Monday, July 18, 2016

खबर

16 जुलाई – हैदराबाद विश्वविद्यालय में काश्मीर के मौजूदा हालात पर सभा। बाहर से किसी के भी आने पर रोक थी। सुरक्षा कर्मियों ने सभा रोकने की कोशिश की, पर युवा छात्रों के बुलंद इरादों और राजनीति विज्ञान के अध्यापक डॉ विजय के हस्तक्षेप से तय कार्यक्रम पूरा हुआ। करीब सौ लोग मौजूद थे।
बाद में ए बी वी पी के लड़कों ने भारत माता की जै वाला जुलूस निकाला और पंजाब से आए शोधछात्र अमोल सिंह को काश्मीरी मुसलमान समझ कर बुरी तरह पीटा। अमोल को अस्पताल जाना पड़ा।

17 जुलाई –आंध्र प्रदेश के करमचेडु गाँव में 31 साल पहले हुए दलितों के कत्लेआम की बरसी और रोहित वेमुला के निधन के छ: महीने पूरे होने पर हैदराबाद विश्वविद्यालय में सभा हुई। बाहर से लोगों के आने पर ज्यादा सख्ती से रोक थी। पुलिस की गाड़ी चक्कर लगा रही थी। दोनों गेट पर कई पुलिसकर्मी और एक पूरा ट्रक मौजूद था। सुरक्षा कर्मियों ने सभा रोकने की कोशिश की, झड़प भी हुई, पर कार्यक्रम पूरा हुआ। दो अध्यापकों ने भी भाषण दिए, इनमें डॉ विजय भी थे। बाद में मोमबत्तियाँ लिए जुलूस उस होस्टल तक गया, जहाँ रोहित का निधन हुआ था। नारे लगाते हुए करीब ढाई सौ लोग शामिल थे। फिर 9 बजे से कार्ल सेगन की फिल्म 'कॉसमॉस' दिखाई जानी थी, पर प्रशासन ने बिजली गुल कर दी।

18 जुलाई –तीस साल पहले देखी वूडी ऐलन की पुरानी फिल्म 'ज़ेलिग' डाउनलोड कर रहा था, जो एक ऐसे अनोखे चरित्र पर काल्पनिक वृत्तचित्र (फिक्शनल डॉक्यूमेंटरी) है, जो परिस्थिति के अनुसार रंग बदलकर खुद को नए शख्सियत में ढाल लेता था। पता नहीं कैसे यह फिल्म मेरे फीचर फिल्मों के फोल्डर में न जाकर डॉक्यूमेंटरी वाले फोल्डर में डाउनलोड हो गई। हमारा समय? कि यह फिल्म कल्पना नहीं, सच है?

Saturday, July 16, 2016

मेरी ये आम आँखें


आत्मकथा


1
जो कुछ कहूँगा सच कहूँगा
सच के सिवा जो कहूँगा
वह भी सच ही होगा
आज सच कहने में डर भी क्या
जो मैंने कहा वह किसने पढ़ा

2
सच कि मैं चाहता हूँ काश्मीर जाऊँ
मेरी मित्र वहाँ सिंहासननुमा कुर्सी पर बैठी है
उसके हाथ में बेटन है
वह कोशिश में है कि
मैं वहाँ आ सकूँ
दस साल पुराने केमिस्ट्री के पाठ
फिर से पढ़ा सकूँ
हो सकता है कि इस बार इतना कुछ सीख ले
कि सी आर पी की नौकरी छोड़ दे
और हवा पानी फूल पत्तों से रिश्ता जोड़ ले
और जब वह एक भरपूर औरत है
मेरी दोस्त बने एक दोस्त की तरह मुझे चूम ले
सच यह कि मैं काश्मीर नहीं जाऊँगा
दूरदर्शन के परदे पर उसे देखूँगा
उसकी खूबसूरत आँखें उसकी गुलाम आँखें
आज़ादी के डर में हो गईं नीलाम आँखें
दूरदर्शन तक मेरा काश्मीर होगा
दूरदर्शन भर होंगी उसकी आँखें
औरों की गुलामी में शामिल होगी
मेरी आवाज़
सच यह कि सच के सिवा
कुछ और ही देखती रहेंगी
मेरी ये आम आँखें
(साक्षात्कार 1999)

Tuesday, June 07, 2016

किसका ब्रिटेन, किसका इंडिया


ब्रिक्सिट से हम क्या सीखें

('समयांतर' के ताज़ा अंक में प्रकाशित)

नोट: इस लेख को मैंने 16 जुलाई की सुबह को पोस्ट किया है, पता नहीं कैसे इसमें 7 जून की तारीख दिख रही है -मूल लेख ब्रिक्सिट जनमत संग्रह के तुरंत बाद यानी जून के अंत में लिखा गया था)



