Saturday, August 01, 2020

विज्ञान, टेक्नेलोजी और समाज

एक अरसे से विज्ञान, टेक्नेलोजी और समाज पर लिखने की सोचता रहा हूँ। संजय जोशी ने पीछे पड़कर चार लेख लिखवा लिए, जो 'समकालीन जनमत' वेब-पोर्टल पर आए हैं। ज्यादातर बातें मौलिक नहीं हैं, पर ज़रूरी बातें हैं, जो हर किसी को पढ़नी चाहिए। 







दलदल में बरगद

'सत्य हिन्दी' वेबसाइट पर आया ताज़ा लेख 

नई शिक्षा नीति : बुनियादी बदलाव या नई जुमलेबाज़ी!

क्या दलदल में कभी बरगद उग सकता है? केंद्र-सरकार ने नई शिक्षा नीति के नाम पर जो मसौदा लागू किया है, पहली नजर में लगता है कि बड़ी मेहनत के बाद और बड़े संजीदा मक़सदों के साथ यह शिक्षा नीति तैयार की गई है। स्कूली तालीम से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय तक की शिक्षा पर गंभीरता से सोचा गया है। पर यह दलदल में बरगद की छाँव का धोखा है। ऐसे समाज में जहां व्यापक गैर-बराबरी हो, बुनियादी मसलों पर फैसला लेने वाले लोग एक छोटे से संपन्न वर्ग से आएं, और अध्यापक- और छात्र-प्रतिनिधियों को फैसलों में शामिल न किया जाए, तो नीतियाँ हमेशा ही खयाली किले जैसी रहेंगी। मसलन एकबारगी ऐसा लगता है कि स्नातक स्तर पर अगर सभी छात्र कामयाब नहीं हो पाते तो उन पर हमेशा के लिए असफलता का धब्बा न लगे, यह अच्छी बात है। अगर कोई चार साल तक पढ़ाई पूरी नहीं कर सकता, तो पहले साल के बाद वह सर्टीफिकेट लेकर निकल जाए, दूसरे साल के बाद डिप्लोमा लेकर निकल जाए, यह तो अच्छी बात होगी। पर कोई यह भी तो पूछे कि स्नातक स्तर की पाठ-चर्या क्या ऐसी होती है कि पहले साल में पूरे प्रोग्राम के मक़सद का एक चौथाई पूरा हो जाता है? साल भर के बाद छात्र के पढ़ाई छोड़ने पर क्या उसमें इतनी काबिलियत होती है कि उसे प्रमाण पत्र दे दें, जिसके बल पर वह कुछ कमा-खा सके? यह सर्टीफिकेट किसको मिलेगा? पहले साल के बाद या दूसरे साल के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्र वही होंगे, जो ग़रीबी या तमाम दूसरे किस्म की समस्याओं की वजह से पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। कहां तो सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हर किसी को मुफ्त तालीम मिले, ताकि आगे चलकर मुल्क की तरक्की में हर कोई पूरी काबिलियत के साथ योगदान करे। हो यह रहा है कि समाज का वह तीन-चौथाई हिस्सा जो आज ऊंची तालीम तक नहीं आ पाता, उसे आधिकारिक रूप से खारिज करने की तरकीब सोची गई है। स्कूली तालीम में कहा जा रहा है कि छठी कक्षा के बाद से पेशेवर प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि बच्चे बड़े होकर हाथों से काम करने में काबिल हों। अगर यह गाँधी के सपने जैसी बात होती कि हर कोई हाथों से काम करना सीखे, तो अच्छी बात होती, पर जाति-व्यवस्था के चंगुल में फँसे समाज में सचमुच इसका मक़सद यही रह जाता है कि बच्चे पारिवारिक धंधों में पारंगत हो सकें। स्कूली तालीम का जो नया ढांचा सोचा गया है, वह अमेरिका जैसे विकसित मुल्क की नकल है। इसलिए मध्य-वर्ग के लोगों को ऐसा लग सकता है कि अब हमारी तालीम का ढांचा भी आधुनिक हो गया है। यह भद्दा मजाक है। महज ढाँचा बदलने से शिक्षा में गुणात्मक बदलाव नहीं आते। क्या पश्चिमी मुल्कों की तर्ज पर समान स्कूली तालीम यहाँ शुरू होगी? क्या किताब कापी, पेंसिल, हर कुछ हर बच्चे को मुफ्त मिलेंगे?

यह कहा गया है कि पांचवी तक बच्चे मातृभाषा या अपने करीब की भाषा के माध्यम में ही पढ़ाई लिखाई करेंगे। पर जब सुविधा-संपन्न स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होगी, तो क्या किसी से कहा जा सकता है कि वह अपने बच्चों को मातृभाषा माध्यम स्कूलों में भेजे? एक आम आदमी को यह समझा पाना कि अंग्रेजी माध्यम के कुछ ही स्कूल अच्छे होते हैं जहां फीस बहुत ज्यादा है और बाक़ी अयोग्य अध्यापकों का धंधा है, इतना आसान नहीं है। ग़रीब को लगता है कि अंग्रेजी ही सफलता की कुंजी है। सच यह है कि मातृभाषा में ही हमारी सीखने की कुदरती क्षमता पूरी तरह फलती-फूलती है। यह बात शिक्षाविद समझते हैं। वे अपने सम्मेलनों में इस बात पर बहस करते हैं, अंग्रेजी में तर्क रखे जाते हैं। आम आदमी इस बात को नहीं समझ पाता। समाज के संपन्न तबके अंग्रेजी बोलते हैं, इसलिए आम लोगों को लगता है कि उनके बच्चे भी अंग्रेजी बोलने लगें तो वह एक दिन ताकतवर हो जाएंगे । जब तक सभी स्कूलों में समान तालीम का इंतज़ाम नहीं होता, एक जैसी सुविधाएं नहीं दी जाती और हर बच्चे को मुफ्त तालीम नहीं दी जाती, तब तक इस तरह की बहस बेमानी है। बेशक हर बच्चे को अंग्रेज़ी सीखनी है, और इसे माध्यमिक स्तर से एक भाषा के रूप में पढ़ाया जा सकता है। अंग्रेजी को जो सामाजिक रुतबा आज मिला हुआ है, वह खत्म होना चाहिए। आज टेक्नोलोजी का मदद से रोज़ाना ज़िंदगी के सभी काम अपनी जुबान में हो सकते हैं। जब तक हुकूमत और ताकतवर तबके इस बुनियादी बात को नहीं मानेंगे, मातृभाषा में पढ़ने-पढ़ाने की कोशिश कामयाब नहीं होगी।

सदियों से चली आ रही जाति-व्यवस्था में जो हाशिए पर रहने को मजबूर हैं, और वे सभी तबके, जो जेंडर, मजहब, शारीरिक भिन्नता जैसी वजहों से भेदभाव का शिकार हैं, उनको इस नीति में आधिकारिक रूप से दरकिनार करने के तरीके सोचे गए हैं। बाक़ी बातें जैसे ऊँची तालीम में निजी संस्थानों से पैसे जुटाना और विदेशी यूनिवर्सिटीज़ को हमारे यहाँ धंधा जमाने देना, संस्थानों में स्वायत्तता का क्रम, आदि सब बातें सुविधा-संपन्न तबकों के लिए सोची गई हैं, जिन्हें आम लोगों की मेहनत लूटने के अलावा इस देश से कुछ लेना-देना नहीं है। अगर औपचारिक रूप से रैंकिंग भी देखी जाय तो भी हार्वार्ड विश्विद्यालय के किसी स्थानीय कैंपस का रुतबा मूल कैंपस जैसा नहीं होगा। वहाँ शोध पर जोर होगा, यहाँ बाज़ार के लिए प्रोफेशनल्स तैयार किए जाएँगे। मसौदे में ऑनलाइन शिक्षा जोड़ दी गई है, और प्रधान मंत्री ने इस पर काफी सीना पीटा है। देश के आम लोगों के लिए ये निष्ठुर मजाक हैं। देशी ज़ुबानों में सामग्री तैयार करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं है, सब कुछ समर्पित भाषा-प्रेमियों का काम बन चुका है, जो हर विषय में पारंगत तो हो नहीं सकते। क्या हर किसी तक नेटवर्क पहुँचता है? मोबाइल पर रिंगटोन और अश्लील तस्वीरें पहुँच रही होगी, पर सबके लिए ऑनलाइन शिक्षा लायक तैयारी हमारी नहीं है, अगर हो भी सकती तो भी नहीं होगी, क्योंकि नीति निर्धारकों को ज्यादातर लोग इंसान ही नहीं लगते। वैसे भी टेक्नोलोजी पर इतनी निर्भरता और इंसान की एजेंसी को दरकिनार करने की ऐसी बेचैनी हमें कहाँ ले जाएगी, यह बड़ा सवाल है। चूँकि इस प्रक्रिया में कॉरपोरेट घराने सरगर्म रहेंगे, इसलिए तालीम का मक़सद भी भी ज्ञान पाने से हट कर बाज़ार की ज़रूरतों में सिमट जाएगा।

नीति में कुछ अनोखी-सी दिखती बातें रखी गई हैं, जैसे विषयों के चयन में छूट। पर व्यावहारिक धरातल पर हमारे संस्थानों में सामंती मानसिकता के प्रशासकों की भरमार है, जिनका काम सिर्फ सत्ता के चाटुकार बने रहकर अपनी सुविधाएँ पुख्ता करनी हैं। राज्य-स्तर के संस्थानों के लिए शोध के अनुदान बढ़ाने की बात कही गई है, पर यह समझने की कोई कोशिश नहीं है कि आज इन संस्थानों में जिस तरह की लाल-फीताशाही, घटिया राजनीति और अविश्वास का माहौल है, इससे कैसे निपटा जाए। क्या तालीम का खित्ता बाक़ी समाज से अलग है कि एक नए मसौदे से ये बुनियादी खामियाँ गायब हो जाएँगी? इसी तरह स्वयंसेवकों और समाज-कर्मियों को जोड़ने के नाम पर दरअसल संघ के कार्यकर्ताओं को शिक्षा-तंत्र के हर कोने में जोड़ने की कोशिश है।

इक्कीसवीं सदी, वैश्विक-स्तर जैसी जुम्ले-बाजी के साथ सरकार ने शिक्षा-नीति भी लागू कर दी, क्या पता कि इसका क्या हश्र होगा। किसी भी देश का असली विकास इस बात पर निर्भर करता है कि तालीम और सेहत जैसे खित्तों पर कितना खर्च किया जा रहा है, न कि राफेल जैसे मारक जहाजों पर। हमारा देश इस पैमाने पर अफ्रीका के कई ग़रीब मुल्कों से भी पीछे है, चीन-अमेरिका की तो क्या बात करें। बहस होती रहेगी, पर आखिरी फैसला तो अवाम ही लेगी, आज भले ही वह कमज़ोर है, वह सुबह कभी तो आएगी।

