझ में नहीं आता, इसलिए वे दोनों नाराज हो रहे हैं। उसे बड़ी शर्म आई।&lt;br /&gt; “इनोवेशन नहीं, रिनोवेशन चाहिए यहां तो ! न बैठने की जगह, न ढंग का ब्लैक बोर्ड ! क्या सुधार हो सकता है यहां ?”&lt;br /&gt;  “अरे सुनो, लौटते वक्त याद दिलाना बाजार से सब्जी ले लेंगे।”&lt;br /&gt; शबनम को उन पर दया आ गई। उसकी अम्मी उनके यहाँ काम करती होती, तो उनको सब्जी लाने की चिंता न करनी पड़ती।&lt;br /&gt; शबनम को फिर एक बार चिंता हुई कि ग्राफ का अभ्यास उसे समझ में नहीं आया। उसके पास बैठी गौरी की कापी के एक पन्ने में ग्राप बना हुआ है और दूसरे में शुरू से अंत तक 'राम – राम' लिखा हुआ है। अलग अलग साइज में, अलग अलग कोण बनाते हुए 'राम राम'। शबनम ने सोचा कि शायद उसे भी अपनी कापी में खुदा का नाम लिखना चाहिए, शायद इससे कोई फर्क पड़े। हो सकता है कि तब उसे मैडम की सारी बातें समझ में आ जाए। घंटी लगने के बाद वह गौरी से पूछेगी कि राम राम लिखने से उसे क्या फायदा हुआ है या नहीं।&lt;br /&gt; स्कूल का चपरासी मैडम को एक चिट दे रहा था। मैडम ने थोड़ी देर पढ़ा, फिर बोली, “सभी लड़कियाँ, ध्यान से सुनो। अरी, तुम लोग अपने पालकों से कुछ बोलती हो स्कूल के बारे में या नहीं - यहां बैठने की जगह नहीं है, पंखा नहीं है - यह सब बोलती हो ?”&lt;br /&gt; कहीं से हाँ मैडम, कहीं से नहीं मैडम की आवाज़ें आईं। शबनम ने सोचा कि अगर वह हाँ कहे तो मैडम बिगड़ जाएंगी। उसने 'नहीं' कह दिया।&lt;br /&gt; “अरी ! बोलना चाहिए न ? आएं !... आज शाम को पालकों की मीटिंग है मैडम के साथ। तुम लोग अब जब रीसेस में घर जाओगी, पालकों को कहना कि छह बजे मैडम से बात करें, बोलोगी सब ? बोलना कि स्कूल को कुछ सौ दो सौ रुपया दान करें - हाँ ?” मैडम मुस्करा रहीं थीं, जैसे उन्होंने कोई मजाक किया हो।&lt;br /&gt; सौ  दो  सौ ? शबनम की अम्मी ने जब से उनके लिए वो सुभाष कालोनी वालों से सेकंड हैंड में टीवी लिया है, हर महीने सौ रुपए वेसे ही निकल जाते हैं। कितना रोई थी वह। उसके भाई  बहन भी रोए थे टीवी के लिए। आखिरकार, अम्मी ने हँसकर वादा दे दिया कि ठीक है, ला देंगे। फिर साहब ने ही बतलाया था कि उनके दोस्त के यहां सेकंड हैंड में टीवी सस्ता मिल जाएगा और उसे महीने महीने रकम देनी होगी। तब क्या पता था कि सेकंड हैंड से तो न लेना अच्छा था। न तस्वीर ठीक से आती है, न आवाज़ । चित्रहार हफ़्ते में दो दिन ढंग से देख ले, इसकी भी गुंजाइश नहीं। बस अब सौ रूपए भरते रहो हर महीने !&lt;br /&gt; शबनम ने एक बार सोचा कि वह आज अम्मी को कहे कि छह बजे बड़ी बहनजी से आकर मिले। क्या बोलेगी अम्मी बड़ी बहनजी से ? अम्मी शायद बड़ी बहनजी की हर बात पर हँसती रहेगी ! अम्मी को बड़ा आश्चर्य होगा कि किस तरह बड़ी बहन जी इतनी सारी बातें कह सकती हैं ? अम्मी शायद बहुत खुश भी होगी कि बड़ी बहनजी वाले स्कूल में उसकी बेटी पढ़ती है। अम्मी की बात सोचते हुए उसे हँसी आ गई।&lt;br /&gt; यह सब सोचते सोचते कब उसकी नजरें फिर मैदान पार कर सड़क पर चली गई थीं, उसे पता भी न चला। अचानक उसने देखा कि सड़क के ठीक बीचों बीच एक बच्चा चल रहा है। बहुत ही छोटा बच्चा। अरे, वह गिर गया। अरे! कोई उसको उठाए तो ! उधर से साइकिलें आ रहा हैं। अभी थोड़ी देर पहले कैसे एक एक कदम चल रहा था। हाय ! क्या पता कोई गाड़ी आ जाए। जाने कहाँ देखा है उस बच्चे को उसने ! इतनी दूर से भी बहुत जाना पहचाना लग रहा है। वह उतावली होने लगी। मैडम से कहे क्या कि वह बच्चा सड़क पर इस तरह गिरा हुआ है ? वह चिंता से छटपटाने लगी। अम्मी होतीं तो तुरंत दौड़कर उस बच्चे को उठा लेतीं। वह क्या करे ! वह एक टक उस बच्चे की ओर देख रही थी। इतनी दूर से वह बच्चा कितना असहाय लग रहा है। वह बच्चा चलती साइकिलों, ठेलों के बीच बैठा हुआ है। कोई नहीं सोच रहा कि उसको उठाकर किनारे रख दिया जाए। शायद उसका कोई न कोई, माँ बाप, भाई बहन, कोई तो होगा आसपास। क्षण भर के लिए यह सोचकर वह आश्वस्त हो गई। दूसरे ही क्षण वह फिर परेशान होने लगी।&lt;br /&gt; अचानक बिजली की कौंध सा उसे याद आ गया कि उसने इस बच्चे को कहाँ देखा था। अरे ! रोज तो टीवी पर आता है वह ! भारत का झंडा जब लहराता है और वे सब बैठे यह सोचते रहते हैं कि साहब जैसा रंगीन पर्दे वाला टीवी होता तो उन्हें तीन रंगों में वह झंडा दिखता ! और कितना बढ़िया म्यूज़िक आता है उसके साथ। फिर तिरंगे के निचले बाएँ कोने में वह बच्चा उठ खड़ा होता है। टीवी पर धीरे धीरे दौड़ता है और ठीक बीच में आने के बाद वह बड़ा दौड़ाक  बन जाता है। अंत में जैसे आसमान से तैरते हुए अक्षर आते हैं 'मेरा भारत महान'।&lt;br /&gt; वह उठ खड़ी हुई। टीवी का संगीत उसके कानों में गूंज रहा है - मेरा भारत महान ! हां, हां वही तो है - वह जो बच्चा दौड़ता है झंडे के इस ओर से उस ओर। वह बच्चा तो बाद में हाथ में मशाल लिए बड़ा दौड़ाक बनता है, पर यह बच्चा टीवी वाले बच्चे की तरह बड़ा होकर दौड़ाक नहीं बनेगा रे ! वह तो अभी यहीं किसी गाड़ी से कुचला जाएगा रे।&lt;br /&gt; “क्या बात है री ?” मैडम की आवाज उसे नहीं सुनाई पड़ी। मैडम कुछ और कह रही थीं। पीछे से उनकी आवाज धावा करती आ रही थी। पर वह अब दौड़ रही थी। उसे चारों ओर से सुनाई पड़ रहा था - मेरा भारत महान।&lt;br /&gt; लड़कियों और मैडम की मिली जुली आवाज का उस पर कोई असर नहीं पड़ा। वह एक मन से मेरा भारत महान के उस बच्चे की ओर दौड़ती रही।&lt;br /&gt;                                                                   (रविवारी जनसत्ताः १९९०)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहानी का इस्तेमाल करना चाहो तो खूब करो, बस लेखक का नाम ज़रुर लिख देना।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-3219150393946093538?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/3219150393946093538/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=3219150393946093538' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3219150393946093538'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3219150393946093538'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/07/blog-post_28.html' title='वह 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का अनुवाद पहल में प्रकाशित हुआ था, तो  उदय ने प्रशंसा में चार पृष्ठ लंबा ख़त लिखा था। एक बात मुझे काफी अच्छी लगी थी, उदय ने लिखा था कि काश कभी भारत का इतिहास भी इस तरह लिखा जाता। मैंने धन्यवाद का जवाबी ख़त भेजा और कुछ ही दिनों के बाद उदय का जवाब आया था कि उसके कोई अमरीकी इतिहासविद मित्र ने बतलाया है कि  हावर्ड ज़िन को अमरीका में कोई खास महत्त्व नहीं दिया जाता है। मुझे रंजिश थी, खास तौर पर इसलिए कि मैंने पहले अध्याय का अनुवाद एकलव्य संस्था के साथियों पर चिढ़ कर लिखा था, क्योंकि वे सामाजिक अध्ययन की पुस्तक में अमरीका पर तैयार किए गए अध्याय पर हमारी प्रतिक्रिया को गंभीरता से नहीं ले रहे थे। बहरहाल मैंने पुस्तक के बारह  अध्यायों का  अनुवाद किया जिनमें से दस अलग अलग पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। कोई दस साल पहले चोम्स्की दिल्ली आए थे तो उनका भाषण सुनने मैं चंडीगढ़ से पहुँचा। चोम्स्की ने  ज़िन का जिक्र किया तो में सोचता रहा कि उदय प्रकाश कहाँ है। फिर मैं ही थक गया और अनुवाद पूरा न कर पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में 'तिरिछ' पढ़कर प्रभावित होकर मैंने उसे लिखा था। कोई जवाब नहीं आया था। कुछ समय बाद मैंने दरियाई घोड़ा वाले संग्रह की कहानियाँ पढ़ीं। रामसजीवन की प्रेम कथा पढ़ी और बहुत तड़पा। गोरख पांडे से दो बार ख़तों में बात हुई थी और  पार्टी में काम करनेवाला तेजिंदर नाम का एक लड़का मुझे उसके बारे में बतलाता था। गोरख पांडे कि मृत्यु से हमलोग मर्माहत थे। दुर्भाग्य से उसके कोई साल भर बाद मैंने वह कहानी पढ़ी, पढ़ते ही समझ गया कि यह गोरख के बारे में है। तब से मन में उदय को लेकर एक पूर्वाग्रह बैठ गया, जो कभी निकला नहीं। इससे उसकी कहानियों के प्रति कोई मन में कोई विराग हुआ हो, ऐसा नहीं है। पिछले साल पहली बार हिंदी