Monday, November 24, 2014

आह, जो सबसे सादा है, वही उसके लिए खूबसूरत है



साहिल के पास नहा रहे हैं युवक अट्ठाईस,


परस्पर स्नेह में बँधे हुए युवक अट्ठाईस;


स्त्री जीवन और हा, इतने एकाकी वर्ष अट्ठाईस।




वह तट के पास की चढ़ाई पर बने खूबसूरत मकान की मालकिन है,


खिड़की के पर्दे के पीछे, सजी-धजी, सुंदर वह छिपी खड़ी है।




युवकों में से कौन उसे सबसे ज्यादा भाता है?


आह, जो सबसे सादा है, वही उसके लिए खूबसूरत है।



कहाँ चल पड़ी, भद्रे? मुझसे नहीं छिप पाओगी,

देखता हूँ तुम्हें पानी छपकाते, जबकि अपने कमरे में अनछुई खड़ी हो।




उनतीसवीं नहानेवाली साहिल पर आई नाचती, खिलखिलाती,


और किसी ने उसे नहीं देखा, पर उसने सबको देखा और


उनसे प्यार किया।




युवकों की दाढ़ियाँ गीली चमक उठीं, उनके लंबे बालों से पानी बह चला,


उनके शरीरों पर चारों ओर छोटी-छोटी नहरें बहने लगीं।




एक अदृश्य हाथ भी उनके बदनों पर से गुजरा,


काँपते हुए वह उनकी कनपटियों और पसलियों से उतरा।




युवक पीठ पर लेटे तैरते हैं, उनके गोरे पेट सूरज की ओर फूल गए हैं, वे पूछते 

नहीं कि कौन उनको जकड़े हुए है,


वे जानते नहीं कि कौन है जो तिरछी पीठ आगे पीछे लहराते हुए हाँफ रहा है.


वे सोचते नहीं कि वे किसपर पर पानी छिड़क रहे हैं।




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  वाल्ट ह्विटमैन की लंबी कविता 'सॉंग ऑफ माईसेल्फ' के दो हिस्सों का अनुवाद

मई में पोस्ट किया था। 'सदानीरा' के ताज़ा अंक में उन दो के साथ कुछ और 

हिस्सों का अनुवाद आया है। ऊपर की कविता उन्हीं में से एक है। एक छोटा 

  आलेख साथ में है - वह अगली बार।
 
 

Friday, November 21, 2014

रब तो यार के दिल में है


बुझाए न बुझे


एक वक्त था, बहुत पहले नहीं - बस सौ साल पहले, जब भारत में अधिकतर शादियाँ बीस की उम्र के पहले हो जाती थीं। गाँवों में लड़के की उम्र बीस होने तक बच्चे पैदा हो जाते थे। वह स्थिति बच्चों और माँ-बाप दोनों के लिए बहुत अच्छी नहीं थी। स्त्रियों के लिए वह आज से बदतर गुलामी की स्थिति थी। यह अलग बात है कि कई लोग उन दिनों के जीवन में सुख ढूँढ़ते हैं और आधुनिक जीवन को दुखों से भरा पाते हैं। जैसा भी वह जीवन था, एक बात तो जाहिर है कि प्राणी के रुप में मानव के जीवन में किशोरावस्था से ही शारीरिक परिपक्वता के ऐसे बदलाव होते हैं कि जैविक रूप से वह यौन-संपर्क के लिए न केवल तैयार, बल्कि बेचैन रहता है। इस बात को यौन-संबंधित साहित्य या दृश्य-सामग्री का व्यापार करने वाले अच्छी तरह जानते हैं। हिंसक शस्त्रों और यौन-संबंधित सामग्री का व्यापार ही आज की आर्थिक दुनिया के सबसे बड़े धंधे है। अरबों-खरबों की तादाद में डालर-यूरो-येन और बिटसिक्कों का लेन-देन इन्हीं दो क्षेत्रों में होता है।

पता नहीं कैसे हमें कुदरत के नियमों के विपरीत यह बात समझा दी गई कि भले लोग खासी उम्र तक यौन-संबंध से परहेज करते हैं। खूब ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ा। कुछ तो हमारी अपनी परंपरा में था, कुछ ऐतिहासिक कारणों से मिला। पर इस कुछ से अलग परंपरा में और भी बहुत कुछ रहा है। मुक्त-प्रेम को धार्मिकता के साथ जोड़ कर कुदरत की इस अनोखी देन – प्रेम – को जिस तरह हमारी परंपरा में देखा और जाना-समझा गया है, ऐसा और कहाँ है। शंकर के सौंदर्यलहरी से लेकर सूर के कृष्णकाव्य तक जैसे अनोखे मिथक हमारी हर भाषा में गढ़े गए हैं। अनपढ़ लोग इस खुलेपन को पश्चिम की देन कहते रहते हैं, जबकि आज के हमारे समाज जैसी ही कुंठित स्थिति कभी पश्चिमी देशों में भी थी। नब्बे साल पहले व्हिलहेल्म राइख़ नामक एक ऑस्ट्रियन मनश्चिकित्सक ने 'द सेक्सुअल स्ट्रगल इन यूथ' (युवाओं में यौनिकता के मुश्किलात) नामक किताब लिख कर वहाँ मौजूद कुंठा के माहौल के खिलाफ शंखनाद किया था। रोचक बात यह है कि यौनिकता पर रोक लगाकर कुदरती प्रक्रियाएं रुकती नहीं हैं। यह बात हमारे यहाँ भी उतनी ही सही है जितनी कहीं और। इसीलिए तो अभिसारिका और शृंगार के विवरणों से हमारा साहित्य भरा पड़ा है। वारेन बीटी की प्रसिद्ध फिल्म 'रेड्स' में हेनरी मिलर एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि उस जमाने में भी अमेरिका में जिस्मानी संबंध खूब थे, बस यही कि उन्हें सामाजिक मान्यता न थी। फ्रांस जैसे देश में रहते हुए भी मारी कूरी जैसी नोबेल विजेता को अपने पति की मौत के कुछ साल बाद साथी वैज्ञानिक लाँजवाँ के साथ प्रेम की वजह से कई यातनाएँ सहनी पड़ी थीं।

