Monday, April 21, 2014

घुघनी


आज से पैंतालीस साल पहले 22 अप्रैल 1969 में, जब मैं 11 साल का था और आठवीं में पढ़ता था, सी पी आई (एम एल) पार्टी बनी। नक्सलबाड़ी में विद्रोह की घटना को करीब दो साल हो चुके थे। बंगाल में '67 की पहली युक्त फ्रंट सरकार के गिरने और राष्ट्रपति शासन से बाद नई बनी सरकार में वाम की ताकत बढ़ी थी। पर संसदीय प्रणाली में रहकर अपने वादों को जल्दी पूरा करने में वाम दल सफल नहीं हो पा रहे थे। कोलकाता शहर युवा क्रांतिकारियों का गढ़ था। हर दूसरे दिन पता चलता कि किसी दादा (बड़े भाई) को पुलिस पकड़ कर ले गई है। हमलोगों को डराया जाता था कि घर से दूर मत जाना, नक्सल बम फोड़ रहे हैं। कहा जाता था कि लंबे बालों वाले किसी लड़के को देखते ही पुलिस उसके बाल काट देती है।

आम जनता की सहानुभूति नक्सलवादियों के साथ थी। आज जो लोग आआपा के प्रति शहरी मध्य-वर्ग के युवाओं के समर्थन से अचंभित हैं, उनकी कल्पना में नहीं आ सकता कि वह क्या वक्त था। इंकलाब की महक हवा में थी। बस अब कुछ समय में ज़माना बदलने को था। जो विरोध में थे, उनके कई तर्कों में एक था कि चीन भारत को हड़पने को आ रहा है।

न इंकलाब आया न चीन आया। बहुत सारे मेधावी युवा हमेशा के लिए धरती से उड़ गए। कई और कई सालों तक जेलों में पुलिसी बर्बरता का शिकार हुए।

जैसा हर आंदोलन में होता है, उस जुनून के भी कुछ महानायक थे। अपने अनुभव से मैंने जाना है कि हर महानायक अंततः एक साधारण आदमी होता है। हमें महान इंसानों को उनकी साधारणता में ढूँढना चाहिए। किसी को असाधारण मानते हुए हम अपनी जिम्मेदारियों से बच जाते हैं।

बहरहाल। यहाँ एक कहानी पेस्ट कर रहा हूँ, यह 1993 में समकालीन जनमत में छपी थी और कई साथियों को एतराज था कि यह मैंने क्या लिखा। एक ने संपादक को ख़त लिखा था कि लाल्टू आधुनिक लू शुन बनने का ख़्वाब देख रहा है - प्रशंसा नहीं, गुस्से में लिखी गई बात थी। पर जैसा मेरे दूसरे काम के साथ हुआ है, इस कहानी का भी कोई खास नोटिस नहीं लिया गया। इसी शीर्षक से मेरा कहानी संग्रह है, जो 1996 में आया था।