Thursday, July 30, 2020

गढ़ी गई हिन्दी में खो जाता है विज्ञान

विज्ञान में हिन्दी

प्यार में गलबँहियाँ नहीं, प्रेमालिंगन करती है।

काला को कृष्ण, गड्ढे को गह्वर कहती है।

जैसे कृष्ण के मुख-गह्वर में समाई सारी कायनात

गढ़ी गई हिन्दी में खो जाता है विज्ञान।

आस-पास बथेरे काले गड्ढे हैं , ज़ुबान के, अदब के, इतिहास-भूगोल के,

(एक वैज्ञानिक ने तस्वीरें छापी हैं और वह एक स्त्री है

अँधेरे गड्ढों में फँसे लोग छानबीन में लगे हैं

कि किन मर्दों का काम इन तस्वीरों को बनाने में जुड़ा है)

ताज़िंदगी इनमें गिरे रहते हैं

एक दिन रोशनी आती है

कोई नहीं जानता फिर क्या होता है

इतिहास-भूगोल, विज्ञान, सब कुछ विलीन हो जाता है

भटकता रह जाता है प्यार और एक प्यारा काला-गड्ढा।

न बचता है विज्ञान और न हिन्दी बचती है। 
(2019)

Tuesday, July 28, 2020

शाना की बचपन की कविता

जल्दी ही वह तीस की हो जाएगी। इस रंजिश के साथ कि आज भी उसकी आठ साल की उम्र में लिखी यही कविता मुझे सबसे ज्यादा क्यों पसंद है।

किनारा

लहरों
के पार

दूर

मैंने
दूर नज़र फैलाई

रेतीले
किनारे पर

पत्थर
कोयले की तरह चमकते हैं

धूप
में ग़र्मी है

मुझे
नहीं एहसास

मुझे
तीखे कंकड़ों का भी नहीं अहसास

खड़ी
हूँ बस

ज़मीं
का विस्तार देखती हूँ।
             - शाना बुल्हान हेडॉक (1999- 8 वर्ष) [अनुवाद - लाल्टू़]

The Beach

I looked over the waves
Far Far away
Along the sandy coast
The stones gleam like coal
The sun is so hot
but I don't feel it
Nor the sharp rocks
I just stand there
looking into a vast land.

- Shana Bulhan Haydock (4 August 1999)

Monday, July 27, 2020

बेरहमी न देख पाने की हमें आदत हो गई

बेरहमी जो नहीं दिखती है

(हाल में न्यूज़लॉंंड्री हिन्दी में प्रकाशित)

चीन पैदाइशी धूर्त देश है। आजकल हर कोई इस तरह की बातें कर रहा है। चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही है। चीन ने चालाकी से विश्व व्यापार संगठन के नियमों का फायदा उठाते हुए कई मुल्कों में पैसे लगाकर वहाँ की अर्थव्यवस्थाओं को पूरी तरह चीन पर निर्भर कर दिया है। पड़ोसी मुल्क श्रीलंका और पाकिस्तान में ऐसे बड़े निवेश हुए हैं, जिन पर वहाँ की सरकारों का कोई बस नहीं रह गया है। चीन के अंदर भी सरकार द्वारा लोगों पर हो रहे अत्याचार के बारे में चेतना फैलानी ज़रूरी है। चीन में उइगूर मुसलमानों पर सत्ता का भयंकर नियंत्रण है। हालांकि वहां से ज्यादा मौतों की खबर नहीं आती, पर पश्चिमी मुल्कों में छप रही खबरों के मुताबिक वहाँ डिटेंशन सेंटर या क़ैदखाने बनाए गए हैं, जहाँ उइगूरों को ज़बरन आधुनिक जीवन शैली और पेशों की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वह अपने पारंपरिक धार्मिक-सामाजिक रस्मों से अलग हो जाएँ। इस पर बीबीसी और न्यूयॉर्क टाइम्स ने रीपोर्ताज तैयार कर फिल्में भी बनाई हैं। इन फिल्मों में उदास या गुस्सैल चेहरे नहीं दिखते, पर इसे पश्चिमी मुल्कों की मीडिया नरसंहार कहती है, क्योंकि यह बड़े पैमाने पर लोगों की सांस्कृतिक पहचान बदलने की कोशिश है। चीन ने सरकारी अधिकारियों को भी उइगूर परिवारों के साथ रहने को भेजा है ताकि वह उनके बारे में जान सकें और उनको मुख्यधारा में शामिल होने में मदद कर सकें। पश्चिमी मीडिया से पता चलता है कि यह दरअसल जासूसी करने का एक तरीका है।

चीन की बेरहमी हमें दिखती है। मानव अधिकार कार्यकर्ता लिउ ज़िआओ बो को लंबे अरसे तक क़ैद में रखा गया और तीन साल पहले ही उन की अस्पताल में मौत हुई है। पर क्या हम इन बातों को इसलिए देख पाते हैं कि यह बेरहमी है, या कि बस चीन को दुश्मन देश मानने की वजह से हम ऐसा सोचते हैं। मसलन काश्मीर के बारे में हमें पता है कि वहां हजारों मौतें हो चुकी हैं। चीन पर सोचते हुए हम मानते हैं कि राज्य-सत्ता द्वारा लोगों की निजी ज़िंदगी पर हुकूमत हमें स्वीकार नहीं करनी चाहिए। काश्मीर या देश के और दीगर इलाकों में मुख्यधारा से अलग लोगों पर पर बनी फिल्मों में हमें उदासी के अलावा कुछ नहीं दिखता, पर क्या सचमुच हमें यह दिखता है? पश्चिमी मुल्कों की मीडिया में विदेशों में बसे उइगूरों के साक्षात्कार छपते हैं और इनसे हमें पता चलता है कि चीन में लोगों के साथ कैसी मुश्किलें हैं। इसका प्रतिवाद होते रहना चाहिए। पर हमारे मुल्क में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के दर्जनों साक्षात्कारों पर हम कितना गौर करते हैं? लिउ ज़िआओ बो को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था। इसकी मुख्य वजह मानव अधिकारों पर उनका काम था। हमारे यहाँ मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को समाज का एक बड़ा वर्ग अर्बन नक्सल, देशद्रोही कह कर उनको धिक्कारता है। सरकार मौका मिलते ही उन्हें बेवजह क़ैद कर लेती है। ठीक इसी वक्त दर्जनों लोग, जिन्होंने ताज़िंदगी समाज की भलाई के लिए काम किया है, जेल में हैं। उनके खिलाफ झूठे इल्ज़ाम लगाए गए हैं, और पुलिस या सरकार उनके खिलाफ सालों तक प्रमाण पेश करने में नाकाम रही है। इनमें से कई बड़ी उम्र के हैं। तेलेगु के इंकलाबी कवि वरावारा राव 81 साल की उम्र में क़ैद में हैं। जेल में रहते हुए कोविड से बीमार होने पर देशभर में कई लोगों ने उनको अस्पताल भेजने की माँग की, तो देर से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। उनके परिवार के लोग चीख-चिल्ला रहे हैं कि उनकी सही चिकित्सा नहीं हो रही है, पर कोई नहीं सुन रहा। आंबेडकर के परिवार से जुड़े प्रो० आनंद तेलतुंबड़े हाल में ही सत्तर साल के हो गए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मैनेजमेंट के अध्येता रह चुके आनंद कोविड महामारी के दौरान अप्रैल में गिरफ्तार हुए। गौतम नवलखा ने हिन्दी में गंभीर वैचारिक पत्रिका 'साँचा' निकली थी और लोकतांत्रिक हक़ों के लिए संघर्षरत रहना उनकी खासियत रही है। वो भी क़ैद हैं। इनके अलावा आठ और लोगों को जनवरी 2018 में भीमा कोरेगाँव में हुई हिंसा मामले के संबंध में गिरफ्तार किया गया, और फिर फर्जी ईमेल के आधार पर इल्ज़ाम लगाए गए। इनमें से ही सुधा भारद्वाज हैं, जिसने अमरिकी नागरिकता छोड़कर और आई-आई-टी कानपुर से पढ़ाई में अव्वल दर्जा पाने के बावजूद भारत के ग़रीबों और आदिवासियों के लिए काम करने के लिए वकालत सीखी और तीन दशकों से समर्पित जीवन गुजार रही थीं। यही ग्यारह नहीं, देशभर में सरकार की मुखालफत करने वाले दर्जनों लोगों को, जैसे नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों को, गिरफ्तार किया गया है। गोरखपुर के अस्पताल में ऑक्सीजन न मिलने से हुई बच्चों की मौत पर विरोध जताने पर डॉ- कफ़ील खान को गिरफ्तार किया गया और वह आज तक जेल में हैं।

चीन में एक बड़ा मध्य-वर्ग है, जो सरकार का समर्थक है, क्योंकि उन्हें बड़ी जल्दी से पूँजीवादी व्यवस्था के फायदे मिले हैं। तालीम, सेहत सुविधाएँ, बहुत अच्छी तो नहीं हैं, पर भारत की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर हैं, हालाँकि पचास के दशक में चीन भारत से बहुत पीछे था। यूरोपी औपनिवेशिक ताकतों द्वारा आर्थिक शोषण और जापान के साथ जंग लड़ कर चीन पूरी तरह तबाह हो चुका था। ऐसी स्थिति से उबर कर आज चीन एक ताकतवर मुल्क बन चुका है। मानव विकास आँकड़ों में वह विकसित देशों के साथ टक्कर लेता है।

भारत में आज़ादी के बाद से ग़रीबों की हालत में जो थोड़े सुधार आए थे, तालीम और सेहत सुविधाओं में बेहतरी हुई थी, नब्बे के दशक में आर्थिक नवउदारवाद आने से आज तक और खास तौर पर पिछले आठ सालों से, उन में फिर से गिरावट आती रही है। धनी-ग़रीब में फ़र्क बढ़ता ही चला है।

