Saturday, December 20, 2014

आओ अपनी बोलियों में मर्सिया लिखें

एक भले मित्र ने एक केंद्रीय सचिव की हिंदी के सरलीकरण की पहल को आधार बनाकर लिखे अंग्रेज़ी लेख को फेबु पर पोस्ट किया।
उसे पढ़कर दोस्त को मेरा जवाब -
 
बॉस,

अंग्रेज़ी वालों के लिए अंग्रेज़ी वालों के लिखे अंग्रेज़ी वाले लेखों को क्या पढ़ना पढ़ाना?
पहली बात तो यह कि जिसे उर्दू कहा जा रहा है उसमें और हिंदी में कोई फर्क नहीं है। उर्दू को अलग कहते ही हिंदी से बोलचाल के शब्दों को अलग करने के षड़यंत्र में हम शामिल हो जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उर्दू किसी भाषा का नाम नहीं है। इसका मतलब सिर्फ यह है कि हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो नाम हैं - अलग लिपियों के साथ जुड़े हुए। इन्हीं का एक और नाम हिंदुस्तानी है। आप ज़बरन फारसी या संस्कृत के क्लिष्ट शब्दों का इस्तेमाल किसी भी भाषा में कर सकते हैं। ऐसा करनेवालों की यह अपनी सीमा है। इसकी वजह से भाषा की आम पहचान बदल नहीं जाती।
दूसरी बात यह कि आसान प्रचलित शब्दों को हटाकर ज़बरन अंग्रेज़ी शब्द थोपनेवाले जिन ट्रेंडी न्यूज़पेपर का लेख में ज़िक्र हुआ है, वे ऐसे हैं जो पाकिस्तान शब्द को दुश्मन शब्द से अलग लिख नहीं पाते, यानी कि वे ट्रेंडी नहीं खास हितों के पर्चे हैं जिनको निकालने वाले अंग्रेज़ी वाले हैं।
अगर सचमुच हिंदी या किसी भी भारतीय भाषा के ज़मीनी लोगों के हाथ ताकत होती तो यह संस्कृत-अंग्रेज़ी राज चलता? भाषा पर अंग्रेज़ी और संस्कृत के कूट समझौते का ज़िक्र न करने वाला कोई भी लेख बेमतलब है।
अंग्रेज़ी और संस्कृत- दोनों उम्दा ज़ुबानें हैं। जैसे हम दूसरी भाषाएँ सीखते हैं, इन्हें भी सीखना ही चाहिए। पर भारत में अंग्रेज़ी और संस्कृत वालों की भूमिका सिर्फ इन भाषाओं को बोलने की नहीं है। भारत में अंग्रेज़ी और संस्कृत वालों की खास पहचान है - इसके साथ जुड़ी अंग्रेज़ी की कई भूमिकाओं में अभी जो सबसे अहम है - वह भारतीय भाषाओं का संहार है। लिंगुईसाइड। भाषा का संहार उस दुनिया का संहार है जहाँ वह भाषा बोली जाती है, उन लोगों का संहार है, जो उस भाषा को बोलते-जीते हैं। संस्कृत यह काम सदियों से करती आई है, हाल की सदियों में यह काम अंग्रेज़ी को आउटसोर्स किया गया है। 
जाहिर है कि बात हर उस व्यक्ति की नहीं हो रही है, जो अंग्रेज़ी या संस्कृत पढ़ता-लिखता है। बात सामाजिक-राजनैतिक प्रक्रियाओं की हो रही है।



एक छोटी कविता पढ़ो जो चुनावों के पहले लिखी थी, अभी हाल में वेब पर (अनुनाद) और बाद में 'समकालीन जनमत' में आई है -

