Wednesday, April 16, 2014

अंग्रेज़ी बोलना और इंग्लिशवाला होना

टोनी मॉरिसन इंग्लिशवालों के खिलाफ लिखती है

इंग्लिशवाला होता हूँ जब जाति-संघर्ष की बात करते हुए मैं सिर्फ 'बड़े कवियों' की ही कविताएँ पढ़ता हूँ;
अंग्रेज़ी बोलना और इंग्लिशवाला होना दो अलग बातें हैं
इंग्लिशवाले चिल्लाते हैं कि टोनी मॉरिसन अंग्रेज़ी में लिखती है, पर वह इंग्लिशवालों के खिलाफ लिखती है

मसलन दुनिया के तमाम मुल्कों में इंग्लिशवालों के खिलाफ जिहाद छिड़ा है
इंग्लिशवाले हिंदी, स्वाहिली, कोंकणी या इस्पानी ही नहीं, अंग्रेज़ी में भी
बेताबी से इस कोशिश में हैं कि हम उनकी इंग्लिशवाला होने को पहचान लें
वे दुनिया की हर भाषा में हमें सीख देते हैं कि अपनी भाषा में हम कुछ पढ़े न पढ़ें
पर उनकी अंग्रेज़ी ज़रूर पढ़ें

उनके प्रति दया की भावना रखते हुए उन्हें अनसुना करते हैं
इस ज़माने में इंग्लिशवाले असली ब्राह्मण हैं।

क्या कीजे कि ब्राह्मण कौन और डोम कौन – अपनी कीरत अपनी कीमत।

                                                         ( बनास - 2014)

Tuesday, April 15, 2014

बारह साल पुराना आलेख


  हमारे भीतर का गुजरात (बारह साल पुराना आलेख) 
     19 अप्रैल 2002 जनसत्ता दिल्ली
  
 पिछले आम चुनावों के दौरान चंडीगढ़ संसदीय क्षेत्र के प्रत्याशियों का शहर की एक संस्था ने आम लोगों के साथ रूबरू करवाया। 
एक प्रार्थी से जब यह पूछा गया कि युवाओं में एड्स और नशे की लत की बढ़ती हुई समस्या के बारे में उसके विचार 
क्या हैं तो उसने एक कहानी सुनाई। रामजी की सीताजी के साथ शादी हुई तो सीताजी ने उनसे पूछा कि आप मेरे 
लिए क्या उपहार लाए हैं। खाली हाथ आए रामजी ने कहा कि मैं आपके लिए बहुमूल्य उपहार लाया हूं। कैसा उपहार?  
यह कि मैं आपको वचन देता हूं कि मैं कभी भी किसी अन्य महिला की ओर नहीं देखूंगा। चंडीगढ़ देश के सबसे अधिक 
साक्षरता वाले क्षेत्रों में से है। वहां से लोकसभा का प्रत्याशी जब इस तरह एक गंभीर समस्या पर बात करता है, इसे हम 
उसकी आस्था की बात कह कर मान लेते हैं। हम आप जैसे हजारों उदारवादी लोग इसे अनजान व्यक्ति से यौन संबंध न 
रखने की एक शालीन अभिव्यक्ति भी मान लेंगे। समस्या यह है कि रामजी और सीताजी का ऐसा इस्तेमाल कर सत्ता 
हथियाने वाले लोग वहां रूकते नहीं, ये `'हिंदुस्तान में रहना है तो हिंदू बन कर रहना होगा', `बाबर की औलाद को बाहर 
करो' से लेकर `मुसलमानों को सुरक्षित जीवन के लिए हिंदुओं की शुभेच्छा निश्चित करनी होगी' तक की यात्रा करते हुए 
हजारों औरतों-बच्चों की हत्याओं तक को सरल ढंग से समझा देते हैं और हम आप कभी आस्था तो कभी स्थिरता 
आदि शब्दों का उपयोग कर उन्हें मानते चले जाते हैं।

 सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मानव अधिकार आयोग ने भी, जिसे सामान्यतः अन्य नागरिक अधिकार मंचों कि तुलना में 
अपेक्षाकृत अधिक रूढ़िवादी माना जाता है, यह कह दिया कि गुजरात में सरकारी तंत्र दंगों को दबाने में पूरी तरह विफल 
हुआ है। नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार पर सांप्रदायिकता के गंभीर आक्षेप मानवाधिकार मंच ने लगाए हैं, फिर भी हम 
परेशान नहीं हैं कि वह सरकार अभी तक हटाई क्यों नहीं गई। न्यूयार्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ध्वंस की घटना हदय- 
विदारक थी। यह भी अच्छी बात थी कि भारत में मुहल्ले-मुहल्ले में, स्कूलों-कालेजों में बच्चों-बड़ों ने आतंकवादियों की 
इस करतूत के खिलाफ प्रतिवाद दर्ज किया और संयुक्त राष्ट्र संघ या संयुक्त राज्य अमेरिका को हस्ताक्षरों की शृंखलाएं 
भी भेजी गईं, पर गुजरात तो मेरठ, मुंबई आदि जैसी ही एक और वारदात है, इसलिए समय से सब ठीक हो जाएगा, ऐसा 
ही हम और आप सोच रहे हैं। सरकारी पक्ष की कुछ पार्टियां कुछ समय तक आवाज उठाती भी हैं तो स्पष्टतः वह महज 
सत्ता के गलियारों का खेल ही होता है। जयललिता, अजित पांजा और कई अनेक नेता अगर पोटो का समर्थन करते हैं 
तो उसकी वजह यही है कि उनके समर्थकों मे हम आप जैसे लोग ही हैं जिन्हें मुसलमान बच्चों की हत्याओं और औरतों 
के बलात्कार से कोई फर्क नहीं पड़ता।