घुघनी

मुहल्ले के लड़के किराए की कुर्सियों पर बैठे गप मार रहे हैं। कैरम खेल खेलकर बोर हो गए हैं। जो ' ब्रिज' खेल रहे थे, वे भी ताश के पत्ते समेट कर अब एक दूसरे को बाबा सहगल से लेकर सुमन के गीतों के बारे में या फिर मोहन बागान – ईस्ट बंगाल के हाल के मैचों के बारे में सुना रहे हैं। सत्यव्रत घोष पूजा मंडप के नीचे एक कुर्सी पर अकेले बैठे हैं, पुराने दिनों की बातें याद आ रही हैं। ज़िंदगी के बासठ सालों में देखी कई पूजाएँ याद आ रही हैं। बचपन के वे दिन, जब अकाल बोधन के अवसर पर नए कपड़े पहनते थे और अब जब खुद नहीं, पर पोती रूना को हर दिन – षष्ठी से दशमी तक पांच दिन अलग अलग नए कपड़े पहनते देखते हैं। अरे रूना गई कहां? यहीं तो बैठी थी! अपनी सुस्त गर्दन हिलाकर सत्यव्रत पीछे की ओर देखते हैं।
रूना एक वृद्ध का हाथ पकड़कर इधर ही आ रही है। वयस्क व्यक्ति का चेहरा जाना पहचाना सा है, पर फिर भी याद नहीं आता। इस मुहल्ले के तो नहीं हैं - कहीं ऐसा न हो कोई रिश्तेदार हो और याद ही नहीं आ रहा कि कौन है - ओफ ! उम्र बढ़ने के साथ साथ दिमाग ऐसा सुस्त होता जा रहा है !
रूना और वह वृद्ध व्यक्ति पास आ गए हैं। सत्यव्रत उनकी ओर देख रहे हैं, रूना कहती है - “ये रहे ठाकुरदा!"
सत्यव्रत 'नमस्कार' करते हैं और होंठों से धीरे से कहते हैं। फिर संकोच के साथ धीरे धीरे कहते हैं - "आप ... पहचान नहीं पा रहा।”
वह वृद्ध हंस रहे हैं। "चारु ... चारु दा ....” अरे ! वही तो हैं - वही दुबली पतली काया ! आँखों में चश्मा ... देखकर लगता है अभी गिर पड़ेंगे पर चारुदा तो...!”
मैं ही हूँ रे ! बहुत सालों के बाद अचानक तेरे पास आने को मन हुआ !”
रूना अपने दादाजी सत्यव्रत की फैलती आँखों को विस्मय से देख रही है, सत्यव्रत हाथ ऋठा कर कहते हैं, ऊलाल सलाम चारुदा! पर...'
"अरे छोड़ रे! चल जरा अपनी बहू से बोल मेरे लिए अच्छी घुघनी बना दे। छोले की घुघनी वह बढ़िया बनाती है, यह तेरी पोती ने बतला दिया है।”
सत्यव्रत चारुदा को लेकर घर आते हैं। सत्यव्रत की पत्नी दरवाजा खोलती है। शांतश्री सत्यव्रत के साथ दुबले चश्माधारी बुजुर्ग को एक बार देखती हैं और तुरंत कहती हैं - “अरे चारुदा ! तुम ...”
अरे शांतश्री ! सवाल मत करो ! अपनी बहू से कहो जरा मुझे घुघनी खिलाए – बहुत भूख लगी है।”
अरे, बैठिए ..अंदर आइए । ध्रुवा, ओ ध्रुवा ...,” इससे पहले कि वह बहू से सुबह की बनाई घुघनी तश्तरी में डालकर लाने को कहें, अचानक चिंतित होकर शांतश्री पूछती है, ”पर घुघनी में तो मसाला बहुत होगा ...! सुबह की बनी है, बिना मसाले की ताजा बनवा लें तो ठीक रहेगा”
अरे पागल लड़की ! अब क्या मुझे मसालों से कोई डर है? ला, ला, भूख लगी है और बाद में मुझे पायस भी खिलाना।”
ध्रुवा प्लेट भर छोले रख जाती है। चारुदा प्यार से कहते हैं, ”मां ! एक हरी मिर्च ले आना!” पानी का ग्लास हाथ में लेकर कहते हैं, ”अब ठंड के दिन आ रहे हैं, फ्रिज का पानी ठीक नहीं। ऐसा करो इसमें आधा ताजा पानी मिला लाओ। और सुनो, चाय मत बनाना, मैं चाय काफी अब नहीं पीता।”
इसी बीच रूना कहीं से एक छोटी डायरी लेकर सामने खड़ी हो गई है। देखते है, मुझे आज ही इंटरविउ चाहिए।”
चारुदा हंसकर कहते हें, ”! तुम्हारी मिनी मैगज़ीन के लिए ! क्या तो नाम है - रविवार ? हाँ, कल तो रविवार है न?”
सत्यव्रत सोच रहे हैं, उन दिनों अगर चारुदा को इस तरह खिला सकते, तो कितना आनंद आता। तब तो उबली सब्जियां और रोहू मछली का झोल, बिल्कुल फीका सा, यही बड़ी मुश्किल से खा पाते थे।