मर्सिया

ऐ हिंदी हिंदुस्तानी उर्दू लिखने वालो
तमिल, तेलुगु, बांग्ला, कन्नड़, पंजाबी वालो
ओ कोया, भीली, कोरकू, जंगल के दावेदारो
धरती गर्म हो रही है
अंग्रेज़ी सरगर्म हो रही है
आओ अपनी बोलियों में मर्सिया लिखें
कल लिखने वाला कोई न होगा
पूँजी की अंग्रेज़ी पर सवार संस्कृत-काल दौड़ा आ रहा है। 
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हम सब मजबूरी में दिनभर अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते हैं, हमारी रोजी-रोटी का सवाल है; पर कई बंधु ऐसे हैं जो बेवजह अंग्रेज़ी में ही अधिकतर काम करते हैं, सिर्फ इसलिए कि इससे उन्हें लगता है कि उन्हें अधिक ख्याति मिलती है। कई तो अब भारतीय भाषाओं में कुछ सार्थक लिख ही नहीं सकते, वे इस काबिलियत को खो बैठे हैं। विड़ंबना यह कि आम लोगों पर गंभीर विमर्श का दावा करनेवाले ऐसे लोगों को हम गंभीरता से लेते हैं। मुझे पता है कि कई लोग यह कहेंगे कि मैंने कहाँ बिल्कुल देशज में लिखा है - सही है, फर्क यह है कि मैं जैसा भी लिखता हूँ, दूसरों से यह माँग नहीं रखता कि वे उसी भाषा में लिखें। मेरी अपनी सीमाएँ हैं, आखिर मैं किसी शून्य से नहीं, मौजूदा व्यवस्था से ही निकला हूँ। मैं मानता हूँ कि हर किसी को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह अपनी भाषा में पढ़े-लिखे और दूसरी भाषाओं को अपनी सुविधा अनुसार सीखे और जब ज़रूरत हो उनका इस्तेमाल करे। मैं संकीर्ण कट्टरता का समर्थक नहीं हूँ, लचीला रुख ही अपनाता हूँ। मेरे लिए अंग्रेज़ी में लिखना आसान है, हिंदी टाइप करना कठिन। पर मैं कुछ बातें अपने ढंग की ऐसी हिंदी में लिखता हूँ क्योंकि जैसी भी यह है, आज की तारीख में इसके जरिए अधिक लोगों के साथ जुड़ पाता हूँ। 

Monday, December 01, 2014

तूने प्यार दिया - इसलिए मैं भी तुझे प्यार देता हूँ


समाजवादी चिंतक अशोक सक्सेरिया से मैं तीन बार मिला हूँ। उन जैसा स्नेह विरल ही मिलता है। अभी कुछ समय पहले समान शिक्षा पर मेरा लिखा आलेख पढ़कर उन्होंने लेख को बढ़ा कर 'सामयिक वार्त्ता' के लिए तैयार करने को कहा था। फ़ोन पर वह उनसे आखिरी बात थी। कल पता चला अब वह नहीं रहे। आज का पोस्ट मैं उनकी स्मृति को समर्पित करता हूँ। पिछले पोस्ट में लिखे मुताबिक 'सदानीरा' के ताज़ा अंक में प्रकाशित ह्विटमैन की  कविताओं के अनुवाद में एक और यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ। साथ में जो आलेख आया है, वह भी नीचे दे रहा हूँ।

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मैं देह का कवि हूँ और मैं आत्मा का कवि हूँ,

स्वर्ग के सुख मेरे पास हैं और नर्क की पीड़ाएँ मेरे साथ हैं,

सुखों को मैं बुनता हूँ और उन्हें बढ़ाता हूँ, दुःखों कों नई भाषा में बदल देता हूँ।

 मैं उतना ही स्त्री का कवि हूँ जितना कि पुरुष का,

और मैं कहता हूँ कि स्त्री होना पुरुष होने जैसा ही गरिमामय है,

और मैं कहता हूँ कि मानव की माँ से बड़ा कुछ नहीं होता।

 मैं संवृद्धि या गौरव के गीत गाता हूँ, 
बहुत हो चुका बचना बचाना,

मैं दिखलाता हूँ कि आकार महज परिवर्तन है।

 तुम क्या औरों से आगे बढ़ गए हो? राष्ट्रपति हो क्या?

