Sunday, August 02, 2015

जन संस्कृति मंच के लिए


31 जुलाई को दिल्ली के हिंदी भवन में जन संस्कृति मंच के सम्मेलन में बोलने के लिए मैंने एक टिप्पणी तैयार की थी, जो नीचे है। वहाँ बोलते हुए इसमें से कुछ बातें मैं बोल पाया और कुछ अलग बातें कहीं। जिन्हें रुचि हो उनके लिए यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ :-


जन संस्कृति मोर्चा के इस 14 वें राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल सभी साथियों को लाल सलाम। मुझे फ़ख़्र है कि क्रांतिकारी कवियों, लेखकों और अन्य रचनाकारों के जुझारू मंच की इस सभा में मैं आप सबका साथी होने का सम्मान पा सका हूँ। इसके लिए आयोजकों को और खास तौर पर साथी प्रणय को शुक्रिया कहता हूँ।

प्रो. राजेंद्र कुमार ने दोपहर में हमें नबारुण भट्टाचार्य की पंक्ति याद दिलाई थी - यह मृत्यु उपत्यका मेरा देश नहीं है। वाकई आज हम ऐसी एक उपत्यका में हैं, जहाँ लोगों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है; जहाँ विरोध है, दमनचक्र पूरी तरह से सक्रिय है। हर अकादमिक संस्था में दक्षिणपंथियों को डाला जा रहा है। आज जब संस्कृति पर अंधकार छाता जा रहा है, आप सबके बीच खड़े होकर उम्मीद बढ़ रही है कि अँधेरे को चीरकर रोशनी लाने की मुहिम जारी है।

दोस्तो, मंच की राष्ट्रीय परिषद ने जो आह्वान जारी किया है, उसमें मुक्तिबोध की कविता की खूबसूरत पंक्तियों के तुरंत बाद ही 'भारत के नए कंपनी राज' का उल्लेख है। यह बड़ी रोचक बात है कि आज बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य के सबसे बड़े नाम, प्रेमचंद की जन्मवार्षिकी है और साथ ही यह साल आज़ादी के बाद प्रेमचंद की ही परंपरा से निकल कर और आगे का कथा साहित्य रचने वाले भीष्म साहनी की जन्म शतवार्षिकी है। एक कंपनी राज वह था, जिसके बारे में भीष्म जी ने अपने उपन्यास 'मय्यादास की माड़ी' में चर्चा की है। कंपनी राज से बर्तानवी राज तक का वह सफर याद करते हुए हम अपने आप से पूछने लगते हैं कि सचमुच हम किस सदी में हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम वापस उन्नीसवीं सदी में पहुँच गए हैं? मुझे उपन्यास का एक प्रसंग याद आता है कि लंदन में किसी सभा में ब्रिटिश सरकार का मंत्री आँकड़े पेश करता है कि भारत में व्यापार से ब्रिटेन को कितना मुनाफा हुआ है। श्रोताओं में एक अध्यापक बैठा हुआ है जो लगातार सवाल उठाता है कि इस हद तक मुनाफाखोरी कि लोग बड़ी तादाद में भुखमरी से मर रहे हों, क्या यह उन उदार मूल्यों के खिलाफ नहीं है, जिनके बारे में अंग्रेज़ गर्व से बात करते हैं। विड़ंबना देखिए कि कंपनी के हितैषी और बाद में सरकारी प्रवक्ता लगातार यह कहते हैं कि वे तो हिंदुस्तान को एक आधुनिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं, जहाँ आधुनिक तक्नोलोजी पूरी तरह से चल रही हो। भीष्म साहनी के उपन्यास में खलनायक अंग्रेज़ नहीं हैं, असली खलनायक यहाँ के लोग हैं, जिन्होंने अंग्रेज़ों के हाथ देश और समाज को लुटा दिया था।

दक्षिण एशिया में आज कमोबेश वही स्थिति है जो कंपनी राज के दिनों में थी। यूरोपी पूँजीवाद यहाँ देर से आया और यहाँ की सामंती संरचनाओं से जुड़कर बहुत ही क्रूर व्यवस्था में बदलता रहा है। 'लूट-झूठ-टूट-फूट' की संस्कृति का उल्लेख मंच के आह्वान परचे में है। आज भी हम देख रहे हैं कि यहाँ के शासक वर्ग जनता को इसी तरह छल रहे हैं कि हम स्मार्ट सिटीज़ और बुलेट ट्रेन लाने वाले हैं, जब बड़ी तादाद में किसान आत्म-हत्याएँ कर रहे हैं। कंपनी राज और बाद में ब्रिटिश राज के दौरान जो यूरोपी उदारवादी हमारे पक्ष में बोलते थे, वे अक्सर सिर्फ कथनी में नहीं, अधिकतर अपनी करनी में सच्चे थे। आज यह कहना मुश्किल होता जा रहा है कि हमारा उदारवादी वर्ग सचमुच किस तरफ खड़ा है। आज़ादी के तकरीबन सत्तर साल बाद आज जहाँ शासक वर्ग पैने दाँत दिखलाते हुए नंगी लूट का जश्न मना रहा है, हम आज भी समझने की कोशिश में हैं कि अंग्रेज़ों ने हमारा सत्यानाश कर दिया। यह सच है कि उपनिवेशकालीन शोषण से जो नुकसान पहुँचा था, उससे उबरने में लंबा समय लगेगा। पर आज़ादी की लड़ाई के दौरान जिस परिप्रेक्ष्य से हम इन बातों को जानते समझते थे, आज आज़ादी के सत्तर सालों बाद उससे अलग एक नए परिप्रेक्ष्य से हमें सोचना पड़ेगा। हमें इस बात की चिंता होनी चाहिए कि हम अपने समाज की विसंगतियों को न भूलें। यूरोप में उन्नीसवीं सदी में बड़ी तेज़ी से वैज्ञानिक और तकनीकी तरक्की हो रही थी, और हमारी आधुनिक भाषाओं में सैद्धांतिक ज्ञान उपलब्ध नहीं था। जो कुछ संस्कृत या फारसी में था, उससे आम लोग वंचित थे। वे स्थितियाँ कैसी भयंकर रही होंगी कि हमारे समाज-सुधारकों के प्रतिनिधि ब्रिटिश सरकार के पास गुहार लेकर गए कि हमें आधुनिक ज्ञान की शिक्षा उपलब्ध करवाई जाए। इसके पीछे सदियों से जाति और वर्ग के आधार पर समाज में व्याप्त भेदभाव को हम नकार नहीं सकते। फिरकापरस्ती की वजह से बहुत सारा आधुनिक ज्ञान जो उर्दू में लिखा गया था, उन्नीसवीं सदी के अंत तक उसका औचित्य कम हो गया। आज़ादी के बाद देश के वे इलाके जो पहले पूरी तरह अंग्रेज़ों के अधीन नहीं थे, वे सरकार और केंद्रीय सत्ता के अधीन हुए हैं। संपन्न वर्गों को हर तरह की सुविधाएँ मुहैया हैं जिनकी कल्पना भी आज़ादी के पहले नहीं की जा सकती थी। पर हर तरह की गैरबराबरी बढ़ती जा रही है। जब विरोध होता है तो दमनतंत्र दनदनाता आता है। हमारे बुद्धिजीवी इस बात को भी दुहराते रहते हैं कि देश में वाम ताकतें खत्म होने को हैं, जबकि सच्चाई यह है कि देश भर में जहाँ भी संगठित विरोध हो रहा है, वह वाम ताकतों के नेतृत्व में हो रहा है। पर इस बात को इतना दुहराया गया है कि लोग चुनावों में वाम के लिए वोट डालने से कतराते हैं कि वोट बर्बाद तो नहीं हो जाएगा। हमारे बुद्धिजीवी बहस करते रहते हैं और वे लोग जो जनता के साथ खड़े हैं, कोई मारे जाते हैं, किसी पर सी बी आई का हमला होता है और क्या-क्या नहीं। वे उम्मीद करते रहते हैं कि प्रधान मंत्री इन ज्यादतियों पर ध्यान दें। अगर इस सरकार से ऐसी उम्मीद कोई मायने रखती तो इनकी विचारधारा के खिलाफ इतने सालों से लड़ते क्यों। इधर राष्ट्रीय इतिहास परिषद को पोंगापंथियों को थमाया जा रहा है, उधर फिल्म इंस्टीटिउट में छात्रों को धमकी दे दी गई है कि हड़ताल बंद करो, नहीं तो निकाल देंगे, रस्टीकेट कर देंगे। और अंग्रेज़ीदाँ विद्वान लगे हैं कि मोदीजी ध्यान दें; क्या कहा जाए, हम आप बस हँस ही सकते हैं।

मैं दो-तीन विषयों पर कुछ बातें आपसे साझा करना चाहूँगा। हालाँकि जसम साहित्य-संस्कृति का मंच है, यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह एक राजनैतिक मंच है और बराबरी पर आधारित समाज बसाने के लिए जहाँ भी जद्दोजहद चल रही है, वहाँ मंच की उपस्थिति काम्य है। अपने निजी समझौतों में बँधे हुए मैं कई सालों से अलग-अलग जनांदोलनों में थोड़ा बहुत जुड़ा रहा हूँ। जहाँ भी वाम के प्रति प्रतिबद्ध साथी कुछ करते नज़र आए, मैंने उनके साथ हाथ जोड़ने की कोशिश की। मेरे जैसे हजारों लोग ऐसी स्थिति में रहे हैं जो किसी पार्टी के साथ जुड़े बिना एक इंच दो इंच काम करते रहे हैं। वाम दलों में सही लाइन को लेकर जो बहसें होती हैं, उसी के मुताबिक उनके मास-ऑर्गनिज़ेशन अलग-अलग काम करते रहते हैं। इससे जो नुकसान पहुँचा है, उसमें एक यह है कि मेरे जैसे हजारों लोग कभी तय नहीं कर पाए कि सही मंच कैसे चुना जाए। मैंने करीब अट्ठाइस साल पहले ज्ञानरंजन जी को ख़त लिखा था कि लेखक संगठनों के एकजुट न होने से बहुत नुकसान हो रहा है। क्या इन संगठनों के सभी सदस्य जानते हैं कि उनमें क्या वैचारिक मतभेद हैं? निश्चित ही नेतृत्व में इसकी समझ होगी, पर ज्यादातर लेखक या संस्कृतिकर्मी किसी संगठन में निजी संबंधों और दूसरे आग्रहों से जुड़ते हैं। अच्छी बात यह है कि मुख्यधारा के वामदलों में इधर बात चली है कि शायद जल्दी ही कभी एकीकरण हो सके, पर अलग होने की जो गतिकी है, वह ऐसी ही है कि उसे वापस मोड़ना आसान नहीं होता। ठीक अभी बिहार के चुनावों की तैयारी के वक्त यह बहुत ज़रूरी सवाल बन गया है। नब्बे के बाद के पहले सालों में बिहार में वाम ताकतें बहुत मजबूत थीं। आज जैसा मंच बना है, वैसा अगर तब बना होता तो चुनाव जीतने की संभावना थी। आज वाम नेतृत्व ने आपस में एकजुट होकर स्वतंत्र गठबंधन बनाया है, इस वक्त सभी सांस्कृतिक और साहित्यिक मंचों के लिए ज़रूरी है कि वे इस नए गठबंधन के समर्थन में पुरजोर लड़ाई शुरू करें। वाम दलों में इतिहास पर बहसें ज्यादा होती रहती हैं, ज़रूरी भी हैं, पर वर्तमान की माँग यह है कि हम उदार लोकतांत्रिक ढाँचे बनाएँ, जो सचमुच अपनी पहुँच में व्यापक हों। बराबरी की न्यूनतम माँगें, जैसे समान शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएँ, ये हमारे मुद्दे हों और पचास साल पहले के झगड़े नहीं। खास तौर पर साहित्य-संस्कृति के संगठनों का अलग होना कोई मायने नहीं रखता - ज़रूरत यह है कि ऐसी लोकतांत्रिक संस्कृति बनाई जाए कि एक ही मंच पर नीतियों पर बहसें हों और अपनी अलग राय बिना किसी डर के कही जा सके। मेरा अनुभव यही बतलाता है कि साहित्य-संस्कृति से जुड़े अधिकतर लोग जानते भी नहीं होते कि अलग-अलग संगठनों में कैसे वैचारिक फ़र्क हैं, क्योंकि आलोचक भले ही अपनी सोच में व्यवस्थित हो, एक लेखक, कवि या संस्कृतिकर्मी स्वभाव से और अपने काम में अराजक होता है। यह सोचने की बात है।