चीन की निंदा जरूर की जानी चाहिए, हालांकि काश्मीर में या देश के तमाम और जगहों पर, जैसे छत्तीसगढ़ आदि में आदिवासी इलाकों में हमारी सैनिक या अर्धसैनिक बलों की उपस्थिति जैसी है, उसकी तुलना में चीन की तानाशाही कुछ भी नहीं है। साथ ही माओवादियों द्वारा जन-अदालत चलाकर आदिवासियों पर ज़ुल्म होते रहते हैं। दोनों ओर से पिस रहे ग़रीबों के लिए ज़िंदगी का मतलब एक ख़ौफ़नाक बेरहम तंत्र में मरते जाना है। क्या हमारे अंदर साहस नहीं बचा कि हम जो कुछ चीन में देख सकते हैं, उससे ज्यादा बेरहमी हमारे आसपास होते नहीं देख सकते? क्या हम चीन में बेरहमी सिर्फ इसलिए देखना चाहते हैं कि ऐसा कहते हुए हम बच निकलते हैं क्योंकि हमें कोई जेल में नहीं डालने डालने वाला, जैसा कि हमारे यहां के सबसे खूबसूरत उन इंसानों के साथ हुआ है, जो अपनी-अपनी जगह पर बड़ी हिम्मत और शिद्दत के साथ सरकारी जुल्म और सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ते रहे हैं। यह भी सही है कि ऐसे हालात सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं है और इतिहास में पहले भी कई बार ऐसे तानाशाही के हालात हो चुके हैं। हास्यास्पद बात यह है कि जो मुल्क मानव अधिकारों के बारे में बड़ी बातें करते हैं, खासतौर से अमेरिका, वहां तो ऐसे हालात कई बार हो चुके हैं। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान, अमेरिका में नागरिक अधिकार तक़रीबन बिल्कुल खत्म कर दिए गए थे। सरकार ने लोगों के खुल कर सियासी बातें करने या अपनी राजनीतिक राय प्रकट करने पर रोक लगाई हुई थी। किसी को भी जासूसी के नाम पर गिरफ्तार किया जा सकता था। दुनिया भर में सैंकड़ों फौजी अड्डे बनाने वाले और लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी सरकारों को पलट गिराने वाले मुल्क अमेरिका ने चीन की बढ़ती फौजी ताकत के खिलाफ प्रोपागंडा छेड़ा हुआ है, हालाँकि चीन ने अपनी सीमाओं से दूर कहीं कोई फौजी अड्डा नहीं बनाया है।

अपने समाज में बेरहमी न देख पाने की हमें आदत हो गई है। हर दूसरे दिन कोई चौंकाने वाली खबर आती है और हम पढ़-देख कर उसे भूल जाते हैं। हाल में बिहार में गैंग-रेप पीड़िता एक लड़की और उसे मदद करने वालों को पौने तीन सौ किलोमीटर दूर किसी जेल में भेज दिया गया क्योंकि उन लोगों ने बयान की प्रति पढ़े बिना हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और अदालत में इस पर बहस की थी। सुप्रीम कोर्ट के सम्मानित ऐडवोकेट प्रशांत भूषण पर अदालत की अवमानना के नाम पर मुकदमा चलना या प्रसिद्ध पत्रकार विनोद दुआ को पुलिस द्वारा परेशान करना - ऐसी खबरें आम हैं। आज हिंदुस्तान में हर जगह भय का माहौल है और धीरे-धीरे सरकार हर प्रकार के विरोधियों को क़ैद कर रही है। कोविड-19 की महामारी के दौरान यह और भी आसान हो गया है क्योंकि इकट्ठे होकर प्रतिवाद करना मुश्किल हो गया है। लोगों में ख़ौफ़ का माहौल है और अगर लोग इकट्ठे होते हैं तो बाक़ी समाज के लोग उन पर आरोप लगाते करते हैं कि वह बीमारी को फैला रहे हैं। ईमानदारी से सोचने वाले नागरिकों की यह जिम्मेदारी है कि वे यह बात लोगों तक ले जाएँ कि चीन के प्रति नफ़रत की जगह हम चीन में और हमारे यहाँ भी सियासत को समझें। हमारी दुश्मन हुकूमतें हैं, न कि आम लोग। इंसान हर जगह एक जैसा है, वह हिंद-पाक, चीन, अमेरिका-अफ्रीका और धरती पर हर जगह एक-सा है। इंसानियत को सामने रख कर हम बात करें। किसी देश को धूर्त कहने से हमारी स्थिति बेहतर नहीं होगी। हमें दुनिया के हर लोकपक्षी आंदोलन के साथ जुड़ते हुए अपने समाज की सड़न और अपने हुक्कामों से लड़ना होगा ताकि देश में बराबरी के हालात बनें।

दो कविताएँ

प्रश्नकाल के कवि से मिलना

उसे कई बड़ी कविताओं के लिए जाना गया
मैं निहायत छोटी सी कविता प्रश्नकाल से मोहित था
ऐसे मुल्क में पला-बढ़ा जहाँ वक्त ने सवालों की भरमार
पेश की और जवाब नदारद। जब उससे मिला तो कोई खास नहीं,
पर कभी न भूलने वाला प्रसंग बन गया।
ख़तो-किताबत में पहले से ही
उसे मुझसे कविता से अलग भी प्यार-सा था
वह बूढ़ा हो चुका था
पर बच्चों सी शरारती अदाएँ थीं उसमें।
सादी पर कलात्मक पोशाक में उसकी जेब में
किस्से छिपे थे, जिसे चाव से सुनाता वह बीच-बीच
में होंठ टेढ़े-से कर मुस्कराता। आम सा लगता वह आदमी कितना
खास था यह जानने के लिए तुम्हें पूछने होंगे प्रश्न और
उस जैसा तड़पना होगा इस आदमखोर तंत्रों के जमाने में।
कुछ और भी बातें की थीं मैंने
जैसे दिल्ली और हैदराबाद के मौसम पर और उम्र के साथ
बढ़ती जिस्मानी तकलीफों पर।
आखिर कभी उसे छोड़कर लौटना ही था।
फिर हर रात सपना देखना था
'पूछो कि क्यों नहीं है पूछने वालों की सूची में तुम्हारा नाम'
कहता वह। (इंद्रप्रस्थ भारती - 2020)

अजीब पहेली है

सदियों तक उबालते हैं
नस्ल, मजहब और जात के सालन
बेस्वाद या कि ज़हर का स्वाद चखते हैं बार-बार
सूली, फाँसी, बम-गोली, तरीके ईजाद किए हैं बेशुमार

बच्चों को पढ़ाते हैं सरहदों के झूठे पाठ
इतिहास, भूगोल के झूठ
गणित और विज्ञान को धुँधला कर देते हैं
बच्चे चाँद-सूरज को बाँटने की मुहिम में शामिल होते हैं

सीना-पीटू नगाड़े सुनकर नाचते हैं
प्रेम की मिठास छोड़कर ज़हरीले पित्त की कड़वाहट चुनते हैं
धरती पर भभकती बू वाली उल्टियाँ बहती हैं
आसानी से जिस्मोज़हन में घर कर जाती है

अजीब पहेली है। (वागर्थ -2020)

What a Riddle

For centuries we cook them
Sauces made of race, religion and caste
Of no taste or tasting like poison, try it again
with countless means like the cross, the hanging and firearms, invented

Teach our children falsehoods on borders
The lies of history and geography
spread mist on mathematics and science
And children join the battle to partition the sun and the moon

We dance to the rhythm of chest-beating drums
Choose the bitter poisonous bile over the sweetness of love
Stinking vomit flowing over the Earth
settles deep in our mind and body

What a riddle.

Saturday, July 18, 2020

चिरंतन-शाश्वत जैसे सुंदर लफ्ज़ गढ़े गए

आज़ादी

सबके बालों में फूल सजाए गए, उनमें काँटे भरे थे
रंग-बिरंगी पंखुड़ियों के बावजूद चुभन तीखी रही, तल्खी बढ़ती रही

कहानियाँ गढ़ी गईं, चिरंतन-शाश्वत जैसे सुंदर लफ्ज़ गढ़े गए
दर्जनों ब्याहे गए एक शख्स के साथ 
सबको मुकुट पहनाया गया  
कि एक धुन पर एक लय में नाचो
एक अंगवस्त्र पहनो

इन सबसे, इन सबमें जन्मा मैं।
मेरे जिस्म में खरोंचों की भरमार है।

देखता हूँ कि आस्मां रंगों से सजा है
हवाओं से पूछता हूँ कि मैं कौन हूँ
और मुझे बंद कोठरियों में धकेल दिया जाता है
खिड़कियों पर परदों में से छनकर आती है नीली बैंगनी रोशनी
आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं कि कोई गा रहा आज़ादी के सुर

तड़पता एक ओर हाथ बढ़ाता हूँ
कि कोई दूसरी ओर से कहता है - आज़ादी
कब मुझे कहा जाता है कि मैं रो नहीं सकता

मैं और कुछ नहीं चाहता 
बस यही कि मुझे रो लेने दो।         (विपाशा - 2019)

Thursday, July 16, 2020

सब कुछ धुँआ-धुँआ है

जागने पर क्या दिखेगा

धरती को कभी ऐसा देखा न था
जैसे मेरी माँ नहीं, बेटी है
अभी कल की जन्मी
अँगड़ाई लेना सीख रही
धरती लिपटती है मुझ से
तो घबराता हुआ उसका माथा थामता हूँ
कितनी नाज़ुक, नर्म, हल्के-से ताप की गठरी है

धीमे चलता हूँ, धरती कहीं टकरा न जाए
ख़ला में तारों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं
कभी भी ठोस-द्रव-गैस हर तरह की टक्कर कहीं से आ सकती है
धरती को गीत गाकर सुलाता हूँ
उसके चेहरे पर महाकाश से आती रोशनी देखता हूँ

धरती रोती है बेचैन होता हूँ
पुचकारता हूँ आगे पीछे चलता हूँ दोलता हूँ
अनकही कहानियों में से चुनिंदा उसे सुनाता हूँ

इस तरह धरती को प्यार करते देख किसान गर्दन उठाकर देखते हैं
फसल रोपते हुए वे धरती के लिए गीत गाते हैं
गर्म हवाएँ थोड़ी देर थमी रहती हैं
बादल रिमझिम संगीत बन बरसते हैं
किसानों को अंदेशा है कि मैं धरती की नज़ाकत से घबरा रहा हूँ
वे भरोसा देते हैं कि धरती मेरा प्यार सह लेगी
उन्होंने धरती की चमड़ी पर जीवन-गाथाएँ उकेरी हैं
हवाएँ बहती हैं कि प्यार उफन रहा है
धीमी बयार और तेज झोंके जब जैसा सही है

देखो, धरती फिलहाल नींद में है
जैसे मैंने दुलार कर सुला दिया हो
पलकें भारी हो आई हों
और सपनों में आरोह-अवरोह चल रहा है

यही वक्त है कि मैं सो लूँ
कौन जानता है कि जागने पर क्या दिखेगा
क्या धरती रहेगी क्या मैं रहूँगा
मोतियों की थाल लिए आस्मां रहेगा
कुछ कहा नहीं जा सकता
सब कुछ धुँआ-धुँआ है
फिलवक्त मैं और धरती
नींद के दोलन में दोल रहे हैं। (इंद्रप्रस्थ भारती -2020)

Wednesday, July 15, 2020

हाल में प्रकाशित कुछ और कविताएँ

मुझमें

मुझमें यह कौन बैठा है
जीत का दर्प जिसके ज़हन में बैठा है
वह चलता है जैसे कोई मशीन चलती है
कदम दर कदम वह धरती को जीतना चाहता है

जीतकर
शहर बसाऊँगा
नाम फैलाऊँगा
जो उजड़ गए उन बच्चों की
माँओं की बद-दुआएँ जमा करता रहूँगा