यह छोटी बातें हैं, सब आते ही आते रहेंगे और गुज़र जाएँगे।

 मैं वह हूँ जो नाजुक और बढ़ती रातों के साथ चलता हूँ,

 रात के शिथिल आगोश में धरती और समंदर को मैं पुकारता हूँ।

और पास आ, ओ खुले सीने वाली रात – और पास आ

जिजीविषा बढ़ाती चुंबकीय रात!

दख्खिनी हवाओं वाली रात – थोड़े से बड़े तारों वाली रात!

अब तक जगी रात – ऐ नंगी पागल गर्मियों की रात।

 ऐ ठंडी साँसों वाली विशाल धरती, मुस्करा!

ऊँघते और पिघलते पेड़ों वाली धरती!

बीते सूर्यास्त वाली धरती - धुंध भरे पर्वत शिखरों वाली धरती!

काँच सी चमकती हल्की नीली पूर्णिमा की चाँदनी वाली धरती!

नदी के ज्वार की चमक और छाया वाली धरती!

मेरे लिए साफ चमक उठते धूमिल बादलों वाली धरती!

सुदूर को आगोश में लेने वाली धरती - खिलते सेवों की गाढ़ी सुगंध वाली 

धरती!

मुस्करा कि तेरा आशिक आया है।

 ऐ अखूट दानी, तूने मुझे प्यार दिया है - इसलिए मैं भी तुझे प्यार देता हूँ!
 ओ अवाच्य अगाध प्रेम!
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 वाल्ट ह्विटमैन (31 मई 1819 – 26 मार्च 1892)
अमेरिकन बार्ड" कहे जाने वाले उन्नीसवीं सदी के अमेरिकी कवि वाल्ट ह्विटमैन को मुक्त छंद की कविता का जनक माना जाता है। 1819 से 1892 तक के अपने जीवन में उन्होंने युगांतरकारी घटनाएँ देखीं। मैं वाल्ट ह्विटमैन को अपना गुरू मानता हूँ। संकट के क्षणों में रवींद्र, जीवनानंद और नज़रुल की तरह ही ह्विटमैन को ढूँढता हूँ। ह्विटमैन में मुझे ऐसी गूँज दिखती है जो कुमार गंधर्व के सुर या आबिदा परवीन की आवाज़ मे सुनाई पड़ती है, जो बाब मारली की पीड़ा में सुनाई पड़ती है।
आधुनिक सोच के वे पुजारी थे और और लोकतांत्रिक सोच में जो कुछ भी अच्छा दिखा, उसका गान उन्होंने गाया। अपने एकमात्र संग्रह "Leaves of  Grass (घास की पत्तियाँ)पर वे आजीवन काम करते रहे। उनकी 52 हिस्सों वाली कविता "Song of Myself” की पहली पंक्ति उनके मूलमंत्र को उद्घोषित करती है: I CELEBRATE myself and I sing myself (मैं उत्सव हूँ, और खुद को गाता हूँ)। यह खुदी संकीर्ण या सीमित नहीं है, अगली ही पंक्ति में वे कहते हैं - And what I assume you shall assume, For every atom belonging to me as good belongs to you (और चूँकि मेरा हर कण तुम्हारे भी अंदर है, जो मेरे मन में है, तुम भी उसे अपने मन में समा लो)। उनकी इन पंक्तियों को मैंने कई कई बार पढ़ा है। इनमें एक ऐसी गूँज है, जो हमें मुक्ति की ओर ले जाती है।
पूरी तरह से आधुनिक होते हुए भी आधुनिकताओं की सीमाओं से ह्विटमैन काफी हद तक मुक्त थे। - 'मतों और मान्यताओं को अपनी जगह रख, पर हमेशा उन्हें ध्यान में रखते हुए, उनसे ज़रा दूर हटकर जो कुछ भी अच्छा या बुरा है, मैं  उसे करीब लाता हूँ, हर खतरा मोलते हुए, आदिम ऊर्जा के साथ प्रकृति पर बेरोक कहने की अनुमति खुद को देता हूँ।' उनके लिए मतों और मान्यताओं से दूर हटना उन्हें नकारना नहीं, बल्कि महज कुंठाओं से मुक्त होना है। मन, शरीर, आत्मा, स्त्री, पुरुष, गोरा, काला – उनकी कविताओं में यह बात बार बार आती है कि हर कुछ, हर कोई श्रेष्ठ है। यह उदार सेक्यूलरवाद आधुनिकता का सुंदरतम और सबसे अराजक वैशिष्ट्य बनकर उनकी कविताओं में आता है। -'तुम क्या औरों से आगे बढ़ गए हो? राष्ट्रपति हो क्या? / यह छोटी बातें हैं,  सब आते ही आते रहेंगे और गुज़र जाएँगे।'