बड़ी आलमी जंगों का एक असर यह था कि पश्चिम में इन जड़ताओं के टूटने में आसानी रही। बीसवीं सदी के बीचोंबीच उन मुल्कों में भारी बदलाव आए। ब्रह्मचर्य को कुंठाओं से जोड़ कर देखा जाने लगा। पर बदलाव ऐसे अपने-आप तो आने न थे। साठ के दशक में युवाओं ने हल्ला बोला और जिस्मानी-प्रेम का परचम बुलंद हो गया। एक दशक में ही कालेजों-विश्वविद्यालयों में युवाओं में यौन-संबंधों पर पूरी तरह रोक से हटकर पूरी छूट की स्थिति बन गई। अब बात इतनी रह गई थी कि युवाओं को यौन-संबंधों से होने वाले मानसिक और शारीरिक समस्याओं के लिए कैसे तैयार किया जाए। अनचाहे गर्भ से युवा स्त्रियों को कैसे बचाया जाए। स्कूलों कालेजों में बड़े पैमाने पर यौन-शिक्षा शुरू हुई। साहित्य, कला आदि हर क्षेत्र से यौनिकता की अभिव्यक्ति पर से पाबंदी हटी। जनांदोलनों ने यौन-शिक्षा के परचे निकाले। स्त्रियों ने खुलकर यौनिकता पर बातें शुरू कीं। बॉस्टन विमेन्स ग्रुप की स्त्रियों द्वारा स्त्रियों के बारे में 'आवर बॉडीज़ आवरसेल्व्स' (हमारे शरीर और हम) जैसी किताब लिखी गई। अब स्थिति ऐसी है कि उन मुल्कों में युवाओं में स्नेह से लेकर संभोग तक प्रेम की हर संभावना को स्वीकृति है। अगर कोई इस पर सवाल खड़ा करे तो उसे सिरफिरा ही माना जाएगा। और हमारे यहाँ के संस्कृति के ठेकेदारों के तमाम फतवों के बावजूद उन मुल्कों में कोई भयानक अस्थिरता नहीं दिखती। संबंध बनते और टूटते हैं, पर ऐसी मारकाट वहाँ नहीं दिखती जितनी हमारे यहाँ है।

पश्चिमी देशों में ये बदलाव समाज में पहले बड़े शहरों मे, फिर धीरे-धीरे अंदरूनी इलाकों में हुए। कालेज कैंपसों में पुराने अनुशासन का विरोध हुआ, पर वह समाज से अलग नहीं था। जैसे-जैसे समाज बदला, कैंपस का माहौल भी बदला। हमारे यहाँ स्थिति कुछ और है। यहाँ कैंपस सरगर्म हैं। कुछ हद तक खुला माहौल है। व्यवस्था अभी बदली नहीं है, पर कई संस्थानों में प्रबंधन युवाओं में संबंधों को उदारता के साथ देखते हैं। यह सही है कि यौनिकता का खुला प्रदर्शन नहीं है, पर पहले की तुलना में माहौल काफी उदार है। कैंपस से बाहर समाज में कुंठाओं का समुद्र है। एक ओर तो सच्चाई यह है कि पुरुषों में जिसको मौका मिलता है, एम एम एस में हर तरह का यौन-प्रदर्शन देख रहा है। आभासी दुनिया में जिस्म के कारोबार का बाज़ार बढ़ता जा रहा है। हिंसा बढ़ रही है। सभ्य शालीन माने जाने वाले पुरुषों में भी कई, पेशे में अपने वरिष्ठ पद से मिली ताकत का ग़लत फायदा उठाकर, स्त्रियों पर ज़बरन अपनी यौनेच्छा थोपते हैं। वयस्क स्त्रियाँ ही नहीं, बच्चों तक पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। दूसरी ओर मजाल क्या है कि आप संबंधों में खुलेपन की बात कर लें। कहीं संगठित खाप हैं तो कहीं अकेला मर्द सीना पीट रहा है। कोई सेना का तो कोई संघ का सिपाही है, जो स्वस्थ संबंधों पर हमला करने के लिए अपने एम एम एस को रोक कर सड़क पर उतरा है। खुले प्रेम को चुनौती देती ललकार यह कि हम बलात्कार करने आ रहे हैं।

जिन भले लोगों के समर्थन की वजह से आज ये हिंसक ताकतें इतनी मुखर हैं, उनमें से कइयों को अचंभा होता है। कैसे लोगों को सत्ता दे दी। पर क्यों, क्या उन्हें सूचनाओं की कमी थी, क्या वे इन ताकतों के बारे में नहीं जानते थे?आज अचंभे में डूबे ये लोग भूल गए हैं कि जानबूझ कर ही इन्हें सत्तासीन किया था, तब ऐसा लगता नहीं था कि लघु-संख्यकों के अलावा ये किसी और पर भी हमला करेंगे। जब तक हम खुद लघु-संख्यक समुदाय के नहीं हैं तो क्या फिक्र। उनकी नीतियों से हम प्रभावित नहीं होते और ग़रीब-गुरबे छले जा रहे हैं तो हमें क्या! अब भी वे भले लोग प्रधानमंत्री पर बहस करते हैं, कि बयानबाजी से अलग सरकार ने क्या कुछ किया आदि। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने सचमुच बहुत कुछ कर दिया है, जैसा उनसे अपेक्षित था, वे करते जा रहे हैं। पूँजी की लूट और सांप्रदायिक जहर का घोल उनका धर्म है, वे और उनके परिवार के सदस्य मजे से वह खेल खेल रहे हैं। साथ में वह सारी कुंठित भीड़ खूँखार होती जा रही है, जिनको एम एम एस में जिस्मों की चीरफाड़ देखने के अलावा सिर्फ ऐसे मौकों की तलाश है कि वे कब किसी अकेली स्त्री या कमजोर बच्चे पर हमला कर सकें। स्त्री को वस्तु मात्र नहीं, बल्कि उसे अपनी कुंठाओं का लक्ष्य मानना इन लोगों की मजबूरी है। ये भयंकर बीमार लोग हैं। इसलिए वे प्रेम के दुश्मन हैं।

प्रेम – स्नेह से संभोग तक – प्राणियों को कुदरत की सबसे अनोखी देन है। आखिर हममें से हर कोई धरती पर अपने माँ-बाप के जिस्मानी उन्माद से ही आया है। शरीरों का वह मिलन इतना खूबसूरत है कि हम देवी-देवताओं तक को जिस्मानी प्रेम में लिप्त देखना चाहते हैं। सूफी मत में इश्क ही मोक्ष का साधन है। भक्ति में खोया प्रेमी पूछता है कि मैं बीच सड़क में खड़ा उलझन में हूँ कि एक ओर तो रब का घर है और दूसरी ओर यार का, मैं किधर जाऊँ। आखिर वह यार को चुनता है क्योंकि रब तो यार के दिल में है। उसमें किसी को अगर कुछ ग़लत दिखता है तो वह अपना इलाज़ करवाए।