  ऐसा नहीं है कि लोग सच नहीं जानते। कहते हैं गोएबल्स ने कहा था कि दस बार झूठ बोलने पर झूठ सच हो जाता है। 
गोधरा में ट्रेन पर हुए हमले में मारे गए लोगों के बारे में कोई कुछ नहीं कहता, इस तरह के झूठ भारतीय मिथ्या पार्टी के 
नेता ही नहीं, हम लोग भी कहते हैं। दूसरों से ही नहीं, अपने आपसे भी कहते हैं। हिंदू सहनशील है, मुसलमान कट्टर हैं
 इस सरलीकरण पर हमारा विश्र्वास ही हमें लगातार इन नेताओं और पार्टियों को सत्ता में लाने को विवश करता है। 
इसीलिए पिछले एक दशक से राम जन्मभूमि जैसा अत्यंत पुरातनवादी और पिछड़ी सोच का मुद्दा आस्था के नाम पर 
हमारी बौद्धिक बहस का मुख्य बिंदु बना हुआ है। हम जानते हैं कि लोगों की आस्था न्यूनतम शिक्षा में भी है, हर गरीब 
चाहता है कि उसके बच्चे पढ़ें और बेहतर जीवन पाए। हम जानते हैं कि लोगों की आस्था समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं में 
है। अनपढ़ व्यक्ति भी बीमार होने पर यथासाध्य दवा दारू के लिए मारा-मारा फिरता है। सिंघल और रामचंद्र दास भी 
अपनी बीमारियों का अपचार रामजी से नहीं, आधुनिक चिकित्सकों से करवाते हैं। पर हमने आस्था के सवाल को धर्म 
की राजनीति तक सीमित रहने दिया है। हमें यह समझ है कि वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था में हर कोई भरपेट नही खा 
सकता, पर हम इस असफलता को अपने स्वार्थ और जड़ता से जोड़ कर देखना नहीं चाहते। हमें एक आसान सा कारण 
चाहिए- अपनी असंतृप्त भोग और विलासिता की इच्छा हम अपनी सांप्रदायिक सोच से पूरी करते हैं।

  गुजरात को गुजरात कह देने से हम बरी नहीं हो सकते। सांप्रदायिक सोच आज की हिंदू मानसिकता में गहरे पैठा हुआ 
है। विश्र्व हिंदू परिषद को आज नहीं, पिछले बीस साल से पैसे मिल रहे हैं। विदेशों में बसे हुए, अधिकतर विदेशी नागारिक 
बन चुके हिंदू कट्टरपंथी ही ये पैसे देते हैं। इन सभ्य सुशिक्षित लोगों को अच्छी तरह पता है कि वे क्या कर रहे हैं। देश भर
में कई संगठनों के द्वारा कुप्रचार, आपसी वैमनस्य और हिंसा फैलाने में इन्हें जरा भी संकोच नहीं। इसीलिए वे संगठित 
होकर अमेरिका में आनंद पटवर्धन की फिल्म का प्रदर्शन रूकवाते हैं, प्रगतिशील लोगों की वेबसाइट बंद करवाते हैं। हम 
और आप यह जानते हैं कि वे लोग यह सब सिर्फ राम-सीता पर आस्था की वजह से नहीं कर रहे। इसके पीछे बुनियादी 
हिंसक सांप्रदायिक भावनाएं काम कर रही होती हैं।

 दुनिया के किसी भी सभ्य देश में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की सुरक्षा सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है। 
चुनावों में नेताओं द्वारा विभित्र संप्रदायों के प्रति प्रत्यक्ष या परोक्ष रियायतों की घोषणाएं भी होती हैं। इसके औचित्य पर 
बहस हो सकती है,पर इसे सांप्रदायिक हिंसा का कारण बना लेना भयंकर बौद्धिक पिछड़ापन और उग्र उन्माद की पहचान 
है। ऐसा जर्मनी में तीस के दशक में हुआ और आज भारत में हो रहा है। कमजोर मध्य-पंथी दलों का सहारा लेकर 
नात्सी दल सत्ता में आया और दो दशकों मे बेशुमार तबाही कर गया। भारत में भी जिम्मेदार पदों पर आसीन राष्ट्रीय 
नेता संविधान को धता बता कर अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने में लगे हुए हैं। यह जहर हमारा-आपका 
ही है, जो इन नेताओं के होंठों से फूटता है।

  आम बोलचाल से लेकर दिल्ली-मेरठ-भिवानी-अमदाबाद के दंगों तक ऐसे अनंत उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनमें 
हिंदू सांप्रदायिकता पूर्वग्रह की अभिव्यक्ति से लेकर बर्बरता तक पहुंचती दिखलाई पड़ती है। फिर भी हम यह मानने को 
तैयार नहीं हैं। इसीलिए इतिहास लेखन की बहस पर एक प्राय: अनपढ़ मंत्री गैर-जिम्मेदार बयान दे सकता है और प्रमुख 
शिक्षा संस्थाओं में पुरातनपंथी प्रशासक थोप कर हस्तरेखाविद्या जैसी मूर्खता लागू करवा सकता है। सन 2002 में हम 
आप इस तरह की बातों पर बहस कर सकते हैं और सूचना क्रांति और जैव-प्रौद्योगिकी के इस युग में अपनी तरक्की 
दिखलाने के लिए आयातित टेक्नोलाजी से बनाए विध्वंसक शस्त्रों का जिक्र कर सकते हैं। इसी बीच देश के हर रेलवे स्
टेशन के दोनों ओर लाखों लोग हर सुबह निवृत्त होने के लिए बैठे रहते हैं और दुनिया के दो तिहाई देशों से मानव-विकास 
आँकड़ों में पीछे खड़ा मेरा भारत महान और भी पीछे खिसक रहा होता है।

