Thursday, December 08, 2016

10. जलाने को एक ही धरती क्यों


मेरी योजना इस धरती को एक आग का गोला बनाने की है

मरता हुआ ग्रह धधकता हुआ

आग आग हर ओर आग हो

कि कायनात के कोनों से दिखे


मेरी साँसों से निकले तेजाब की बू

भस्म करती जाए दरख्त-दर-दरख्त

घास-पात पानी के सोते सूख जाएँ

जलते हुए काँपें चर-अचर

जैसे बर्फानी तूफानों से गुज़र रहे हों


और मैं लंबी आरामकुर्सीनुमा उड़नखटोले में सैर करूँ

देखता यह कला-उन्माद

बीच-बीच में फेंकता खंजर

बेंधता किसी हतवाक् मानुष को

अमात्य हँसते-हँसते पागल होता

जैसे कोई निरंतर हो गुदगुदाता


दूर से भी हर कोई

देख लेता हमारे दाँत

आग की लपटों में

सतरंगी चमक से भी आगे

न दिखने वाले रंगों में चमक रहे दाँत


खालीपन मेरे अंदर कचोटता

कि जलाने को एक ही धरती क्यों है

पेट में आवाज़ें गुड़गुड़ातीं

बाक़ी कायनात को निगलने का वर मुझे क्यों नहीं मिला

गुरु-गंभीर खुले दाँत गुज़रता

वायुमंडल की ऊपरी सतह पर मैं योग-शिविर करता। 
 

I plan to transform this planet into a fireball

A dying planet glowing

Fire, fire everywhere

Visible from the horizons of the universe


I shall exhale acid vapours

That will destroy every tree

All vegetations, all sources of water must dry away

Burning life and inanimate shivering

As if engulfed in a snowstorm


And I will roam the skies in a flying easychair

Watching this frenzy of artworks

Every once in a while throwing a dagger

Targeting a surprised human

My counselor losing his head laughing crazy

As if tickled incessantly


Even from a distance

one can see our fangs

In the flames of fire

Fangs shining in invisible colours

Beyond the spectrum of visible seven


Emptiness pinching me from within

Why is there only one Earth to burn

My stomach rumbles

Why am I not empowered to swallow the rest of the universe


With pensive looks I roam across

The upper atmosphere in my Yoga postures.

Tuesday, December 06, 2016

चुपचाप अट्टहास - 9


मेरे पहले आ चुके हैं

पिता पितृव्य आदि

जब मैं युवा था

आम नज़रों से छिप कर

पीते हुए उम्दा शराब

वे रणनीतियाँ बनाते थे


कि कैसे बदले निजाम

पास बैठे छुटभइए कभी उनकी खिदमत में पेश करते थे

मांसाहारी किस्म के चुटकुले

वे हँसते या नहीं हँसते थे


मैं आज भी ज़िंदा हूँ

वे भी हैं

कभी सोचते हैं क्या

कि उन दिनों मेरी छँटी हुई दाढ़ी पर भी

वे बतिया लेते थे

यह राजनीति में असफलता की ऊब से

अच्छा छुटकारा होता था


मैंने कभी उस्तरे से दाढ़ी नहीं बनाई

उनका मजाक होता कि मैं डरता हूँ

कि कभी गले की नस पर न चल जाए

काँपता हुआ उस्तरा मेरे हाथों में


मैं आज ज़िंदा हूँ

वे भी हैं

उम्र के गुरूर या कि थकान में

वे सोचते हैं कि

मेरी भी तारीख तय हैं

यह तो मैं भी जानता हूँ

इसीलिए कदम दर कदम

चला रहा हूँ लगातार

धरती की नसों पर उस्तरा।


Before me have come

My father, uncle and others

When I was young

They secretly

Drank good wine

And formulated strategies


To change the regime

Occasionally small fries sitting close by

Told them adult jokes

They would laugh or not laugh at them


I am still living

They are so too

Do they ever remember

That they chatted then

on my trimmed beard sometimes

This was a good relief

From the failures in politics


I never used a razor to shave

They made fun that I am scared

That I may by mistake

Use them on the veins on my throat


I am still living

They are so too

In the pride of age or may be just tired

They think that

Even my days are fixed

I know it too

And that is why I use restlessly

Razors on the veins of the Earth.