अगली बात मुझे भाषा के बारे में कहनी है। सोचने पर यह कमाल की बात लगती है कि जिस देश में एक तिहाई जनता आज भी निरक्षर है, जहाँ बुद्धिजीवी वर्ग जनसंख्या के 10% से ही आते हैं, वहाँ कैसे एक विदेशी भाषा को ज़बरन हिंदुस्तानी ज़ुबान बना दिया गया है। इस बात को कहने पर मुझे चरमपंथी करार दिया जाएगा, जबकि फैनाटिक तो वे हैं जो ज़बरन हम सब पर अंग्रेज़ी लाद रहे हैं। जब यूरोप में प्रबोधन या इनलाइटेनेमेंट का समय था, तो वहाँ लड़ाई लड़ी गई थी कि हर तरह का ज्ञान आम लोगों की ज़ुबानों में मिले और हमारे बुद्धिजीवी ऐसे कमाल के हैं कि वे चाहते हैं कि लोग पहले विदेशी ज़ुबान सीखें और फिर ज्ञान पाने की सोचें। भारतीय भाषाओं के लिए, खासतौर पर हिंदी के लिए ऐसा घोर संकट दिखता है, जिससे निकलने के लिए बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ेगी। एक सांस्कृतिक मंच के रूप में जसम को भाषा पर स्पष्ट नीति बनाने की ज़रूरत है। इस संदर्भ में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच के प्रो. अनिल सदगोपाल और उनके सहयोगियों की यह कोशिश कि देश के हर बच्चे को अपनी ज़ुबान में मुफ्त तालीम दी जाए, एक महत्वपूर्ण लड़ाई है। जसम के कई साथी इस राष्ट्र-व्यापी आंदोलन में शामिल हैं। जाहिर है कि मैं उन लोगों मे से नहीं हूँ जो अंग्रेज़ी का विकल्प हिंदी को या संवैधानिक मान्यता प्राप्त भाषाओं को ही मानते हैं। हिंदी के बहुभाषी स्वरूप को जैसे खत्म किया गया है, उससे नुकसान हुआ है। मैं मानता हूँ कि आज तकनोलोजी की मदद से सौ ज़ुबानों में पठनीय सामग्री तैयार की जा सकती है। पढ़ाने वाले लोग भी मिल जाएँगे। बेशक इसके लिए सरकार को पैसा लगाना पड़ेगा। पैसा कहाँ से आएगा? इस सवाल के कई जवाब हैं, मेरा सीधा सा जवाब यह है कि दक्षिण एशिया के हुक्मरानों, जनता को बेवकूफ बनाना बंद करो और आपसी मारकाट में आम जनता के खून-पसीने का पैसा बर्बाद करना बंद करो। हिंद-पाक-चीन कहीं भी आम लोगों में आपस में लड़ने की कोई तमन्ना नहीं है। लोग शांति और बुनियादी सर्वांगीण विकास चाहते हैं। बदकिस्मती से हमारा बुद्धिजीवी वर्ग आज भी संपन्न वर्गों से ही आता है और अपनी सोच में काफी हद तक सामंती है - इसके साथ राष्ट्रवाद का ऐसा अजीब मेल हुआ है कि भाषा के मुद्दे पर सरल सी बातें भी उन्हें समझ नहीं आती हैं। वे या तो संस्कृत थोपेंगे या अंग्रेज़ी। चूँकि अंग्रेज़ी के साथ सत्ता और पैसा है, इसलिए गरीबों और दलितों को लगने लगा है कि उनके बच्चों को अंग्रेज़ी पढ़नी है - जो सही है, पर हमें यह बात समझनी और समझानी है कि अंग्रेज़ी हम तभी सीख सकते हैं जब हमें अपनी ज़ुबान में महारत हासिल हो। कम से कम प्राथमिक स्तर तक तो अंग्रेज़ी पढ़ाने का कोई मतलब ही नहीं है और इसके बाद भी अंग्रेज़ी भाषा को एक विषय की तरह पढ़ाया जा सकता है, न कि इसे तालीम का माध्यम ही बना दिया जाए। इसके लिए जसम जैसे मंच को एक स्पष्ट नीति बनानी पड़ेगी। तकनीकी ज्ञान के लिए जहाँ ज़रूरी हो प्रचलित अंग्रेज़ी लफ्ज़ों का इस्तेमाल हो सकता है; कृत्रिम तत्सम शब्दों के इस्तेमाल से नुकसान ही हुआ है कि लोग अपनी ज़ुबानों में तकनीकी विषय पढ़ने से घबराने लगे हैं। तालीम के बारे में प्रेमचंद से लेकर इब्ने इंशा तक ने बहुत लिखा है। अंग्रेज़ी पढ़ने की आफत पर 'बड़े भैय्या' कहानी में प्रेमचंद ने क्या खूब कहा है - ‘... रात-दिन आँखें फोड़नी पड़ती है और ख़ून जलाना पड़ता है, तब कहीं यह विधा आती है। और आती क्या है, हाँ, कहने को आ जाती है। बड़े-बड़े विद्वान भी शुद्ध अंग्रेज़ी नहीं लिख सकते, बोलना तो दूर रहा। ...तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-द में वक़्त, गँवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो ही तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पड़े सड़ते रहोगे।' अपनी ज़ुबान क्या होती है, इसकी एक मिसाल हाल में ब्रिटिश संसद में बीस साल के उम्र की युवा सांसद माइरी ब्लैक के भाषण में है - जब वह युवा स्कॉट सांसद में बोल रही थी, लगता था कि पूरा स्कॉटलैंड बोल रहा है, उसकी आवाज में वह आग थी। ऐसे हिंदुस्तानी ज़ुबानों में इस तरह बोलने वाले सैंकड़ों बीस की उम्र के मिल जाएँगे, पर यहाँ जब कोई बड़ी उम्र का भी अंग्रेज़ी में बोलता है तो कितना खोखला लगता है। यह अजीब विड़ंबना है कि हमारे अंग्रेज़ीदाँ लोग अंग्रेज़ी में विमर्श करते हैं कि इंसान की अस्मिता में भाषा का महत्व क्या है। अंग्रेज़ी में एक दूसरे को समझाते हैं कि भाषा बड़ी चीज़ है। शिक्षा में बढ़ते निजीकरण का भी ज़बरन अंग्रेज़ी थोपे जाने के साथ सीधा रिश्ता है। इब्ने इंशा ने पचास साल पहले तालीम के निजीकरण पर व्यंग्य किया कि तू भी स्कूल खोल, ऊँची फीस ले और फिर और स्कूल खोल – और आज हम देख रहे हैं कि क्रमबद्ध ढंग से सरकारी स्कूल व्यवस्था को तबाह किया जा रहा है और निजीकरण को बढ़ाया जा रहा है। गैट्स नियमों के तहत उच्च-शिक्षा को विदेशी संस्थानों के लिए खोल दिया जा रहा है। जैसे स्कूलों को तबाह किया गया, वैसे ही विश्वविद्यालयों को तबाह किया जाएगा। सिर्फ पैसे वालों के लिए अंग्रेज़ी में दोयम दर्जे की ही सही वैश्विक पहुँच की तालीम होगी। बाकी लोगों को कामगार बनाया जाएगा ताकि वे संपन्न वर्गों के ऐशो-आराम के लिए मेहनत करते रहें। जब तालीम ही नहीं मिलेगी तो साहित्य क्या और संस्कृति क्या? वह तालीम भी क्या जो हमें अपनी ज़ुबान और रवायतों से दूर ले जाए। अपनी ज़ुबानों से कटकर हम धीरे-धीरे मनुष्य के रूप में खत्म होते जाएँगे। भविष्य में कभी इतिहासकार हमारे बारे में लिखेंगे कि ये भी कैसे लोग थे जिन्होंने अपनी ज़ुबानों को खत्म होने दिया, खुद को यूँ खत्म होने दिया। इसलिए तालीम की लड़ाई भी इस मंच की लड़ाई है। तालीम के निजीकरण के खिलाफ, सांप्रदायिकता के खिलाफ, हर तरह के भेदभाव के खिलाफ और अपनी ज़ुबान में मुफ्त तालीम के लिए मंच आवाज उठाए और शिक्षा अधिकार मंच के समर्थन में हल्ला बोले, यह हम चाहेंगे। मंच से जुड़े साथी संगठन 9 अगस्त को गैट्स में उच्च-शिक्षा को लाने के खिलाफ देशव्यापी मुहिम पर उतर रहे हैं, यह बड़ी खबर है।

ूसरी ज़रूरी बात वैज्ञानिक सोच के बारे में है। उन्नीसवीं सदी में यूरोप में तर्कशीलता और वैज्ञानिक सोच को लेकर समझ विकसित हुई। हमारे यहाँ लंबे समय तक इन दोनों बातों को एक माना गया। पिछले पचास वर्षों में यह समझ बनी कि तर्कशीलता कई तरह की हो सकती है। एक ही व्यक्ति अलग-अलग तर्कशीलताओं में जी सकता है। वह प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक तर्कशीलता दिखलाता है, घर परिवार में सामंती, कर्मकांडी तर्कशीलता के साथ जीता है। आज हम वैज्ञानिक तर्कशीलता को और बेहतर समझते हैं, हालाँकि इस पर भी कोई आखिरी समझ बनी हो, ऐसा हम नहीं कह सकते हैं। जो समझ आज है, वह सारी मार्क्सवादियों से नहीं आई है, पर सिर्फ इस वजह से हम उसे खारिज नहीं करेंगे। कोई सिद्धांत किन स्थितियों में ग़लत साबित हो सकता है, उसकी कल्पना कर पाना उस सिद्धांत के वैज्ञानिक कहलाने के लिए ज़रूरी है। वेद कुरान और दीगर धर्मग्रंथों में सारा आधुनिक ज्ञान मौजूद है, यह बात वैज्ञानिक इसलिए नहीं हो सकती कि हम इस तरह की आस्था को ग़लत कैसे प्रमाणित करें, इसका कोई उपाय नहीं है। आप कुछ भी कहें वे कहेंगे पुष्पक विमान से लेकर गणेश के सिर की सर्जरी सब कुछ इस या उस वेद में है। अगर आस्था किसी को सुकून देती है, हमें उससे क्या एतराज होगा, मार्क्स ने भी यही कहा था कि एक ऐसी दुनिया जहाँ दिल नहीं है, यानी संवेदनाएँ मर रही हैं, वहाँ धर्म संवेदनाओं भरा जिगर बन कर आता है, पर जब आस्था नफ़रत का सौदा करने वालों के हाथ सत्ता हथियाने का औजार बनती है, तो हमें इसका विरोध करना है। पर इसके लिए हमें यह समझ बनानी होगी कि क्या विज्ञान है और क्या नहीं है। विज्ञान और तकनोलोजी का आपस में संबंध क्या है। किस तरह विज्ञान का स्वरूप आज बदल रहा है। पिछली सदियों में विज्ञान का तरीका यह था कि जटिल बातों को हम टुकड़ों में बाँट कर समझें। यही अब समाज विज्ञान में भी दिखता है। इसकी अपनी सीमाएँ हैं। आज तकनोलोजी की मदद से विज्ञान की पद्धति पहसे से ज्यादा सर्वांगीण हो रही है। इन बातों को समझने और इन पर चर्चा के लिए के लिए हमारे पास जो भाषा होनी चाहिए थी, वह नहीं है, क्योंकि हमने लोगों की ज़ुबानों से शब्द न लेकर ज़बरन कृत्रिम संस्कृत के शब्द अपनाए। इस तरह हम अपने ही खिलाफ षड़यंत्र में शामिल हुए। आज हमारे पास विज्ञान की शब्दावली के लिए अंग्रेज़ी के अलावा कोई विकल्प नहीं है। हिंदी प्रदेशों में ही विरले ही ऐसे वैज्ञानिक मिलेंगे जो अपना शोध कार्य हिंदी में समझा सकें। इसलिए विज्ञान के संदर्भ में भी भाषा का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।

हम आप इन बातों को जानते थे कि मौजूदा सरकार के आने पर पोंगापंथियों को बढ़ावा मिलेगा, हर जगह ये अपने लोग बैठाएँगे, जो इतिहास भूगोल विज्ञान हर विषय को फिरकापरस्त नज़रों से देखते हैं। तो वैसा हो रहा है, आगे और भी होगा। इसलिए अब सभी तरक्कीपसंद लोगों को बड़े मंच पर इकट्ठे होने की ज़रूरत है। आपस में बहसें होती रहें, पर अगर आज वाम लोकतांत्रिक मंच बनाने में असफल रहा तो इतिहास हमें कभी मुआफ़ नहीं करेगा। एक सांस्कृतिक मंच के जिम्मे यह काम भी आता है कि हम भावनात्मक रूप से लोगों के साथ जुड़ें, सिर्फ सैद्धांतिक धरातल पर ही नहीं। मार्क्स ने भावनात्मक समझ पर बहुत जोर दिया था, धार्मिक आस्था पर उनका लिखा इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। यह एक कमजोरी हमें साफ दिखती है। हम एक खास तरह की तर्कशीलता में ऐसे उलझे हुए हैं कि हमें हाशिए में खड़े लोगों को जोड़ पाने में सफल नहीं रहे हैं। हमारे नेतृत्व में स्त्रियाँ कम होती हैं, दलित कम हैं। इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है। संज्ञान का एक पहलू भावनात्मक भी होता है।