  `ऐसे जिंदाबाद से मर जाना बेहतर समझता हूं'-कहने वाले अटल बिहारी का ढोंगी वाग्जाल हम सबकी पाखंडी 
अभिव्यक्ति है। यही वह शख्स है, जिसने कहा था कि मुसलमानों के वोटों के बिना भी हम चुनाव जीत जाएंगे, इसी को 
भुखमरी, अशिक्षा आदि से ऊपर जेहादी इस्लाम सबसे बड़ा दुश्मन दिखता है। सत्ता में आसीन पार्टियों के समर्थक भी 
अधिकतर वही सांप्रदायिक लोग हैं, जो मुख्य विपक्षी पार्टी के समर्थक हैं। नही तो विशाल हिंदी क्षेत्र के कई इलाकों में 
पिछले पंद्रह साल से `'हिंदुस्तान में रहना है तो हिंदू होकर रहना होगा' जैसे नारे कैसे लिखे हुए हैं? गुजरात की दंगा 
पीड़ित औरतों को सांत्वना देने वाली पार्टी के लोगों को जैसे दिल्ली की दर्शन कौर याद नहीं है।

  नरेंद्र मोदी के हट जाने पर सब ठीक हो जाएगा, यह सोचना बिल्कुल गलत है। नरेंद्र मोदी को तो हटना ही होगा,  
बकौल प्रफुल्ल बिदवई नरेंद्र मिलोसेविच मोदी को जनसंहार के दोषी के रूप में कटघरे में भी खड़ा होना होगा। पर बहुत 
कुछ हमें अपने बारे में भी सोचना होगा। कब तक आस्था के नाम पर हम अपने अंदर बसे गुजरात को जीते रहेंगे! अपनी 
इंसानियत को हम कब सामने आने देंगे? और फिलहाल तो कोई बहुत बड़ी कोशिश नजर नहीं आती। जिस तरह 
पाकिस्तान और बांग्लादेश में कुछ लोग सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ रहे हैं वैसे ही भारत में भी गिनती 
के कुछ लोग मुखर हैं। पर मुख्यधारा और खासकर हिंदी के अधिकतर अखबारों में आज भी `गोधरा की प्रतिक्रिया' का 
मुहावरा ही चल रहा है। 

  यहाँ तात्पर्य यह नहीं कि मात्र हिंदू को सांप्रदायिक सिद्ध किया जाए। सांप्रदायिक लोग हर समुदाय में हैं। एक ही जैसी 
सोच विभिन्न समुदायों की सांप्रदायिकता को खाद-पानी देता है। हर व्यक्ति सांप्रदायिकता के वर्चस्व में पलता हुआ कुछ 
हद तक सांप्रदायिक है। इसलिए पाकिस्तान में भी और हिंदुस्तान में भी सांप्रदायिकता और कट्टरपंथ विरोधी जद्दोजहद 
की जरूरत है। इस भ्रम ने हमें बहुत नुकसान पहूंचाया है कि सांप्रदायिक सिर्फ `वे' हैं `हम' नहीं! वर्तमान सरकार और 
इसके साथ जुड़ा कुख्यात परिवार इस सुप्त भावना को इस कदर इस्तेमाल करने और उसे जगाने में सक्षम हुआ है कि 
आज देश के टूटने की प्रक्रिया की शुरूआत हो चुकी है। इसलिए इन असली गद्दारों से देश को बचाने के लिए, हिंदुस्तान 
और  पाकिस्तान को बचाने के लिए, हमें अपने अंदर के गुजरात को पहले नष्ट करना होगा। इतिहास ने हिटलर और 
नात्सी जर्मनी को नकारा, पर इसकी कीमत सारी दुनिया को चुकानी पड़ी। इसके पहले कि बहुत देर हो जाए, हमें 
समझना होगा कि अमदाबाद के गुजरात को गुजरात कह कर हम बरी नहीं हो सकते।

Monday, April 14, 2014

झूठे गौरव से सीना है चौड़ा


युवाओं से



तुम कहते हो मैं सुनता हूँ कि कुछ होने वाला है
हमने खिड़कियाँ बंद कर दी हैं कि ग़लत किस्म हवा न आए
कि बस एक चौंधियाती सोच है, अब इस घर में बस जाए
और यूँ आँख कान बंद रख कर ही सच दिखने वाला है
अगर दीवार में किसी छेद से कोई और बात घुस पैठ आए
तो अनदेखा करें, हाथ पड़ ही जाए तो उसे तोड़-मरोड़ दें
सारे अर्थ बदल जाएँ उसमें कुछ ऐसा मुहावरा जोड़ दें
जो सच हमारा है वही बस वही समंदर सा फैल जाए



डरता हूँ कि दिखेगा दिखेगा हमें कभी कोई और सच भी
तब तक हम समंदर में जाने कहाँ किस ओर बह चुके होंगे
चारों ओर चीखें होंगीं, और हमें समझ न आएगा कुछ भी
अनजान चट्टानों से टकराते हम तब भरपूर थके होंगे
लाशें बिखरी होंगी जिन साहिलों पर जा गिरेंगे हम
खून सनी रेत में से लड़खड़ाते चलेंगे ढूँढते सहारा
लहरों की मार से गिरते बार बार हर कोई थका हारा
कोई कश्ती पास न होगी न मल्लाह कोई, बहेंगे आँसू हर दम



