Tuesday, February 02, 2016

मुझे दिखते बादल मटमैले


संवाद

मुझे दिखते बादल मटमैले

आप कहते हैं कि अब तूफान नहीं आएगा

मैं देखता हूँ कि हवा थमी ही नहीं


आप विरक्त हैं

आपके अंदाज़ में दया है

मेरे पास दो रास्ते हैं

एक कोना है जहाँ मैं सिमट सकता हूँ

दूसरा यह कि मैं आप की आँखों की सर्जरी करूँ

कि वे देख सकें जो चारों ओर है


आप समझाते हैं

कि मुझे बैठ जाना चाहिए

नहीं देखना चाहिए जो दिखता है


मैं कोने में सिमटने से पहले

उछलना चाहता हूँ

आप हैं जितने शिथिल

टाँगें बेजान, मुट्ठियाँ बंद

मेरा शरीर उतना ही है बेचैन

मुझे बदली में दिखती है धूप

हवा के कण परस्पर दूर भागते

दीवारें पारदर्शी

प्रकाश के साथ ताप का एहसास
 
ज़मीं से आस्मां तक धधकती फिजां

आप को लगता है कि

इन दिनों धरती रहने लायक नहीं रही

मैं धरती को चूमता हूँ

उन्मत्त नहीं, सधे ताल पर नाचता हूँ।      (वागर्थ 2016) 

Sunday, January 24, 2016

जो दमक रहा, शर्तिया काला है



यूनिवर्सिटी में छात्रों का आंदोलन रुका नहीं है। कैंपस में आए तरह-तरह के 
राजनैतिक नेताओं में सीताराम येचुरी और कविता कृष्णन ने सबसे बेहतर ढंग 
से बातें रखीं। जे एन यू से आए छात्र नेता शहेला रशीद को सुनकर भी अच्छा 
लगा। कल शाम शहर के सांस्कृतिक केंद्र ला मकां में रोहित वेमुला पर 
सार्वजनिक सभा हुई। यह बात सामने आई कि जातिगत भेदभाव को जड़ से उखाड़ने का वक्त आ गया है। 25 जनवरी को चलो एचसीयू (हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी)का आह्वान है। दूसरी ओर यूनिवर्सिटी के अध्यापकों में अधिकतर यह चाहने लगे हैं कि नियमित क्लासें लगनी शुरु हो।

चार दिन पहले यह छोटा लेख दैनिक भास्कर के लिए लिखा था। आज छपा है- मामूली काट-छाँट के साथ। 
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क्या आपके किसी परिचित ने कभी खुदकुशी की है? रोहित वेमुला एक युवा छात्र कार्यकर्ता था, जिससे दो चार बार मेरी मुलाकात हुई थी। आम सभाओं में मिले, एकबार शायद एक व्याख्यान के बाद भी हम कुछ देर तक साथ थे। एक इंसान जिसे मैं जानता था हमेशा के लिए गायब हो गया है। हम खबरों में किसानों की खुदकुशी की खबर पढ़ते हैं। किशोरों और युवाओं में खुदकुशी से मौत आमफहम बात होती जा रही है। करीब अड़तीस साल पहले आई आई टी कानपुर में पढ़ने के दौरान एक खुदकुशी की घटना हुई तो मुझे याद है मेरे अधिकतर दोस्त उसको कोस रहे थे जिसने खुदकुशी की थी। मैं बहस करता रहा कि यह किसी एक आदमी की नहीं सामाजिक बीमारी है। बहुत बाद में मैंने जाना कि समाजशास्त्र के संस्थापक माने जाने वाले विद्वान एमिल दुर्खाइम और माक्स वेबर दोनों ने अलग-अलग वैचारिक पक्ष रखते हुए खुदकुशी को सामाजिक परिघटना माना है। बेशक खुदकुशी का निर्णय ले रहा व्यक्ति हम आप जैसे आम लोगों से कुछ तो अलग होगा, पर यह मान लेना कि हम आप किसी की खुदकुशी के लिए बिल्कुल जिम्मेदार नहीं हैं, सही नहीं है। मसलन किसानों की बड़ी तादाद में हो रही खुदकुशी पर हम क्या कर रहे हैं? हम खबरें पढ़ते हैं और मन मसोस कर रह जाते हैं। पर सच तो यही है कि हमने आम लोगों को गैरबराबरी के इस स्तर पर लाकर खड़ा किया है कि लोग कर्ज और भुखमरी से छुटकारा पाने का और कोई रास्ता नहीं ढूँढ पा रहे हैं।

रोहित वेमुला की खुदकुशी के लिए वे सब लोग जिम्मेदार हैं, जिन्होंने मुल्क में ऐसे माहौल को उभरने दिया है, जिसमें विरोध की कोई भी आवाज़ सही नहीं जाती है। एक केंद्रीय मंत्री मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखता है कि हैदराबाद विश्वविद्यालय राष्ट्रविरोधी तत्वों का गढ़ बन गया है। क्यों, इसलिए कि कुछ छात्रों ने अदालत के किसी निर्णय को सही नहीं माना है और वे प्रतिवाद कर रहे हैं। क्या इस देश में इतना भी लोकतंत्र नहीं बचा है कि युवा नागरिक अपनी असहमति जाहिर कर सकें? मानव संसाधन विकास मंत्री विश्वविद्यालय से बार बार पूछती है कि साथी मंत्री की शिकायत पर कारवाई क्यों नहीं हो रही है। दबाव में आकर विश्वविद्यालय प्रशासन छ: दलित छात्रों के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा करता है। उनमें से एक, रोहित वेमुला, खुदकुशी कर लेता है।

हम ग़मजदा हैं, परेशान हैं, पर सचमुच इस तरह की घटनाओं की तैयारी हमारी होनी चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि व्यापक हिंसक गुंडा संस्कृति की शुरुआत डेढ़ साल पहले संसदीय चुनावों के पहले से हो चुकी है। लोकतंत्र जिनके लिए ढकोसला मात्र है, उनकी हुकूमत है। वे नगर-नगर दंगे करवाएँगे, वे बुद्धिजीवियों का कत्ल करेंगे, भय का मौसम लाएँगे, यह किसको नहीं मालूम था? ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि हमने इन स्थितियों को उभरने दे कर युवाओं के साथ दगा नहीं किया? आज अगर देश भर में दलितों में आक्रोश का उफान है तो इसमें अचरज किस बात का है? आज तो जो भी सत्ता पर काबिज परिवार के साथ नहीं है, वह राष्ट्रविरोधी है। जिसमें भी स्वाभिमान है, वह राष्ट्रविरोधी है। वह दलित या मुसलमान हो तो और भी राष्ट्रविरोधी है! क्या देश के किसी भी नागरिक को बेवजह राष्ट्रविरोधी कह देना सबसे बड़ा राष्ट्रविरोधी काम नहीं है? क्या किसी के भी खिलाफ राष्ट्रविरोधी होने का इल्ज़ाम लगाकर उस पर कारवाई करने की माँग राष्ट्रविरोधी काम नहीं है? रोहित वेमुला की खुदकुशी इस देश के सचेत लोगों के लिए यह सवाल रख गई है कि क्या हम अपनी जिम्मेदारियों को निभा रहे हैं? क्या इस देश में अकादमिक संस्थान राजनैतिक ताकतों के सामने इतने गुलाम हो गए हैं कि अपनी ही समिति के निर्णय को दरकिनार कर मंत्रियों के दबाव में छात्रों को सामाजिक बहिष्कार के फतवे जारी करने लगें? क्या यह देश वह देश रह गया है जिसे हम अपना देश मानते हैं?