प्रेम का ऐसा पार्थिव स्वरूप और कहाँ है। प्रेम जो शरीर से है, आत्मा से है, मन से है, खुद से है, औरों से है, जगत से है, सब कुछ से है। एक ही शब्द है - अद्भुत, जिसका इस्तेमाल इसे बखानने के लिए किया जा सकता है। ह्विटमैन इस लिए प्रिय है कि वह हमें कुंठाओं से मुक्त करता है। उसे पढ़ते हुए हम अपनी  खूबसूरती पहचानने लगते हैं। ह्विटमैन पढ़ते हुए हम जानते हैं कि मानव शरीर  सृष्टि के अनंत रहस्यों में से एक सामान्य और साथ ही गौर-तलब बात है। कभी वह भी पहाड़, नदी, ज़मीं जैसा खूबसूरत हो जाता है और शब्दों, ध्वनियों में हम उसे ढूँढते रहते हैं, उसके साथ खेलते रहते हैं। वह शरीर स्त्री का हो सकता  है, वह पुरूष का हो सकता है।
आधुनिक विश्व-साहित्य में शायद ही कोई कवि हो, जिसने ह्विटमैन को कई बार  न पढ़ा हो और उससे प्रभावित न हुआ हो। इसलिए किसी भी भाषा में ह्विटमैन  के एकाधिक अनुवाद मिलते हैं। हिंदी में भी केदारनाथ अग्रवाल से लेकर हाल के कई कवियों ने उनकी कृतियों का अनुवाद किया है। पिछली सदी में हिंदी  कविता की भाषा बदलती रही है। ह्विटमैन के सहज, उन्मुक्त प्रवाह को देखते हुए तत्सम शब्दावली में उनकी कविता का अनुवाद पुराना सा लगता है। उसे नए ढंग से पढ़े जाने और अनुवाद किए जाने की ज़रूरत है। 



Monday, November 24, 2014

आह, जो सबसे सादा है, वही उसके लिए खूबसूरत है



साहिल के पास नहा रहे हैं युवक अट्ठाईस,


परस्पर स्नेह में बँधे हुए युवक अट्ठाईस;


स्त्री जीवन और हा, इतने एकाकी वर्ष अट्ठाईस।




वह तट के पास की चढ़ाई पर बने खूबसूरत मकान की मालकिन है,


खिड़की के पर्दे के पीछे, सजी-धजी, सुंदर वह छिपी खड़ी है।




युवकों में से कौन उसे सबसे ज्यादा भाता है?


आह, जो सबसे सादा है, वही उसके लिए खूबसूरत है।



कहाँ चल पड़ी, भद्रे? मुझसे नहीं छिप पाओगी,

देखता हूँ तुम्हें पानी छपकाते, जबकि अपने कमरे में अनछुई खड़ी हो।




उनतीसवीं नहानेवाली साहिल पर आई नाचती, खिलखिलाती,


और किसी ने उसे नहीं देखा, पर उसने सबको देखा और


उनसे प्यार किया।




युवकों की दाढ़ियाँ गीली चमक उठीं, उनके लंबे बालों से पानी बह चला,


उनके शरीरों पर चारों ओर छोटी-छोटी नहरें बहने लगीं।




एक अदृश्य हाथ भी उनके बदनों पर से गुजरा,


काँपते हुए वह उनकी कनपटियों और पसलियों से उतरा।




युवक पीठ पर लेटे तैरते हैं, उनके गोरे पेट सूरज की ओर फूल गए हैं, वे पूछते 

नहीं कि कौन उनको जकड़े हुए है,


वे जानते नहीं कि कौन है जो तिरछी पीठ आगे पीछे लहराते हुए हाँफ रहा है.