दूर जंगलों में से कोई हमें पुकारता होगा; हम सुनेंगे
दमन के खिलाफ गाए जाएँगे गीत और हम रुकेंगे वहीं
सत्य सुंदर तब भी ज़िंदा होगा, छिप कर ही सही कहीं
थके हुए हम उन खूबसूरत आवाजों की ओर तब मुड़ेंगे


हर सिम्त माहौल में कोई गिद्ध बू सूँघता होगा
हर पौधे हर पत्ते में से आएगी जिहाद की फिसफिसाहट
शाम छिपे-छिपे हम षड़यंत्र रचेंगे, सुनेगी हिटलर की गुर्राहट
हर साथी फौज-पुलिस को चकमा देते राह ढूँढता होगा



हम नहीं जानते हैं कि अपने इन क्षणों में हम ढो रहे हैं
हमारे भविष्य की दर्दनाक दरारें; इंसानियत नहीं
देश-धर्म ही हमारी नियति है मानते हम क्या खो रहे हैं
फिलहाल झूठे गौरव से सीना है चौड़ा, हैवानियत सही



थोड़ा सुकून, औरों से थोड़ा और ज्यादा सुख
इसी में मदहोश हैं हम, सीना चौड़ा है, निडर हैं
सब जानकर अंजान, मानो तालीमयाफ्ता नहीं सिफर हैं
कैसे जानें कि आगे है इंतज़ार में खड़ा पहाड़ सा दुख।

Sunday, April 13, 2014

यूँ बीत गया एक और व्याख्यान


्याख्यान

तो फिर एक बार
भीड़ भरे हॉल में बोले साईनाथ
बाहर मौसम अच्छा था
मीठी धूप और बयार का मिजाज भूल
जितने बैठे उतने खड़े
सुना एक बार फिर गैरबराबरी पर बोलते साईनाथ
बंद हॉल में थोड़ा सा आस्माँ भारी था
भूखे-प्यासे लोगों की चर्चा का वजन भारी था
फर्श पर कुर्सियों पर जमे रहे लोग
गुरुत्वाकर्षण का बल अचानक भारी था
विट और ह्यूमर पर हँसे कुछ लोग
कुछ निरंतर गंभीर रह गए
रोया कोई नहीं पर रुआँसी थीं कुछ आँखें
माहौल वाकई भारी था
ध्यान से सुनते हुए
कुछ युवा लड़के-लड़कियाँ
देखते दिखाते रहे
स्मार्ट फोन पर
अपने और दोस्तों के फोटोग्राफ,
नरेंद्र मोदी और केजरीवाल पर एफ बी कमेंट

ज़रूरी था कि पूरे व्याख्यान को सुनें
बाकी जीवन में सुना सकें घर-परिवार-दोस्तों को
सुना है कभी साईनाथ को
कमाल वक्ता कमाल बातें
एक बार फिर दर्ज़ हुआ
विमर्श सवाल जवाब का सिलसिला
थके नहीं लंबे जवाब दिए
बस एक बार खिड़की से बाहर देखा
क्षण भर के लिए रुक सा गया समय
सोच रहे थे साल के दो सौ बहत्तर दिनों को
जब ऊबड़-खाबड़ ज़मीन सरीखी ज़िंदगी जीते लोगों का साथ होता है
जिनके लिए बहाने को अब आँसू भी नहीं बचे हैं
वह एक रुका क्षण ले गया उनको वहीं विदर्भ अनंतपुर
कुछ लोग इसी मौके में हॉल से बाहर निकल आए
इस साल इस हॉल में
यूँ बीत गया एक और व्याख्यान।
                                      - (जनसत्ता - 2014)

Saturday, April 12, 2014

सही-ग़लत


यह कोई बारह दिन पहले 'शुक्रवार' के लिए लिखा था। इस हफ्ते के अंक में आ गया होगा।


हमें ही सही-ग़लत तय करना है
- लाल्टू

नरेंद्र मोदी ने असम के धेमाजी में भाषण देते हुए कहा है कि गैंडों को मार कर बांग्लादेशियों के लिए जगह बनाई जा रही है। कोई नई बात नहीं, थोड़े ही दिनों पहले जम्मू में भी केजरीवाल को वह पाकिस्तान का एजेंट घोषित कर चुके थे। चुनाव का समय है, इसलिए आरोप-प्रत्यारोप की भाषा खूब सुनाई पड़ेगी। वैसे भी नरेंद्र मोदी मौका मिलते ही हमें याद दिलाने की कोशिश करते हैं कि हम किसी विशेष समुदाय के व्यक्ति है और दूसरे समुदायों के लोगों को लेकर हमें सचेत रहना चाहिए कि कहीं कोई हमें टँगड़ी न मार जाए। यह उनकी विशेषता है। पंद्रह बीस साल पहले ज्यादा जहर भर कर कहते थे, अब कुछ हद तक राजनैतिक दबावों के कारण और कुछ शायद उम्र का तकाजा है कि उनका स्वर पहले से धीमा पड़ा है।