किन दुखों ने मुझे ऐसा बनाया है
क्या कोई कंधा नहीं था जब मैं रोना चाहता था

शौक से यायावरी क्यों न कर पाया
क्यों न चल पड़ा कभी
बसे हुए गाँव-शहरों में से गुजरते
जंगलों, पहाड़ों में से ऊबड़-खाबड़ ज़मीं के साथ न बतियाया
न बैठा, पल भर चैन से संगीत न सुना

न सुना कि हवा की साँय-साँय में कोई गा रहा है
आरोह-अवरोह गाते हुए सैर न किया

परिंदों, जानवरों से प्यार न किया
तस्वीरें न बनाई

वे इलाके, जहाँ मौत के खेल खेल चुका हूँ, कोई मेरे नहीं रहेंगे
औरों की क्या, मैं खुद अपना नहीं रहूँगा
कभी जागना होगा कुछ और बनकर


****

बोझ

फ़ोन पर, ख़त लिखकर, कभी न नहीं कहा
कहते हुए जैसे अपने ही कान दुखते हैं
अपनी ज़ुबान में कभी न नहीं कह पाया

कभी कहा तो ऐसी ज़ुबान में कहा कि खुद समझ न पाया
तर्जमा किया तो न न नहीं रहा
कुछ और कहता गुजर गया

कभी सोचा कि इस पल नहीं
फिर कभी न कह देंगे
इंतज़ार में रहा कि कभी
हर कोई उदासीन हो जाएगा
दीवारें कान बंद कर लेंगी
और चुपके से न कह दूँगा

कह देता तो क्या बिगड़ना था
जो अभी न है हमेशा न रहे ज़रूरी नहीं है
जिस्मोज़हन की ज़रूरतें बदलती हैं
रूह की फरियाद बदलती है
डिलीट भी हो जाता है लिखा हुआ लफ्ज़

सुननेवालों ने न सुनना चाहा होगा
मुमकिन है कि कोई मुखालफत न करता
किसी से माफी नहीं माँगनी पड़ती
न न कह पाना बोझ बन गया चिरंतन

ऐ खुदी, माफ करना
जानता नहीं कि क्यों न नहीं कहा। (वागर्थ -2020)

***

अहल्या

लड़की को पता था।

क्या सचमुच पता था
क्या वह पारदर्शी नकाब बुन सकती थी
उसे मिला था इश्क मजाज़ी
कहा गया था कि जीना है इश्क हक़ीक़ी
जीवन का हर तंतु तत्सम बुनना है
और इस तरह खेल खत्म हो गया।

बाक़ी बचा पत्थर का सनम
खेल देख रहे माँ-बाप-भाई-बहन-देवर-ननद-जेठ....
मान लेना है, समझ लेना है कि पाप हुआ है।

पथरीले अणुओं से बना उसका दिल धड़का होगा
आँखें थक कर जम गई होंगी
जाने कितने दिनों तक न आई नींद
उदासी की मोटी परत बनकर उतर आई होगी
कहते हैं जवानी की नींद गाढ़ी होती है

उँगलियों के छोर तरस रहे होंगे
कि प्रेम की खरोंच जड़ दे फिर से फिर से
हुस्न अमूर्त खयाल बन कर जम गया होगा

कहानी खत्म हो सकती थी
पर नहीं, अभी एक और पुरुष का आना बाक़ी है
स्त्री फिर आज़ाद होगी मर्यादा पुरुषोत्तम के पाँव तले
उसका प्यार कैसा तड़पता है अब तक
इंद्र को क्या पता।

- विपाशा (2019)

लेनर्ड कोहेन का बूगी स्ट्रीट

एक महीना हो गया - इसे फेसबुक पर पोस्ट किया था।

उन्माद के माहौल में हम प्यार की बातें करेंगे। साल भर से कोशिश में हूँ कि मेरे प्रिय गीतकार लेनर्ड कोहेन के इस गीत का तर्जुमा कर लूँ। मुश्किल है, अब तक जहाँ हूँ, पेश है -

ऐ रोशनी के ताज, साँवले यार
कभी न सोचा कि मिलेंगे एक बार
आ चूम लें, कि बस यही दो पल
लौटा हूँ मैं मीनाबाज़ार

एक घूँट जाम, यह नशीला धुँआ,
कि बस यही दो पल।
मैंने हर कोना सँवारा है
साज बजने को है बेकल

शहर से आते हैं बुलावे
महफिल कर रही है इंतज़ार
मैं वही हूँ, और जो हूँ,
लौटा हूँ मीनाबाज़ार

ऐ दिलरुबा, मुझे याद हैं
वो खुशियाँ
वो साथ नहाना
वो झरना वो दरिया

तेरे हुस्न का जादू,
मेरे हाथों में तेरे पाँव तर
वो तेरा मुझे ले चलना
जवाँ मैं चला था प्रीतनगर

ऐ रोशनी के ताज, साँवले यार।
कभी न सोचा कि मिलेंगे एक बार
आ चूम लें, कि बस यही दो पल
लौटा हूँ मैं मीनाबाज़ार

ऐ दुनिया, फ़िक्र न कर
हवा में फुनगे हैं हम
प्यार ही कायनात है
प्यार में फना हैं हम

रगों में बहते ख़ूँ के नक्श
दरबदर बयां हैं
कोई बताए तो हमें
कि मीनाबाज़ार क्या है

ऐ रोशनी के ताज, साँवले यार
कभी न सोचा कि मिलेंगे एक बार
आ चूम लें, कि बस यही दो पल
लौटा हूँ मैं मीनाबाज़ार

एक घूँट जाम, यह नशीला धुँआ,
कि बस यही दो पल।
मैंने हर कोना सँवारा है
साज बजने को है बेकल।

हाल की कुछ गद्य कविताएँ

इधर कई सारी  प्रकाशित कविताएँ फेसबुक पर पोस्ट करता रहा हूँ। अब थकने लगा हूँ, फेसबुक और ब्लॉग दोनों पर पोस्ट कर पाने में देर हो रही है।


समालोचन व्लॉग पत्रिका पर (2020)

 1
इंसानियत एक ऑनलाइन खेल है, जिसमें बहस और हवस की स्पर्धा है. सारी रात कोई सपने में चीखता है कि चाकू तेज़ करवा लो.

औरत घर बैठे मर्द को देख कर खुश होना चाहती है. घर बैठा मर्द औरत को पीटता है. सपनों के तेज़ चाकू हवा में उछलते हैं. उनकी चमक में कभी प्यार बसता था.

सड़कों पर कुत्ते भूखे घूम रहे हैं. कुत्तों से प्यार करने वाले इंटरनेट पर चीख रहे हैं. इंसान कुत्ता नहीं है. कानूनन इंसान सड़क पर भूखा घूम नहीं सकता. इंसान ने तय किया है कि वह कुत्ता है. अपनी टोली बनाकर पूँछ हिलाते हुए लोग घूम रहे हैं. औरत और मर्द भूल चुके हैं कि वे औरत और मर्द हैं. कोई हिलाने के लिए पूँछ और कोई दिखाने के लिए दाँत ढूँढ रहा है. इंसानियत एक ऑनलाइन खेल है, इंसान इस बात से नावाकिफ है कि वह महज खिलाड़ी है. खेल में पूँछ हिलाता कुत्ता खूंखार हो सकता है.

चाकू की चौंध कब रंग दिखाएगी, यह इतिहास की किताबों में लिखा है. 


 2
सारा रोना आसमान रो लेता है.

जो बरस रहा है वह अवसाद है. जो बरसने से पहले था वह अवसाद था. बारिश रुक जाती है. नदियाँ अभी भरी नहीं है. पहली बारिश में नदियाँ बह रही हैं. नदियों में यादें बहती हैं. जिनकी यादें हैं वे एक-एक कर बह जाते हैं. बहती हुई यादें बह कर भी रह जाती हैं. जो बह जाते हैं, उनके लिए सही लफ़्ज ढूंढते हैं, जैसे- दोस्त, प्रेमी, यार.... बचपन की यादें बहती हैं. बापू का सीना बह जाता है. उछल कर उसके सीने पर बैठना चाहो तो बैठ नहीं सकते. रोना चाहो तो रो नहीं सकते.

सारा रोना आसमान रो लेता है. हम सारी धरती पर अपने आंसू टपकते देखते हैं. कोई कहता है- थोड़ी देर और. पंछी आएगा. पंख फरफराता बादलों के छींटे बिखेर जाएगा.  थोड़ी देर और.


 3
मैं सोया हुआ हूँ कि जगा हूँ
कि इक साए की गिरफ्त में हूँ
कि खुद ही साया हूँ
हवा बहती है कि मैं बहता हूँ
सुबहो-शाम किसी से कुछ कहता हूँ
कि कायनात के हर कण में इक कहानी है
हर वह कहानी इक दर्द है और हर दर्द कोई शख्स है

कहीं कोई पनचक्की चल रही है
वातायन में लगातार एक आवाज़ गूंजती है
तुम किस बीमारी के खौफ़ में हो. वह आएगी
वह खड़ग-धारिणी, वह अपरुपा, वह हर किसी पर आएगी
एक दिन हर किसी की कायनात गायब हो जाएगी
मैं देखता रहूँगा सोया या कि जगा हुआ
कोई झटके दे-देकर मुझे जगाता रहेगा
कि सुबह हो गई है, सुबह हो गई है
मैं जागूँ तो क्यों जागूँ
बीमारी हर साए में घुली हुई है
हर मुस्कान में एक अँधेरा है
जो मुझसे शुरू होता है
मुझमें विलीन होता है.



 4
वह मुंबई से चेन्नई जाते हुए करीमनगर में मर गया. वह लखनऊ में मरा कि उसे जीवाणु नाशक दवा पिला दी गई. वह मरा तीन में से एक कि वह बाकी दो को गाड़ी में बैठाकर ले जा रहा था. इन सबके हाथों में इक्कीसवीं सदी थी. किसी की आवाज़ बज रही थी. क्या हुआ! कैसे हो! जवाब क्यों नहीं देते? नहीं, वे हवाई जहाज से नहीं जा सकते थे.

उनमें से जिनके लिए ग़रीब लफ्ज़ लागू नहीं होता, वे किस्मत के मारे थे. जो बिस्किट खरीदने गया था, उसे मरना ही था कि वह पुलिस के हाथ आ गया मुसलमान था. पी एम को यह कहते हुए तकलीफ हुई कि बीमारी हिन्दू-मुसलमान नहीं देखती, जैसे किसी समीक्षक को आपत्ति थी कि कविता में हिन्दू-मुसलमान नहीं घुसना चाहिए. बहुत सारे लोग ढोल-नगाड़ों के साथ प्रेम बाँटते हैं जब नौजवान प्रेमियों की हत्याएं होती हैं. समांतर सच.  सच के समांतर.

