Friday, October 24, 2014

जी हाँ, मैं जानता हूँ





...
संयम! कैसा संयम! क्या किसी गहरी आशंका से यह संयम उपजा था अंधविश्वास, अरुचि, धीरज या भय?

भूख हर भय को खा जाती है, हर धीरज भूख से हार मानता है, भूख के सामने कोई भी बात अरुचिकर नहीं 

 लगती; और जहाँ तक अंधविश्वास, आस्थाएँ और जिन्हें आप सिद्धांत कहते हैं, वे हवा में तिनके की तरह उड़ जाते 

हैं। कौन नहीं जानता कि लगातार भूख से तड़पने से कैसी हैवानियत पैदा होती है, जो असहनीय उत्पीड़न होता है

जो भयंकर खयाल दिमाग में आते हैं, कैसी गंभीर और भयानक सोच यह पैदा करती है? जी हाँ, मैं जानता हूँ।...



('हार्ट ऑफ डार्कनेस' – जोसेफ कोनराड; हिंदी अनुवाद 'पाखी' के ताज़ अंक में आया है। पुस्तक वाग्देवी प्रकाशन से आ रही है।)

Thursday, October 16, 2014

आज किशोर कल वयस्क पाठक


'कथा' पत्रिका के बालसाहित्य आलोचना विशेषांक में इस आलेख का एक स्वरूप प्रकाशित हुआ है।

बच्चों के लिए लेखन पर कुछ चिंताएँ
-लाल्टू


मेरी परवरिश बांग्ला भाषी परिवेश में हुई। जब मैं पाँचवीं में था तब तक किशोरों के लिए लिखी बांग्ला की किताबें पढ़ने लगा था। हमारे घर किताबें खरीदी नहीं जाती थीं, पर मुहल्ले में अधिकतर मध्यवर्गीय बंगाली परिवारों के घर कहानियाँ पढ़ने का चलन था। उनसे किताबें माँग लाते थे। माँ बड़ों की किताबें पढ़ती थी और हम बच्चे अपने स्तर की किताबें। हर साल (दुर्गा)पूजा के दिनों के पहले शारदोत्सव के रंगीन माहौल के साथ नई पूजावार्षिकियों का भी इतज़ार रहता। उन दिनों यह जानता न था कि कितने बड़े साहित्यकारों का लिखा पढ़ रहे हैं। ताराशंकर बंद्योपाध्याय, आशापूर्णा देवी, महाश्वेता देवी, आदि सभी बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखते थे। आज भी यह परंपरा चलती है। उन दिनों सभी आम पत्रिकाओं के पूजावार्षिकी बच्चों के नहीं आते थे, कुछ प्रकाशक अलग नाम से साल में एक मोटी किताब बच्चों के लिए निकालते थे। हर साल उनके अलग नाम होते थे। बच्चों की पत्रिकाएँ जैसे शुकतारा, संदेश आदि की वार्षिकियाँ निकलती थीं। आज की लोकप्रिय 'आनंदमेला' का पहला रंगीन वार्षिक विशेषांक 1971 में आया, जब मैं दसवीं में था। हालांकि मेरी उम्र कम ही थी, तब तक मैं बड़ों के लिए लिखी किताबें पढ़ने लगा था। इनमें भी बच्चों और किशोरों के लिए सामग्री रहती थी। 'आनंदमेला' के उस पहले वार्षिक विशेषांक में न केवल बड़े रचनाकारों की भरमार थी, तस्वीरें बनानेवाले भी उन दिनों के सबसे बड़े नाम थे। इनमें सत्यजित राय, पूर्णेंदु पत्री, सैयद मुजतबा अली आदि जैसे लोग शामिल थे। सत्यजित राय स्वयं हर साल बच्चों के लिए एक जासूसी कहानी (फेलू दा की कहानियाँ, जिनमें से कइयों पर उन्होंने फिल्में भी बनाईं) और एक विज्ञान कथा (प्रोफेसर शंकु) लिखते थे और इनके साथ आकर्षक तस्वीरें खुद बनाते थे।