गणतंत्र दिवस की संध्या पर हम रोहित वेमुला और उस जैेसे अनगिनत बेचैन युवाओं की ओर से आह्वान करते हैं कि ऐ देश के लोगों, इन असली गद्दारों को पहचानो, जो इस मुल्क को तबाह करने को तत्पर हैं। हाल में हमें छोड़ गए कवि वीरेन डंगवाल की पंक्तियों को हम याद करें - 'हमने यह कैसा समाज रच डाला है/ इसमें जो दमक रहा, शर्तिया काला है।' हम कब तक इन शर्तिया हत्यारों को झेलते रहेंगे?

ोहित वेमुला एक प्रतिभाशील युवा था, जिससे मैं दो चार बार मिला था। वह अब इस दुनिया में नहीं है। मैं इस निष्ठुर समाज में किससे कहूँ कि जिन राजनैतिक परस्थितियों में देश के ईमानदार युवाओं को धकेला गया है, वह ग़लत है। फिलहाल मैं सिर्फ खुद को कटघरे में खड़ा कर सकता हूँ और पूछ सकता हूँ कि तुमने क्या किया। क्या ऐसा वक्त आ गया है कि हम समझदारी की रस्मों को तोड़ें और शहर के सबसे व्यस्त चौक पर नंगे खड़े हो कर चीख कर कहें कि कोई हमारे बच्चों को इन हिंसक बीमारों से बचाए, जो मुल्क के तख्त पर आसीन हैं?

Monday, January 18, 2016

जैसे कोई पिता सबके सामने हँसते हुए भी रोता है

हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की मौत के हादसे से लाखों लोग सदमे में हैं। मैं देख रहा हूँ कि ऐसे वक्त भी कुछ लोग छात्रों की योग्यता पर सवाल उठा रहे हैं। कैसे निर्दयी लोगों से घिरे हैं हम! 
पिछले हफ्ते परवेज हूदभाई का व्याख्यान करवाया था और फिर संजय जोशी ने प्रतिरोध के सिनेमा पर हमारे यहाँ बातचीत की थी। एक ताज़गी सी आ गई थी। पर कल शाम से मन खिन्न है।


हिंसा

हिंसा किसी भी खयाल में होती है

कुदरत ने दी यह फितरत कि

सोचने मात्र से कहीं किसी को रुला बैठते हैं हम

कभी जीव हो जाता है निर्जीव


जो कुछ देखता हूँ ज़ेहन के दरवाजों से

अंदर जा बसता है

चाहता हूँ कि छोटी बातें करूँ

कैसे हैं आप और घर परिवार कैसा है जैसी

जो सोचता हूँ वह रुक जाता है अचानक आ बसे

दृश्यों में जैसे कोई पिता सबके सामने हँसते हुए भी रोता है

कि उसकी बेटी बड़ी हो गई है

यूँ मकसद बनता है चमकीले दृश्यों का

आते हैं जो धरती के अंजान कोनों से चीख बन।

कितनी फिल्में देखूँ कि जान लूँ

कि हर ओर एक ही राग, एक ही विराग।


फिल्में बनती रहती हैं

निहतों के नाम गिने जाते हैं

राजा जी साल दर साल हवा में मिठास घोलते हैं

हवा ज़हरीली होती रहती है। 

(वागर्थ -2016) 

Sunday, January 03, 2016

लौटता हूँ सेरा टीसडेल की कविताओं में


ए बी बर्धन की बेबाकी को सुनने का अलग ही मज़ा होता था। 
उनकी ज़िंदादिली को याद करते हुए लौट रहा हूँ सेरा टीसडेल की कविताओं में - जिनकी सादगी मुझे 
सहलाती है। 
  
Words For An Old Air

Your heart is bound tightly, let
Beauty beware,
It is not hers to set
Free from the snare.

Tell her a bleeding hand
Bound it and tied it,
Tell her the knot will stand
Though she deride it;

One who withheld so long
 All that you yearned to take,
Has made a snare too strong
For Beauty's self to break.

पुरानी हवा के लिए अल्फाज़

हुस्न को खबर हो कि
तुम्हारा दिल है सख्त बँधा,
इस जाल से छुड़ाना
काम नहीं है उसका।

उसे खबर करो कि घायल हाथों ने
इसे बाँधा जकड़ा
कह दो कि वह रोए पीटे
बंधन बड़ा यह तगड़ा।

अब तक जिसने सहा
जो कुछ भी पाना चाहा तुमने
ऐसा सख्त जाल रचा उसने
जो न टूटेगा हुस्न की खुदी से।


Mountain Water

You have taken a drink from a wild fountain
Early in the year;
There is nowhere to go from the top of a mountain
But down, my dear;
And the springs that flow on the floor of the valley
Will never seem fresh or clear
For thinking of the glitter of the mountain water
In the feathery green of the year.

पहाड़ का पानी

तुमने साल की शुरुआत में
जंगली झरने का पानी पिया है;
पहाड़ की चोटी से कहीं और नहीं जा सकते
प्रिय, रास्ता बस नीचे ही जाने का है;
और घाटी की सतह पर जो सोते बहते हैं
वे कभी साफ और पारदर्शी न दिखेंगे
साल के पंख भरी हरीतिमा के दिनों
पहाड़ के पानी की झलक क्या सोचेंगे।

Two Minds

Your mind and mine are such great lovers they
Have freed themselves from cautious human clay,
And on wild clouds of thought, naked together
They ride above us in extreme delight;
We see them, we look up with a lone envy
And watch them in their zone of crystal weather
That changes not for winter or the night.

दो दिल

तेरे मेरे दिल ऐसे गहरे आशिक हैं
कि वे सँभली इंसानी ज़मीं से छूट चुके हैं
ऊपर खयालों के पागल बादलों पर, इकट्ठे नंगे
मस्तमौला सैर कर रहे हैं;
उन्हें देखते हम, बस जलन के साथ
और साफ मौसम की फिज़ां में दिखते वे
न वो जाड़ों में न रातों में बदलते हैं।             (सदानीरा - 2015)

Saturday, January 02, 2016

प्रवासी भारतीय और हम


प्रवासी भारतीयों से एक संवाद
-'गर्भनाल' के ताज़ा प्रवासी भारतीय विशेषांक में प्रकाशित लेख