आर्थिक वैश्वीकरण के जमाने में माली नज़रिए से ताकतवर किसी मुल्क में आ रहे राजनैतिक झटकों के प्रभाव सारी दुनिया पर दिखते हैं। ब्रिटेन के यूरोपी संघ से निकलने के पक्ष में जनमत से दुनिया भर में तहलका मच गया है। बाज़ार मंदी में है। कहा जा रहा है कि विश्व व्यापार को 200 खरब डॉलर का नुक्सान पहुँचा है। भारत में भी स्टॉक मार्केट में कीमतें धड़धड़ा कर गिर गईं। यह सोचना लाजिम है कि इस प्रकरण से हम क्या सीख सकते हैं। वैसे तो लगता है कि यह सब कुछ आलमी सरमाएदारी का खेल है, और वह है भी, पर इसकी गहराई में इंसानी रिश्तों को बिगाड़ने में प्रतिक्रियाशील ताकतों की लट्ठमार भी है।



यूरोप का संघीय ढाँचे में उभर आना उतना ही सही दिखता है, जितना कि भारत की भिन्न राष्ट्रीयताओं का एक राष्ट्र में शामिल होना है। आखिर जब सभ्यताओं की बात आती है तो इंसानों को बाँट कर देखने वाले हमेशा हिंदुस्तानी या चीनी जैसी सभ्यताओं के बरक्स यूरोपी सभ्यता की बात करते हैं। आलमी सरमाएदारी के हित में पिछली सदियों में जिस तरह के नस्लवादी आख्यान इतिहास, भूगोल या आम तौर पर समाज विज्ञान में निर्मित हुए हैं, उन्हें यूरोपकेंद्रिक आख्यान कहा जाता है। इसी बात को उलट कर कहें तो ब्रिटेन का इस संघ से निकलना उतना ही सही है जितना कि भारत राष्ट्र-राज्य में शामिल किसी एक राष्ट्रीयता का इससे निकलने का निर्णय लेना होगा। राष्ट्रवादियों के अखंड भारत के सपने देखने के बावजूद भारत भी यूरोप की तरह बहुराष्ट्रीय देश है, जिसमें अलग-अलग राष्ट्रीयताएँ एक सामाजिक अनुबंध के तहत एक राष्ट्र-राज्य में शामिल हैं। भारत का संविधान इस सामाजिक अनुबंध का मसौदा है। जैसे यूरोप में भिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ, धर्म आदि हैं, हर देश का अलग इतिहास है, उसी तरह भारत में भी हर स्तर पर व्यापक विविधता है।



यूरोप एक देश नहीं है, और इसमें शामिल सभी देशों में से कुछ ज्यादा ताकतवर हैं, कुछ कम। ताकतवर मुल्कों में से ब्रिटेन एक है। अंग्रेज़ी भाषा और इससे जुड़ी संगीत आदि बातों को सांस्कृतिक वर्चस्व के नज़रिए से देखा जाए तो यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर अंग्रेज़ों ने यूरोप छोड़ने की क्यों ठानी। यूरोप में अंग्रेज़ी भाषा का महत्व दूसरी भाषाओं से ज्यादा है; ब्रिटेन ने संघ में रहते हुए अपनी मुद्रा ब्रिटिश पाउंड को लागू रखा था, जबकि जर्मनी, फ्रांस जैसे सभी देशों ने 2001 से ही यूरो को मुद्रा मान लिया था। हम-आप लोग यूरोप के बीस से भी अधिक मुल्कों में एक ही शेनगन वीज़ा लेकर घूम सकते हैं, पर ब्रिटेन के लिए अलग वीज़ा चाहिए। संघ में रहने के लिए धीरे-धीरे ब्रिटेन को ये सारी ज़िदें छोड़नी पड़तीं, पर अभी तक तो उनकी चाँदी थी। हालाँकि 1993 की मास्ट्रिख़्त संधि के अनुसार यूरोपी संघ में शामिल हर मुल्क के नागरिक को यूरोपी नागरिक कहा जाएगा, पर ब्रिटिश नागरिकों ने अभी तक अपनी संघ की नागरिकता के साथ अलग ब्रिटिश नागरिकता बनाए रखी थी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि आधी जनता ने यूरोप छोड़ने के पक्ष में मतदान किया। माना जा रहा है कि संघ छोड़ने की राय रखने वालों में बहुतायत कामगारों की थी। क्या संघ में रहना कामगारों के हित में नहीं था? यह सवाल जटिल है। जाहिर है कि कामगारों में असंतोष है, पर एक बड़ा अार्थिक ढाँचा, जो कि संघीय ढाँचे में निश्चित था, उनके हित में ही रहता। कामगारों के असंतोष का फायदा उन पुरातनपंथी लोगों ने उठाया, जिन्हें द्वीप की सीमाओं के बाहर से आने वाले प्रभावों में खतरा दिखता है। किसी तरह वे आम लोगों को यह समझाने में सफल हो गए कि उनकी सारी समस्याएँ इस वजह से हैं संघ में रहने की वजह से काम बाहरी लोगों को मिल रहे हैं, मूल निवासियों में बेरोजगारी बढ़ गई है। विपन्न इंसान जल्दी विक्षिप्त हो सकता है, यह बात दुनिया भर में बार-बार देखी गई है। ऐसा जर्मनी में हुआ, जब दो आलमी जंगों के बीच के सालों में गरीबी काफी बढ़ गई और हालात ने फासीवादियों के सत्ता में आने की ज़मीन तैयार की। जंग और कत्लेआम का वह तज़ुर्बा इतना भयंकर रहा कि अब वैसे हालात आसानी से वापस नहीं आने वाले, पर गुस्सा और नफ़रत की ज़मीन तो बनती चली है। कइयों का मानना है कि यूरोपी संघ से निकलने का यह निर्णय दक्षिणपंथी नस्लवादी ताकतों की जीत है। यही मुद्दा है जिसे हमें अपने संदर्भ में सोचना है।