हिंदी में किताबें शुरू में स्कूल की लाइब्रेरी से लेकर पढ़ी थीं। ज्यादातर अलग-अलग प्रांतों की लोककथाओं का संकलन जैसी किताबें थीं या नैतिक संदेश वाली कहानियों की किताबें थीं। यह अहसास किशोर वय में ही पक्का हो चला था कि हिंदी में बच्चों के पढ़ने के लिए अच्छी सामग्री नहीं है। चंदामामा, पराग – ये दो आम पत्रिकाएँ खूब पढ़ते थे। नेशनल लाइब्रेरी घर से ज्यादा दूर न थी और वहाँ ये पत्रिकाएँ आती थीं। पर वहाँ भी बांग्ला में ज्यादा रोचक किताबें मिलतीं। तब तक अंग्रेज़ी पढ़ने की योग्यता बनी न थी, न ही किसे ने कभी कहा कि अंग्रेज़ी पढ़ो। पिछली दो सदी में पश्चिम में लिखे साहित्य का संक्षिप्त अनुवाद विपुल परिमाण में उपलब्ध था। इस तरह मैंने थॉमस हार्डी, आलेक्सांद्र दूमा, मार्क ट्वेन आदि को पढ़ा। साथ ही अनगिन जासूसी कहानियाँ और लघु उपन्यास पढ़े।

हिंदी में बच्चों के बारे में सोचते हुए अक्सर लोग चंदा मामा, हाथी-घोड़ा, राजा रानी आदि जैसी बातों तक सोचकर रह जाते हैं। एक ज़माना था जब बच्चे ऐसी कथाएँ और तुकबंदियो की कविताएँ सुनकर खुश होते थे। आज भी होते हैं। पर जिस तरह वक्त के साथ बच्चों के खेल और खिलौने बदले हैं, वैसे ही यह सोचना ज़रूरी है कि उनके विनोद की भाषा और वह जो पढ़ना चाहते हैं, इनमें कैसे बदलाव आए हैं। आज यह माना जात है कि भ्रूण की अवस्था से ही मानव प्रकृति और स्वयं के बारे में सीखना शुरू करता है। जन्म के तुरंत बाद दो आँखों से देखने और दो कानों से आवाज़ें सुनकर स्रोत के स्वरूप और उसकी दूरी की पहचान, वस्तुओं के आकार, इत्यादि सीखने के साथ ही भाषा सीखने और उसे पुख्ता करने की क्रियाएँ भी शुरू हो जाती हैं। शुरूआती दो-चार महीनों के बाद करवट लेने, रेंगने आदि के साथ शब्द-निर्माण बढ़ता चलता है। इस स्थिति में तकरीबन दो साल की उम्र तक चंदा सूरज जैसी पुरानी लोरियाँ आज भी बच्चों को भाती हैं। पर दो की उम्र होने तक आज बच्चे टेलीफोन, मोबाइल, कंप्यूटर आदि यंत्रों में रुचि लेने लगते हैं और जहाँ ये हर वक्त उपलब्ध हों, चार की उम्र तक उनका उपयोग भी शुरू कर देते हैं। ऐसी स्थिति में पुराने किस्म की तुकबंदी और राजा-रानी की कहानियाँ बच्चों को संतुष्ट नहीं कर सकतीं।

अधिकतर लोगों के लिए बच्चों को कुछ पढ़ने को कहना हमेशा उन्हें कुछ सिखलाने के लिए होता है। पर कला या साहित्य, कहानी-कविता का महत्व महज उस तरह की शिक्षा का नहीं होता जो वयस्क सोचते हैं। बच्चे बड़ों की बातों को गौर से सुनते हैं और उस अंजान रहस्य भरी दुनिया में घुसपैठ करने का संघर्ष निरंतर करते रहते हैं, जिसमें वयस्क डुबकियाँ लगाते हैं। जो हमें कतई शैक्षणिक नहीं भी लगता, वह सब कुछ भी बच्चों की शिक्षा में जुड़ता है।