चारुदा मुंह में छोले भरकर कहते जा रहे हैं, “लिखो, लिखो, चारु मजुमदार, जन्म ... जन्म कब हुआ मुझे ही नहीं मालूम ... मौत 28 जुलाई 1972....।”
फिर हँस पड़े हैं चारुदा, “बचपन में मैं आम के पेड़ों पर चढ़ना बहुत पसंद करता था। कई कई दिन तो कहानियों की किताब हाथ में लेकर किसी आम के पेड़ पर चढ़कर डालियों पर लेटे लेटे किताब पढ़ता रहता - घंटों तक। फिर मेरे घरवाले मुझे ढूँढ़ने निकलते।
रूना पूछती है, ”आप स्कूल में फर्स्ट आते थे?”
फर्स्ट ? ऐसी बात तो याद रहनी चाहिए ... शायद नहीं ...स्कूल में फर्स्ट आना तो कोई बड़ी बात नहीं ..। “ चारुदा आचानक चिंतित लगे। रूना फिर पूछती है, ”घुघनी कैसी लगी आपको ?”
घुघनी .. अरे वाह! बहुत बढ़िया है। जरा अपनी माँ से कहो कि थोड़ा और दे जाए।”
ध्रुवा खुद ही मुस्कराते हुए घुघनी भरा बर्तन ले आती है और कड़छी से डालती है। चारुदा उसको रोक नहीं रहे। सत्यव्रत परेशान होकर कह बैठते हैं - ”इतना खा लेने दो, फिर और देना।”
चारुदा कहते है, “अरे और नहीं - इसके बाद पायस खाऊँगा। तुम्हें याद है, पहली बार जब आया था, तब शांतश्री ने पायस ही खिलाया था, बहुत सारा। तुमने खूब कहा था कि सब्जी बना दें, पर रात के डेढ़ बज चुके थे, पायस पड़ा था और मैंने वही खाया।”
सत्यव्रत को याद नहीं । सत्यव्रत को 1971 के दो दिन ही याद आते हैं, जब चारुदा आए थे और मकान की हर खिड़की पर दो दिनों तक उनके साथी हर क्षण तैनात बैठे थे। तब घर में जो तनाव था, सत्यव्रत को लगता है वैसा फिर हो तो उन्हें तुरंत दिल का दौरा पड़ जाएगा। उन दो दिनों चारु दा सिर्फ उबली सब्जियां, सूप, रोहू मछली का फीका झोल, यही निगल सकते थे। और शायद दो दिनों में बिल्कुल न सोकर वे लिखते जा रहे थे - बीच बीच में अपने साथियों से मशविरा करते। सत्यव्रत को घर से निकलने से मना कर दिया गया था। कालेज छुट्टी की दरखास्त भेज दी थी, विभाग के साथी शिक्षक इंद्रजीत बनर्जी हाल पूछने आ बैठे तो शांतश्री ने दरवाज़े से ही कह दिया, “वे तो टालीगंज गए हैं। ” और बैठने को भी नहीं कहा।
दीवार की ओर ताक रहे हैं चारुदा। सामने बरामदे की ओर खिड़की पर अब कोई तैनात नहीं। अब कोई पुलिसवाला वर्दी में भी गुज़र जाए तो किसी को परवाह न होगी। फिर भी ऐसा ख्याल मन में आते ही काँप उठे सत्यव्रत। अपनी परेशानी को छिपाते दीवार पर लगे कैलेंडर को दिखाकर कहते हैं - “यह ध्रुवा ने बनाया है। इनका महिला संगठन है, उनके लिए।”
हाँ, हाँ” और चारुदा लपककर उसकी डायरी लेते हैं, ”मैं यहीं बना देता हूं, तुम चिपका लेना।”
चारुदा ने एक बड़ा मेंढ़क बनया है। एक पेड़ और एक गोल गाल सा चेहरा पेड़ के ऊपर।
रूना पूछती है, “यह मॉडर्न पेंटिंग है ?”
हां, माँडर्न है, ठहरो, मैं साइन कर दूँ।” चारुदा साइन करते हैं। सत्यव्रत उत्सुकता छिपा नहीं पाते - करीब आकर देखते हैं - चारुदा ने बड़े स्टाइल से लिखा है- सी एम।
शांतश्री अचानक बोल उठती हैं, “आप हमेशा ही ऐसे थे क्या?”
चारुदा हंसते हैं, “पता नहीं क्या क्या था रे, मुझे सब थोड़े ही पता है ! कई दफा लगता है कि मैं चाहता तो चूनी गोस्वामी की टीम में खेलता। अरे! स्कूल में तो खूब खेला करता था मैं। सेंटर फारवर्ड था...।”
सत्यव्रत का मुँह खुला हुआ है। सामने के दाँत टेढ़े मेढ़े हैं। काले हो चुके हैं। अचानक सिगरेट की तलब होती है। पर बेटे ने घर के अंदर सिगरेट पीने से मना किया हुआ है। पूछते हैं, “चारुदा ! आप सिगरेट पिएँगे ?”