सम का अधिकतर कार्यक्षेत्र हिंदी प्रदेशों में है। यहाँ के पढ़ने-लिखने वालों में, अलग-अलग मंचों पर बेकार की बहसें खूब चलती हैं। आजकल तो हर कोई दो-चार लाइनों में इंकलाब लाने को बेताब दिखता है। इस माहौल में सार्थक बहसें चलाना, लोगों को बेहतर समाज के लिए लामबंद करने में तरक्कीपसंद ताकतों के साथ मिलकर आगे बढ़ना चुनौतीपूर्ण काम है। बिहार के चुनावों में आप सब लोग जी-जान से जुटेंगे, मैं जानता हूँ। घर-घर तक स्वस्थ संस्कृति ले जाते हुए आम लोगों को सही राजनैतिक दिशा दिखलाने में आपका एक-एक पल समर्पित रहेगा, मुझे मालूम है। यह सोच पाना मुश्किल है कि कितने अन्यायों के खिलाफ मंच इस सम्मेलन में प्रस्ताव पारित करेगा - तीस्ता सीतलवाड़ के साथ जो हो रहा है और पूना में फिल्म इंस्टीटिउट पर थोपे गए जुधिष्ठिर चौहान और छात्रों को दी गई धमकी पर तो बात होगी ही। फिलहाल यहीं अपनी बात खत्म करते हुए मैं फिर एकबार सभी साथियों को सलाम और जोहर कहता हूँ।

Thursday, July 30, 2015

सच और झूठ



तीस्ता सीतलवाड़ का सच और झूठ पर खड़ी संघी राजनीति

संघ परिवार और भाजपा सरकार के अनेक कारनामों में से एक जुझारू सांप्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को बदनाम कर उसे लगातार परेशान करने का सिलसिला है। गुजरात सरकार ने तीस्ता सीतलवाड़ और उनके सबरंग प्रकाशन संस्थान पर ग़लत ढंग से विदेशी मुद्रा लेने और सार्वजनिक काम के लिए इकट्ठा किए गए चंदे का निजी खर्च के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। राज्य सरकार ने ऐन उस वक्त केंद्रीय गृह मंत्रालय को सी बी आई द्वारा जाँच के लिए कहा, जब गुजरात में 2002 के जनसंहार के कुछ दोषियों के खिलाफ तीस्ता और उसके सहयोगियों की अगुवाई में अदालत में लाए मामलों की सुनवाई अंतिम चरण पर आ पहुँची है। सी बी आई में लगातार गुजरात से लाए पुलिस अफसरों को ऊँचे पदों पर लाया गया है, इसलिए अचरज नहीं कि त्वरित कारवाई हुई और उनके घरों पर सी बी आई के छापे पड़े। गुजरात पुलिस ने मीडिया को बतलाया कि कैसे मदिरा, फास्ट फूड आदि पर पैसे खर्च किए गए हैं। तीस्ता और उनके पति जावेद आनंद पर लगाए ये आक्षेप बहुत पुराने हैं और निष्पक्ष जाँच से कुछ निकलने का होता तो साल भर पहले ही सामने आ गया होता। तीस्ता और जावेद सी बी आई और अन्य एजेंसीज़ को सारे कागज़ात दे चुके हैं, जिसमें विदेशी मुद्रा लेने के सारे विवरण हैं। यह भी कि गृह मंत्रालय और उनकी (तीस्ता की) समझ में फ़र्क है कि विदेशी मुद्रा लेने में उन्होंने अपराध किया है नहीं। सरकारी नियमों के अनुसार विदेशी संस्था से पैसे लेने के लिए विदेशी मुद्रा पंजीकरण नियम (FCRA registration) के मुताबिक नाम दर्ज़ करवाना पड़ता है। तीस्ता और जावेद का कहना है कि एफ सी आर ए नियमों के मुताबिक अगर यह पैसा कन्सल्टेंसी यानी सलाहकार के काम के लिए मिला है तो इसमें अनुमति की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसी बात को लेकर विवाद है - जिसकी निष्पत्ति अदालत में चल रही सुनवाई से हो सकती है। अभी तक कहीं इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि उनके अपराध की पुष्टि हो गई है। गुजरात पुलिस के बयानों पर यकीन करना मुश्किल है, क्योंकि पिछले दशकों में कई ऐसे मामले आए हैं, जहाँ उसकी भूमिका पर सवाल उठे हैं। कभी राज्य पुलिस का उच्चतम अधिकारी रह चुका शख्स अभी तक जेल में है, और एकाधिक ऊँचे पदों पर रह चुके अधिकारियों को ज़बरन निलंबित किया गया है। तीस्ता ने अपने तईं दस साल के खर्चे का पूरा हिसाब दिखलाया है, जिसमें दस साल में उनकी सैंतालीस लाख से जरा कम और जावेद की सवा अड़तीस लाख से जरा ज्यादा की तनख़ाह या मानदेय के अलावा हर खर्च की नामी अकाउंटेंट डी एम साठे समूह द्वारा बाकायदा ऑडिटिंग हुई है। तीस्ता और सहयोगियों द्वारा आयोजित गतिविधियों में देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी शामिल रहे हैं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व न्यायधीश व्ही आर कृष्णा अय्यर और पी बी सावंत जैसी विभूतियाँ शामिल रही हैं। इंसाफ और अम्न के लिए इकट्ठे हुए मुंबई के जिस सचेत नागरिक समूह की पहल से ये गतिविधियाँ शुरू हुई थीं, उनमें विजय तेंदुलकर जैसे जानेमाने साहित्य-संस्कृति कर्मी रहे हैं। तो क्या वे सभी लोग देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं? गौरतलब है कि इनमें से किसी ने भी तीस्ता पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया है। सबरंग की तरह ही अम्न और इंसाफ पसंद नागरिक गुट के खर्चों का भी नामी ऑडिटर्स हरिभक्ति कंपनी के द्वारा हर साल हिसाब रखा गया है। दोनों ऑडिटर्स ने पुलिस की अपराध शाखा को सूचना दी है कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं हुई है। उनको जो विदेशी मुद्रा की राशि मिली है, उससे कहीं गुना (बिना अतिशयोक्ति के, कम से कम हजार गुना ज्यादा) ज्यादा संघ परिवार के संगठनों को विदेशों से पैसा मिला है। क्या ऐसे संगठनों पर सी बी आई के छापे पड़े हैं? कभी किसी राज्य की पुलिस या खुफिया संस्थाओं ने इन संगठनों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं कहा, जबकि सांप्रदायिक हिंसा में पीड़ित लोगों के लिए की गई पहल और इस पर जागरुकता फैलाने को देश के लिए खतरनाक कहा जा रहा है। यह संभव है कि बहीखाते में पाई पाई का हिसाब न मिलता हो। पर उन्हें अपराधी मानना और जैसा कि सी बी आई के किसी अधिकारी ने कहा है कि वे देश की सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बिना किसी प्रमाण के ऐसी बातें कहते रहना हमारे समय में फासीवाद के बढ़ते शिकंजे की पहचान है।
देश की कई संस्थाएँ और संस्थान कई देशी-विदेशी संस्थाओं से सहायता लेने की कोशिश करते रहते हैं। तो क्या उन संस्थाओं में काम कर रहे हर किसी के घर पर सी बी आई का छापा पड़ेगा? क्या लाखों युवाओं के घर छापे पड़ेंगे जो ऐसी कंपनियों में काम करते हैं जिनका विदेशी मुद्रा में लेनदेन कितना कानूनी है कहना मुश्किल है। देश में शायद ही ऐसी कोई कंपनी होगी जो विदेशी मुद्रा में लेनदेन पूरी तरह से कानूनी ढंग से करती है। बात यह नहीं है कि उन सब की तरह तीस्ता को भी छोड़ दिया जाए। सवाल यह है कि ढंग से अदालती कार्रवाई कर दोषियों को सजा दी जा सकती है। गुलबर्ग सोसायटी, जहाँ 2002 में एहसान जाफरी समेत 69 लोगों का कत्ल हुआ था, वहाँ स्मारक बनाने के लिए सबरंग निधि ने 4.6 लाख रुपए इकट्ठे किए थे। तीस्ता पर यह इल्ज़ाम है कि इन पैसों का ग़लत उपयोग हुआ है। सच यह है कि ज़मीन की कीमतें हद से ज्यादा बढ़ जाने की वजह से स्मारक बन नहीं पाया और सारे पैसे निधि के बैंक खाते में जमा हैं। अगर सचमुच कोई घोटाला है तो जाँच कर दोषियों को सजा दी जाए, पर हर दिन सी बी आई के द्वारा बुलाया जाना और एक ही सवाल बार बार पूछे जाना, इसका मतलब क्या है? तीस्ता के खिलाफ जो माहौल तैयार किया जा रहा है, वह एक षड़यंत्र है, ताकि गुजरात में हुई हत्याओं के जिन मामलों को, खास तौर पर गुलबर्ग सोसायटी के जिन मामलों को वे अदालत में ले आई हैं, उनसे जुड़े गवाहों में और न्यायाधीशों में ऐसा ख़ौफ़ पैदा कर दिया जाए कि ये मामले कभी अपनी सही परिणति पर न पहुँच पाएँ और पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाए। यू एन ओ के भूतपूर्व मानव अधिकार मामलों के कमिश्नर जज नवी पिल्लै ने चिंता प्रकट की है कि सरकारें मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को राष्ट्रविरोधी करार देती हैं। अगर विदेशी पैसे की समस्या है तो इसका हल यही है कि मानव अधिकार संस्थाओं को सरकार द्वारा आर्थिक मदद मुहैया करवाई जाए।

भाजपा के सत्तासीन होने के बाद से संघ परिवार के कई ग़लत कारनामों के बावजूद देश में संघ और सरकार के समर्थकों की कमी नहीं है। वे सभी इस वक्त तीस्ता को बदनाम करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। देश की आम जनता के खिलाफ काम कर रही सरकार को विकास का रहनुमा कहने वाले इन लोगों को पता है कि अस्सी साल पहले जर्मनी में हिटलर की सरकार ने जितनी तेजी से तकनीकी तरक्की लाई थी, उसकी तुलना में यह सरकार बहुत पीछे है। सौ साल पहले का हो, या पिछले दो दशकों का, इतिहास हमारे सामने खुली किताब बन मौजूद है। एक ज़माने में सारी जर्मन क़ौम को हिटलर पसंद था। उनकी संतानें आज तक इस बात को समझ नहीं पा रही हैं कि ऐसा कैसे हुआ।
कई लोग तीस्ता पर लगे इल्ज़ामों का जिक्र करते हुए दुहाई देते हैं कि सवाल उठाना ही लोकतंत्र की निशानी है। बात सही है। पर कौन नहीं जानता है कि सवाल उठाने की वजह से ही तीस्ता को तंग किया जा रहा है। निरपेक्षता का दावा करना, खास तौर पर ऐसे विवादों में जहां एक पार्टी खुलेआम सांप्रदायिक हो और जिसके बारे में साफ तौर पर पता हो कि वे हिंसा की राजनीति करते हैं और निर्दोषों का कत्ल करवाते रहे हों, ऐसा दावा एक राजनैतिक पक्षधरता है। मौजूदा सरकार और संघ परिवार के अधीन हर एजेंसी की पहली रणनीति हिटलर के सूचना अधिकारी गोएबेल्स की तरह जोर-शोर से झूठी बातें फैला कर झूठ को सच में बदलने की कोशिश होती है। यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि तीस्ता के खिलाफ इल्ज़ाम उस गुजरात पुलिस ने लगाए हैं, जो बुरी तरह बदनाम है।

यह संभव है कि गुजरात पुलिस की सारी बातें सच हों, पर जब तक वे प्रमाणित न हों, उन्हें सच मान लेना और दूसरे पक्ष को निश्चित रूप से दोषी ठहराना लोकतांत्रिक नहीं कहला सकता। काश कि हम कह पाते कि तीस्ता पर उठाए इल्ज़ामों को दुहराने वाले लोग लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत कर रहे हैं। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि वे एक जनविरोधी सत्ता के समर्थन में बड़ी सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। जिस तरह से सी बी आई और एन आई ए आदि जाँच संस्थाओं का इस्तेमाल सत्तासीन राजनैतिक दल के हितों की रक्षा के लिए होने लगा है, अगर तीस्ता को जेल हो भी जाती है, फिर भी सवाल तो रह जाएँगे, पर अदालत की राय आने के पहले ही गुजरात पुलिस के बयानों के आधार पर उन्हें दोषी ठहराया जाना बीमार मानसिकता ही दर्शाता है। तीस्ता ने बार बार इन आरोपों का खंडन करते हुए लोगों तक जानकारी पहुँचाने की कोशिश की है। यह जानकारी भी सार्वजनिक है। हम किस जानकारी को क्यों याद रखते हैं, और किसको भूल जाते हैं, यह हमारी राजनैतिक पक्षधरता को दिखलाता है। जब पढ़े-लिखे लोग इस तरह शासक वर्गों के समर्थन में आग्रह के साथ खड़े होने लगते हैं, तो यह फासीवाद को जन्म देता है। कई लोगों को चिढ़ होती है कि 1984 या 2002 की घटनाओं पर कब तक बात होती रहेगी। अव्वल तो न्याय की गुहार तो तब तक उठती रहेगी जब तक न्याय मिलता नहीं है, पर ज्यादा गंभीर बात यह है कि इतिहास को, खास तौर पर निर्दोषों के साथ हुए ज़ुल्मों को इसलिए बार-बार याद करना पड़ता है कि वैसी स्थितियाँ दुबारा न आ पाएँ। अतीत के अन्यायों को छिपाना देश का गौरव बढ़ाता नहीं है, बल्कि उन्हें याद कर यह सुनिश्चित करना कि भविष्य में फिर कभी ज़ुल्म न ढाए जाएँ, यही सभ्यता और गर्व की बात है। अगर हमें अपने अंदर पूरी तरह इंसानियत को बसाना है तो हमें दूसरों के दर्द को समझना पड़ेगा और इंसानियत पर कहर ढाने वालों को सजा देने के लिए आवाज़ उठानी पड़ेगी, चाहे वे कितने भी ताकतवर क्यों न हों। तीस्ता की लड़ाई इसी संघर्ष का हिस्सा है।