यह मानना ग़लत है कि बच्चों को तुकबंदी, ध्वन्यात्मकता या सांगीतिकता में वयस्कों से अधिक रुचि होती है। कल्पनाशीलता की अनंत तहों में बच्चे भी उसी तरह प्रवेश करना चहते हैं, जैसे बड़े करते हैं - बल्कि उनमें ये संभावनाएँ वयस्कों से अधिक ही होती हैं। दस की उम्र तक बच्चों में पारंपरिक पठन-सामग्री के प्रति उदासीनता और अरुचि दिखने लगती है। हिंदी पढ़ने वाले बच्चों के लिए यह संकट और गहरा है। किशोरों के लिए हिंदी में साहित्य की विशेष कमी है। हिंदी प्रदेशों में सामंती सोच का वर्चस्व व्यापक स्तर का है। लोकतांत्रिक चेतना का सामान्य अभाव आम लोगों में तो है ही, बच्चों के बारे में यह संकट तथाकथित प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों में भी है। साहित्य में बच्चों और किशोरों के लिए पठनीय सामग्री के अभाव को लेकर बड़े रचनाकारों में चिंता का अभाव इसी संकट की पहचान है। इसलिए बांग्ला जैसी भाषाओं की तुलना में हिंदी में रोचक और उत्कृष्ट बाल-साहित्य का भयंकर अभाव दिखता है। वयस्क पाठकों के लिए लिखने वाले साहित्यिकों के लिए बच्चे महज खेल-कूद करते अल्प-बुद्धि के मानव शिशु हैं, जिनका चिंतन-संसार इतना सीमित है कि बड़े रचनाकारों को पढ़ने के काबिल वे नहीं हैं। सच्चाई इसके विपरीत यह है कि हम वयस्क ऐसी संकीर्ण सोच से ग्रस्त हैं कि हम यह कभी सोच नही पाते कि दरअस्ल बच्चों के लिए लिखने की भी दक्षता होती है और कि यह हममें कम है। ऐसे लेखन का अभ्यास करना हम ज़रूरी नहीं समझते हैं।

ऐसा नहीं कि प्रतिष्ठित रचनाकारों ने कुछ भी बच्चों के लिए नहीं लिखा है। बात यह है कि जितना लिखा गया है, वह बहुत कम है। रचनाओें की कमी है और जो है वह हर जगह उपलब्ध नहीं है। प्रशासनिक स्तर पर कई प्रयास हुए हैं, जैसे मध्य प्रदेश सरकार ने अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों में ऑपरेशन ब्लैक-बोर्ड के तहत कदम उठाए थे कि हर सरकारी स्कूल में कहानी कविताओं की किताबें पहुँचें। पर बांग्ला में जिस तरह हर साल बड़े रचनाकार बच्चों के लिए उपन्यास लिखते हैं, ऐसा हिंदी में नहीं है। स्‍कूलों में पुस्‍तकालय पर ताला भी बच्‍चों और किताबों के बीच एक बाधा है। ऐसे में विनोद कुमार शुक्ल, राजेश जोशी आदि कई प्रतिष्ठित रचनाकारों के काम सराहनीय हैं। इनदिनों भोपाल से निकलती 'चकमक' पत्रिका में विनोद कुमार शुक्ल का धारावाहिक उपन्यास 'मुझे कुछ करना है, मैं क्या करूँ, मैं कुछ करूँ' आ रहा है, जो अद्भुत है। इसी पत्रिका में पिछले कुछ अंकों में वरुण ग्रोवर की लंबी कहानी ;हरिहर विचित्तर'‌ आई थी, जो सांप्रदायिक आधार पर दक्षिण एशिया के विभाजन पर बड़ी संवेदनशीलता के साथ लिखी गई अद्भुत फंतासी है।