ना! वह सब तभी छूट गया था !”
अचानक शांतश्री कहती है, “हमलोग तो इंतजार कर रहे थे कि रविवार को आपको हमारे घर आना था, फिर 16 तारीख को रेडियो पर सुना....।” इतनी पुरानी बातें, शांतश्री को कैसे याद रहती हैं, सत्यव्रत सोच रहे हैं।
चारुदा सुन नहीं रहे ...। बरामदे की ओर दरवाजे पर लगा परदा हवा में उड़ रहा है। उस ओर ताक कर बोल उठे, “उन दिनों वह नया लड़का था, सुभाष भौमिक। अच्छा खेल रहा था... बहुत इच्छा थी कभी उसका खेल देखूं।”
सत्यव्रत अचानक पूछते हैं। "चारुदा, कभी तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि सब कुछ गलत हुआ – अगर फिर से करना हो तो...।”
चारुदा टोककर रूना से पूछते हैं, “क्यों, मेंढक ठीक बना? मॉडर्न मेंढक है !”
अरे बहू ! पायस तो खिलाओ !”
चाव से पायस खाते हैं चारुदा।
सत्यव्रत उठकर दूसरे कमरे में जाते हैं। वहाँ मेज पर फाइल है - हाल के कई जन आंदोलनों के परचे, सँभालकर रखे हुए हैं। बेटे के काग़जों से निकालकर उन्होंने अपनी फाइल में रखे हैं। मन हो रहा है चारुदा को दिखालाएँ। पर फाइल उठाकर फिर वापस रख देते हैं। हल्के कदमों से वापस आ जाते हैं। चारुदा रूना से पूछ रहे हैं - “इस बार कितने कपड़े लिए पूजा पर?”
चार... नहीं पांच... चार फ्राक, एक सलवार कमीज़ !”
वाह, सलवार कमीज़ कब पहनोगी ?”
नवमी के दिन ... कल वो फूलों वाला फ्रॉक पहनूंगी। देखेंगे ?”
चारुदा रूना का फ्राक देख रहे हैं, कहते हैं, ”अगली दफा मैं तुम्हारे लिए नए किस्म के पकड़े लेकर आऊंगा - क्या चाहोगी तुम?”
रूना उछलकर कहती है, ”जीन्स के पैंट।”
अच्छा, ”सत्यव्रत की ओर देखकर पूछते हैं चारुदा, ”कितनी कीमत होगी जीन्स के पैंट की ?”
शांतश्री जवाब देती हैं, “सौ रुपए से कम में तो नहीं मिलेगा।”
चारुदा सोच रहे हैं। क्या सोच रहे हैं - सत्यव्रत खुद अर्थशास्त्र पढ़ाते रहे हैं, पर दो साल हुए रिटायर हो जाने के बाद विषय के बारे में कम ही सोचते हैं। चारुदा मुद्रास्फीति के बारे में सोच रहे होंगे, सत्यव्रत का यह ख्याल बिल्कुल झुठलाकर चारुदा शांतश्री से पूछते हैं, “तुमने कभी जीन्स के पैंट पहने हैं ?”
शांतश्री खिलाखिला उठी हैं। ध्रुवा भी। रूना भी हंस रही है। सत्यव्रत सिर झुकाकर उदास बैठे हैं। उन्हें अचानक लग रहा है कि वे रो पड़ेंगे। परेशानी में अपनी गर्दन इधर उधर हिला रहे हैं।
चारुदा उठकर सत्यव्रत के कंधों पर हाथ रखते हैं। "यंगमैन, उठो। तुम्हारे बेटे से मुलाकात नहीं हुई। कोई बात नहीं, इस घुघनी का नशा अब छूटेगा नहीं। अब मैं आता रहूंगा - आज चलूं ?”
सत्यव्रत अभी भी सिर झुकाए बैठे हैं। काश वे युवा होते, या कोई छोटा बच्चा... मन हो रहा है शांतश्री के वक्ष में सिर छिपाकर फूट फूटकर रोएँ। या चारुदा के सीने पर मुक्के मार मारकर बिलख उठें।
चारुदा चल पड़े हैं। "तुम लोग बैठो, मैं चलूँ।” शांतश्री दरवाजे तक आती हैं। फिर वे सब बरामदे में आते हैं और चारुदा को जाता हुआ देखते हैं। वे तब तक उन्हें देखते हैं, जब तक कि वे दूर कोने वाले मकान पार कर मुड़ नहीं जाते। फिरा चारुदा विलीन हो गए।
सत्यव्रत परदा पकड़े हुए खड़े हैं। अचानक कहते हैं - “बहू, जरा मुझे भी थोड़ी सी घुघनी खिलाओ।”
शातंश्री कहती हैं, “सुबह तो तुम्हारा पेट ढीला जा रहा था !”
सत्यव्रत की आँखों में एक उदास आँसू छलकता है।
(समकालीन जनमत - 1994)