अस्सी के दशक के बाद से ब्रिटेन में आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती रही है। आलमी पैमाने पर अपनी दादागीरी बनाए रखने के लिए अमेरिका का छोटा भाई बनकर ब्रिटेन कई जंगों में भी शामिल रहा है। खास तौर पर अफगानिस्तान, ईराक और मध्य-पूर्व की जंगों में ब्रिटेन ने अमेरिका और नाटो ताकतों के साथ मिलकर पूरी भागीदारी की है। टोनी ब्लेयर के प्रधानमंत्री पद में रहने के तुलनात्मक रूप से प्रगतिशील माने जाने वाली लेबर पार्टी की सरकार के दिनों में ही सद्दाम हुसैन के खिलाफ लड़ाई में ब्रिटेन पूरी तरह शामिल रहा। लीबिया पर बमबारी भी इसी सरकार के दौर में हुई। इसमें कोई शक नहीं कि अपने पूर्वसूरी मार्गरेट थैचर और टोरी सरकारों की जनविरोधी नीतियों को बदलने में नाकाम ब्लेयर की सरकार के दौरान भ्रष्टाचार बढ़ा। 2008 में भारी मंदी के बीच बड़े पैमाने में बेरोज़गारी बढ़ी। मकानों की कीमतें बढ़ती चलीं, स्वास्थ्य सुविधाओं और तालीम पर सरकारी खर्च में भारी कटौती हुई। साथ ही तमाम रोकथाम के बावजूद दूसरे मुल्कों से लाचार लोग ब्रिटेन में आते रहे। आखिर जिन मुल्कों में ब्रिटिश फौजें तबाही मचा रही थीं, वहाँ से भागे हुए लोग कहाँ जाएँ? विस्थापितों और पीड़ितों के साथ सहानुभूति रखने वाले कई लोगों ने ब्रिटेन में आतंकी माहौल बनाने में हिस्सा लिया, जिनमें कुछ तो ब्रिटिश नागरिक ही थे। इसलिए आम लोगों को दक्षिणपंथियों की इस बात में दम लगा कि सारी समस्याएँ बाहर से आ रहे कामगारों की वजह से है। लेबर पार्टी ने सरमाएदारी का खुलकर विरोध नहीं किया, क्योंकि पूँजीवाद के गढ़ में कोई भी ताकत इस हद तक विरोध नहीं कर सकती। डेविड कैमेरन के नेतृत्व की मौजूदा टोरी सरकार वैसे ही घोषित रूप से सरमाएदारों के हित में काम करती है। ऐसे माहौल में कामगारों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक था। हालाँकि पिछले दो सालों से जेरमी कोर्बिन के नेतृत्व में लेबर पार्टी में उदारवादियों और वामपंथियों ने अपनी पकड़ मजबूत की है, पर जैसा दुनिया भर में दिखता है, ब्रिटेन में भी कामगारों को एकजुट कर उनके हितों को आगे बढ़ाने में सफल नेतृत्व उभर नहीं पाया है। ज़मीनी स्तर पर जनांदोलनों में शामिल वामपंथियों में ब्रिक्सिट को लेकर मतभेद है। कोर्बिन समेत अधिकतर नेता मानते थे कि ब्रिटेन को यूरोपी संघ में रहना चाहिए। कोर्बिन ने 'रीमेन' पक्ष में मत देने के लिए आवाज़ उठाई और साथ ही लोगों को चेताया कि संघीय सरकार से आम लोगों को हालात में बेहतरी की कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। संघ में रहने के पक्ष में उनका तर्क यह नहीं है कि यूरोप की संघीय सरकार कोई अधिक जनपक्षधर सरकार है; यह हर कोई मानता है कि संघीय सत्ता भी पूरी तरह नवउदारवादी पूँजीवाद की जकड़ में है और जनकल्याण के सभी ढाँचों को धीरे-धीरे तोड़ डालने में उनको कोई हिचक न होगी। साथ ही संघ में रहने के 'रीमेन' पक्ष का नेतृत्व कर रही कैमरन सरकार भी वाम का समर्थन पाने के योग्य बिल्कुल नहीं है। पर जिस तरह कामगारों में दक्षिणपंथी सोच घर करती जा रही है और बाहर से आए लोगों के खिलाफ ज़हर फैलाया जा रहा है, ऐसे माहौल में उन्हें लगता है कि संघ से निकलना सियासी मैदान दक्षिणपंथियों के हाथ दे देने जैसा होगा। पर ऐसे भी वामपंथी लोग हैं जिन्हें लगता है कि संघ में रहना ब्रिटेन के कामगारों के हित में नहीं है। वे ठीक इसी बात को सामने रखते हैं कि कामगारों में फैले असंतोष का दक्षिणपंथी जिस तरह फायदा उठा रहे हैं, संघ में रहने से उसमें बढ़ोतरी आएगी और सियासी मैदान में दक्षिणपंथियों के पैर और जम जाएँगे। वे यह भी मानते हैं कि संघ में न रहने से दक्षिणपंथी पार्टियों का एजेंडा कमजोर पड़ जाएगा और लेबर पार्टी को लोगों को अपने पक्ष में लामबंद करने में सुविधा होगी। वैसे सचाई यह है कि लेबर पार्टी के अंदरूनी मतभेद जनमत का निर्णय आने के बाद बढ़ गए हैं; यहाँ तक कि प्रतिपक्ष (शैडो) काबीना के ग्यारह सदस्यों ने पदत्याग कर दिया है, जिनमें से एक पर तो नेतृत्व का तख्तापलट करने की कोशिश के इल्जाम हैं। जो भी हो इतना तो साफ है कि जिन आम लोगों ने संघ से निकलने के लिए मतदान किया है, उनमें से अधिकतर की असली मंशा सियासी नेताओं को यह बतलाने की रही है कि वे उनके लाचारी के हालात पर ध्यान दें नहीं तो आगे कुछ भी हो सकता है। ये उन्हीं इलाकों के लोग हैं, जहाँ लेबर पार्टी और दूसरे वामपंथी दलों के कार्यकर्ता कई सालों से निष्क्रिय रहे हैं और लोगों में सही राजनैतिक चेतना फैलाने में नाकाम रहे हैं। इन इलाकों में मुख्यधारा की मीडिया का प्रभाव ही ज्यादा रहा, जिसमें कन्ज़रवेटिव पार्टी के दो पक्षों में विरोध को ही मुख्य मुद्दा बनाकर पेश किया जाता रहा।