एकलव्य संस्था द्वारा अस्सी के दशक से लगातार प्रकाशित हो रही 'चकमक' पत्रिका ने हिंदी में बाल-साहित्य के माहौल को काफी बदला है। न केवल स्वयं प्रकाश, तेजी ग्रोवर और रुस्तम जैसे गंभीर रचनाकार पत्रिका से जुड़े रहे हैं, राजेश उत्साही ने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा 'चकमक' के संपादन में लगाया है, जिससे पत्रिका का स्तर हमेशा ऊँचा रहा। इन दिनों सुशील शुक्ला जैसे युवा साथी पूरी शिद्दत के साथ 'चकमक' के लिए अच्छी रचनाओं को इकट्ठा करने, बच्चों में साहित्य के प्रति रुचि बढ़ाने आदि काम में लगे हुए हैं। इस पत्रिका के मार्च 1987 अंक में मेरी एक कविता 'भैया ज़िंदाबाद' आई थी, जिसमें एक बच्ची अपने भाई की ओर से पिता के अन्याय के प्रति विरोध दर्ज़ करती है। यह वयस्क मानस की और मुक्त छंद में लिखी कविता है, निश्चित ही इसे बच्चों की कविता मात्र कहना ग़लत होगा; पर यह सोचना कि बच्चे इसके साथ नहीं जुड़ पाएँगे, ठीक न होगा। मेरी यह कोशिश सफल हुई या नहीं, यह औरों के सोचने की बात है, पर अगर हम कोशिश न करें और बच्चों को भोंदू मानकर उनके लिए सिर्फ पुराने ढंग की चिड़िया गुड़िया, तितली रानी आदि विषयों पर लिखें तो यह सही नहीं है। एकलव्य संस्था द्वारा बच्चों का साहित्य इकट्ठा करना और एक आंदोलन की तरह इसे लोगों तक ले जाना सराहनीय है।

ऐसे प्रयास और भी गिने जा सकते हैं। युवा कवि प्रभात ने स्वयं बच्‍चों के लिए काफी सारा लिखने के अलावा कई लोक कथाओं को सुंदर भाषा में पस्‍तुत किया है । उसके कई गीत बच्चों में लोकप्रिय भी हैं। चिल्‍ड्रन बुक ट्रस्‍ट, नेशनल बुक ट्रस्‍ट, आदि की किताबें बहुत कम दाम में और सुंदर किताबें होती हैं, लेकिन लोगों को उनके बारे में जानकारी नहीं होती। तूलिका और कथा जैसे कुछ महंगे प्रकाशन सुंदर किताबें छापते हें, जिनमें भारतीय लोक कथाओं को भी सं‍कलित किया गया है, लेकिन इन किताबों के दाम इतने ज्‍यादा होते हैं कि सामान्‍य व्‍यक्ति की पहुंच में नहीं हेातीं।

रूसी पुस्‍तक प्रदर्शनी और सोवियत रूस के समय में उपलब्‍ध अनुवादों ने जो पुस्‍तक और पढ़ने की संस्‍कृति को बढ़ावा दिया था, उसे भूलना नहीं चाहिए। अब पुस्‍तक मेले तो साल में कई बार लगते हैं, लेकिन वैसा साहित्‍य अब नहीं मिलता।

