Tuesday, June 07, 2016

आधुनिकता-भावनात्मकता-प्रतिरोध


 
भोपाल से एक पत्रिका आती है 'गर्भनाल'
उनके लिए बीच-बीच में लिखता रहा हूँ। मैंने देखा है कि बड़े-बड़े लोग लिखते हैं उनके लिए।
यह आलेख संपादक जी नहीं छाप सकते, उन्होंने बड़ी विनम्रता से लिखा है कि उन्हें पहले दो पैरा ठीक नहीं लग रहे। उनका निर्देश है कि मैं कोई पहले का उदाहरण लूँ। मैं उनकी दिक्कत समझता हूँ। बदकिस्मती मेरी है कि मेरा हाजमा पहले से ही काफी बिगड़ा हुआ है, उसे और बिगाड़ नहीं सकता। इसलिए यह अब सबके लिए खुला है, जिसको चाहिए इस्तेमाल करें।

आधुनिकता-भावनात्मकता-प्रतिरोध

जे एन यू के छात्र उमर खालिद ने हाल में कोलकाता में भारतीय संघ के भवन में छत्तीसगढ़ की समस्याओं पर व्याख्यान दिया। सभागार के बाहर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ए बी वी पी के कार्यकर्त्ता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। इसकी वजह से ट्रैफिक में कुछ समस्याएँ हो रही थीं। एक बस में किसी सवारी ने पूछा, यहाँ क्या हो रहा है। किसी दूसरे ने जवाब दिया, अरे वह उमर खालिद है न, जिसने देशद्रोही नारे लगाए थे, वह आया हुआ है। किसी तीसरे ने कहा, अरे उसेे अभी तक गिरफ्तार नहीं किया। एक युवा स्त्री ने कहा कि आपलोग क्या कह रहे हैं, आपको पता नहीं कि यह सब झूठ है। जाली वीडियो दिखलाकर यह झूठ फैलाया गया था। तो कई लोग चिल्ला उठे कि इसे पीट कर गाड़ी से उतार दो।

इस घटना में एक तर्कशीलता है जो आधुनिक पूँजीवाद और सामंती समाज की गड्ड-मड्ड संस्कृति से निकलती है। कई लोग हैं जो इस बात के प्रति उदासीन हैं कि हमारे समाज में कई लोगों को या तो उमर खालिद से या उसके मुसलमान नाम से नफ़रत है, पर वे हम आप जैसे भले और सचेत भी दिखना चाहते हैं, तो वे कहेंगे कि यह सब आधुनिकता की वजह से, अंग्रेज़ों की वजह से, औपनिवेशिक शासन की वजह से है। यानी कि उस दिन उस वक्त बस में उस 
युवा स्त्री को एक बुज़ुर्ग ने सँभाल न लिया होता तो उसकी पिटाई और पता नहीं जो कुछ भी हो सकने की संभावना थी, उसे भूल जाएँ और अंग्रेज़ों को कोस लें तो सब ठीक दिखने लगेगा। जिस तर्कशीलता के साथ मैं अपने मित्रों की आलोचना कर रहा हूँ, यह भी आधुनिकता से ही आई है। ऐसी अलग-अलग युक्तियों में से हम कोई एक पक्ष चुनते हैं और उसे अपने तर्कों के साथ आगे बढ़ाते हैं। मित्रों को लगता है कि वे ठीक हैं, मुझे लगता है कि मैं ठीक हूँ। अक्सर दोनों पक्षों में से कोई एक ही सही होता है, पर यह ज़रूरी नहीं कि हमेशा ऐसा हो और अगर हो भी तो पूरी तरह यानी सौ फीसद सही हो। अपने पक्ष की सीमाओं को समझने में हमें लंबा समय लग सकता है और कभी-कभी तो हम उसे कभी नहीं समझ सकते।

कुछ साल पहले का एक उदाहरण लें। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन सी ई आर टी) की 2006 में तैयार की गई ग्यारहवीं की राजनीति-शास्त्र की पाठ्य-पुस्तक में कोई तीस कार्टून डाले गए। इसके पीछे मासूम सा तर्क था कि बच्चे कार्टून का मजा लेते हुए पाठ के विषय-वस्तु में रुचि लेने लगेंगे। वैसे तो यह सही बात है और इस तरह के शैक्षणिक प्रयोग पिछली सदी के आखिरी दशकों में दुनिया भर में हुए हैं। किताब में एक अध्याय भारत के संविधान पर था और यह समझाने के लिए कि संविधान के लिखे जाने में तक़रीबन तीन साल लग गए, प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर का 1949 में छपा एक कार्टून डाला गया था। इसमें दिखलाया गया था कि भारत की जनता एक गोल चक्कर के बाहर अधीरता से इंतज़ार कर रही है कि संविधान जल्दी तैयार हो और अखाड़े में संविधान लिखने वाली समिति के अध्यक्ष आंबेडकर एक घोंघे पर बैठे हुए हैं। पीछे से उन दिनों की कार्यकारी सरकार के प्रमुख जवाहरलाल नेहरु एक चाबुक लेकर खड़े हैं कि घोंघे को जल्दी दौड़ाया जाए। जाहिर है इस कार्टून के पीछे अंग्रेज़ी का "स्नेल'स पेस" (घोंघे की चाल) वाला मुहावरा थाकि भई अब कामकाज की गति बढ़ाओ, कब तक लोग इंतज़ार करेंगे। इस कार्टून पर 2010 से पहले कुछ, और जल्दी ही बड़ी तादाद में, लोगों ने आपत्ति जतानी शुरु की। 2012 तक ऐसा लगने लगा कि भारतीय बौद्धिक समाज दलित और गैर-दलित, दो तबकों में बँट गया है। दलितों और गैर-दलितों के बीच बृहत्तर समाज में जो संकट का संबंध है, वह बौद्धिकों में तीखी बहस बन कर सामने आ गया। दलित और गैर-दलित चिंतकों के बीच ध्रुवीकरण बढ़ता चला। अखबारों में, टी वी चैनलों पर जम कर बहस हुई। एन सी ई आर टी की पाठ्य-पुस्तक समिति के सदस्य जागरुक और सचेत लोग थे, बाकी समाज के लिए पथ-प्रदर्शक थे, फिर भी बहस चली। इसके एक दशक पहले प्रेमचंद की कहानियों पर भी ऐसा ही विवाद काफी तीखे तेवरों के साथ हुआ था।

आखिर कार्टून में पाठ को बेहतर ढंग से पढ़ाए जाने के अलावा और क्या पक्ष हो सकता था? कल्पना कीजिए कि देश के एक आम स्कूल में यह पाठ पढ़ाया जा रहा है। अध्यापक पाठ के मुताबिक समझा रहे हैं कि देश का संविधान कैसे बना। बच्चे पाठ में बनी तस्वीरों की तरह शर्ट निकर के साथ टाई पहने हो भी सकते हैं। मान लें कि कक्षा में सवर्ण और दलित दोनों पृष्ठभूमि के बच्चे हैं। ईमानदारी से हम मौजूदा स्थिति के बारे में सोचें तो हम देख सकते हैं कि अांबेडकर का घोंघे पर सवार होना किसी सवर्ण बच्चे को हास्यास्पद लग सकता है। वह इस कार्टून का इस्तेमाल किसी दलित बच्चे को तंग करने के लिए कर सकता है। अांबेडकर के ठीक पीछे नेहरू का चाबुक लिए खड़े होना कार्टून को और भी जटिल बना देता है।