भारत में नामचीन टिप्पणीकारों ने अभी तक ब्रिक्सिट के आर्थिक प्रभावों पर बयान दिए हैं। रिज़र्व बैंक के अध्यक्ष रघुराम राजन और सरकार की ओर से बयान आए हैं कि भारत इन आर्थिक झटकों को सँभालने के काबिल है। पर इन आर्थिक मुद्दों से कहीं ज्यादा गंभीर मसला भारतीय राष्ट्र-राज्य की संरचना का है, जिसके बारे में बहुत कम बात हो रही है।



पिछले कुछ दशकों से भारत में आम लोगों को उसी तरह भड़काया जा रहा है जैसे ब्रिटेन में कामगारों को भड़काया गया है। फ़र्क सिर्फ यह है कि वहाँ बाहर से आए लोगों के खिलाफ और यहाँ अपने ही लोगों के खिलाफ, जो बहुसंख्यक समुदाय के नहीं हैं, भड़काया गया है। इसी के साथ मुख्यधारा के राजनैतिक नेता अपने स्वार्थ के लिए देशी-विदेशी पूँजीपतियों को देश के संसाधनों की खुली लूट के लिए न्यौता दे चुके हैं। संविधान की धज्जियाँ उड़ाकर विकास के नाम पर छत्तीसगढ़ और ओड़िसा जैसे राज्यों में आदिवासियों के साथ बेइंतहा ज़ुल्म हो रहे हैं। अत्याचारी ब्राह्मणवादी परंपराओं के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले दलित बुद्धिजीवियों को जेलों में क़ैद किया जा रहा है। बड़ी तेजी से ध्रुवीकरण हो रहा है - एक ओर तो नफ़रत की राजनीति के बल पर समुदायों में फूट डाली जा रही है, दूसरी ओर बड़ी तादाद में दलितों और दीगर अल्पसंख्यकों में यह भावना बढ़ रही है कि भारतीय राष्ट्र-राज्य के बनने में भिन्न राष्ट्रीयताओं के बीच जो सामाजिक अनुबंध हुआ है, उसका धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है। इसके परिणाम क्या होंगे, इस पर सोचना चाहिए।



जनमत ग्रहण के ठीक पहले यूरोपी संघ में रहने के पक्ष में प्रचार करने वाली सांसद जो कॉक्स की हत्या हुई। हत्यारे ने वार करते हुए 'ब्रिटेन फर्स्ट' का नारा उछाला। दक्षिणपंथी और नस्लवादियों के आक्रामक प्रचार से हालात ऐसे हो गए थे कि एक बहुत ही लोकप्रिय सांसद की इस तरह खुले आम हत्या हो पाना संभव हुआ। जनमत का निरणय आने के बाद माहौल में नफ़रत कम नहीं हुई है। नाइजेल फाराज के ज़हर फैलाते पोस्टरों की जो कॉक्स की हत्या के बाद कुछ आलोचना हुई, पर वह बात अब भुला दी गई है। वामंपथियों में कुछ इन खतरों को कम कर आँक रहे हैं, यह आने वाले दिनों में ही पता चलेगा कि सचमुच स्थिति कितनी बुरी है।



