Wednesday, September 23, 2020

मुंशीगंज की वे

' आलोचना' पत्रिका के अंक 62 में प्रकाशित 


मुंशीगंज की वे

दूसरी ओर दो सौ कदम आगे से मकानों की खिड़कियों पर शाम के वक्त सज-धज कर खड़ी होती थीं। सादे कपड़ों में लोग आते और फौजी यहाँ से आगे न जाएँ लिखे बोर्ड को पार कर जाते। कभी बाँह पर एम पी की पट्टी और सिर पर तुर्रेदार पगड़ी पहने रॉयल एनफील्ड की मोटरबाइक बगल में लिए मिल्ट्री पुलिस वाले दिखते। फौजियों के निजाम में तत्सम शब्दावली आने में अभी कुछ दशक और गुजरने थे।

यहाँ से आगे न जाएँ लिखे बोर्ड वाली सरहद जवानी को जवानी से मिलने से रोक नहीं पाती थी। मुल्क के कोने-कोने से आए मर्द वहाँ मानो किसी मंदिर में जाते थे जैसे जंग छिड़ने पर सनकी कमांडर के हुक्म बजाने टैंक के सामने चले जाते हैं। उनके हाथ छोटे-मोटे तोहफे होते थे, जो वो अपनी बीबियों को देना चाहते थे, पर वहीं अपने वीर्य के साथ छोड़ जाते थे। स्त्रियाँ बाद में नहा लेतीं तो वीर्य बह जाता, पर तोहफे रह जाते। कुछ तोहफे उनके बच्चे ले लेते।

मर्द शराब पीते थे और हमेशा हँसते नहीं थे। कभी किसी स्तन पर माथा रखे रोते थे। सियासत नहीं समझते थे, पर जानते थे कि पुरअम्न दिनों में भी जंग छिड़ सकती है। कभी भी किसी सरहद को पार करते हुए मारे जा सकते थे। उस खयाल से दो घूँट और पी लेते या रोने लगते थे। कभी कोई दंभ दिखलाता, औरत के जिस्म पर उछलता हुआ दुश्मन पर फतह के उल्लास से चिल्लाता, पर सच यह था कि वह रो रहा होता।

वे यह सब देखतीं। उनमें से ज्यादातर माहिर थीं कि कब किसके माथे को कहाँ छोड़ा जाए कि वह उनकी जाँघों के बीच उछलता रहे। वे जैसी भी दिखतीं, असल में उदासीन आँखों से छत के ऊपर तारों भरे आस्मान के ऊपर देख रही होतीं। फिल्मों-कहानियों में नई नवेली के रोने जैसी बात वहाँ कम ही होती। मुंशीगंज की वे।

(ii)

आना-जाना समांतर ब्रह्मांड में घटित होता था। अपनी धरती पर उन्हें कोई फिक्र न थी कि किस जंग में कौन जीत रहा है, कौन प्रधानमंत्री कब मरा या किस को नोबेल जैसा सम्मान मिला। कुछ बातें न जानना जन्म से उनकी नियति थी। बाक़ी की खबर खुद नहीं रखते थे। उन्हें शिविरों में जानवर की हैसियत से रखा जाता था। जरा सी ग़फलत होने पर उनको ऐसे काम करने पड़ते जो जानवर से भी करवाए न जाते थे, मसलन रेंग कर पत्थर ढोना। उन्हें लगता कि यही सच है, उनको जानवर जैसा होना था। मुंशीगंज की वे उनके जिस्मों की गर्माहट सँभाल रखतीं। उनके सामने वे पिघल-सी जातीं, पर नज़र पलटते ही वे उनके दिए पैसों को ध्यान से गिनतीं। दो पल में जब वे सौ रुपए गिनकर खुश होतीं, टाटा-बिड़ला करोड़ों का लेन-देन कर चुके होते थे। अंबानी को आने में कुछ साल और बाक़ी थे। भारत-पाकिस्तान हाल में तीसरी जंग लड़ चुके थे। एक बंदा नया फील्ड मार्शल बन गया था। उनके कमरों के बाहर बीमार बच्चे खेल-झगड़ रहे होते थे कि वक्त बीत जाए और माँएं खाना खिलाएँ। धंधे के वक्त बच्चों का शोर मचाना उनको पसंद न था। मुंशीगंज की वे।

(iii)

शिविरों में सुबह-शाम जो कुछ भी करते वह अफसरों के आदेश मुताबिक होता। सुबह की परेड, शाम के खेल, हर बात में उनको आ, जा, घूम, नाच, उछल, कूद, हुक्म दिए जाते। कभी-कभी उनसे नकली हमले करवाए जाते कि अगली जंग के लिए तैयार रहें। ऐसा करते हुए उनमें से जो मुंशीगंज आ चुके थे छुट्टी की शाम का इंतज़ार करते। जो अभी वहाँ आए नहीं थे, पर वहाँ की औरतों के बारे में औरों से सुन चुके थे, छुट्टी की शाम का इंतज़ार करते। वक्त के साथ उनके ज़हन में अपराध-बोध कम होता रहता। एम पी वालों से पकड़े जाने का डर रहता और गाँवों में रह रही बीबियों के साथ बेवफाई की परवाह कम होती जाती। उनके सपनों में तमाम परेडों, मोर्चाबंदियों, आगे बढ़ पीछे मुड़ के साथ रंग-बिरंगी साड़ियाँ सलवार कमीज़ पहनी अपने जिस्म लहराती तरह-तरह की वे आतीं। मुंशीगंज की वे।  

(iv)

देर रात तक धंधा कर चुकने के बाद स्त्रियाँ अपने बच्चों की खबर लेतीं। उन्हें सोता देख कर या जगे हुओं को सुलाकर वे खुद सोने की तैयारी करतीं। उनमें से जो पुरानी थीं, उन्हें अपने जिस्म से घिन नहीं आती थी। वे इस पर सोचती भी नहीं थीं। अगली सुबह रोज़मर्रा के काम की चिंता अवचेतन में लिए वे सो जातीं। उनका हर दिन एक जंग है ऐसा कवि सोचते हैं, दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं था। फुर्सत में पीर भरे गीत गातीं और उल्लास के गीत गातीं। वे रोतीं और हँसतीं। बच्चों को पीटतीं और उनसे प्यार करतीं। अभी एड्स की बीमारी आई नहीं थी, कुछ फोड़ा फुंशी और एकाध सिफिलिस से परेशान रहतीं। एकाध असावधान मर्द ये बीमारियाँ साथ ले जाते। साल में एक-दो ऐसे केस होते रहते और फिर कोर्ट मार्शल जैसी कारवाई होती। पुलिस आकर उन स्त्रियों को छेड़ती। कुछ खिला-पिलाकर मामला दफा होता। डॉक्टरों के दौरे होते। जिस्मों की सफाई का इंतज़ाम होता। इन झमेलों के बीच वे पूजा-पाठ, नमाज वगैरह करतीं। मुंशीगंज की वे।

(v)

उनमें से कोई प्यार के सपने देखती थी। कोई मर्द भी कभी हिल जाता। यह मसला कुछ महीनों से ज्यादा नहीं चलता था। उसके लगातार कई दिन न आने से औरत समझ जाती थी कि फिर एकबार उसके साथ धोखा हुआ है। वह अकेले में रोती, अपनी करीबी सखियों से कहती कि मैं मर जाऊँगी। आखिर में सब वैसा ही रहता, जैसा था। इतिहास में ऐसी स्त्रियों को उबारने के लिए मसीहों ने जन्म लिया है। पर इनके साथ भले लोगों की टोलियाँ जुटने में अभी कुछ दशक और लगने थे। कुछ सालों बाद भटके हुए से कुछ युवा एन जी ओ कर्मियों को यहाँ आना था। एड्स पर जानकारी और बच्चों की पढ़ाई के बीच उनमें नए सपनों को जगाना था। उन दिनों ऐसी बातों से बेखबर वे एक उम्र के बाद कहीं गायब हो जातीं। वृंदावन, काशी या ऐसी किसी जगह। एकाध बुढ़ापे और बीमारी में मरने के लिए वहीं पड़ी रहतीं। मुंशीगंज की वे। 

(vi)

ज़िंदगी एक जंग के मानिंद उन्हें निगल जाती थी। किसी भी जंग की तरह कहना मुश्किल है कि कौन किस ओर था। कौन जी रहा था और कौन मरता था, कहना मुश्किल था। ज़िंदगी धरती के सूरज के चक्कर काटने जैसी आवर्ती घटना थी। वे चली जातीं और वे आतीं। तबादले होते और नए मर्द आ जाते। मुल्क में तख्तापलट होता, सरकार गिरती और नई सरकार सत्तासीन होती। कहीं कोई मसीहा सिसकता हुआ गायब हो जाता और नया मसीहा ज़िंदा हो उठता। अदीब उन औरतों के बारे अफसाने लिखते जाते। कई इसी से पहचाने गए कि उन्होंने उन औरतों के सपनों में जगह बनाई। मुंशीगंज की वे।

Monday, September 21, 2020

तीन कविताएँ

 'हंस' के ताज़ा अंक में आई तीन कविताएँ - 


1. आखिरी कविता नहीं


जीवन में कुछ आम बातें रही होंगी, कुछ लोग, आम दोस्त,

भाई-बहन, परिवार। लोग सालों तक

पेड़ की डाल पर पत्तों के काँपने

या बारिश की पहली बूँद बदन पर आ टपकने पर,

सड़क किनारे शोकेस में टँगी कमीज़ देख कर या

खबरों में किसी दुर्घटना के जिक्र पर, अचानक चौंकते होंगे। । लंबी साँस लेकर सोचते होंगे कि

उसे भूल बैठे थे। शाम को बेवजह यू-ट्यूब पर कोई गीत सुनते हुए

कोई रंग दिख जाना, हवा में उसकी आवाज़ की कंपन का होना।

अनकहा मुहावरा याद आ जाना।


उसे मार डाला गया। यह सोचते ही थर-थर काँपते होंगे लोग।

काँपती होंगी दीवारें, खयाल काँपते होंगे, कोई उठ खड़ा होगा,

कोई बैठ गया होगा। कोई सोचता होगा कि यह कैसे संभव है कि

वह नहीं है, पर मैं हूँ। किसी ने उसे बेहद प्यार किया होगा। वह

सरहद पर मारा गया वह गली में मारा गया वह मैदान में मारा गया

वह कहाँ मारा गया। वह किस जंग में मारा गया। दुश्मन की फौजों ने

उसे निहत्था धर दबोचा। ग़लती उसकी कि वह नहीं जानता था कि वह

जंग में शामिल था। उसके मुहावरे उसके हथियार थे। वह अपनी लड़ाई में

सूरज और चाँद को इस्तेमाल करता था। वह प्यार का इस्तेमाल करता था।

दुश्मन ने उसे टेढी आँखों से देखा तो वह हर कहीं दिखा।

उसे मारने की गरज में उन्होंने कई औरों को मारा।

मरने के तुरंत बाद उस पर दर्जनों कविताएँ लिखी गईं।

यह उस पर लिखी गई आखिरी कविता नहीं है।


2. अकेला

जिनसे हर रोज मिलता हूँ

साथ लंच खाता हूँ

सियासत के खतरे और मुखालफत की बातें करता हूँ

अगर उनके पत्ते झड़ गए तो वे कैसे दिखेंगे?


मुंबई में आरे इलाके में ऊँचे दरख्तों को आरों से काटा गया

हमने उन पर बात की यहाँ बैठे जहाँ से दस साल पहले एक गुलमोहर को उखाड़ फेंका गया था

कैंपस की दीवार के साथ कई पेड़ हैं जो आपस में ज़मींदोज़ जड़ें बाँटकर गुफ्तगू कर लेते हैं

उस बंदे की जड़ें वहाँ तक नहीं पहुँच पातीं

वह बहुत अकेला था

कौन समझेगा कि अकला पेड़ बहुत अकेला होता है


जिस गुलमोहर को हमने पाला था उसे हमने काट डाला

कि एक नई इमारत बननी थी और उसके पास हमारे बतियाने की जगह होनी थी


उस गुलमोहर से मैं वहीं बतियाता था, उसके पास से गुजरते हुए उसके तने को छूकर साथ कुछ गोपनीय खयाल साझा कर लेता था


सोचता हूँ कि अकेले हो गए बरगद से कभी पूछूँ कि क्या वह मुझ सा अकेला है।


3. आदत

एक प्रधान-मंत्री की मुझे आदत हो गई है

कुछ विशेषण जो पहले इस्तेमाल कर लेते थे, मसलन जालसाज, धोखेबाज, कातिल, फिरकापरस्त

अब नहीं करता

बासठ की उम्र में अनगिनत ज़ुल्म और जालिमों की आदत पड़ चुकी है


जैसे नापसंद कपड़ों को आदतन पहनते रहते हैं

खयाल आता है कि कुछ गड़बड़ है

पर पल में भूल जाते हैं

आखिर जिस्म ढँकने का काम ही तो करते हैं कपड़े

पर एक प्रधान-मंत्री को आदतन झेलते रहना आसान बात नहीं होती है


उसे आप जाँघिए की तरह नहीं पहन सकते

वह कभी भी चींटी की तरह कहीं भी डंक मार सकता है

सार्वजनिक माहौल में आप उसे उतार नहीं पाएँगे

हालाँकि बेचैनी आप पर सर चढ़कर बोलेगी

नापसंद ज्यादा या कम नमक की दाल सा

वह हर रोज परोसा जाता है

कुछ दिन चीख चिल्ला कर

आप शांत हो जाते हैं


ऐसी आदत के साथ जीते हुए

हम खुद को मुर्दा मानने लगते हैं

किसी शायर ने कहा था कि

मुर्दा शांति से भर जाना खतरनाक होता है

बस आदत है कि इंतज़ार करते हैं

कि एकदिन भेड़िया हमें खा जाएगा।

Saturday, August 01, 2020

विज्ञान, टेक्नेलोजी और समाज

एक अरसे से विज्ञान, टेक्नेलोजी और समाज पर लिखने की सोचता रहा हूँ। संजय जोशी ने पीछे पड़कर चार लेख लिखवा लिए, जो 'समकालीन जनमत' वेब-पोर्टल पर आए हैं। ज्यादातर बातें मौलिक नहीं हैं, पर ज़रूरी बातें हैं, जो हर किसी को पढ़नी चाहिए। 







दलदल में बरगद

'सत्य हिन्दी' वेबसाइट पर आया ताज़ा लेख 

नई शिक्षा नीति : बुनियादी बदलाव या नई जुमलेबाज़ी!

क्या दलदल में कभी बरगद उग सकता है? केंद्र-सरकार ने नई शिक्षा नीति के नाम पर जो मसौदा लागू किया है, पहली नजर में लगता है कि बड़ी मेहनत के बाद और बड़े संजीदा मक़सदों के साथ यह शिक्षा नीति तैयार की गई है। स्कूली तालीम से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय तक की शिक्षा पर गंभीरता से सोचा गया है। पर यह दलदल में बरगद की छाँव का धोखा है। ऐसे समाज में जहां व्यापक गैर-बराबरी हो, बुनियादी मसलों पर फैसला लेने वाले लोग एक छोटे से संपन्न वर्ग से आएं, और अध्यापक- और छात्र-प्रतिनिधियों को फैसलों में शामिल न किया जाए, तो नीतियाँ हमेशा ही खयाली किले जैसी रहेंगी। मसलन एकबारगी ऐसा लगता है कि स्नातक स्तर पर अगर सभी छात्र कामयाब नहीं हो पाते तो उन पर हमेशा के लिए असफलता का धब्बा न लगे, यह अच्छी बात है। अगर कोई चार साल तक पढ़ाई पूरी नहीं कर सकता, तो पहले साल के बाद वह सर्टीफिकेट लेकर निकल जाए, दूसरे साल के बाद डिप्लोमा लेकर निकल जाए, यह तो अच्छी बात होगी। पर कोई यह भी तो पूछे कि स्नातक स्तर की पाठ-चर्या क्या ऐसी होती है कि पहले साल में पूरे प्रोग्राम के मक़सद का एक चौथाई पूरा हो जाता है? साल भर के बाद छात्र के पढ़ाई छोड़ने पर क्या उसमें इतनी काबिलियत होती है कि उसे प्रमाण पत्र दे दें, जिसके बल पर वह कुछ कमा-खा सके? यह सर्टीफिकेट किसको मिलेगा? पहले साल के बाद या दूसरे साल के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्र वही होंगे, जो ग़रीबी या तमाम दूसरे किस्म की समस्याओं की वजह से पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। कहां तो सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हर किसी को मुफ्त तालीम मिले, ताकि आगे चलकर मुल्क की तरक्की में हर कोई पूरी काबिलियत के साथ योगदान करे। हो यह रहा है कि समाज का वह तीन-चौथाई हिस्सा जो आज ऊंची तालीम तक नहीं आ पाता, उसे आधिकारिक रूप से खारिज करने की तरकीब सोची गई है। स्कूली तालीम में कहा जा रहा है कि छठी कक्षा के बाद से पेशेवर प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि बच्चे बड़े होकर हाथों से काम करने में काबिल हों। अगर यह गाँधी के सपने जैसी बात होती कि हर कोई हाथों से काम करना सीखे, तो अच्छी बात होती, पर जाति-व्यवस्था के चंगुल में फँसे समाज में सचमुच इसका मक़सद यही रह जाता है कि बच्चे पारिवारिक धंधों में पारंगत हो सकें। स्कूली तालीम का जो नया ढांचा सोचा गया है, वह अमेरिका जैसे विकसित मुल्क की नकल है। इसलिए मध्य-वर्ग के लोगों को ऐसा लग सकता है कि अब हमारी तालीम का ढांचा भी आधुनिक हो गया है। यह भद्दा मजाक है। महज ढाँचा बदलने से शिक्षा में गुणात्मक बदलाव नहीं आते। क्या पश्चिमी मुल्कों की तर्ज पर समान स्कूली तालीम यहाँ शुरू होगी? क्या किताब कापी, पेंसिल, हर कुछ हर बच्चे को मुफ्त मिलेंगे?

यह कहा गया है कि पांचवी तक बच्चे मातृभाषा या अपने करीब की भाषा के माध्यम में ही पढ़ाई लिखाई करेंगे। पर जब सुविधा-संपन्न स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होगी, तो क्या किसी से कहा जा सकता है कि वह अपने बच्चों को मातृभाषा माध्यम स्कूलों में भेजे? एक आम आदमी को यह समझा पाना कि अंग्रेजी माध्यम के कुछ ही स्कूल अच्छे होते हैं जहां फीस बहुत ज्यादा है और बाक़ी अयोग्य अध्यापकों का धंधा है, इतना आसान नहीं है। ग़रीब को लगता है कि अंग्रेजी ही सफलता की कुंजी है। सच यह है कि मातृभाषा में ही हमारी सीखने की कुदरती क्षमता पूरी तरह फलती-फूलती है। यह बात शिक्षाविद समझते हैं। वे अपने सम्मेलनों में इस बात पर बहस करते हैं, अंग्रेजी में तर्क रखे जाते हैं। आम आदमी इस बात को नहीं समझ पाता। समाज के संपन्न तबके अंग्रेजी बोलते हैं, इसलिए आम लोगों को लगता है कि उनके बच्चे भी अंग्रेजी बोलने लगें तो वह एक दिन ताकतवर हो जाएंगे । जब तक सभी स्कूलों में समान तालीम का इंतज़ाम नहीं होता, एक जैसी सुविधाएं नहीं दी जाती और हर बच्चे को मुफ्त तालीम नहीं दी जाती, तब तक इस तरह की बहस बेमानी है। बेशक हर बच्चे को अंग्रेज़ी सीखनी है, और इसे माध्यमिक स्तर से एक भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकता है। अंग्रेजी को जो सामाजिक रुतबा आज मिला हुआ है, वह खत्म होना चाहिए। आज टेक्नोलोजी का मदद से रोज़ाना ज़िंदगी के सभी काम अपनी जुबान में हो सकते हैं। जब तक हुकूमत और ताकतवर तबके इस बुनियादी बात को नहीं मानेंगे, मातृभाषा में पढ़ने-पढ़ाने की कोशिश कामयाब नहीं होगी।

सदियों से चली आ रही जाति-व्यवस्था में जो हाशिए पर रहने को मजबूर हैं, और वे सभी तबके, जो जेंडर, मजहब, शारीरिक भिन्नता जैसी वजहों से भेदभाव का शिकार हैं, उनको इस नीति में आधिकारिक रूप से दरकिनार करने के तरीके सोचे गए हैं। बाक़ी बातें जैसे ऊँची तालीम में निजी संस्थानों से पैसे जुटाना और विदेशी यूनिवर्सिटीज़ को हमारे यहाँ धंधा जमाने देना, संस्थानों में स्वायत्तता का क्रम, आदि सब बातें सुविधा-संपन्न तबकों के लिए सोची गई हैं, जिन्हें आम लोगों की मेहनत लूटने के अलावा इस देश से कुछ लेना-देना नहीं है। अगर औपचारिक रूप से रैंकिंग भी देखी जाय तो भी हार्वार्ड विश्विद्यालय के किसी स्थानीय कैंपस का रुतबा मूल कैंपस जैसा नहीं होगा। वहाँ शोध पर जोर होगा, यहाँ बाज़ार के लिए प्रोफेशनल्स तैयार किए जाएँगे। मसौदे में ऑनलाइन शिक्षा जोड़ दी गई है, और प्रधान मंत्री ने इस पर काफी सीना पीटा है। देश के आम लोगों के लिए ये निष्ठुर मजाक हैं। देशी ज़ुबानों में सामग्री तैयार करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं है, सब कुछ समर्पित भाषा-प्रेमियों का काम बन चुका है, जो हर विषय में पारंगत तो हो नहीं सकते। क्या हर किसी तक नेटवर्क पहुँचता है? मोबाइल पर रिंगटोन और अश्लील तस्वीरें पहुँच रही होगी, पर सबके लिए ऑनलाइन शिक्षा लायक तैयारी हमारी नहीं है, अगर हो भी सकती तो भी नहीं होगी, क्योंकि नीति निर्धारकों को ज्यादातर लोग इंसान ही नहीं लगते। वैसे भी टेक्नोलोजी पर इतनी निर्भरता और इंसान की एजेंसी को दरकिनार करने की ऐसी बेचैनी हमें कहाँ ले जाएगी, यह बड़ा सवाल है। चूँकि इस प्रक्रिया में कॉरपोरेट घराने सरगर्म रहेंगे, इसलिए तालीम का मक़सद भी भी ज्ञान पाने से हट कर बाज़ार की ज़रूरतों में सिमट जाएगा।

नीति में कुछ अनोखी-सी दिखती बातें रखी गई हैं, जैसे विषयों के चयन में छूट। पर व्यावहारिक धरातल पर हमारे संस्थानों में सामंती मानसिकता के प्रशासकों की भरमार है, जिनका काम सिर्फ सत्ता के चाटुकार बने रहकर अपनी सुविधाएँ पुख्ता करनी हैं। राज्य-स्तर के संस्थानों के लिए शोध के अनुदान बढ़ाने की बात कही गई है, पर यह समझने की कोई कोशिश नहीं है कि आज इन संस्थानों में जिस तरह की लाल-फीताशाही, घटिया राजनीति और अविश्वास का माहौल है, इससे कैसे निपटा जाए। क्या तालीम का खित्ता बाक़ी समाज से अलग है कि एक नए मसौदे से ये बुनियादी खामियाँ गायब हो जाएँगी? इसी तरह स्वयंसेवकों और समाज-कर्मियों को जोड़ने के नाम पर दरअसल संघ के कार्यकर्ताओं को शिक्षा-तंत्र के हर कोने में जोड़ने की कोशिश है।

इक्कीसवीं सदी, वैश्विक-स्तर जैसी जुम्ले-बाजी के साथ सरकार ने शिक्षा-नीति भी लागू कर दी, क्या पता कि इसका क्या हश्र होगा। किसी भी देश का असली विकास इस बात पर निर्भर करता है कि तालीम और सेहत जैसे खित्तों पर कितना खर्च किया जा रहा है, न कि राफेल जैसे मारक जहाजों पर। हमारा देश इस पैमाने पर अफ्रीका के कई ग़रीब मुल्कों से भी पीछे है, चीन-अमेरिका की तो क्या बात करें। बहस होती रहेगी, पर आखिरी फैसला तो अवाम ही लेगी, आज भले ही वह कमज़ोर है, वह सुबह कभी तो आएगी।

Thursday, July 30, 2020

गढ़ी गई हिन्दी में खो जाता है विज्ञान

विज्ञान में हिन्दी

प्यार में गलबँहियाँ नहीं, प्रेमालिंगन करती है।

काला को कृष्ण, गड्ढे को गह्वर कहती है।

जैसे कृष्ण के मुख-गह्वर में समाई सारी कायनात

गढ़ी गई हिन्दी में खो जाता है विज्ञान।

आस-पास बथेरे काले गड्ढे हैं , ज़ुबान के, अदब के, इतिहास-भूगोल के,

(एक वैज्ञानिक ने तस्वीरें छापी हैं और वह एक स्त्री है

अँधेरे गड्ढों में फँसे लोग छानबीन में लगे हैं

कि किन मर्दों का काम इन तस्वीरों को बनाने में जुड़ा है)

ताज़िंदगी इनमें गिरे रहते हैं

एक दिन रोशनी आती है

कोई नहीं जानता फिर क्या होता है

इतिहास-भूगोल, विज्ञान, सब कुछ विलीन हो जाता है

भटकता रह जाता है प्यार और एक प्यारा काला-गड्ढा।

न बचता है विज्ञान और न हिन्दी बचती है। 
(2019)

Tuesday, July 28, 2020

शाना की बचपन की कविता

जल्दी ही वह तीस की हो जाएगी। इस रंजिश के साथ कि आज भी उसकी आठ साल की उम्र में लिखी यही कविता मुझे सबसे ज्यादा क्यों पसंद है।

किनारा

लहरों
के पार

दूर

मैंने
दूर नज़र फैलाई

रेतीले
किनारे पर

पत्थर
कोयले की तरह चमकते हैं

धूप
में ग़र्मी है

मुझे
नहीं एहसास

मुझे
तीखे कंकड़ों का भी नहीं अहसास

खड़ी
हूँ बस

ज़मीं
का विस्तार देखती हूँ।
             - शाना बुल्हान हेडॉक (1999- 8 वर्ष) [अनुवाद - लाल्टू़]

The Beach

I looked over the waves
Far Far away
Along the sandy coast
The stones gleam like coal
The sun is so hot
but I don't feel it
Nor the sharp rocks
I just stand there
looking into a vast land.

- Shana Bulhan Haydock (4 August 1999)

Monday, July 27, 2020

बेरहमी न देख पाने की हमें आदत हो गई

बेरहमी जो नहीं दिखती है

(हाल में न्यूज़लॉंंड्री हिन्दी में प्रकाशित)

चीन पैदाइशी धूर्त देश है। आजकल हर कोई इस तरह की बातें कर रहा है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही है। चीन ने चालाकी से विश्व व्यापार संगठन के नियमों का फायदा उठाते हुए कई मुल्कों में पैसे लगाकर वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं को पूरी तरह चीन पर निर्भर कर दिया है। पड़ोसी मुल्क श्रीलंका और पाकिस्तान में ऐसे बड़े निवेश हुए हैं, जिन पर वहाँ की सरकारों का कोई बस नहीं रह गया है। चीन के अंदर भी सरकार द्वारा लोगों पर हो रहे अत्याचार के बारे में चेतना फैलानी ज़रूरी है। चीन में उइगूर मुसलमानों पर सत्ता का भयंकर नियंत्रण है। हालांकि वहां से ज्यादा मौतों की खबर नहीं आती, पर पश्चिमी मुल्कों में छप रही खबरों के मुताबिक वहाँ डिटेंशन सेंटर या क़ैदखाने बनाए गए हैं, जहाँ उइगूरों को ज़बरन आधुनिक जीवन शैली और पेशों की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वह अपने पारंपरिक धार्मिक-सामाजिक रस्मों से अलग हो जाएँ। इस पर बीबीसी और न्यूयॉर्क टाइम्स ने रीपोर्ताज तैयार कर फिल्में भी बनाई हैं। इन फिल्मों में उदास या गुस्सैल चेहरे नहीं दिखते, पर इसे पश्चिमी मुल्कों की मीडिया नरसंहार कहती है, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर लोगों की सांस्कृतिक पहचान बदलने की कोशिश है। चीन ने सरकारी अधिकारियों को भी उइगूर परिवारों के साथ रहने को भेजा है ताकि वह उनके बारे में जान सकें और उनको मुख्यधारा में शामिल होने में मदद कर सकें। पश्चिमी मीडिया से पता चलता है कि यह दरअसल जासूसी करने का एक तरीका है।

चीन की बेरहमी हमें दिखती है। मानव अधिकार कार्यकर्ता लिउ ज़िआओ बो को लंबे अरसे तक क़ैद में रखा गया और तीन साल पहले ही उन की अस्पताल में मौत हुई है। पर क्या हम इन बातों को इसलिए देख पाते हैं कि यह बेरहमी है, या कि बस चीन को दुश्मन देश मानने की वजह से हम ऐसा सोचते हैं। मसलन काश्मीर के बारे में हमें पता है कि वहां हजारों मौतें हो चुकी हैं। चीन पर सोचते हुए हम मानते हैं कि राज्य-सत्ता द्वारा लोगों की निजी ज़िंदगी पर हुकूमत हमें स्वीकार नहीं करनी चाहिए। काश्मीर या देश के और दीगर इलाकों में मुख्यधारा से अलग लोगों पर पर बनी फिल्मों में हमें उदासी के अलावा कुछ नहीं दिखता, पर क्या सचमुच हमें यह दिखता है? पश्चिमी मुल्कों की मीडिया में विदेशों में बसे उइगूरों के साक्षात्कार छपते हैं और इनसे हमें पता चलता है कि चीन में लोगों के साथ कैसी मुश्किलें हैं। इसका प्रतिवाद होते रहना चाहिए। पर हमारे मुल्क में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के दर्जनों साक्षात्कारों पर हम कितना गौर करते हैं? लिउ ज़िआओ बो को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था। इसकी मुख्य वजह मानव अधिकारों पर उनका काम था। हमारे यहाँ मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को समाज का एक बड़ा वर्ग अर्बन नक्सल, देशद्रोही कह कर उनको धिक्कारता है। सरकार मौका मिलते ही उन्हें बेवजह क़ैद कर लेती है। ठीक इसी वक्त दर्जनों लोग, जिन्होंने ताज़िंदगी समाज की भलाई के लिए काम किया है, जेल में हैं। उनके खिलाफ झूठे इल्ज़ाम लगाए गए हैं, और पुलिस या सरकार उनके खिलाफ सालों तक प्रमाण पेश करने में नाकाम रही है। इनमें से कई बड़ी उम्र के हैं। तेलेगु के इंकलाबी कवि वरावारा राव 81 साल की उम्र में क़ैद में हैं। जेल में रहते हुए कोविड से बीमार होने पर देशभर में कई लोगों ने उनको अस्पताल भेजने की माँग की, तो देर से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उनके परिवार के लोग चीख-चिल्ला रहे हैं कि उनकी सही चिकित्सा नहीं हो रही है, पर कोई नहीं सुन रहा। आंबेडकर के परिवार से जुड़े प्रो० आनंद तेलतुंबड़े हाल में ही सत्तर साल के हो गए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मैनेजमेंट के अध्येता रह चुके आनंद कोविड महामारी के दौरान अप्रैल में गिरफ्तार हुए। गौतम नवलखा ने हिन्दी में गंभीर वैचारिक पत्रिका 'साँचा' निकली थी और लोकतांत्रिक हक़ों के लिए संघर्षरत रहना उनकी खासियत रही है। वो भी क़ैद हैं। इनके अलावा आठ और लोगों को जनवरी 2018 में भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा मामले के संबंध में गिरफ्तार किया गया, और फिर फर्जी ईमेल के आधार पर इल्ज़ाम लगाए गए। इनमें से ही सुधा भारद्वाज हैं, जिसने अमरिकी नागरिकता छोड़कर और आई-आई-टी कानपुर से पढ़ाई में अव्वल दर्जा पाने के बावजूद भारत के ग़रीबों और आदिवासियों के लिए काम करने के लिए वकालत सीखी और तीन दशकों से समर्पित जीवन गुजार रही थीं। यही ग्यारह नहीं, देशभर में सरकार की मुखालफत करने वाले दर्जनों लोगों को, जैसे नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों को, गिरफ्तार किया गया है। गोरखपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन न मिलने से हुई बच्चों की मौत पर विरोध जताने पर डॉ- कफ़ील खान को गिरफ्तार किया गया और वह आज तक जेल में हैं।

चीन में एक बड़ा मध्य-वर्ग है, जो सरकार का समर्थक है, क्योंकि उन्हें बड़ी जल्दी से पूँजीवादी व्यवस्था के फायदे मिले हैं। तालीम, सेहत सुविधाएँ, बहुत अच्छी तो नहीं हैं, पर भारत की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर हैं, हालाँकि पचास के दशक में चीन भारत से बहुत पीछे था। यूरोपी औपनिवेशिक ताकतों द्वारा आर्थिक शोषण और जापान के साथ जंग लड़ कर चीन पूरी तरह तबाह हो चुका था। ऐसी स्थिति से उबर कर आज चीन एक ताकतवर मुल्क बन चुका है। मानव विकास आँकड़ों में वह विकसित देशों के साथ टक्कर लेता है।

भारत में आज़ादी के बाद से ग़रीबों की हालत में जो थोड़े सुधार आए थे, तालीम और सेहत सुविधाओं में बेहतरी हुई थी, नब्बे के दशक में आर्थिक नवउदारवाद आने से आज तक और खास तौर पर पिछले आठ सालों से, उन में फिर से गिरावट आती रही है। धनी-ग़रीब में फ़र्क बढ़ता ही चला है।

चीन की निंदा जरूर की जानी चाहिए, हालांकि काश्मीर में या देश के तमाम और जगहों पर, जैसे छत्तीसगढ़ आदि में आदिवासी इलाकों में हमारी सैनिक या अर्धसैनिक बलों की उपस्थिति जैसी है, उसकी तुलना में चीन की तानाशाही कुछ भी नहीं है। साथ ही माओवादियों द्वारा जन-अदालत चलाकर आदिवासियों पर ज़ुल्म होते रहते हैं। दोनों ओर से पिस रहे ग़रीबों के लिए ज़िंदगी का मतलब एक ख़ौफ़नाक बेरहम तंत्र में मरते जाना है। क्या हमारे अंदर साहस नहीं बचा कि हम जो कुछ चीन में देख सकते हैं, उससे ज्यादा बेरहमी हमारे आसपास होते नहीं देख सकते? क्या हम चीन में बेरहमी सिर्फ इसलिए देखना चाहते हैं कि ऐसा कहते हुए हम बच निकलते हैं क्योंकि हमें कोई जेल में नहीं डालने डालने वाला, जैसा कि हमारे यहां के सबसे खूबसूरत उन इंसानों के साथ हुआ है, जो अपनी-अपनी जगह पर बड़ी हिम्मत और शिद्दत के साथ सरकारी जुल्म और सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ते रहे हैं। यह भी सही है कि ऐसे हालात सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं है और इतिहास में पहले भी कई बार ऐसे तानाशाही के हालात हो चुके हैं। हास्यास्पद बात यह है कि जो मुल्क मानव अधिकारों के बारे में बड़ी बातें करते हैं, खासतौर से अमेरिका, वहां तो ऐसे हालात कई बार हो चुके हैं। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, अमेरिका में नागरिक अधिकार तक़रीबन बिल्कुल खत्म कर दिए गए थे। सरकार ने लोगों के खुल कर सियासी बातें करने या अपनी राजनीतिक राय प्रकट करने पर रोक लगाई हुई थी। किसी को भी जासूसी के नाम पर गिरफ्तार किया जा सकता था। दुनिया भर में सैंकड़ों फौजी अड्डे बनाने वाले और लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी सरकारों को पलट गिराने वाले मुल्क अमेरिका ने चीन की बढ़ती फौजी ताकत के खिलाफ प्रोपागंडा छेड़ा हुआ है, हालाँकि चीन ने अपनी सीमाओं से दूर कहीं कोई फौजी अड्डा नहीं बनाया है।

अपने समाज में बेरहमी न देख पाने की हमें आदत हो गई है। हर दूसरे दिन कोई चौंकाने वाली खबर आती है और हम पढ़-देख कर उसे भूल जाते हैं। हाल में बिहार में गैंग-रेप पीड़िता एक लड़की और उसे मदद करने वालों को पौने तीन सौ किलोमीटर दूर किसी जेल में भेज दिया गया क्योंकि उन लोगों ने बयान की प्रति पढ़े बिना हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और अदालत में इस पर बहस की थी। सुप्रीम कोर्ट के सम्मानित ऐडवोकेट प्रशांत भूषण पर अदालत की अवमानना के नाम पर मुकदमा चलना या प्रसिद्ध पत्रकार विनोद दुआ को पुलिस द्वारा परेशान करना - ऐसी खबरें आम हैं। आज हिंदुस्तान में हर जगह भय का माहौल है और धीरे-धीरे सरकार हर प्रकार के विरोधियों को क़ैद कर रही है। कोविड-19 की महामारी के दौरान यह और भी आसान हो गया है क्योंकि इकट्ठे होकर प्रतिवाद करना मुश्किल हो गया है। लोगों में ख़ौफ़ का माहौल है और अगर लोग इकट्ठे होते हैं तो बाक़ी समाज के लोग उन पर आरोप लगाते करते हैं कि वह बीमारी को फैला रहे हैं। ईमानदारी से सोचने वाले नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि वे यह बात लोगों तक ले जाएँ कि चीन के प्रति नफ़रत की जगह हम चीन में और हमारे यहाँ भी सियासत को समझें। हमारी दुश्मन हुकूमतें हैं, न कि आम लोग। इंसान हर जगह एक जैसा है, वह हिंद-पाक, चीन, अमेरिका-अफ्रीका और धरती पर हर जगह एक-सा है। इंसानियत को सामने रख कर हम बात करें। किसी देश को धूर्त कहने से हमारी स्थिति बेहतर नहीं होगी। हमें दुनिया के हर लोकपक्षी आंदोलन के साथ जुड़ते हुए अपने समाज की सड़न और अपने हुक्कामों से लड़ना होगा ताकि देश में बराबरी के हालात बनें।