हर सुबह एक कबूतर और मुझमें गुफ्तगू होती है. मैं इतना खतरनाक नहीं हूँ कि गिरफ्तार हो जाऊं. कबूतर खतरनाक है, इसलिए रोज उसे बतलाता हूँ कि कुछ दिनों तक अपने घोसले में बंद रहो. धर-पकड़ चल रही है. मैं रंगीन पर्दे पर ख़बरें पढ़ता हूँ. 12% और बीमार. सवा सौ मर गए. अभी आँकड़ा चलेगा. हर छ: दिन में दुगुना. कबूतर खिड़की पर बैठा बोर होता रहता है. थोड़ी देर में उड़ जाता है. मुझे नीचे दूध लेने जाना है. मास्क ढूंढता हूँ.  


 5
कोई भजन-कीर्तन नहीं हो सकता. घर में भगवान बुलाओ. घर में नमाज़ पढो. बैंक डूबेंगे. नाश्ता करते हुए सोचो. हाथ में झाड़ू लेते हुए सोचो. जब अम्मा एकदिन आएगी उसे पैसे दे दोगे. वह नहीं जानेगी कि म्युचुअल फण्ड डूब गया है. सब डूब रहे हैं. राहत कोष को राहत पहुँचाने एक और कोष. चीन बैंकों को खरीद रहा है. कोई सब कुछ बेच रहा है. बार-बार पेशाब आता है. बाथरूम जाते रहने से सचमुच कुछ भी खो गया वापस नहीं आता. हिसाब लगाते रहो.

जी रहे हो. आईने के सामने खड़े होकर देखो, सचमुच जी रहे हो. जीवन की महक है. ख़ौफ़ में जीवन है. क्या ख़ौफ़नाक है- जीना या मरना?

जो ऊपरी मंजिलों से कूदकर मर रहे हैं, उन्हें किसका ख़ौफ़ था?
जिनके लाखों डूब जाएंगे, वे भी कूदेंगे; जो सैकड़ों मील चलकर घर नहीं पहुंचेंगे, वे बिना कूदे मर जाएंगे. कोई पुलिस की लाठी से मरेगा, कोई भूख से मरेगा. गर्मी से मरने वालों की गिनती अभी शुरू होनी है.   


 6 
ऐसे वक्त में जब खुद को बचाए रखना ही सुबह है, और शाम है, खयालों में वह एक स्वार्थी इनसान सा आती है. पोथियों, संस्कारों और डांट-डपट से हमें बतलाया गया कि वह स्वर्ग से भी ऊपर है, पर सचमुच उसके सपने कभी डरावने होते हैं! हमारे अपने डरों के धागे उस तक पहुँचते हैं. सोचने लगें तो जलेबी की तरह चकराते खयाल ज़हन में फूलते हैं; अकसर वे बेस्वाद होते हैं. यादों में उसका रोना सबसे ज्यादा दिखता है और एहसास होता है कि कोई अंतड़ियों में रो रहा है. किसी ठंडी सुबह बासी रोटी गर्म कर दही के साथ खिलाते हुए उसकी आँखें मेरे सीने पर टिक गई थीं और वह जल्दी से मफलर ले आई थी कि हवाएं मेरे आर-पार न हो पाएं. किसी कहानी में जिक्र किया है कि उसने कभी गर्भ गिराया था. वह महानायक तो नहीं पर किसी गुमनाम कथा की नायक तो है, जिसने ताज़िंदगी अपने सपनों को भूलने की कोशिश की, कि हम सपने देख सकें.  


 7
कुछ दिन पहले अमलतास और पलाश के रंग मेरी नज़र में थे. इंसान हर मौसम में उदास खिलता है, पौधे और पंछी बसंत और वर्षा में रोते हैं. पंखुड़ियां एक-एक कर पुरजोर जय-जयंती गाते हुए जमीं पर बिखर जाती हैं. धरती पर मिट्टी, घास और रंग बेतरतीब गश्त लगाते हैं. कभी कोई दौड़ता दिखता है. जिस किसी को हवा छू लेती है, वह उन्मत्त नाचता है. दूर मटमैली सड़कें दिखती हैं, नशीली, बिछी हुईं जिन पर लोटने का मन करता है. धूप-छांव, हर सपने में बार-बार लौटते हैं. देखते-देखते जिंदगी गुजर जाती है.

इस स्टेशन पर हमेशा के लिए रुक गया हूँ. खुली या बंद आँखें मैं देखता हूँ कि गाड़ियाँ आ-जा रही हैं. हर कोई दूसरे से अलग है, पर उनकी आत्माओं को छूता हूँ तो हर कोई एक जैसा रोता है. मैं गाड़ी पर चढ़कर इस या उस ओर जाना चाहता हूँ; पहुँच कर देखता हूँ कि उसी स्टेशन पर खड़ा हूँ. यहाँ खड़े होकर लोगों को बिछड़ता देखता हूँ. नकाब पहने लोग आपस में गले मिलना चाहते हैं, पर मेरी नज़र उन पर पड़ते ही वे सिमट जाते हैं और एक दूसरे से दूर हो जाते हैं. उनके बीच दुःख की तरंगें आर-पार होती हैं.

अचानक दूर होते हुए किसी को कुछ याद आता है. गाड़ी वापस आती है और अपने साथी को ढूँढती है. मैं धीरे से दोनों गाड़ियों को पास ले आता हूँ. 

हमेशा यहीं रुके रहकर आंसुओं के सैलाब में बहता रहता हूँ.  


 8 
सुबह गिनती से शुरू होती है कि रसोई की गैस का सिलिंडर देने वाला हफ्ते पहले आया था. सब्जियां चार दिन पहले ली थीं. अभी तक सिर्फ गले की हमेशा वाली खराश है. किस्मत पर भरोसा जैसा झूठ को सच मानकर जी रहे हैं. पुलिस की मार से जिसकी कमर दुःख रही है, उसका भी सच है कि वह थोड़ी दूर और निकल आया है. गठिए से सूजा बाएं पैर का अंगूठा अपने सच में जीता है कि यह बस आज भर की कहानी है. खिड़की से जो बवंडर दिखता है, वह उड़ जाएगा, हर कोई यह सच जीना चाहता है. आखिर में हर कोई क़ैदखाने में होगा. तानाशाह शैतान के पैरों को छूकर शपथ ले रहा होगा कि हर किसी से झूठ को सच मनवा कर रहेगा. लोग तानाशाह की वंदना गाते हुए कतारों में खड़े रहेंगे. अदृश्य बंद दरवाजों को पार करने के लिए खड़े हुए लोग सड़क पर लेट जाएंगे.

सड़क जिस्मों से ढंक जाएंगी. मुर्दाघरों से निकलता अशरीरी शोर हर ओर गूँजेगा. हर सुबह गिनती करते रहेंगे कि शांत सुखी आत्माएं स्वप्न लोक का सफर कर रही हैं.  


 9
दीवारों पर सीलन बढ़ती चली है
नम हवा में शाम जगमगाती है
कुछ खींचता-सा है. कोई है
कोई जो पुकारता है. कोई मेरे सभी
सच जान चुका है. मेरे डर, अकेलेपन
का कायर सुख, मेरे दुखों के रंग,
मेरी सूखी त्वचा, सब उजागर है.
हमेशा इंतजार रहा कि कुछ होने वाला है,
अब
क़ैदखाने की आवाज़ों का इंतजार है
जहाँ एक-एक कर सभी फूल दराजों में बंद हो चुके हैं.

मुझे कोई देख ले तो पूछेगा कि जब सारे दोस्त छीन लिए गए कैसे जी रहे हो
कैसे इस श्रृंखला में उत्श्रृंखल होने के सपने देख रहे हो. यही है, गति के नियम,
भौतिकी का गणितशास्त्र. प्रलय को अब ज्यादा देर नहीं;
भले सिपाही आग बुझाने को दौड़ रहे हैं. वक्त
वैसा ही है, जैसा हमेशा था, मैं अपने खेल
खेलता देखता रहा कि कुछ बदल रहा है. यही है,
जीवन. गुलामी और ईशान कोण से आता बवंडर. 


 10 
सबको यह इल्म था कि एक दिन हर कोई तूफान में बह जाएगा. हर रात हम पूछते रहे कि सुबह किसकी बारी है. करीब आती साइरेन की आवाज़ से बचने के लिए हम कानों को चादर से ढँक लेते. सपनों में प्रार्थना करते कि जब उड़ना हो तो एक साँस में निडर उछल सकें. हम कब सो जाते और कब नींद से वापस जागरण में आते यह लम्बी कहानी बन सकती है. नींद और जागने के बीच हम खुद से बतियाते कि गर्मी आ रही है और दुश्मन थक गया होगा.   प्रियजन तैयार हो रहे थे कि हम सब आखिर में नींद में ही उड़ चलेंगे.

कानों को चादर से ढंकने पर पसीना सीने से कानों तक चढ़ आता. पंखा तेज चलता तो शैतान जैसी आवाज़ें निकालता और हमें लगता कि गिरफ्तारी का फरमान लेकर वे आ पहुँचे हैं. हम अदालत में खड़े होकर गाना गाने का सपना देखते और वे एक-एक कर हमारे दाँत उखाड़ते रहते कि गाना गाते हुए हम दांतों के बीच में से हवा निकालें और बाँसुरी जैसी आवाज़ में हमें रोते हुए सुना जा सके. हम चादर के अन्दर से चाँद को पुकारते कि गर्म रात किसी तरह चाँदनी सरीखी शीतल हो. कहीं से किसी रुदाली का स्यापा सुनाई पड़ता और हम जान लेते कि कोई और क़ैदखाने में दाखिल हो गया है.


इस तरह वह संक्रमण काल बीतता रहा, जब हमारे बाल एक-एक कर झड़ते रहे और नाक की चमड़ी झुर्रियों से भरती रही. बच्चे हमें देख कर डर जाते कि कहीं भूत तो नहीं.   


 11
खुद एक कहानी हूँ.

जब से सफर पर  निकला हूँ, जहाँ जिन पड़ावों पर पहुँचा हूँ, वे दर्ज़ हो रहे हैं.

गुजर चुके मौसम कहानी में आते हैं. जो प्यार मिला, जो दिया और जो बह जाने दिया, अपनी और किसी और की ज़िंदगी में आना और जाना. दर्ज़ हुई कहानी हमेशा वह नहीं होती जो सचमुच घटित हुई होती है.  जिन रंगों को पहना, जिन्हें आँखों में उतरकर जलने दिया, जो सुबहें थीं, जो रातें.

हर कुछ फिर से जनमता है, हलक से निकलती हुई चीख रुक जाती है. रंग कभी वह नहीं होते जो गुजरी ज़िंदगी के गर्भाशय में क़ैद हैं. कहानी लिखना खुद से दगाबाज़ी है. खुद को प्रयोगशाला की बेंच पर लिटा कर जिस्म की चीरफाड़  करनी है जब रुह पास खड़ी होकर सब कुछ देखती है. जो मैं था, मैं नहीं हूँ.  


 12
हर कोई किसी का इंतज़ार कर रहा है.

कोई है, जो आएगा.  कौन है, जिसका इंतज़ार हर कोई कर रहा है.

क्या वह एक आदमी है, गोदो, या कि हर किसी के लिए अलग लोग आएँगे?