साहित्य पर कुछ पढ़ाने का मौका मिला तो 'टेपचू' पढ़ाई। छात्रों ने गालियों के प्रयोग पर सवाल उठाए तो उदय के पक्ष में और अश्लीलता पर सामान्य चर्चा भी की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में उदय के योगी आदित्यनाथ से पुरस्कार लेने पर विवाद खड़ा हुआ तो मुझे छः साल पहले की घटना याद आई। भूपेन हाजारिका ने बीजेपी की ओर से लोकसभा का चुनाव लड़ा। दुःखी मन से मैंने कविता लिखी थी, जो पश्यंती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भू भू हा हा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन ऐसे आ रहे हैं&lt;br /&gt;सूरज से शिकवा करते भी डर लगता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी को कत्ल होने से बचाने जो चले थे&lt;br /&gt;सिर झुकाये खड़े हैं&lt;br /&gt; दिन ऐसे आ रहे हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोयल की आवाज़ सुन टीस उठती&lt;br /&gt;फिर कोई गीत बेसुरा हो चला &lt;br /&gt; दिन ऐसे आ रहे हैं&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;भू भू हा हा  ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;              (पश्यंती- २००४)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में एक लेख भी लिखा था, जिसमें हंगेरियन निर्देशक इस्तवान स्जावो की फिल्म मेफिस्टो का जिक्र किया था, जो हिटलर के समय हंगरी के एक ऐसे संस्कृतिकर्मी पर लिखी कहानी है, जिसमें गोएठे के मेफिस्टो की तरह शैतान और हैवान का द्वंद्व छिड़ा हुआ है और जो नात्सी प्रताड़कों के साथ समझौता करते हुए यहाँ तक पहुँच जाता है कि वापस लौटने का कोई रास्ता उसे नहीं दिखता। वह लेख अधूरा ही रहा और कहीं प्रकाशित नहीं किया। अभी भी किसी फाइल में पड़ा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उम्र और अनुभव के साथ मुझमें भी सहिष्णुता बढ़ी है और अपनी मजबूरियों और समझौतों को समझते हुए अपने साथ दूसरों को भी स्वीकार करना मैंने सीखा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रसंग में मुझे जो बात बहुत महत्त्वपूर्ण लगती है, वह है हिंदी की गुटबाजी से भरी, व्यक्तिकेंद्रिक, संकीर्ण एक दुनिया का होना जो केवल हताश कर सकती है। अगर &lt;a href="http://kabaadkhaana.blogspot.com/2009/07/blog-post_4902.html"&gt;कबाड़खाना&lt;/a&gt; पर चली बहस को पढ़ें तो ऐसा लगता है कि गाँधी या आइन्स्टाइन जैसे किसी व्यक्ति पर बहस हो रही है। कई बार लगता है पूछूँ कि किसी को याद है कि प्रेमचंद ने कितने उपन्यास, कितनी कहानियाँ लिखी थीं। क्या आज के लेखक तमाम सुविधाओं के बावजूद इतना लिख रहे हैं। दूसरी भाषाओं की ओर भी जरा देखें। ताराशंकर ने पचपन उपन्यास लिखे थे। बांग्ला में हर प्रतिष्ठित रचनाकार आम वयस्कों के अलावा बच्चों के लिए भी लिखता है। महाश्वेता देवी के बराबर हिंदी में कोई है क्या? सच यह है कि हिंदी में बहुत कम लिखकर बहुत ज्यादा शोर के केंद्र में पहुँचने की प्रवृत्ति आम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अशोक बाजपेयी के बारे में अकसर कहा जाता है कि वे हिंदी के लेखकों की अनपढ़ता की ओर संकेत करते हैं। यह तो खतरनाक है ही, पर उससे भी ज्यादा चिंता का विषय है कि जो लोग सही जगहों पर होने की वजह से थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं, वे जब विदेशी फार्म या शैली को बिना आत्मसात किए हिंदी में ढाल लेते हैं, अधिकतर लोगों को पता भी नहीं चलता और बहुत हो हल्ला होता है कि भयंकर शिल्प रचा गया। सही है लोग मुझसे पूछेंगे कि यह तो आक्षेप है बिना उदाहरण दिए यह मैं कैसे कह सकता हूँ। पर मैं इस बहस में नहीं पड़ने वाला। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमलोगों ने जब ब्लागिंग शुरु की थी, हिंदी में ब्लाग लिखने वाले बहुत कम लोग थे।  सहिष्णुता के साथ संघी मानसिकता के लोगों के साथ बहस करते थे। अचानक युवाओं की यह भीड़ आई जिसे यह पता नहीं कि ब्लाग कोई लघु पत्रिका नहीं जिसे कुछ लोग पढ़ते हैं और जिनमें खास किस्म की बहसें चलती हैं।  ब्लागिंग हिंदी में व्यापक पाठक समुदाय को साहित्य और समकालीन अन्य समस्याओं के प्रति जागरुक करने का अच्छा माध्यम हो सकता है और है भी। पर इस तरह की गाली गलौज की भाषा में बहसें - इससे ब्लाग पाठक हिंदी से विमुख ही होंगे। हर कोई एक दूसरे से आगे बढ़ कर खुद को सचेत और जागरुक पेश करने में लगा है। अगर आपने गुजरात कहा तो चौरासी क्यों नहीं कहा, अगर लालगढ़ कहा तो शिक्षा बिल पर क्यों नहीं कहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसका मतलब यह नहीं कि बहस हो ही नहीं। जो मुद्दा चर्चा में है वह महत्त्वपूर्ण है, सवाल यह है कि हम कैसे इस पर बात करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात और। लेखकों के संदर्भ में सांप्रदायिकता और जातिवाद को लेकर बातचीत खूब होती है। इसमें भी आत्मकेंद्रिक या अधिक से अधिक कुछ लोगों तक सीमित बातें होती हैं।  सांप्रदायिकता और जातिवाद से लड़ने के लिए सिर्फ कहानी कविता में बात करने से अलग जीवन में कुछ करने की ज़रुरत ज्यादा है। और सिर्फ नामी गरामी लेखक हो जाना ही तरक्कीपसंद होने की कसौटी नहीं है। न ही तरक्कीपसंद लेबल लग जाना निजी जीवन में तरक्कीपसंद होने का प्रमाण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं शायद और भी बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ पर वह सब फिर कभी। युवाओं से इतना ही कहना है कि दुनिया बहुत बड़ी है - वह न तो उदय प्रकाश से शुरु होती है न उस पर खत्म। वह तो गाँधी, मार्क्स या आइन्स्टाइन पर भी खत्म नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://samatavadi.wordpress.com/2009/07/27/shamim_modi_attack/"&gt;अफलातून ने शमीम मोदी पर हुए निर्मम हमले&lt;/a&gt; की बात अपने ब्लाग में लिखी है। इस निंदनीय घटना के लिए जितना भी प्रतिवाद हो, कम है। युवा इस पर एकजुट हों। हाँ, हाँ, लालगढ़ पर भी। हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष.......सिर्फ नारा ही नहीं, जो जितना कर सके जो जितना कह सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-9190510133951307282?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/9190510133951307282/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=9190510133951307282' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/9190510133951307282'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/9190510133951307282'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/07/blog-post_27.html' title='उदय प्रकाश के बहाने'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-6583172400104566541</id><published>2009-07-26T09:55:00.000-07:00</published><updated>2009-07-26T09:59:00.154-07:00</updated><title type='text'>सोहनी धरती अल्लाह रखे</title><content type='html'>प्रतिलिपि पर कविता पढ़ कर एक मित्र ने मजाक करते हुए पूछा - &lt;a href="http://pratilipi.in/2009/07/7-poems-by-laltu/"&gt;दरख्त को क्यों इतनी झेंप?&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सचमुच कई बार लिखने की कोशिश करते हुए रुक गया। कई कारण हैं चिट्ठा न लिखने के। व्यस्तता, बीमारी, इत्यादि, पर सबसे बड़ा कारण वही सामान्य अवसाद है, जो जरा सा सजग हो कर सोचते ही हावी हो जाता है। इसके बावजूद कि कितने साथी जूझ रहे हैं कि बेहतर सुबह नसीब हो, फिर भी कभी कभी जैसे असहायता का समंदर सा दम घोटने लगता है। वैसे इन दिनों में हमेशा कि तरह कुछ पढ़ता रहा। अब पढ़ने के तुरंत बाद भी सब नाम याद नहीं रहते, पर मसलन &lt;br /&gt;Ian Mcewan  का उपन्यास Atonement,  Per Patterson का Out Stealing Horses – ये दो और David Allyn  का Make Love Not War – साठ-सत्तर के दशकों में अमरीका में हुए यौन आंदोलनों पर लिखी इतिहास की किताब पढ़ी। मैं  १९७९  में  पहली बार अमरीका गया था और छः साल लगातार ठहरा था।  