Friday, December 02, 2016

मैं था एक जलता शहर देखता


काँप उठता हूँ उस पहली वारदात को याद कर

सचमुच मैं था

खिड़की से एक जलता शहर देखता


न जाने कितनी बार मैंने नकारा वह सच

कहा गला फाड़ कि नहीं

नहीं नहीं नहीं

मैंने कोई हत्या नहीं की

मेरे दामन में नहीं कोई ख़ून का धब्बा


झूठ शक्ल को बदल रहा होगा

स्याह पड़ रहा होगा मेरा नक्श

बुझ रही होगी प्यार की आखिरी लौ

नहीं नहीं नहीं

मैंने हत्या नहीं की

मेरे दामन में नहीं कोई ख़ून का धब्बा

पाक साफ हैं लफ्ज़ जो उस ज़ुबान में हैं

जो मेरी ज़बान पर तुम्हारे लिए चलती है


मेरे आका के लिए भाषा कुछ और है

गुलाम हूँ उसका

वह मालिक कायनात के हर अंधकूप का।



I shiver thinking of that first incident
Indeed it was I
watching the city burning down

I have denied the Truth many times
I have screamed aloud that no
No, no, no
I never killed any one
My skin does not carry any blood stain

Untruth must have changed my complexion
My features must have turned gloomy
The last flame of love in me must have died

No, no, no
I never killed any one
My skin does not carry any blood stain

Pious clean words flow in the lingo
That flows for you from my tongue

For my master I have a different tongue
I am his slave
He who owns all depths of darkness.

Wednesday, November 30, 2016

चुपचाप अट्टहास - 7


मैं अपनी गुफा से निकला

मेरे दाँतों से खून टपक रहा

मुझे पकड़ने की कोशिश में थक-चूर रहे

लोकतंत्र के प्रहरी


सूरज, लबालब कालिमा लपेटे

तप रहा आधा आस्मान समेटे


अमात्य खोद रहा खाइयाँ

गिरते चले विरोधी

शक्तिपात कर दिया है मैंने उसमें

मुझसे ज्यादा ही दिखला रहा वह असर


मैंने अनधुले दाँतों पर सफेद रंग चढ़ाया

मुझे मिलता रहा खून का स्वाद और

लोगों ने देखी मेरी धवल मुस्कान

मेरी जादुई छड़ी किसी को नहीं दिखती

विजय पताका फहराती किला दर किला

काली घनघोर काली


हवाएँ ज़हरीली साँस लिए मुड़ रहीं

रोशनी काँपती-सी दूर होती जा रही। 



I came out from my caves
Blood dripping from my teeth
And the sentries of democracy
Are exhausted in their attempts to catch me

The sun, drenched in darkness
Stretched out hot in half the sky

My minister digging pits
And my rivals falling in them
I have poured power in him
He is even more excited than me

I painted my dirty teeth with white
I tasted blood
And people saw white smile on me
No one can see my magic wand
My victory flag over each and every fortress
Waving in intense darkness

The breeze winds on with poison breath
The light dithers and fades away.
 