Saturday, July 25, 2015

अँधेरे की इस परत को चीरना होगा


तेज़ी से बिगड़ते देश के हालात और नागरिकों की जिम्मेदारी

इस लेखक जैसे कई लोगों ने पिछले साल संसद के चुनावों के पहले अलग-अलग माध्यमों से यह चिंता जाहिर की थी कि देश में सांप्रदायिक सोच बड़ी तेज़ी से फैल रही है। हर समुदाय में सांप्रदायिकता बढ़ती दिख रही थी और सबसे अधिक चिंता की बात थी कि बहुसंख्यक समुदाय में बढ़ती सांप्रदायिकता का फायदा उठा कर स्थानीय और विदेशी सरमाएदार तैयार हो रहे थे कि खुली लूट का मौसम आने को है। इसके लिए उन्होंने विपुल परिमाण धन देश की सबसे संगठित, संघ परिवार के छत्र तले फल फूल रही राजनैतिक ताकतों पर निवेश किया, जिनकी दृष्टि और सोच उन्नीसवीं सदी के यूरोपी क़ौमी राष्ट्रवाद की संकीर्णता में सीमित है। इन ताकतों ने बड़े पैमाने पर नफ़रत फैलाते हुए भाजपा के झंडे तले सत्ता हासिल की और उम्मीद से भी ज्यादा रफ्तार से अपने एजंडे पर काम करना शुरू किया। चुनावों के पहले भाजपा के हिंदुत्ववादी रुझान के बारे में हर कोई वाकिफ था, फिर भी जैसे खुद को भरमाने के लिए कई लोग विकास का बहाना ढूँढते रहे। अस्सी के दशक के अंत में जब उत्तर भारत में अयोध्या में मंदिर बनाने के लिए कार सेवा और इसके लिए शिला पूजन के नाम पर कई इलाकों में 'हिंदुस्तान में रहना है तो हिंदू होकर रहना होगा' जैसे नारे उठे, जिसकी परिणति 1992 में बाबरी मस्जिद के टूटने में हुई, तब से लेकर गुजरात के दंगों तक और तमाम और घटनाओं के बाद भी अगर किसी को कोई शक रह गया हो कि भाजपा और संघ परिवार का एजेंडा क्या है, तो हम उसकी मानसिक स्थिति पर अफसोस ही जता सकते हैं। कइयों ने यह कहना शुरू किया कि कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार को गिराने के लिए और कोेई विकल्प नहीं है। बड़े सुनियोजित ढंग से मीडिया में यह बात बार बार कही गई कि वाम खत्म हो चुका है, हालाँकि हर तरह के बिखराव के बावजूद देश भर में बराबरी के आधार पर समाज रचने की जद्दोजहद वामपंथी ताकतों के ही नेतृत्व में ही चलती रही है। ज़मीनी स्तर पर अधिकारों के लिए लड़ाई कहीं साम्यवादी और कहीं समाजवादी नेतृत्व में ही लड़ी जा रही है।

आज स्थिति यह है कि लोकतांत्रिक ढाँचे को रौंदते हुए हर तरह के ऐसे पोंगापंथी लोग हावी होते जा रहे हैं, जिनको दस पंद्रह साल पहले कोई सुनने को भी तैयार न होता। कहीं किसी का कत्ल हो रहा है, जैसे पानसारे की हत्या हुई, कहीं स्त्रियों पर सोशल मीडिया में संघ के समर्थक अश्लील भाषा में हमला करते हैं; उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर जिस असभ्य तरीके से हमला हुआ - स्वाभाविक हालात में अव्वल तो ऐसी बातें खबरें बनती ही नहीं, इनको पागलों का प्रलाप मान लिया जाता। अगर बात फैलती भी तो लोग पूछते कि यह कैसे हो सकता है, इन बेवकूफों को पुलिस क्यों नहीं पकड़ती? पर ऐसा हर रोज होते जा रहा है कि कोई संघी ऐसी ऊल-जलूल हरकत करता है और उस पर राष्ट्रीय स्तर पर बातचीत होती है जैसे कि देश और समाज के पास इन सिरफिरों पर ध्यान देने के अलावा कुछ और ज़रूरी विषय नहीं है। एक ओर तो संघ और गुजरात से जुड़े भ्रष्ट और नागरिकों पर हिंसा के लिए अभियुक्त लोगों की सजा मुआफ़ी हो रही है तो दूसरी ओर तीस्ता सीतलवाड़ को इस तरह परेशान किया जा रहा है जैसे पहले कभी आज़ाद भारत के इतिहास में नहीं हुआ। अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़े मानव अधिकार और पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े कार्यकर्ताओं को परेशान किया जा रहा है। जरा सा भी सरकार या संघ परिवार की ज्यादतियों के खिलाफ कोई कुछ कह रहा है तो उसे परेशान किया जा रहा है। अगर कोई विदेशी शोधकर्ता है तो उसका वीज़ा रद कर दिया जाता है। धौंस जमाने और हिंसा की संस्कृति को बढ़ाया जा रहा है। राष्ट्रीय संस्थानों में सारी की सारी निर्देशक मंडली को हटा कर अयोग्य और संकीर्ण सोच के लोगों को लाया जा रहा है, जैसे पूना के फिल्म इंस्टीटिउट, या भारतीय इतिहास शोध परिषद या एन सी ई आर टी और कई विश्वविद्यालयों में हो रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म प्रशिक्षण संस्थान में सलाहकार मंडली में ऐसे लोगों को डालना जिन्होंने फिल्म को कला की तरह जाना ही नहीं है, किसी ने अश्लील फिल्मों में काम किया है तो कोई प्रोपागंडा फिल्में बनाता रहा है, यह किस दर्जे का घटियापन है! संघ के लोग जब जो मर्जी कह रहे हैं - सारे आई आई टी संस्थान हिंदू विरोधी घोषित किए गए हैं, आई आई एम संस्थानों के प्रबंधन में वाम समर्थकों का प्रभाव है - सुन कर एकबारगी लगता है कि ऐसी हास्यास्पद बात खबर बनती कैसे है! जिन बातों पर पचास साल पहले लोग हँसते थे- गणेश और सर्जरी, वैमानिकी शास्त्र, ऐसी तमाम कपोल कल्पनाएँ इक्कीसवीं सदी के भारत की मुख्य खबरें होती हैं। राष्ट्र के नेता ऐसे हों जो सीना चौड़ा कर अपने अज्ञान और अंधविश्वासों को बखानते हों तो देश का क्या होगा? प्रधानमंत्री कभी साक्षात्कारों में कह चुके हैं कि उन्होंने कालेज का दरवाजा खटखटाया नहीं है। सारी शिक्षा दूर संचार से पाई है। यह इस घमंड का ही नतीज़ा है कि पूना फिल्म संस्थान में छात्रों की हड़ताल खिंचती चली जा रही है। ऐसा लगता है कि अधकचरी पढ़ाई किए कुछ लोग पढ़े-लिखे लोगों पर खार खाए बैठे हैं और अपनी ताकत दिखाने को लगे हैं। हर दिन कोई ऐसी नई ऊटपटाँग बात सामने आती है, जिसे समझ पाना मुश्किल है। पर आज इन बातों को हम हँसी में नहीं उड़ा सकते हैं। आज इनको गंभीरता से लने की वजह सिर्फ यह नहीं है कि बड़ी तेजी से यह भगवाकरण हो रहा है, बल्कि गंभीर समस्या यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद देश का पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग शांत है, संभवत: मध्य-वर्ग का बड़ा हिस्सा पूरी तरह से सांप्रदायिक सोच में दबा है। एक अजीब सी बीमारी चारों ओर फैली दिखती है, जिसमें पता नहीं किन हीन भावनाओं की अभिव्यक्ति आक्रामक पोंगापंथी प्रवृत्तियाँ बन कर आ रही है। क्या यह दुनिया के स्तर पर कुछ बातों में पिछड़े होने की वजह से है कि हमें यह साबित करना है कि हम हमेशा महान थे या कि यह नवउदारवादी बहुराष्ट्रीय षड़यंत्र है, जिसमें देशी पूँजीपति खुल कर साझेदारी कर रहे हैं, ऐसे कई सवाल हमारे सामने हैं। लब्बोलुबाब यह कि ऐसी ताकतों से हमारा पाला पड़ा है जो इस देश को तबाह करने को आमादा हैं और इन ताकतों को रोकने के लिए वाम के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिख रहा है।

किसी भी समझदार आदमी को यह मालूम है कि मौजूदा सरकार एक सामूहिक उन्माद के कंधे पर चढ़कर नवउदारवादी आर्थिक शोषण के लिए काम कर रही है। आम लोगों के हित के लिए यह सरकार कुछ नहीं करेगी, उल्टा हर क्षेत्र में आम लोगों का अहित हो रहा है। स्वास्थ्य बजट में कटौती की गई है। सरकारी स्कूल बड़ी तादाद में बंद किए जा रहे हैं। उच्च शिक्षा को भी गैट्स के समझौतों के अंतर्गत विदेशी संस्थानों के लिए खोल दिया जा रहा है। और जिस तरह सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों को तबाह किया गया है, उसी तरह विश्वविद्यालयों को तबाह किया जाएगा। बिना सोचे समझे, बहस विमर्श को धत्ता बतलाते हुए नई शिक्षा नीतियाँ लागू की जा रही हैं। पिछली सरकार ने गाँव के गरीबों का भला करने के लिए मनरेगा स्कीम चलाई थी, उसमें बड़ी कटौती कर दी गई है। बिहार में विधानसभा चुनावों के पहले क्या कुछ होने वाला है, उसकी आशंका चारों ओर है - कितने दंगे करवाए जाएँगे, क्या पाकिस्तान के साथ कोई जंग शुरू हो जाएगी, कुछ भी हो सकता है! लोगों को किसी तरह बुनियादी हकों की लड़ाई से हटाकर फिरकापरस्त और जातिवादी सोच में जकड़ने की पूरी कोशिश की जाएगी। इस सरकार के लिए कुछ भी संभव है! संघ परिवार ने तो बिहार में जी-जान से लड़ाई लड़नी ही है। आखिर राज्यसभा में बहुमत के लिए अभी एक दो राज्य हाथ में आने ज़रूरी हैं। लोकसभा और राज्यसभा दोनों में बहुमत मिलने पर संविधान बदलने की प्रक्रिया शुरू होगी। भारत के संविधान में बराबरी और न्याय के जो दूरगामी प्रावधान हैं, ये लोग उनको हटाकर कठमुल्लापंथी और मनुवादी व्यवस्था लाने को पूरी ताकत से जुट गए हैं। हो सकता है कि मध्य-वर्ग में ऐसा उदासीन तबका है, जिसे इस बात की समझ हो तो वह जाग उठे। आज देश के हर नागरिक को यह खतरा समझाने की जिम्मेदारी लोकतांत्रिक ताकतों की है। यह हँसी मजाक का मामला नहीं रह गया है। जहाँ तक आम लोगों की बात है, वे ग़रीब हैं, पर नासमझ नहीं हैं। यह झूठ कि भ्रष्ट और सांप्रदायिक ताकतों का विकल्प नहीं है, इसके खिलाफ उन्हें लामबंद करना होगा। अगर कहीं तरक्कीपसंद ताकतें कमजोर भी हों तो भी लोगों को संगठित होकर अपने में से किसी भले आदमी को चुनना चाहिए न कि लुटेरों और हत्यारों को।

इसलिए यह बात महत्वपूर्ण हो गई है कि बिक चुकी मीडिया और देशी-विदेशी पूँजी की भयावह ताकतों के आगे लोकतांत्रिक ताकतें किस तरह खड़ी होती हैं। आम लोग देख रहे हैं कि क्या वाम ताकतें इतिहास को सामने नहीं रखकर वर्तमान की लड़ाई लड़ेंगी? अतीत को भूलना नहीं चाहिए, सही ग़लत ऐतिहासिक घटनाओं पर बहस और विमर्श होते रहना चाहिए, पर पचास साल पहले के विवादों में उलझे रहकर वाम ताकतें अपनी ऐतिहासिक भूमिका को बार बार नकारती रही हैं। देश भर में जहाँ भी संगठित विरोध होता है, वहाँ जनता वाम के नेतृत्व में भरोसा करती है, पर चुनावों में सांगठनिक मतभेदों से ऊपर उठकर जनता की आशाओं को सफल बनाने में वाम ताकतें असफल रह जाती हैं। विड़ंबना यह है कि बड़े वामपंथी दल भ्रष्ट राजनैतिक ताकतों के साथ तो समझौता करते रहे हैं, पर कम ताकत वाले वाम संगठनों के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार किए रखते हैं। ऐसी स्थिति में बिहार में वाम दलों के गठबंधन ने लोकतांत्रिक ताकतों में आशा जगाई है कि बेहतर भविष्य का सपना सार्थक हो सकता है। इस गठबंधन को और व्यापक और लोकतांत्रिक होना होगा। थोड़े ही समय में देश भर में, खास तौर पर उत्तर भारत के राजनैतिक परिदृश्य में अंधकार युग आ चुका है। अँधेरे की इस परत को चीरकर रोशनी लाने के लिए हर सचेत नागरिक को सक्रिय होना होगा।