Allyn की उम्र मुझसे कम है, इसलिए प्रत्यक्ष अनुभव उन घटनाओं का उसे नहीं है, जिन्हें मेरी पीढ़ी के लोग थोड़ा बहुत देख पाए थे। फिर भी साक्षात्कारों और दस्तावेजों के आधार पर लिखी यह किताब सचमुच पढ़ने लायक है। दो साल से पास पड़ी हुई थी, आखिरकार मैंने पढ़ ही ली। एक और किताब जो लंबे समय से पास थी और जिसका दो तिहाई पढ़ गया हूँ, वह है  Marvin Minsky की &lt;br /&gt;The Society of Minds. चूँकि पेशे से वैज्ञानिक हूँ इसलिए विज्ञान की पुस्तकों के बारे में जिक्र करने का मन नहीं करता। पर यह पुस्तक भी अद्भुत है। एक एक पन्ने के २७० अध्यायों में Minsky ने दिमागी प्रक्रियाओं के बार में खूबसूरती से समझाया है।  Minsky विश्व विख्यात AI यानी artificial intelligence के शोधकर्त्ता रहे हैं और उनकी पहुँच इस क्षेत्र में अद्वितीय है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, इन सब के बीच भारत महान अपनी लीक पर चलता रहा। राम सेने के लोगों ने किसी हिंदू विवाह समारोह में उपस्थित एक मुसलमान सज्जन की पिटाई की सिर्फ इसलिए कि मुसलमान होकर  हिंदू विवाह में आने कि जुर्रत कैसे की। किसी दरगाह के मौलवी के समर्थकों ने अखबार वालों को पीटा कि उन्होंने मौलवी के बारे में क्यों लिखा। और बलात्कार, खून खराबा, सब अपनी जगह पर चल रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर एक और स्वतंत्रता दिवस आ रहा है। इस बार मैंने तय किया है कि सारे दिन यह नग्मा गाऊँगा - इसे सबसे पहले फरीदा ख़ानूम की आवाज में सुना था:&lt;br /&gt;सोहनी धरती&lt;br /&gt;अल्लाह रखे&lt;br /&gt;कदम कदम आबाद तुझे&lt;br /&gt;तेरा हर इक ज़र्रा हम को&lt;br /&gt;अपनी जान से प्यारा&lt;br /&gt;तेरे दम से शान हमारी&lt;br /&gt;तुझ से नाम हमारा&lt;br /&gt;जब तक है ये दुनिया बाकी&lt;br /&gt;हम देखें आजाद तुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरी प्यारी सज धज की हम&lt;br /&gt;इतनी शान बढ़ाएँ&lt;br /&gt;आने वाली नस्लें तेरी&lt;br /&gt;अज़मत के गुन गाएँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गीत को जमीलुद्दीन अली ने लिखा था। इसे नूरजहाँ आदि कइयों ने गाया है। किस मुल्क के लिए लिखा गया है यह गीत? मुझे लगता है यह मेरे मुल्क के लिए है - जहाँ भी मैं हूँ - हैदराबाद में, या दुनिया के किसी दीगर जगह पर, हर जगह मैं यह गीत गा सकता हूँ। इसको सुन कर Woodie Guthrie का गाया पुराना गीत याद आता है:&lt;br /&gt;This land is my land this land is your land &lt;br /&gt;This land is made for you and me&lt;br /&gt;From Redwood forests to Newyork Islands,&lt;br /&gt;This land is made for you and me.&lt;br /&gt;सचमुच कौन सा इतिहास मेरा है, क्या टिंबक्टू का इतिहास मेरा इतिहास नहीं है!  वक्त आ गया है कि लोग माँग करें कि हमें देशभक्ति की संकीर्ण परिभाषाओं से मुक्त किया जाए।  हम धरती के लाल, सारा संसार हमारा है। जैसे मुक्तिबोध ने कहा था: जन जन का चेहरा एक।&lt;br /&gt;जन जन का चेहरा एक&lt;br /&gt;मुक्तिबोध&lt;br /&gt;फिर कहो मेरी कलम से&lt;br /&gt;जन जन विक्षिप्त&lt;br /&gt;यूँ ही घबराहट, एकाकीपन&lt;br /&gt;यूँ ही आश्रय की खोज में लिप्त&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यूँ ही आसक्त, यूँ ही विरक्त&lt;br /&gt;यूँ ही अन्याय से समझौतापरस्त&lt;br /&gt;यूँ ही व्यक्तिवादी&lt;br /&gt;यूँ ही समष्टि से विच्छिन्न&lt;br /&gt;सुख दुख के खेल में क्लांत&lt;br /&gt;परिभ्रांत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                (नाबार्ड की पत्रिका में प्रकाशित - २००५)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच हबीब तनवीर गुजर गए। भोपाल में 87-88 के दौरान पहली बार उनका 'चरनदास चोर' देखा था।  चंडीगढ़ मे एक बार उनसे थोड़ी बातें हुईं थीं। जनवरी में वर्धा में उनका कार्यक्रम था और मैं बीमार लेटा हुआ था - दूर से उनकी बेटी का गाना सुन रहा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-6583172400104566541?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/6583172400104566541/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=6583172400104566541' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/6583172400104566541'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/6583172400104566541'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='सोहनी धरती अल्लाह रखे'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' 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rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/7680222003174471249/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=7680222003174471249' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/7680222003174471249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/7680222003174471249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/05/blog-post_29.html' title='रोशनी'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total 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/&gt;दुनिया को ज़रा और बेहतर बनाएँ।&lt;br /&gt;              (दैनिक भास्कर – चंडीगढ़ २०००)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-2897541207482625630?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/2897541207482625630/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=2897541207482625630' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/2897541207482625630'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/2897541207482625630'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/05/blog-post_7960.html' title='अभी समय है'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-4722637751332167412</id><published>2009-05-26T01:36:00.000-07:00</published><updated>2009-05-26T07:42:37.894-07:00</updated><title type='text'>तुम्हारी दाढ़ी को क्या हुआ</title><content type='html'>बिनायक सेन, बिनायक सेन, तुम्हारी दाढ़ी को क्या हुआ।&lt;br /&gt;चलो एक तो अच्छी खबर आई। &lt;a href="http://www.hindu.com/2009/05/26/stories/2009052657640100.htm"&gt;बिना दाढ़ी का बिनायक सेन जेल से छूटा&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;पर जैसा कि हिंदू में आज कार्टून छपा है, फुर्र नहीं हो सकते- जमानत ही है। पर  फुर्र होना भी क्यों? जनता का आदमी, जनता के बीच ही रहेगा। खतरनाक लोगों के बीच रहने की उसको आदत है। &lt;br /&gt;बेशर्म हुक्मरान अपनी जिद पर हैं। अभी अभी बस्तर में एक गाँधी वादी संगठन का दफ्तर तोड़ा है। गरीबों की ओर से बोलने वाले की हर पार्टी दुश्मन। ऊपर से बस्तर में सरकार संघियों की है।  वे लोग तालिबानी हैं, गलती से हिंदू पैदा हो गए हैं, इसलिए खुले आम कह नहीं सकते, केंद्र में फिर सरकार इनकी बन जाए तो खुले आम भी घोषणा कर दें, क्या पता। केंद्र में हारे तो &lt;a href="http://www.thehindu.com/2009/05/18/stories/2009051850020100.htm"&gt;मंगलूर में सीट जीतने की खुशी में मुसलमानों को पीटा&lt;/a&gt;। तो बिनायक न भी डरे, उसकी ओर से डर हम पर हावी है। &lt;a href="http://www.kalpana.it/eng/blog/2009/05/dr-binayak-sen-gets-bail.html"&gt;सुनील ने भी आज इस पर लिखा &lt;/a&gt;है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-4722637751332167412?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/4722637751332167412/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=4722637751332167412' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/4722637751332167412'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/4722637751332167412'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html' title='तुम्हारी दाढ़ी को क्या हुआ'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-3428044700623424296</id><published>2009-05-21T02:39:00.000-07:00</published><updated>2009-05-21T02:52:18.789-07:00</updated><title type='text'>अचंभित दुनिया देखती है औरत।