पर उनकी ये बातें हमें कुछ सोचने को विवश करती हैं। बेशक बांग्लादेशी शरणार्थियों की बड़ी तादाद पिछले दो दशकों में असम में बस गई है। इससे वहाँ ज़मीन और अन्य संसाधनों पर भार बढ़ा है। यह भी सच है कि इनमें से कई मुसलमान हैं। पिछले सवा सदी की अवधि में, खासतौर से उत्तर भारत में सांप्रदायिक माहौल कभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। सभी समुदायों में कट्टरपंथियों ने अपनी जड़ें फैलाई हैं। असम भी इससे छूटा नहीं है, हालाँकि वहाँ ये समस्याएँ आज़ादी के बाद से ही बढ़ीं। असम के मूल निवासियों में, जिनमें जनजाति के लोग भी हैं, यह चिंता दिखती है कि उनके यहाँ बंगालियों की तादाद बढ़ती गई है और कई क्षेत्रों में वे धीरे-धीरे अल्प-संख्यक होते जा रहे हैं। यह ऐसा ही है, जैसे भारत के कई राज्यों में घुमंतू कामगारों की वजह से स्थानीय जनसंख्या में बड़े बदलाव आ रहे हैं। पंजाब से लेकर केरल और तमिलनाड जैसे कई राज्यों में यह दिखता है। हर जगह इन बदलावों से नए तनाव पैदा हुए हैं।

इस समस्या को समझने के कई तरीके हो सकते हैं। एक तो यह कि कई बांग्लादेशी ग़रीबी और भुखमरी से तंग लोग हैं और काम की तलाश में मारे-मारे भटकते हुए वे सीमा पार कर भारत में आ गए हैं। यह हर कोई मानता है कि ये शरणार्थी मेहनती हैं और कम लागत में अधिक काम करने की वजह से जोतदार या ठेकेदार लोग उनको काम देते हैं। कई वर्षों तक यहाँ रहते हुए वे भारत की नागरिकता में अधिक सुरक्षा महसूस करते हैं। संसदीय राजनीति के खिलाड़ी इस बात का फायदा उठाकर कि उनको नागरिकता दिलाने पर एक सुरक्षित वोट बैंक भी बन जाएगा, मामले को और जटिल बना देते हैं।

एक तरीका यह है कि हम यह मान लें कि बांगलादेशी तो सारे मुसलमान हैं और वो एक षड़यंत्र के तहत भारत में घुसपैठ कर बस रहे हैं। नरेंद्र मोदी इसी भावना को भड़काने वाले हैं।

हममें से हर कोई अपनी भली और बुरी अस्मिताओं को ढोते हुए जीता है। हर कोई इतना उदार नहीं हो सकता कि चारों ओर फैली सच्चाई को देखे और देश- दुनिया में बराबरी लाने के लिए जीवन समर्पित कर दे। मन में एक पक्ष कहता है कि क्या किया जाए, जो है सो है, पर हमें तो अपनी ज़िंदगी को देखना है, इसलिए जो दिखता है उसे हम अनदेखा कर जीना सीख लेते हैं। एक और पक्ष है जो आक्रोश से फुँफकारता है कि क्यों ये लोग हमारे जीवन में घुस आए हैं, इनको यहाँ नहीं होना चाहिए। भले-बुरे की इस लड़ाई में कभी भला तो कभी बुरा पक्ष हावी हो जाता है। व्यक्तिगत द्वंद्व से आगे बढ़कर कभी यह सामूहिक स्वरूप अख्तियार करता है। इस तरह यह सांप्रदायिक राजनीति का औजार बन जाता है।

नरेंद्र मोदी हमारे उस सामूहिक बुरे पक्ष को जगाने वाली ताकतों के प्रतिनिधि हैं। हम जब कोशिश करते हैं कि बदली हुई स्थितियों में खुद को मना लें और दूसरे इंसानों की तकलीफों को पहचानें, नरेंद्र मोदी जैसे लोग, जिनमें संघ परिवार के अलावा जमाते इस्लामी या ऐसे ही और कट्टरपंथी दलों के नेता भी आते हैं, हमारे अंदर के शैतान को जगाते हैं कि सोचो वह आदमी जो अपने बच्चों की भूख मिटाने तुमसे काम माँग रहा है, वह तुम्हारे समुदाय का नहीं है। आज देश के कई हिस्सों में जो मोदी लहर दिखती है, उसकी जड़ में यह क्रूर मानसिकता है, जो कभी उदासीनता तो कभी खूँखार हिंसक प्रवृत्ति बन कर सामने आती है।

एक तर्क यह है कि तो क्या हम बाहरी लोगों को घुसते ही रहने दें, कुछ तो करना ही होगा। सही है, पर वह मुंबई में बिहारियों को मार कर या असम में बंगालियों को मारकर नहीं होगा। वह नवउदारवादी नीतियों के तहत नहीं होगा, जिसके झंडे को सामने रखकर अपने असली चेहरे को छिपाते मोदी देश भर में लोगों को बरगला रहे हैं। ग़रीब कामगरों और किसानों की समस्या के स्थाई हल कल्याणपरक ठोस नीतियों के जरिए ही निकलेंगे। हमारे सामूहिक विष वमन से कोई हल नहीं निकलेगा।

पड़ोसी देशों के प्रति नफ़रत फैलाकर और अपने देश में लघु समुदायों को असुरक्षित रखने के जिन संघी विचारों का प्रतिनिधित्व मोदी करते हैं, वह हमें आगे नहीं, बल्कि बहुत पीछे मध्य-काल की ओर ले जाएगा। सत्ता में आते ही ये लोग लोकतांत्रिक ढाँचे पर कुठार चलाएँगे। पाठ्य-पुस्तकों में कूपमंडुकता और सांप्रदायिकता पर आधारित सामग्री डालेंगे। इस अँधेरे से लड़ने के लिए कोई और मदद नहीं कर सकता, हमें ही खुद से लड़ना है कि हमारी कमज़ोरियों का फायदा ग़लत लोगों को न मिले।