दो कविताएँ

प्रश्नकाल के कवि से मिलना

उसे कई बड़ी कविताओं के लिए जाना गया
मैं निहायत छोटी सी कविता प्रश्नकाल से मोहित था
ऐसे मुल्क में पला-बढ़ा जहाँ वक्त ने सवालों की भरमार
पेश की और जवाब नदारद। जब उससे मिला तो कोई खास नहीं,
पर कभी न भूलने वाला प्रसंग बन गया।
ख़तो-किताबत में पहले से ही
उसे मुझसे कविता से अलग भी प्यार-सा था
वह बूढ़ा हो चुका था
पर बच्चों सी शरारती अदाएँ थीं उसमें।
सादी पर कलात्मक पोशाक में उसकी जेब में
किस्से छिपे थे, जिसे चाव से सुनाता वह बीच-बीच
में होंठ टेढ़े-से कर मुस्कराता। आम सा लगता वह आदमी कितना
खास था यह जानने के लिए तुम्हें पूछने होंगे प्रश्न और
उस जैसा तड़पना होगा इस आदमखोर तंत्रों के जमाने में।
कुछ और भी बातें की थीं मैंने
जैसे दिल्ली और हैदराबाद के मौसम पर और उम्र के साथ
बढ़ती जिस्मानी तकलीफों पर।
आखिर कभी उसे छोड़कर लौटना ही था।
फिर हर रात सपना देखना था
'पूछो कि क्यों नहीं है पूछने वालों की सूची में तुम्हारा नाम'
कहता वह। (इंद्रप्रस्थ भारती - 2020)

अजीब पहेली है

सदियों तक उबालते हैं
नस्ल, मजहब और जात के सालन
बेस्वाद या कि ज़हर का स्वाद चखते हैं बार-बार
सूली, फाँसी, बम-गोली, तरीके ईजाद किए हैं बेशुमार

बच्चों को पढ़ाते हैं सरहदों के झूठे पाठ
इतिहास, भूगोल के झूठ
गणित और विज्ञान को धुँधला कर देते हैं
बच्चे चाँद-सूरज को बाँटने की मुहिम में शामिल होते हैं

सीना-पीटू नगाड़े सुनकर नाचते हैं
प्रेम की मिठास छोड़कर ज़हरीले पित्त की कड़वाहट चुनते हैं
धरती पर भभकती बू वाली उल्टियाँ बहती हैं
आसानी से जिस्मोज़हन में घर कर जाती है

अजीब पहेली है। (वागर्थ -2020)

What a Riddle

For centuries we cook them
Sauces made of race, religion and caste
Of no taste or tasting like poison, try it again
with countless means like the cross, the hanging and firearms, invented

Teach our children falsehoods on borders
The lies of history and geography
spread mist on mathematics and science
And children join the battle to partition the sun and the moon

We dance to the rhythm of chest-beating drums
Choose the bitter poisonous bile over the sweetness of love
Stinking vomit flowing over the Earth
settles deep in our mind and body

What a riddle.

Saturday, July 18, 2020

चिरंतन-शाश्वत जैसे सुंदर लफ्ज़ गढ़े गए

आज़ादी

सबके बालों में फूल सजाए गए, उनमें काँटे भरे थे
रंग-बिरंगी पंखुड़ियों के बावजूद चुभन तीखी रही, तल्खी बढ़ती रही

कहानियाँ गढ़ी गईं, चिरंतन-शाश्वत जैसे सुंदर लफ्ज़ गढ़े गए
दर्जनों ब्याहे गए एक शख्स के साथ 
सबको मुकुट पहनाया गया  
कि एक धुन पर एक लय में नाचो
एक अंगवस्त्र पहनो

इन सबसे, इन सबमें जन्मा मैं।
मेरे जिस्म में खरोंचों की भरमार है।

देखता हूँ कि आस्मां रंगों से सजा है
हवाओं से पूछता हूँ कि मैं कौन हूँ
और मुझे बंद कोठरियों में धकेल दिया जाता है
खिड़कियों पर परदों में से छनकर आती है नीली बैंगनी रोशनी
आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं कि कोई गा रहा आज़ादी के सुर

तड़पता एक ओर हाथ बढ़ाता हूँ
कि कोई दूसरी ओर से कहता है - आज़ादी
कब मुझे कहा जाता है कि मैं रो नहीं सकता

मैं और कुछ नहीं चाहता 
बस यही कि मुझे रो लेने दो।         (विपाशा - 2019)