Sunday, April 20, 2014

चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना



दो हफ्ते पहले रविवार डॉट कॉम में ' हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई!' शीर्षक से छपा आलेख

2014 में मानव कहाँ पर है? हालैंड की एक कंपनी का दावा है कि दल साल बाद से वह लोगों को मंगल ग्रह पहुँचा कर वहाँ बस्ती बनाना शुरू कर देगी. इसके लिए कई लोगों ने चंदा भी भर दिया है और कंपनी ने पहले यात्रियों की सूची भी जारी की है. इसमें कुछेक भारतीय भी हैं.
कंप्यूटर की दुनिया में सिलिकॉन आधारित टेक्नोलोजी ऐसी सीमा तक पहुँच गई है कि इसमें आगे तेजी से तरक्की होने की संभावना कम है. इसलिए भविष्य के कंप्यूटर कैसे होंगे, डी एन ए और क्वांटम कंप्यूटर आदि पर भारी शोध हो रहा है. इंसान के दिमाग से लेकर ब्रह्मांड की शुरूआत तक के कई सवालों का जवाब मिल चुका है और आगे और भी जवाब तेजी से मिलते जे रहे हैं. साथ ही पूँजीवादी लूट के लिए टेक्नोलोजी के ग़लत इस्तेमाल से धरती विनाश की दहलीज पर भी आ गई है.
राष्ट्रीय संकीर्णताओं से ऊपर उठकर लोग मानवता और प्रकृति के बारे में गंभीरता से सोचने लगे हैं. आपसी मतभेदों को मिटाकर मौसम में बदलाव और पारिस्थिकी में असंतुलन जैसी सार्वभौमिक समस्याओं के निदान ढूँढे जा रहे हैं.
ऐसे में धरती पर सबसे बड़े लोकतंत्र माने जाने वाले मुल्क भारत में स्थिति क्या है? आधी जनता अनपढ़ है. जो पढ़-लिख सकते हैं, उनमें से बहुत कम ही कॉलेज तक की उच्च शिक्षा पा सकते हैं. जो कॉलेजों तक पहुँच भी जाते हैं, उन्हें बैंक से कर्ज़ लेकर पढ़ाई पूरी करनी पड़ती है. फिर कहने को हालाँकि सूचना क्रांति आदि क्षेत्रों का बोलबाला है, पर कम ही लोगों को अपनी योग्यताओं के मुताबिक नौकरियाँ मिलती हैं.
देश भर में शहरीकरण हो रहा है. शहरों में हर ओर ऊँची अट्टालिकाएँ दिखती हैं. अधिकतर शहरों में कहीं कोई योजना नहीं दिखती. छोटी छोटी सड़कों के दोनों ओर गाड़ियाँ वालों के लिए फ्लैट बन रहे हैं. गाड़ियाँ खड़ी करने की जगह नहीं है. कहीं बड़े बड़े मॉल बन रहे हैं. भयानक सामाजिक विसंगति के इस माहौल में आश्चर्य नहीं कि हिंसा बढ़ रही है.
ऐसे में यह अपेक्षा होती है कि संसद के चुनावों में पार्टियाँ बुनियादी मुद्दों पर बहस करेंगीं. शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में निजीकरण से जो घोर संकट आम आदमी के सामने है, उस पर कोई गंभीर विकल्प सोचे जाएँगे. पर नहीं, हमारे राजनैतिक दल इसी बात में उलझे हुए हैं कि हिंदू और मुसलमानों को वोट कैसे बाँटे जाएँ.
नरेंद्र मोदी और उनकी टीम बहुसंख्यक हिंदुओं को भड़काने में जुटे हैं तो कॉंग्रेस इमाम बुखारी से समर्थन लेती है. सपा बसपा भी पीछे नहीं हैं. आआपा काश्मीर में मानव अधिकारों पर बात होते ही घबराकर प्रेस कान्फरेंस करती है कि हम मोदी से कम नहीं हैं.
यह सब कुछ देखते हुए भारतेंदु का रोना दुबारा याद आता है- हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई! मोदी के समर्थक चिल्लाएँगे कि इसीलिए तो अबकी बार.... पर यही सबसे बड़ी विड़ंबना है.
देश की जो दुर्दशा आज है, वह जिस भ्रष्ट मुनाफाखोर सरमाएदार तबके की देन है, उसी के पैसों से मोदी का प्रचार हो रहा है. जो देश छोड़कर कबके विदेशों में जा बसे हैं, जो देशी मुनाफाखोरों के बाद देश का खून चूसने वालों में सबसे आगे हैं, वे मोदी के सबसे बड़े समर्थक हैं. अमेरिकी और यूरोप की बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ उनका गठजोड़ है. नवउदारवाद के शिकंजे में फँसा देश का भूखा, ग़रीब आम आदमी इतनी बातें नहीं सोच सकता. उसे तो अपने दैन्य से उबरने के लिए कोई जुनून चाहिए. अपनी दयनीय स्थिति के लिए जिम्मेदार अपने आस-पास कोई दुश्मन ढूँढ लिया जाए तो सामयिक रूप से ही, एक झूठा सुकून मिलता है.