आज जब चारों तरफ से जिस्म का कारोबार हमारी संवेदना को हर तरह से खोखला करता जा रहा है, यह सोचने की ज़रूरत है कि युवाओं में प्रेम की माँग को हम कैसे देखें। हमें इस बात को समझना होगा कि युवाओं में प्रेम एक स्वस्थ प्रवृत्ति है, और इस समझ के साथ हमें स्कूलों कालेजों में ऐसे इंतज़ाम करने होंगे कि युवा मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें और अपने संबंधों की वजह से जीवन के दूसरे पहलुओं को बिगड़ने न दें। हमें युवाओं से यह भी कहना होगा कि प्रेम के बगैर जिस्मानी संबंध जीवन को अँधेरे की ओर धकेलता है। यह भी कि हम अपनी परंपरा को जानें - टी वी और विकीपीडिया से नहीं, जरा मेहनत करें और पुस्तकालयों में जाकर पढ़ें कि शिव ने पार्वती की स्तुति में क्या कहा है, भ्रमर गीत पढ़ें, लोगों से जानें कि हमारी लोक परंपराओं में प्रेम का क्या महत्त्व है। आखिर क्या वजह है कि हीर-राँझा, सोहनी-महीवाल या शीरीं-फरहाद आज भी गाँवों में गाए जाते हैं। और अंग्रेज़ी में नहीं, भारतीय भाषाओं में पढ़ें। अंग्रेज़ी में प्यार भी क्या प्यार है!

सांस्कृतिक फासीवाद अभी पूरी तरह हावी हुआ नहीं है। उसके पंजे लगातार बढ़ते चले आ रहे हैं। संवेदना की घोर कमी ने ऐसा सांप्रदायिक माहौल बनाया है कि हम अपने ही रचे झूठ में फँसते जा रहे हैं। समाज के दबे कुचले, मेहनतकश तबकों को भड़का कर एक दूसरे के साथ भिड़ंत करवा कर एक के बाद एक चुनाव जीतने की कोशिशें हैं। जब व्यवस्था पर निरंकुश नियंत्रण हो जाएगा, तब ये क्या करेंगे? कुंठित ताकतें खुला प्रेम नहीं सह सकतीं। युवाओं को यह समझना होगा कि हमारा भविष्य दुरुस्त और खुशहाल हो, उसके लिए हमें इन कुंठित ताकतों के खिलाफ लड़ना होगा। अभी ज़ुल्म की शुरूआत है। वे हमारी शक्लें, हमारे पहनावे, हमारी ज़ुबान, हमारे विश्वास, हमारी हर साँस पर हमला करेंगे। आखिरी जीत प्रेम की होगी, पर उसके पहले जो तबाही होने वाली है, उसकी कल्पना से आतंक होता है। इसलिए युवाओं को संगठित होना होगा कि इस हमले के खिलाफ आवाज़ उठाएँ। यह लड़ाई सिर्फ कैंपसों में रहकर नहीं लड़ी जाएगी, इसे व्यापक समाज में फैलाना होगा। प्यार की प्रतिष्ठा के लिए उनके खिलाफ भी आवाज़ उठानी होगी जो प्यार और चाहत को शोषण का जरिया बनाते हैं। यह समझना होगा कि संस्कृति के ठेकेदारों को उस बहुराष्ट्रीय जिस्मानी धंधे से कोई एतराज नहीं जिनसे उन्हें फायदा मिलता है। नहीं तो देश में हर साल ग़रीबी से लाचार हजारों युवा किशोरियाँ बिकती हैं, उसके खिलाफ ये फतवेबाज कभी कुछ क्यों नहीं करते। इन्हें प्रेम से एतराज है क्योंकि प्रेम हमारी गायब होती मानवता को वापस ले आता है। प्रेम हमें अन्याय के खिलाफ सचेत करता है। प्रेम में रोते हुए हम हर उत्पीड़ित का दुख अपनाने लगते हैं। इसी मानवता को फासीवादी सह नहीं पाते। वे प्रेम के खिलाफ धर्म, जाति और हर तरह के रस्मों की दीवारें खड़ी करते हैं। पर बकौल ग़ालिब - ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे

Thursday, November 13, 2014

बात कहो जो बादल बादल हो


 बच्चों के लिए लिखी यह कविता 'चकमक' के ताज़ा अंक में आई है। 

बात कहो

एक बात कहो जो धरती जितनी बड़ी हो
एक बात कहो जो बारिश जैसी गीली हो
एक बात कहो जो माँ जैसी सुंदर हो
एक बात कहो जो संगमरमर हो

एक बात कहो जो आग जैसी गर्म हो
एक बात कहो जो पानी जैसी नर्म हो
एक बात कहो जो बादल बादल हो
एक बात कहो जो बिल्कुल पागल हो

बात जो दिन हो रात हो
बात जो बातों की बात हो
बात इक ऐसी बेबात हो
एक बात कहो एक बात कहो।
                                                 (चकमक - 2014)

Tuesday, November 04, 2014

गो ग बा ब - 4


(पिछली किश्त से आगे - आखिरी किश्त) 

आखिर उन्होंने गोपी से कहा, "गोपी! बड़ी मुसीबत में पड़ गया हूँ, पता नहीं क्या होगा। शुंडी का राजा मेरा राज्य छीनने आ रहा है।" शुंडी का राजा वही था, जिसने गोपी और बाघा को जलाकर मारना चाहा था। उसका नाम सुनते ही गोपी के दिमाग में एक चाल सूझी। उसने राजाजी से कहा, "महाराज ! आप इसकी चिंता न करें, आप इस गुलाम को हुक्म दें, मैं इसे एक मजाक बनाकर छोडूंगा।" राजा ने हँसकर कहा, "गोपी, तुम गवैये-बजैये हो, जंग-लड़ाई के पास नहीं फटकते, इसके बारे में तुम क्या समझोगे? शुंडी के राजा की बहुत बड़ी सेना है, मैं उसका क्या बिगाड़ सकता हूँ?" गोपी बोला,"महाराज, आदेश दें तो एक बार कोशिश कर सकता हूँ। कोई नुकसान तो नहीं है।" राजा बोले, "जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, तुम कर सकते हो।" यह सुनकर गोपी फूला न समाया, उसने बाघा को बुलाया और सलाह-मशविरा शुरू किया। 
 
गोपी और बाघा उस दिन बड़ी देर तक सोच-विचार करते रहे। बाघा उत्साह से भरपूर था। वह बोला, "भैया, हम कुछ न कुछ करके ही रहेंगे। मुझे बस एक बात का डर है, अगर अचानक जान बचाकर भागने की ज़रुरत हो, तो शायद मैं जूतों की बात भूलकर आम लोगों कि तरह दौड़ने लगूँगा और फिर मुझ पर बुरी तरह मार पड़ेगी। इसी तरह उस बार हमारे गाँव के मूर्खों ने मेरा हुलिया ही बिगाड़ दिया था!" 
 