प्रताड़ित जन की प्रतिक्रिया कैसी होती है, विश्व इतिहास में इसके बेशुमार उदाहरण हैं। साठ के दशक में, जब अमेरिका में काली चमड़ी के लोगों को बराबरी का नागरिक अधिकार देने का आंदोलन शिखर पर था, जिसमें कई गोरे लोग भी शामिल थे, प्रसिद्ध अफ्रो-अमेरिकी कवि इमामु अमीरी बराका (मूल ईसाई नामः लीरॉय जोन्स) ने लिखाः- 'ब्लैक डाडा निहिलिसमुस। रेप द ह्वाइट गर्ल्स। रेप देयर फादर्स। कट द मदर्स थ्रोट्स।' कोई भी इस हिंसक कविता को सभ्य अभिव्यक्ति नहीं कहेगा। सिर्फ जाति नहीं, आर्थिक वर्ग आधारित निपीड़न भी हिंसक प्रतिक्रिया पैदा करता है। अभी हाल तक कोलकाता शहर में दीवारों पर सुकांतो भट्टाचार्य की ये पंक्तियाँ पढ़ी जा सकती थीं - 'आदिम हिंस्र मानविकतार आमि यदि केऊ होई, स्वजन हारानो श्मशाने तोदेर चिता आमि तूलबोई।' बराका की हिंसात्मक अभिव्यक्ति आज भी यू ट्यूब पर संगीत के साथ सुनी जा सकती है। गोरे लोगों के समाज ने इसका विरोध किया या नहीं, इसका कोई दस्तावेज नहीं है, पर अफ्रो-अमेरिकी स्त्रियों ने प्रतिवाद किया, यह इतिहास है। एलिस वाकर ने तो इस पर कहानी, उपन्यास तक लिखे - उनके उपन्यास 'मिरीडियन' में यह दिखलाया गया है कि किस तरह काले लोगों के अधिकारों के लिए लड़ने आई एक गोरी लड़की का एक काला युवक ग़लत फायदा उठाता है।

बहरहाल हमें गैरतार्किक लगती स्थितियों तक कोई कैसे पहुँचता है, इस पर बेशुमार साहित्य लिखा गया है। 1949 में ही एक अफ्रो-अमेरिकी कवि लैंग्स्टन ह्यूज़ ने लिखा थाः- ह्वाट हैपेन्स टू अ ड्रीम डिफर्डदरकिनार किए गए सपने का क्या हश्र होता है? / क्या वह किसमिस के दाने की तरह धूप में सूख जाता है? / या वह घाव बन पकता रहता है? /  क्या उसमें सड़े माँस जैसी बदबू आ जाती है?/ या वह मीठा कुरकुरा बन जाता है....? शायद उसमें गीलापन आ जाता है और वह भारी होता जाता है / या फिर वह विस्फोट बन फूटता है?

प्रसिद्ध इतिहास लेखक हावर्ड ज़िन ने अपनी किताब में एक अमेरिकी कहावत का ज़िक्र किया है, 'ग़रीब की आह हमेशा न्याय-संगत हो, यह ज़रूरी नहीं; पर अगर तुम उसे सुनोगे नहीं, तो तुम जान ही नहीं पाओगे कि न्याय क्या है।'

तो हम कैसे तय करें कि सही और ग़लत क्या है। सच यह है कि हममें से बहुत सारे लोग कभी नहीं जान पाएँगे कि दो विरोधी धारणाओं में से सही क्या हो सकता है। जीवन की तमाम प्रताड़नाएँ और असुरक्षाएँ हमारी इंसानियत को थोड़ा-थोड़ा कर खाती रहती हैं, और हममें से कई इसे इस हद तक खो बैठते हैं कि हम वापस पूरे इंसान नहीं बन सकते हैं। अच्छी बात यह है कि हममें से अधिकतर लोग इस बीमारी से निदान पा सकते हैं। वक्त के साथ इंसान में सहनशीलता और विरोधी धारणाओं के साथ जीने की क्षमता बढ़ी है। पिछली सदी के बीच के दशकों तक यह माना जाता था कि तर्कशीलता ही हमें सही राह पर ले जा सकती है। पर यह स्पष्ट होता गया कि विरोधी धारणाओं के अपने-अपने तर्क होते हैं और तर्कशील सोच हमें सही या ग़लत दोनों तरह के निष्कर्षों पर ले जा सकती है। मेरी अपनी तर्कशीलता मुझे बतलाती है कि राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता या इंसान को इंसान से बाँटने वाले सिद्धांत मानसिक बीमारियाँ हैं। पर औरों की तर्कशीलता उन्हें यह नहीं, बल्कि इसके विपरीत भी बतला सकती है। बीसवीं सदी के आखिर में यह दिखने लगा कि सिर्फ तर्कशीलता नहीं, बल्कि भावनात्मकता भी सत्य की ओर जाने का एक रास्ता है। जाहिर है कि भावनात्मक होना भी अक्सर हमें ग़लत दिशा में भी धकेलता है, पर कम से कम इतना तो कहा जा सकता है कि भावनात्मकता के साथ हम विरोधी विचारों के लोगों के साथ इंसानी रिश्ते बनाने के काबिल हो सकते हैं और उनकी सोच को जगह देने के काबिल होते हैं और मिलजुलकर आगे बढ़ने की कोशिश कर सकते हैं। असमंजस की स्थिति में समझदारी यह है कि हम उसकी सुनें जो उत्पीड़ित है। बाद में यह निर्णय ग़लत भी निकले तो उससे घबराना नहीं चाहिए, आज तक सामाजिक-राजनैतिक अखाड़ों में जिन निर्णयों को सही माना जाता रहा है, उनमें से अधिकतर बाद में ग़लत साबित हुए हैं।

जिसे आम तौर पर आधुनिकता कहा जाता है, सत्रहवीं सदी के बाद से यूरोप में प्रबोधन-काल (इनलाइटेनमेंट) से आए वैचारिक बदलावों के उस समूह में आधुनिक वैज्ञानिक तर्कशीलता पर जोर बढ़ता रहा। आधुनिक विज्ञान की यह ताकत भी है और कमजोरी भी कि इसमें सिद्धांतत: भावनात्मकता के लिए कोई जगह नहीं है। पर वैज्ञानिक तो आखिर इंसान है, इंसान सामाजिक प्राणी है, इसलिए विज्ञान के पेशे में वे सारे पूर्वग्रह मौजूद हैं, जो वर्ग, जाति, लिंग आदि आधारित भेदभावों से भरे बृहत्तर समाज में है। इसलिए अगर हमारी सोच सिर्फ वैज्ञानिक तर्कशीलता पर आधारित हो और हम भावनात्मक रुप से विज्ञान के पेशे की सीमाओं को नहीं पहचान पाते, तो हम सामाजिक पूर्वग्रहों से कभी मुक्त नहीं हो पाएँगे। यह विरोधाभास सा लगता है, क्योंकि भावनात्मकता से रहित विज्ञान से यह अपेक्षा होती है कि वह हमें सामाजिक पूर्वग्रहों से ऊपर ले जाए, पर ऐसा होता नहीं है। दरअस्ल बौद्धिक कर्म करने वालों की अलग-अलग जमातों में वैज्ञानिक ही संभवत: सबसे अधिक संरक्षणशील होते हैं। इसलिए दुनिया भर में इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि उच्च-स्तर पर विज्ञान और तकनीकी शिक्षा लेने वालों को जहाँ तक हो सके समाज-शास्त्र और मानविकी (अदब समेत) भी पढ़ाया जाए। बगैर पर्याप्त भावनात्मक विकास के एक वैज्ञानिक महज एक मशीन है।