</title><content type='html'>मन तो मेरा था कि बुर्जुआ लोकतंत्र के चुनावों पर एक पेटी बुर्जुआ अराजकतावादी के कुछ अवलोकनों को लिखूँ। पर अफलातून जो इन दिनों मेरे संस्थान में आया हुआ है ने समझा दिया कि मुल्क में मेरे जैसे पेटी बुर्जुआ टिप्पणीकारों की भरमार है। इसी बीच पुराने पोस्ट में 'छोटे शहर की लड़कियाँ' शीर्षक कविता पर टिप्पणी आई कि दूसरी कविता 'बड़े शहर की लड़कियाँ' भी पोस्ट कर दूँ। तो फिर वही सही।&lt;br /&gt;यह कविता भी मेरे पहले संग्रह 'एक झील थी बर्फ की' में संकलित है। यह कविता लाउड है, इसमें शब्दों के सैद्धांतिक अर्थ हैं, जिनसे हर कोई परिचित नहीं होता, जैसे 'गोरा' शब्द रंग नहीं, सामाजिक राजनैतिक सोच है। यह कविता संभवतः पल-प्रतिपल पत्रिका में भी १९८९ में प्रकाशित हुई थी। 'छोटे शहर की लड़कियाँ' जैसी हल्की न होने की वजह से यह आम पाठकों पर भारी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े शहर की लड़कियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर में&lt;br /&gt;एक बहुत बड़ा छोटा शहर और&lt;br /&gt;निहायत ही छोटा सा एक&lt;br /&gt;बड़ा शहर होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहाँ लड़कियाँ &lt;br /&gt;अंग्रेज़ी पढ़ी होती हैं&lt;br /&gt;इम्तहानों में भूगोल इतिहास में भी &lt;br /&gt;वे ऊपर आती हैं&lt;br /&gt;उन्हें दूर से देखकर&lt;br /&gt;छोटे शहर की लड़कियों को बेवजह &lt;br /&gt;तंग करने वाले आवारा लड़के&lt;br /&gt;ख्वाबों में - मैं तुम्हारे लिए &lt;br /&gt;बहुत अच्छा बन जाऊँगा - &lt;br /&gt;कहते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ड्राइवरों वाली कारों में &lt;br /&gt;राष्ट्रीय स्पर्धाओं में जाती लड़कियाँ&lt;br /&gt;तन से प्रायः गोरी &lt;br /&gt;मन से परिवार के मर्दों सी &lt;br /&gt;हमेशा गोरी होती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्मों में गोरियाँ&lt;br /&gt;गरीब लड़कों की उछल कूद देखकर&lt;br /&gt;उन्हें प्यार कर बैठती हैं&lt;br /&gt;ऐसा ज़िंदगी में नहीं होता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे शहर की लड़कियों के भाइयों को&lt;br /&gt;यह तब पता चलता है&lt;br /&gt;जब आईने में शक्ल बदसूरत लगने लगती है&lt;br /&gt;नौकरी धंधे की तलाश में एक मौत हो चुकी होती है&lt;br /&gt;बाकी ज़िंदगी दूसरी मौत का इंतज़ार होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तब तक बड़े शहर की लड़कियाँ &lt;br /&gt;अफसरनुमा व्यापारी व्यापारीनुमा अफसर&lt;br /&gt;मर्दों की  बीबियाँ बनने की तैयारी में &lt;br /&gt;जुट चुकी होती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके बारे में कइयों का कहना है&lt;br /&gt;वे बड़ी आधुनिक हैं उनके रस्म &lt;br /&gt;पश्चिमी ढंग के हैं&lt;br /&gt;दरअसल बड़े शहर की लड़कियाँ &lt;br /&gt;औरत होने का अधकचरा अहसास&lt;br /&gt;किसी के साथ साझा नहीं कर सकतीं&lt;br /&gt;इसलिए बहुत रोया करती हैं&lt;br /&gt;उतना ही &lt;br /&gt;जितना छोटे शहर की लड़कियाँ &lt;br /&gt;रोती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोते रोते &lt;br /&gt;उनमें से कुछ &lt;br /&gt;हल्की होकर&lt;br /&gt;आस्मान में उड़ने &lt;br /&gt;लगती है&lt;br /&gt;ज़मीन उसके लिए &lt;br /&gt;निचले रहस्य सा खुल जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर कोई नहीं रोक सकता&lt;br /&gt;लड़की को&lt;br /&gt;वह तूफान बन कर आती है&lt;br /&gt;पहाड़ बन कर आती है&lt;br /&gt;भरपूर औरत बन कर आती है&lt;br /&gt;अचंभित दुनिया देखती है&lt;br /&gt;औरत।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-3428044700623424296?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/3428044700623424296/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=3428044700623424296' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3428044700623424296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3428044700623424296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/05/blog-post_21.html' title='अचंभित दुनिया देखती है औरत।'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-3679709105262354540</id><published>2009-05-03T06:20:00.000-07:00</published><updated>2009-05-03T06:23:08.666-07:00</updated><title type='text'>चिढ़</title><content type='html'>चिढ़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चिढ़ता हूँ तो मेरी दुनिया भी चिढ़ती रहती है&lt;br /&gt;मेरी दुनिया को चिढ़ है और दुनियाओं से&lt;br /&gt;मेरी चिढ़ मेरी दुनिया भर की चिढ़ है&lt;br /&gt;दुनिया भर की चिढ़ को सँभालना कोई आसान काम तो नहीं है&lt;br /&gt;मैं हार गया हूँ&lt;br /&gt;अपनी चिढ़ को किसी अदृश्य थाल पर लिए चलता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम बतलाते हो कि मैं चिढ़ कर बोलता हूँ&lt;br /&gt;तो मुझे पता चलता है कि मैं चिढ़ कर बोलता हूँ&lt;br /&gt;मैं किसी और से कहता होऊँगा कि वह चिढ़ कर बोलता है&lt;br /&gt;वह किसी और से&lt;br /&gt;यह सिलसिला चलता ही रहता है&lt;br /&gt;बहुत सारी चिढ़ का पहाड़ ढोते हैं हम सब मिलकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं क्यों चिढ़ता रहता हूँ&lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि मैं चिढ़  कर खुश होता हूँ&lt;br /&gt;मैं तो सबसे मीठी बातें करता हूँ&lt;br /&gt;कोई और चिढ़ रहा हो तो उसे भी सहलाता हूँ&lt;br /&gt;तो मैं क्यों चिढ़ता रहता हूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा क्यों नहीं करते कि हम यह सारी चिढ़&lt;br /&gt;इकट्ठी कर अमरीका के राजदूत को या हमारे &lt;br /&gt;मुल्क को पाकिस्तान बनाने में जुटे मोदी सरीखों को दे दें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो सकता है हमारे उपहार को देख वे खूब हँसें&lt;br /&gt;कम से कम हमारी चिढ़ इस काम तो आएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या यूँ करें कि यह सारी चिढ़  &lt;br /&gt;किसी सभ्य कवि को दे आएँ &lt;br /&gt;या किसी को जो माँग करता है कि कविता में&lt;br /&gt;गाँव होना ही चाहिए &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिढ़ की पूँजी&lt;br /&gt;बाँटते रहें तो कम नहीं होती&lt;br /&gt;यह बात शीशे से टकराती चिड़ियों से &lt;br /&gt;जानी है मैंने&lt;br /&gt;वही पुरुष चिढ़&lt;br /&gt;बाँटता चला हूँ।  &lt;br /&gt;          (जनसत्ता - अप्रैल २००९)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-3679709105262354540?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/3679709105262354540/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=3679709105262354540' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3679709105262354540'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3679709105262354540'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='चिढ़'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-3398257627798813729</id><published>2009-04-30T21:28:00.000-07:00</published><updated>2009-04-30T21:32:35.812-07:00</updated><title type='text'>गाँधीवाद या नक्सलवाद, तुम सच्चाई से डरते हो</title><content type='html'>बिनायक सेन को जेल में भरने के पीछे सिर्फ संघी हठवादिता नहीं, नक्सलवाद का हौव्वा हर कोई इस्तेमाल करता है। प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने कई बार कहा है कि देश को सबसे बड़ा खतरा नक्सलवाद से है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;है कौन सा देश हे मनमोहन, जिसकी बातें करते हो&lt;br /&gt;मेरा  देश भी है मनमोहन, जिससे डरते रहते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सही कहा है तुमने कि खतरा बड़ा है देश को&lt;br /&gt;यूँ अपने देश में मनमोहन, हमें कहाँ तुम गिनते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे देश में हे मनमोहन, लड़ते हैं, मरते हैं लोग&lt;br /&gt;तेरे देश में हे मनमोहन, यूँ ज़मज़म जेबें भरते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ बाढ़ है वहाँ है दंगा, ये मेरा तेरा देश मनोहर&lt;br /&gt;मेरे देश में आ मनमोहन, डगर डगर फिसलते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेरे देश में हे मनमोहन,  किसको नींद है आती &lt;br /&gt;डरावने सपनों से घबराते, क्यों खर्राटे भरते हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँधीवाद या नक्सलवाद, तुम सच्चाई से डरते हो&lt;br /&gt;भूखे पेटों को मनमोहन, क्यूँ गप्पों से यूँ भरते हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-3398257627798813729?