इसके पहले कि मैं प्रवासी भारतीयों से संवाद स्थापित करने की कोशिश करूँ, मैं अपने बारे में कुछ कह लूँ। इसे एक तरह से अपने 'क्रीडेंशल' स्थापित करना भी कह सकते हैं।
मैं कुल मिलाकर तकरीबन साढ़े आठ साल यू एस ए में रहा हूँ। इसके अलावा इंग्लैंड के ब्रिस्टल में तीन गर्मियाँ बिताई हैं। एक बार दो हफ्तों के लिए जर्मनी में भी रहा हूँ। इसलिए प्रवासी होने का कुछ तज़ुर्बा मुझे है। ...
आजकल प्रवासी भारतीयों की चर्चा आम होती रहती है। भारतीय राजनीति में उनकी रुचि पहले से अधिक हो, ऐसा नहीं है, पर वह पहले से अधिक दिखती है। इधर केंद्र में वर्तमान सत्तासीन दल ने प्रवासी भारतीयों को साथ जोड़ने की कोशिशें बढ़ाई हैं। इस पत्रिका के संपादक ने ध्यान दिलाया है कि"मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, क्लीन इंडिया, डिजिटल इंडिया, क्लीन गंगा" जैसे कई नारों के साथ प्रवासी भारतीयों को जोड़ा गया है। यह कहना ग़लत होगा कि सभी प्रवासी भारतीय एक जैसी सोच रखते हैं, पर अक्सर मीडिया में वर्तमान सरकार के साथ सहमति जताने वाले प्रवासी बंधु आक्रामक रुख के साथ दिखलाई देते हैं। लगता है जैसे कि कोई बड़ी लड़ाई छिड़ गई है, जिसके एक ओर सरकार समर्थक हैं तो दूसरी ओर सरकार विरोधी हैं। सोशल मीडिया में बड़ी तादाद में अभद्र और गाली गलौज भरी भाषा के साथ चिल्ल-पों दिखलाई पड़ती है। इस तरह से देखने पर संवाद की स्थिति नहीं रह जाती। अलग-अलग विषयों पर उनकी अपनी जटिलताओं को लेकर संवाद हो सकता है।
आज़ादी के बाद से अब तक भारत में राष्ट्रवादी सोच का वर्चस्व रहा है। हम सब अपने देश पर गर्व करते हुए, यह मानते हुए कि हमारी परंपराएँ, हमारे संस्कार सर्वश्रेष्ठ हैं, बड़े हुए हैं। चाहे क्रिकेट के मैच हों या आतंकवाद पर बहस, हमलोग अधिकतर यह मानकर चलते हैं कि हमें भारत के साथ रहना है। इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। सारी दुनिया में हर मुल्क में लोग इसी तरह सोचते हैं। वे अपनी परंपराओं को, अपनी संस्कृति को औरों से बेहतर मानते हैं। कहा जा सकता है कि स्थायित्व के लिए आम लोगों में ऐसी सोच, जिसे अक्सर ग़लती से देशभक्ति कह दिया जाता है, होनी चाहिए। यह देशभक्ति नहीं हो सकती, क्योंकि इस तरह की सोच अंततोगत्वा मुल्कों के बीच स्पर्धा और जंग लड़ाई मार तक ले जाती है, जिसेस किसी देश का कोई भला नहीं होता।
बहरहाल, राष्ट्रवाद को देशभक्ति मानकर, विकसित पूँजीवादी मुल्कों में प्रवास में पहुँचे भारतीय को कितनी तकलीफ होती होगी, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। वैसे अधिकतर तो गए ही इस वजह से हैं कि उन्हें भारत में रहने की तकलीफ थी। अफ्रीका या दुनिया के और ग़रीब इलाकों में गए भारतीयों में ऐसी उत्तेजना कम दिखती है, जैसी अमेरिका में पहुँचे देशवासियों में है। अमेरिका के और दीगर और मुल्कों में गए प्रवासियों में क्या फर्क है?
उन्नीसवीं सदी के आखिर से ही भारत के कई इलाकों से लोग अमेरिका में जाते रहे हैं। इनमें से पंजाब से गए कई लोग कैलिफोर्निया में बड़ी ज़मीनों में आलू की खेती करते थे और पोटेटो किंग भी कहलाए। उनकी बढ़ती संपन्नता के कारण उनके साथ भेदभाव भी बढ़ने लगा और बीसवीं सदी के बीचोंबीच नागरिक अधिकार और भदभाव के खिलाफ पहले कुछ मुकदमे भी ऐसे भारतीय प्रवासियों ने लड़े। पर पचास के दशक से यू एस ए में कामगार भारतीयों को आने की अनुमति नहीं रही। इस मामले में कनाडा और ब्रिटेन अलग हैं, वहाँ आज भी कामगार भारतीय, मुश्किल से सही, जाते रहते हैं, पर यू एस ए में ऐसे लोगों का जा पाना असंभव ही है। पर शुरूआती दौर के उन्हीं प्रवासियों ने ग़दर पार्टी बनाई और भारत की आज़ादी की लड़ाई में मुकम्मल जगह बनाई। पंजाब में आज भी उन्हें गदरी बाबा के नाम से याद किया जाता है। ऐसे ही बंगाल के एक नरेंद्र भट्टाचार्य थे, जो बाद में मानवेंद्र नाथ रॉय कहलाए और बीसवीं सदी के क्रांतिकारी और मानवतावादी महान चिंतकों में गिने गए।
यू एस ए में उच्च-शिक्षित और अव्वल दर्जे की काबिलियत होने के बावजूद प्रवासी भारतीयों को कई तरह के भेदभाव सहने पड़े हैं। इसके खिलाफ वे मुखर रहे हैं। पर पिछली कई सदियों से अफ्रीकी मूल के लोगों ने नस्लवाद के खिलाफ जिस तरह का संघर्ष किया है और आज भी कर रहे हैं, उसमें हाल में यू एस ए आए तीन पीढ़ियों के भारतीयों की भूमिका नहीं के बराबर रही है। इतना ही नहीं, भारतीयों में काले लोगों के प्रति नस्लवादी रवैया भारत में तो है ही, प्रवासी भारतीय अमेरिका और ब्रिटेन में भी ऐसे ही पेश आते हैं। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो सामाजिक बराबरी के लिए लड़ रहे लोगों के साथ मिलकर आवाज़ उठाते हों। हाल में सीएटल में क्षमा सावंत इनमें से एक प्रमुख नाम हैं।
मुझे अपनी यूनिवर्सिटी के दिन याद आते हैं1984 में मैं पी एच डी की थीसिस खत्म करने के मोड़ पर था। दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ आंदोलन विश्व-व्यापी बन चुका था। भारत दशकों से दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी की पहल करता रहा और संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत और गुट निरपेक्ष देशों के बहुमत से पारित मत के खिलाफ सुरक्षा परिषद में अमिका और ब्रिटेन वीटो का उपयोग करते रहे। सत्तर के बाद के दशक में एक बार अफ्रीकी मूल के अेमेिकी छात्रों ने नस्लभेद के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। उस वक्त के दूसरे आंदोलनों की तरह यह भी धीरे धीरे ढीला पड़ गया। पर अस्सी के शुरुआती सालों में ओलिवर तांबो के नेतृत्व में (नेल्सन मांडेला जेल में थे) अफ्रीकी नैशनल कांग्रेस ने पश्चिमी मुल्कों में अपनी ज़मीन बढ़ाने के लिए मुहिम तेज कर दी थी। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से अपार्थीड के खिलाफ सूचनाएँ खुले आम बाँटी जा रही थीं।
अमिरिकी कैंपसों में 1984 में हवा सी चल पड़ी थी कि दक्षिण अफ्रीका को लेकर कुछ करना है। अमिकी व्यापारी वर्ग आर्थिक नाकेबंदी के पूरी तरह खिलाफ था। प्रिंस्टन जैसे कई विश्वविद्यालय के ट्रस्ट के पैसे ऐसी कंपनियों में निवेशित थे जिनका ताल्लुक दक्षिण अफ्रीका से था। हमलोगों ने 'डाइवेस्टमेंट' यानी निवेश किया पैसा वापस लो का आंदोलन शुरु किया। मैंने दक्षिण अफ्रीका के चर्चित उपन्यासकार ऐलन पैटन की पुस्तक 'क्राई बीलवेड कंट्री' की तर्ज पर नारा बनाया 'क्राई बीलवेड प्रिंस्टन'1984 की प्रिंस्टन की रीयूनियन परेड में जाली ताबूतों के साथ हम जबरन शामिल हो गए।
1985
की मई के पहले हफ्ते में मेरा थीसिस डिफेंस हो गया और मैं औपचारिक रुप से पी एच डी की डिग्री पाने के लिए पास हो चुका था। फिर एक दिन आंदोलन की समिति ने तय किया कि रात को मुख्य प्रशासनिक बिल्डिंग के पास एक चर्च में छिपे रहेंगे और सुबह मुँह अँधेरे बिल्डिंग पर अधिकार कर लेंगे। सारी रात हम गीत गाते रहे। फिर सुबह करीब नब्बे से सौ लोग नासाउ बिल्डिंग के अलग अलग गेटों पर खड़े हो गए। नासाउ बिल्डिंग प्रिंस्टन की वह ऐतिहासिक इमारत है जहाँ अमरीकी आजादी की लड़ाई के दौरान काँग्रेस की सभाएँ होती थीं। पुलिस हमें राइट्स पढ़कर सुना रहाृी और हम 'डेथ टू अपार्थाइड, फ्री मांडेला' नारे लगाते रहे। पाँच घंटे जेल परिसर में हल्ला गुल्ला मचाकर कागजात साइन कर हमलोग आ गए। बाद में एक प्रसिद्ध वकील ने मुफ्त में हमारी ओर से पैरवी का निर्णय लिया। यूनिवर्सिटी काउंसिल ने अपनी अलग सुनवाई की।
आज अमेरिका जैसे देश में प्रवासी भारतीयों को जो बराबरी का माहौल दिखता है, उसको बनाने में संघर्ष का इतिहास क्या है, इस बारे में उनको कितनी जानकारी है? भारत की अंदरूनी स्थिति और प्रवासियों की भूमिका पर आने से पहले हमें यह पूछना चाहिए कि अगर सचमुच कोई भरतीय अस्मिता प्रवासियों में है, तो उन्होंने अपने नए मुल्कों में बसे दक्षिण एशियाई लोगों के इतिहास के बारे में जानने की क्या कोशिश की है। इस सवाल का जवाब हताशाजनक है। मुझे अचरज नहीं होगा अगर हम पाएँ कि अमेरिका में बसे अधिकतर प्रवासियों को ग़दर पार्टी के बारे में ही कुछ भी न पता हो। कनाडा और यू के की बात जरा अलग है, क्योंकि वहाँ प्रवासियों की संस्कृति उच्च जाति-वर्ग की संकीर्णताओं से उस हद तक प्रभावित नहीं है।