खैर, गोपी के समझाने पर बाघा का डर कम हुआ। दूसरे दिन से उन्होंने काम शुरू किया। कुछ दिनों तक वे रोज़ रात को शुंडी जाते रहे, और राजाबाड़ी के आसपास घूमकर वहाँ की खबरें इकट्ठी करते रहे। जंग का इंतज़ाम उन्होंने देखा, वह बड़ा भयंकर था; ऐसा इंतज़ाम लेकर अगर हाल्ला में जा पहुँचें, तो बचना मुश्किल है। राजा के मंदिर में रोज़ धूमधाम से पूजा हो रही है। दस दिनों तक इस तरह पूजा करने के बाद भगवान को खुश कर वे हाल्ला को रवाना होंगे। 
 
गोपी और बाघा ने यह सब देखा; फिर एक दिन अपने कमरे में बैठ, दरवाज़ा बंद कर, भूतों की दी हुई उस थैली से कहा, "नए किस्म की मिठाइयाँ चाहिए, खूब स्वादिष्ट।" इस पर उस थैली से जो मिठाइयाँ निकलीं, वह कहकर समझाया नहीं जा सकता। ऐसी मिठाइयाँ पहले किसी ने कभी नहीं खाईं, आँखों से भी नहीं देखी इन मिठाइयों को लेकर बाघा और गोपी शुंडी के राज के बड़े मंदिर के शिखर पर जा बैठे। नीचे खूब पूजा की धूम थी--बेहद धूप-धूनी शंख-घंटा शोरगुल चल रहा था, आँगन लोगों से खचाखच भरा हुआ था। उन सब लोगों के सिर पर धड़ाम से सारी मिठाइयाँ डालकर, बाघा और गोपी भी मंदिर के शिखर पर जमकर बैठ तमाशा देखने लगे। अँधेरे में उस धू-धूनी और प्रकाश के धुँए में कोई उन्हें देख न पाया। 
 
मिठाइयाँ आँगन में गिरते ही शोरगुल रुक गया। कई लोग कूद पड़े, कोई-कोई तो चीख कर दौड़ भी लिए। उसके बाद दो-चार साहसी लोग कुछ मिठाइयाँ उठाकर, डरते-डरते रोशनी के पास ले जाकर उन्हें देखने लगे। अंत में उनमें से एक ने आँखें बंद कर थोड़ा सा मुँह में डालते ही -फिर क्या था -- वह दोनों हाथों से आँगन से मिठाइयाँ उठाकर मुँह में डाले नाचने लगा और ख़ुशी से चीखने लगा। तब उस आँगन पर सभी लोग मिठाइयाँ खाने के लिए पागलों की तरह छीना-झपटी कर हो-हल्ला करने लगे। 
 
इसी बीच कुछ लोगों ने दौड़कर जाकर राजाजी से कहा, "महाराज! ईश्वर ने आज पूजा से संतुष्ट होकर स्वर्ग से प्रसाद भेजा है। वह इतना बढ़िया प्रसाद है कि हम बतला भी नहीं सकते।" यह बात सुनते ही राजा चड्ढी पहनते-पहनते लम्बी-लम्बी साँसें लेते जी-जान से दौड़ते मंदिर आए।

पर हाय! तब तक सारा प्रसाद ख़त्म हो गया था। सारे आँगन में झाड़ू लगाकर भी राजाजी के लिए प्रसाद का ज़रा सा चूरा भी नहीं मिला। तब उन्होंने बड़े गुस्से में कहा, "तुम लोग बड़े जाहिल हो! मैं पूजा करूँ और प्रसाद खाकर ख़त्म करते हो तुम! मेरे लिए ज़रा सा चूरा भी नहीं रखा! तुम सबको पकड़कर शूली पर चढाऊँगा!" यह सुनकर सबने डरते-डरते हाथ जोड़कर कहा, "दुहाई हो महाराज! हम आपका प्रसाद खाकर भला क्यों ख़त्म करें? अजीब बात है! हमने खाने की कोशिश भर की थी, पता नहीं कैसे झट से ख़त्म हो गया! आज हमने जो प्रसाद खाया, उसके लिए आप हमें माफ़ कर दें, कल जो भी प्रसाद मिलेगा वह महाराज अकेले ही खाएँगे। तब राजा ने कहा, "अच्छा, ऐसा ही होगा। खबरदार! भूल मत जाना।"

अगले दिन राजाजी प्रसाद खाएँगे, इसीलिए पहले पहर से ही वे मंदिर के आँगन में बैठकर आकाश की ओर ताककर बैठे थे। बाकी सब लोग डरे हुए थोड़ी दूर बैठकर उनको घेरकर तमाशा देख रहे थे। आज पूजा का ड़ं और दिनों की अपेक्षा सौ गुना अधिक था। सब सोच रहे थे कि भगवान खुश होकर राजाजी को और भी बढ़िया प्रसाद देंगे। 
 
आधी रात के वक़्त गोपी और बाघा और भी बढ़िया किस्म की मिठाइयाँ लिए मंदिर के शिखर पर आ बैठे। आज उन्होंने और भी बढ़िया कपड़े पहन रखे थे, सर पर मुकुट, गले में हार, हाथों में कड़े, कानों में कुंडल; वे देवता बनकर आये थे। 
 