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/3398257627798813729/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=3398257627798813729' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3398257627798813729'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/3398257627798813729'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/04/blog-post_30.html' title='गाँधीवाद या नक्सलवाद, तुम सच्चाई से डरते हो'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-444483242983924407</id><published>2009-04-29T22:31:00.000-07:00</published><updated>2009-04-29T23:32:40.965-07:00</updated><title type='text'>छोटे शहर की लड़कियाँ</title><content type='html'>१९८८ में हरदा एक छोटा शहर था। अब जिला मुख्यालय है। मैं बड़े शहर में जन्मा पला, इसके पहले कभी किसी छोटे शहर में रहा न था। सबसे ज्यादा जिस बात ने मुझे प्रभावित किया, वह था युवाओं की छटपटाहट। मुझे लगता था कि ऊर्जा का समुद्र है, जो मंथन के लिए तैयार है। बहरहाल, संस्था के केंद्र में एक पुस्तकालय था, जहाँ छोटे बच्चों से लेकर कालेज की लड़कियाँ तक आती थीं। खास तौर पर लड़कियों में मुझे लगता था जैसे उनके लिए केंद्र में आना घर परिवार के संकीर्ण माहौल से मुक्ति पाना था। मुझे तब पहली बार लगा था कि इस देश में अगर लड़कियों को घर से बाहर रहने की आज़ादी हो तो आधे से ज्यादी लड़कियाँ निकल भागेंगी। लगता था अगर हम लड़कियों के लिए सुरक्षित जगहें बना सकें तो बहुत बड़ा काम होगा। हाँ भई, उम्र कम थी, संवेदनशील था, तो ऐसा ही सोचता था। उन दिनों यह कविता लिखी थी जो तीन चार पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई और मेरे पहले संग्रह 'एक झील थी बर्फ की' में भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छोटे शहर की लड़कियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना बोलती हैं&lt;br /&gt;मौका मिलते ही &lt;br /&gt;फव्वारों सी फूटती हैं&lt;br /&gt;घर-बाहर की&lt;br /&gt;कितनी उलझनें&lt;br /&gt;कहानियाँ सुनाती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी नहीं बोल पातीं&lt;br /&gt;मन की बातें&lt;br /&gt;छोटे शहर की लड़कियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भूचाल हैं&lt;br /&gt;सपनों में&lt;br /&gt;लावा गर्म बहता&lt;br /&gt;गहरी सुरंगों वाला आस्मान है&lt;br /&gt;जिसमें से झाँक झाँक&lt;br /&gt;टिमटिमाते तारे&lt;br /&gt;कुछ कह जाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुस्कराती हैं&lt;br /&gt;तो रंग बिरंगी साड़ियाँ कमीज़ें &lt;br /&gt;सिमट आती हैं&lt;br /&gt;होंठों तक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोती हैं&lt;br /&gt;तो बीच कमरे खड़े खड़े&lt;br /&gt;जाने किन कोनों में दुबक जाती हैं&lt;br /&gt;जहाँ उन्हें कोई नहीं पकड़ सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन &lt;br /&gt;क्या करुँ&lt;br /&gt;आप ही बतलाइए&lt;br /&gt;क्या करुँ&lt;br /&gt;कहती कहती&lt;br /&gt;उठ पड़ेंगी&lt;br /&gt;मुट्ठियाँ भींच लेंगी&lt;br /&gt;बरस पड़ेंगी कमज़ोर मर्दों पर&lt;br /&gt;कभी नहीं हटेंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर सड़कों पर&lt;br /&gt;छोटे शहर की लड़कियाँ&lt;br /&gt;भागेंगी, सरपट दौड़ेंगी&lt;br /&gt;सबको शर्म में डुबोकर&lt;br /&gt;खिलखिलाकर हँसेंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन पौ सी फटेंगी&lt;br /&gt;छोटे शहर की लड़कियाँ।&lt;br /&gt;                                          (१९८९)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में चंडीगढ़ में बड़े शहर की लड़कियाँ शीर्षक से एक और कविता भी लिखी थी, वह फिर कभी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले पोस्ट पर जो टिप्पणियाँ आई हैं, उस संबंध में भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश कृष्ण अय्यर का प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा &lt;a href="http://www.mainstreamweekly.net/article1324.html"&gt;यह खत&lt;/a&gt; पठनीय है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाकी इस जानकारी के लिए धन्यवाद कि विनायक सेन नक्सलवादी है, मुझे तो पुलिस ने ही बतला दिया था कि मैं आतंकवादी हूँ। न्यायाधीश कृष्ण अय्यर भी कुछ वादी होगा। आजकल गाँधीवाद के भी खतरनाक पहलू लगातार सामने आ रहे हैं। वैसे विनायक सेन को और दो चार दिन जेल में रख लो - देश के लिए वह दाढीवाला मुस्कराता चेहरा बहुत बड़ा खतरा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-444483242983924407?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/444483242983924407/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=444483242983924407' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/444483242983924407'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/444483242983924407'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/04/blog-post_4411.html' title='छोटे शहर की लड़कियाँ'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-4751991321381836148</id><published>2009-04-29T06:19:00.000-07:00</published><updated>2009-04-29T06:50:46.451-07:00</updated><title type='text'>अरे! वो आतंकवाद वाली फाइल लाना</title><content type='html'>कुछ मित्रों ने कहा कि एकलव्य के साथ गुजारे डेढ़ सालों के बारे में कुछ लिखूँ। मैंने एकलव्य संस्था में मई १९८८ से नवंबर १९८९ तक डेढ़ साल गुजारे थे। यह अनुभव बहुत मूल्यवान था और इस छोटी सी अवधि में जिस तरह के दोस्त मैंने बनाए, वैसा और शायद ही कभी हुआ। हरदा और उसके आस पास अध्यापकों और युवाओं के साथ बिताए उन दिनों में मैंने बहुत कुछ सीखा, बहुत कुछ पाया। यहाँ सिर्फ शुरुआत की एक रोचक घटना का जिक्र करुँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९८६ में प्रोफेसर यशपाल ने यू जी सी का अध्यक्ष बनते ही एक अनोखा काम किया। कालेज और यूनीवर्सिटी अध्यापकों को फेलोशिप्स दी गईंं कि वे ज़मीनी स्तर पर शिक्षा पर काम कर रही स्वैच्छिक संस्थाओं के साथ काम कर सकें। कागज़ी तौर पर इस तरह किए काम को उनकी जिम्मेदारियों का हिस्सा माना गया और इसे पदोन्नति आदि में बाधा नहीं माना जाना था (हालांकि मेरा अनुभव इसके विपरीत था - लंबे समय तक मेरे उन डेढ़ सालों के काम को मेरे खिलाफ इस्तेमाल किया गया)। इसके लिए यू जी सी से संस्थान के प्रमुख को बाकायदा निर्देश आता था कि प्रार्थी को फेलोशिप के काम पर भेजा जाए और संस्थान से ड्यूटी लीव मिलती थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं विदेश में शोध करते वक्त ही  एकलव्य के काम से परिचित हो चुका था। १९८३ के आस पास इंडिया टूडे में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम (होविशिका) पर रीपोर्ताज़ छपा था। मेरा मन था कि देश लौटते ही इस प्रयास से जुड़ूँ। अमरीका से लौटते हुए जिनको जानता था, उनको ख़त लिखा कि मैं किसी कालेज में नौकरी लेना चाहता हूँ, ताकि ईमानदारी से ज़मीनी स्तर पर काम कर सकूँ (उस वक्त भोली सी समझ यह थी कि यूनीवर्सिटी या आई आई