आज भारत में छात्र शिक्षा के बुनियादी अधिकारों को लेकर लड़ रहे हैं। देश भर में किसान मजदूर अलग अलग मुद्दों पर व्यवस्था के साथ लड़ रहे हैं। क्या भारतीय प्रवासी जिन सुविधाओं के लिए अपने नए मुल्कों में माँग करते हैं, उसका बहुत छोटा सा हिस्सा भी अपने हर देशवासी को देना चाहते हैं? फिलहाल तो लगता है कि भारत में रह रहे सुविधा-संपन्न लोगों की तरह ही अधिकतर प्रवासी भारतीय भी भारत के अधिकांश लोगों को अनदेखा ही करते हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए भारत में कई तरह की सुविधाएँ विकसित हुई हैं, जिनका कुछ फायदा हमारे जैसे मध्य-वर्ग के लोगों को मिलता रहता है, पर देश की बहुत बड़ी जनसंख्या इनसे बिल्कुल ही वंचित है। यहाँ तक कि जिन नागरिक अधिकारों के लिए अमेरिका में वंचितों ने संघर्ष किया, वे हमारे लोगों से छीने जा रहे हैं; हाल में हरियाणा में पंचायत चुनावों में मतदान का हक ग़रीबों से यह कहकर छीना गया है कि उन्हें पर्याप्त तालीम नहीं मिली है। क्या भारतीय प्रवासी कभी इन बातों के बारे में सोचते हैं? अगर हाँ, तो एक बुनियादी बात जो समझनी पड़ेगी, वह यह है कि हम सरकार के पक्ष-विपक्ष में इस तरह खुद को खड़ा कर कोई संवाद नहीं कर सकते कि जैसे कोई स्थानीय क्रिकेट मैच में एक टीम के साथ हम हैं। हमें खुद से पूछना पड़ेगा कि हम लोगों के पक्ष में या विपक्ष में हैं। अगर इस संदर्भ में हम सरकार को या किसी को भी जनहित के खिलाफ पाते हैं तो हमें अपना पक्ष चुनना होगा।
बदकिस्मती से अब तक का मानव-इतिहास लोगों को बाँट कर लिखा गया है। कुदरत ने हमें काबिलियत दी कि हम तक्नोलोजी की ईजाद कर पाए, हमने सवाल पूछे और कुदरत के रहस्यों को समझन की कोशिश की। पर इसे मानव के लिए कुदरत की अनोखी देन न कह कर हमने इसे ग्रीको-रोमन, प्राच्य आदि सभ्यताओं में बाँट दिया। प्रवासी भारतीय अक्सर खुद को भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि और प्रचारक मानते हैं। यह कितनी हास्यास्पद बात है कि भयंकर गैरबराबरी वाले दक्षिण एशियाई मुल्कों से आए कई लोग विदेशों में खुद को वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति के वारिस घोषित करते हैं! इनके रहन-सहन, पहनावे, खान-पान, किसी भी चीज़ में पूरब की झलक कम ही होती है, पर ये मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों पर करोड़ों खर्च कर भारतीय संस्कृति के स्वयंभू पहरेदार बने फिरते हैं। इनके पैसों से भारत की राजनीति में भूचाल आते रहते हैं, लोकतंत्र में अवांछित हस्तक्षेप कर ये लोग दक्षिण एशिया में रहने वाले लोगों की बदहाली बढ़ाते रहते हैं और इनको यह गुमान है कि ये भारत के प्रतिनिधि हैं। यहाँ तक कि पिछड़े तबकों के लिए आरक्षण का खुलकर विरोध करते ये लोग अपने लिए अधिकांश संस्थानों में आरक्षण लिए हुए हैं, पर इनको कोई शर्म नहीं। भारत में बहुत कम ही ऐसे शिक्षा संस्थान रह गए हैं जहाँ एन आर आई सीट्स न हों। अगर अपने बच्चे नहीं तो भारत में रह रहे अपने किसी संबंधी के बच्चों को इन सीटों पर ग़लत ढंग से दाखिला करवाने वाले लोग कैसे खुद को भारतीय हितों के रक्षक कह सकते हैं। सच्चाई यह है कि दुनिया के हर इलाके में मिलती-जुलती संस्कृतियाँ रही हैं, जिनमें भौतिक परिस्थितियों के मुताबिक थोड़े बहुत फर्क रहे हैं। आधुनिक पश्चिमी सभ्यता और पुरानी ग्रीको-रोमन सभ्यता में वैसा ही फर्क है जैसा हमारे यहाँ बड़े शहरों और गाँवों में है।
सही है कि हर किसी के बारे में ऐसा सामान्यीकरण करना ग़लत होगा। बहुत सारे लोग भले हैं और आर्थिक सहायता से लेकर अलग-अलग कई तरीकों से भारत में रह रहे लोगों की मदद कर रहे हैं। इसलिए सत्तासीन राजनैतिक दल भी "मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, क्लीन इंडिया, डिजिटल इंडिया, क्लीन गंगा" जैसे नारों को उछालकर उनका फायदा उठाना चाहता है। पर सचमुच जो भला चाहते हैं, उन्हें सार्थक हस्तक्षेप के लिए कई बातों पर सोचना पड़ेगा, जिनमें से कुछ ये हैं -
1. पश्चिमी मुल्कों में बड़ी तादाद में बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते हैं और वहाँ बिना खर्च के या बहुत कम खर्च में पढ़ाई लिखाई करते हैं। भारत में क्रमबद्ध ढंग से सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है या ऐसी स्थितियाँ पैदा की जा रही हैं कि वे सुचारु रूप से चल न पाएँ। इसके खिलाफ देश भर में आंदोलन हो रहे हैं, पर केंद्र या राज्य सरकारों के कानों में जूँ तक नहीं रेंग रही है। तालीम के निजीकरण के साथ अंग्रेज़ी को जबरन शिक्षा के माध्यम के रूप में थोपा जा रहा है। इससे हमारी संस्कृति तो क्या, भाषाएँ खत्म होंगी तो इंसान के रूप में हमरी पहचान खत्म हो जाएगी। क्या पढ़े-लिखे प्रवासी भारतीय हमारी भाषाओं में लिखा साहित्य पढ़ रहे हैं? अगर हाँ तो यहाँ साहित्य उत्सवों के नाम पर अंग्रेज़ी वालों की उछल-कूद क्यों होती रहती है? कुछ लोग शोर मचाकर खुद को इस भ्रम में डाल लें कि अब अंग्रेज़ी भारतीय ज़ुबान बन गई है, पर ऐसा वाकई होने में अभी कुछ सदियाँ और लगेंगी। सही कदम यह होगा कि सरकारी मदद से, और स्वायत्त प्रशासन की, समान स्कूली व्यवस्था लागू हो (जैसे अमेरिका के नेबरहुड स्कूल हैं) और हर बच्चे को उसकी अपनी भाषा या सबसे करीब की भाषा में तालीम दी जाए।
2. विकास के नाम पर ग़रीब आदिवासियों और दूसरे तबकों को उनकी ज़मीनों से उखाड़ा जा रहा है, और इस पर किसी भी तरह के विरोध को नक्सलवाद का नाम देकर बेरहमी से कुचला जा रहा है। अगर सचमुच विकास का मतलब लोगों का विस्थापन है, तो इस प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। इसके लिए शिक्षा जैसे बुनियादी अधिकारों को मजबू करना पड़ेगा। अभी सरकारी आँकड़ों के मुताबिक एक चौथाई जनता अनपढ़ है। सरकार और संपन्न वर्गों का रवैया ग़रीब तबकों के साथ ऐसा है जैसे कि वे सड़क पर घूमते जानवरों जैसे हैं। देसी सरमाएदार अपने फायदे के लिए देश के बहुसंख्यक लोगों के हितों के खिलाफ विदेशी पूँजी के साथ मिलकर संसाधनों की बेतहाशा लूट में लगे हुए हैं और सरकार इसी को विकास कहती है।
3. जनसंख्या के बड़े हिस्से में भयंकर ग़रीबी और भुखमरी के बावजूद सरकार सुरक्षा खाते में राष्ट्रीय बजट का एक चौथाई लगाती है। प्रवासियों को यह समझना होगा और हमारी सरकारों पर दबाव डालना होगा कि दुनिया के हर इलाके में इंसान की एक सी तकलीफें हैं और आपसी विवादों को जंग लड़ाई से नहीं, बल्कि बातचीत के द्वारा सुलझाना होगा। हमारी सरकारें औरों से बेहतर हैं या नहीं, इस बात को प्रवासी जिस तरह समझ सकते हैं, देश के अंदर रह रहे लोग उस तरह नहीं समझ सकते। देश की सुरक्षा के नाम पर तैयार की गई फौजों और अलग-अलग तरह के पुलिस बलों को अक्सर आम ग़रीब-गुरबा के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह देश में लोकतंत्र को कमजोर कर संपन्न तबकों के हितों की रक्षा की जाती है।
4. दक्षिण एशिया का इतिहास उतना ही विविध है जितना कि यूरोप का है। जैसे सारे यूरोप को किसी एक सभ्यता में समेट लेना नासमझी है, वैसे ही किसी एक भारतीय सभ्यता की बात करना भी नासमझी है। भौगोलिक कारणों से अतीत में दक्षिण एशिया में दुनिया भर से लोग आते जाते रहे, ज्ञान-विज्ञान का विकास प्रसार हुआ, पर यह भी सच है कि सामाजिक भेदभाव की पराकाष्ठा भी यहीं थी, जिसकी वजह से बहुसंख्यक लोगों को पठन-पाठन और बौद्धिक कर्म से दूर रखा गया। इसका नतीज़ा आज भी हम भुगत रहे हैं। विशेष जाति और वर्ग से आए एक निहायत ही छोटे हिस्से के लोग पूरे देश पर काबिज हैं। इस वजह से सही काबिलियत सामने नहीं आ पा रही है और इम्तहानों में परिणामों के बल पर दोयम दर्जे के लोग सत्ता के हर कोने पर ऊपर बैठे हुए हैं। धाँधलियाँ आम हैं, जहाँ 'दलक' जातियों के लोग एक दूसरे की मदद कर ग़लत ढंग से नौकरियों लेते-दिलाते हैं।जिन्हें लगता है कि वे भारत के हितों के लिए काम करना चाहते हैं, उन्हें ब्राह्मणवाद और भारतीय सभ्यता की एकांगी पहचान से हटकर हर तरह की गैरबराबरी के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी।
इन बातों को ध्यान में रख कर यह सवाल उठाना लाजिम है कि मेक इन इंडिया तो ठीक, पर किस के लिए? क्या चीन की तरह हमारे यहाँ भी सस्ते श्रम का बेइंसाफी से फायदा उठाने का षड़यंत्र हो रहा है? कौ नहीं चाहता कि 'स्किल' बढ़े, स्वच्छ परिवेश हो, डिजिटल या और नई तक्नोलोजी का फायदा हर नागरिक उठाए, पर क्या सबके हाथ सस्ता मोबाइल पकड़ा देना ही डिजिटल कहलाता है? प्राथमिक शिक्षा में नामांकित बच्चों में बड़ी संख्या में मिडिल स्कूल आते-आते पढ़ना छोड़ क्यों दे रहे हैं? गंगा तो क्लीन होनी ही चाहिए, पर गाँव-गाँव से पीने का पानी खत्म क्यों हो गया है? जब प्रवासी भारतीय एक या दूसरी राजनैतिक पार्टी के लिए मोर्चाबंदी कर खड़े हो जाते हैं तो वे दक्षिण एशिया के मुल्कों का भला नहीं, नुकसान कर रहे होते हैं। यह बात समझन पड़ेगी कि लोकतांत्रिक ढाँचे के अंदर बराबरी के लिए लड़ाई चल रही है, चलती रहेगी और इस लड़ाई में आज जैसी सरकार के पक्ष में खड़े लोग जनता के विरोध में ही होंगे।