सांप्रदायिकता के इसी हैवानी जुनून को भड़का कर मोदी आज राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बना पाए हैं. इसके लिए उनके साथ मध्ययुगीन मानसिकता वाले संघियों की पूरी फौज है, जो लंबे अरसे से देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए जुटे हुए हैं. हालाँकि यूरोप में, जहाँ पर कौमी राज की आधुनिक धारणा का जन्म हुआ, वहाँ के लोग इसकी सीमाओं को समझ चुके हैं और आज खुली सरहदों वाला महासंघ बना चुके हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश में कौमी राष्ट्रीयता के भयंकर परिणाम हम सब जानते हैं. फिर भी अनपढ़ता और अमानवीय स्थितियों का फायदा उठाकर संघ परिवार बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक जहर फैलाने में सफल होता जा रहा है.
पाकिस्तान के समझदार लोग भारत में राजनैतिक माहौल के इस कदर बिगड़ने पर हैरान हैं. शायरा फ़हमीदा रियाज़ ने लिखा है - 'वो मूरखता, वो घामड़पन/ जिसमें हमने सदी गँवाई/ आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे/ अरे बधाई, बहुत बधाई./ प्रेत धर्म का नाच रहा है/ कायम हिंदू राज करोगे ?/ सारे उल्‍टे काज करोगे !/ अपना चमन ताराज़ करोगे !' पर क्या कीजे कि संघ परिवार सदियों पुरानी अपनी समझ के आवर्त्त में फँसा हुआ है! आगे फ़हमीदा सही कहती हैं - 'अब जाहिलपन के गुन गाना./ आगे गड्ढा है यह मत देखो/ लाओ वापस, गया जमाना/ एक जाप सा करते जाओ/ बारंबार यही दोहराओ/ 'कैसा वीर महान था भारत/ कैसा आलीशान था-भारत'.
कई लोग यह मानते हैं कि संवैधानिक धर्म-निरपेक्षता एक पश्चिमी खयाल है. हमारे लोग सर्वधर्म- समभाव में यकीन रखते हैं और हमारी अपनी सांस्कृतिक विरासत है, जो पश्चिम से थोपी गई आधुनिकता से मेल नहीं रखती- इसलिए हमें संघ परिवार और मोदी जैसे हिंदुत्ववादियों को हमें उदारता से देखना चाहिए.
इसमें कोई शक नहीं कि देश-समाज और कायनात के बारे में हमारी समझ अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है और हर समुदाय के लोगों को यह हक होना चाहिए कि अपनी विरासत के अंदर रहकर वह अपना भविष्य स्वयं तय कर सकें. पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सार्वभौमिक होती हैं. जैसे आज किसी इंसान का कत्ल किया जाना किसी भी संस्कृति में स्वीकार नहीं किया जा सकता.
एक समय था जब नर-बलि या सती आदि पर बहस होती थी, पर आज ऐसी रुढ़ियों के समर्थन में कहने के लिए कोई खड़ा नहीं होगा. परस्पर नफ़रत के आधार पर सामाजिक सोच रखना आज मान्य नहीं हो सकता. निर्दोष लोगों के मानव अधिकारों के हनन को यह कहकर सही नहीं बतलाया जा सकता कि वे जिस समुदाय के हैं उन लोगों ने कहर ढाए हैं, आदि.
संघ परिवार की विचारधारा में भारत महज वह देश नहीं जहाँ हम जन्मे पले, जहाँ की मिट्टी, हवा और पानी से हमें प्यार है, भारत तो वह देश है जहाँ एकमात्र हिंदू संस्कृति और हिंदू परंपराएँ थीं, हैं और रहेंगीं. एक तो इस तरह की एकांगी दृष्टि अपने आप में ग़लत है, दूसरी बात यह है कि अपनी सोच को ज़बर्दस्ती दूसरों पर थोपने के लिए गैरलोकतांत्रिक हथकंडे अपनाना और यूरोपी ढंग के उस हिटलरी राष्ट्रवाद को अपना ध्येय मानना, जिससे यूरोप के लोग अब नफ़रत करते हैं, यह संघ परिवार की दिमागी नसों में घर कर चुका है. मोदी के नेतृत्व में वे इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए जुटे हुए हैं.
देशी और विश्व-स्तर के पूँजीवाद को तब तक इस बात से कोई दिक्कत नहीं कि पुरातनपंथी और मानवविरोधी ताकतें सत्ता पर काबिज हो सकती हैं, जब तक उसके सरगनाओं को खुली लूट की पूरी छूट है. यूरोप के लोगों को अपनी ग़लतियों को समझने के लिए पिछली सदी में भयंकर तबाही और विनाश से गुजरना पड़ा. जो आज मोदी और संघ परिवार के समर्थन में हैं, देर सबेर वो अपनी ग़लती समझेंगे, पर तब तक देर हो चुकी होगी. अगली पीढ़ियाँ अचंभित होती रहेंगीं कि इतना कुछ उजागर होने के बावजूद भी उनके माता-पिता इस अँधेरे में कैसे फँस गए.
मानव नियति की इन विडंबनाओं से हमें स्वयं अपने अलावा कोई और नहीं बचा सकता. इसलिए इस बार के संसदीय चुनाव पहले के सभी चुनावों से अधिक सोच-समझ की माँग करते हैं. फ़हमीदा की चेतावनी है - भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा/ फिर तुम लोग पहुँच जाओगे/ बस परलोक पहुँच जाओगे/ हम तो हैं पहले से वहाँ पर/ तुम भी समय निकालते रहना/ अब जिस नरक में जाओ वहाँ से/ चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना.