वे सोचते नहीं कि वे किसपर पर पानी छिड़क रहे हैं।




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  वाल्ट ह्विटमैन की लंबी कविता 'सॉंग ऑफ माईसेल्फ' के दो हिस्सों का अनुवाद

मई में पोस्ट किया था। 'सदानीरा' के ताज़ा अंक में उन दो के साथ कुछ और 

हिस्सों का अनुवाद आया है। ऊपर की कविता उन्हीं में से एक है। एक छोटा 

  आलेख साथ में है - वह अगली बार।
 
 

Friday, November 21, 2014

रब तो यार के दिल में है


बुझाए न बुझे


एक वक्त था, बहुत पहले नहीं - बस सौ साल पहले, जब भारत में अधिकतर शादियाँ बीस की उम्र के पहले हो जाती थीं। गाँवों में लड़के की उम्र बीस होने तक बच्चे पैदा हो जाते थे। वह स्थिति बच्चों और माँ-बाप दोनों के लिए बहुत अच्छी नहीं थी। स्त्रियों के लिए वह आज से बदतर गुलामी की स्थिति थी। यह अलग बात है कि कई लोग उन दिनों के जीवन में सुख ढूँढ़ते हैं और आधुनिक जीवन को दुखों से भरा पाते हैं। जैसा भी वह जीवन था, एक बात तो जाहिर है कि प्राणी के रुप में मानव के जीवन में किशोरावस्था से ही शारीरिक परिपक्वता के ऐसे बदलाव होते हैं कि जैविक रूप से वह यौन-संपर्क के लिए न केवल तैयार, बल्कि बेचैन रहता है। इस बात को यौन-संबंधित साहित्य या दृश्य-सामग्री का व्यापार करने वाले अच्छी तरह जानते हैं। हिंसक शस्त्रों और यौन-संबंधित सामग्री का व्यापार ही आज की आर्थिक दुनिया के सबसे बड़े धंधे है। अरबों-खरबों की तादाद में डालर-यूरो-येन और बिटसिक्कों का लेन-देन इन्हीं दो क्षेत्रों में होता है।

पता नहीं कैसे हमें कुदरत के नियमों के विपरीत यह बात समझा दी गई कि भले लोग खासी उम्र तक यौन-संबंध से परहेज करते हैं। खूब ब्रह्मचर्य का पाठ पढ़ा। कुछ तो हमारी अपनी परंपरा में था, कुछ ऐतिहासिक कारणों से मिला। पर इस कुछ से अलग परंपरा में और भी बहुत कुछ रहा है। मुक्त-प्रेम को धार्मिकता के साथ जोड़ कर कुदरत की इस अनोखी देन – प्रेम – को जिस तरह हमारी परंपरा में देखा और जाना-समझा गया है, ऐसा और कहाँ है। शंकर के सौंदर्यलहरी से लेकर सूर के कृष्णकाव्य तक जैसे अनोखे मिथक हमारी हर भाषा में गढ़े गए हैं। अनपढ़ लोग इस खुलेपन को पश्चिम की देन कहते रहते हैं, जबकि आज के हमारे समाज जैसी ही कुंठित स्थिति कभी पश्चिमी देशों में भी थी। नब्बे साल पहले व्हिलहेल्म राइख़ नामक एक ऑस्ट्रियन मनश्चिकित्सक ने 'द सेक्सुअल स्ट्रगल इन यूथ' (युवाओं में यौनिकता के मुश्किलात) नामक किताब लिख कर वहाँ मौजूद कुंठा के माहौल के खिलाफ शंखनाद किया था। रोचक बात यह है कि यौनिकता पर रोक लगाकर कुदरती प्रक्रियाएं रुकती नहीं हैं। यह बात हमारे यहाँ भी उतनी ही सही है जितनी कहीं और। इसीलिए तो अभिसारिका और शृंगार के विवरणों से हमारा साहित्य भरा पड़ा है। वारेन बीटी की प्रसिद्ध फिल्म 'रेड्स' में हेनरी मिलर एक सवाल के जवाब में कहते हैं कि उस जमाने में भी अमेरिका में जिस्मानी संबंध खूब थे, बस यही कि उन्हें सामाजिक मान्यता न थी। फ्रांस जैसे देश में रहते हुए भी मारी कूरी जैसी नोबेल विजेता को अपने पति की मौत के कुछ साल बाद साथी वैज्ञानिक लाँजवाँ के साथ प्रेम की वजह से कई यातनाएँ सहनी पड़ी थीं।