कोई नहीं जानता कि कौन आएगा. क्या तुम जानते हो कि तुम्हें किसका इंतज़ार है? यह बचकाना सवाल है, यह तो बहुत पहले बहुत सारे लोग पूछ चुके हैं. तो जवाब क्या है?
कोई जानता है, कि जवाब क्या है?  


 13
बिस्तर, छत, दीवार-खिड़कियों के बीच
हैं खबरें. जीने की लड़ाई.
हमें विराम चिह्नों के बीच पर्याप्त जगह मिल गई है.
खिड़की से धूप आती है तो कभी बंद कर लेते हैं.
बारिश के छींटों के साथ खुशी बदन गीला कर जाती है.
ज्यादा भीगने पर खिड़की बंद कर लेते हैं. एक दूसरे की ओर देखकर
फिल्मी गीत गा लेते हैं. दूसरों की मौत-बीमारी सुनकर ख़ौफ़ में न आने की आदत है.
 मौत से डर नहीं, मौत के इंतज़ार का डर है. 


 14
शाम देर से आती है
कभी बादल धूप से बच निकलने में मदद करते हैं
तो शाम से मिलने वक्त से पहले निकल पड़ता हूँ
सड़क पर कोई नहीं होता
कुत्ते दुम हिलाकर खबर लेते हैं
अचानक जूते का फीता बाँधने रुकता हूँ
तो भौंककर कहते हैं कि मत रुको
इस तरह मेरे और उनके पल बीत जाते हैं.
*******

जानकीपुल वेब पत्रिका पर 

खंडहर : एक सफर

1
ठंड की बारिश बन टपक रहा हूँ। बेमहाबा ग़ालिब सा आतिश-ए-खामोश के मानिंद जलता हुआ।
पहाड़ से पत्थर गिरकर सड़कें टूटी हुईं। अँधेरे में दो घंटे।
सुबह एक छोटी बच्ची बन कर आई है, दोस्त बन गई है। पत्ते, पत्थर, मिट्टी, लकड़ी के टुकडे, उसके खिलौने।
समझ नहीं पाया हूँ कि मैं यहाँ क्यों आया हूँ। भाग रहा हूँ। सच है कि भागना चाहता हूँ। पर भाग नही सकता, कहीं छिप नहीं सकता।
दोपहर बारिश में देसी दारू की गंध। मक्का और कोदो के दानों में पानी मिलाकर लकड़ी की नलियों से बारिश पी। खट्टी अंगूरी।

सुकून है कि पहाड़ हैं।  
2

कहीं तो पहुँचना है। थकी हुई किस्मत से महरूम बारिश।
खुद से रूबरू, ग़ाफिल, कुछ न सोचने की कोशिश में बारिश। ग़फलत के अनगिनत पल।
दरवाजे पर आहट। एक बड़ा मेढक बेताबी से खड़ा है।
“कौन है भई?” मेढक से पूछता हूँ।
मेढक मेरी ओर देखता है। वह पूछता है, “तुम कौन हो भई?”
जिस खंडहर को पढ़कर मैं भागकर यहाँ आया हूँ, वह उसे थमाता हूँ – भाई, पढ़ लो।  
3

कहानी लिख रहा हूँ। खंडहर टूटी दीवारों, इतिहास के भूचालों या मलबे का जंजाल नहीं है। मेरा कोई होना महज प्रासंगिक है। इतनी बुरी तरह सर्वव्याप्त हूँ कि अदृश्य हूँ। संकट की तैयारी में सोचना नहीं पड़ता।

देश के असंख्य महानगरों, नगरों में मैं दिख जाऊँगा। कुछ बातें हैं, जो मुझमें और किसी औरत में एक जैसी मिल जाएँगी।

यह खंडहर, जिसमें बैठा, जहाँ गिरा, जिससे दबा, जहाँ एक जंगली फूल की तरह उगता हुआ, जिसमें गंदे कीड़े की तरह कुलबुलाता हुआ, जिसकी धूप और जिसके अँधेरे में जागता सोता हुआ, बिखरे नुकीले काँटों पत्थर व काँच के टुकड़ों से बार बार घायल होता हुआ, मैं ज़िंदगीनामा तैयार कर रहा हूँ, यह मुझे कब मिला या मैं इससे कब मिला, यह बतला पाना मुश्किल है, क्योंकि मेरे जन्म के पहले इस खंडहर के मेरे साथ होने का दावा मैं नहीं कर सकता। पर मेरा जन्म कब हुआ?

एक दिन अचानक अपने साथ चलते खंडहर को देखा। ऊपर नीचे चारों ओर, इस तरह मुझसे चिपका हुआ था कि अचरज हुआ कि अब तक अब तक इसे देखा क्यों न था। धीरे-धीरे एक-एक ईंट का टुकड़ा पहले से देखा हुआ लगने लगा। एक के बाद एक खंडहर का हर कण अपने अतीत में मिल गया।

खंडहर अनादिकाल से साथ है। बिना किसी पहचान के, अदृश्य, सोया हुआ, खोया हुआ।
खंडहर, मैं, मेरे द्वारा खंडहर की पहचान और खंडहर का होने वाला ध्वंस, यही कहानी बार-बार।


4

नक्सलबाड़ी में लोग रहते हैं। लोगों के साथ गाय-भैंस, मुर्ग, कुत्ते, बिल्ली भी रहते हैं। नक्सलबाड़ी से पानी-टंकी इलाके तक और वापस बसें चलती हैं। बसों के साथ और गाड़ियाँ, टैक्सियां, आटो, स्कूटर भी चलते हैं, इन इलाकों से बोर्ड दिखते हैं, जो बतलाते हैं कि नक्सलबाड़ी एक इलाका है। वहाँ कोई टूरिज़्म नहीं है, पर होना चाहिए, गाइड होने चाहिए जो पचास साल पुराना इतिहास बतलाएं। – इतना लिख कर हाथ रुक जाता है। कलम रुकती है कि हाथ रुकता है? या ज़हन रुकता है।
कौन ‘हवा-ए-सरे-रहगुज़र’ जीता है? किसकी लाश खिंची जाती है?


5

एक बच्चे ने पूछा- आप कौन हैं?
मैं मुस्कराता हूँ।
एक लड़की जिसके चेहरे पर जरा सी विकलांगता है, बिगड़ी आवाज़ में चिल्लाती है- तुम चोर हो, भाग जाओ। वह देर तक चिल्लाती है- भाग जाओ, तुम चोर हो।
या ग़ालिब, ग़मे रोजगार छूटता ही नहीं है।


6

पहाड़ बादलों से ढँके है। सैलानी बादलों को देखकर खुश हैं – एक-दूसरे को दिखला रहे हैं।

दस जगह सोच कर निकले हैं, एक से भी रंगे नहीं जाएँगे। अब किसी और व्यू-प्वाइंट के लिए निकलेंगे – यहाँ बारिश ने चौपट कर दिया। लौटकर कहेंगे कि ये देखा और वो देखा।

पहाड़ से पूछता हूँ कि यह किसका खंडहर ढो रहा हूँ। एक सफेद आवाज़ मुझे सहलाती है।

7

कमरे की पिछली दीवार की खिड़कियों के पार थोड़ी दूर एक गाय और उसका बछड़ा बँधे हैं। दूसरी दीवार के पार इलायची के पौधे हैं, इसी तरफ से पहाड़ बुलाते हैं।

थोड़ी देर के लिए धूप। पानी भाप बनता बादल बन उड़ चला, और छोटे-छोटे उड़ते बादल।
कपड़े जो धोए थे उन्हें सुखाने के लिए जगह नहीं।
दिनों से दुनिया की कोई खबर नहीं है। फ़ोन पर न्यूयॉर्क टाइम्स और गार्डियन की हेडलाइन है। न्यूज़ एलर्ट देखते ही डिलीट करता हूँ।


8

सोचने को इतना कुछ है, निश्चिंत सोचता हूँ। सोचते हुए दिन गुजारता हूँ। बचपन से सोचता रहा हूँ। सोचना चिंताओं से भरा होता है। अनगिनत अपराध-बोध, डर, शंकाएं, यही सोच के पर्दे पर नाचते हैं, निश्चिंत सोचता हूँ। पहली बार इस तरह सोच रहा हूँ। हमेशा छिपा नहीं रह सकता, हालाँकि छिपा तो यहाँ भी नहीं हूँ। कोई पकड़ना चाहे तो आसानी से ढूँढ सकता है। तमाम शंकाओं में दूसरों को जीता हूँ।

खंडहर जारी है।


9

हल्की ठंडी हेमंत की इस रात को पहाड़ों के सामने खड़ा मैं क्या कर रहा हूँ! थोड़ी देर पहले धानखेत के सामने छोटा नाला पार करते वक्त पैर में एक जोंक सट गया था। इसके पहले कि हटा सकूं, उसने खूब खून चूस लिया। पसीना आ रहा है। रात में धूप खिल गई। दूर से कोई आ रहा है। परिचित-सा। बहुत कोशिश करके भी पहचान नहीं पाता हूँ। मैंने इसे कहीं देखा है। वह बहुत करीब आ पहुँचा है। उसकी आँखें ठंडी हैं। किसी ने मेरी बाँह पकड़ ली है।
“जाओ, मिलो इनसे, तुम इनसे जरुर मिलो।”
इसी बीच वह आदमी सामने खड़ा है। उसने उंगली उठाकर मुझे कुछ कहना शुरु किया है – अस्पष्ट शब्दों में…
“…..तुमने पूरे परिवार को बिगाड़ दिया। तुमने एक बार भी नहीं सोचा कि तुम्हारे चले आने के बाद …?”
“पर मैं तो …। मुझे क्या मालूम कि …।
“तुम मुझे नहीं पहचानते?” उसकी आवाज में गहरा अवसाद था।
”मैं कैसे नहीं आता! मैं तंग आ चुका था।”
“तुम नहीं समझोगे बेटे हिंदुस्तान में जनम लेना कैसा अभिशाप है।”
अभी तक समझ में नहीं आया यह आदमी है कौन – पूछने से पहले ही वह बोल उठा, “मैं तेरा पिता हूँ बेटे।”
उस आदमी को धक्का देने की कोशिश करता हूँ। वह पत्थर की मूरत बन गया है। उसके कपड़े, कुर्ता धोती सब पत्थर के तराशे हुए बेजान चीज़ें बन गई हैं।
“चलो, वापस चलें।”
“कहाँ ?”
”तुम्हारे घर, जहाँ से तुम बहुत पहले चले आए थे।”
“मेरे घर?” ….. वहाँ मेरा अब कौन है?
वह आदमी, जिसने खुद को मेरा पिता कहा, वह फिर खड़ा था। उसके पास एक जवान लड़की थी, जिसके चेहरे में कुछ था पहचाना हुआ – फिर वही दिक्कत, याद नहीं आता, कहाँ देखा है।
मैं गुस्से से उबलकर उस आदमी पर कूद पड़ा। अब वह गायब हो गया। वहाँ कोई नहीं है, मैं बीच सड़क पर खड़ा हूँ और कोई नहीं है।
”तुम्हें पता है, वह आदमी कौन था?”
”वह तुम्हारे पिता की प्रेतात्मा थी!”
वह जवान लड़की बैठी है। मैं दौड़ने लगता हूँ। वह पीछे से कुछ कहने की कोशिश कर रही है।
कुछ कहना चाहता हूँ। उसने मेरा गला पकड़ लिया है। खिड़की से रात के तीसरे पहर का गहरा भूरा आकाश दिखलाई पड़ रहा है। दो तारे हैं। शरीर पसीने से तर है। 
10