धुएँ की वजह से कुछ दिखलाई नहीं पड़ रहा था, फिर भी राजाजी आकाश की ओर ताकते हुए बैठे हुए थे। इसी वक़्त्त गोपी और बाघा ने हँसते-हँसते उनके ऊपर उन मिठाइयों को फेंक दिया। इस पर पहले तो राजाजी चीखकर तीन हाथ ऊँचाई तक कूद पड़े, फिर जल्दी ही सँभलकर वे दोनों हाथों से मिठाइयाँ मुँह में डालने लगे, फिर झूम-झूम कर वाह कैसा नाच उन्होंने नाचा!
ठीक उसी वक्त गोपी और बाघा अचानक मंदिर के शिखर से उतर कर राजा के पास आ खड़े हुए। उनको देखकर सब 'भगवान आए' कहकर कौन पहले प्रणाम करे, सोचकर तय नहीं कर पा रहे थे। राजाजी तो लम्बे होकर ज़मीं पर लेट ही गए और केवल सिर ठोकते जा रहे थे। गोपी ने उनसे कहा, "महाराज! तुम्हारा नाच देखकर हम संतुष्ट हुए हैं; आओ अब ज़रा गले मिल लें।" राजा ने यह सुना क्या, उन्हें तो जैसे हाथों में स्वर्ग मिल गया, देवता के साथ गले मिलना, यह कोई कम सौभाग्य की बात थी!

गले मिलना शुरू हुआ। सभी लोग 'जय हो, जय हो' कहकर चीखने लगे। तभी मौका पाकर गोपी और बाघा ने राजाजी को अच्छी तरह बाँहों में जकड़कर कहा, "तो अब अपने कमरे में चलें!" ऐसा कहते ही वे लोग उनको साथ लिए अपने कमरे में आ उपस्थित हुए। मंदिर के आँगन में लोग काफी देर तक मुँह खोले आकाश की ओर ताकते रहे। इसके बाद राजाजी और लौटकर नहीं आए, तब वे अपने-अपने घर लौट आए और बोले, "कितने आश्चर्य की बात देखी ! राजाजी जिंदा स्वर्ग चले गए! देवता लोग खुद उन्हें लेने आए थे!"

इधर राजाजी गोपी और बाघा की गोद में बेहोश पड़े हुए थे। उनके कमरे में आकर भी बहुत देर तक उनको होश नहीं आया। जब भोर हुई तो उनकी आँखें खुलीं, और उन्होंने देखा कि वे दो भूत उनके सिर पर बैठे हुए हैं। वे झट उनके पैरों पर गिर पड़े और काँपते-काँपते बोले, "तुमसे प्रार्थना करता हूँ! मुझे मत खाना। मैं दो सौ भैंसे बलि चढ़ाकर तुम्हारी पूजा करूँगा।" गोपी बोला, "महाराज, आपके डरने की कोई बात नहीं है। हम भी भूत नहीं हैं, आपको खाने की भी कोई मंशा हमारी नहीं है।" राजाजी को इससे ज़रा भी भरोसा नहीं हुआ। वे और कुछ न कहकर सिर छिपाकर काँपने लगे। 
 
इधर बाघा ने आकर हाल्ला के राजा से कहा, "कल रात हमलोग शुंडी के राजा को पकड़ लाए हैं। अब आपका क्या आदेश है?" हाल्ला के राज बोले, "उन्हें ले आओ!"

जब दोनों राजाओं की मुलाक़ात हुई तो शुंडी के राजा को पता चला कि उनको पकड़ कर लाया गया है। हाल्ला को जीतना तो उनके भाग्य में रहा ही नहीं, अब जान पर भी बन आई है। पर हाल्ला के राजा ने उनको जान से नहीं मारा, सिर्फ उनका राज्य छीन लिया। इसके बाद गोपी और बाघा से बोले, "तुम्हीं लोगों ने मुझे बचाया है, नहीं तो मेरा राज्य भी जाता और जान भी जाती। मैं तुम्हारा क्या भला कर सकता हूँ? शुंडी-राज्य का आधा तुम्हें दे रहा हूँ और अपनी दो बेटियों की शादी तुम्हारे साथ करना चाहता हूँ। 
 
फिर खूब धूम मची। गोपी और बाघा हाल्ला के राजा के दामाद होकर और शुंडी का आधा राज्य पाकर परम आनंद के साथ संगीत-चर्चा करते रहे। तब गोपी के माँ-बाप जैसा सुख और किसे मिल सकता था?