बड़ी आलमी जंगों का एक असर यह था कि पश्चिम में इन जड़ताओं के टूटने में आसानी रही। बीसवीं सदी के बीचोंबीच उन मुल्कों में भारी बदलाव आए। ब्रह्मचर्य को कुंठाओं से जोड़ कर देखा जाने लगा। पर बदलाव ऐसे अपने-आप तो आने न थे। साठ के दशक में युवाओं ने हल्ला बोला और जिस्मानी-प्रेम का परचम बुलंद हो गया। एक दशक में ही कालेजों-विश्वविद्यालयों में युवाओं में यौन-संबंधों पर पूरी तरह रोक से हटकर पूरी छूट की स्थिति बन गई। अब बात इतनी रह गई थी कि युवाओं को यौन-संबंधों से होने वाले मानसिक और शारीरिक समस्याओं के लिए कैसे तैयार किया जाए। अनचाहे गर्भ से युवा स्त्रियों को कैसे बचाया जाए। स्कूलों कालेजों में बड़े पैमाने पर यौन-शिक्षा शुरू हुई। साहित्य, कला आदि हर क्षेत्र से यौनिकता की अभिव्यक्ति पर से पाबंदी हटी। जनांदोलनों ने यौन-शिक्षा के परचे निकाले। स्त्रियों ने खुलकर यौनिकता पर बातें शुरू कीं। बॉस्टन विमेन्स ग्रुप की स्त्रियों द्वारा स्त्रियों के बारे में 'आवर बॉडीज़ आवरसेल्व्स' (हमारे शरीर और हम) जैसी किताब लिखी गई। अब स्थिति ऐसी है कि उन मुल्कों में युवाओं में स्नेह से लेकर संभोग तक प्रेम की हर संभावना को स्वीकृति है। अगर कोई इस पर सवाल खड़ा करे तो उसे सिरफिरा ही माना जाएगा। और हमारे यहाँ के संस्कृति के ठेकेदारों के तमाम फतवों के बावजूद उन मुल्कों में कोई भयानक अस्थिरता नहीं दिखती। संबंध बनते और टूटते हैं, पर ऐसी मारकाट वहाँ नहीं दिखती जितनी हमारे यहाँ है।

