Thursday, April 13, 2017

चुपचाप अट्टहास : 29 - बहुत देर हो चुकी होगी


मैं गाँधी का मुखौटा बनाता हूँ

कोई डरता है कि मुझे क्या हो गया है

कोई सोचता कि मैं भटक गया

या कि सुधर गया हूँ



मैं नहीं खोया

ज़मीन में गड़े मटकों सा हूँ

गल पिघल जाती है मिट्टी

मैं रहता हूँ वहीं जहाँ टिका था

मैं मैं हूँ नहीं

कैसे खोऊँ अपने आप को

इसे इश्क में वफादारी कह दो

हारूँ या जीतूँ

मुखौटा गाँधी का हो कि बुद्ध का

पैने रहेंगे मेरे दाँत

जानोगे जब गहरी नींद में होगे तुम

महसूस करोगे अपनी गर्दन पर

बहता हुआ ख़ून जो मेरी जीभ सोखेगी

जब गड़ जाएँगे दाँत

थोड़ी देर तुम्हें भी होगा उन्माद

फायदा कुछ तुम्हें भी तो है

कि अँधेरे के इस दौर में

जगमगाती है रोशनी तुम्हारे घर

तुम्हें भी यात्राओं का मिलता है सुख

जब कल्पना में ही सही उड़ लेते हो तुम मेरे साथ

जब तक तुम जानोगे

रोशनी है अँधेरे से भरी

बहुत देर हो चुकी होगी

गाँधी के पदचिह्न मिटाता अपने कदमों आता तुम्हें सहलाऊँगा

उसी गर्दन पर उंगलियाँ फेरते हुए

जहाँ से तुम्हारा ख़ून पिया था।



I make masks that look like Gandhi

Some wonder what has happened to me

Some fear that I may have gone bonkers

Some think that I have reformed myself



I am not lost

I am like clay pots buried in earth

The clay dissolves eventually

I remain where I was

How can I lose myself

when I am not myself

You may call it loyalty in love

I may lose or I may win

The mask I wear my be Gandhi or Buddha

My teeth remain sharp as ever

You will know it only when in deep slumber

you feel on your neck

Blood flowing that my tongue will suck

When the teeth will dig inside you

You will enjoy it for a while

You too gain from it a bit after all

Your house shines in this age of darkness

You too enjoy travels

When even if in thoughts you fly with me

By the time you know

That the shine is filled with darkness

It will be too late

I will erase the footprints of Gandhi

And come on my own feet to comfort you



With my fingers rubbing the same neck

Where I sucked your blood from. 

Monday, April 10, 2017

चुपचाप अट्टहास: 28 - अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर


 अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर
 
इस गर्म रात को सिरहाने से आवाज़ें आ रही हैं
 
सिरहाने पर कान रखकर बाएँ बगल पर टिककर सोता हूँ
 
पलकें मूँदते ही निकल आते हैं जुलूस
 
हुजूम चल रहा है और शोर बढ़ता आ रहा है 
  
 
वे सामने दिखती हर चीज़ को चूरमचूर करते आ रहे हैं
 
सेनापति ने योजनाएँ बनाई हैं कि कैसे इनको तबाह किया जाए
 
व्यूह वापस बुलाए हैं हमने इतिहास के पन्नों से

पुराणों में से निकाल जीवंत किए हैं अश्वमेध-आख्यान
सरकारें क्या पूरी कायनात को तबाह करने की योजना बन रही है 
  
 
फिलहाल कायनात अपनी धुरी पर है
 
शहरों में गगनचुंबी इमारतें स्थिर खड़ी हैं
 
अँधेरे में जगमगाहट दिखती है खिड़कियों से आती रोशनी से
 
अंदर झाँक लो जब तक सब स्थिर है
 
देख लो एक किशोरी कैसे शांत सोती है
 
उम्र ही ऐसी है कि कितनी साफ दिखती है दुनिया
 
फिलहाल लुत्फ उठाओ मशीन की ठंड में काँपते हुए
आखिरी लड़ाई होनी है कल।




This night, hot, I hear voices from my pillow


I put my ears on the pillow and lie down on my left 
side


I close my eyes, I see the marches


The crowd marching and the noise approaching





They are crushing everything in sight


My commander has planned to eliminate them


We have looked at strategies learning from history


Ancient imperial victories have come alive


We plan to demolish not just Governments, but the 
creation.




For now the creation moves on its axis


The skyscrapers in the cities are standing robust


In the dark light shines in through the windows


Look inside when all is well


Look how a young girl sleeps in calm


Such is her age that the world appears pretty


For now enjoy the cooling machine when you can




 
Tomorrow will be the last battle.  

Thursday, April 06, 2017

कोई उन्हें छू सके

उड़ते हुए

उड़ते
हुए नीचे लहरों से कहो कि

तुम्हें
आगे जाना ही है

तुम
बढ़ोगे तो तुम्हारे पीछे आने
वाले बढ़ेंगे

इसलिए
आगे बढ़ते हुए अपनी उँगलियाँ
पीछे रखो

कि
कोई उन्हें छू सके ।    (रेवांत - 2017)

Flying
When you fly
Tell the waves below

That you have to
Move forward
You
Move and then move those
Who follow you

And so
Moving ahead
Keep your fingers behind

That others
May feel them.

Tuesday, April 04, 2017

किस खिड़की पर हो तुम?


फिज़ां



सोचता था कि इतनी है ज़मीं कहाँ तक जा पाऊँगा


अंजाने


धूप खिड़कियों से अंदर आती।




देखता था खिड़की से बाहर धूप फैली अनंत तक।


अंदर बातचीत।


कुछ पुरानी, कुछ आने वाले कल की।


साथ बुनते स्वप्न गीत


हम ज़मीं पर लेट जाते। धूप हमें छूती और बादलों से रूबरू होते ही




हम हाथों में हाथ रख खड़े हो जाते।


कहाँ आ पहुँचा


गड़गड़ाते काले बादल धूप निगलते


किसके नाच की थाप से काँपती धरती


मनपाखी डरता है




ढूँढता हूँ धूप


किस खिड़की पर हो तुम? (रेवांत 2017)





The Environs


I used to wonder how far I can go in this wide world


Unknown to me


The sun came in from the windows.




From my window I saw sun spread afar beyond 
the horizons.


Inside was our chit chat.


A bit about the past, and a bit future.


We composed dream songs together


And lay down on the floor. The sun caressed us and 
the moment it met the clouds



we were up holding our hands together.


Where am I now


Thundering dark clouds consume the sun


Who dances that the Earth shivers


My soul fears





I keep looking for the sun


On which window do I find you?

Saturday, April 01, 2017

उमस बढ़ रही है


डर


मैं सोच रहा था कि उमस बढ़ रही है


उसने कहा कि आपको डर नहीं लगता


मैंने कहा कि लगता है


उसने सोचा कि जवाब पूरा नहीं था


तो मैंने पूछा - तो।


बढ़ती उमस में सिर भारी हो रहा था


उसने विस्तार से बात की -


नहीं, जैसे खबर बढ़ी आती है कि


लोग मारे जाएँगे।


मैंने कहा - हाँ।


मैं उमस के मुखातिब था


यह तो मैं तब समझा जब उसने निकाला खंजर


कि वह मुझसे सवाल कर रहा था। (रेवांत 2017)





Fear





I thought that it was getting more humid


He said don’t you feel afraid


I said well I do


He thought that I had not quite replied


Then I asked – so


My head was getting stuffy with rising humidity


He explained -


You know, we hear


that people will be killed


I said – ya


I was dealing with the humidity


It hit me when he pulled out the knife


That he was interrogating me.