Monday, July 13, 2015

शासन-प्रणाली के खिलाफ आवाज़ उठाएँ, विज्ञान के खिलाफ नहीं



(आशीष नंदी: ग़फलत-में-सुकून का उल्लास  
- आशीष लाहिड़ी का लेख: पिछली किश्त से आगे)


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बहुलतावाद, विज्ञान और तरक्की



जो राष्ट्र-राज्य को लोकसमाज को तबाह करती भयंकर आफत करार देना 

चाहते हैं, वे साथ ही 'पश्चिमी विज्ञान' के बारे में भी नापसंदगी पालते हैं। पर  

'पश्चिमी विज्ञान' कथन का कोई मतलब नहीं होता। जोसेफ नीडहैम ने 

दिखलाया है कि विज्ञान ऐसी एक हरकत है जो सात घाट का पानी पिए बिना 

बचता नहीं है। इसलिए वे 'एक्यूमेनिकल (विश्वप्रसारी) साइंस' मुहावरा 

इस्तेमाल करते थे। अमर्त्य ने भी नीडहैम से प्राभावित होकर लिखा है

'दरअसल जिसे 'पश्चिमी' विज्ञान और प्रौद्योगिकी कहा जाता है, उसका बहुत 

बड़ा हिस्सा कई घाटों के पानी से सिंचा बढ़ा था - भारत की गणितविद्या उनमें 

मुख्य है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह अरब लोगों के हाथ होते हुए पश्चिम में पहुँची थी।'4


आशीषबाबू ने भी प्रचलित 'पश्चिमी' विज्ञान का विरोध कर उसके बाहर 'अन्य 

विज्ञान' की विरासत ढूँढी है। इस खोज में लगने पर कहीं कोई उन पर भारतीय 

संस्कृति के 'रोमांटिक आवाहन' का दोष लगा न दे, इसलिए भूमिका में ही 

उन्होंने राग अलापा है कि 'एनलाइटेनमेंट (प्रबोधन) के वक्त आधुनिक विज्ञान 

की शुरूआत के बारे में किसी भी इतिहास चर्चा में ग्रीक कल्चर में लौटने का 

रिवाज है; कहाँ, उनके खिलाफ तो कोई कभी 'चर्चा को रूमानी करने का'  

इल्ज़ाम नहीं लगाता है।' वैसे वे 'सब बेद में बा' पार्टी के सदस्य नहीं हैं, वह 

शुरू में ही साफ तरीके से समझा देते हैं। साथ ही उनका कहना है, विज्ञान 

और तर्कशीलता के बारे में प्रतिष्ठित 'पश्चिमी' पैराडाइम के बाहर दूसरे 

पैराडाइमों की भी जाँच करना बहुत ज़रूरी है - यह खास तौर पर इस वजह से 

ज़रूरी है कि आधुनिक विज्ञान की तथाकथित जययात्रा के हर कदम पर अनेक 

चट्टानें आती हैं, यहाँ तक कि उनमें से कइयों पर तो खून के धब्बे हैं (पैराडाइम 

– ज्ञान की किसी विधा में विद्वानों द्वारा स्वीकृत मान्यताओं, धारणाओं, मूल्यों, नज़रिए आदि का विशेष समूह -अनु.)। 

यह जाँच कर देखना ज़रूरी है कि सैद्धांतिक पैराडाइम क्या विज्ञान के अंदरूनी 

ढाँचे से स्वत:चालित प्रक्रियाओं में बनते गए हैं या सत्तासीन वर्गों की सुविधाओं 

के अनुसार विचारों को 'वैज्ञानिक' विचार मानकर निरंकुश कह कर उनका 

प्रचार किया गया है। कहना गैरज़रूरी है कि इस सवाल के जवाब ढूँढने का 

सबसे आसान तरीका यह है कि प्रतिष्ठित पैराडाइमों के विपरीत दूसरे 

पैराडाइमों को तयशुदा ऐतिहासिक धरातल पर रख कर तुलना की जाए। 

आशीषबाबू ने अपनी किताब में यही काम किया है। इस काम का परिणाम क्या 

हुआ, इस पर चर्चा करने के पहले बिल्कुल सहज तरीके से एकबार हम देखें कि ' 

आधुनिक विज्ञान' और 'तरक्की' में अंतरंगता पर हमारे विचार कैसे विकसित 

हुए हैं।


वैश्विक (एक्यूमेनिकल) विज्ञान के सात घाटों का पानी पीकर विकसित होने 
के बावजूद यह बात सही है कि सत्रहवीं सदी के बाद वह मुख्यत: यूरोप में ही 

केंद्रीभूत हुआ था (जैसे आजकल काफी हद तक अमेरिका में केंद्रीभूत हुआ 

है)। इसलिए इस विज्ञान पर यूरोपी समाज, यूरोप के विभिन्न दर्शन और यूरोपी 

राजनीति (उपनिवेशवाद जिसका प्रधान हिस्सा रहा है) का गहरा प्रभाव रहा 

है। न्यूटन के दोस्त और अनुयायी दार्शनिक जॉन लॉक ने कानून के शासन का 

स्वागत किया था - एक ओर न्यूटन के वैज्ञानिक सिद्धांत थे, दूसरी ओर थे 

ब्रिटेन में 1688 में संवैधानिक क्रांति के जरिए प्रतिष्ठित दीवानी (सिविल)  

कानून के नियम। ये नियम आगे बढ़ चलते बुर्ज़ुआ समाज के नियम हैं। 

एनलाइटेनमेंट युग के बाद से ही विज्ञान और प्रगति पर्याय बन गए। यह प्रगति 

बुर्ज़ुआ वर्गों की प्रगति है। आँसीक्लोपेदी (encyclope`dic) समूह के 

चिंतकों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी को हर तरह के पिछड़ेपन की दवा मान 

लिया था। मार्क्स ने इसे और आगे बढ़ाया और इसे क्रांतिकारी अर्थ दिया। 

मार्क्स बुर्ज़ुआ क्रांतिकारियों के परवर्ती मनीषी थे। मार्क्स को याद करते हुए 

कार्ल लीबनेख्ट ने 1850 के दशक में विज्ञान और समाज के आपसी संबंध 

पर मार्क्स के दृष्टिकोण पर लिखा है (कार्ल लीबनेख्ट (1871-1919) – जर्मन समाजवादी जिन्होंने रोज़ा लक्सेमबर्ग के साथ जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की - अनु.):


थोड़ी देर में ही हम कुदरत संबंधी विभिन्न वैज्ञानिक विषयों पर चर्चा करने लगे।  

... यूरोप की तब की विजयी प्रतिक्रियाशील ताकतें सोचती थीं कि वे क्रांति का 

गला घोंटकर पूरी तरह खात्मा करने में सफल हो गई हैं। उनके इस दिवास्वप्न 

पर व्यंग्य करते हुए मार्क्स ने कहा, 'वे समझ नहीं पा रहे कि प्रकृति विज्ञान 

फिर नई क्रांति को घनीभूत कर रहा है। जिस महामहिम भाप ने पिछली  

(अठारहवीं) सदी में धरती में उथल-पुथल ला दी थी, अब उसके राज के 

बारह बज गए; उसकी जगह बिजली ने ले ली है, जिसकी क्रांतिकारी क्षमता में 

बढ़त को मापा नहीं जा सकता।


ऐसा कहकर मार्क्स ने असाधारण जोश के साथ मुझे बतलाया कि कुछ दिनों 

से रीजेंट स्ट्रीट में बिजली चालित इंजिन के छोटे माडल की प्रदर्शनी लगी है 

और उससे छोटी रेलगाड़ी खींचने का काम लिया जा रहा है। ...


आत्महंता दृष्टिहीनता की वजह से बुर्ज़ुआ समाज आधुनिक समय के इस ट्रॉय 

के घोड़े को प्राचीन ट्रॉयवासियों की तरह ही जोश के साथ खींच लाए हैं, पर 

यही उनके निश्चित विनाश का कारण भी होगा।

(ट्रॉय का घोड़ा - होमर के महाकाव्य 'ओडिसी' और वर्जिल की कविता 'ईनिड' में लिखे मिथक के अनुसार ट्रॉय पर जीत हासिल करने के लिए ग्रीकसिपाहियों ने लकड़ी का घोड़ा बनाया, जिसे ट्रॉय के सिपाही अपनी दीवारों के 
अंदर ले आए तो घोड़े में छिपे सिपाहियों ने निकल कर वहाँ तबाही मचा दी और ग्रीक जंग जीत गए- अनु.)


सूत्र साफ है: प्रकृति विज्ञान में क्रांति हो रही है, होती रहेगी और वह क्रांति 

प्रौद्योगिकी के जरिए समाज को बदलने का हथियार बन जाएगी। समाज में यह 

बदलाव मजदूर वर्ग लाएगा। बुर्ज़ुआओं ने विज्ञान रचा, पर वही विज्ञान मजदूरों 

का शस्त्र बन जाएगा। इसी शस्त्र का इस्तेमाल कर वे बुर्ज़ुआ समाज का पतन 

लाएँगे। स्वाभाविक रूप से विज्ञान मेहनती इंसान का स्वार्थ पूरा करेगा, निहित 

स्वार्थों का विरोध करेगा। जो केवल बुर्ज़ुआ वर्ग की प्रगति थी, वह मजदूर वर्ग 

के हाथों इंसान की तरक्की हो जाएगी - यही उम्मीद थी।


समाजवाद = सोवियत शासन = बिजली की राहें, इस सूत्र के साथ लेनिन ने 

भी तकरीबन यही बात कही है। वर्ष 1939 में 'सोशल फंक्शन ऑफ साइंस  

(विज्ञान की सामाजिक भूमिका)' – में बर्नाल ने यह बात भी कही थी कि 'In 

its endeavour, science is socialism (अपनी कोशिशों में विज्ञान 

समाजवाद है)'। भारत जैसे औपनिवेशिक देश के लोगों की विज्ञान आधारित 

प्रौद्योगिकी के बिना मुक्ति संभव नहीं है, साफ शब्दों में मेघनाद साहा ने ऐसा 

कहा (मेघनाद साहा - 20वीं सदी के विश्व-विख्यात भारतीय वैज्ञानिक – 

अनु.)1959 साल में द टू कल्चर्स किताब में स्नो ने आँकड़ों के द्वारा 

दिखलाया कि सोवियत राष्ट् ने विज्ञान शिक्षा को कितना महत्व दिया और और 


इस वजह से उसकी अग्रगति में कैसी तेजी आई है। 1957 के स्पुटनिक ने 

चौंधियाते ढंग से दुनिया के लोगों से सामने इस बात को पेश किया। स्पुटनिक 

की सबसे बड़ी चोट अमेरिका के महाकाश शोध पर नहीं, उनकी शिक्षा 

व्यवस्था पर पड़ी। तैयारी की भेड़ियाँ बजने लगीं। बिल्कु स्कूली स्तर स ही 

विज्ञान को नए साज में ढालने की योजनाएँ बनीं। यानी कि हर तरक्की की जड़ 

में विज्ञान है, बुर्ज़ुआ और मजदूर, हर वर्ग ने बिना फर्क इस बात को मान 

लिया। शीतयुद्ध का एक पैमाना यह भी बना - विज्ञान में कौन कितना आगे है। 

विज्ञान को ही प्रगति का पैमाना माना गया।


पर इसी के साथ-साथ दूसरे आलमी जंग के दिनों से ही (जिसे कभी 'भौतिक 

विज्ञानियों की जंग' कहा जाता था) सुर टूटना शुरू हो गया था। ऐटम बम का 

आतंक और उसके साथ अग्रणी वैज्ञनिकों का अंतरंग संबंध कइयों की आँखें 

खोल रहा था। जनरल आइज़नहावर ने जिस 'मिलिटरी इंडस्ट्रियल- 

सायंटिफिक' कांप्लेक्स की बात की थी, उसके सबको निगल डालने वाले 

तरीके संवेदनशील लोगों के सामने लगातार खुलते जा रहे थे। विज्ञान से, खास 

तौर पर सभी विज्ञानों की रानी भौतिक शास्त्र से जिस बुनियादी समझ 

विकसित होने की अपेक्षा थी, वह कहाँ तक पूरी हो पाएगी, इस बारे में शंका 

बढ़ती जी रही थी। भौतिक विज्ञान के सभी निष्कर्ष आखिर जंग के मैदान तक 

पहुँच जाते है, यह देखकर कई भौतिकविज्ञानी अपराध बोध में दबे भौतिक 

विज्ञान का काम छोड़ कर आणविक जैवविज्ञान के क्षेत्र में चले आए। क्रिक 

और वाटसन की क्रांतिकारी खोज के जरिए जीवविज्ञान के भी आखिर एग्ज़ैक्ट 

साइंस के दायरे में आ जाने से एक ओर समझ की दुनिया में कुहरा कम हुआ,  

दूसरी ओर इसी जीवविज्ञान के नैतिकता की दृष्टि से खतरनाक होने की 

संभावना बढ़ गई  (फ्रांसिस क्रिक (1916–2004) और जेम्स वाटसन  (1928–जीवित) – डी एन ए की 

द्वि-हेलिकीय संरचना की खोज करने वाले वैज्ञानिक – अनु.)। 

हाल में इंसान की क्लोनिंग पर हुए विवाद के बहुत पहले ही बीसवीं सदी के 

सत्तर के दशक में जोसेफ नीडहैम ने बड़े विस्तार से इस पर चर्चा की थी। कुल 

मिलाकर विज्ञान = प्रगति, इस सूत्र से सुकून मिलना संभव नहीं रहा। इंसान 

को और दीगर कामकाज की तरह विज्ञान भी किस वर्ग के स्वार्थ में किस काम 

आता है, उसे देखकर ही इस बारे में सही-ग़लत की राय लेनी चाहिए, यह 

विचार बढ़ता चला। विज्ञान में तरक्की के बावजूद सोविय राष्ट् की ताकत में 

कमी आने और साम्राज्यवादी अमेरिका के शासक वर्गों के पैरों पर कुछ 

वैज्ञानिकों के लंबलेट आत्म-समर्पण ने (जिसके सबसे मूर्त रूप एडवर्ड टेलर 

थे) इस धारणा को मजबूत किया। कइयों ने कहना शुरू किया कि संस्थागत 

विज्ञान की जो प्रतिष्ठा और महत्व है, शासकवर्गों के लिए इसकी उपयोगिता ही 

उसकी जड़ है। इस नज़रिए से प्राक्-विज्ञान जमाने के संस्थागत धर्म में और 

विज्ञान की भूमिका में कोई फर्क नहीं है।


ाल की नवउदारवादी अर्थव्यवस्था की जड़ें मजबूत होने के बाद, जिसका 

बाजारी वाहन वैश्वीकरण है, बाकी हर कुछ की तरह विज्ञान भी खुले आम 

संयुक्त राज्य अमेरिका के साम्राज्यवादी स्वार्थ-साधन का अंग बन गया। अब 

विज्ञान सत्य की खोज का रास्ता नहीं रहा। अब विज्ञान साफ तौर पर 

साम्राजयवादी ताकतों के सामरिक, राजनैतिक और र्थिक एकाधिपत्य को 

बनाए रखने का माध्यम है।


इसलिए सवाल उठता है कि विज्ञान को दीगर इंसानी कामकाज से अलग 

किसी निर्णायक भूमिका का महत्व क्यों दें? इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या 

विज्ञान की संरचना में ऐसा कुछ है जो स्वभावत: शासक-वर्गों के हित में है,  

या फिर शासक वर्गों की स्वार्थ-सिद्धि में नियोजित उसका यह रूप उसके 

स्वाभाविक स्वरूप का अपवाद है?


जंगली फ्रॉयड?

अब हम देखें कि नंदी जी इस सवाल के कौन से जवाब कैसे ढूँढते हैं। उन्होंने 

इस सवाल पर दोतरफा हमला किया है। एक तो फ्रॉयड के 'पश्चिमी' सिद्धांत 

के साथ गिरीन्द्रशेखर बसु के 'पूरबी' विचारों की मुठभेड़ है। दूसरा, भारत में 

उपनिवेशवाद के साथ लागू हुई आधुनिक चिकित्सा-पद्धति के साथ देसी 

चिकित्सा-पद्धति की मुठभेड़ है।


फ्रॉयड के सिद्धांतों के साथ गिरीन्द्र के अपने विचारों के मुकाबले (मुठभे) में 

नंदी दो खासियत देखते हैं: एक उनका कट्टर क्लिनिकल अनुभववादी 

दृष्टिकोण है। उनके लिए मानसिक रोगी कभी भी किताबी पढ़ाई से मिली सीख 

या मिसाल या 'आँकड़े' नहीं थे। बिल्कुल शाब्दिक अर्थ में रोगी के बिस्तर के 

पास बैठकर अवलोकन के आधार पर सिद्धांतों तक पहुँचते थे। चिकित्साशास्त्र 

के इतिहास में इन दो दृष्टिकोणों का आपसी विरोध बहुत पुराना है। बिना जाँच 

किए दूर से की गई कल्पना के आधार पर कपोल-कल्पित दर्शन को हकीमों 

के ऊपर थोपने के खिलाफ हिपोक्रेटिस घराने ने संघर्ष किया था - हालाँकि 

यह संघर्ष असफल रहा था। इसी तरह चरक-संहिता में ज़बरन बकवास 

डालकर वैद्य-विरोधी ब्राह्मणों ने आयुर्वेद के अनुभव पर आधारित वैज्ञानिक 

रीतियों का विरोध किया था। यूरोप में नवजागरण के जमाने में घावों के इलाज 

में क्रांति लाने वाले शल्य-चिकित्स के माहिर फ्रांसीसी आँब्रोआज़ पारे  

(Ambroise Pare`) जो कुछ भी अपनी आँखों से देखते या जो कुछ अपने 

हाथों करते थे, उसी का विवरण प्रचलित ज़ुबान में वे लिखते रहे। फ्रांसीसी 

ज़ुबान में लिखने का कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि उन्हें लातिन भाषा में 

लिखी पोथियों वाली विद्या नहीं मिली थी। जन लक के गुरू डॉक्टर सिडेनहैम 

के चिकित्सा-दर्शन में यह क्लिनिकल दृष्टिकोण शिखर पर पहुँच गया था। 

लॉक खुद कुशल सर्जन थे। लिवर का सिस्ट काट-फेंक कर रोगी को स्वस्थ 

कर पाने के वास्तविक अनुभव ने उनके विज्ञान दर्शन पर खास छाप डाली 

थी। उन दिनों यह मान्य तरीका नहीं था। यह महज मान्यता से अलग एक 

तरीका था।


देह-चिकित्सा के क्षेत्र मे ही अगर इन दो दृष्टिकोणों में मुठभेड़ इतनी प्रचंड और 

टिकाऊ रही तो मनोरोग के उपचार में इसके तीखेपन का अंदाज़ा आसानी से 

मिल सकता है, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभवों को माननेवाले फ्रॉयड के आविर्भाव के 

पहले तक मनोविज्ञान आध्यात्मिक तत्व-मीमांसा और धर्म-शास्त्रों की पकड़ 

में फँसा था। पर फ्रॉयड को पढ़ने के पहले ही गिरीन्द्रशेखर दूर से की गई 

यादृच्छ कल्पना को महत्व न देकर रोग के प्रत्यक्ष अवलोकन के जरिए 

मनश्चिकित्सा में जुट गए। उनकी असली मौलिकता यहीं है। उनमें दो पद्धतियों 

की जो मुठभेड़ हमें दिखती है, वह दरअसल हर सभ्यता में युगों-युगों से चली 

आ रही है: एक ओर दार्शनिक अपनी अन-जाँच, पर शासकों के समर्थन में 

फलते-फूलते दर्शन को चिकित्सा-वैज्ञानिकों के काम करने के तरीकों पर 

थोपते रहे, दूसरी ओर चिकित्सा-वैज्ञानिक अपने तज़ुर्बों की रोशनी में जी 

जान से उससे टक्कर लेन चाहते रहे।


आशीष नंदी ने जो दूसरी विशेषता कही है, वह यह है कि गिरीन्द्रशेखर ने  

'यूरोपी विरासत' से बाहर निकलकर काम करने की हिम्मत दिखलाई थी। 

सवाल यह है कि क्या 'यूरोपी विरासत' कहने मात्र से कोई बात बनती है?  

बर्कली और बेकन, दोनों यूरोपी दार्शनिक थे; पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने 

बर्कली को छोड़कर बेकन और मिल को माना - ऐसा करते हुए बैलेंटाइन जैसे 

प्रमुख प्राच्यवादियों के घोर विरोध को नज़रअंदाज़ किया। इसी तरह पावलोव 

भी मनोविज्ञान स्नायुतंत्र पर आधारित घराना में से हैं, पर गिरीन्द्रशेखर ने 

पावलोव के प्रति कोई रुचि नहीं दिखलाई, क्योंकि पश्चिमी यूरोप में 

मनोविज्ञान की विरासत में पावलोव का प्रभाव बहुत बाद में माना गया। यानी 

कि दरअसल वे यूरोपी मुख्यधारा से ही प्रभावित थे। वे फ्रॉयड के ढाँचे से 

उतना ही अलग हो पाए हैं जितना कि यूरोपी मुख्यधारा ने उन्हें जाने दिया है।


उनके अपने मन की दार्शनिक प्रवृत्ति ने यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 

वेदांती पिता के प्रभाव में उनका अपना दार्शनिक झुकाव-वस्तुवादी 

व्याख्याओं की ओर था। इस प्रवृत्ति को बड़ी आसानी से अनुभववाद विहीन 

मायावादी या पूरी तरह तर्क आधारित सांख्य दर्शन में जगह मिल गई। वेदांतिक 

प्रमाण पद्धति क सहार लेकर, भय से मुक्ति पाने का औपनिवेशिक हल लेकर,  

आत्मा की क्रियापद्धति लेकर, गिरीन्द्रशेखर ने बड़े ऊँचे स्तर की चर्चा की थी,  

पर उन्होंने कभी भी लोकायत या चार्वाक दर्शन की चर्चा नहीं की। यह भी तो  

पश्चिमी प्रच्यवाद (ओरिएंटलिज़्म) का ढर्रे में बँधा थोपा हुआ साँचा है।  

बैलेंटाइन ने भी तो विद्यासागर को ऐसी ही बातें कही थीं। क्या इसमें कोई 

खास मौलिकता है? भूदेव मुखोपाध्याय, विवेकानंद, राधाकृष्णन आदि के 

हाथों बार-बार इस्तेमाल होकर क्या यह पैटर्न जरा मलिन या थोथ, यहाँ तक 

कि बेकार नहीं हो गया था? गिरीन्द्रशेखर की कुछ टिप्पणियाँ हूबहू विवेकानंद 

की प्रतिध्वनि लगती हैं। जैसे, 'हिन्दू शास्त्रों के आदर्शों के नज़रिए से देखा जाए 

तो... मनोविज्ञान की जगह हर तरह के विज्ञान से ऊपर है। आत्मा के साथ 

मिलन की कोशिश ही हिन्दू धर्म का चरम उपदेश है।... सभी विज्ञानों में से 

मनोविज्ञान ही सात्विक विद्या है, बाकी सभी राजसिक हैं। वे मन को बहिर्मुखी 

कर कर्म की ओर ले जाते हैं। मनोविद्या मन को अंतर्मुखी करती है और अपने 

बारे में जानने में सहायता करती है।' यहाँ संज्ञान के बिना ही (प्रमाण का तो 

सवाल ही नहीं है) कुछेक entity (तत्वों) को गिरीन्द्र मान ले रहे हैं। कठोर 

वैज्ञानिक सिद्धांत या नियमनिष्ठा से जो बात बनती है, उनके दूसरे लेखों में 

िसके उदाहरण भरे पड़े हैं, उसका लेशमात्र भी यहाँ नहीं है। समझ में आता 

है कि यहाँ विज्ञान की जगह किसी और बात पर वे चर्चा करना चाहते हैं,  

हालाँकि मुखौटा विज्ञान का है। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है:


हमारे दिमाग में दया, सहानुभूति आदि मनोभावों का अनुभव हमें नहीं होता है। 

इन सब मनोभावों के साथ जो संवेदनाएँ जुड़ी होती हैं, कहते हैं कि उनकी 

जगह दिल में है, इसलिए दयालु को 'सहृदय' व्क्ति कहते हैं। हिन्दू शास्त्रकारों 

ने भी हृदय को रागद्वेष आदि का उद्गम कह कर निर्देश दिए है। इससे पता 

चलता है कि शरीरशास्त्र के जानकार के लिए जो सच है, मनोविद् के लिए वह 

सच नहीं भी हो सकता है।


इससे क्या समझ बनती है? तो क्या दया, सहानुभूति आदि मनोभावों के साथ 

जुड़ी संवेदनाएँ दिल में बैठी हुई हैं? तो क्या सहृदय शब्द को शाब्दिक अर्थ में 

ही समझना चाहिए? और केवल हिन्दू शास्त्रकार ही क्यों, सही वैज्ञानिक 

विचारों के अभाव में पैरासेल्सस के जमाने में यूरोप के लोग भी तो ऐसे ही 

सोचते थे, हालाँकि पैरासेल्सस ने सारवजनिक रूप से गैलन की आत्मा का 

गला घोंटा था (पैरासेल्सस - (1493–1541) स्विस जर्मन चिकित्सक;  