पश्चिमी देशों में ये बदलाव समाज में पहले बड़े शहरों मे, फिर धीरे-धीरे अंदरूनी इलाकों में हुए। कालेज कैंपसों में पुराने अनुशासन का विरोध हुआ, पर वह समाज से अलग नहीं था। जैसे-जैसे समाज बदला, कैंपस का माहौल भी बदला। हमारे यहाँ स्थिति कुछ और है। यहाँ कैंपस सरगर्म हैं। कुछ हद तक खुला माहौल है। व्यवस्था अभी बदली नहीं है, पर कई संस्थानों में प्रबंधन युवाओं में संबंधों को उदारता के साथ देखते हैं। यह सही है कि यौनिकता का खुला प्रदर्शन नहीं है, पर पहले की तुलना में माहौल काफी उदार है। कैंपस से बाहर समाज में कुंठाओं का समुद्र है। एक ओर तो सच्चाई यह है कि पुरुषों में जिसको मौका मिलता है, एम एम एस में हर तरह का यौन-प्रदर्शन देख रहा है। आभासी दुनिया में जिस्म के कारोबार का बाज़ार बढ़ता जा रहा है। हिंसा बढ़ रही है। सभ्य शालीन माने जाने वाले पुरुषों में भी कई, पेशे में अपने वरिष्ठ पद से मिली ताकत का ग़लत फायदा उठाकर, स्त्रियों पर ज़बरन अपनी यौनेच्छा थोपते हैं। वयस्क स्त्रियाँ ही नहीं, बच्चों तक पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। दूसरी ओर मजाल क्या है कि आप संबंधों में खुलेपन की बात कर लें। कहीं संगठित खाप हैं तो कहीं अकेला मर्द सीना पीट रहा है। कोई सेना का तो कोई संघ का सिपाही है, जो स्वस्थ संबंधों पर हमला करने के लिए अपने एम एम एस को रोक कर सड़क पर उतरा है। खुले प्रेम को चुनौती देती ललकार यह कि हम बलात्कार करने आ रहे हैं।

जिन भले लोगों के समर्थन की वजह से आज ये हिंसक ताकतें इतनी मुखर हैं, उनमें से कइयों को अचंभा होता है। कैसे लोगों को सत्ता दे दी। पर क्यों, क्या उन्हें सूचनाओं की कमी थी, क्या वे इन ताकतों के बारे में नहीं जानते थे?आज अचंभे में डूबे ये लोग भूल गए हैं कि जानबूझ कर ही इन्हें सत्तासीन किया था, तब ऐसा लगता नहीं था कि लघु-संख्यकों के अलावा ये किसी और पर भी हमला करेंगे। जब तक हम खुद लघु-संख्यक समुदाय के नहीं हैं तो क्या फिक्र। उनकी नीतियों से हम प्रभावित नहीं होते और ग़रीब-गुरबे छले जा रहे हैं तो हमें क्या! अब भी वे भले लोग प्रधानमंत्री पर बहस करते हैं, कि बयानबाजी से अलग सरकार ने क्या कुछ किया आदि। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने सचमुच बहुत कुछ कर दिया है, जैसा उनसे अपेक्षित था, वे करते जा रहे हैं। पूँजी की लूट और सांप्रदायिक जहर का घोल उनका धर्म है, वे और उनके परिवार के सदस्य मजे से वह खेल खेल रहे हैं। साथ में वह सारी कुंठित भीड़ खूँखार होती जा रही है, जिनको एम एम एस में जिस्मों की चीरफाड़ देखने के अलावा सिर्फ ऐसे मौकों की तलाश है कि वे कब किसी अकेली स्त्री या कमजोर बच्चे पर हमला कर सकें। स्त्री को वस्तु मात्र नहीं, बल्कि उसे अपनी कुंठाओं का लक्ष्य मानना इन लोगों की मजबूरी है। ये भयंकर बीमार लोग हैं। इसलिए वे प्रेम के दुश्मन हैं।

प्रेम – स्नेह से संभोग तक – प्राणियों को कुदरत की सबसे अनोखी देन है। आखिर हममें से हर कोई धरती पर अपने माँ-बाप के जिस्मानी उन्माद से ही आया है। शरीरों का वह मिलन इतना खूबसूरत है कि हम देवी-देवताओं तक को जिस्मानी प्रेम में लिप्त देखना चाहते हैं। सूफी मत में इश्क ही मोक्ष का साधन है। भक्ति में खोया प्रेमी पूछता है कि मैं बीच सड़क में खड़ा उलझन में हूँ कि एक ओर तो रब का घर है और दूसरी ओर यार का, मैं किधर जाऊँ। आखिर वह यार को चुनता है क्योंकि रब तो यार के दिल में है। उसमें किसी को अगर कुछ ग़लत दिखता है तो वह अपना इलाज़ करवाए।