Monday, November 03, 2014

गो ग बा ब - 3


(पिछली कड़ी से आगे)
यह कहकर उसने भूतों की दी हुई उस थैली में हाथ डालकर कहा, "लाओ यार, एक हंडिया पुलाव लाओ" तुरंत ऐसी एक सुगंध चारों ओर फैल गई ! ऐसा पुलाव आमतौर पर राजा लोग भी नहीं खा पाते। और वह ऐसी एक बड़ी हंडिया थी! गोपी की क्या औकात कि उसे थैले में से निकाल बाहर करे! खैर, किसी तरह उसे बाहर निकाल लिया और थैली से कहा, "तले व्यंजन, चटनी, मिठाई, दही, रबड़ी, शरबत! तुरंत, तुरंत लाओ !" देखते-देखते खाने की चीज़ों और सोना-चादी के बर्तनों से घर भर गया। आखिर दो लोग कितना खा सकते थे? इतना बढ़िया खाना खाकर उनका दुःख न जाने कहाँ उड़ गया।
तब बाघा बोला, "भैया, चलो इसी वक़्त यहाँ से भागते हैं, नहीं तो कुत्तों से नुचवाएँगे?
"अरे सब्र करो, देखते हैं क्या होता है।" यह सुनकर बाघा बड़ा खुश हुआ। वह समझ गया कि गोपी भैया कुछ मजेदार वाकया करने वाले हैं।
दो दिन हो गए, और उनकी सजा सुनाने में एक दिन बाकी रह गया। सुनवाई के दिन रात-ही-रात गोपी ने थैले में हाथ रख कहा, "हमें राजवेश चाहिए।" ऐसा कहते ही उसमें से इतने बढ़िया कपड़े निकले कि कोई सोच ही नहीं सकता था। दोनों ने वे कपड़े पहने और उन बर्तनों की एक पोटली बनाई, फिर जूते पहनकर बोले, "अब हम मैदानों में हवा खाने जाएँगे।" बस, आँख खुली तो देखा कि राजबाड़ी के बाहर बहुत बड़े एक मैदान में आ गए हैं। उस मैदान में एक जगह अपनी पोटली छिपाकर, घूमते-घामते वे राजबाड़ी के सामने आ खड़े हुए।
दूर से ही उन्हें आते देखकर राजा के लोगों ने दौड़कर उन्हें खबर पहुंचाई, "महाराज, दो राजा आ रहे हैं।" यह सुनकर राजा भी अपने फाटक पर आ खड़े हुए थे। ज्यों ही बाघा और गोपी पहुँचे, वे उन्हें बड़े सम्मान के साथ महल के अन्दर ले गए। एक बहुत बढ़िया कमरे में उनके ठहरने का प्रबंध हुआ। कितने नौकर ब्राह्मण, प्यादे, सेवादार उनकी सेवा में लग गए, इसका अंत न था।
इसके बाद गोपी और बाघा हाथ-मुँह धो नाश्ता कर ज़रा आराम से बैठे, तो महाराज उनकी खबर लेने आये। उनका पहनावा देखते ही उन्होने सोच लिया कि 'पता नहीं कितने बड़े राजा हैं!' फिर अंत में जब उन्होने गोपी से पूछ लिया कि "आप लोग किस देश के राजा हैं?" तो गोपी ने हाथ जोड़कर कहा, "महाराज! हम राजा कैसे? हम तो आपके नौकर हैं !"
गोपी ने सच ही कहा था, पर राजा को इस पर यकीन न हुआ। उन्होंने सोचा, "कितने अच्छे लोग हैं, कैसी नम्रतापूर्वक बातें करते हैं। जितने बड़े राजा हैं, उतने ही सभ्य भी हैं।" उस वक़्त्त अधिक कुछ न कहकर उन दोनों को वे सभा में ले आए। उस दिन वहाँ उन दोनों लोगों को सजा सुनाई जानी थी।- तीन दिनों पहले जो उनके सोने के कमरे में घुस गए थे। अदालत का समय हो गया, उन दो असामियों को लाने प्यादे भेजे गए; पर उनको वे अब कहाँ ढूँढें? इन तीन दिनों तक उनके कमरे पर ताला लगा हुआ था, जब ताला खोला गया तो देखा गया, वहाँ कोई नहीं है, खाली कमरा पड़ा हुआ है।
तब ज़बर्दस्त दौड़धूप और अफरा-तफरी शुरू हो गई। दरोगाजी बड़े परेशान होकर प्यादों को डाँटने लगे। प्यादों ने हाथ जोड़कर कहा, "हुजूर ! हमारा कोई कसूर नहीं, हम लोगों ने ताला लगाकर रखा था, इसके अलावा शुरू से दरवाज़े के सामने खड़े भी थे। वे दो लोग इंसान तो थे नहीं, वे भूत थे; नहीं तो इसमें से निकलकर वे भागे कैसे?"
इस बात पर सबको यकीन हुआ। पहले महाराज भी दरोगा पर बिगड़कर उसका गला ही कटवा देने को थे, पर अंत में यह बात सुनकर बोले, "हाँ, वे लोग ज़रूर भूत ही थे। मेरा कमरा भी तो बंद था, उसमें इतना बड़ा ढोल लेकर कैसे आए।
यह सुनकर सबने कहा, "हाँ, हाँ, ठीक, ठीक, वे दोनों भूत थे !" कहते-कहते उनके शरीर काँपने लगे। बदन से पसीना बहने लगा। तब बाघा के उस ढोल की बात याद कर वे बोले, "महाराज ! भूत का ढोल बड़ी खतरनाक चीज़ है। उसे कभी भी अपने कमरे में न रखें। उसे अभी जला दीजिए। "
महाराज भी बोले, "बाप रे! भूत का ढोल कमरे में पड़ा है? तुरंत उसे जला दो।"
महाराज ने जैसे ही यह बात कही, तुरंत बाघा दोनों आँखें ढँके, "आय-हाय- हाय आय" चीखकर रोते-रोते लोटपोट होने लगा।
उस दिन बाघा को सँभालने में गोपी को बड़ी दिक्कत हुई। ढोल जलाने की बात होते ही बाघा ने रोना शुरू कर दिया, अगर वे ढोल लाकर आग ही लगा दें, तो पता नहीं वह क्या कर बैठेगा! तब वह ढोल उसी का है, इस बात को बाघा छिपाएगा कैसे? कैसी बड़ी आफत है ! अब शायद पकड़े ही जाएँ और जान खो बैठें।
गोपी की बड़ी इच्छा थी कि वह बाघा को लेकर दौड़ भागे। पर अब तो ऐसा संभव ही नहीं था, सभा में बैठते वक़्त्त उन जूतों को तो पैरों से उतारकर रखना पड़ा था।
इसी बीच बाघा की यह हालत देखकर सभा में ज़बर्दस्त अफरा-तफरी शुरू हो गई। सबने सोचा, बाघा को कोई गंभीर बीमारी हो गई होगी, अब वह और जी नहीं सकता। राजबाड़ी के वैद्यजी आकर बाघा की नाड़ी देखकर बहुत ज्यादा चिंतित होकर सिर हिलाने लगे। बाघा को बहुत सारी जुलाब की दवाएँ खिलाकर पेट पर पट्टी लगा दी गई। इसके बाद वैद्यजी ने कहा कि, "अगर इस पर भी दर्द नहीं रुकता, तो पीठ पर एक और, उससे भी न हो तो दोनों ओर दो पट्टियाँ लगानी होंगी। "