Friday, April 11, 2014

हम कैसा भविष्य चाहते हैं

 कल जनसत्ता में  प्रकाशित आलेख -


चुनाव का वक्त है। भारत में कहीं दुंदुभी बज रही है तो कहीं संग्राम शुरू हो गया है। पड़ोस में एक और देश अफगानिस्तान में अभी शनिवार को चुनाव हुए हैं। दोनों मुल्कों में माहौल में फर्क गौरतलब है। भारत में अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद लोकतंत्र की जड़ें मजबूत दिखती हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा बिका हो सकता है, पर प्रिंट और दृश्य दोनों माध्यमों में पर्याप्त आज़ादी का दावा है। सभी ताकतवर राजनैतिक दल भ्रष्ट हैं, कोई पैसों के लेन-देन में तो कोई बौद्धिक धरातल पर, हर तरह के भ्रष्टाचार का बोलबाला है। फिर भी हमें अपने लोकतंत्र पर नाज़ है कि कम सही, सामाजिक गैरबराबरी और दकियानूसी सोच के विरोध में उठती आवाज़ें बुलंद हैं। अफगानिस्तान में ऐसा नहीं है। यह वह मुल्क है, जिसे रूस ने थोड़ा बनाया, थोड़ा बिगाड़ा तो अमेरिका ने बिल्कुल ही तबाह कर दिया। फिर अपने ही बनाए दानव तालिबान से लड़ने फौजें भेजीं। इस बार चुनाव तब हो रहे हैं, जब अमेरिकी वहाँ से पूरी तरह से दफा होने को हैं। कोई नहीं जानता कि आगे क्या होने वाला है। अफगानिस्तान हमेशा ऐसा नहीं था। हालाँकि भारत की ही तरह वहाँ के गाँव काफी पिछड़े हुए थे, 1980 तक काबुल जैसे शहर आधुनिक रंगत के बढ़िया नमूने थे। विश्वविद्यालय में छात्र-छात्राएँ हमारे युवाओं की तरह मिल-जुल सकते थे। खुली सोच और रुढ़ि का द्वंद्व था, पर किसी की कल्पना में भी यह नहीं था कि हालात आज जैसे हो जाएँगे, जब औरतें कैदियों की तरह जी रही होंगीं, पुरातनवादियों का बोलबाला होगा।

उपराष्ट्रपति के पद की प्रार्थी हबीबा सरोबी के साथ कोई 300 स्त्रियाँ प्रांतीय परिषदों के लिए चुनाव मैदान में थीं। इनमें से एक ज़ाकिया वारदाक की बेटी मरियम वारदाक का कहना है कि उसने गाँव जाकर देखा कि एक महिला 25 वर्षों से अपने जेठ-देवरों के सामने बुरखा नहीं उतार सकती। शुक्र है कि हम अफगानिस्तान नहीं भारत में हैं। तमाम खाप पंचायतों के बावजूद अधिकतर लोग अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से जीने को आज़ाद हैं। पर भारत में कब तक यह माहौल रहेगा, जो आज है! क्या माहौल सुधरेगा या वह और भी बिगड़ेगा! इस बार के चुनावों में यह सवाल बहुत गंभीर बन कर सामने आ रहा है। कई लोग कहेंगे कि अरे अफगान लोग पिछड़े लोग हैं। वहाँ रुढ़िवाद हो सकता है, हमारे यहाँ नहीं होगा। याद करें कि उन्नीसवीं सदी से लेकर बीसवीं सदी की शुरूआत तक सारे यूरोप में जर्मन बुद्धिजीवियों की धाक थी। दर्शन, विज्ञान, संगीत, हर क्षेत्र में जर्मनी और दीगर मुल्कों से आगे था। फिर दो दशकों में ही ऐसा हुआ, जिससे आज तक जर्मन लोग उबर नहीं पाए हैं। यहूदियों के खिलाफ भावनाओं को भड़काते हुए नात्सी पार्टी सत्ता में आई और जब तक हिटलर ने आत्महत्या की, जर्मनी ही नहीं, सारी दुनिया बदल चुकी थी। लंदन शहर का आधा तबाह हुआ तो ड्रेस्डेन जैसे शहर मिट्टी में मिला दिए गए। मित्र-शक्ति में शामिल जापान – उफ्फ्! हिरोशिमा, नागासाकी का वह भयानक विनाश, कौन इन बातों को भूल सकता है? आखिर कैसे होता है यह सब कि अच्छे-भले समाज देखते ही देखते इस तरह रसातल में डूब जाएँ कि विनाश और तबाही के बिना उनको वापस लाना संभव ही न हो। इसका मुख्य कारण यह है कि जब विनाशकारी ताकतें सत्ता में आने की प्रक्रिया में होती हैं, अधिकतर लोग, खासकर युवा इस झंझा को ताड़ नहीं पाते। उन्हें लगता है कि जितना भी हो, कुछेक गड़बड़ियाँ होंगीं, पर सारे देश में तबाही लाने की बात कपोल-कल्पना है।