Friday, April 18, 2014

जादुई यथार्थ जादुई भी था और यथार्थ भी


एक बड़े लेखक का गुज़रना क्या हुआ कि हर कोई ग़म ग़लत में जुटा है। हर किसी को कुछ तो कहना ही है। मैंने मार्ख़ेज़ की चार किताबें पढ़ी हैं। कुछ उनके साक्षात्कार आदि भी पढ़े हैं। दिवंगत किसी को याद करते हुए अपना ही अतीत याद आता है। एक आदमी जो रहा नहीं वह मेरे लिए क्या था, यही सोच पाता हूँ। मैं शायद बाईस साल का था जब 'वन हंड्रेड ईयर्स …' पढ़ी थी। मैं तो हिंदी मीडियम का पढ़ा, कालेज आने के बाद ही अंग्रेज़ी में विदेशी साहित्य पढ़ना शुरू किया था। विदेश में मेरे साथ रह रहे मुझसे चार साल सीनियर मित्र विट्ठल के पास किताबें भी कई थीं और उसने पढ़ा भी बहुत कुछ था। उसी ने 1980 में मुझे वह उपन्यास पढ़ने को दिया। वह शायद पहली किताब थी जिसे पढ़ कर मैंने कहा कि इसे नोबेल मिलने वाला है। उसके दो साल या कि तीन साल बाद मार्ख़ेज़ को नोबेल पुरस्कार मिला था। अब तक ऐसे कम से कम पाँच लेखकों के बारे में मैंने भविष्यवाणी :-) की है और उनको नोबेल पुरस्कार मिला है। इनमें से डोरिस लेसिंग को बहुत बाद में मिला और एलिस मनरो को मेरे अनुमान के बावजूद पुरस्कार मिलना अचंभित करने वाला था, क्योंकि उन्होंने सिर्फ लंबी कहानियाँ लिखी हैं।

मेरी आर्थिक स्थिति कभी भी अच्छी नहीं रही, पर मुझे अच्छी किताब पढ़ने पर जुनून सा हो जाता था (अब कम होता है) और मैं कई दोस्तों को प्रतियाँ खरीद कर देने लगता था कि वे ज़रूर पढ़ें। मुझे वन हंड्रेड ईयर्स … का कथानक इतना याद नहीं आता जितना कि 'लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा' का कथानक याद आता है, पर मैंने उस किताब (वन हंड्रेड...) की दस प्रतियाँ तो ज़रूर बाँटी होंगीं। बाद में कई बार लगा है कि जिसको दी वह शायद पढ़ेगा भी नहीं, पर देते वक्त कहाँ सोच पाता हूँ। 'डेथ ऑफ अ क्रोनिकल फोरटोल्ड' बहुत बाद में पढ़ी, कोई दस साल पहले ही। इन सभी उपन्यासों में, खास तौर पर 'ऑफ लव ऐंड अदर डीमन्स'‌ में मुझे सबसे ज्यादा प्रेम के प्रसंग ही याद आते हैं। उन कथाओं को याद करते हुए जिस तरह के सघन प्रेम की भावना मन में होती है, उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। मुझे याद है कि मुझे सबसे ज्यादा इस बात ने प्रभावित किया था कि वह प्रेम कोई रागात्मक भावनाओं वाला प्रेम मात्र न था, उसे पढ़ते हुए खुद का मानव शरीर में जीने का सुख अद्भुत सुंदर लगने लगता है। अभी यह लिखते हुए मुझे लगता है कि मुझे फिर से उन किताबों को पढ़ना पड़ेगा ताकि मैं उन क्षणों को फिर फिर जी सकूँ।

मार्ख़ेज़ का जादुई यथार्थ जादुई भी था और यथार्थ भी। अन्यथा जादू तो हर किसी परंपरा में भरा पड़ा है। मार्ख़ेज़ पहले न थे जिन्होंने ऐसी शैली का इस्तेमाल किया, पर उनके बाद से कम से कम तीस साल तक लातिन अमेरिकी ही नहीं, विश्व साहित्य में यह शैली धड़ाके से चली। हमारे यहाँ कई लोग उनकी नकल में ही लिखने की कोशिश रहे। सलमान रश्दी की शैली में हम मार्ख़ेज़ देख सकते हैं। मार्ख़ेज़ से पहले बोर्ख़ेज (ख़ोर्ख़े लुइस बोर्ख़ेज़) अमूर्त्त किस्म के जादुई यथार्थ का इस्तेमाल कर कालजयी लेखन कर चुके थे, पर उन तक पहुँच पाना सब के लिए आसान न था। उन में कला के अनोखे प्रयोग थे और उनका जोर दार्शनिक चिंतन पर था। इसके विपरीत गाब्रिएल गार्सिया मार्ख़ेज़ आम लोगों तक पहुँचने वाले रचनाकार थे। मार्ख़ेज़ की कला आम पाठक को खींचती है। दर्शन से ज्यादा समकालीन राजनीति उनका विषय रहा। बोर्ख़ेज़ की तरह वैचारिक दुविधा में वे कभी न थे। इसलिए भी वे इतने लोकप्रिय रहे हैं।