टी आदि में नौकरी लूँ तो उच्च शिक्षा और शोध पर ही सारा वक्त लगाना पड़ेगा - यह बाद में पता चला कि इस सामंती समाज में जितने ऊपर हो, उतनी छूट है, सामान्य संस्थानों में बंधन ज्यादा हैं - यह अलग बात है कि बेकार कामों के लिए बंधन नहीं हैं - बहुत सारे कालेज अध्यापक ट्यूशन के धंधे में ही लगे रहते हैं)। बहरहाल मित्रों ने शायद मुझे भोला समझकर ही कोई जवाब नहीं दिया। आखिरकार यूनीवर्सिटी में नौकरी ली। १९८६ में अपने शोध कार्य पर IITK भाषण देने गया तो पहले से संपर्क में आए अमिताभ मुखर्जी के साथ मुलाकात हुई, जो उस वक्त वहाँ कुछ समय से postdoctoral काम कर रहा था। वहीं से  एकलव्य के विनोद रायना का पता चला। विनोद को ख़त लिखा तो उसने तुरंत होविशिका के प्रशिक्षण शिविर के लिए बुलाया। होशंगाबाद और उज्जैन दो शहरों में मिडिल स्कूल के अध्यापकों के लिए शिविर शुरु हो रहे थे। चंडीगढ़ लौटते ही मैंने उज्जैन जाने की सोची। उन दिनों आज जितनी ट्रेनें न थीं। दिल्ली आया और सीधे रतलाम की ओर जाती गाड़ी पकड़ ली। अनारक्षित कोच में बैठा। भीड़ भाड़ में किसी ने ऊपर से खाना वाना गिरा दिया। गंदे कपड़ों में पहले नागदा और फिर उज्जैन पहुँचा। पहुँचते ही स्टेशन के पास विवेकानंद कालोनी में एकलव्य के दफ्तर पहुँचा - विवेक पायस्कर और अरविंद गुप्ते उज्जैन केंद्र में काम करते थे, इनके अलावा और लोगों में एक कमाल का व्यक्ति मनमौजी था, जिसने बाद में ओरीगामी आदि में महारत हासिल कर ली थी।  उस वक्त वहाँ कोई नहीं मिला, वहाँ से सभी एजुकेशन कालेज चले गए थे, जहाँ शिविर था। तो कहीं से दो ग्लास लस्सी पी (तभी पता चला कि मध्य प्रदेश की लस्सी पी नहीं चम्मच से खायी जाती है) और शिविर पहुँचा। विनोद ने मिलते ही गले लगाया तो मैंने बतलाया कि दूर रहो, कपड़े गंदे हैं। जिनसे भी मिला तो बड़ा प्यार का माहौल सा था। मैं पहले दिन जिस क्लास में बैठा था, वहाँ स्रोत व्यक्ति अरविंद गुप्ते थे, जिन्होंने जीव जगत पर बहुत कुछ लिखा है और चकमक आदि पत्रिकाओं में बहुत सारी यह सामग्री प्रकाशित हुई है। उनके समझाने के तरीके का मैं तब से कायल रहा हूँ। देवास केंद्र का प्रभारी राम नारायण स्याग भी वहीं था, और बिल्कुल पंजाबी अंदाज में दमघोटू जफ्फी के साथ उसके साथ परिचय हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह थी एकलव्य में मेरी शुरुआत। उन दिनों माहौल प्रोफेशनल और बोहेमियन का मिश्रण सा था। दिनभर शिविर में स्थानीय ग्रामीण अध्यापकों के साथ मिलकर प्रशिक्षण का काम – शाम को सब मिलकर गाने बजाने बैठते। जनगीत गाए जाते।  शिक्षाविदों के अलावा राजनैतिक सोच वाले कार्यकर्त्ता भी जुटे थे - लोग दूर दूर से शिविर में आए थे। हिंदुस्तान में कम्युनिटी लिविंग जैसा ऐसा माहौल मैंने पहली बार पाया था। बहुत मजा आया। लौटकर यू जी सी फेलोशिप के लिए दरख़ास्त भेज दी। उन दिनों कुलपति गणित के प्रोफेसर बांबा थे।  प्रोफेसर यशपाल के मित्र थे और जन विज्ञान जैसी बातों में रुचि रखते थे। तो तय हो गया कि  दो वर्षों के लिए  एकलव्य जा रहा हूँ। कागज़ात निकलने में देर हो गई, मई १९८८ से जाने का तय हो गया। मैं इस बीच १९८६ के दिसंबर में सत्यपाल सहगल को साथ लेकर देवास और भोपाल केंद्रों में आया (राजेश उत्साही से शायद तभी पहली बार भोपाल केंद्र में मुलाकात हुई और उसी यात्रा के दौरान पहली बार वरिष्ठ कवि राजेश जोशी से मिला)। १९८७ की गर्मियों में देवास में बाल मेले में आया; उस मेले की स्मृति ऐसी है जैसे बहुत उम्दा संगीत सुनने का अनुभव होता है; वहाँ शुभेंदु को छाओ नाच नाचते देखा और स्याग भाई के साथ तो मुहब्बत ही हो गई – (इसमें बहुत बड़ा हिस्सा उसके शिव बटालवी के गीतों को गाने के असर का है - मैंनूँ तेरा शबाब लै बैठा.....)। वहाँ से होशंगाबाद के शिविर में। इसी दौरान विनोद से कुछ बातों में मतभेद भी पनपे। इस पर फिर कभी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९८७ की उन गर्मियों में होशंगाबाद में मीरा सदगोपाल से मुलाकात हुई। मीरा से मिलते ही मैं उसका भक्त हो गया। एक दिन शाम को मीरा ने गिटार बजाते हुए पीट सीगर और जोन बाएज़ के पुराने गीत गाए। अनिल सदगोपाल से पिछले साल ही उज्जैन में मिल चुका था और मैं अनिल से बहुत प्रभावित था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों एकलव्य के सात केंद्र थे। भोपाल, होशंगाबाद, हरदा, पिपरिया, उज्जैन, देवास और धार। जब आना तय हुआ तो हमारी इच्छा के मुताबिक केंद्र में जगह न मिली। हम चाहते थे कि हम पिपरिया जाएँ क्योंकि मीरा सदगोपाल बनखेड़ी में किशोर भारती में थी और वह पिपरिया से करीब था। मैं मीरा को बहुत पसंद करता था और मेरा खयाल था कि मेरी पत्नी कैरन को मीरा के पास होने से सहूलियत होगी। मीरा भी अमरीका से आई थी और भारत में बस गई थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि बाद में हरदा में आकर हम खुश थे (खासकर अनवर जाफरी की ज़िंदादिली की वजह से), शुरुआत में बहुत हताशा हुई कि हमें अपने मन मुताबिक केंद्र में जाने नहीं दिया गया। एकलव्य की अंदरुनी समस्याओं का यह पहला झटका था और अगर तब तक चंडीगढ़ में सबसे कह न दिया होता तो शायद हम उस वक्त मध्य प्रदेश आते ही नहीं। तब तक देर हो चुकी थी और वापस जाना संभव न था। मुझसे पहले कैरन ने एकलव्य में काम लिया। बहुत ही सामान्य तनख़ाह थी। शायद पंद्रह सौ रुपए मिलते थे। आते ही उसे कुछ शारीरिक समस्याएँ हुईं। मैं दो या तीन बार चंडीगढ़ से हरदा दौड़ता रहा। आखिर मई में सामान पैक करवा मैं भी रवाना हुआ। अब भी एग्ज़ाम ड्यूटी के लिए वापस आना था। इसी बीच एक अजीब संकट आ खड़ा हुआ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१९८७ की शुरुआत में पिपरिया के पास एक गाँव में एक पुलिस के सिपाही का कुछ लोगों से झगड़ा हो गया। उसने अपने आप को मृत घोषित कर दिया और जिला पुलिस की उच्च-स्तरीय समिति के निरीक्षण में उसकी 'हड्डियाँ' कहीं से निकाली गईं। बस पुलिस का जुल्म शुरु हुआ। इसको पकड़, उसको पकड़। जवान लड़के मर्द जो बच सके, जंगलों में भाग गए। औरतों, बच्चों, बूढ़ों पर जुल्म चलता रहा। एकलव्य के कुछ साथी नागरिक अधिकारों पर काम करते थे। विरोध शुरू हुआ तो पी यू सी एल के स्थानीय कुछ लोगों को मदद मिलती थी। पंद्रह दिन बाद जब वह 'मृत' सिपाही इटारसी में ज़िंदा ढूँढ लिया गया तो अफरातफरी मच गई। जाँच शुरु हुई। पुलिस के आला अफसर परेशान। एकलव्य पर भी गाज पड़नी थी क्योंकि जिला मुख्यालय होशंगाबाद में था और कोर्ट कचहरी के काम में आए कार्यकर्त्ताओं को केंद्र में शरण भी मिलती थी और कागज, स्याही, टाइपराइटर भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में आ पहुँचा खालिस्तानी आतंक वाले क्षेत्र पंजाब से हरजिंदर सिंह और साथ में विदेशी पत्नी। जिला पुलिस को इससे बेहतर मौका और क्या मिल सकता था। कैरन को नोटिस मिली कि जिला में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। मैं पहुँचा ही था और दो दिनों में वापस चंडीगढ़ लौटना था। मई के पहले हफ्ते की बेतहाशा गर्मी। हरदा से भीड़ भरी बस में आम लोगों के अलावा बकरी भेड़ों के साथ होशंगाबाद आते हुए शिवपुर के पास रेलवे के फाटक पर घंटे भर बस का रुका रहना भूलता नहीं है। उन दिनों हरदा होशंगाबाद शहर का हिस्सा था और होशंगाबाद देश का तीसरा सबसे बड़ा जिला था (लद्दाख और बस्तर के बाद)। जवान थे - होश बरकरार रहा। दूसरे दिन  होशंगाबाद केंद्र के संचालक हृदय कांत दीवान (प्यार से हार्डी) की सलाह मुताबिक पुलिस मुख्यालय पहुँचा। एस पी से मिलना था। देर तक मुझे एक क्लर्क ने बैठाए रखा। कैरन के पुलिस कागजात चंडीगढ़ से पहुँचे नहीं थे, इस पर कुछ सवालात करते रहा। फिर दूर अपने साथी से चिल्लाकर कहा - अरे, वो आतंकवाद वाली फाइल लाना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा अनुभव मुझे पहले हो चुका था। १९८५ में अमरीका से लौटते हुए कलकत्ता हवाई अड्डे पर पुलिस ने परेशान किया था। उस वक्त आँखों में आँसू आ गए थे, पर तय किया था कि फिर कभी जितना भी पिट जाऊँ, हौसला नहीं छोड़ूँगा। बैठा रहा। आखिर एस पी साहब ने बुलाया। मैंने समझाया कि मैं यूनिवर्सिटी अध्यापक