यह बात सुनते ही बाघा का रोना तुरंत रुक गया। तब सबने सोचा की वैद्यजी ने कितनी बढ़िया दवा दी है, दवा देते ही दर्द ख़तम हो गया।
खैर, बाघा ने देखा कि उसके रोने से ढोल को जला देने की बात अब दब गई है, तब उस पट्टी की मुसीबत झेलते हुए उसका मन कुछ हद तक शांत हुआ। महाराज इसके बाद बड़े सम्मान के साथ उसे अपने कमरे में लिटा आए; गोपी उसके पास बैठकर पट्टी पर हवा देने लगा।
फिर जब सब कमरे से निकल आए तो गोपी ने बाघा से कहा, "छि: भैया, जहाँ-तहाँ इस तरह नहीं रोना चाहिए! अब सोचो ज़रा, कैसी मुसीबत आ गई।" बाघा बोला, "अगर मैं न रोता, तो अब तक मेरे ढोल को जलाकर ख़त्म कर दिया होता। अब थोड़ी-बहुत तकलीफ ज़रूर हो रही है, पर मेरा ढोलक तो बच गया!"
बाघा और गोपी इस तरह आपस में बातचीत कर रहे थे। इसी बीच महाराज जब सभा में वापस लौट आये तो दरोगाजी ने उनके कानों में धीरे से कहा, "महाराज, एक बात है, अगर इजाज़त हो तो बतलाऊं।" राजा बोले, "कैसी बात?" दरोगा बोले, "वह जो आदमी लोट-पोट होकर रो रहा था, वह और उसका साथी वह दूसरा, ये वही दो भूत हैं; मैं उन्हें पहचान गया हूँ।" राजा बोले, "अरे हाँ, मुझे भी कुछ ऐसा ही लग रहा था। यह तो बड़ी मुसीबत आ खड़ी हुई। अब बतलाओ कि क्या किया जाए? "
तब इस बात पर सभा में जोर से कानाफूसी शुरू हो गई। किसी ने कहा, "ओझा बुलाओ - उन दोनों को भगा दे। " और एक कोई बोला, "ओझा अगर इन्हें भगा न पाए, तब ये दोनों बिगड़कर भयंकर कुछ कर बैठेंगे। इससे बेहतर तो यह होगा कि रात को जब वे सो रहे हों तो उन्हें जलाकर मार दीजिए। "
यह बात सबको जँच गई, पर इसमें मुसीबत यह आई कि भूतों को जलाया जाए तो राजबाड़ी में भी आग लग सकती है। अंत में बहुत सोच-विचार के बाद यह तय हुआ कि एक बागानबाड़ी में उन्हें रहने को कहा जाए - बागानबाड़ी अगर जल भी जाए तो कोई खास नुकसान न होगा। तब महाराज बोले कि, "उस ढोल को भी फिर इस बागानबाड़ी में रख दिया जाए; तब बागानबाड़ी को जलाया जायेगा, तो एक साथ सारी परेशानियाँ ख़त्म हो जायेंगी।
बागानबाड़ी में जाने की बात सुन गोपी और बाघा बहुत खुश हुए। उन्हें तो कुछ पता न था कि इसमें कितना भयंकर जाल है; उन बेचारों ने सोचा कि चलो आराम से एकांत में रहेंगे, संगीतचर्चा भी ढंग से होगी। जगह बड़ी निर्जन और सुन्दर थी। मकान लकड़ी का है, पर देखने में बढ़िया है। वहाँ चारों ओर देखते-ताकते बाघा की तबियत सुधर गई। तब गोपी ने उससे कहा, "भाई, अब और यहाँ रहकर क्या करें? चलो हम लोग यहाँ से चले जाएँ।" बाघा बोला, "भैया, ऐसी सुन्दर जगह में रहने की किस्मत तो हमारी नहीं है, क्यों न दो दिन ठहर ही जाएँ। आह! अगर मेरा ढोलक पास होता!"
उस दिन बाघा घर में इस कमरे से उस कमरे में टहल रहा था, गोपी बगीचे में एक जगह बैठकर गुनगुना रहा था, अचानक बाघा जोरों से चिल्ला उठा। उसकी बातें पूरी समझ में नहीं आईं, केवल, "गोपी भैया ! ओ गोपी भैया" पुकार खूब सुनाई पड़ने लगी। गोपी ने तब दौड़कर आकर देखा कि बाघा अपना वह ढोल सिर पर लिए पागलों सा नाच रहा था, और अंट-संट अनाप-शनाप बोलते हुए "गोपी भैया, गोपी भैया।" कहकर चीख रहा था। ढोल वापस पाकर उसे इतनी ख़ुशी मिली कि वह आराम से खड़ा नहीं हो पा रहा था, ढंग से बात भी नहीं कर पा रहा था। इस तरह करीब आधा घंटा हो जाने पर बाघा ने ज़रा शांत होकर कहा, "गोपी भैया, देखा तुमने -- इस कमरे में मेरा ढोलक -- अरे मज़ा आ गया -- हा: हा: हा:"
कहकर दस मिनटों तक वह खूब नाचता रहा। उसके बाद उसने कहा, " भैया, इतने दुःख के बाद यह ढोलक मिला है, एक गाना गाओ, ज़रा मज़ा लें।" गोपी बोला, "इस वक़्त बड़ी भूख लगी है। " खाना-पीना हो जाए, फिर रात को बरामदे में बैठकर दोनों खूब गाएँगे - बजाएँगे। "
महाराज ने तय किया था कि उस रात उनको जला मारेंगे। दरोगा को आदेश दिया गया था कि उस शाम उस बगानबाड़ी में एक विशाल भोज का बंदोबस्त करना होगा। गोपी और बाघा सो जाएँगे, तब वे सब मिलकर एक साथ उस लकड़ी के मकान को चारों ओर से आग लगाकर उसके आगे भागने का रास्ता बंद कर देंगे।
उस दिन भोजन बड़ा अच्छा रहा। गोपी और बाघा ने सोचा कि लोगों के चले जाते ही गाना-बजाना शुरू करेंगे, दरोगाजी ने सोचा कि गोपी और बाघा के सोते ही वे आग लगवाएँगे। वे कोशिश करने लगे कि वे दोनों सोने चले जाएँ। उनके हाव-भाव से जब यह स्पष्ट हो गया कि उनके न सोने पर वे वहाँ से निकलेंगे नहीं, तब गोपी बाघा के साथ बिस्तर पर लेटकर खर्राटे भरने लगा।