दूसरी भाषाओं, खास तौर पर अंग्रेज़ी से विश्व-साहित्य का अनुवाद हिंदी में विपुल मात्रा में उपलब्ध है। पर अब लगातार बढ़ते मध्य वर्ग के किशोर अंग्रेज़ी में पढ़ सकते हैं और अंग्रेज़ी के पास राजनैतिक ताकत है तो वे हिंदी में अनुवाद क्यों पढ़ें? खास तौर पर किशोरों के लिए कहानियों में जैसी अनौपचारिक शब्दावली का उस्तेमाल किया जाता है, हिदी में उसका अनुवाद न केवल कठिन है, अक्सर यह असंभव है। क्लासिक अनुवादों में शमशेर बहादुर सिंह का लुइस कैरोल की विश्व-विख्यात कृति 'एलिस इन वंडरलैंड' का अनुवाद उल्लेखनीय है। प्रबुद्ध रचनाकारों का बच्चों के लिए लिखना कितना ज़रूरी है वह शमशेर की कविता 'चाँद से थोड़ी सी गप्पें' पढ़ने से समझ में आता है। शमशेर की चाँद से गप्पें दस ग्यारह साल की लड़की की गप्पें तो हैं ही, वो मेरी और आपकी गप्पें भी हैं। वैसे तो हर बड़े में एक बच्चा होता है। पर मैं उस बच्चे की बात नहीं कर रहा। 'चंदा मामा दूर के' वाले चाँद से शमशेर का चाँद अलग है। इस पर मैंने विस्तार से लिखा है (उद्भावना - 2011; साखी - 2011)। शमशेर बच्चों के लिए भी एक नई भाषा और एक नया फार्म गढ़ रहे थे। चंद्रमा पर विजय प्राप्त करना जैसा गौरव गीत या या चंदामामा से बतियाना जैसी लोरियों से अलग कविता - सचमुच कविता की ज़मीन बनाने की सोच रहे थे, ऐसी कविता जो बच्चों के नैसर्गिक विकास से जुड़े। जन्म के उपरांत जीवन क्रमशः व्यक्ति में निहित मानवता के विनाश के खिलाफ संघर्ष की प्रक्रिया है। सामाजिक परवरिश और औपचारिक शिक्षा में बहुत कुछ ऐसा है जो हमें अपनी नैसर्गिक अस्मिता से दूर ले जाता है। इसलिए बच्चों के विकास पर गहराई पर सोचने वाले अनेक चिंतकों ने औपचारिक स्कूली शिक्षा की आलोचना की है। एक सचेत कवि से भी यही अपेक्षित है।

भारत के हर क्षेत्र में लोककथाओं, लोकगीतों और स्थानीय 'नॉनसेंस' (पहेलियाँ, चुटकुले, बुझव्वल और इनके अलावा भी यूँ बतरस के लिए प्रचलित) की एक समृद्ध परंपरा रही है। कुछ हद तक बांग्ला जैसी भाषाओं में बाल-साहित्य की मुख्य-धारा में इसने जगह बनाई है। पर हिंदी में यह धीरे-धीरे लुप्त-प्राय हो गई है। इसका मुख्य कारण पारंपरिक सामग्री को बदलती स्थितियों के अनुरूप ढाल पाने में हमारी अक्षमता और अरुचि ही है। पंजाब में लोहड़ी के त्यौहार के दौरान गाया जाता 'सुंदरी वे मुंदरिए...' और मध्य प्रदेश के कई क्षेत्रों में 'पोसम राजा' जैसे अनेक गीतों को इकट्ठा कर उन पर काम किया जाना ज़रुरी है। पर्याप्त ध्यान के बिना ये गीत धीरे धीरे विलुप्त हो जाएँगे। सुवास कुमार और मैंने बांग्ला से सुकुमार राय की प्रसिद्ध कृति 'आबोल ताबोल' का 'अगड़म बगड़म' शीर्षक से अनुवाद किया है जो पिछले वर्ष साम्य पत्रिका के विशेषांक के रूप में प्रकााशित हुआ है। नानसेंस की अच्छी समझ गंभीर साहित्य के लेखन में प्रेरणा का काम करती है। नागार्जुन ('मंत्र' या अन्य कविताएँ), रघुवीर सहाय ('अगर कहीं मैं तोता होता' आदि कविताएँ), सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ('बतूता का जूता' आदि) या अन्य कई कवियों की रचनाओं में हम यह बात देख सकते हैं। अन्यथा गंभीर या वैचारिक सामग्री को रसीले तरीके से सीधे पाठक के अंतस् तक पहुँचाने का इससे बेहतर तरीका और कोई नहीं है। रोचक बात यह है कि 'नॉनसेंस' बच्चों और बड़ों के लिए अलग-अलग अर्थ लिए आता है।

आज का किशोर ही कल के वयस्क साहित्य का पाठक है। हिंदी में पाठक की उदासीनता पर अक्सर चर्चा होती है, पर इसे बाल साहित्य के संदर्भ में कम ही सोचा गया है। यह ज़रूरी है कि हिंदी का हर लेखक या कवि इस पर गंभीरता से और नए आयामों की तलाश के साथ इस पर सोचे। अच्छे बाल-साहित्य के बिना वयस्कों के लिए अच्छे लेखन का होना संभव तो है, पर वह व्यापक नहीं हो सकता।

Tuesday, October 14, 2014

हम मिथक जीते हैं


संशय



हमेशा संशय रहता है
ठीक ही हूँ न?