यूरोपी आधुनिकता और इसकी तर्कशीलता से जो और बातें आई है, उनमें आधुनिक 'राष्ट्र' की धारणा प्रमुख है। यह एक ऐसी अजीब धारणा है, जो हमें अपने ही अंदर दुश्मन ढूँढने को कहती है। जो भी मुख्यधारा की भाषा, संस्कृति, मजहब का नहीं है, वह मेरा दुश्मन है। राष्ट्र की यह धारणा हमारी इंसानियत को बड़ी तेजी से खत्म करती है। यह कहा जा सकता है कि आज समूची दुनिया में हर मुल्क के लोग इस आधुनिक बीमारी से ग्रस्त हैं। इसलिए एक मुल्क का नागरिक दूसरे मुल्क के नागरिकों के साथ भावनात्मक रुप से नहीं जुड़ पाता, यहाँ तक कि अपने ही मुल्क में अल्पसंख्यकों से हम भावनात्मक रुप से नहीं जुड़ पाते। एक दूसरे को मार कर अपने मृत को शहीद और दूसरे को दुश्मन कहते हैं, जबकि सच यह है कि मरने वाले तो मर जाते हैं, उनके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। लगता ऐसा है कि लोग भावनात्मकता में बह जा रहे हैं, पर दरअस्ल होता यह है कि राष्ट्र आधारित तर्कशीलता हमारे भावनात्मक अस्तित्व को खा चुकी होती है। इसका फायदा उठाकर मुनाफाखोर पूँजीपति और फिरकापरस्त राजनैतिक गुटबंदियाँ अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं। सरकारें जनता को भूखी और ग़रीबी की हालत में रखे अरबों-खरबों के शस्त्र खरीद कर जंग की तैयारी और दमन-तंत्र को मजबूत करती हैं।

इतना तो कहा ही जा सकता है कि सामाजिक सह-अस्तित्व का मनोविज्ञान जटिल है। इस जटिलता में हमारी भागीदारी क्या और कितनी है, हम यह समझ लें तो गैर-बराबरी की इस दुनिया में हम अपनी मुक्ति की ओर बढ़ सकते हैं। और दूसरी ओर जो विस्फोट हैं, उनको झेलने की ताकत हममें हो, इसकी कोशिश हम कर सकते हैं। अपनी मुक्ति के बिना किसी और की मुक्ति का सपना कोई अर्थ नहीं रखता। इसलिए आधुनिकता के उन पक्षों को जो हमें सत्ता और समाज पर सवाल खड़े करने की ताकत देते हैं, उनको पहचानने, जानने और अपनाने की ज़रूरत है। इस प्रतिरोधी प्रवृत्ति का भी एक भावनात्मक पक्ष है, जिसे हमें मजबूत करना होगा। उमर खालिद इसी प्रतिरोधी प्रवृत्ति का नायक है, और बस में भरी भीड़ की हिंसक मानसिकता के खिलाफ खड़ी होती युवा स्त्री भी।   

Thursday, June 02, 2016

शोर बढ़ा है पर कौन है सुनता


शहर लौटते हुए दूसरे खयाल


पहले वालों से भरपूर निपट लेने के बाद
आते हैं रुके हुए दूसरे खयाल
दिखने लगती है शहर की उदासी
वैसी ही जैसी यहाँ से जाते वक्त थी।
न चाहते हुए भी आँखें देखती हैं
कौन हुआ पस्त और कौन निहाल


शहर थोड़ा फूला भर है,
झंडे बदले हैं, उनके उड़ने के कारण नहीं बदले
उदासीन आस्मान के मटमैले रंग नहीं बदले
शोर बढ़ा है पर कौन है सुनता, है पता किसे


उल्लास का गुंजन छूकर बहती है नदी
पहले जैसा लावण्य है, पर बढ़ी है गंदगी
दीवारें बढ़ी हैं, छतें भी, और बढ़े हैं बेघर
ऊँघता शहर, जीने को अभिशप्त लंबी उमर
हिलता डुलता, कोशिश में बदलने की करवट


टीस है उठती उसे यूँ देखकर
एकाएक मानो अपना यूँ सोचना हम रोक लेते हैं
और उसकी अदृश्य आत्मा को सहलाते हैं।


बहुत बदल चुके हमें चुपचाप देखता है
हम नहीं जानते कि हमें सहला रहा होता है शहर
उसी को पता है
किस वजह से कभी जुदा हुए थे हम।

(अर्थात - 2013; 'कोई लकीर सच नहीं होती' संग्रह में संकलित)

Wednesday, June 01, 2016

हमेशा होंगे हम हारी हुई फौजों के साथ

 ये कविताएँ शायद पहले भी पोस्ट कर चुका हूँ, पर अब सर्च करने पर मिल नहीं रहीं, तो फिर कर रहा हूँ।

 शहर लौटने पर पहले-पहल ख़याल

दक्षिण के जाने किस प्रांत से आए कारीगर लेटे होते थे जहाँ
उन जगहों की शक्ल नहीं बदली
जैसे नहीं बदला शाम का धुँआ
मुहल्ले की कुंठाएँ नहीं बदलीं

हालाँकि दस सालों में बदलती भी है आत्मा कुछ
शून्य की ओर बढ़ता शहर लड़खड़ाता फँसा किस आवर्त्त में
मुहल्लों में लगे पेड़
तापस दास पार्टी के बारे में बात नहीं करता
कहता - ये पेड़ रहेंगे ज़िंदा
पेड़ों के पास है असीम दया
शहर की आत्मा को बचाए हुए शैतानी हवाओं से पेड़।

नब्बे के शून्य  पर रची गई कविता
फिल्म बनी शून्य(1) से शुरू करने की(2)
शून्य पर दोनों टाँगें रख धकेल रहा
खुद को कलकत्ता।

1) पहले संग्रह 'एक झील थी बर्फ़ की" में संकलित 'न्यूयार्क 90 और टेसा का होना न होना'। 2)अशोक विश्वनाथन की बांग्ला फिल्म 'शून्य थेके शुरु'।
1994; हंस - 1996


2

बाज़ार है अब वहाँ नशीले पदार्थों का
सुनो, हमने वहाँ देखी थी हरी घास
अनंत
वहीं फुटबॉल खेलते हुए गोलपोस्ट के पास रखा
मेरा कड़ा(1) खो गया था
याद है क्योंकि वह अंतिम कड़ा था
सहिष्णुता लौटी पर कड़ा नहीं
शहर में लौटी आत्मा पर मदहोश ज़रा नहीं

कैसा समय है  नहीं पता मुझे मैं क्या चाहता हूँ
हरी घास, ऐंग्लो इंडियन लड़कियाँ, शहर में आत्मा या
ख़ुदगर्ज़ आलस

1) सिख धर्म की परंपरा में कड़ा एक अनिवार्य परिधान है


3

घर में पड़ी हैं कैशोर्य की कविताएँ
काल्पनिक प्रेमिका का नाम
तीखी नाराज़गी
बाहर दोस्त हैं उनके पिताओं जैसे
अपनी या अपनी बहनों की शादियों के बारे में सोचते हुए
घर-घर शाम खरीदी दूरदर्शन ने
कविताओं में तलाश रहा शहर मैं

साथी कवियों, शहर की ओर से बोल रहा हूँ
रोज़ की दौड़भाग में पैरों के पास छूटे हुओं के लिए
बेचैनी काफी नहीं
शहर के कवियों, हमेशा होंगे हम हारी हुई फौजों के साथ
जीतेंगे आखिर।
शब्दों को गढ़ना शहर का सपना चिरंतन

4

खाली है मकान
वहाँ शाम होने से पहले आसमान होता रक्ताभ
बरामदे पर खड़ी होती वह
पश्चिमा

खाली है
जाने कब वहाँ से आई थीं कवि की प्रेमोक्तियाँ
वक्ष चुंबन और ऐसी बातें
फोटोग्राफ

वह घर बसा रही है
उसकी बच्ची बढ़ रही है
उससे भी प्रबल प्रेमिका होगी वह एक दिन

लौटने पर मुहल्ले में सबसे अधिक खाली दिख़ता है
वह बरामदा
फिर खालीपन बिखरता है पेड़ों पर
ज़मीं आस्मां पर
सौंदर्य-शास्त्र और आधुनिकता की किताबों पर
बूढ़ा दिख़ता है शहर तब

(1994; हंस - 1996) ('डायरी में तेईस अक्तूबर' संग्रह में संकलित)

Tuesday, May 24, 2016

कुछ नहीं बदला

फिर से सेरा टीसडेल - 

Blue Stargrass

If we took the old path
In the old field
The same gate would stand there
That will never yield
Where the sun warmed us
With a cloak made of gold,
The rain would be falling
And the wind would be cold;
And we would stop to search
In the wind and the rain,
But we would not find the stargrass
By the path again.

नीली दूब 
पुराने मैदान में
पुरानी पगडंडी पर चलें
वही कभी न मिटने वाले
दरवाजे मिलेंगे वहाँ
जहाँ सोने का आवरण वाली
धूप की उष्णता थी
बारिश होगी
और ठंडी हवाएँ होंगी
बारिश और हवाओं में
ढूँढेंगे हम
पर नहीं दिखेगी दूब
उस पगडंडी पर।
 Sand Drift

I thought I should not walk these dunes again,
Nor feel the sting of this wind-bitten sand,
Where the coarse grasses always blow one way,
Bent, as my thoughts are, by an unseen hand.

I have returned; where the last wave rushed up
The wet sand is a mirror for the sky
A bright blue instant, and along its sheen
The nimble sandpipers run twinkling by.

Nothing has changed; with the same hollow thunder
The waves die in their everlasting snow---
Only the place we sat is drifted over,
Lost in the blowing sand, long, long ago.

रेत का बहाव

मैं इन रेत के टीलों पर फिर से चलना नहीं चाहती थी
हवा से कटती इस रेत की मार सहना नहीं थी चाहती, 
जहाँ मेरे खयालों सी किसी अनदेखे हाथों से झुकाई
एक ही दिशा में बहती मोटी घास

मैं लौटी हूँ; जहाँ आखिरी लहरें उछल रही थीं 
आस्मां का आईना है यह गीली रेत,
गाढ़ा नील पल और इसकी चमक के साथ
टिमटिमाती-सी चुस्त टिटहरियाँ दौड़ती हैं

कुछ नहीं बदला; वैसी ही खोखली गरजन लिए 
लहरें चिरंतन बर्फ हो जातीं ---
जहाँ हम बैठे थे, वह जगह
बहती रेत में खो गई बहुत पहले कभी।

Sunday, May 08, 2016

कभी चाहा था कोई और जीवन


जैसे यही सच है

जैसे समंदरों पार वह इंतज़ार में रहती है कि
मैं फ़ोन करूँ

सोचता हूँ तो कई बार
मन करता है कि फूट पड़ूँ कहूँ कि
तुम्हें कभी नहीं फ़ोन करना चाहता

वह फिर भी इंतज़ार करती है
कि फ़ोन आते ही कहे
सोच रही थी तू मुझे भूल गया होगा
मैं कहता हूँ अच्छा

कभी नहीं कहता कि काश भूल पाता
काश कि जन्म लेते ही किसी और सृष्टि में
चला गया होता

मेरा घर सचमुच ही किसी और ग्रह में है
अपने घर में बैठा रहता हूँ
महीनों बाद मिलता हूँ
फिर भी अपने ही ग्रह में होता हूँ
गर्म दाल-भात और आलू-पोस्ता खाते हुए
भीगता रहता हूँ ग्रहों पार से आते
उसके रुके हुए आँसुओं में

उसकी झुर्रियों में अब संतोष नहीं दिखता
कि मैं उंगलियाँ चाट कर खा लेता हूँ
महीनों बाद उसके हाथों का बना

साल दर साल चाह कर भी नहीं कह पाऊँगा
कि मैंने कभी चाहा था कोई और जीवन।
                                     ('कोई लकीर सच नहीं होती' संग्रह से)

Tuesday, April 05, 2016

सिर्फ भारत माता नहीं, धरती माता


संकीर्ण राष्ट्रवाद को ना, मानवीय वैश्विक आख्यान को हाँ
('सबलोग' पत्रिका के ताजा अंक में इस लेख का एक संक्षिप्त प्रारुप प्रकाशित हुआ है)

मैं हैदराबाद में बैठा यह लेख लिख रहा हूँ। हैदराबाद तेलंगाना की राजधानी है। तेलंगाना को भारत का 29वाँ राज्य बने अभी दो साल नहीं हुए हैं। तेलंगाना निज़ाम शासित भूतपूर्व हैदराबाद राज्य का तेलुगु-भाषी इलाका है, जिसे भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन करते हुए आंध्र प्रदेश में शामिल किया गया था। यानी कि पिछले सत्तर सालों में तेलंगाना राजतंत्र से आज़ाद भारत के एक प्रांत का, फिर एक भाषाई प्रांत का और आखिर में एक अलग राष्ट्रीय पहचान का राज्य बन गया है। तेलुगु में हिंदी के राष्ट्र शब्द के लिए 'जाति' शब्द और हिंदी के 'जाति' के लिए जाति के अलावा 'कुल' शब्द का इस्तेमाल होता है। अब जब देश भर में हाल में जे एन यू में हुई घटनाओं के बाद से 'राष्ट्र' और 'राष्ट्रवाद' पर चर्चाएँ आम हैं, तेलंगाना में बैठे इस पर लिखना वाजिब लगता है।

'राष्ट्र' के बारे में और जो भी विवाद हो, यह तो हर कोई मानता है कि यह एक तरह की पहचान से जुड़ा हुआ शब्द है। संस्कृतवादी लोग इसका संस्कृत मूल ढूँढ़ते हैं और हिंदी विकीपीडिया के अनुसार 'राजृ-दीप्तो’ अर्थात ‘राजृ’ धातु से कर्म में ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय करने से संस्कृत में राष्ट्र शब्द बनता है अर्थात विविध संसाधनों से समृद्ध सांस्कृतिक पहचान वाला देश ही एक राष्ट्र होता है। देश शब्द की उत्पत्ति 'दिश' यानि दिशा या देशांतर से हुआ जिसका अर्थ भूगोल और सीमाओं से है। देश विभाजनकारी अभिव्यक्ति है जबकि राष्ट्र, जीवंत, सार्वभौमिक, युगांतकारी और हर विविधताओं को समाहित करने की क्षमता रखने वाला एक दर्शन है।' संस्कृतवादियों के साथ समस्या यह है कि वे हर चीज का संस्कृत मूल गढ़ लेते हैं, चाहे वह कभी रहा हो या नहीं भी हो। अक्सर ऐसे 'मूल' दरअसल हाल के वक्त में गढ़े गए होते हैं। बहरहाल, जिस 'राष्ट्र' को लेकर इतनी बहस चल रही है, अंग्रेज़ी के 'नेशन' का अनुवाद वाली वह अवधारणा तो पिछली कुछ सदियों में ही सामने आई है। राजनीतिशास्त्र के अध्येताओं के लिए 'नेशन' पर यह समझ कोई नई बात नहीं है। इस शब्द और अवधारणा पर जे एन यू में चल रहे मुक्तांगन भाषणों की शृंखला में प्रो. प्रभात पटनायक ने संक्षेप में बहुत अच्छा समझाया है, जो यू ट्यूब पर देखा जा सकता है। इसके पहले उन्होंने अंग्रेज़ी के 'द हिंदू' में इसी विषय पर एक लेख भी लिखा था। कइयों को इस बात की तकलीफ रहती है कि प्रभात साम्यवादी पृष्ठभूमि के हैं तो वे लोग स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की दर्शन पर बनी साइट plato.stanford.edu/entries/nationalism पर उपलब्ध सामग्री पढ़ सकते हैं।

इसके पहले कि हम 'नेशन' पर विस्तार से लिखें, एक और बात कही जानी चाहिए। हम सब बचपन से यह पढ़ते आए हैं कि 1857 का ग़दर आज़ादी की पहली लड़ाई थी। ऐसा कहते हुए आम तौर पर हम यह समझते हैं कि अगर 'हम' उस लड़ाई में जीत गए होते तो भारत तभी आज़ाद हो गया होता। बेशक वह लड़ाई एक जनयुद्ध थी, पर अगर ईस्ट इंडिया कंपनी तब हार गई होती तो आज भारतीय उपमहाद्वीप में तीस या उससे ज्यादा मुल्क होने की अच्छी संभावना होती। रोचक बात और है कि 18 वीं सदी में अमेरिका में जिस बर्तानवी औपनिवेशिक प्रशासन का विरोध हुआ और जिसमें आखिर में आज़ाद संयुक्त राज्य अमेरिका विजयी हुआ, उस लड़ाई में दोनों पक्षों में बड़ी तादाद में यूरोप से आए लोग शामिल थे, बहुतायत उन्हीं की थी, जबकि 1857 की लड़ाई में गोरे सिर्फ कंपनी के पक्ष में थे और उनकी कुल तादाद कोई 40000 थी। सिर्फ कंपनी की फौज में भर्ती हिंदुस्तानी ही नहीं, कई रजवाड़े अंग्रेज़ों के पक्ष में थे। मुख्यतः उत्तर भारत के आज के हिंदी प्रदेश में सीमित इस ग़दर में उपमहाद्वीप के बाक़ी इलाकों का कोई जुड़ाव नहीं था।

'हिंदुस्तानी' लफ्ज़ भी कई मायने रखता है। सब जानते हैं कि 'हिंदू' शब्द 'सिंधु' से बना और सिंधु के दक्षिण के लोगों के लिए अलग-अलग रूप में इस शब्द का इस्तेमाल हुआ है। उन्नीसवीं सदी के यूरोपी नक्शों में हिंदोस्तान कहकर उत्तर भारत के उन खास इलाकों को दिखलाया जाता था, जिसमें आज के हिंदी प्रदेश का बड़ा हिस्सा आता है। बंगाल में आज भी बिहार, उत्तर प्रदेश से आए लोगों को 'हिंदुस्तानी' कहा जाता है, सौ साल पहले शरतचंद्र ने तो इस शब्द का इस्तेमाल अपने उपन्यास 'चरित्रहीन' में इस तरह किया है - 'लोकगुलो जे भाषा ब्यबहार करतेछे, ताहा हिंदुस्तानी जिह्वा छाड़ा उच्चारण करते पारे, एतो-बड़ो जीभ पृथवीर आर कोनो जातेर नेई' यानी कुछ (बिहारी) लोग ऐसे (गंदे) लफ्ज़ बोल रहे हैं, जिन्हें कह सके, इतनी बड़ी जीभ धरती पर और किसी जात की नहीं है। आज उत्तर भारत में हम 'हिंदुस्तानी' ज़ुबान कहते हुए हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी कहते हैं, 'हिंदुस्तानी' लोग कहते हुए सारे भारत के लोग कहते हैं, 'हिंदुस्तान' से हमारा मतलब पूरा भारत देश होता है। 'देश' या 'देस' का अर्थ भी बोलचाल में वह नहीं होता जो हम भारत देश से समझते हैं। मैंने बचपन में कोलकाता में रहते हुए बिहारियों को 'देस जा रहे हैं' कहते सुना है, जब वे अपने गाँव जाना चाहते थे।

जिन धार्मिक आस्थाओं को 'हिंदू' कहा जाता है, उनके लिए 18 वीं सदी के पहले भारतीय उपमहाद्वीप के लोग इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करते थे। इन बातों पर सोचना इसलिए ज़रूरी है कि आज जिस तरह इन शब्दों के ऐसे एकांगी अर्थ निकाले जाते हैं, जैसे कि यही अर्थ शाश्वत थे और रहेंगे, इससे हटकर हमें सोचना चाहिए।

आज 'नेशन' की बात 'नेशन-स्टेट' या राष्ट्र-राज्य के अर्थ में की जाती है। यह शब्द यूरोप में सत्रहवीं सदी में सामने आया जब लंबी लड़ाइयों के बाद यूरोप की ताकतों ने तय किया कि वे एकरूप भाषा, संस्कृति आदि के आधार पर राजतंत्रों को मानेंगे। यह औद्योगिक क्रांति की शुरुआत का वक्त था और ऐसे नए सरमाएदारों का समूह उभर रहा था जो अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अपने सगे-संबंधियों और कुनबे के लोगों पर ज्यादा यक़ीन रखते थे। राष्ट्र-राज्य की इस नई धारणा में एक भाषा, एक संस्कृति के आधार पर राष्ट्रीय पहचान उभर कर सामने आई, और इसके साथ सार्वभौमिक राज्य की भौगोलिक पहचान को जोड़ा गया। जहाँ भौगोलिक सीमाएँ कुदरती तौर पर तय थीं, जैसे ब्रिटेन जैसे द्वीप-देश, वहाँ यह राष्ट्र-राज्य आसानी से पनपा। राष्ट्रीय गौरव की वजह से कहीं-कहीं नए तरक्कीपसंद खयालों को बढ़ावा मिला। कई देशों में राजतंत्र की ताकत कमजोर हुई और लोकतांत्रिक ढाँचों को मजबूत किया गया। खासकर हॉलैंड में सत्रहवीं सदी में और इंग्लैंड में उन्नीसवीं सदी में यह दिखता है। फ्रांस और अमेरिका में तो 18 वीं सदी में ही राजतंत्र खत्म हो चुका था। इस तरक्कीपसंद प्रवृत्ति से ही राष्ट्र-राज्य का एक व्यापक अर्थ भी बना कि हालाँकि राष्ट्र की सार्वभौमिकता पर कोई समझौता नहीं हो सकता, पर राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं में रहने वाले हर किसी को, चाहे वह मुख्य भाषा या सांस्कृतिक समूह का न भी हो, पूरी आज़ादी मिलेगी। अपनी पहचान से ऊपर राष्ट्र की पहचान रहेगी (जैसे हम पहले भारतीय हैं, फिर बंगाली, पंजाबी आदि), पर हर किसी को अपने ढंग की ज़िंदगी जीने का हक होगा। एकरूपता वाली सीमित अवधारणा से अलग इस समावेशी बहु-सांस्कृतिक (आज जिसे हम बहु-राष्ट्रीय या multi-national) राष्ट्र की बुनियाद हमेशा कमजोर रही। हुकूमत ने संकट के समय पर राष्ट्र के एकांगी अर्थ पर जोर दिया और मुख्यधारा से हटकर जो लोग रह रहे थे, उन्हें दुश्मन करार दिया। इस 'enemy‌ within' या अपने ही अंदर दुश्मन ढ़ूँढ़ने की लगातार चलती प्रवृत्ति की वजह से एक नया आक्रामक राष्ट्रवाद उभरा। वैसे भी राष्ट्रीय गौरव की वजह से आलमी पैमाने पर स्पर्धा बढ़ी, और अपनी माली ताकत बढ़ाने के लिए आधुनिकता में सराबोर पश्चिम का यह राष्ट्रवाद बड़ी तेजी से साम्राज्यवाद बनने की ओर बढ़ा। सारी दुनिया में संसाधनों पर नियंत्रण के लिए इन साम्राज्यवादी ताकतों में होड़ चल पड़ी।