Tuesday, November 29, 2016

हरमन-प्यारा 'साहित्यिक नहीं' गायक-गीतकार बॉब डिलन और नोबेल पुरस्कार


('समयांतर' के ताज़ा अंक में प्रकाशित लेख - पत्रिका में 'मार्कूसी' नाम ग़लती से 'मार्क्स' छपा है)
बॉब डिलन को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा होते ही न्यूयॉर्क टाइम्स में आना नॉर्थ ने अपने आलेख में लिखा कि बॉब डिलन कोई साहित्यिक नहीं थे। साहित्य में नोबेल पुरस्कार दिया जाना चाहिए और इस साल ऐसा नहीं होगा। प्रसिद्ध पत्रिका न्यूयॉर्कर में रोज़ाना कार्टून में डेविड सिप्रेस ने ग्राफिक टिप्पणी की है - एक छोटे शहर का लड़का हाथ में बेंजो लिए सड़क पर अंगूठा उठाए खड़ा है कि कोई गाड़ी रुक जाए और वह सवारी कर सके। खयालों में वह कई सारे कामों की सूची तैयार कर रहा है - न्यूयॉर्क शहर जाना है, कुछ क्लबों में फोक (लोक संगीत) गाना है, कुछ गीत लिखने हैं, नोबेल पुरस्कार लेना है।
 जाहिर है कि साहित्यिक दुनिया में बॉब डिलन को नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा से तहलका मचा हुआ है। हमारे अपने अंग्रेज़ीदाँ बंधुओं ने भी लिखा है - 'द हिंदू' में लेख आ चुका है। पर इस पर चिल्ल-पों मचाने की हिम्मत कम लोगों की है। क्योंकि सही या ग़लत, जैसा भी है, बॉब डिलन को नोबेल मिलना दुनिया भर में तरक्कीपसंद लोगों के लिए खुशी का झोंका सा बन कर आया। यह ऐसा निजी सुख है, जिसे बड़ी तादाद में लोग साझा कर रहे हैं। इसलिए निजी संदर्भों से ही इसे समझना चाहिए। सत्तर के बीच के सालों में मैं कोलकाता में कॉलेज में था, जब अपने एक दोस्त के साथ ट्राम की सवारी करता कहीं जा रहा था। अचानक उसने गाना शुरू किया। दो चार बांग्ला गीतों के बीच अपनी बांग्ला लहजे वाली अंग्रेज़ी में उसने वह गीत गाया - हाऊ मेनी टाइम्स….। उसके बाद कई जगह सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं की सभाओं में यह गीत हमने गाया-सुना है।
यह बॉब डिलन का जादू है। उस घटना के दसेक साल बाद सुमन चट्टोपाध्याय (अब कबीर सुमन) ने इस गीत का बांग्लाकरण किया - कोतो टा पथ पेरुले तबे पथिक बोला जाए? कोतो टा पथ पेरुले पाखी जिरोबे तार डाना? कोतो टा अपचयेर पर मानुष चेना जाए? प्रश्नगुलो सहज आर उत्तर तो जाना। आखिरी वाक्य कि सवाल आसान हैं और जवाब भी हम जानते हैं, - the answer is blowing in the wind – यह चिरंतन दार्शनिक तथ्य है, जिसे ज्ञान-मीमांसा में confirmation bias या पुष्टि पूर्वग्रह कहते हैं। हम सच देखकर भी नहीं देखना चाहते। संगीत के जानकार लोग बतलाते हैं कि बॉब डिलन ने अनोखे प्रयोग किए, हाथ में बेंजो और मुँह में माउथऑर्गन लिए गाना-बजाना की लोक-परंपरा में नए आयाम जोड़े (जिससे कबीर सुमन जैसे अनेकों गायक-गीतकार प्रेरित हुए), पर सचमुच उनके संगीत नहीं, बल्कि उस गुस्से ने जो गीतों में बड़े नाजुक एहसासों के साथ आता है, वह गुस्सा जिसे आज तक हम जताते रहते हैं (दो सेकंड लगते हैं कि आप बटन दबाकर जान लें कि गुजरात राज्य 1990 से आज तक मानव विकास आँकड़ों में ग्यारह नंबर पर है, और केरल पहले नंबर पर है, पर आप नहीं जानेंगे क्योंकि आप नहीं जानना चाहते; तथ्य भरे पड़े हैं कि अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों से धरती विनाश के कगार पर आ खड़ी है, पर हम यह नहीं जानना चाहते, इसलिए हम नहीं जानेंगे), उसने इस 'साहित्यिक नहीं' गायक-गीतकार को हरमन-प्यारा बना दिया। हाल में ब्रिटिश फिल्म-निर्देशक केन लोच ने अस्सी साल की उम्र में कहा है - आप कैसे इंसान हैं कि आपको गुस्सा न आए? यही गुस्सा था, जब रॉबर्ट ऐलन ज़िमरमान उर्फ बॉब डिलन ने 1965 में टाइम मैगज़ीन को साक्षात्कार देते हुए कहा - टाइम मैगज़ीन के लिए मुझे कुछ नहीं कहना। कौन पढ़ता है टाइम मैगज़ीन? मैं नहीं पढ़ता। एक खास तबके के लोग इसे पढ़ते हैं, जिनको सच्चाइयों से कुछ लेना-देना नहीं है। यह पूछने पर कि सच क्या