कितने लोगों को आज सूर्योदय से अगले साल इसी दिन सूर्योदय तक अपनी पहचान बदलनी है? फूल कुतरने की मशीनों की रफ्तार बढ़ती जा रही है। हम मिथक जीते हैं और तय करते हैं कि आज कौन बलि चढ़ रहा है। एक दिन राजकुमार आएगा और राक्षस को मार डालेगा।

राक्षसों ने लाटरियाँ बंद कर दी हैं।
किसी ने दोलन चक्रों पर काम किया है?


(2009; 'नहा कर नहीं लौटा है बुद्ध' में संकलित')

Sunday, October 12, 2014

फिर भी जीना


हो सकता है और है

हो सकता है
दो महीने साथ किसी पहाड़ी इलाके में रहना।
हर सुबह एक दूसरे को चाय पिलाना।
थोड़ी सी चुहल। पिछली रात पढ़ी किताब पर चर्चा।
दोपहर खाना खाकर टहलने निकलना।
घूमना। घूमते रहना।
शाम कहीं बीयर या सोडा पीना।
इन सब के बीच आँगनबाड़ी में बच्चों को कहानियाँ सुनाना।
एक साथ बच्चे हो जाना।

है
बच्चों की बातें सुन कर रोना आना।
बच्चों को देख-देख रोना आना।
रोते हुए कुमार विकल याद आना।
कि 'मार्क्स और लेनिन भी रोते थे
पर रोने के बाद वे कभी नहीं सोते थे।'
फिर यह सोच कर रोना आना
कि इन बातों का मतलब क्या
धरती में नहीं बिगड़ रहा ऐसा बचा क्या।
इस तरह अंदर बाहर नदियों का बहना।
पहाड़ी इलाकों से उतरती नदियों में बहना।
नदियों में बहना खाड़ियों सागरों में डूबना।
कोई बीयर सोडा नहीं जो थोड़ी देर के लिए बन सके प्रवंचना।

फिर भी जीना।
साथ बहते हुए नदियाँ बन जाना।
ताप्ती, गोदावरी, नर्मदा, गंगा
अफरात नील दज़ला
नावों में बहना, नाविकों में बहना।
यात्राओं में विरह गीतों में बहना।
आखिर में कुछ लड़ाइयों में हम जीतेंगे खुद से कहना। 
  (पहल -2013)