इस वक्त भूख कुछ और है। नीम-बेहोशी और बुखार में कहीं लेटा हूँ।
सुबह होने में देर नहीं है। बीच-बीच में रह-रह कर किसी का चेहरा दिमाग में तैर रहा है। अंदर धक् सी कहीं कोई आग जल उठती है। कोई कहता है कि उसका गला पकड़ लूं और एक-एक नस कुतर दूँ।
सुबह। ठंडी हवा।
और वह धीरे-धीरे मेरी दुनिया से निकल गया।

11

कायनात की शुरूआत में दो नदियों, तीस्ता और रंगीत को इकट्ठा लाकर संगम करवाना था। तीस्ता नर और रंगीत मादा। सारे प्राणी इकट्ठा हुए और पूछा गया कि कौन तीस्ता को लाएगा कौन रंगीत को। साँप ने कहा कि वह तीस्ता को लाएगा। वह सीधे चलता हुआ तीस्ता को ले आया। रंगीत को लाने चली चिड़िया। चिड़िया को लगी भूख। वह कभी दाएं तो कभी बाएं दाने चुगती रही। इसलिए रंगीत बलखाती हुई आई, फिर दोनों नदियों का संगम हुआ।

सुबह चाय के साथ धूप में पहाड़। एक छोटी बच्ची, बिना कुछ खाए-पिए, दूर तक मस्त चलती है। आधा रास्ता जंगल के बीच में से है।
किस अनहोनी से आतंकित हूँ, मुझे पता नहीं है, पर सोचता रहता हूँ कि एेसा कुछ हो गया तो मैं क्या करूंगा। आजीवन दोस्त ढूँढते हैं जो हमारी सभी कमज़ोरियाँ जानें, हमें बतलाए कि हम कहाँ ग़लत रहे, पर नैतिकता के पाठ न पढ़ाएं।

कुछ पन्नों में खंडहर समा जाता है, जो एक नहीं अनेक खंडहरों से बना है और आगे और कई खंडहर बनाता चलता है।
12

खंडहर को पहचानने में ज़माने लग जाएँगे। जितनी भी कोशिश करुँ, यह कहानी खत्म नहीं कर पाऊंगा। दिन रात रोओं में खंडहर समाए घूम रहा हूँ। खंडहर तभी सार्थक है जब यह जटिलता कायम रहे। खंडहर बनाने वाली ताकतें बहुत सारे खेल खेलती हैं। इसी भूलभुलैए में फँसे हम रोशनी की लकीर ढूँढ बैठे हैं। वह लकीर चौड़ी होती जा रही है।
अँधेरा हो चुका है। आस्मान में चाँद। दिन भर की बदली के बाद आस्मान साफ हो गया है। हवा में हल्की सी ठंडक। खेतों के बीच में से साइकिल चलातेा हूँ। अँधेरे में साइकिल।

घर अँधेरे गड्ढे की तरह इंतज़ार करता है। शहर में बिजली गुल है। अँधेरे में मोमबत्ती जलाकर हाथ पैर धोता हूँ। मोमबत्ती बुझाकर खिड़की के पास लेटता हूँ। आस्मान में बादल इधर उधर चाँदनी में बिखरे हुए। एहसास कि किसी को अपना हाथ देकर कहना चाहता हूँ , ‘पकड़ो।’ सिर झुकाकर कहना चाहता हूँ, ‘पकड़ो मेरे बाल।’ अंदर सोया कोई जाग रहा है और उसे आस्मान जैसे चौड़े एक मैदान की ज़रूरत है।  
13

कोई परेशां है कि उसने क्या ग़लती की कि कोई नाराज़ हो गया है, और हत्यारे सीना चौड़ा कर दुनिया पर राज करते हैं। यही खयाल बार-बार ज़हन में आता है। आम भले लोग इतिहास नहीं हैं। हत्यारे इतिहास हैं। हत्यारा कभी भली बात कर बैठता है तो इस बहस में ज़िंदगी बीत जाती है कि उसकी भलाई पर गौर किया जाए।

शरीर चाहे बूढ़ा हो जाए, पर मन कभी बूढ़ा नहीं होता। खुद से छिपना चाहता हूँ। बारिश से ऊब होती है। सारे ब्रह्मांड से जुड़े होने का एहसास होता है, या कि बादल, पहाड़, आस्मां, सारी कुदरत को खुद में पाता हूँ। विशालता का यह एहसास साथ रख पाऊँगा? क्या पोंगापंथियों से चिढ़ खत्म हो जाएगी? इंसान ही है, जिससे जुड़ना हमेशा संभव नहीं होता।

बादल, जंगल, पहाड़, गुफ्तगू में शामिल हैं। एक पिघलता है, एक सोखता है और एक उदासीन, निष्ठुर खड़ा रहता है।
हर आवाज़ कुछ कहती है। भौंरे की, तरह-तरह की चिड़ियों की, पौधों और पत्तों की, भाप बनकर उड़ते पानी की आवाज़ है। एक आवाज़ सन्नाटे की है। 
14

शहर अनुमान से ज्यादा बड़ा है। थकी सवारियों से भरी जीपें एक के बाद एक गुजरती जाती हैं। परिवार में दो मुर्गे और एक मुर्गी भी है। एक बिल्ली है। कभी-कभी एक कुत्ता आकर ऐसे बैठ जाता है जैसे वह इसी परिवार का है। आसपास और कुत्ते हैं। सुबह एक कुत्ता मेरे साथ खेलने लगा। बच्ची मेरे साथ खेलती है। बीच-बीच में एक अजीब सी उदासी उसमें दिखती है। वह रोती कम है, पर जब रोती है तो मेरा सीना फटने लगता है।

खंडहर, खंडहर।

15

कोई कह रहा है, हर कोई वही है, जो तेरे अंदर है। उससे कह कि एकबार दोस्त की तरह तुझसे बातें करे।
मुझे इस बहस में फिर आना है। दरअसल कई बार आना है। और धीरे-धीरे शक्ल इस तरह बदलनी है कि मुझे फिर कोई अँधेरी रात में न रोके।

दोस्त बहस में लगे हुए हैं। बहस ही उनका जीवन है। साफ सुनाई तक न देता है कि कोई कह क्या रहा है। वह क्या बातें कर रहे हैं। वे अंग्रेज़ी में या हिंदी में बोल रहे हैं?

क्या वे नशे में हैं? ऐसा लगता है कि जैसे हर कोई हवा से बातें कर रहा हो। क्या हर कोई अपने एकांत में खुद से कुछ कहने की ग़फ़लत में है?

घबराकर मुड़ता हूँ। तेज कदमों से दौड़ता हूँ । कोई चीखता है। कहीं कोई जोर से हँसता है। पता नहीं क्यों दौड़ रहा हूँ।

सुबह बहस में चुप बैठी एक औरत के बारे में सोचता रहा। यह औरत मादाम कूरी क्यों नहीं बन सकी?

16

पहाड़ पर रुई जैसा बादलों का आवरण बिखरता है। दूर किसी गाँव का कोई मकान दिखता है। ताज़ा बारिश मे धुला हुआ। अजीब सा सर्रीयल एहसास। इंसानी दिमाग कुदरत की कैसी अनोखी देन है। कठिन स्थितियों में सारे दिन बड़े सहज ढंग से जुगाड़ और एक सार्थक जीवन। धरती, आस्मां – कुदरत सब कुछ देती है। इस पहाड़ का क्या हश्र होगा?
रात। ठंड। जोरों से बारिश। कँपकँपी। डर कि बुखार तो नहीं। सुबह सिर भारी।
गाँव का आदमी दूर की नहीं जानता। समझता है कि कौन क्या खाता है, यह आप तय नहीं कर सकते। किसी को बीफ नहीं खाने दोगे तो वह आदमी मार कर खाएगा।

काश कि एक आरामकुर्सी होती। 
17

बच्ची स्कूल गई। दीदी उसे साथ ले गई है। स्कूल के कपड़े बिल्कुल साफ दुरूस्त। जूते उलटे पहने हुए थे। बतलाया तो खोल कर कहा कि पहना दो। सीधे पहना दिए तो हँसने लगी। उसकी हँसी में पहाड़, दरख्त, पंछी, हर कोई शामिल था। दुबारा जूते खोल कर उल्टे पहन लिए। खिलखिलाती सामने की ओर झुकी तो समझा कि वह दुनिया रच रही है। मैंने डाँटने का बहाना किया और उसके दाएँ हाथ की नर्म उँगली पकड़ ली।  
18

एक फौजी हेलिकॉप्टर आया। हेलिपैड पर उतरा। सड़क से चार-पाँच जीप और दूसरी गाड़ियाँ आईं। अफसर और सिपाही। ज्यादातर की तोंदें बढ़ी हुई हैं। जाते हुए लंच के लिए मुर्गा ढूँढ रहे थे। ग़रीब लोग फौजियों से डरकर मुफ्त में ही खाने का सामान दे देते हैं।
ग़ालिब से ऊबकर जासूसी उपन्यास पढ़ रहा हूँ। फ़ोन में है। कहानी में कोई ग़रीब मुफ्त में मुर्गा नहीं देता है।
नींद में खंडहर पढ़ा जा रहा था।

19

तंग गलियों में से गुजर रहा हूँ। गैस पीड़ित बच्चे आ-आ कर मेरा हाथ छू रहे हैं। रह-रहकर नींद टूट जाती है। खिड़कियाँ बंद होने के बावजूद ठंड लग रही है। उठकर खिड़कियों में जहाँ भी छेद हैं, वहाँ कपड़े ठूँसता हूँ। मजदूर, बच्चे, अँधेरे में खो गए।
बच्चे लौटकर आकर कहते हैं, ‘गुरू जी। मैंने तितली देखी। …मैंने घास तोड़ा। कोई कहता है, मैं गाना सुनाऊँ।
बेचैनी में मुझे हँसी आ रही है।
फटे कंबलों में लिपटे मजदूर मेरे पैर छूते हैं। एक मेरी ओर बीड़ी का बंडल बढ़ाते हुए पूछता है, “बीड़ी पिएँगे मास्साब!”