है, डिलन ने कहा - 'सच यानी सादी तस्वीर। ऐसी तस्वीर जिसमें कोई बेघर बेबस सड़क पर उल्टी कर रहा है, और उसके बगल ने रॉकेफेलर जैसा कोई धनाढ्य अपने काम पर जा रहा है। हर शब्द में एक सच होता है। आप अंग्रेज़ी के 'know' (जानना) शब्द को जानते हैं - के एन ओ डब्ल्यू? छोटा 'k' और बड़ा 'K'। हर कोई मानता है कि वह हर कुछ जानता है। असल में हम कुछ नहीं जानते।' ऐसे गुस्साट डिलन को नोबेल मिलने से हमें लगा कि हमारे सुमन, साहिर, ग़दर जैसे अनगिनत जन-गीतकारों को सम्मानित किया गया - और हम गाते हैं, बेघर बेबस बेदर इंसां तारीक गली से निकलेंगे, वह सुबह कभी तो आएगी। और भी पीछे जा सकते हैं और मान सकते हैं कि खुसरो, बुल्ले शाह और लालन फकीर को सम्मानित किया गया है। यही सच है - डिलन को नोबेल दरअसल जनगीत-परंपरा का सम्मान है। कोई चाहे तो कहता रहे कि यह साहित्य को पुरस्कार नहीं है।
ताज़ा खबर यह है है कि नोबेल समिति की ओर से कई बार संपर्क करने की कोशिशों का डिलन ने कोई जवाब नहीं दिया है। यह लिखते हुए यह खबर आ रही है कि उसने नोबेल पुरस्कार लेने से मना कर दिया है। दस साल पहले स्पेन के राजकुमार द्वारा दिए जाने वाले सम्मान 'प्रिंसिपे दे आस्तूरियास' लेने भी डिलन नहीं पहुँचे थे (हालाँकि डिलन ने शुक्रिया जताते हुए ख़त भेजा था)। यह खबर हमारे जैसों की खुशी बढ़ाती है, जिन्होंने कभी इन बातों पर ध्यान नहीं दिया है कि पुरस्कार किसको मिल रहे हैं, क्यों मिल रहे हैं, जिनके ज़हन में पहली बात यह है कि ज़िंदगी को अपने संघर्षों के साथ जिया जाए, गाया जाए।
यह भी सही है कि डिलन को अपनी आवाज़ का मसीहा मानने वाले अधिकतर लोगों को उनके साठ के दशक के गीत ही पसंद हैं - 'द आन्सर इज़ ब्लोइंग इन द विंड' के अलावा 'टाइम्स दे आर अ'चेंजिंग' – दुनिया बदल रही है - जैसे गीत आज भी खूब गाए जाते हैं। बाद के दशकों में जो गीत डिलन ने लिखे और गाए, उनमें उनकी अपनी दार्शनिक, आध्यात्मिक पड़ताल ज्यादा नज़र आती है। अपने निजी जीवन में भी वे बड़े बदलावों में से गुजरे। जन्म से यहूदी, व्यवहार से अराजक, वे पहले तो ईसाई बन गए, फिर बाद में वह भी छोड़ा और वापस यहूदी जड़ों की ओर लौट आए। पर दिवंगत बर्तानवी मार्क्सवादी समीक्षक माइक मार्कूसी ने 2003 में एक आलेख में लिखा कि दरअसल वक्त के साथ उनके तीखे वैचारिक तेवर में कमी नहीं आई, बल्कि बढ़ोतरी ही दिखती है। माना जाता है कि बीटनिक पीढ़ी के प्रख्यात कवि ऐलन गिन्सबर्ग से साथ लंबे रिश्ते का उन पर असर पड़ा है। गिन्सबर्ग को नोबेल मिलना चाहिए था, अपनी पीढ़ी के बड़े कवियों में वे बेशक शिखर पर हैं। गिन्सबर्ग कोई दस साल बनारस में रहे और भारतीय अध्यात्म से प्रभावित हुए। उनकी 'हाउल' जैसी शुरुआती कविताओं में (भारत आने के पहले) अमेरिका में रंगभेद और जंगखोर सरकार के खिलाफ उग्र आक्रोश दिखता है, पर बाद की कविताओं में उनकी कविताएँ निजी दार्शनिक किस्म की होने लगी थीं। ऐसा माना जाता है कि गिन्सबर्ग डिलन के प्रति मोहित थे, पर डिलन ने उन्हें बड़े साथी या बुज़ुर्ग की तरह माना। डिलन की निर्देशित फिल्म 'रेनाल्डो ऐंड क्लारा' में गिन्सबर्ग ने काल्पनिक चरित्र 'फादर (पिता)' की भूमिका में अभिनय किया है और कई दृश्यों में रेनाल्डो के चरित्र में डिलन उनसे धार्मिक उपदेश लेता है। गिन्सबर्ग भी यहूदी थे, पर फिल्म में दोनों की भूमिका में ईसाइयत है।