आज जब चारों तरफ से जिस्म का कारोबार हमारी संवेदना को हर तरह से खोखला करता जा रहा है, यह सोचने की ज़रूरत है कि युवाओं में प्रेम की माँग को हम कैसे देखें। हमें इस बात को समझना होगा कि युवाओं में प्रेम एक स्वस्थ प्रवृत्ति है, और इस समझ के साथ हमें स्कूलों कालेजों में ऐसे इंतज़ाम करने होंगे कि युवा मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहें और अपने संबंधों की वजह से जीवन के दूसरे पहलुओं को बिगड़ने न दें। हमें युवाओं से यह भी कहना होगा कि प्रेम के बगैर जिस्मानी संबंध जीवन को अँधेरे की ओर धकेलता है। यह भी कि हम अपनी परंपरा को जानें - टी वी और विकीपीडिया से नहीं, जरा मेहनत करें और पुस्तकालयों में जाकर पढ़ें कि शिव ने पार्वती की स्तुति में क्या कहा है, भ्रमर गीत पढ़ें, लोगों से जानें कि हमारी लोक परंपराओं में प्रेम का क्या महत्त्व है। आखिर क्या वजह है कि हीर-राँझा, सोहनी-महीवाल या शीरीं-फरहाद आज भी गाँवों में गाए जाते हैं। और अंग्रेज़ी में नहीं, भारतीय भाषाओं में पढ़ें। अंग्रेज़ी में प्यार भी क्या प्यार है!

सांस्कृतिक फासीवाद अभी पूरी तरह हावी हुआ नहीं है। उसके पंजे लगातार बढ़ते चले आ रहे हैं। संवेदना की घोर कमी ने ऐसा सांप्रदायिक माहौल बनाया है कि हम अपने ही रचे झूठ में फँसते जा रहे हैं। समाज के दबे कुचले, मेहनतकश तबकों को भड़का कर एक दूसरे के साथ भिड़ंत करवा कर एक के बाद एक चुनाव जीतने की कोशिशें हैं। जब व्यवस्था पर निरंकुश नियंत्रण हो जाएगा, तब ये क्या करेंगे? कुंठित ताकतें खुला प्रेम नहीं सह सकतीं। युवाओं को यह समझना होगा कि हमारा भविष्य दुरुस्त और खुशहाल हो, उसके लिए हमें इन कुंठित ताकतों के खिलाफ लड़ना होगा। अभी ज़ुल्म की शुरूआत है। वे हमारी शक्लें, हमारे पहनावे, हमारी ज़ुबान, हमारे विश्वास, हमारी हर साँस पर हमला करेंगे। आखिरी जीत प्रेम की होगी, पर उसके पहले जो तबाही होने वाली है, उसकी कल्पना से आतंक होता है। इसलिए युवाओं को संगठित होना होगा कि इस हमले के खिलाफ आवाज़ उठाएँ। यह लड़ाई सिर्फ कैंपसों में रहकर नहीं लड़ी जाएगी, इसे व्यापक समाज में फैलाना होगा। प्यार की प्रतिष्ठा के लिए उनके खिलाफ भी आवाज़ उठानी होगी जो प्यार और चाहत को शोषण का जरिया बनाते हैं। यह समझना होगा कि संस्कृति के ठेकेदारों को उस बहुराष्ट्रीय जिस्मानी धंधे से कोई एतराज नहीं जिनसे उन्हें फायदा मिलता है। नहीं तो देश में हर साल ग़रीबी से लाचार हजारों युवा किशोरियाँ बिकती हैं, उसके खिलाफ ये फतवेबाज कभी कुछ क्यों नहीं करते। इन्हें प्रेम से एतराज है क्योंकि प्रेम हमारी गायब होती मानवता को वापस ले आता है। प्रेम हमें अन्याय के खिलाफ सचेत करता है। प्रेम में रोते हुए हम हर उत्पीड़ित का दुख अपनाने लगते हैं। इसी मानवता को फासीवादी सह नहीं पाते। वे प्रेम के खिलाफ धर्म, जाति और हर तरह के रस्मों की दीवारें खड़ी करते हैं। पर बकौल ग़ालिब - ये वो आतिश ग़ालिब, जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे