Wednesday, January 18, 2017

18. हर रात अब अमावस की रात होगी

फरिश्तों से कह दो
 

वे अब न आएँ
 

वे तुम्हारा हाथ नहीं थाम पाएँगे
 

मैंने सारी धरती पर काँटेदार बाड़े लगा दिए हैं
 

हर प्रवेशद्वार पर नुकीले त्रिशूल लिए खड़े हैं
 

चिलम सी धधकती आँखों वाले प्रहरी

 

चाँद को रोक दिया है मैंने
 

हर रात अब अमावस की रात होगी

 

कोई जादू, ताबीज़, मंत्र-तंत्र काम नहीं आएगा
 

कापालिक रक्तपिपासु मेरे साथ हैं
 

सभी मठों पर कब्जा है
 

मेरे अवधूतों का
 

हर धाम ख़ून की आरती चढ़ाई जाती है मेरे आका को।

 

Send a word to the angels
 

They must not visit any more
 

They will not be able to hold your hand
 

I have put a barbed fence all around the Earth
 

Sentries with glowing pot like eyes
 

Guard every entrance with pointed tridents 

 

I have stopped the moon
 

It will be a new moon every night now

 

No magic, amulets, tantra or spells will work
 

The bloodthristy skull-carriers are with me
 

The ascetics I own rule all monasteries
 

My master is worshipped in each of them
 

With blood servings.

Sunday, January 15, 2017

17. ऐसी ही कविता लिखनी है मुझे


मेरे पूर्वसूरी कविता लिखते थे

मैंने कोशिश की

और जाना कि

जिस अँधेरे में हूँ वहाँ

कविता नहीं होती।

गुस्से में हाथ आई सभी कविता की किताबें

फाड़ कर आग में जला दीं


जलते कागज में से कोई आवाज़

-आ कह जाती

कि जहाँ प्यार नहीं

वहाँ कविता नहीं होती।

मैंने कल्पना में दुनिया की

सबसे खूबसूरत औरत को देखने की कोशिश की।

हड्डियों का ढाँचा वह आती

होंठों में काला पड़ा ख़ून

कोशिश की कि उसे मुस्कराता देखूँ

होंठ खुलते दिखते उसके विषैले दाँत

वह चबाती कागज़ के पन्ने

जिन पर बेहतरीन कविताएँ लिखी होतीं।

सोचा कि उसके उन्माद पर कविता लिखूँगा

कपड़े उतार कर

उसके वक्ष नितंब देखूँगा

पर उसका शरीर काँटेदार रोंओं से भरा था


एकबारगी चीखे बिना नहीं रहा गया

कि ऐसी ही कविता लिखनी है मुझे।

Those who came before me wrote poems

I tried

And learned that

The darknss in which I dwell

Does not allow poetry.

I was angry and I burnt

All the books that I could find.


A voice kept reaching me 

From the burning papers

That poetry does not grow

Where Love does not exist.

I tried to imagine

The prettiest woman in the world

She appeared, a skeleton

With dark blood on her lips

I tried to see her smile

Venom fangs appeared as she opened her lips

She ate sheets of paper

With poems written on them.

Then I thought of writing a poem on her insanity

That I would take her clothes off and

And see her breasts and her behinds

But her body was filled with thorny hair


And for once I could not help screaming

That this is the poetry I write.

Sunday, January 08, 2017

16. तुम सिर्फ उत्पाद हो



इधर कुछ समय से मेरी ज़ुबान पर

जिन्हें पहले हराम कहता था ऐसे अल्फाज़

अनचाहे ही आते हैं

कत्ल और दंगा-फसाद ही नहीं

खारिज किसी दुनिया से वापिस आए अनेकों लफ्ज़

रस-बस गए हैं ज़ुबान पर


याद है कि अपने आका तक

पहुँचने के लिए कभी अपने मातहतों से कहा था कि

कातिलों को कुछ देर खेल खेल-लेने दो

आज तक इक्के-दुक्के लोग कोशिश में हैं

कि अंतरिक्ष में ध्वनि की गति से ज्यादा तेजी से दौड़ कर

उन लफ्ज़ों को पकड़ लें

भोले बेचारों को समझ नहीं आई है

कि अंतरिक्ष में हर दिशा में

खड़े हैं कराल द्वारपाल

क्षितिज झुका बैठा मेरे आका के पैरों पर

नवजात बच्चों के माथों पर चिरंतन दासता का भवितव्य

लिखा जा रहा है


भूल जाओ कि कभी तुमने सपनों में फूल देखे थे

तुम सिर्फ उत्पाद हो

और-और उत्पाद का स्रोत बन जीते रहना तुम्हारी नियति है।


For a while now words that I hated earlier

Come out of my mouth

Without my asking;

Not just murder and mayhem

Many words from some world rejected

Are part of my vocabulary


I remember that to conect with my master

I had told my subordinates

That the killers be allowed to play the game for a while

There are a few who to this day

Think of flying with a speed greater than of sound

And catching the words

Poor fellows do not realise

That in all directions in space

There stand the gatekeeping monsters

The horizons bow to my master

And the newly born are being destined

For slavery forever.


Forget it that you dreamt of flowers once

You are a mere product

It is your destiny that you will live to be source of even newer products.

Saturday, December 31, 2016

15. मैं कानून हूँ

जहाँ जाता हूँ
 

साथ होती एक स्याह चादर
 

धरती की परिक्रमा कर रहा हूँ
 

समूची धरती पर फैल रहा स्याह रंग
 

कोई कानून मुझे नहीं रोक सकता
 

दीगर मुल्कों में सहचर
 

मुझसे सीख रहे हैं गुर
 

स्याह चादरें दिखने लगी हैं धरती के हर कोने में

 

भूख धधक रही धरती पर हर ओर
 

कोई घास फूस खाता है
 

कोई प्यासा मर जाता है
 

हम स्याह साथ लिए चलते हैं
 

हमें अँधेरे की भूख है
 

हम अँधेरे में जीते हैं
 

अँधेरा खाते-पीते हैं
 

हमारा मकसद अँधेरे से धरती को ढँक लेना है

 

कई डॉक्टर, वैज्ञानिक, चिंतक, परेशान हुए
 

पर वे अकेले पड़ते जा रहे हैं
 

धीरे-धीरे हर कोई हमारे घेरे में आ रहा है

 

कानून की पकड़ क्या होती है
 

मैं ही कानून हूँ।

 

Wherever I go
 

A gloomy canopy accompanies me
 

I am out on globetrotting
 

A colour of gloom spreads across the skies
 

I am not restrainable by law
 

Fellow-travellers in several other countries
 

Are learning skills from me
 

And gloom canopies spread across all the skies

 

Hunger burns across the globe
 

They eat the weeds
 

They die of thirst
 

We carry gloom
 

We are what the darkness craves for
 

We live in dark
 

We thrive on darkness
 

We aim to engulf the Earth in darkness

 

Wise folks, the doctors and the scientists, are worried
 

But then who cares for them
 

We will catch all of them

 

Who cares for the law
 

I am the law.

Thursday, December 29, 2016

14. चुपचाप अट्टहास: हवा ने कहीं जाल बिछाया हो



मैं पहाड़ों पर चला तो चट्टानें फट गईं

नदियों का सीना चीर डाला मैंने

समूची धरती पर वनस्पति काँपती

तेजाब बरसता है जहाँ मैं होता हूँ


हर मिथक में एक राजकुमार होता है

वह दरख्तों को उखड़ने से रोकता है

उसकी चाल को हवा सुर में बाँध देती है

जब वह दबोच लेता है मेरे प्राण-पखेरू

मेरे पैरों तले कहीं कुछ ठोस नहीं होता


अब अनगिनत राजकुमार हैं

डरता हूँ

ध्यान से सुनता रहता हूँ

हवा ने कहीं जाल बिछाया हो

मुझे किसी भँवर में डालने को।


I walk on the hills and they split apart

I cleave the rivers

Plants shiver on the Earth

Acid rains where I am


A prince comes in the tale

He saves the trees from being killed

The wind gives chime to his gait

When he catches hold of my soul

I am left with no firm ground below my feet


There are princes too many

I fear

I listen with care

What if the wind laid a snare

to trap me.

Sunday, December 25, 2016

13. नासूर

चौंका जब पढ़ा
 

कि मेरे नाम पर वैज्ञानिकों ने किसी नासूर का नाम रखा है
 

 खुद को बार बार देखा
 

 कपड़े उतारे, बढ़ी तोंद और सख्त पाछों को घूम-घूम कर देखा
 

क्या सचमुच नासूर हूँ

 

धीरे-धीरे  समझ आया कि
 

सचमुच नासूर हूँ
 

भृकुटी सपाट हुई
 

मुस्कान हँसी और फिर अट्टहास में बदली

 

नासूर
 

कैसा चाकू लगेगा काट उखाड़ने में
 

एकबारगी अपने अट्टहास से मैं डरा।

 

It came as a shock
 

That scientists have named a kind of cancer after me
 

I looked at myself many times
 

Took off the clothes, turned my neck and saw my pot-belly and hard buttocks
 

Am I really malignant

 

Gradually it dawned on me
 

That I am indeed a cancer
 

My brows flattened
 

Smile changed to laughter and then into roaring laughter

 

Malignant tumour
 

‘Wonder what scalpel they would need to remove me
 

For once my horse-laugh scared me.

Monday, December 19, 2016

12. अनुचर हूँ मैं उस का

कुछ नाम मुझे याद आते हैं
 

आखिर मैं वहीं पैदा हुआ
 

गलियों मैदानों में खेला
 

दूकान में काम किया

 

नाम याद आते हैं अचानक
 

कभी गहरी नींद से झकझोरते से
 

सच कि कभी-कभी पसीना आता है उन के याद आने पर
 

जिन्हें आग, रासायनिक या ऐसे तरीकों से
 

धरती से किसी और लोक में भेजा गया

 

कभी-कभी बू साथ आती है
 

जैसे कोई नाम नहीं, एक जलता हुआ शरीर है
 

और हाँ, कभी कोई स्त्री या बच्चा भी होता है
 

एक नाम अक्सर नींद से जगाते मुझे
 

कह जाता है मैं इतिहास हूँ

 

आखिर वह क्या कहना चाहता है
 

नाम इतिहास कैसे हो सकता है
 

शायद इसी दिक्कत से
 

नाम बदलता रहता है
 

हालाँकि उसका कहा कि मैं इतिहास हूँ
 

नहीं बदलता है

 

विदेशी नाम कम डराएँगे ऐसा मैं सोचता था
 

आखिर 'उएबर आलेस' का नारा हम भी लगाते रहे हैं
 

पर विदेशी गड्डमड्ड हो जाते हैं देशी नामों के साथ
 

कभी-कभी तो किसी अनजान भाषा में
 

बड़बड़ाता नींद से उठ पड़ता हूँ

 

बेकार मुझे ऐसे नाम याद दिलाते हो
 

जो रोते चीखते हैं
 

सपनों में डरता हूँ तो क्या
 

जागता तो कब का नहीं रहा
 

अनुचर हूँ मैं उसी का
 

जो हर रंग को घने स्याह में बदल देता है।
 

A few names remain in my memory
 

After all I was born there
 

I played in the lanes and the parks
 

I worked in the shops

 

Names come to me all of a sudden
 

Sometimes shaking me out of deep slumber
 

Indeed I sweat when I remember them
 

Those who were sent to a world away from this Earth
 

By fire, chemicals or similar means

 

Sometimes a stink comes along
 

Not a mere name, a body on fire
 

And yes, occasionally there is a woman or a child
 

Often one wakes me up from sleep
 

And tells me that her name is history

 

What is it that she really wants to tell me
 

How can a name be history
 

Perhaps this paradox is why
 

The name keeps changing
 

Though the words that it is history
 

Do not change ever

 

I used to think that names with foreign words are less fearsome
 

After all, we too have been screaming ‘Über Alles’
 

But the foreign words get mixed up with the native ones
 

Sometimes it is some pigeon tongue altogether
 

That I rattle out as I wake up

 

Why do you remind me of names
 

That cry and scream
 

So what if I have scary dreams
 

It's been a while that I was awake

 

I follow that special one
 

Who transforms all colours into deep gloom.