पश्चिम में हर देश में अपने अंदर दुश्मन ढूँढने की प्रवृत्ति पनपी। फ्रांस में 19वीं सदी की शुरुआत में समावेशी या विविध पहचान वाली राष्ट्रीयता थी, पर सदी के आखिर तक यहूदियों को दुश्मन माना जाने लगा। एक देशभक्त यहूदी फौजी अफ्सर, रिचर्ड ड्रेफस, पर भ्रष्टाचार के ग़लत इल्ज़ाम लगाकर उसे दक्षिण अमेरिका में फ्रेंच गायाना के उपनिवेश में पाँच साल कैद में रखा गया। हालाँकि अंत में उसे निर्दोष माना गया और फौज में दुबारा बहाल किया गया, पर ड्रेफस अफेयर कहलाए इस कांड को फ्राँसीसी राष्ट्रवाद पर बड़ा धब्बा माना जाता है। उत्तरी यूरोप के सभी मुल्कों में, जहाँ प्रोटेस्टेंट ईसाई बहुसंख्यक थे, कैथोलिक समुदाय को गद्दार समझा जाता था और इसी तरह दक्षिणी यूरोप के मुल्कों में, जहाँ कैथोलिक बहुसंख्यक थे, प्रोटेस्टेंट ईसाइयों को दुश्मन माना जाता था। यहूदी हर जगह इस भेदभाव का शिकार रहे।

यूरोप में यह भेदभाव मुसोलिनी और हिटलर के जमाने में अपने शिखर पर पहुँच गया। बीसवीं सदी की शुरुआत में यूरोप के सरमाएदार धीरे-धीरे राष्ट्रीय पहचान से हटकर बहुराष्ट्रीय पहचान बना रहे थे, पर राष्ट्रवाद को एकांगी अर्थ में सीमित करने की इस प्रक्रिया में उन्होंने हुकूमतों का साथ देकर महत्वपूर्ण भूमिका अपनाई। उन्होंने राष्ट्र के गौरव का झाँसा देकर अपना सरमाया बढ़ाने के लिए आम लोगों में दूसरे मुल्कों को लूट कर अपनी औकात बढ़ाने की भूख पैदा की। इसलिए इस तरह का राष्ट्रवाद बीमारी की तरह और-और की माँग करता हुआ बढ़ता चला। इस बीमारी की पहचान और पहली बार इसकी तीखी और सर्वांगीण आलोचना कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने की, और उन्होंने दुनिया के सभी मजदूरों को एकजुट होने का नारा उछाला।

भारत में वह राष्ट्रीय पहचान जो भौगोलिक संप्रभुता से जुड़ी है, कब आई? हर भारतीय में यह पहचान मौजूद है, ऐसा आज भी नहीं कहा जा सकता। जाहिर है कि ऐसा होता तो पृथकतावादी आंदोलन नहीं चल रहे होते। हमें बचपन में जैसे पढ़ाया जाता है, उससे लगता है कि भारतीय अस्मिता हमारे पूर्वजों में चिरंतन रही है और वह आदिकाल से चली आ रही है। सांस्कृतिक एकता के जो प्रतीक बतलाए जाते हैं, जैसे वेदों का व्यापक प्रभाव, 'हिंदू' धर्म के चार मठ, सनातनी आस्था में काशी जैसे धर्मस्थल का महत्वपूर्ण होना, ये राष्ट्रीय अस्मिता के कारक नहीं हैं। यूरोप के सभी ईसाइयों के लिए यरुशलम (आज इस्रायल में) बहुत बड़ा धर्मस्थल है। पर वह यूरोप में नहीं है। रोम का वैटिकन, जहाँ पोप रहते हैं, दुनिया भर के कैथोलिक ईसाइयों के लिए पवित्र भूमि है, पर इसका राष्ट्रीय पहचान से कोई संबंध नहीं है। ऐसा ही इस्लाम में मक्का का उदाहरण लिया जा सकता है। इसी तरह छोटे-बड़े साम्राज्यों का बनना भी वैसा ही है जैसे यूरोप में होता रहा है, इसलिए अतीत के भारतीय उपमहाद्वीप में हम आज के भारत राष्ट्र को नहीं ढूँढ सकते। इस तरह की अ-ऐतिहासिक सोच एक ब्राह्मणवादी नज़रिया है, जिसका सचाई से कोई संबंध नहीं है।

ईस्ट इंडिया कंपनी को 1764 में दीवानी हक मिले। उन्होंने अपनी दीवानी के इलाकों में कर बढ़ा दिया और नतीजतन 1770 में आए भयंकर अकाल में बंगाल की एक तिहाई आबादी खत्म हो गई। इस भयंकर घटना के बारे में हमें जो जानकारी मिलती है, वह बंगाल-बिहार-ओड़िसा की लोककथाओं में है, या कंपनी और समकालीन बंगाल के इतिहासकारों के लेखन में है, पर किसी दूसरी भारतीय भाषा में समकालीन कोई लेखन या अन्य कोई सामग्री नहीं दिखती। दो सौ साल बाद सब 1945-46 में बंगाल में फिर भयंकर अकाल पड़ा, तो लाहौर में इप्टा के कार्यक्रमों में बंगाल के अकाल पर गीत गाए गए। यानी 1945-46 में जैसी राष्ट्रीय भारतीय पहचान दिखती है, वह 1770 में कहीं नहीं है। 1858 तक भारतीय उपमहाद्वीप दर्जनों राष्ट्रों का वैसा ही समूह था, जैसा कि यूरोप था और आज भी है। फ़र्क सिर्फ इतना था कि भारतीय रजवाड़े आधुनिक राष्ट्र-राज्य नहीं थे, जैसा कि अधिकतर यूरोपी देश 19 वीं सदी तक बन चुके थे। उनका स्वरूप काफी हद तक सामंती था। उनकी सेनाओं में कई तरह की जातियों और समुदायों के लोग शामिल थे। पर ऐसी सामूहिक पहचान मौजूद थी कि लड़ाइयाँ लड़ने पर जीतने वाला पक्ष हारे हुए पक्ष के आम लोगों पर कहर बरपाता था। मसलन मराठों के साथ जो लड़ाइयाँ अंग्रेज़ों ने या दूसरे राजाओं ने लड़ीं, उसके बाद आम लोगों पर जैसी ज्यादतियाँ मराठों ने बरपी, उससे पता चलता है भारतीय पहचान नामक कोई चीज़ मौजूद नहीं थी। यह हाल तक़रीबन सभी रजवाड़ों का था। आज भी जब अक्सर फौज या अर्द्ध-सैनिक बलों का इस्तेमाल दमन के लिए होता है, उसमें दमनकारी सिपाहियों और उत्पीड़ित लोगों की अलग सांस्कृतिक पहचान महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।

जिसे आज हम भारत कहते हैं, औपचारिक रूप से उसका बनना आज़ादी के महज 89 साल पहले यानी कि 1858 में हुआ, जब पूरे उपमहाद्वीप को बर्तानवी साम्राज्य ने अपने अधीन घोषित किया। तब इंडिया एक प्रशासनिक इकाई बना, हालाँकि 1947 तक रजवाड़े काफी हद तक अपना अलग अस्तित्व बनाए रहे। औपनिवेशिक सरकार ने कभी भी इंडिया को सांस्कृतिक या भाषाई रूप से एकांगी नहीं माना, न ही उन्होंने किसी एक मुख्यधारा की सांस्कृतिक पहचान थोपने की कोशिश की। ईसाई धर्म-प्रचारकों ने भी किसी राष्ट्रीय पहचान को थोपने की कोशिश नहीं की। अलग अलग भाषाओं में बाइबिल छापी गई। यहाँ तक कि भारतीय भाषाओं के विकास में यूरोपी विद्वानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