सैमुएल जॉनसन की कही यह बात अब कहावत बन चुकी है कि देशभक्ति बदमाशों का आखिरी औजार होता है। हमारे यहाँ भी 'इंडिया फर्स्ट' का नारा उछलता रहता है, पर वह इंडिया किसका है, किसके लिए है, ये सवाल पूछे नहीं जा रहे हैं। जब हर क्षेत्र में सौ प्रतिशत विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा हो, और ग़रीब जनता को बेघर करने के लिए हिंसा और बलात्कार के तरीके अपनाए जा रहे हों तो सोचना पड़ता है कि देशभक्ति क्या होती है। दादरी में अखलाक की हत्या से लेकर कर्नाटक के प्रो. गुरू की गिरफ्तारी जैसी घटनाएँ हर दूसरा दिन सामने आ रही हैं। उत्तर प्रदेश में चुनाव जीतने के लिए खुलेआम सांप्रदायिक ज़हर फैलाने की कोशिश जारी है। ब्रिक्सिट पर सोचते हुए हमें इन सवालों को पूछना पड़ेगा। ब्रिटेन में स्कॉटलैंड के बत्तीस काउंसिल क्षेत्रों में से हरेक में 'रीमेन' पक्ष में मतदान हुआ है और यह हो सकता है कि आगे फिर से जनमत हो और स्कॉटलैंड ब्रिटेन से निकलकर स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में यूरोपी संघ में शामिल हो। इसी तरह भारत में किसी इलाके में जनता के बड़े हिस्से में अगर यह एहसास बढ़ता रहे कि केंद्रीय सरकार संविधान में नागरिकों को दिए हकों का उल्लंघन कर उनको कुचलती जा रही है, तो वह भी कभी भारतीय संघ से अलग होने की आवाज़ उठा सकते हैं। यह संपन्न वर्गों को सोचना है कि आम लोग किस हद तक ज़ुल्म सहते जाएँगे और आज़ादी के सत्तर सालों के बाद भी सारी नीतियाँ उनके खिलाफ क्यों जाती दिखती है। असंतोष अगर व्यापक विक्षोभ में बदलता है तो इससे संपन्न वर्ग भी बच नहीं पाएँगे। फौज-पुलिस का इस्तेमाल कर और चौड़े सीने का दावा करने वाले घुमंतू प्रधानमंत्री के जुमलों से जन-आक्रोश को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता है।


आधुनिकता-भावनात्मकता-प्रतिरोध


 
भोपाल से एक पत्रिका आती है 'गर्भनाल'
उनके लिए बीच-बीच में लिखता रहा हूँ। मैंने देखा है कि बड़े-बड़े लोग लिखते हैं उनके लिए।
यह आलेख संपादक जी नहीं छाप सकते, उन्होंने बड़ी विनम्रता से लिखा है कि उन्हें पहले दो पैरा ठीक नहीं लग रहे। उनका निर्देश है कि मैं कोई पहले का उदाहरण लूँ। मैं उनकी दिक्कत समझता हूँ। बदकिस्मती मेरी है कि मेरा हाजमा पहले से ही काफी बिगड़ा हुआ है, उसे और बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए यह अब सबके लिए खुला है, जिसको चाहिए इस्तेमाल करें। 
(अपडेट - 'फिलहाल' के ताज़ा अंक और कुछ वेब-मैगज़ीन्स में आ गया है) 

आधुनिकता-भावनात्मकता-प्रतिरोध

जे एन यू के छात्र उमर खालिद ने हाल में कोलकाता में भारतीय संघ के भवन में छत्तीसगढ़ की समस्याओं पर व्याख्यान दिया। सभागार के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ए बी वी पी के कार्यकर्त्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इसकी वजह से ट्रैफिक में कुछ समस्याएँ हो रही थीं। एक बस में किसी सवारी ने पूछा, यहाँ क्या हो रहा है। किसी दूसरे ने जवाब दिया, अरे वह उमर खालिद है न, जिसने देशद्रोही नारे लगाए थे, वह आया हुआ है। किसी तीसरे ने कहा, अरे उसेे अभी तक गिरफ्तार नहीं किया। एक युवा स्त्री ने कहा कि आपलोग क्या कह रहे हैं, आपको पता नहीं कि यह सब झूठ है। जाली वीडियो दिखलाकर यह झूठ फैलाया गया था। तो कई लोग चिल्ला उठे कि इसे पीट कर गाड़ी से उतार दो।