हूँ। विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम में स्रोत व्यक्ति की हैसियत से आया हूँ और हम अधिकारियों से पूरी तरह सहयोग करेंगे आदि। जनाब ने फरमाया - आपको विदेशी नागरिक से विवाह करने की इजाजत किसने दी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भरपूर तनाव के बावजूद मैं जोर से हँस पड़ा। बतलाया कि भारत के संविधान में नागरिकों पर ऐसी कोई रोक नहीं है। पर सर पर कोई प्रभाव न पड़ा। हताश मैं निकला और वापसी की ट्रेन पकड़ने स्टेशन पहुँचा। दुखी होकर कैरन पर चिल्लाता रहा कि वापस जाओ। यह सब झमेला मुझसे नहीं झेला जाता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई लोगों को लगता होगा कि पुलिस से परेशान होने के लिए विनायक सेन जैसा धाँसू ऐक्टीविस्ट होना ज़रुरी है। मैंने अब तक तकरीबन समझौतापरस्त मध्यवर्गीय जीवन जिया है, फिर भी बार बार पुलिस या अन्य अधिकारियों से परेशान हुआ हूँ। पता नहीं जीवन में कैसी कैसी जटिलताएँ इन वजहों से आई हैं। सबसे ज्यादा परेशान करने की बात यह है कि भारत महान के सचेत बुद्धिजीवी हमें ही समझाते हैं - देखो, स्थितियाँ ऐसी हैं, इसलिए तुम्हें समझना चाहिए। सच यह है कि जैसा मेरे मित्र एच एस मेहता कहा करते हैं - इस मुल्क के हुक्मरानों में खानदानी बदतमीज़ी कूट कूट कर भरी हुई है। यह अद्भुत ही है कि यहाँ हम सब – हमसे कहीं ज्यादा वे जो विपन्न हैं, जो कम पढ़े लिखे हैं, कामगर लोग, लगातार जुल्म झेलते हैं और फिर भी यह व्यवस्था टिकी हुई है। सलाम है विनायक सेन जैसे महान लोगों को और सचमुच ऐसे लाखों लोग हैं जो रोजाना मुश्किलात झेलते हुए बेहतर समाज के लिए लड़ रहे हैं, और धिक्कार है इस मुल्क के हुक्मरानों और सुविधापरस्त बुद्धिजीवियों को जो इस व्यवस्था की दलाली में लगे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि आशा की किरणें नहीं हैं। हालांकि कैरन को पुलिस के झमेले से राहत गृह विभाग के कुछ अधिकारियों की मदद (जिन तक पहुँचने में संस्था की ही साथी ने मदद की थी, जिसके अफसरों से ताल्लुकात थे) से मिली थी, पर उस एस पी का ट्रांस्फर भी हुआ था - और वह जन संगठनों के संघर्ष का परिणाम था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-4751991321381836148?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/4751991321381836148/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=4751991321381836148' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/4751991321381836148'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/4751991321381836148'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/04/blog-post_29.html' title='अरे! वो आतंकवाद वाली फाइल लाना'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-191600922637692154</id><published>2009-04-19T00:46:00.000-07:00</published><updated>2009-04-19T02:08:41.189-07:00</updated><title type='text'>हमकलम</title><content type='html'>&lt;a href="http://utsahi.blogspot.com/2009/04/blog-post_10.html"&gt;राजेश उत्साही ने अपने ब्लॉग 'गुल्लक'&lt;/a&gt; में जिक्र किया कि एक ज़माने में हम लोगों ने 'हमकलम' गुट नाम से साइक्लोस्टाइल साहित्यिक पैंफलेट निकाले थे। हमलोग मतलब सत्यपाल सहगल, मैं और रुस्तम। उन दिनों लगता था कि साइड ऐक्टीविटी है, पर अब सोचता हूँ तो लगता है कि एक महत्त्वपूर्ण काम था। १९८५: मैं ताजा ताजा अमरीका से लौटा था, रुस्तम आर्मी से रिज़ाइन कर पोलीटिकल साइंस में एम ए करने आया था। पार्टी के साथ जुड़ा था और मार्क्स पर काम कर रहा था। अमरीका से लौटा मैं लिबरेशन थीओलोजी, निकारागुआ, एल साल्वादोर, गुआतेमाला जैसे खयालों से भरा हुआ था और इस कोशिश में था कि बाकी भी इन खयालों में सराबोर हो जाएँ। कभी फ्रांत्ज़ फानों, कभी मैल्कम एक्स, इन पर कुछ न कुछ बकता रहता। कुछ अनुवाद वगैरह भी किया। कैंपस में हम तीन ऐसे लोग थे जिन्हें नाम से सिख पहचाना जाता था, पर जो केशधारी नहीं थे (- सत्यपाल नहीं, तीसरा व्यक्ति भूपिंदर बराड़ है जो हमसे उम्र में  भी बड़ा था और अधिक गंभीर, रुस्तम उसी के साथ शोध कार्य कर रहा था)। मेरी आदत थी कि इधर उधर किसी न किसी से उलझ लेता, तब डरता नहीं था, अब सोच कर डर लगता है। वो कहानियाँ फिर कभी। बहरहाल मैंने सुझाव रखा कि कैंपस में आतंक के माहौल से जूझने के लिए बौद्धिक सांस्कृतिक शून्य को भरना होगा। मेरे पास एक कैनन का इलेक्ट्रानिक टाइपराइटर था, मैंने दो विकल्प सुझाए, या तो हिंदी में साइक्लोस्टाइल पत्रिका निकालें या मेरे कैनन के यंत्र में अंग्रेज़ी में कुछ निकालें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों तक बोलता रहा तो सत्यपाल और रुस्तम मान ही गए। वे दोनों वैसे तो शुरुआत में देर कर रहे थे, पर काम को लेकर मुझसे ज्यादा गंभीर थे। सत्यपाल ने खुद को संपादक घोषित कर दिया। मेरा नज़रिया इन मामलों में उदारवादी था, रुस्तम शायद बहुत खुश नहीं था, पर पहला अंक १९८६ में 'खुले मैदान में' शीर्षक से  सत्यपाल सहगल के नाम से ही निकला। अंक निकला तो व्यापक स्वागत हुआ। तेईस सेक्टर में भ्रा जी (गुरशरण सिंह) के नेतृत्व में नुक्कड़ नाटक सम्मेलन हुआ तो वहाँ पचास पैसे में बेचने की सोची। हालांकि अध्यापक मैं था, मुझे सड़क पर खड़े होकर बेचने में कोई लाज न थी, पर मेरे उन दिनों के शोध-विद्यार्थी साथीद्वय संशय में थे। उसी नुक्कड़ नाटक समारोह में 'चिनते पार्च्छिस' कहकर कालेज में मुझसे एक साल सीनियर शुभेंदु घोष जो अब दिल्ली में बायोफिज़िक्स का प्रोफेसर है और प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक है, ने मुझसे सालों बाद फिर से परिचय किया। आस पास लोग अचंभित थे कि मैं अचानक पंजाबी बोलते बोलते बांग्ला कैसे बोलने लगा हूँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा अंक अंग्रेज़ी में था और उसमें अधिकतर लातिन अमरीका की कविताएँ थीं। उसके बाद कोई भी अंक अंग्रेज़ी में नहीं आया। मुझे आश्चर्य था कि लोग इसे इतनी गंभीरता से ले रहे थे - एक तरह से मेरे लिए वह घातक था क्योंकि मैं ज़रुरत से ज्यादा सामाजिक कार्यों में रुचि ले रहा था - इसका हर्जाना आज तक भुगत रहा हूँ (मज़ा भी तो आता था न)। धीरे धीरे 'हमकलम' एक आंदोलन का रुप अख्तियार कर चुका था और टोहाना, मंडी आदि जगहों से भी उस तरह के साइक्लोस्टाइल पैंफलेट निकलने लगे। मैं दो साल के लिए मध्य-प्रदेश चला गया, तब भी हमकलम को रुस्तम ने चलाए रखा। इस बीच सत्यपाल अध्यापक बन चुका था और रुस्तम शायद एम फिल कर रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रुस्तम से जब पहली बार मिला - सहगल ने ही मिलाया था कैंपस में एक और गंभीर व्यक्ति से मिलाते हैं कहकर; तो यह जानकर कि वह मार्क्स पर काम कर रहा है, मैंने देर तक उसे समझाने की कोशिश की कि हमें 'स्ट्रैटेजी' पर काम करना चाहिए। एक नई रणनीति जिसमें सभी लोकतांत्रिक ताकतें एक संघ बनाएँ और मिलकर स्थितियों से जूझें। हालाँकि मैं समझता था कि मैं ऐतिहासिक स्थितियों को सही देख समझ रहा हूँ, और बड़े उत्साह के साथ बकवास करता रहा, पर रुस्तम ने सब सुनकर चार नंबर होस्टल के उस घटिया लंच के बाद कहा था 'आपके खयाल बड़े नावल (novel) हैं। ' (तब भी सुधर गया होता रे ...........!)।