गैलन (129–200/216) ग्रीक चिकित्सक – अनु.)। आज भी lily 

livered, chicken/ lion-hearted (लिली-लिवर यानी फीके रंग 

के जिगर वाला या कायर, चिकन यानी मुर्गा या कायर, लायन-हार्टेड यानी 

शेरदिल) जैसे अलंकारों वाली वाक्-शैली में पुरानी सोच देखी जा सकती है ।


जबकि यही इंसान जब सही ढंग से क्लिनिकल तज़ुर्बों के आधार पर या किसी 

विशुद्ध वैज्ञानिक सिद्धांत के आधार पर लेख लिखते हैं, तब उनके तर्क और 

भाषा की ठोस बनावट और बंधन हमें बाँध लेते हैं, जिसकी अमिट पहचान  

स्वप्न शीर्षक किताब में लिपिबद्ध है।


एक और बात है, जीवन की संध्या में जब फ्रॉयड ने चिकित्सा से अर्जित अपने 

खयालों और विचारों को मानव-विज्ञान और धर्म के आँगन में लागू करने की 

कोशिश की, तो उनकी व्याख्याएँ खुले आम पुराण कथाओं पर निर्भर हो गईं। 

क्या वे भी टोटेम और टाबू (कुनबे का प्रतीक) का इतिहास घोंट कर 

मानव-विज्ञान पर चर्चा करते हुए गिरीन्द्रशेखर की तरह ही मनोविज्ञान-पुराण 

को मिलाकर एक ढाँचा तैयार करना नहीं चाह रहे थे? अर्थात इस प्रक्रिया का 

भारत या यूरोप से कोई संबंध नहीं था। अपने-अपने मुल्कों में अपनी तयशुदा 

फलसफे की ज़मीं सोच की राहें तय कर रही थी।


वैसे यह बात सही है कि मनोविश्लेषणवादी गिरीन्द्रशेखर का 

गीता-विश्लेषण बिल्कुल अनोखा है, यह अलग से ध्यान देने की माँग रखता है।  

यहाँ उसकी जगह नहीं है, पर संक्षेप में दो क बाते कही जा सकती हैं। उनके 

अनुसार गीता समेत जितनी भारतीय दार्शनिक कृतियाँ हैं, उनकी जड़ में जतनी  

दार्शनिक जिज्ञासा है, उससे कहीं अधिक विशेष ऋषियों की विशेष 

मनोवैज्ञानिक दशा का बिना किसी सजावट के हूबहू प्रक्षेपण है। इसी वजह से 

बड़ी गहरी अंतर्दृष्टि से भरी उपलब्धि के साथ ही हास्यास्पद बचकानी  

(childish‌ and even silly) बातें भी मिलती हैं। उनके विचार में गीता में 

विशुद्ध वैज्ञानिक कौतूहल को चरितार्थ करने की कामना को ईश्वर की खोज में 

सही ताड़ना माना गया है। विभिन्न उपनिषदों में से ऐसी ईश्वर की खोज की कई  

मिसालें देते हुए उन्होंने दिखलाया कि इनमें से हरेक कोई न कोई सवाल 

उठाता है, जैसे हम कहाँ से आए हैं? हम किस तरह जीवन धारण करते हैं?  

मौत के बाद क्या होता है? कितनी शक्तियों की क्रियाओं से जीवदेह सजीव 

रहता है और उनमें से कौन सी मुख्य हैं? सोते वक्त कौन सी इंद्रियाँ जगी रहती 

हैं? सपने कहाँ से आते हैं? शरीर में सुख के अहसास का आधार क्या है? मन 

को कौन नियंत्रित रखता है? इंद्रियों को सजीव रखने का भार किसके ऊपर 

दिया गया है? 'इन सवालों में से अधिकतर मनोविज्ञान या शरीरविज्ञान के 

दायरे में आते हैं। कुछेक भौतिक विज्ञान और दर्शन के दायरे में आते हैं। 

इसलिए हम देख सकते हैं कि ऋषियों ने ब्रह्म के बारे में पहले से निर्धारित 

विचारों से साथ सोचना शुरू नहीं किया था ... और सभी नश्वर इंसानों की 

तरह ही वे इन समस्याओं के बोझ से पीड़ित थे।' गिरीन्द्रशेखर ने यह भी कहा 

कि मनोविज्ञान के अध्यापक होते हुए अक्सर अपने छात्रों से न्हीं सवालों को 

उन्होंने सुना है। इन सवालों में 'there is nothing of mysticism 

(कोई रहस्यवा नहीं है)'। फिर भी इन सवालों के जवाबों ने आखिर में ब्रह्म 

जैसी धुँधली सत्ता की ओर संकेत किया, गिरीन्द्रशेखर के अनुसार इसकी 

वजह यह थी कि उस प्राक्-विज्ञान युग में यही स्वाभाविक था। उनके अनुसार 

सिर्फ सत्व, रस, तम ही नहीं, सारे भारतीय दर्शन को अलग-अलग इंसानों के,  

यानी विभिन्न ऋषि-व्यक्तियों के नज़रिए से परखना चाहिए। इसके लिए भौतिक 

विज्ञान के पद्धति-तंत्र की व्यक्ति निरपेक्ष परख की ज़रूरत नहीं है। अर्थात यह 

विभिन्न समय पर विभिन्न व्यक्तियों की विभिन्न मानसिक स्थितियों क  

दिखलाता है - यह प्रकृति और इंसान के बारे में वैज्ञानिक खोज नहीं है। ध्यान 

रहे, यहाँ मनोविज्ञान से मतलब है कि वे प्राक्-विज्ञान युग के इंसान की  

'अनछुई' उपलब्धि को ही समझा रहे हैं - 'his own sophisiticated 

experience. He had no Newton or Einstein to 

consult... Whatever the Rishi said is absolutely true  

psychologically (उनका अपना जटिल अनुभव। कोई न्यूटन या 

आइंस्टाइन मौजूद न था, जिससे वे सलाह-मशविरा कर पाते... ऋषि ने जो 

भी कहा, वह मनोवैज्ञानिक रूप से ध्रुव सत्य है)' सच-झूठ का प्रमाण पेश 

करने का जिम्मा उस ऋषि का नहीं है। अपने मन की उपलब्धि को जस का 

जस प्रकट कर के वे बरी हो जाते हैं। जाहिर है, यहाँ उन्होंने तथाकथित  

'पश्चिमी' पैमाने से ही गीता के 'दर्शन' पर विचार किया है।


यह ध्यान देने योग्य है कि गिरीन्द्रशेखर उन प्रज्ञासंधानी ऋषियों का तिरस्कार 

नहीं कर रहे कि प्राचीन भारत के ये चिंतक आधुनिक विज्ञान का इस्तेमाल नहीं 

कर सके, उलटा वे यह कह रहे हैं कि वे बड़ी हिम्मत के साथ अपने  

'मनोवैज्ञानिक इंद्रिय अहसासों' के आधार पर अवरोही (deductive) तर्क 

की राह पर आगे बढ़े थे। उनके तर्क आम लोगों को सही लगते हैं या नहीं,  

इसकी परवाह उन्होंने नहीं की। बेशक ऐसे विश्लेषण में उनकी मौलिकता है,  

पर इसे 'पश्चिमी पैराडाइम' के पार नहीं कहा जा सकता है। इसके अलावा 

एक और सवाल यहाँ उठना चाहिए, पर उठाया नहीं गया। गिरीन्द्रशेखर द्वारा 

बतलाए इन ऋषियों के विपरीत राह पर चलते हुए चार्वाक लोकायतिकों ने  

'मदशक्ति' की तुलना लाकर देह और मन के संबधों की व्याख्या करने की 

कोशिश की थी। गिरीन्द्रशेखर बारे में चुप हैं, आशीष नंदी भी चुप हैं।



कोई शक नहीं कि गिरीन्द्रशेखर उपनिवेशकाल में पले 'पश्चिमी' विज्ञान 

शिक्षित भद्रलोक बांगाली चिंतनजीवियों की पराकाष्ठा थे। आशीष जी के लेखन 

में उनकी यही पहचान लाजवाब ढंग से सामने आती है, पर उनके विश्लेषण के 

बुनियाद को लेकर शंकाएँ रह जाती हैं। हो सकता है कि वे खुद इस बारे में 

सचेत थे। गिरीन्द्रशेखर के बारे में उनका लेख इस तरह खत्म होता है: 'क्या 

सचमुच 'हिंदू शास्त्रों के आदर्शों के नज़रिए से ... मनोविज्ञान की जगह सभी 

विज्ञानों से ऊपर है? क्या औपनिवेशिक भारत उस पुराने भारत का 'सच्चा 

उत्तराधिकारी' है? जब वे 'अन्य फ्रॉयड' के बारे में विचार गढ़ते हैं तब 'what 

empirical and conceptual clues did he use (कैसे प्रत्यक्ष 

अवलोकन और अवधारणात्मक सूत्रों का इस्तेमाल उन्होंने किया)?' नंदी को 

इन सवालों में से किसी के भी जवाब नहीं मालूम हैं। और वह मानते भी हैं कि 

ये सवाल विवादास्पद हैं। फिर भी वे विज्ञान और पुराणों के बीच झूला झूल रहे 

इस मनीषी के कर्मकांड की इस तरह व्याख्या करने की कोशिश करते हैं कि 

एक पेशेदार मनोसमीक्षक होते हुए गिरीन्द्रशेखर का काम 'स्मृत अतीत' पर था  

- 'objective past (नि:शंक अतीत)' को लेकर नहीं। पर मनोविज्ञान को 

विज्ञान मानना हो तो वैज्ञानिक पद्धतियों के तंत्र के सवाल को नज़रअंदाज नहीं 

कर सकते। अगर वह नज़रअंदाज नहीं होता तो objective past का 

मुकाबला वह किस तरह से करेगा, इस सवाल का जवाब देना ज़रूरी हो जाता 

है। इस सवाल का जवाब देना हो तो स्नायुतंत्र आधारित मनोविज्ञान के साथ 

उसका क्या संबंध है, इस बारे में चर्चा ज़रूरी हो जाती है। इस बारे में  

गिरीन्द्रशेखर क्या सोचते थे - और क्या नहीं सोचते थे - इस पर नंदी जी 

कोई चर्चा नहीं करते हैं।


इस सबके बावजूद यह बात बिना झिझक माननी पड़ेगा कि गिरीन्द्रशेखर को 

केंद्र में रखते हुए आशीष बाबू ने जिन सवालों को उठाया है वे मूल्यवान हैं। 

जवाबहीन इन सवालों के हवाले से ही हमें खुद को इस तरह पहचानने काम  

को बढ़ाते है।


िकित्साविज्ञान: देसी बनाम औपनिवेशिक

इसके बाद के सवाल पर आशीष बाबू ने बड़े निष्पक्ष ढंग से अपनी बात रखी है।  

ख्यत: उन्होंने चार आख्यान सुनाए हैं:

1) विज्ञान-शिक्षा और वैज्ञानिक शोध में जानवरों को काटने-चीरने के 

खिलाफ थीओसोफिस्टों (ब्रह्मविद्यावादियों) ने जो आंदोलन किया, उनके 


कागज़ात की जाँच कर आधुनिक िकित्साविज्ञान के तथाकथित व्यक्ति- 

निरपेक्षता के खिलाफ आधुनिक विज्ञान-विरोधियों के बयान ढूँढे हैं, 2)  

विश्वविद्यालय और विज्ञान-चर्चा को बिल्कुल एक-आयामी करने की जगह 

सौ फूल खिलाने की जो कोशिश पैट्रिक गेडस ने की थी, उसका वर्णन किया है  

(पैट्रिक गेडेस (1854 –1932) – स्कॉटिश जीवविज्ञानी और 

शिक्षाविद-अनु.) । गेडस ने चाहा था कि उनके 'विज्ञान संबंधी ग्रामीण 

दृष्टिकोण' की ज़मीन शांतिनिकेतन में हो, 3) गाँधीजी के हिंद-स्वराज में उन्हें  

' a fascinating science policy document of the  

post-Swadeshi era (उत्तर-स्वदेशी युग में विज्ञान नीति का अद्भुत 

दस्तावेज)' ढूँढ मिला है। इंसान के जिस्म को राष्ट्-यंत्र के प्रतीक की तरह 

पेश कर गाँधीजी ने दिखलाया था कि 'आधुनिक यंत्रनिर्भर सभ्यता बीमारी है,  

क्योंकि वह देह की समग्रता को नुकसान पहुँचाती है। सच्चा औजार तो ... वही 

होगा जो शरीर का स्वाभाविक विस्तार है, शरीर से अलग कुछ नहीं है,' 4) सन  

1923 में जी श्रीनिवासमूर्ति ने आयुर्वेद िकित्सापद्धति के बारे में जो प्रतिवेदन 

दिया था, उस पर नंदी जी ने विस्तार से चर्चा की है। इस भाग में यही सबसे 

मूल्यवान दलील है। श्रीनिवासमूर्ति के विचार में, आयुर्वेद में जीवाणु को रोग 

का एक कारण मानने को महत्व ज़रूर दिया गया है, पर इसे अनेक कारणों में 

से सिर्फ एक माना जाता है, जबकि ऐलोपैथी में जीवाणुओं का रोग के कारण 

रूप में बहुत ज्यादा महत्व है। बात ज़रूर सोचने लायक है। पर सवाल है:  

पास्तूर और कोख़ के बाद से जीवाणु का जो मतलब हम जानते हैं, क्या 

आयुर्वेद के विज्ञानियों को इसी अर्थ में जीवाणुओं की समझ थी (लुई पास्तूर  

(1822–1895) फ्रांसीसी रसायनविद और सूक्ष्मजीवविज्ञानी; रॉबर्ट 

हाइनरिख़ हर्बर्ट कोख़ (1843–1910) जर्मन चिकित्सक और 

सूक्ष्मजीवविज्ञानी - अनु.)? कोई वजह नहीं है कि हम देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय 