Wednesday, December 30, 2015

आज 'वाङ्चू' पढ़ते हुए


'वाङ्चू' - आज भीष्म साहनी को कैसे पढ़ें?
'बनास जन' पत्रिका के भीष्म साहनी विशेषांक में प्रकाशित

विश्व साहित्य में तकरीबन सभी भाषाओं में प्रवासी जीवन के अनुभव पर बहुत कुछ लिखा मिलता है। अपने परिवेश से हटकर किसी दूसरे मुल्क में जाने पर या अपने ही मुल्क में किसी ऐसे इलाके में जाने पर जहाँ रस्मो-रिवाज भिन्न हों, जैसी मुश्किलें आती हैं, इस पर पूरे विश्व-साहित्य में खूब लिखा गया है। प्रवासी भारतीय जो लंबे समय तक विदेशों में रहे हैं, उन्होंने ऐसे अनुभवों पर उपन्यास या संस्मरण लिखे हैं। भीष्म साहनी की 'वाङ्चू' कहानी में वाचक अपने प्रवास के अनुभव की कहानी नहीं कह रहा, बल्कि वह भारत में आए ऐसे विदेशी की कथा कह रहा है, जिसे उसका अपना देश अपनाना नहीं चाहता और भारत में भी, जहाँ वह बस गया है, यहाँ भी उसके लिए जगह नहीं रहती।

भीष्म साहनी की रचनाएँ अपने समय की जीवंत कथाएँ हैं। इसलिए उन की रचनाओं पर बहुत कुछ लिखा मिलता है, पर 'वाङ्चू' पर बहुत कम ही लिखा गया है। उनकी और दीगर कहानियों, उपन्यासों में समकालीन भारतीय समाज की विसंगतियों पर जोर है। 'तमस' और ऐसी कई रचनाएँ तो देश के विभाजन से उपजी त्रासदी पर हैं। पर गहराई से देखने पर हम जान पाते हैं कि सचमुच उनका लेखन मानव नियति पर है। सामाजिक प्रक्रियाओं से समूह-संस्कृतियों का बनना और ऐसे समूहों का परस्पर के प्रति हिंसा और नफ़रत में बह जाना, इसी के बीच संवेदनशील इंसान का पलना, बचपन से लेकर पूर्ण वयस्क अनुभवों तक से गुजरना, इन बातों को ही हम उनके लेखन में पाते हैं। मसलन उनके 'झरोखे' उपन्यास में ऐसे ही एक चरित्र के जरिए मानव नियति को ही दिखलाने की कोशिश है। इस अर्थ में उनके लेखन में ऐसी सार्वभौमिकता है, जो उसे अनन्य बना देती है। अपने रूप में बिल्कुल अलग होते हुए भी, उनकी रचनाएँ चेखव से प्रेमचंद तक के महान कथाकारों की रचनाओं की श्रेणी में आ जाती हैं।