Thursday, April 17, 2014

कहाँ है पद्य


मैं क्यों गद्य कविताएँ लिखता हूँ
बहुत दूर से एक आदमी पूछ रहा है
उसकी आवाज़ देर तक आती है
तुम
    क्यों 
        गद्य कविता
                    लिखते हो
मैं गद्य लिखता हूँ मैं रोटी खाता हूँ मैं कविता लिखता हूँ मैं पूरब-पश्चिम होता हूँ मैं क्या लिखता हूँ मैं क्या पढ़ता हूँ मैं 
जो भी करता हूँ उसमें कहाँ है पद्य
कहाँ है पद्य ओबामा ओसामा मनमोहनम चितअंबरम मोदी मोदी मोदी कहाँ है पद्य जानना बहुत ज़रूरी है 
उसकी हताशा दब जाती है मेरी व्याकुलता में कहाँ है पद्य 
'ক্ষুদ্র আশা নিয়ে রয়েছে বাঁচিয়ে, সদাই ভাবনা।
'যা-কিছু পায় হারায়ে যায়, না মানে সান্ত্বনা।'
--तनिक सी आस बची है पास, हर पल चिंता होती ।
जो कुछ पाए वह खोते जाए, तसल्ली हो ना पाती। - - (रवींद्रनाथ ठाकुर)

सब ठीक है।
पूछता चला हूँ कि मैं कौन हूँ और सुनता रहा हूँ कि यही है, इसी का जवाब मिल जाए तो सभी ताले खुल जाएँगे। सृष्टि की शुरुआत से आज तक यही सवाल पूछता रहा हूँ; सूरज उगता देखता हूँ, अस्त होता देखता हूँ, यही पूछता रहता हूँ। ज्ञानपापी हूँ, जानता रहा हूँ कि विशाल है ब्रह्मांड और कि मैं कुछ भी नहीं।
कथाओं-व्यथाओं की भीड़-भाड़ में से बचता बचाता यही लिखना चाहता रहा हूँ कि हे विशाल, मुझे दृष्टि दो।

होता यह है कि हवा धीरे बहती है, रात थमी रहती है. मैं भूल नहीं पाता कि एक स्त्री है जो मेरा कमरा साफ करती है; वह सुबह काम शुरू करती है और दोपहर तक लगातार कमरे ही साफ करती रहती है, मैं यह सोचता रह जाता हूँ कि क्या इसके बच्चे वैसे ही सपने देते हैं जैसे मेरा बच्चा देखता है; मुझे दिखता है एक आदमी बीच सड़क जान की परवाह नहीं मेरी गाड़ी के सामने बदन फैलाए खड़ा हुआ। उसे अठन्नी पकड़ाते हुए सोचता रह जाता हूँ कि यह वही तो नहीं जिसे आधी रात में पैदल नदी पार कर बच्चा जनाने अपनी बीबी को ले जाना पड़ा था...

मैं लिखता हूँ हे विशाल, मुझे दृष्टि दो पर जो दिखता है और नहीं दिखता, उसे देखने की ताकत दो न! ओ सृष्टि के नियमों, कुछ ऐसी भौतिकी चलाओ कि जो दिखे वह सचमुच दिखे।

या कि जैसे ईश्वर ठीक है, वैसे ही ठीक है यह खयाल कि कोई जवाब है जिससे सभी ताले खुल जाएँगे। सब ठीक है। फिलहाल ईश्वर ने जो जंग छेड़ी है मैं उसे देखता रहता हूँ।

मैं विक्षिप्त नंगा नाचता हूँ जब हर दिशा से आती हैं सुसज्जित गद्य में पद्य में लूट बलात्कार की खबरें 
हर तरफ आदमी दिखता है लुटा हुआ 
लूट सुनाई पड़ती है हर भाषा में            हिंदीउर्दूसंस्कृतअंग्रेज़ी में 

तभी निकल पड़ते हैं वे जो प्यार करते हैं जो हमें झंझावात की तरह खींच ले जाते हैं 
पुरानी गंदी गलियों में से गुजरते हुए हम सब मिलकर गीत गाते हैं 
दहकती लू में ठंडी हवाओं में हम सब मिलकर गीत गाते हैं 
शहरों में जंगलों में हम सब मिलकर गीत गाते हैं 
अपने बचपन में वयस्क जीवन में हम सब मिलकर गीत गाते हैं 
स्मृतियों की गड्डमड्ड धक्कमपेल में हम सब मिलकर गीत गाते हैं 
प्रेम की लंबी रातों में          प्रेम जो हमें तड़पाता रुलाता हँसाता रहता है       
प्रेम में जलते हुए खिलते हुए हम सब मिलकर गीत गाते हैं 

इस गद्यमय दुनिया को
धीरे धीरे बदल रही है हमारे स्वरों की रुनझुन। मैं यही तो लिखता हूँ । मैं गद्य के पद्य के सारे बंधन तोड़कर लिखता हूँ । 
अपनी विक्षिप्तता में तुम्हें शामिल करता लिखता हूँ। 

‘‘अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे। तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।’’

(सदानीरा - 2013)