की इस बात को न मानें, “... विज्ञान के इतिहास में जीव-कोष और जीवाणु 

की खोज के पहले तक शरीर क ढाँचे और अधिकतर रोगों के असली कारणों 

की जानकारी नहीं थी (संदर्भ: आयुर्वेद में विज्ञान, उत्स मानुष प्रकाशन, पृ

34)


इस संदर्भ पर श्रीकृष्णचैतन्य ठाकुर ने भी चर्चा की है, हालाँकि भाषा में 

अवांछित टेढ़ेपन से उनकी बातें समझने में दिक्कत आती है (श्रीकृष्णचैतन्य 

ठाकुर – बांग्ला में आयुर्वेद पर कई किताबों के लेखक – अनु.)। ठाकुर जी ने 

लिखा है, “वाइरस, बैक्टीरिया, अमीबा जैसे भी रोग पैदा करते हैं, जो तथ्य 

सुश्रूत के सूत्र स्थान 19/23 सूत्रश्लोक और 20/28 की उक्तियाँ हैं, वे  

शतपथ ब्रह्मण 11/4 सूक्ति में स्पष्ट है (यह ब्रह्मण यजुर्वेद की माध्यंदिन 

शाखा का सौवाँ अध्याय है), पर इस बारे में पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान के 

सामने हमारी दीनता नंगी ड़ी दिखती है (संदर्भ: कविराज (वैद्य) ब्रजेंद्रनाथ 

नाग संपादित चरक संहिता की भूमिका, पृ. 6)' क्या इसका मतलब यह 

निकलता है कि आयुर्वेद विज्ञानियों ने वाइरस, बैक्टीरिया, अमीबा आदि की 

खोज बहुत समय पहले ही कर ली थी, पर बाद में यह ज्ञान खो गया? अगर 

ऐसा ही है तो सवाल है: यह खोज किस पद्धति से, कैसे परीक्षण-निरीक्षणों के 

आधार पर हुई थी? क्या ये सारी खोजें अणुवीक्षण यंत्र (माइक्रोस्कोप) के 

बिना ही हो गई थीं? अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसे सैद्धांतिक अनुमान ज़रूर 

कहा जा सकता है, पर क्या इसे प्रमाणयोग्य या खंडनयोग्य (फॉल्सिफायबल)  

सिद्धांत कहा जा सकता है? अगर यह नहीं होता तो तथाकथित आयुर्वेद को 

ऐलोपैथी का वैकल्पिक 'सिस्टम' मानकर कैसे खड़ा किया जा सकता है?


दरअसल आयुर्वेद के बारे में बुनियादी सवाल यह है कि लोकसमाज में सैंकड़ों 

सालों से तथाकथित आयुर्वेदिक चिकित्सा के नाम से जो चला आ रहा है,  

उसके साथ असली आयुर्वेद शास्त्र का कितना संबंध है? श्रीकृष्णचैतन्य ठाकुर  

के 'पूज्यनीय अध्यापक वैद्यरत्न वाराणसीगुप्त और महामहोपाध्याय 

गणनाथ सेन महाशय ने मजाक करते हुए कहा था - बेटे! कलियुग में पाँच 

आयुर्वेदी चिकित्सक हैं -  
मालाकारश्चचर्मक: नापितो रजकस्थता
वृद्धारंडा विहेषणे कलौ पंच चिकित्सा:

यानी फूलमाली, कर्मकार (लोहार), नाई, धोबी और मुहल्ले की बूढ़ी राँड़ – ये 

ही चिकित्सक हैं'। गणनाथ सेन ने उन्हें कहा था, 'आज आम लोगों को मन में  

आयुर्वेद के प्रति जो उदासीनता दिकती है, वह एक दिन या एक साल में नहीं 

पनपी है, यह कम से कम ईसा की पाँचवीं-छठी सदी में शुरू हुई थी, क्योंकि 

किसी जटिल रोग के लिए सही आयुर्वेद ज्ञान और दवाओं का अनुभव अर्जित 

करने लायक वैद्य है ही नहीं। वे अपना तज़ुर्बे से मिले आयुर्वेदी चिंतन से जो 

कुछ सीखते हैं, उसी का प्रयोग करते हैं दरअसल तांत्रिकों द्वारा खोजी दवाओं 

के असर का सहारा लेकर वे ग़लत राह पर चल पड़ते हैं। इसके पीछे आयुर्वेद 

के बुनियादी ग्रंथ पर चर्चा का अभाव है और बस दो चार मुट्ठी भर शरीर-चर्चा 

के ग्रंथों का पाठ मात्र है (वही, पृ.1)'



हम जो विशेषज्ञ नहीं हैं, इसे पढ़कर इतना कह सकते हैं कि फलित आयुर्वेद 

पैराडाइम-विहीन मामला है। और यह बात अंग्रेज़ों के आने के बहुत पहले से 

ही चल रही है। कुछ लोग 'अपने तज़ुर्बों से मिली धारणाओं' के साथ-साथ 

काम करते जा रहे थे, पर इन धारणाओं को किसी मान्य, किसी हद तक 

व्यापक, वैज्ञानिक रीति से प्रमाणित होने का मौका नहीं मिला। इसलिए ये 

अलग-थलग रीतियाँ बनकर रह गईं। उसके ऊपर 'तांत्रिकों द्वारा खोजी 

दवाओं के असर का सहारा लेकर वे ग़लत राह पर चल पड़ते हैं'। ऐसे हाल में 

क्या आयुर्वेदिक 'सिस्टम' नामक किसी चीज़ के होने का दावा किया जा सकता


है? इसलिए बाज़ार में व्यवहार में 'अंग्रेज़ी दवा' के उलट जो आयुर्वेद- 

चिकित्सा चलती है, वह महज 'टोटका चिकित्सा या जड़ीबूटी चिकित्सा' है  

(वही, पृ. 2)



इसलिए ऐलोपैथी के साम्राज्यवादी उद्गम की बात को याद रखते हुए भी कहा 

जा सकता है, एक्यूमेनिकल विज्ञान की कुछ मान्य पद्धतियों को मान चलने की 

कोशिश उसमें है, जैसे तयशुदा नियमों के मुताबिक परीक्ष-निरीक्षण,  

खंडनयोग्यता (फॉल्सिफायबििटी) आदि। इसके उलट, प्रचलित आयुर्वेद मेें ' 

फूलमाली, कर्मकार, नाई, धोबी और मुहल्ले की बूढ़ी राँड़' के कुछ निजी 

लोकतथ्य मिलते हैं, जिसमें से बहुत कुछ बेशक प्रयोगों द्वारा सिद्ध है और 

लाभदायक है, पर वह कभी भी वैज्ञानिक पद्धति के नियमों से परखे नहीं गए हैं 

देसी टीका या मोतियाबिंद काटना इसके परिचित मिसाल हैं इसलिए यह बात 

मान लेने पर भी कि साम्राज्यवादियों ने पूरी तरह अपने स्वार्थों के लिए इस 

देश पर खर्चीली चिकित्सा-पद्धति थोपी है, यह कहना बाकी रह जाता है कि 

जो उन्होंने थोपा है, वह कुछ हद तक प्रमाणित, खंडनयोग्य और मान्य पद्धति 

है। पद्धति खंडनयोग्य हो त उसके लगातार बेहतर होने की संभावना रहती है -  

जो फलित, अप्रमाणित, अखंडनयोग्य, प्रचलित आयुर्वेद के बारे में नहीं कहा 

जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है कि आयुर्वेद शास्त्र अपनी खोई मर्यादा 

वापस पा ले, और खंडनयोग्यता की माँग पूरी कर दिखाए तो वह मान्य 

चिकित्सापद्धति का सिस्टम हो जाएगा। पर जब तक यह नहीं होता, तब तक 

इस हीनस्तर के आयुर्वेद को ऐलोपैथी का विकल्प मानना अतार्किक है।


चूँकि साम्राज्यवाद से ऐलोपैथी आई, इसलिए ऐलोपैथी और रोग के होने में 

जीवाणु के होने के सिद्धांत की उपयोगिता को कम कर आँकना द्वंद्वहीन 

एकआयामी सोच को बढ़ावा देता है। यह ऐसा है, जैसे संस्थागत विज्ञान  

साम्राज्यवाद का पिछलग्गू हो गया है, इस वजह से विज्ञान के सिद्धांत ग़लत 

नहीं हो जाते, बल्कि साम्राज्यवादियों के मुनाफालोलुप हाथों से विज्ञान को 

वापिस छीन लाना और आम लोगों के हित में उसे अपने दम पर ड़ा करना 

एक बड़ी लड़ाई है। बहुराष्ट्रीय दवाकंपनियों के हाथ बिक चुके चिकित्सा- 

विज्ञान को सचमुच के विज्ञान में बदलना उसी लड़ाई का हिस्सा है। इसके 

लिए बुनियादी विज्ञान को ही नकारने का मतलब, विलायती मुहावरे में,  

बाथटब के पानी के साथ शिशु को भी बहा देना है। नंदी जी की मेहनत से की 

गई खोज में मानो इसी बहाव का बाजा सुनाई पड़ता है।


नंदी के विचार में इसमें से 'आधुनिक चिकित्साविज्ञान के दर्शन' के खिलाफ 

तीन किस्म के विरोध फले फूले हैं। इन तीनों की न्होंने इस तरह पहचान की 

है। - थियोसोफिस्टों का 'तर्कहीनता-आधारित अस्वीकार', गाँधीजी का  

'संस्कृति आधारित प्रतिरोध' और श्रीनिवासमूर्ति का 'स्वदेहजात सिद्धांत ही 

बहिरागत सिद्धांत की बुनियाद है (indigenous-as-the-theory-

of-the-exogenous)' इसमें कोई शक नहीं है कि आधुनिक विज्ञान 

आज संकट से गुजर रहा है। नंदी की उम्मीद है कि ऊपर कही गई तीन किस्म 

की आलोचनाएँ, उनमें 'आपस में जितनी भी दूरी हो, शायद उस संकट से 

उबरने में मदद करेंगी।' यह कैसे होगा, वह उन्हें मालूम नहीं है


उपसंहार
तुरत जवाब ढूँढने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण सही सवाल पूना है - यह 

कहकर हमने चर्चा शुरू की थी। आशीष नंदी ने अपनी प्रगाढ़ विद्वत्ता और मुक्त 

चिंतन की मिठास में घोलकर कई सारे सवाल उठाए हैं। जिन बातों को 

सोचकर आश्वस्त हो जाते हैं, उनके अंदर बड़े गड्ढों को उन्होंने दिखलाया है। 

अधिकतर बीमारी को पहचानने में वे सफल हुए हैं। फिर भी शंका होती है, वे 

किके पक्ष में खड़े होकर सवाल उठा रहे हैं? उनका मूल हमला 

सिक्योलरिज़्म और आधुनिक विज्ञान पर आ फूटता है। दार्शनि नज़रिए से 

उनके तर्क बेशक सोचने लायक हैं, पर हमारे जैसे मुल्क में, जहां ठीक इन दो 

बातों के अभाव से इंसान की दुनियावी तकलीफों का अंत नहीं है, वह उनक 

अति-परिशीलित दर्शन-चिंतन राष्ट्र-राज्य की उन ताकतों को ही मजबूत 

करेगा, जो इंसान को जड़ मीडिया पशु के स्तर पर उतार गिराना चाहते हैं। कई 

तरह के मूलवाद आज इस तरह के सैद्धांतिक सहारे की उम्मीद में बैठे हैं। 

निश्चित ही ऐसी बात आशीष बाबू नहीं चाहेंगे।


अमर्त्य सेन का एक बयान उद्धृत कर इस चर्चा को रोकें। 'भारत की वयस्क 

जनता में अधिकतर (और वयस्क स्त्रियों का दो-तिहाई) आज भी निरक्षर है। 

दो एक खास इलाकों को छोड़ दें तो तालीम और विज्ञान को भारतीय नागरिकों 

के बड़े हिस्से तक ले जाने की कोई ईमानदार कोशिश दिखती नहीं है इस 

यंकर असफलता को ध्यान में रखकर विज्ञान के महत्व को कम करने का 

मतलब गैरबराबरी और अन्याय के खिलाफ नहीं, उनके पक्ष में काम करना है। 

भारत में सबको तालीम देने की नीति की असफलता चूँकि राष्ट्र-यंत्र की 

असफलता का हिस्सा है, इसलिए ज़रूरी है कि शासन-प्रणाली के खिलाफ आवाज़ उठाएँ, विज्ञान के खिलाफ नहीं।5


संदर्भ:

1. अमर्त्य सेन, द आर्गुमेंटेटिव इंडियन, ऐलेन लेन, पेंगुइन, लंदन, 2005, पृ. 194
2. अमर्त्य सेन, भारतेर अतीत -व्याख्या प्रसंगे (मूल से बांग्ला में अनुवाद – आशीष लाहिड़ी), एशियटिक सोसायटी 1999, पृ. 20
3. वही, पृ. 22
4. वही, पृ. 29
5. वही, पृ. 31