Thursday, October 09, 2014

मुझ में एक बाग़ है

सपना

1

महालक्ष्मी कमल पर बैठी थीं 
 
या था सदी का दर्दनाक बुरा सपना

रोशनी कम होती चली, हताशा बढ़ती चली

दिलासा बन कर आते शब्द – आदि सच जग-आदि सच

कर्त्ता-पुरख ब्रह्मा सामने या उनका बनाया पुतला मैं

आज़ाद कायनात को साथ लिए घूमता कायनात भर मैं

जादू कि

ईश्वर उग रहा फटेहाल पसलियों से बच्चों की 
 
कुछ भी स्पष्ट नहीं 
 
स्वर्ग धुँए से भरा भीड़ त्राहि-त्राहि चीखती

मुझे यहीं होना था 
 
प्यार के अकाल में खून से रँगे कमल-दल में डूबता

हाय अंबालिका, मैं नहीं कारण पीत भवितव्य का

कैसे आएगी स्वस्थ संतान

इतना जहर है हमारे चारों ओर।


2

कालिदास नहीं उसकी साँसों से बना मैं

समय बहता रहा मुझमें से नदी की तरह

जागा अपनी सदी में एक और सपने में

मेरे रोओं से वैसी ही बह रही हवा

गंध थी उसमें मृत्यु की

हालाँकि वह अहसास सपने में का था

हर देश हर काल में हर प्राणी बदलता जा रहा

भयावह उस सपने में पेड़-पौधे
 
बन रहे मेरी प्रतिकृति 
 
बिलखते सर पीटते, समूह गान में रो रहे 
 
सूरज उगा या कि छिप रहा 
 
अँधेरा भी रोशनी भी

सपने में जगा मैं बहते समय के साथ

कालिदास, यह कैसा अभिशाप।


यह ज़िद

सुबहो-शाम

'आह से उपजा होगा गान' गाते रहने की

यह घातक चाह


वह जल था या थल

आकाश या पाताल

ज़मीं हरी थी या कि स्याह

साथ कणाद भी थे

थे अल बरूनी 
 
सपने में हम उनकी कथाओं के चरित्र थे


मैं और तुम इकट्ठे रो रहे थे

पहला और आखिरी भी आँसू प्यार का था।


3

यह दंभ भी मुझे ही होना था

नगरपालिका अस्पताल में जन्मा

तय किया कि जीना है कवि सा

कौन देवी आ बैठी अंदर कि 
 
जैसे वैज्ञानिक सपने में देखते हैं कुदरत के रहस्य

अर्थशास्त्री खाताबही में राजनीति 
 
मुझे सपना आया कि बुनने हैं शब्द

रंग, राग, धिन-ता-धिन जैसे शब्द

गुलमोहर के पागल दिनों के शब्द

रोजाना की चीखों से गीले हुए शब्द

सपने में देखा कि सपनों का सागर हैं शब्द 
 
अगर देखता सपना कि मैं बदल रहा पारे को सोने में

या कि बहुत ऊँचा पुल बना रहा हूँ

सो लेता आराम की नींद

आँखें खुलने पर आँसुओं के खारेपन से बच जाता

यह कैसा दंभ बसा मुझमें कि

मेरे दुखों में अनंत का सरगम है


कि मुझे सुकरात के दर्शन से अचंभित होकर 
 
उससे जहर का प्याला छीन लेना है 
 
पीते हुए विष सँकरी गलियों में से गुजरना है

सारे नकाब फाड़ फेंकने हैं

कि ढूँढना है प्यार जो कभी स्थिर न हो

लिखने हैं अपने ही खिलाफ गीत बच्चों के लिए 
 

4

मैं शहर का रुदन गाता हूँ

मेरा आँगन सिकुड़ता चला है

वहाँ चाँदनी नहीं आती

मेरी सड़कों पर गाढ़ी काली धूल है

मेरे सामने पीछे हर पल छैनियाँ चल रही हैं

सुनो यह आवाज बहुत पहले कट चुके पेड़ों की साँस का आना-जाना है

इसमें कहीं न दिखती चिड़ियों की चीं-चीं सुनो


मैं कागा काँव-काँव कविता करता

सदियों से उड़ रहा

शहर में कोई रंग ऐसा दिखला दो

जो न हो थका


मैं कुछ देर छंद अलंकारों से निकलकर बैठना भर चाहता हूँ

अँधेरा होने पर एक बार वर्षों पहले देखे तारों को ढूँढना चाहता हूँ

वह कोना दिखला दो जहाँ न हो रोशनी भरा अँधेरा 

 
 
मेरे दंभ को दिल से न लगाना

मुझ में एक बाग़ भी है


वहाँ आबिदा बुल्ले शाह गाती हैं

और ग़ालिब अपनी पारी का इंतज़ार करते हैं

वहाँ कोई तख्त पर बैठा नहीं है

हरी नर्म घास है सबके लिए


मेरा दिल मयकदा है

नासेह भी झूमते दिखते हैं
 
सचमुच मेरे लफ्ज़ों में डींगें नहीं हैं

जो दिखता है वह देखता हूँ

यही जो तुम्हारा प्यार है, आराध्य है, यही साध्य है


स्तुति या सम्मान नहीं चाहता 
 
वह तो उन पत्थरों जैसे हैं 
 
जिन्हें चुन-चुन कर मैं अपने दिल से निकालता हूँ

जगह बनाता रहता कि तुम थोड़ा और बस जाओ

तुम्हीं से भरा हुआ होता हूँ 
 
जब मुझसे खेलते हैं शब्द ।

(वागर्थ - 2014)