औपनिवेशिक सरकार के ज़ुल्मों का आम लोगों ने, जहाँ संभव हुआ, विरोध किया और प्रतिरोध में जंगें लड़ीं। संथाल आदिवासियों से लेकर देश के हर कोने में कई लड़ाइयाँ लड़ी गईं, पर यह वैसी ही लड़ाइयाँ थी, जैसे पहले रजवाड़ों के खिलाफ लड़ी जाती थीं। फ़र्क यह था कि अब दुश्मन के कमांडर गोरे थे, सिपाही नहीं। यानी कि इस प्रतिरोध को राष्ट्रीय सर्व-भारतीय पहचान के उभार में नहीं देखा जा सकता है।

भारतीय राष्ट्रीयता का उभरना 1858 के बाद ही शुरु होता है, जब संपन्न-वर्गों में यह एहसास गहराने लगा कि वे अपनी सत्ता खो रहे हैं। उत्तर भारत के मुसलमानों के संपन्न वर्गों में तो यह होना ही था, क्योंकि जिस तरह अंग्रेज़ आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के साथ पेश आए और जो कत्लेआम दिल्ली में हुआ, उसके बाद कौन अंग्रज़ी सरकार के खिलाफ न सोचता। हिंदू सवर्णों में यह एहसास बढ़ा कि चाहे अंग्रेज़ धार्मिक आस्थाओं और रीति-रिवाज़ों में हस्तक्षेप न भी करें, सदियों से बना उनका प्रभुत्व खत्म होने को था, क्योंकि चाहे-अनचाहे अंग्रेज़ी शासन के साथ नए खयाल यूरोप से आ रहे थे और 1857 के पहले से ही सावित्री बाई और जोतिबा फुले और राममोहन राय, डेरोज़िओ आदि की कोशिशों से यह खतरा बढ़ रहा था।

चूँकि यह नया उभरता राष्ट्रवाद समाज के एक छोटे तबके से शुरु हुआ, और अंग्रेज़ों से लोहा लेने के लिए इसे व्यापक पैमाने में फैलाने की और समाज के सभी तबकों को इसमें शामिल करने की ज़रूरत थी, इसलिए स्वाभाविक था कि इस राष्ट्रीयता में अनेकों विरोधभास भरे पड़े थे। फिर भी काफी हद तक यूरोपी प्रभाव में एक मुख्यधारा की राष्ट्रीयता सामने आई, जो समाज के बड़े हिस्से को शामिल करने के काबिल थी। प्रभात पटनायक 1931 में कांग्रेस के कराची महासम्मेलन का जिक्र करते हैं, जिसमें ऐसे इंकलाबी प्रस्ताव पारित हुए कि आज़ाद भारत में सबको लाजिम तौर पर मुफ्त तालीम दी जाएगी, सभी को मतदान का अधिकार होगा, यहाँ तक कि मृत्युदंड की सजा नहीं होगी। ऐसे समय जब पश्चिमी मुल्कों में भी हर जगह सब को मतदान का अधिकार नहीं था, ये प्रस्ताव वाकई बड़े इंकलाबी लगते हैं। हालाँकि आज़ादी के बाद जब संविधान लिखा गया, इनमें से कइयों पर अमल नहीं किया गया।

साम्राज्यवाद के विरोध में जन्मा यह राष्ट्रवाद सबको साथ ले कर चलने वाला था, जबकि यूरोप में राष्ट्रवाद अपने सीमित अर्थ में एकांगी होता गया। दूसरी आलमी जंग के बाद यूरोप के लोगों को यह समझ में आ गया कि ऐसा राष्ट्रवाद आखिरकार सब के विनाश की ओर ले जाता है। आज यूरोप में 'राष्ट्रवादी' लफ्ज़ अक्सर कट्टर दक्षिणपंथियों के लिए गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इस समझ के बनने में करोड़ों लोगों की जान गई। गलियों-गलियों में जंगें लड़ी गईं। जापान में हिरोशिमा-नागासाकी हुआ। पर हमारे यहाँ ऐसी जंग नहीं लड़ी गई। इसलिए हमारे यहाँ यूरोपी किस्म का एकांगी राष्ट्र-राज्य का खयाल भी हिंदुत्व की शक्ल में सामने आया। अपने जन्म से ही यह सवर्ण हिंदुओं के वर्चस्व का राष्ट्रवाद था। इसके बरक्स मुसलमानों के बड़े तबके में एक और राष्ट्रीयता बनी, जो शुरुआत में सिर्फ एक धार्मिक पहचान थी, पर बाद में वह राष्ट्र-राज्य की माँग में बदल गई।

गाँधी नेहरू का उदार राष्ट्रवाद इस एकांगी सीमित राष्ट्रवाद के साथ जूझता रहा। जैसे-जैसे गाँधी 'अंतिम जन' के लिए प्रतिबद्ध होते गए, कांग्रेस के अन्य नेताओं की अपनी संकीर्णताएँ वक्त के साथ मुखर होती गईं। धर्म के आधार पर देश का बँटवारा इसी सियासी खेल का दुष्परिणाम था। फिर भी कम से कम आज़ादी के वक्त भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक और भाषाई पहचान की अनेक राष्ट्रीयताओं में एक सामाजिक अनुबंध या सोशल कॉंट्रैक्ट हुआ। ये सभी राष्ट्रीयताएँ मिलकर एक राष्ट्र में शामिल हुईं। ऐसे बहुराष्ट्रीय देश और भी हुए हैं। सोवियत रूस एक बहुराष्ट्रीय देश था। संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में सोवियत रूस ने यह माँग रखी थी कि उनके राष्ट्रों की ओर से पंद्रह प्रतिनिधि हों, जिनके अलग मताधिकार हों। इसके विरोध में अमेरिका ने दावा किया कि उनके 48 राज्यों की ओर से इतने ही प्रतिनिधि रखे जाएँ। आखिरकार यूक्रेन और बायलोरुस को मिलाकर 1991 तक सोवियत रुस के तीन प्रतिनिधि बैठते थे। यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनकी राष्ट्रीय पहचान बनी रहे, लेनिन ने सोवियत रूस के संविधान में यह प्रावधान रखवाया था कि उन सबको सोवियत संघ से अलग होने का हक था। भारत के संविधान में ऐसा कोई विकल्प नहीं रखा गया। इसलिए प्रभात पटनायक मानते हैं कि यह ज़रूरी हो गया कि हुकूमत यह सुनिश्चित करे कि किसी भी राष्ट्रीयता के लोगों को ऐसा न लगे कि उनकी पहचान को ऐसा खतरा है कि उन्हें अलग होना पड़ेगा। अगर किसी को लगता है कि जो सामाजिक अनुबंध हमें एक बहुराष्ट्रीय देश में शामिल करता है, उसकी अवहेलना हो रही है, तो उन्हें इसके लिए आवाज़ उठाने का हक होना चाहिए। और जब वह ऐसी आवाज़ उठाते हैं तो उन्हें देशद्रोही या राष्ट्रद्रोही नहीं कहना चाहिए। देशद्रोही या राष्ट्रद्रोही जैसे शब्द हमारी राजनैतिक शब्दावली में नहीं रहने चाहिए। आज़ादी के वक्त इन बातों पर सभी राष्ट्रनेता एक जैसा नहीं सोचते थे। गाँधी ने पाकिस्तान को राष्ट्रीय खजाने से उनका उचित हिस्सा देने के लिए उपवास शुरु किया था, जो उनकी हत्या का एक कारण भी बना। पर इसके लिए उनको कोई देशद्रोही या राष्ट्रद्रोही नहीं कहता। आंबेडकर ने बड़ी गंभीरता से पाकिस्तान के बनने पर विवेचन किया था और अंत में वे इस निर्णय पर पहुँचे कि पाकिस्तान के बनने का कोई विकल्प नहीं है, हालाँकि उनके अनुसार यह पूरे उपमहाद्वीप के लिए दुखद घटना थी।