जैसा कि अक्सर सफल कलाकारों के साथ होता है, डिलन ने वैचारिक तेवर के गीत गाए हैं, पर उनके बयानों में कोई वैचारिक स्पष्टता नहीं दिखती। अक्सर उन्होंने नासमझी में ग़लत बयान दिए हैं। 1963 में बाईस साल की उम्र में नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे संगठन से सम्मान लेते हुए बहुत सारी बकवास करते हुए आखिर में उसने यहाँ तक कह दिया कि मैं ली ओसवाल्ड (राष्ट्रपति केनेडी का हत्यारा) के साथ अपनत्व महसूस करता हूँ। हालाँकि डिलन यह बात अमेरिका की क्यूबा विरोधी नीतियों के संदर्भ में कह रहा था, पर केनेडी की हत्या के कुछ ही हफ्तों बाद ऐसी बात ऐसे माहौल में कहना, जहाँ केनेडी को काले लोगों (अफ्रीकी अमेरिकी) के अधिकारों का मसीहा माना जाता हो, बेवकूफी थी। बाद में एक तरह से माफी माँगते हुए डिलन ने लंबी कविता जैसा ख़त सम्मान के निर्णायकों को भेजा. जिसमें उसने अपने ग़लत बयानों में निहित और बातों को समझाने की कोशिश की। ख़त में यह भी लिखा था कि मैंने ईमानदारी से खुद को सामने रखा और इसके लिए मैं माफी नहीं माँगूँगा। डिलन पर शोध करने वालों को वह भाषण और बाद में लिखा वह ख़त पढ़ना चाहिए। कलाकारों में ऐसा अजीब घनचक्करपन आम बात सी है। डिलन की ही परंपरा से (डिलन से पहले के वूडी गथरी, पीट सीगर आदि) प्रभावित हमारे लोक-गीतकार भूपेन हाजारिका नब्बे के दशक में भारतीय जनता पार्टी की ओर से संसद का चुनाव लड़ रहे थे। हार भी गए। समझना मुश्किल है कि किन बातों से वे एक दक्षिणपंथी दल की ओर से, जो आज निश्चित रूप से मुल्क में तानाशाही लाने की कोशिश में है, चुनाव लड़ने को मजबूर हुए थे।
यह हर कोई जानता है कि डिलन ही नहीं, अमेरिका का हर लोक-संगीत गायक ऊडी गथरी (देखिए – समांतर: अगस्त 2012) से प्रभावित रहा है। पर डिलन पर जिस गायिका का प्रभाव काफी गहरा था, वह है ओडेटा होम्स। डिलन ने खुद कहा है कि उसे फोक यानी लोक-संगीत की ओर सबसे पहले ओडेटा ने ही खींचा। यहाँ तक कि एक रेकॉर्ड (संगीत) की दूकान में 'ओडेटा सिंग्स बैलेड्स ऐंड ब्लूज़' सुनकर डिलन ने अपना इलेक्ट्रिक गिटार छोड़कर (जिसे आधुनिक रॉक म्यूज़िक में इस्तेमाल किया जाता है) पुराने किस्म का एकुस्टिक गिटार ले लिया, जिसमें ज़मीनी आत्मीय एहसास बढ़ता है। डिलन ने ओडेटा के उस रेकॉर्ड के सारे गाने सीखे और बजाए। डिलन से पंद्रह साल बड़ी ओडेटा ने भी कई बार डिलन के गीत गाए।
डिलन में अस्सी के दशक से लगातार जो बदलाव दिखे, जिन्हें अधिकतर लोगों ने प्रतिक्रियाशील माना, ये भी दरअसल एक अराजक मन की बेचैनी की ओर संकेत करते हैं। अपने लेख 'द पॉलिटिक्स ऑफ बॉब डिलन' में मार्कूसी ने लिखा है कि डिलन ने तय कर लिया था कि उसे अपनी पीढ़ी के प्रतिरोध की आवाज़ नहीं बनना है। 'यह नया ऊडी गथरी कुछ और ही बनता जा रहा था - जिससे उसके पूर्व-प्रशंसक परेशान हो रहे थे। डिलन अपने वक्त का सबसे जानामाना विरोध का गीतकार ही नहीं, बल्कि इस धारा के सबसे जानामाना भगौड़ा भी है।' डिलन ने अस्सी की शुरुआत में अपने साक्षात्कारों में बयान भी दिए कि वह लोगों के लिए नहीं लिखना चाहता, बल्कि अपने अंदर की आवाज़ को सामने लाना चाहता है। वह किसी आंदोलन या संगठन के साथ काम नहीं कर सकता। जिस आंदोलन की आवाज़ को उसने 'द टाइम्स दे आर अ-चेंज़िंग' में गाया था, उसी की आलोचना में अब वह एक नए गीत 'माई बैक पेजेस' में कहता है, कि 'लाश बन चुके धर्म-प्रचारक विचारों को नक्शा' मानकर चलते हैं और ज़िंदगी को महज सही या ग़लत दो ही छोरों में देखने का झूठ' फैलाते हैं और वे यह समझना ही नहीं चाहते कि 'प्रचारक बनते ही मैं खुद का ही दुश्मन बन जाता हूँ।' डिलन ने वाम आंदोलनों में तानाशाही और खुदगर्ज़ रवैए से चिढ़कर नए गीत लिखे। एक गीत की पंक्तियाँ हैं - 'मैंने कहा बराबरी, जैसे कि शादी करते हुए कसम लेते हैं; पर तब मैं उम्रदराज़ था, अब युवतर हूँ।' मार्कूसी के अनुसार यह 'द टाइम्स दे आर अ-चेंज़िंग' को नकारता नहीं, बल्कि उसे और तीखे तेवर के साथ कहता है - 'सर्वज्ञानी होने के घमंड से निकालकर आंदोलन को कुछ नहीं जानने की स्वीकृति तक ले आता है।' आज जब हमारे वाम आंदोलनों में, खासकर दलित-प्रसंग में, गहन मंथन की प्रक्रिया जारी है, ये बातें काफी प्रासंगिक हैं।
बहरहाल, 10 दिसंबर को बॉब डिलन को नोबेल पुरस्कार मिलेगा। वह न लेने आए तो उसकी मर्जी। संयोग से 10 दिसंबर अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस भी है।