'वाङ्चू' की कहानी भी ऐसे सार्वभौमिक तज़ुर्बे की ज़मीन पर खड़ी है। अपने देश को छोड़ कर दूसरे देश में जा बसने के कई कारण हो सकते हैं। अक्सर लोग आर्थिक कारणों से विदेश जाते हैं। पूरी तरह बौद्धिक कारणों से विदेश जाना कुछ ही लोगों के लिए संभव होता है। आजकल जब भारतीय युवा अमेरिका और दीगर यूरोपी मुल्कों में जाकर वहाँ बस जाते हैं, इसके पीछे बड़ी वजह पैसा कमाने और बेहतर भौतिक संसाधनों से संपन्न जीवन जीने की ही होती है। कुछ ही लोग ऐेसे होते हैं जिनको विशेष ज्ञान पाने की तड़प होती है और इसी खोज में वे पश्चिम जाते हैं। पुराने जमाने में विदेशों से लोग ऐसे ही कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में आते थे। धरती पर यही एक ऐसी जगह थी जहाँ मौसम खुशनुमा होने के साथ ही खेतीबाड़ी पर आधारित स्थाई समाज बस पाए थे। बौद्धिक अध्ययन और शोध के छोटे-बड़े केंद्र थे। हाल की सदियों में यहाँ से दूसरे देशों में बड़ी संख्या में लोगों का जाना उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हुआ। मसलन कई मुल्कों (तब यहाँ दर्जनों छोटे-बड़े मुल्क थे) से बंधुआ मजदूर बनाकर अफ्रीका महाद्वीप और करिबीयन द्वीपों में लोगों को ले जाया गया।

शैली के लिहाज से 'वाङ्चू' साठोत्तरी 'नई कहानी' कही जाएगी। पर कहानी में कला नहीं, बल्कि चरित्र और घटनाएँ ही ध्यान खीचते हैं। सतही पाठ से यह कहानी महज एक चीनी शख्स के बारे में है, जो भारत आया और अपने जीवन के आखिरी दिनोें में सिर्फ शक्ल से चीनी होने की वजह से भारतीयों की हिंसा का शिकार हुआ। एक औसत भारतीय के मन में चीन के प्रति हमेशा ही विद्वेष का भाव रहा है। यह काफी हद तक नस्लवादी विद्वेष है। यहाँ तक कि हम अपने ही देश के उत्तर-पूर्व के लोगों को उनकी मंगोल शक्ल की वजह से चिंकी कहकर पुकारते हैं। कमाल यह है कि चीन पड़ोसी देश है, कभी भी भारतीय उपमहाद्वीप में हुई बौद्धिक तरक्की से पीछे नहीं रहा, भारतीय भूखंड के इतिहास के बारे में बहुत सारी जानकारी चीनी यात्रियों के लिखे विवरण से मिलती हैं, फिर भी चीनियों को लेकर हमारे मन में न केवल उत्सुकता कम है, बल्कि विद्वेष की भावना भरी हुई है। बीसवीं सदी में बड़ी तादाद में चीनी व्यापारी भारत में आए और कोलकाता जैसे शहरों में बस गए। उनके परिवार के लोगों को हमेशा ही भेदभाव का शिकार होना पड़ा। और आज भी स्थिति कोई बहुत बदली नहीं है। इसके विपरीत ऐसे उदाहरण भी हैं जहाँ भारत के कुछ लोगों ने चीन के बारे में जानने समझने की कोशिश की, यहाँ तक कि आपदाओं में उनकी मदद करने की कोशिश भी की। चीनी साम्यवादी क्रांति के दिनों में डॉक्टर कोटनीस और उनके सहयोगियों की समर्पित सेवा को आज तक चीन कृतज्ञता के साथ याद करता है और भारत-चीन मैत्री में यह एक स्तंभ है।

पर 'वाङ्चू' सिर्फ उस चीनी आदमी की कहानी नहीं है। जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्रीयता के आधार पर संकीर्णता ही इसका असली विषय है। आज इंसान इन सभी संकीर्णताओं से भरा हुआ है। इस संकीर्णता का फायदा उठाने वाले बहुत हैं और जाने-अंजाने हम उनका शिकार बनते हैं। आज देश की जो स्थिति है, उसमें यही माहौल चौंधियाता दिखता है। अपनी पहली लाइन में ही कहानी हमें कहती है कि हम अपने संकीर्ण सोच से अलग हर कुछ को दूर का मानते हैं। - 'तभी दूर से वाङ्चू आता दिखाई दिया।' धरती बहुत बड़ी है, पर जो दिखता है वह दूर दिखे, पर दिखता तो है। वाङ्चू का परिचय एक धर्मपरायण व्यक्ति का है, वह बौद्धभिक्षु नहीं है, पर वह वैसा ही दिखता है, और 'महाप्राण' यानी भगवान बुद्ध की बात करते हुए वह भावविह्वल हो उठता है और उसका गला रुँध आता है। भीष्म साहनी स्वयं पंजाबी हिंदू परिवार के हैं और मुख्यधारा का जो सुर कथावाचक में ढला है वह एक औसत भारतीय दृष्टि का है। कहानी में शुरू से ही हम सचेत हो जाते हैं कि कोई है, जिसका नाम हमारे नाम जैसा नहीं है, जो देखने में हम जैसा नहीं है, जिसके प्रति हम सहानुभूति रख सकते हैं, पर वह कभी भी हममें से एक नहीं हो सकता। वह हमारी तरह शब्दों का उच्चारण नहीं कर सकता, 'अच्छा' को 'अच्चा' कहता है, हमें आसपास हो रही जो घटनाएँ उत्तेजित करती हैं, वह उसे नहीं करतीं। वह - '... बोलता है, न चहकता है। कुछ पता नहीं चलता, हँस रहा है या रो रहा है। सारा वक्त एक कोने में दुबक कर बैठा रहता है।'

इस मायने में यह कहानी रवींद्रनाथ की कहानी 'काबुलीवाला' जैसी है, जिसमें मुख्य चरित्र अफग़ानिस्तान से आया पठान रहमत है, जो किस्मत का मारा ग़रीब है और ग़लत कारणों से जेल जाता है। 'काबुलीवाला' में वात्सल्य है, छोटी बच्ची से पिता जैसा प्यार है; एक खोई, लंबे समय से न देखी बच्ची को किसी और बच्ची में देखना है; 'वाङ्चू' में वयस्क प्रेम के संकेत हैं। दोनों कहानियों के आखिर में आत्मीय संबंध दुनियादारी में खो गए हैं, 'काबुलीवाला' की बच्ची बड़ी हो गई है और अपनी शादी के दिन उसे याद भी नहीं है कि कोई उसे बेटी मान कर पिता सा जान लुटा देना चाहता था और 'वाङ्चू' में लड़की शादी कर घर बसा लेती है, उसके बच्चे हैं; बस एक औपचारिक संबंध है जो कभी किसी ख़त में लिखा जाता है। वाङ्चू और रहमत दोनों ही अपने देश या समाज से कटे हुए हैं, वाङ्चू का विराग बौद्धिक कारणों से है, रहमत का ग़रीबी की वजह से है। दोनों में मानवता छलकती है, पर दोनों को ही हमारे समाज में पहले दर्ज़े की नागरिकता की स्वीकृति नहीं मिल सकती। दोनों से ही अपेक्षा है कि वे यहाँ भावनात्मक संबंध न बनाएँ। रहमत अगर बच्ची को पिता का प्यार देना चाहता है तो वह संदेह का पात्र है, इसी तरह वाङ्चू भी लेखक की मौसेरी बहन के साथ दोस्ती करता है तो वह चिंता का कारण बन जाता है।