इसी बीच दरोगाजी ने अपने लोगों से कह दिया, "तुम सब हर दरवाज़े पर अच्छी तरह आग लगाओगे; खबरदार, अच्छी तरह आग लगने से पहले कोई वापस मत लौटना।" वे खुद सीढ़ियों पर आग लगाने गए; अच्छी-खासी आग लग गई, दरोगाजी सोच ही रहे हैं, "अब भाग चलें" - उसी वक़्त्त बाघा का ढोल बज उठा, गोपी ने गाना शुरू कर दिया। अब दरोगाजी और उनके लोगों के लिए दौड़ भागना संभव न था, सबको जलकर मरना पड़ा। इसी बीच आग भड़कती देखकर, गोपी और बाघा भी अपने जूते पहन, ढोल और थैला लिए वहाँ से नौ-दो-ग्यारह हो गए।
उस दिन की आग में दरोगाजी तो जलकर मर ही गए, उनके साथ आए लोगों में बहुत कम ही बच पाए थे। जब उन लोगों ने जाकर महाराज को इस घटना की खबर सुनाई तो उनके मन में बड़ी घबराहट हुई। दूसरे दिन और भी दो-चार लोग राजसभा में आए बोले कि वे आग का तमाशा देखने वहाँ गए थे; तब उन लोगों ने बड़ा अजीब संगीत सुना और दोनों भूतों को अपनी आँखों से शून्य में उड़ जाते देखा। यह सुनकर राजाजी तो यूँ कांपने लगे! उसदिन बेचारे सभा में बैठ न सके। जल्दी से महल के अन्दर आकर भूत के डर से दरवाज़े बंद कर रजाई में छिपकर साँस लेते रहे, फिर एक महीने तक बाहर नहीं निकले।
इधर गोपी और बाघा उस आग में से निकल भाग अपने घर के पास उस जंगल में आकर उतरे, जहाँ वे पहले एक दूसरे से मिले थे। इतनी घटनाओं के बाद अपने माता-पिता से मिलने के लिए उनका जी मचलने लगा। जंगल में आते ही बाघा बोला, "गोपी भैया, यहाँ हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी न?" गोपी बोला, "हाँ।" बाघा बोला, "तो ऐसी जगह आकर बिना गाना-बजाना किए चले जाना क्या ठीक होगा?" गोपी बोला, "ठीक कहा भैया। तो फिर अब देर क्यों करें? अभी शुरू कर दो।" यह कहकर वे जी खोलकर गाने लगे।
इसी बीच एक आश्चर्यजनक घटना हुई। डाकुओं का एक गिरोह हाल्ला के राजा का खजाना लूट, उसके दो छोटे बच्चों को चोरी कर भागकर इस ओर आ रहा था, राजा कई सिपाहियों सहित उनका जी-जान से पीछा करते हुए भी उन्हें पकड़ नहीं पा रहे थे। गोपी और बाघा जब गा रहे थे, उसी वक़्त वे डाकू भी वन में से होकर गुज़र रहे थे। पर वह गाना एक बार सुनने पर तो उसे अंत तक सुने बिना चले जाने का कोई उपाय न था, इसलिए डाकुओं को वहाँ रुकना पड़ा। सुबह हाल्ला के राजा ने आकर बड़ी आसानी से उन्हें पकड़ लिया। इसके बाद जब उन्हें पता चला कि गोपी और बाघा के संगीत के गुण से ही उन्होंने डाकुओं को पकड़ा, फिर तो उनकी सेवा का कोई अंत नहीं रहा। राजकुमारों ने भी कहा, "पिताजी, ऐसा अद्भुत संगीत पहले कभी नहीं सुना, इनको साथ ले चलो।" इसलिए राजा ने गोपी और बाघा को कहा, "तुमलोग हमारे साथ चलो। तुम्हें पाँच सौ रुपये महीने की तनख्वाह मिलेगी। "
यह सुनकर गोपी ने हाथ जोड़कर राजाजी को नमस्कार किया और कहा, "महाराज, कृपया हमें दो दिनों के लिए छुट्टी दें। हम अपने माता-पिता से मिलकर उनकी अनुमति लेकर आपकी राजधानी में आ जाएँगे।" राजा बोले, "अच्छा, अगले दो दिन हम इस वन में ही आराम करेंगे। तुम लोग अपने माँ-बाप से मिलकर दो दिनों बाद हम से यहीं मिलो। "
गोपी को निकाल भगाने के बाद से उसका पिता उसके लिए बड़ा ही दुखी था, इसलिए उसे लौट आते देख उसे बड़ी ख़ुशी हुई। पर बेचारे बाघा के भाग्य में यह सुख नहीं था। उसके माता-पिता कुछ दिनों पहले मर चुके थे।
गाँव के लोगों ने जब उसे सिर पर ढोल लेकर आते देखा तो कहा, "अरे रे! वह साला बाघा लौट आया है, फिर हमें परेशान कर छोड़ेगा, मारो साले को!" बाघा ने नम्रतापूर्वक कहा, "मैं सिर्फ अपने माँ-बाप से मिलने आया हूँ; दो दिन ठहरकर चला जाऊँगा, बजाऊँगा-वजाऊँगा नहीं। " पर यह बात सुने कौन? उन्होंने दाँत पीसकर उसे माँ-बाप की मौत की खबर सुनाई और वे लाठियाँ लेकर उसे मारने आए। वह जी-जान लेकर दौड़ा। लेकिन पत्थर मार-मार उन्होंने उसके पैर तोड़ दिए, सिर फोड़ दिया।
गोपी अपने घर के आँगन में बैठ अपने पिता के साथ बातचीत कर रहा था, तभी उसने देखा कि बाघा पागलों सा लँगड़ाते-लँगड़ाते दौड़ते हुए आया; उसके कपड़े फटकर चीथड़े हो गए थे और खून से लाल हो गए थे। वह तुरंत दौड़कर बाघा तक गया और पूछा, "यह क्या हुआ? तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हुई?" गोपी को देखते ही बाघा खूब मुस्कुराया। फिर उसने हाँफते हुए कहा, "भैया, किसी तरह बच के आया! बेवकूफों ने मेरा ढोलक ही तोड़ देना था!" गोपी के घर पर गोपी की देखभाल और उसके माँ-बाप के प्यार से बाघा के दो दिन जितना हो सका, सुखपूर्वक ही बीते। दो दिनों बाद गोपी अपने माँ-बाप से विदा लेते हुए कह गया, "तुम लोग तैयार रहना। मुझे फिर छुट्टी मिलते ही मैं तुम्हें ले जाऊँगा।"
उसके बाद कई महीने बीत गए। गोपी और बाघा अब हाल्ला के राजा के घर बड़े सुखपूर्वक रहते हैं। देश-विदेश में उनका नाम फैल चुका है- "ऐसे उस्ताद कभी नहीं हुए, होंगे भी नहीं!” राजाजी उनको बड़ा प्यार करते हैं; उनके गीत सुने बिना एक दिन भी नहीं रह सकते। अपने सुख-दुःख की बातें सब गोपी को बतलाते हैं। एक दिन गोपी ने देखा कि राजाजी के चेहरे पर बड़ी उदासी छाई हुई है। वे लगातार किसी सोच में डूबे जा रहे हैं, जैसे उन पर कोई बड़ी विपत्ति आ गई हो। 
(बाकी अगली किश्त में)