अगर हम यह समझें कि एकांगी राष्ट्रवाद की बीमारी सिर्फ उन्हीं लोगों में है, जो सीधे-सीधे संघ परिवार से जुड़े हैं, तो हम इसकी जटिलता को समझने से चूकेंगे। अगर ऐसा होता तो इसे रोकना आसान हो जाता। हमारे यहाँ यह एकांगी राष्ट्रवाद जातिवाद और फिरकापरस्ती की ज़मीन पर फला फूला है। दरअसल हममें से हरेक में यह रोग कमोबेश मौजूद है। इसीलिए जिन्हा की मुस्लिम बहुल राज्यों में स्वायत्तता की माँग को नेहरू जैसे नेताओं ने अलगाववाद की तरह देखा। हालाँकि गाँधी ने आंबेडकर की दूरदर्शिता से बहुत कुछ सीखा था और उनकी नई तालीम की संरचना में यह दिखता भी है, पर आज भी अनेक सवर्ण विद्वान आंबेडकर को दलितों के नेता से अधिक मानने को तैयार नहीं हैं। उत्तर भारत में अदब की भाषा फिरकापरस्ती में रँगी गई। लोगों की बोलचाल की भाषा को हटाकर कृत्रिम संस्कृतनिष्ठ मानक हिंदी और इसी तरह अरबी फारसी के वजन से लदी मानक उर्दू बनी। कांग्रेस पार्टी ने समय समय पर जाति और संप्रदाय का चुनावी राजनीति में इस्तेमाल किया। चुनावी वाम भी कभी-कभार इसका शिकार बना। अब तो यह आम बातें हो गई हैं।

आज युवाओं में जो बेचैनी दिख रही है, वह इसलिए भी है कि एक लंबी लड़ाई के बाद दलित वर्गों ने जाति के सवाल को मुख्यधारा की राजनीति का सवाल बना दिया है। जाति के विनाश के बिना गैरबराबरी को मिटाना संभव नहीं है। यहाँ तक कि यह भी अनुमान लगाए जा रहे हैं कि आर एस एस भी अब मनु स्मृति के स्त्री और दलित विरोधी हिस्सों पर असहमति जारी कर सकता है। जातिप्रथा हिन्दू धर्म का संरचनात्मक आधार है। अगर जातिप्रथा को हटा दिया जाए तो हिन्दू धर्म कुछ और बन जाएगा। आज़ादी के तुरंत बाद जिस मुक्तिकामी राष्ट्रवाद की कल्पना की गई थी, उसे सबसे बड़ा खतरा जातिवाद से ही आया और वह महज संघियों से नहीं, बल्कि उन सभी सवर्णों से आया जो अपनी जाति और आर्थिक संपन्नता की बदौलत हुकूमत चला रहे थे। दूसरा खतरा स्थानीय सरमाएदारों से आया जो आज़ादी की लड़ाई में इस हद तक शामिल थे कि वे देश के संसाधनों पर अपना नियंत्रण चाहते थे और उन्हें यूरोपी सरमाएदारों के साथ स्पर्धा में सफलता नहीं मिल रही थी। पर आज़ादी मिलते ही उनको यह छूट मिली कि अब वे हुकूमत के साथ मिलकर आम लोगों की मेहनत की लूट से अपना सरमाया बढ़ा सकें। इन दो चुनौतियों से जूझते हुए आज़ाद हिंदुस्तान आगे बढ़ता रहा, पर आखिरकार इन अलग-अलग प्रवृत्तियों में टकराव तो होना ही था। फिलहाल पिछली सदी के आखिरी दशक से आलमी सरमाएदारों के साथ समझौता कर भारतीय पूँजीवादी दमनकारी हाकिमों की मदद से पूँजी की लूट पर से नियंत्रण हटाते जाने में काबिल हो रहे हैं और देश के संसाधनों की खुली लूट जारी है। इस नवउदारवादी लूट में जाति के सवाल पर और आदिवासियों के हक में खड़े हो रहे आंदोलन अवरोध बन रहे हैं, इसलिए यह संभव है कि जातिप्रथा पर बड़े समझौते उनकी ओर से दिखने लगें। पर हजारों सालों से चल रहे इस अमानवीय मनुवादी व्यवस्था में ऐसा बदलाव अपने आप होता दिख नहीं रहा और आज दलित-वाम-अल्पसंख्यक-स्त्री के सम्मिलित पटल पर जो एकजुटता दिख रही है, उससे एक इंसानी पहचान सामने उभर रही है, जो किसी भौगोलिक संप्रभुता में बँधी नहीं रहेगी।

राष्ट्रवाद का जो स्वरूप संघ परिवार आक्रामक रूप से भारत की अवाम पर थोप रहा है, उसकी विड़ंबना यह है कि एक ओर तो ब्राह्मणवादी संस्कृत-आधारित भाषा नीति है, दूसरी ओर तालीम का निजीकरण कर अंग्रेज़ी लादना है। इस लड़ाई में संस्कृत तो पीछे छूटेगी ही, छलावे के लिए अंग्रेज़ी में संस्कृत के शब्द पढ़े जाएँगे। यह प्रक्रिया तेजी से चल पड़ी है और अमेरिका में बैठे संघ परिवार के नौटंकीबाज बुद्धिजीवी संस्कृत के नामी-गरामी विद्वानों पर कीचड़ उछालने में लगे हैं, हालाँकि वहाँ इतनी जल्दी इनकी दाल गलेगी नहीं और अभी तक उनके वार उलटे ही पड़े हैं। तालीम के क्षेत्र में जिस तरह सरकारी स्कूलों को तबाह कर या उनको बंद कर निजी स्कूलों की तादाद बढ़ाई जा रही है और सचमुच की समान तालीम की जगह जैसा जाली शिक्षा अधिकार बिल लागू किया गया है, उससे जाहिर है कि देश तो कमजोर होता ही रहेगा।

आज जे एन यू में छात्र आंदोलन से उभरती दलित-वाम-अल्पसंख्यक-स्त्री एकजुटता को तोड़ने के लिए जो बेवकूफाना प्रतिक्रिया एकांगी हिंदुत्वादी राष्ट्रवाद से आई है, उसमें एक सुझाव यह भी है कि परिसर में टैंक रखे जाएँ तो इससे युवाओं में 'देशभक्ति' बढ़ेगी। ऐसे ही कुछ लोगों को लगता है कि भारत माता की जय कहला कर वे राष्ट्रभक्ति का सर्टीफिकेट बाँट सकते हैं। दो विकल्प साफ तौर पर दिख रहे हैं। या तो हुकूमत के साथ के संस्कृत-अंग्रेज़ीपरस्त लघुसंख्यक ब्राह्मणवादी तबके अपने दमनतंत्र को बढ़ाते जाएँगे या फिर विविध राष्ट्रीयताएँ अपने सामाजिक अनुबंध को और मजबूत करेंगी और हम सारी दुनिया के सामने बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक एक नया सपना पेश कर सकेंगे, जिसमें भौगोलिक संप्रभुता नहीं, बल्कि हर इंसान की सर्वांगीण समृद्धि की कोशिश देशभक्ति कहलाएगी। पहली संभावना में पश्चिमी साम्राज्यवाद और नस्लवाद के बरक्स हम अपना साम्राज्यवाद और नस्लवाद खड़ा करेंगे, उनकी हर बेवकूफी की नकल करेंगे, जबकि दूसरी संभावना में हम धरती के सभी भले लोगों के साथ एकजुट होकर सिर्फ भारत माता नहीं, धरती माता को बचाने के लिए संकीर्ण राष्ट्रवाद की सीमाओं को तोड़ते हुए एक वैश्विक आख्यान या प्लैनेटरी नैरेटिव बनाएँगे। इस दूसरी संभावना का उम्मीदों से भरे होने की एक वजह विज्ञान और तकनोलोजी की अभूतपूर्व तरक्की है, जिससे आज विविधता में एकता का सपना सचमुच साकार होता चला है।