भारत में स्थानीय स्तर पर कभी प्राकृतिक तो कभी इंसानी दरिंदगी से तबाही के नमूने दिखते रहे हैं। पर ऐसा आज तक नहीं हुआ कि सारा देश किसी विनाश लीला से सीधे प्रभावित हो। यहाँ तक कि देश के विभाजन की अंतहीन पीड़ा से भी देश का अधिकांश छूटा हुआ था। अभी हो रहे चुनावों में पहली बार ऐसी स्थिति है कि हम देश के हर कोने में विनाश लाने वाली ताकतों के सत्ता में आ सकने की संभावना देख रहे हैं। देश में हर जगह कम ज्यादा आधार इन ताकतों का है। खाप पंचायत और राम सेने के स्त्री-विरोधी हिंसक कार्य-कलाप, अमदाबाद, कंधमाल, मुजफ्फरनगर आदि अनेक इलाकों में लघु-संप्रदाय पर अत्याचार, पुस्तकों पर ऊल-जलूल तर्कों के आधार पर प्रतिबंध - यह सब जो अब तक टुकड़ों में होता रहा है, हिंदुत्ववादी ताकतें उन सबको संगठित रूप देने को तत्पर हैं। दूर दराज के इलाकों में कहीं स्कूल बनाकर, कहीं भगत सिंह और विवेकानंद का ग़लत इस्तेमाल कर लोगों में जहर फैलाया जा रहा है। खतरनाक बात यह है कि जैसा पिछली सदी में जर्मनी, इटली, स्पेन के साथ और बाद में अफगानिस्तान में देखा गया, थोड़े समय में बड़ा मुनाफा कमाने के लालच से, भारत में भी विश्व-स्तर का पूँजीवाद इन ताकतों की मदद कर रहा है।

भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी भी मजबूत नहीं हैं, इस बात को हम पहली बार तब जान पाए थे, जब भूतपूर्व प्रधान-मंत्री इंदिरा गाँधी ने आपात-काल की घोषणा की थी। आपात-काल के दौरान जिस तरह की ज्यादतियाँ हुईं और नागरिक अधिकारों का हनन हुआ, उसकी कल्पना पहले किसी ने न की थी। इतिहास हमें संभावनाओं को दिखला देता है, उन पर गौर करना या उन्हें अनदेखा करना हमारा काम है।

सवाल उठ सकता है कि एक पार्टी और उसके लोकप्रिय नेता का ऐसा विरोध हम क्यों कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने बड़ी सावधानी से अपनी नई छवि गढ़ी है। बीस साल पहले से मुख्य-मंत्री बनने तक जैसा सांप्रदायिक जहर वे उगलते थे, उससे बच कर बड़े व्यापारियों के मित्र की इस छवि बनाने में कई पैंतरे उन्होंने अपनाए। कोई पत्रकार गुजरात के 2002 में हुए दंगों पर सवाल करे तो वे चुप्पी साध लेते। उन्हें पता था कि चुप रहने पर जो निंदा होगी वह कुछ कह देने पर होने वाली स्थिति से ज्यादा विकट है। कई जगह देश के इतिहास भूगोल पर अंट-शंट कहकर पहले ही काफी फजीहत हो चुकी थी। जहाँ भीड़ बीजेपी समर्थकों और संघियों की दिखी तो कह दिया कि दंगों का दुख है, पर इसका कोई अपराध-बोध उन्हें नहीं है। उन्हें सचमुच पहले जैसा जहर उगलने की ज़रूरत नहीं है। वैसे भी जो ज़मीनी काम है वह तो संघ के सेवक कर ही रहे हैं। अमित शाह ने मुजफ्फरनगर में अपने सहयोगियों के साथ वह आग लगा ही दी जिसके लिए वे वहाँ गए थे। बाकी जेटली, राजनाथ सिंह से लेकर रामदेव तक अपना काम कर ही रहे हैं। इसलिए मध्य-वर्ग के उस बड़े हिस्से को जो खुले आम सांप्रदायिक होना पसंद नहीं करता, उनको साथ रखने के लिए सावधानी से छवि बनाए रखनी थी। पर महीनों देश-विदेश के पूँजीपतियों के पैसों से धुँआधार चुनाव प्रचार में लगे रहकर दिखने लगा कि लहर सचमुच वैसी है नहीं, जैसा कहा जा रहा था। पार्टी भी पूरी तरह से उनके साथ नहीं है। तो अब बेचारे थकने भी लगे हैं और जहाँ थोड़ा सा भी माहौल अनुकूल लगता है, वहाँ अपनी पुरानी शैली में भड़काने का काम कर आते हैं। जम्मू में केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट घोषित कर दिया। थे। असम के धेमाजी में भाषण देते हुए कहा है कि गैंडों को मार कर बांग्लादेशियों के लिए जगह बनाई जा रही है। कभी कह दिया कि सरकार गोहत्या के लिए बनाए कसाईखानों को बढ़ा रही है। ये सब बातें इसलिए कहनी पड़ रही हैं कि कुछ मतदाता और कुछ समझें न समझें वे सांप्रदायिक भाषा समझते हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश का नाम लेकर मुसलमानों के खिलाफ भावनाएँ भड़काई जा सकती हैं। ऐसा ही गोहत्या का संदर्भ भी है। उन्हें पता है कि आम लोगों की स्मृति में इतना नहीं रहता कि गोहत्या का कारोबार बीजेपी के नेतृत्व वाली एन डी ए सरकार के दिनों में भी वैसा ही चलता था जैसा आज चलता है। उनके अपने राज्य गुजरात से भी मांस का निर्यात बढ़ता चला है। पर सांप्रदायिक सोच तर्क नहीं कुतर्क से नियंत्रित होती है। पड़ोसी देशों के साथ समस्याएँ आपसी विमर्श से सुलझाई जा सकती हैं, यह सोचना सही तो है, पर इसके लिए संयत मानसिकता चाहिए जो खुशहाल माहौल में पनपती है। जहाँ आधी जनता भुखमरी और ग़रीबी का शिकार है, ऐसी बदहाली के माहौल में - वे सब बदमाश हैं हम उनको मजा चखा देंगे जैसी मार-काट की भाषा जल्दी घर करती है। इंसान के अंदर के इसी हैवानियत को भड़काकर मोदी और संघ परिवार अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं। लोकतंत्र की कमजोरियों का पूरा फायदा ये लोग उठाएँगे। सत्ता में आने के बाद ये लोग क्या करेंगे? जैसे अफगानिस्तान को विकास के राह से भटका कर उसे मध्य-कालीन स्थितियों में धकेल दिया गया, ऐसा ही यहाँ भी हो सकता है। स्त्रियों के अधिकार छीने जाएँगे। धर्म और जाति के नाम पर लोगों पर ज़ुल्म ढाले जाएँगे। इतिहास की किताबों में अपने ढंग से मनगढ़ंत बातें डाली जाएँगीं। जहाँ पारिस्थितिकी में असंतुलन से समूची धरती के विनाश को लेकर हर ओर इंसान परेशान है, और विश्व-स्तर की मानवीय चेतना के निर्माण की ज़रूरत गंभीर होती जा रही है, वहीं ये संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित भावनाओं को बढ़ाएँगे।