एक औसत पाठक जो कहानी को महज कहानी की तरह पढ़ना चाहे, वह शायद उन तमाम पूर्वग्रहों के साथ ही पढ़ेगा। पढ़ते हुए वाङ्चू पर हँसेगा। पढ़ते हुए वह ज़ोर से बोल पड़ सकता है कि अरे इस भिक्षु को लड़की से क्या मतलब। रवींद्र ने शुरू से ही रहमत को ऐसा गढ़ा था कि पाठक लगातार सहानुभूति के साथ ही उसे देखता है। भीष्म साहनी हमारे अंदर के पूर्वग्रही मन को सामने ले आते हैं। इसके बाद यह हमारी नैतिक ताकत का मसला है कि हम खुद के रूबरू कैसी लड़ाई लड़ पाते हैं। इसी कारण से 'वाङ्चू' अपने समय की अग्रणी गल्प-धाराओं से जुड़ जाती है। इसी लिए इसे हम नई कहानी आंदोलन से अलग नहीं कर सकते।

धरती बहुत बड़ी है और हर तरह के रंग-ढंग और विचार के लिए यहाँ जगह होनी चाहिए बशर्ते कि कोई किसी को चोट न पहुँचाए। कहीं भी ऐसी कोई परंपरा या संस्कृति नहीं है जो किसी देश या भौगोलिक प्रदेश के हर व्यक्ति की परंपरा कहला सकती हो। हमें ज़बरन बचपन से यह पढ़ाया जाता है कि कुछ परंपराएँ हमें दूसरों से अलग करती हैं। एकबारगी सोचकर ऐसा लगता है कि यह सच होगा। जैसे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत कोई अमेरिकी परंपरा तो है नहीं, उसे तो भारतीय परंपरा ही कह सकते हैं। यह सही है कि मानव जीवन के ऐसे पहलू जिनमें सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होती है, उनके भौगोलिक विस्तार की सीमाएँ होती हैं। पर सचमुच कौन सी संस्कृति कहाँ शुरू और कहाँ खत्म होती है, यह कौन कह सकता है। परंपराओं को स्थानीय तौर पर स्थापित करना और कुछ खास तरह की परंपराओं को सब के ऊपर थोप देना, यह मानव 'सभ्यता' के अँधेरे पक्षों में से एक है। सचमुच हमें धरती पर पनपे किसी भी सांस्कृतिक-सामाजिक कर्म को अपनी परंपरा मानना चाहिए। उसमें जो अच्छा है, जो बुरा है, उसमें हर इंसान की भागीदारी है। कोई एक परंपरा या संस्कृति किसी दूसरी परंपरा या संस्कृति से बेहतर या बदतर नहीं है। पर मानव का सामाजिक विकास आज जहाँ तक हुआ है, उसमें लकीरें खिंची हुई हैं। लकीरों के पार राज बदलते हैं तो वह 'उन' का मामला है। हमारे मामले लकीर के इस पार के हैं। ये लकीरें हमेशा भौगोलिक ही नहीं होतीं। अपने ही समाज में अपने ही घर के आस-पास ऐसी कई लकीरें हमें एक दूसरे से अलग करती हैं। यह स्थिति कमोबेश दुनिया भर में है। संयुक्त राज्य अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ नस्लवाद तो था ही, दूसरी आलमी जंग के दौरान जापानी मूल के नागरिकों के साथ भी जैसा सलूक हुआ, उसे सोचकर भी दिल दहल उठता है। करीब सवा लाख नागरिकों को शिविरनुमा जेलों में बंद रखा गया। 'वाङ्चू' का सतही पाठ हमें महज एक चीनी आदमी की तकलीफ से ही वाकिफ करवाता है, पर गहराई से सोचने पर वह हमें खुद से रूबरू होने को मजबूर करता है। हम सोचने को मजबूर होते हैं कि आखिर ऐसा क्यों है, अगर एक चीनी आदमी हमारे परिवार की किसी लड़की से अंतरंग संबंध में बँध जाए तो उससे हमें क्यों परेशानी होती है। आज के संदर्भ में हमें पूछना होगा कि आखिर क्या कारण है कि कुछ लोगों को अपने समय की तमाम परेशानियों से हटकर यही बात परेशान करती है कि अपने से गैर मजहब का कोई हमारे भाई-बहन से प्यार करता है। यह बड़े पैमाने पर हिंसा का सबब बन जाती है। क्यों? जन्म से तो कोई भी किसी मजहब या संस्कृति से बँधा नहीं होता तो फिर आखिर बड़े हो जाने पर यह ठेकेदारी कहाँ से उभर आती है? कहानी में संकेत हैं कि हर किसी की तरह वाङ्चू भी अपनी युवावस्था में प्रेम की यातना से तड़पता होगा। पर उसके लिए प्रेम उपलब्ध नहीं है। बस ठिठौली हो सकती है। कथावाचक खुद परेशान रहता है कि उसकी मौसेरी बहन से वाङ्चू की अंतरंगता बढ़ न जाए। वह तभी आश्वस्त होता है जब वह जान लेता है कि दोनों में दूरी बढ़ने वाली है - 'पर मैं इस सूचना से बहुत विचलित नहीं हुआ था। नीलम लाहौर में पढ़ती थी और वाङ्चू सारनाथ में रहता था और अब वह हफ्ते-भर में श्रीनगर से वापस जानेवाला था। इस प्रेम का अंकुर अपने-आप ही जल-भुन जाएगा।' कहानी में वाङ्चू हँस रहा है या रो रहा है पता नहीं चलता, पर क्या यह पता चल सकता है कि आप और हम हँस रहे हैं या रो रहे हैं? कितना अच्छा होता कि हमारी दुनिया ऐसी होती कि हम इस कहानी को एक हास्य कहानी मान सकते और खूब हँसते।

'वाङ्चू' में भीष्म साहनी समाज के इन बंधनों, राष्ट्रभक्ति के अहं और अस्मिता के संकट से उपजी निरंकुशता पर बड़ी चिंताएँ रख गए हैं। चीन लौटने की कोई खास इच्छा वाङ्चू में नहीं थी, वह भारत में जम गया था। - 'अब आ गया है, तो लौट कर नहीं जाएगा। भारत मे एक बार परदेशी आ जाए, तो लौटने का नाम नहीं लेता।'... 'भारत देश वह दलदल है कि जिसमें एक बार बाहर के आदमी का पाँव पड़ जाए, तो धँसता ही चला जाता है, निकलना चाहे भी तो नहीं निकल सकता!'