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल दोस्तों के बारे में मजेदार बातें फिर कभी, फिलहाल तो राजेश उत्साही को धन्यवाद कि उसने उन दिनों की याद दिला दी, जब मैं सारी दुनिया को बदल देने की ऊर्जा से लबालब भरा हुआ था। (जैसा कि अब तक पढ़ने वाले समझ ही चुके हैं मैं बचपने में ही जी रहा हूँ अभी तक)। हो सकता है कभी किसी कोने से हमकलम के पैंफलेट निकालकर स्कैन प्रति ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ या कोई और ही करे। यह छोटा सा इतिहास हमारा भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसीबत यह कि टिप्पणी करने वालों की एक फौज है, जो मेरी ऊपर की बातों पर टिप्पणी करने को बेताब होगी। पचसियापा ही सही, पर लगता ज़रुर है कि दुनिया में बहुत सारे अनपढ़ लोग हैं। इसलिए दोस्तों से यही कहता हूँ कि इस बार टिप्पणी मत ही करना, फालतू की बमबारी में काम की बात खो जाएगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी बीच नईम गुजर गए। अभी सुदीप बनर्जी के गुजरने के सदमे से निकले भी न थे कि नईम के गुजरने की खबर आई। सुदीप से एक बार मिला था, कुरुक्षेत्र में साक्षरता मिशन के कार्यक्रम में भाषण देने आए थे, कोई पंद्रह साल पहले की बात है। उनकी कविताएँ खास पसंद आती थीं। नईम से कभी नहीं मिला, जब भी देवास गया हूँ, मिलना चाहता रहा, पर मिला नहीं। उनके गीतों को मैं झूम झूम कर गाता हूँ, बड़ी जटिल बातों को बहुत सुंदर ढंग से बाँधने की तरकीब कोई नईम से सीखे। &lt;a href="http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=हो_न_सके_हम_/_नईम"&gt;कविता कोश से उनका यह नवगीतः&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; हो न सके हम   - नईम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हो न सके हम &lt;br /&gt;छोटी सी ख्वाहिश का हिस्सा &lt;br /&gt;हो न सके हम बदन उधारे बच्चों जैसा &lt;br /&gt;गर्मी या बारिश का हिस्सा &lt;br /&gt;हुआ न मनुवां &lt;br /&gt;किसी गौर की महफिल का गायक साज़िंदा&lt;br /&gt;अपने ही मौरूसी घर का &lt;br /&gt;रहा हमेशा से कारिंदा &lt;br /&gt;दास्तान हो सके न रोचक &lt;br /&gt;याकि लोक में प्रचलित किस्सा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन जीने की कोशिश में &lt;br /&gt;लगा रहा मैं भूखा–प्यासा &lt;br /&gt;होना था कविता सा लेकिन &lt;br /&gt;हो न सका मैं ढंग की भाषा &lt;br /&gt;जनम जनम से &lt;br /&gt;होता आया &lt;br /&gt;इन–उन की ख्वाहिश का हिस्सा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन बांध नहीं पाये हम &lt;br /&gt;मंसूबे ही रहे बांधते&lt;br /&gt;खुलकर खेल न पाये बचपन &lt;br /&gt;यूं ही खिचड़ी रहे रांधते &lt;br /&gt;हो न सके &lt;br /&gt;जीवन जीने की &lt;br /&gt;हम आदिम ख्वाहिश का हिस्सा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-191600922637692154?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/191600922637692154/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=191600922637692154' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/191600922637692154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/191600922637692154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/04/blog-post_19.html' title='हमकलम'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-6641021344033597837</id><published>2009-04-09T05:53:00.000-07:00</published><updated>2009-04-09T05:58:55.911-07:00</updated><title type='text'>रात है अँधेरा है हम हैं जी हाँ  हम हैं</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;हम हैं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले उन्होंने कहा - भ्रम है तुम्हें, हार तुम्हारी होगी&lt;br /&gt;आसपास थी वीरानी फैल रही&lt;br /&gt;अनमने से उसे जगह दे रहे&lt;br /&gt;बचे खुचे झूमते पेड़&lt;br /&gt;हम देर तक नाचते &lt;br /&gt;चलते चले पेड़ों की ओर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे आए&lt;br /&gt;अट्टहास करते हुए बोले&lt;br /&gt;देखते नहीं हार रहे हो तुम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाने क्या था नशा&lt;br /&gt;हमारे बढ़े हाथों को मिलते चले हाथ&lt;br /&gt;गीतों के लफ्जों में ऊपर चढ़ने&lt;br /&gt;रास्तों के पास बैठने की जगहें बनीं&lt;br /&gt;जहाँ रामलीला की शाम मटरगश्ती से लेकर&lt;br /&gt;बचपन में छिपकर बागानों से&lt;br /&gt;आम चुराने की कहानियाँ सुनानी थीं हमने&lt;br /&gt;एक दूसरे को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार कहा उन्होंने गहरी चिंता के साथ&lt;br /&gt;हार चुके तुम&lt;br /&gt;हार रहे हो&lt;br /&gt;हारोगे हारोगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक चेहरा बचा था मुस्कराता हरेक के पास&lt;br /&gt;एक ही बचा था गीत&lt;br /&gt;समवेत हमारे स्वर उठे&lt;br /&gt;बिगुल बजाया किसी न किसी ने&lt;br /&gt;एक के बाद एक सारी रात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात है&lt;br /&gt;अँधेरा है&lt;br /&gt;हम हैं हम हैं&lt;br /&gt;जी हाँ &lt;br /&gt;हम हैं।&lt;br /&gt;  (उत्तरार्द्ध - १९९६; प्रतिबद्ध - १९९८; क्या संबंध था सड़क का उड़ान से - १९९५)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-6641021344033597837?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/6641021344033597837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=6641021344033597837' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/6641021344033597837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/6641021344033597837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/04/blog-post_09.html' title='रात है अँधेरा है हम हैं जी हाँ  हम हैं'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-5622023953916214637</id><published>2009-04-06T05:33:00.000-07:00</published><updated>2009-04-06T05:37:01.288-07:00</updated><title type='text'>नीचे को ही ढो रहा हूँ ऊपर का धोखा देते हुए</title><content type='html'>क्या महज संपादित हूँ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर चढ़ रहा हूँ ऊँचाई पर&lt;br /&gt;तो कभी नीचे रहा हूँगा&lt;br /&gt;झाँक कर देखूँ&lt;br /&gt;वह क्या था जो नीचे था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या सचमुच आ गया हूँ ऊपर&lt;br /&gt;या जैसे घूमते सपाट ज़मीं पर किसी परिधि पर &lt;br /&gt;वैसे ही किसी और गोलक के चक्कर काट रहा हूँ&lt;br /&gt;क्या महज संपादित हूँ या सचमुच बेहतर लिखा गया हूँ&lt;br /&gt;जो अप्रिय था उसे छोड़ आया हूँ कहीं झाड़ियों में&lt;br /&gt;या दहन हो चुका अवांछित, साधना और तपस में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर से दिखता है नीचे का विस्तार &lt;br /&gt;बौने पौधे हैं ऊपर छाया नहीं मिलती जब तीखी हो धूप&lt;br /&gt;नीचे समय की क्रूरता है हर सुंदर है गुजर जाता एकदिन&lt;br /&gt;ऊपर अवलोकन की पीड़&lt;br /&gt;संगीत में दिव्यता; गूँज, परिष्कार हवा &lt;br /&gt;नहीं हैं विकार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऊपर कब तक है ऊपर&lt;br /&gt;एकदिन ऊपर भी दिखता है नीचे जैसा&lt;br /&gt;बची खुची चाहत सँजोए फिर चढ़ने लगता हूँ कहीं और ऊपर&lt;br /&gt;जानते हुए भी कि कुछ भी नहीं छूटा सचमुच&lt;br /&gt;नीचे को ही ढो रहा हूँ ऊपर का धोखा देते हुए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                      -साक्षात्कार (अक्तूबर २००८)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-5622023953916214637?l=laltu.blogspot.com'/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://laltu.blogspot.com/feeds/5622023953916214637/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='https://www.blogger.com/comment.g?blogID=18449440&amp;postID=5622023953916214637' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/5622023953916214637'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/18449440/posts/default/5622023953916214637'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://laltu.blogspot.com/2009/04/blog-post_06.html' title='नीचे को ही ढो रहा हूँ ऊपर का धोखा देते हुए'/><author><name>लाल्टू</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04044830641998471974</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:extendedProperty xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' name='OpenSocialUserId' value='10634947122085624300'/></author><thr:total xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'>3</thr:total></entry></feed>