Monday, November 28, 2016

इतिहास की ग़लती नहीं


वे तारीखें तुम्हें याद हैं

जब-जब तवारीख़ को सधा गढ़ा था अपने लिए

वे तारीखें मेरे लिए प्राणवायु थीं

मेरे पखेरु को

जैसे उन्होंने कछुए का खून पिलाया हो


तुमने कविताएँ लिखीं

बर्लिन को याद किया

मैं शैतान की पूजा कर रहा था

मैंने तय कर लिया है कि मौसम मेरी मुट्ठी में बंद होने को है

गोला बारूद तलवार खंजर सब बाँट दिए हैं

पैने दाँत निकाल सड़कों पर उतर आए हैं मेरे रक्तबीज


मैं एक मकसद से धरती पर आया हूँ

इतिहास को गुलाम बनाने

इतिहास मेरा गुलाम है

मेरे नंगे सिर पर तुम्हें सींग नहीं दिखते

यह इतिहास की ग़लती नहीं है।





Do you remember the dates
When I shaped history for myself?
Those dates were lifelines for me
They fed my soul
the magic turtle-blood

You wrote poems on the dates
You remembered Berlin
I worshiped Satan then
I have decided that I will be lord of the times
I have distributed all the explosives and the knives
The monsters from my blooddrops
Showing their fangs are out on the streets

I am here with a purpose
I have come to enslave history
History is my slave
If you cannot see the horns on my bare head
It is not history that is to blame.

Sunday, November 27, 2016

कौन खुदा का बंदा गिरा सकता

मेरे वेश पर क्या नहीं कहा गया
पर मैंने परवाह ही कहाँ की
मेरा नंगा सिर तना रहा
मेरे नाम की हजारों प्रतियाँ ढोते इस महँगे भेष के ऊपर

सलीके से इसे सिला गया
पहले पहना इसे मेरे ख़ैरख़ाहों ने
क्या खबर कि इसके धागों में किसी ने मिला रखा हो ज़हर

फिक्र हुई थी एक पल
कि ज़हर से बचे पर जिन्होंने मेरे पहले पहना उनके बदन से
आ गए हों कुछ जीव सूक्ष्म अगर

फिर अपना सीना आईने में देखा इसके अंदर
कितना तो जिसकी चौड़ाई पर नाज़ है मुझे
खुश था मैं और भूल गया ज़हर वहर
जिसे मिला है शैतान का वर
कौन खुदा का बंदा गिरा सकता उसे!




A lot has been said about what I wear
How do I care
I have held my bare head high
On this disguise carrying my name thousands of times

It was sewn neatly
At first my well-wishers wore it
You know there could be poison in it

And for a moment I did worry
Though saved from poison but from their skin
A few bacteria might have crawled on to me

And then in the mirror I saw my chest inside the dress
Oh how I pride on its size
I felt happy and forgot about the poison
After all I am blessed by the Satan
No God’s creation can hurt me!