इन मानव-विरोधी ताकतों को आर्थिक समर्थन नवउदारवादी पूँजी के सरगनाओं से मिल रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार ने नवउदारवादी नीतियाँ देश पर लागू कीं। एन डी ए सरकार ने उसे आगे बढ़ाया और पिछले दस साल में यू पी ए सरकार ने इसके ढाँचे को और मजबूत किया। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में निजीकरण को बढ़ाया गया, बड़ी तादाद में लोगों को विस्थापित कर खनन का कारोबार बढ़ा। जब इन नीतियों का विरोध बढ़ने लगा तो कुछ कल्याणकारी कदम उठाए गए। इससे कांग्रेस से सरमाएदारों की जमात का भरोसा कम हो गया। मोदी के तानाशाही रवैए में उनको भरोसा है कि जन-विरोध को कुचलने में वे कामयाब होंगे। आखिर अपनी हिंदुत्व की विचारधारा को तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने नकारा नहीं है। नवउदारवाद और सांप्रदायिकता का यह मेल भारत के लोकतंत्र को ध्वस्त कर देगा। अभी यह देख पाना संभव नहीं है, पर जब ज़ुल्म का दौर शुरू होगा, हम असहाय दर्शक बने रह जाएँगे या एक-एक कर धरती से हमारा निशान मिटता जाएगा।

ऐसा नहीं कि बर्बरता पर हिंदुत्ववादियों का एकाधिकार है। हर समुदाय में कट्टरपंथी हैं और सरमाएदार अपने फायदे के लिए उन सबके साथ समझौता करते रहते हैं। नरेंद्र मोदी जैसे लोग, जिनमें संघ परिवार के अलावा जमाते इस्लामी या ऐसे ही और दलों के नेता भी आते हैं, हमारे अंदर के शैतान को जगाते हैं कि सोचो जो आदमी तुम्हारे समुदाय का नहीं है, वह तुम्हारे बराबर कैसे हो सकता है। जिसे मोदी लहर कहा जा रहा है, उसकी जड़ में यह क्रूर मानसिकता है, जो कभी उदासीनता तो कभी खूँखार हिंसक प्रवृत्ति बन कर सामने आती है। हर हर मोदी जैसे आक्रामक नारे भी सुनाई पड़ने लगे हैं।

यूरोप से लेकर अफगानिस्तान तक का इतिहास हमारे सामने है। अनपढ़ लोगों को भड़काना आसान है। कम से कम हम पढ़े लिखे लोग चुनाव के हक का इस्तेमाल करते हुए एकबार गंभीरता से सोचें कि हम इस मुल्क का कैसा भविष्य चाहते हैं।

Wednesday, April 09, 2014

सड़क किनारे


सड़क किनारे
दुम दबाए घूरती
व़ह मुझे अपने बच्चों का दुश्मन मानती है

मुझे उसके पिल्ले प्यारे लगते हैं
मैं उसे फुसला नहीं सकता
वह यूँ अपनी जगह पर अड़े हुए मुझे शक से देखती
जैसे मेरी जरा सी ग़लती पर हमला कर देगी

वहीं एक बच्ची जो धीर-धीरे बन रही
बहुमंज़िला इमारत
के पास बैठ
एकटक अपनी माँ को तगाड़ी भर-भर कभी ईंटें कभी सीमेंट
कहीं ऊपर कहीं नीचे चढ़ाती उतारती देखती रहती

मुझे अपनी माँ याद आती है
और मैं चाहता हूँ
कि तुम आओ
मुझे अपनी गोद में मुँह छिपा थोड़ी देर रो लेने दो

अपने पिल्‍लों की हिफाजत में बैठी
वह मुझे एक पैगंबर लगती
मेरी माँ जैसी
और उस माँ जैसी भी
जो तगाड़ी दर तगाड़ी इस दुनिया से
अपनी बच्ची को बचाने के लिए हर पल सतर्क है

दुनिया की सभी
माँओं जैसे उसका
एक पेट है जिसमें मेरी माँ के मुझे जनमने जैसा विज्ञान है
जो उसकी छातियों तक जाता है
जहां मुंह छिपा उसके पिल्ले दूध पी सकें और
निरंतर खेल-झगड़ सकने के काबिल रहें जैसे मेरी माँ ने
मुझे मेरी दोस्त से यह कहने के काबिल बनाया कि वह दुनिया की सबसे खूबसूरत धड़कन है
जैसे वह बच्ची जो एकटक देख रही अपनी माँ को
एकदिन इस काबिल बन ही जाएगी कि वह भरपूर जिए
सपने देखे
प्रेम करे

फिलहाल तो मैं बस उसे शुक्रिया कहता हूँ कि उसे देखकर मैं कुछ देर और जीता हूँ

(बनास - 2014)