इस घटना में एक तर्कशीलता है जो आधुनिक पूँजीवाद और सामंती समाज की गड्ड-मड्ड संस्कृति से निकलती है। कई लोग हैं जो इस बात के प्रति उदासीन हैं कि हमारे समाज में कई लोगों को या तो उमर खालिद से या उसके मुसलमान नाम से नफ़रत है, पर वे हम आप जैसे भले और सचेत भी दिखना चाहते हैं, तो वे कहेंगे कि यह सब आधुनिकता की वजह से, अंग्रेज़ों की वजह से, औपनिवेशिक शासन की वजह से है। यानी कि उस दिन उस वक्त बस में उस 
युवा स्त्री को एक बुज़ुर्ग ने सँभाल न लिया होता तो उसकी पिटाई और पता नहीं जो कुछ भी हो सकने की संभावना थी, उसे भूल जाएँ और अंग्रेज़ों को कोस लें तो सब ठीक दिखने लगेगा। जिस तर्कशीलता के साथ मैं अपने मित्रों की आलोचना कर रहा हूँ, यह भी आधुनिकता से ही आई है। ऐसी अलग-अलग युक्तियों में से हम कोई एक पक्ष चुनते हैं और उसे अपने तर्कों के साथ आगे बढ़ाते हैं। मित्रों को लगता है कि वे ठीक हैं, मुझे लगता है कि मैं ठीक हूँ। अक्सर दोनों पक्षों में से कोई एक ही सही होता है, पर यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा ऐसा हो और अगर हो भी तो पूरी तरह यानी सौ फीसद सही हो। अपने पक्ष की सीमाओं को समझने में हमें लंबा समय लग सकता है और कभी-कभी तो हम उसे कभी नहीं समझ सकते।

कुछ साल पहले का एक उदाहरण लें। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन सी ई आर टी) की 2006 में तैयार की गई ग्यारहवीं की राजनीति-शास्त्र की पाठ्य-पुस्तक में कोई तीस कार्टून डाले गए। इसके पीछे मासूम सा तर्क था कि बच्चे कार्टून का मजा लेते हुए पाठ के विषय-वस्तु में रुचि लेने लगेंगे। वैसे तो यह सही बात है और इस तरह के शैक्षणिक प्रयोग पिछली सदी के आखिरी दशकों में दुनिया भर में हुए हैं। किताब में एक अध्याय भारत के संविधान पर था और यह समझाने के लिए कि संविधान के लिखे जाने में तक़रीबन तीन साल लग गए, प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर का 1949 में छपा एक कार्टून डाला गया था। इसमें दिखलाया गया था कि भारत की जनता एक गोल चक्कर के बाहर अधीरता से इंतज़ार कर रही है कि संविधान जल्दी तैयार हो और अखाड़े में संविधान लिखने वाली समिति के अध्यक्ष आंबेडकर एक घोंघे पर बैठे हुए हैं। पीछे से उन दिनों की कार्यकारी सरकार के प्रमुख जवाहरलाल नेहरु एक चाबुक लेकर खड़े हैं कि घोंघे को जल्दी दौड़ाया जाए। जाहिर है इस कार्टून के पीछे अंग्रेज़ी का "स्नेल'स पेस" (घोंघे की चाल) वाला मुहावरा थाकि भई अब कामकाज की गति बढ़ाओ, कब तक लोग इंतज़ार करेंगे। इस कार्टून पर 2010 से पहले कुछ, और जल्दी ही बड़ी तादाद में, लोगों ने आपत्ति जतानी शुरु की। 2012 तक ऐसा लगने लगा कि भारतीय बौद्धिक समाज दलित और गैर-दलित, दो तबकों में बँट गया है। दलितों और गैर-दलितों के बीच बृहत्तर समाज में जो संकट का संबंध है, वह बौद्धिकों में तीखी बहस बन कर सामने आ गया। दलित और गैर-दलित चिंतकों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ता चला। अखबारों में, टी वी चैनलों पर जम कर बहस हुई। एन सी ई आर टी की पाठ्य-पुस्तक समिति के सदस्य जागरुक और सचेत लोग थे, बाकी समाज के लिए पथ-प्रदर्शक थे, फिर भी बहस चली। इसके एक दशक पहले प्रेमचंद की कहानियों पर भी ऐसा ही विवाद काफी तीखे तेवरों के साथ हुआ था।

आखिर कार्टून में पाठ को बेहतर ढंग से पढ़ाए जाने के अलावा और क्या पक्ष हो सकता था? कल्पना कीजिए कि देश के एक आम स्कूल में यह पाठ पढ़ाया जा रहा है। अध्यापक पाठ के मुताबिक समझा रहे हैं कि देश का संविधान कैसे बना। बच्चे पाठ में बनी तस्वीरों की तरह शर्ट निकर के साथ टाई पहने हो भी सकते हैं। मान लें कि कक्षा में सवर्ण और दलित दोनों पृष्ठभूमि के बच्चे हैं। ईमानदारी से हम मौजूदा स्थिति के बारे में सोचें तो हम देख सकते हैं कि अांबेडकर का घोंघे पर सवार होना किसी सवर्ण बच्चे को हास्यास्पद लग सकता है। वह इस कार्टून का इस्तेमाल किसी दलित बच्चे को तंग करने के लिए कर सकता है। अांबेडकर के ठीक पीछे नेहरू का चाबुक लिए खड़े होना कार्टून को और भी जटिल बना देता है।