मित्रों के कहने पर ही वह चीन गया। चीन पहुँचने पर नई क्रांतिकारी सरकार के ग्राम-प्रशासन ने तब तक तो उसकी आवभगत की जब तक भारत-चीन संबंध बिगड़े न थे, फिर जैसे संबंध बिगड़ने लगे, उसके प्रति प्रशासन का रुख बदलता गया। उसका भारत में कई साल बिताना, फिर वापस जाने की चाहत, यह सब कुछ शक की नज़रों से देखा जाने लगा। पार्टी-अधिकारी उसे वर्ग-शत्रु की तरह मानते हुए सवाल करते रहे- 'द्वंद्वात्मक भौतिकवादी की दृष्टि से तुम बौद्ध धर्म को कैसे आँकते हो?' क्या प्रशासन और सुरक्षा संस्थाएँ हर जगह ऐसी ही रहेंगीं? प्रशासन के ऐसे रवैए से आखिरकार आम लोग विरोध का राह ढूँढने को मजबूर कैसे न हों? पुलिस और फौज का होना हमारी सुरक्षा के लिए है। पर संकट के समय में यही संस्थाएँ निरंकुश होकर कमज़ोरों पर अत्याचार करती हैं। हमलोग या तो इतने पिछड़े हैं कि आँख मूँद कर इसे सहते हैं या इतने लाचार हैं कि इसे देखते हुए भी कुछ न कर पाना हमारी नियति बन गया है। वाङ्चू भारत लौटता है तो तुरंत उसके साथ यहाँ की पुलिस ऐसे व्यवहार करती है जैसे कि वह चीन का जासूस हो। आम लोग भी उसे शक की नज़रों से देखते हैं और कुछ तो उसके साथ हिंसक व्यवहार भी करने लगते हैं - 'या तो कहो कि तुम्हारे देशवालों ने विश्वासघात किया है, नहीं तो हमारे देश से निकल जाओ... निकल जाओ... निकल जाओ!' इन सबके बीच अगर कोई उसे इंसान की तरह देखता है तो वह बस एक रसोइया है जिसने अपने 'चीनी बाबू' वाङ्चू को अपना आत्मीय मान लिया है और उसे संत की तरह मानकर उसका सम्मान करता है।

'वाङ्चू' के लिखे जाने के बाद करीब आधी सदी गुज़र गई है। यह कहानी अब केवल कहानी न रहकर एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गई है। इसे पढ़ते हुए हम इतिहास भूगोल और राजनीति के सवाल न उठाएँ तो वह हमारी बौद्धिक दरिद्रता होगी। आखिर भारत और चीन के बीच बेहतर संबंध क्यों नहीं है? भारत-चीन सीमा विवाद क्या है? कहानी पढ़कर जाहिर होता है कि ऐसा नहीं है कि चीन के लोग हम पर हमला करना चाहते हैं। वे तो खुद इस बात से परेशान हैं कि भारत ने उनसे दुश्मनी क्यों रखी है? क्या सचमुच इस मामले में सरकारें जो कुछ हमें बतलाती हैं, वह सब सच है? अगर ऐसा होता तो भारत और चीन की लड़ाई पर हमारी अपनी फौज के अफ्सरों की तैयार की गई रिपोर्ट आज तक गोपनीय नहीं रहती। इस मुद्दे पर सरकारी पक्ष से अलग भी बातें सामने आई हैं और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आखिर क्या कारण है कि हम इन बातों को जानना तक नहीं चाहते? क्या कोई हमें देशभक्ति के नाम पर अँधेरे में तो नहीं रखे हुए है? ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार नेविल मैक्सेल ने इस मसले पर सालों से शोध किया है और इस पर लगातार लिखा है। क्या हम उसके लिखे से वाकिफ हैं? आज 'वाङ्चू' पढ़ते हुए इस सवाल को पूछना लाजिम है। इन सवालों को और आगे ले चलते हुए हमें पूछना होगा कि आम तौर पर दूसरे किसी भी मुल्क के लोगों के बारे में हम कैसा सोचते हैं। ईमानदारी से इस सवाल का जवाब ढूँढें तो हम देखेंगे कि हम वाकई पिछड़े हुए लोग हैं। जो ताकतवर हैं उनके साथ हमारा व्यवहार एक ढंग का है, जो हमारे बराबर या हमसे कमज़ोर हैं, उनके प्रति हमारा व्यवहार सीनाज़ोरी का है। यह खानदानी बदतमीज़ी हमारी विशिष्टता है।
एक और बात जो 'वाङ्चू' हमें बतलाती है, वह हमारी संस्कृति में शोध के प्रति गंभीर उदासीनता है। भारतीय पुलिस सिर्फ वाङ्चू को नहीं, उसके शोध को भी सजा देती है। कोई ज़रूरी नहीं है कि शोध के कागज़ात बर्बाद किए जाएँ, पर ऐसा होता है। कहानी पढ़ते हुए एक आम पाठक इस पर सोचता भी न होगा कि यह एक घोर अपराध है कि वर्षों से किए शोध के काम को नष्ट कर दिया जाए या किसी तहखाने में बंद कर दिया जाए। ऐसा सोच पाना मुश्किल है क्योंकि सदियों से हमारे यहाँ आम लोगों को बौद्धिक कर्म से अलग रखा गया। सुविधासंपन्न राष्ट्रभक्त टिप्पणीकार यही सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि दरअसल हमारा समाज तो बड़ा प्रबुद्ध था, पर विदेशियों की वजह से हमारी बौद्धिक संपदा नष्ट हो गई। 'वाङ्चू' बड़े ही सरल ढंग से इस झूठ का पर्दफाश करती है। बार-बार अर्जियाँ देने के बावजूद 'वाङ्चू' के शोध के कागज़ात का एक छोटा हिस्सा ही मिल पाता है। कथावाचक को इसके लिए बहुत परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। - 'मैं कुछेक संसद-सदस्यों के पास गया, एक ने दूसरे की ओर भेजा, दूसरे ने तीसरे की ओर। भटक-भटक कर लौट आया। आश्वासन तो बहुत मिले, पर सब यही पूछते - 'वह चीन जो गया था वहाँ से लौट क्यों आया?' या फिर पूछते - 'पिछले बीस साल से अध्ययन ही कर रहा है?'
आखिर क्यों? बोधिसत्वों पर किए शोध में ऐसा क्या खौफनाक षड़यंत्र होगा! इस बात को हम सिर्फ पुलिस और सरकारी अफसरों की बेवकूफी कह कर हट जाएँ तो यह धोखाधड़ी होगी। हमें खुद से पूछना पड़ेगा कि हममें बौद्धिक कर्म के प्रति कैसी भावनाएँ हैं।
कोई भी बड़ी रचना अपने कथानक के साथ कई सवाल ले कर आती है। 'वाङ्चू' ऐसी एक बड़ी रचना है। एक स्तर पर यह सिर्फ एक भोले इंसान की कहानी है जो 'भावुक, काव्यमयी प्रकृति का जीवन' जीना चाहता था, 'जो प्राचीनता के मनमोहक वातावरण में विचरते रहना चाहता था', पर जिसके साथ घोर अन्याय हुआ और वह बेवजह तकलीफें झेलते हुए मारा गया। मरने के बाद उसके - 'ट्रंक में वाङ्चू के कपड़े थे, वह फटा-पुराना चोगा था, जो नीलम ने उसे उपहारस्वरूप दिया था। तीन-चार किताबें थीं, पाली की और संस्कृत की। चिट्ठियाँ थीं, जिनमें कुछ चिट्ठियाँ मेरी, कुछ नीलम की रही होंगी, कुछ और लोगों की।' वह जो चला गया, उसके साथ एक 'नीलम' भी चली गई, जिसने हो सकता है कि उसके साथ ठिठौलियाँ करते हुए कभी मन में प्यार का कोई बीज भी सँजोया है, पर वह हसरत--तामीर कभी उजागर नहीं होगा, क्योंकि शुद्धता के प्रहरी बल्लम-भाले-बरछियाँ लिए घूम रहे हैं। कहानी का ज्यादा हिस्सा वाङ्चू का है तो एक बहुत बड़ा हिस्सा नीलम का भी है।

दूसरे स्तर पर यह कहानी हमें बतलाती है कि हमने यह अन्याय होने दिया और हम लगातार ऐसा अन्याय होने देते हैं, दे रहे हैं। आज 'वाङ्चू' पढ़ते हुए हमें इस सचाई को सामने रखना होगा।