Monday, October 06, 2014

चीखता रहा - प्रेम, प्रेम।


प्रगति


शहर-दर-शहर घूमा। किसकी तलाश में? अचिन इलाकों का अकेलापन चाहा और भीड़ बनता चला। काले बादलों 

से बतियाना चाहा और आँखें उजास से चौंधियाती रहीं। 
 
इतना कुछ, इतना कुछ। 
 

भीड़ में अकेला। उनींदे सपनों में काले बादल। भारी आँखें चमकीली सड़क पर गड्ढे को ताकती खड़ी हैं।

इस तरह सड़क किनारे पड़ा रहा। सड़क में गड्ढे की शुरूआत और अंत के खेल खेलता। भविष्य बेचने आए लोग 

बोलियाँ लगाते रहे। ज़मीं-आस्माँ बेचने वाले कई हैं, कोई अतीत बेच कर भविष्य बेचता है, कोई भाषा बेचना चाहता 

है। हर कोई जो कुछ बेचने का कहता है, उसके पास वह होता नहीं। अतीत बेचने वाले अतीत गढ़ते हैं, ज़मीं-आस्माँ 

बेचने वाले दिखलाते कि वो देखो, तुम कहो तो तुम्हारे नाम लिख दें। भाषा गढ़ने वालों की कारीगरी पर हर कोई मुग्ध। 
 

और और किताबें पढ़ लीं, समाज इतिहास के बारे में नई समझ गढ़ ली। नज़रें गड्ढे को नहीं, उससे परे कहीं जातीं

सड़क किनारे पड़ा हुआ चीखता रहा - प्रेम, प्रेम।


(पाखी - 2013)

Saturday, October 04, 2014

मैंने उसे है चाहा


जब कोई पक्षी न बचेगा


जब कोई पक्षी न बचेगा

किसमें पूर्वजों को ढूँढूँगा 
 
न दिखेगी कोई चिड़िया 
 
तो किसे बहन कहकर पुकारूँगा

किससे करूँगा प्यार और किससे नाराज़ होऊँगा।


उसे चाहा

जैसे चाहता हूँ स्वास में शुद्ध हवा 
 
उस के लिए विशेषण क्रिया-विशेषण नहीं ढूँढूँगा।

वैसे कौन सा विशेषण सही होगा 
 
जाफना की स्त्री के लिए जिससे मैंने प्रेम किया 
 
ईराकी फिलस्तीनी स्त्रियों के बारे में भी कहता हूँ 
 
कि उनको चाहा

जैसे चाहता हूँ बादल में पानी या दरख्त की छाया


सुनता हूँ अचिन पाखी की कूक में 
 
कि कौन महाद्वीपों को लाँघकर कहने आएगा

कि प्यार को चाहिए जीना

चाहिए कुछ न कुछ गाते रहना। 
 

जवान उसे चाहा 
 
वयस्क उसे चाहा 
 
सड़क पर लहूलुहान 
 
वह मेरे घर लड़ रही

चिड़ियों की लड़ाई


बावजूद इसके कि हर शहर ने चीर डाला

कि वह विवस्त्र खड़ी हो गई

उससे सीखता हूँ कि पेड़ की छाया जिऊँ

कि उसकी शाखाओं में मेरे पूर्वजों ने घर बनाए हैं


बादलों के बीच में से 
 
उतरता कौन आखिरी पेड़ से बतियाने आएगा 
 
ठूँठ भले ही, कंधों पर कौन बैठेगा मेरे 
 
किससे प्यार करूँगा 
 
किसके लिए गीत गाऊँगा

गोल गोल रानी इत्ता इत्ता पानी किसे सुनाऊँगा।


वह खेत-मजूर 

वह मिट्टी से खेलती 
 
खुरदरी उँगलियाँ 
 
मन-पाखी छूतीं

वह वैज्ञानिक 

शोध करती 
 
वह कविता लिखती

दिखलाती 
 
कि दिनों बाद सही, गौरैया दिखी है। 
 

मुझमें 
 
आखिरी पक्षी की कहानी कहती

मैंने उसे है चाहा।

(पाखी - 2013)