प्रताड़ित जन की प्रतिक्रिया कैसी होती है, विश्व इतिहास में इसके बेशुमार उदाहरण हैं। साठ के दशक में, जब अमेरिका में काली चमड़ी के लोगों को बराबरी का नागरिक अधिकार देने का आंदोलन शिखर पर था, जिसमें कई गोरे लोग भी शामिल थे, प्रसिद्ध अफ्रो-अमेरिकी कवि इमामु अमीरी बराका (मूल ईसाई नामः लीरॉय जोन्स) ने लिखाः- 'ब्लैक डाडा निहिलिसमुस। रेप द ह्वाइट गर्ल्स। रेप देयर फादर्स। कट द मदर्स थ्रोट्स।' कोई भी इस हिंसक कविता को सभ्य अभिव्यक्ति नहीं कहेगा। सिर्फ जाति नहीं, आर्थिक वर्ग आधारित निपीड़न भी हिंसक प्रतिक्रिया पैदा करता है। अभी हाल तक कोलकाता शहर में दीवारों पर सुकांतो भट्टाचार्य की ये पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती थीं - 'आदिम हिंस्र मानविकतार आमि यदि केऊ होई, स्वजन हारानो श्मशाने तोदेर चिता आमि तूलबोई।' बराका की हिंसात्मक अभिव्यक्ति आज भी यू ट्यूब पर संगीत के साथ सुनी जा सकती है। गोरे लोगों के समाज ने इसका विरोध किया या नहीं, इसका कोई दस्तावेज नहीं है, पर अफ्रो-अमेरिकी स्त्रियों ने प्रतिवाद किया, यह इतिहास है। एलिस वाकर ने तो इस पर कहानी, उपन्यास तक लिखे - उनके उपन्यास 'मिरीडियन' में यह दिखलाया गया है कि किस तरह काले लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने आई एक गोरी लड़की का एक काला युवक ग़लत फायदा उठाता है।

बहरहाल हमें गैरतार्किक लगती स्थितियों तक कोई कैसे पहुँचता है, इस पर बेशुमार साहित्य लिखा गया है। 1949 में ही एक अफ्रो-अमेरिकी कवि लैंग्स्टन ह्यूज़ ने लिखा थाः- ह्वाट हैपेन्स टू अ ड्रीम डिफर्डदरकिनार किए गए सपने का क्या हश्र होता है? / क्या वह किसमिस के दाने की तरह धूप में सूख जाता है? / या वह घाव बन पकता रहता है? /  क्या उसमें सड़े माँस जैसी बदबू आ जाती है?/ या वह मीठा कुरकुरा बन जाता है....? शायद उसमें गीलापन आ जाता है और वह भारी होता जाता है / या फिर वह विस्फोट बन फूटता है?

प्रसिद्ध इतिहास लेखक हावर्ड ज़िन ने अपनी किताब में एक अमेरिकी कहावत का ज़िक्र किया है, 'ग़रीब की आह हमेशा न्याय-संगत हो, यह ज़रूरी नहीं; पर अगर तुम उसे सुनोगे नहीं, तो तुम जान ही नहीं पाओगे कि न्याय क्या है।'

तो हम कैसे तय करें कि सही और ग़लत क्या है। सच यह है कि हममें से बहुत सारे लोग कभी नहीं जान पाएँगे कि दो विरोधी धारणाओं में से सही क्या हो सकता है। जीवन की तमाम प्रताड़नाएँ और असुरक्षाएँ हमारी इंसानियत को थोड़ा-थोड़ा कर खाती रहती हैं, और हममें से कई इसे इस हद तक खो बैठते हैं कि हम वापस पूरे इंसान नहीं बन सकते हैं। अच्छी बात यह है कि हममें से अधिकतर लोग इस बीमारी से निदान पा सकते हैं। वक्त के साथ इंसान में सहनशीलता और विरोधी धारणाओं के साथ जीने की क्षमता बढ़ी है। पिछली सदी के बीच के दशकों तक यह माना जाता था कि तर्कशीलता ही हमें सही राह पर ले जा सकती है। पर यह स्पष्ट होता गया कि विरोधी धारणाओं के अपने-अपने तर्क होते हैं और तर्कशील सोच हमें सही या ग़लत दोनों तरह के निष्कर्षों पर ले जा सकती है। मेरी अपनी तर्कशीलता मुझे बतलाती है कि राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता या इंसान को इंसान से बाँटने वाले सिद्धांत मानसिक बीमारियाँ हैं। पर औरों की तर्कशीलता उन्हें यह नहीं, बल्कि इसके विपरीत भी बतला सकती है। बीसवीं सदी के आखिर में यह दिखने लगा कि सिर्फ तर्कशीलता नहीं, बल्कि भावनात्मकता भी सत्य की ओर जाने का एक रास्ता है। जाहिर है कि भावनात्मक होना भी अक्सर हमें ग़लत दिशा में भी धकेलता है, पर कम से कम इतना तो कहा जा सकता है कि भावनात्मकता के साथ हम विरोधी विचारों के लोगों के साथ इंसानी रिश्ते बनाने के काबिल हो सकते हैं और उनकी सोच को जगह देने के काबिल होते हैं और मिलजुलकर आगे बढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। असमंजस की स्थिति में समझदारी यह है कि हम उसकी सुनें जो उत्पीड़ित है। बाद में यह निर्णय ग़लत भी निकले तो उससे घबराना नहीं चाहिए, आज तक सामाजिक-राजनैतिक अखाड़ों में जिन निर्णयों को सही माना जाता रहा है, उनमें से अधिकतर बाद में ग़लत साबित हुए हैं।

जिसे आम तौर पर आधुनिकता कहा जाता है, सत्रहवीं सदी के बाद से यूरोप में प्रबोधन-काल (इनलाइटेनमेंट) से आए वैचारिक बदलावों के उस समूह में आधुनिक वैज्ञानिक तर्कशीलता पर जोर बढ़ता रहा। आधुनिक विज्ञान की यह ताकत भी है और कमजोरी भी कि इसमें सिद्धांतत: भावनात्मकता के लिए कोई जगह नहीं है। पर वैज्ञानिक तो आखिर इंसान है, इंसान सामाजिक प्राणी है, इसलिए विज्ञान के पेशे में वे सारे पूर्वग्रह मौजूद हैं, जो वर्ग, जाति, लिंग आदि आधारित भेदभावों से भरे बृहत्तर समाज में है। इसलिए अगर हमारी सोच सिर्फ वैज्ञानिक तर्कशीलता पर आधारित हो और हम भावनात्मक रुप से विज्ञान के पेशे की सीमाओं को नहीं पहचान पाते, तो हम सामाजिक पूर्वग्रहों से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे। यह विरोधाभास सा लगता है, क्योंकि भावनात्मकता से रहित विज्ञान से यह अपेक्षा होती है कि वह हमें सामाजिक पूर्वग्रहों से ऊपर ले जाए, पर ऐसा होता नहीं है। दरअस्ल बौद्धिक कर्म करने वालों की अलग-अलग जमातों में वैज्ञानिक ही संभवत: सबसे अधिक संरक्षणशील होते हैं। इसलिए दुनिया भर में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि उच्च-स्तर पर विज्ञान और तकनीकी शिक्षा लेने वालों को जहाँ तक हो सके समाज-शास्त्र और मानविकी (अदब समेत) भी पढ़ाया जाए। बगैर पर्याप्त भावनात्मक विकास के एक वैज्ञानिक महज एक मशीन है।

यूरोपी आधुनिकता और इसकी तर्कशीलता से जो और बातें आई है, उनमें आधुनिक 'राष्ट्र' की धारणा प्रमुख है। यह एक ऐसी अजीब धारणा है, जो हमें अपने ही अंदर दुश्मन ढूँढने को कहती है। जो भी मुख्यधारा की भाषा, संस्कृति, मजहब का नहीं है, वह मेरा दुश्मन है। राष्ट्र की यह धारणा हमारी इंसानियत को बड़ी तेजी से खत्म करती है। यह कहा जा सकता है कि आज समूची दुनिया में हर मुल्क के लोग इस आधुनिक बीमारी से ग्रस्त हैं। इसलिए एक मुल्क का नागरिक दूसरे मुल्क के नागरिकों के साथ भावनात्मक रुप से नहीं जुड़ पाता, यहाँ तक कि अपने ही मुल्क में अल्पसंख्यकों से हम भावनात्मक रुप से नहीं जुड़ पाते। एक दूसरे को मार कर अपने मृत को शहीद और दूसरे को दुश्मन कहते हैं, जबकि सच यह है कि मरने वाले तो मर जाते हैं, उनके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। लगता ऐसा है कि लोग भावनात्मकता में बह जा रहे हैं, पर दरअस्ल होता यह है कि राष्ट्र आधारित तर्कशीलता हमारे भावनात्मक अस्तित्व को खा चुकी होती है। इसका फायदा उठाकर मुनाफाखोर पूँजीपति और फिरकापरस्त राजनैतिक गुटबंदियाँ अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं। सरकारें जनता को भूखी और ग़रीबी की हालत में रखे अरबों-खरबों के शस्त्र खरीद कर जंग की तैयारी और दमन-तंत्र को मजबूत करती हैं।

इतना तो कहा ही जा सकता है कि सामाजिक सह-अस्तित्व का मनोविज्ञान जटिल है। इस जटिलता में हमारी भागीदारी क्या और कितनी है, हम यह समझ लें तो गैर-बराबरी की इस दुनिया में हम अपनी मुक्ति की ओर बढ़ सकते हैं। और दूसरी ओर जो विस्फोट हैं, उनको झेलने की ताकत हममें हो, इसकी कोशिश हम कर सकते हैं। अपनी मुक्ति के बिना किसी और की मुक्ति का सपना कोई अर्थ नहीं रखता। इसलिए आधुनिकता के उन पक्षों को जो हमें सत्ता और समाज पर सवाल खड़े करने की ताकत देते हैं, उनको पहचानने, जानने और अपनाने की ज़रूरत है। इस प्रतिरोधी प्रवृत्ति का भी एक भावनात्मक पक्ष है, जिसे हमें मजबूत करना होगा। उमर खालिद इसी प्रतिरोधी प्रवृत्ति का नायक है, और बस में भरी भीड़ की हिंसक मानसिकता के खिलाफ खड़ी होती युवा स्त्री भी।