20

वे मेरे बारे में बातें कर रही हैं। किसी ने मुझे हल्की चपत लगाई। चश्मे के पार उसकी आँखें देखता हूँ। आँखें पत्थर जैसी स्थिर हैं। गीत रुक चुका है। दो-चार लड़कियाँ कोरस में गाने लगी हैं। उठो जागो बहना, आओ बहना, अब नहीं और सहना…
कटाक्षों में आत्मीयता है, जिससे मुझे सुकून मिलता है। बहस में मर्दों जैसा तीखापन नहीं है। हँसी-मजाक। परिवेश सखि-मय है। लोगों पर नशा सा छा रहा है। कोई किसी के ऊपर लेट रही है। बातों में नखरा और शोर-गुल बढ़ रहा है। अचानक कोई गीत गाती है। दर्द भरा गीत। सखी तुझे खोए कई महीने बीत गए रे। वो जालिम मर्द तुझे ले गया, उसे क्या परवाह होगी तेरी री। तू आ देख मैं भी खिलती जा रही हूँ। मेरी छातियाँ जो धड़क रही हैं, यह सब तेरे लिए है री।

उसकी आँखों में यह कैसी तड़प! उसकी देह काँप क्यों रही है? वह तो इतनी अशांत न थी। मेरे अंदर यह कौन उठ रहा है, जो तुम्हारी ओर दौड़ने को इतना व्याकुल है! तुम्हारा यह कैसा रूप है? हाथों में नरमुंड, जीभ लाल, पुष्ट जाँघों में थिरकन.…


21

एक तार से लटकी पच्चीस वाट की बत्ती बुझाकर मैं सोने की कोशिश करता हूँ। ठंड और घबराहट से परेशान।
आँख खुली और माथे पर हल्का नर्म सा स्पर्श। वह। क्षण भर चौंका। उसकी मौजूदगी में भरपूर सुकून है। उसने बिस्तर पर बैठते हुए मेरा सिर उठाया और अपनी जाँघों पर रखा। मैं उसका नाम लेकर पुकारना चाहता हूँ पर मैं रो पड़ा। उसके हाथ मेरा सिर थामे हुए हैं। मेरी शिराओं में, शिराओं की हर कोशिका में सृष्टि का अनहद नाद दौड़ रहा है। वह स्त्री। स्त्री के हाथ। मेरे सीने के चमड़े पर, बालों पर। वह धीरे-धीरे मुझे जगा रही है। मैं जो आग सा जगा हुआ था, उसके स्पर्श से जाग रहा था। मेरी उँगलियाँ सुंदर की अर्चना करते हैं। उसके होंठ मेरे होंठों पर हैं। हमारे कपड़े शरीर पर से सरकते जा रहे हैं। उसका गीलापन छूते ही मेरे हाथ पहली बार जीवित हो गए हैं। सुन रहा हूँ शंखनाद और घंटों की ध्वनि। देर रात की अजान। उसकी साँसों में लावा फूट रहा है। किसी के होंठों के बीच किसी के होंठ थे। जीभ से बँधी जीभ। मेरी कमर अचानक तड़पती सी उठी।
परेशान मैंने आँखों पर हाथ रख लिया। उसने मेरा सिर अपनी गोद में रखा।
मैंने आँखों पर से हाथ उठाया। उसकी ओर देखा।
मैं समझ गया कि वह स्त्री, वह प्रकृति, वह आदि, वह अनंत, वह प्रगाढ़, वह संपूर्ण है।
वह मेरी टूटी हुई याद है। उसने मुझे अपनाया और मुझे मेरी अपूर्णता से मुक्त किया। और यह सपना न था।

22

पहाड़ नहीं दिख रहा। बादलों की ओढ़नी गायब है। मटमैला दिगंत। आज घर याद नहीं आएगा।
एक मुर्गी छः चूजों के साथ-साथ आई है। चूजे बहुत छोटे हैं जैसे परसों अंडों से निकले हों। माँ के पीछे-पीछे भागते हैं। माँ कीड़े चुन कर खिलाती है। कभी-कभार माँ की लत्ती चूजे पर पड़ती है तो वह कलाइयाँ खाता है।
किसी से रंजिश है। किसे रंजिश है? कलाइयाँ खाते चूजे को देखता हुआ अपनी रंजिशों को परखता हूँ। क्या इतनी मुश्किलें ज़िंदगी में आई हैं कि ‘यूँ ही गर रोता रहा ‘गालिब’ तो ऐ अहले जहाँ ! देखना इन बस्तियों को तुम, कि वीराँ हो गईं?’
बार बार फिसलता हूँ। अंदर गहराई तक जाने के लिए रेंगना पड़ता है। दो पत्थरों के बीच से मोटे से मोटे लोग अंदर घुस जाते है। जिसने पाप किया हो, वो कितना भी पतला हो, अंदर नहीं जा सकता। वह बच्ची जो इतनी काबिल है, क्या उसे यह विकल्प जीवन में मिलेगा कि वह यहाँ की रुटीन ज़िंदगी से हटकर कुछ और बन सके?


23

उस के जिस्म की महक साथ है। साथ बिताया एक-एक पल, उससे सीखी एक-एक बात फिर से जी रहा हूँ। उस के बारे में छोटी-छोटी बातें याद करते हुए मैं बीच-बीच में मुस्करा उठता हूँ। भीड़ भरी बस में लोग बार-बार मेरी ओर ताकते हैं।
जीवन में और क्या हुआ है, कोई तो बतलाएगा। न कोई आकर्षण है, न कोई नफ़रत।
कभी-कभी डर लगता है कि मैं भीड़ में खो जाऊँगा। वह भीड़ में खो जाएगी। हम बहुत समझदार है, पर मन नहीं मानता।
क्या मुझे यह एहसास है कि संबंधों का क्या अर्थ होता है? नज़रें कमरे की खिड़की से बाहर दूर तक कुछ देखतीं स्थिर हैं। वहाँ तरह तरह के झाड़ और एक दो मकानों के ऊपर एक मटमैला आकाश है। वक्त शाम और आस्मान में हल्की रोशनी।
खयाल पूरा किए बिना ही गहरी नींद।

24

– साइकिल पर सवार वह पहाड़ ढूँढता चला है। वह रात को आता है, दिनभर ढूँढता है। सुबह वह बादलों में सूरज ढूँढता है। वह पहाड़-पहाड़ ढूँढता है। वह समंदर-समंदर ढूँढता है। वह खेलता ढूँढता है। वह पढ़ना या लिखना ढूँढता है। वह गाता ढूँढता है। वह रोता ढूँढता है। वह पेड़ पर चढ़ता ढूँढता है। वह ज़मीं पर लेटा ढूँढता है। किसको?

छिपकर ढूँढना अब आसान नहीं रहा। तार-बेतार किस्म-किस्म की दूरबीनों से लोग ढूँढ लेते हैं ढूँढते हुए को। मेटामोरफोसिस अंग्रेजी में कहो कि हिन्दी में वे तुम्हें ढूँढ लेंगे। जंगल-गुफाओं में छिपो या कि माशूक की गोद में, वो ढूँढ लेंगे। तुम ढूँढने निकले हो, इसकी खबर उनको जमाने से है।

हे पहाड़, हर पल मुझे बतलाते रहो कि मैं कितना छोटा हूँ। और इतने में ही मैं भी अपने लिए पहाड़ हूँ। पहाड़ आँखों में डूब रहा है। 
25
यह मेरा बाँया हाथ तुम्हारे दाँए हाथ में और तुम्हारा बाँया हाथ मेरे दाँए हाथ में।
ये हाथ ये पैर हमारे, तुम्हारे।
सतपुड़ा की पहाड़ियों में ये बहती नदियाँ, मैं और तुम।
हमारे हाथ, हमारे पैर इकट्ठे। हमारा इकट्ठा होना सूरज का उगना है। हमारा इकट्ठा होना परेशान धरती के सीने में चाँदनी का बिछ जाना है।
पीछे हैं गहरी काली सुरंगें। सामने पीले सरसों के खेत। शरत् की धूप और खिलखिलाते बच्चे।
हम हाथ थामे चल रहे हैं फरवरी ऊँची सुनहरी गेंहू के खेत में से। खुशी में किसान हमारी ओर देखकर हँसते हैं और बच्चों से कहते हैं – वो देखो! सोनचिरैया।
हम शहरों में उड़ रहे हैं। शहरों में चौड़ी खुली सड़कों पर गाड़ियाँ हैं। सब कुछ शांत है। शांत हवा है। लोग आ जा रहे हैं। रेलगाड़ियाँ रंग बिरंगी खिलौनों सी चल रही हैं। गोधूलि-बेला में दूर-दूर से हल्की बाँसुरी की आवाज़।

26
चलो पहाड़ पर चढ़ें। पहाड़ पर कैक्टस हैं। देखो, मैं फिसला। इस कैक्टस ने मेरी कमीज़ पकड़ ली है। देखो, मैं आ गया। तुम हँस क्यों रही हो?
अरे चलो, हमारी बस आ गई। दौड़, दौड़। ठीक है, फिर मिलेंगे। और सुनो, …। अरे, तुम तो परेशान हो गई। अरे, अब तो बस चल पड़ी।

27
आज हम तुम्हें कहानी सुनाएँगे। सब चुप हो जाओ। अभी भी शोर मचाना है। फिर हम कहानी नहीं सुनाएँगे। अच्छा, अब सुनो। हाँ, हाँ, राजकुमार वाली। और राजकुमार तो उसका नाम था – था तो वह किसान का बेटा। और राजकुमारी उसे कहते थे, पर वह थी नयागंज के बढ़ई की बेटी। तो राजकुमार घोड़े पर बैठकर आया और घोड़ा वह किसको कहता था – अपनी बकरी को न! राजकुमारी अपने घर में छोटी कोठरी की खिड़की पर बैठी थी। राजकुमार ने राजकुमारी के लिए बेर छिपाकर रखे थे। जब वह बेर देने गया तो अचानक क्या हुआ – राक्षस…!


28

राक्षस को राक्षस नहीं होना था। पर बस जब लाइन-क्रॉसिंग पर खड़ी हुई, उस वक्त वह राक्षस ही था। वह मुझे पकड़कर कहीं खींच कर ले जा रहा था। मैंने बस में बैठे ही चिल्लाने की कोशिश की, पर किसी ने नहीं सुना। जब तक मैं उतरा, लोग काफी दूर जा चुके थे। मैं उनके पीछे दौड़ने की कोशिश करता रहा। पर वे लोग ओझल हो चुके थे। कोई सामने खड़ा हँस रहा था। कोई मेरी ओर देख रहा था।
बस चली और रुकी। बस पीछे चली, आगे मुड़ी। बस बीच में कहीं लटकी रही। कहीं दीवाली के पटाखे फूट रहे थे और कहीं होली खेली जा रही थी। कोई हँस रहा था, कोई रो रहा था। मैंने सोचा कि वह कोई खास दिन था, पर जब सोचा कि वह कौन सा दिन था, तो कहीं कोई बोल उठा, ‘यह वह दिन है जब कायनात बनी।’

कौन था वह जो मुझसे यह कह रहा था? घूमकर देखा कि कोई हँस रहा है, ‘कायनात कोई एक नहीं, कई हैं। कायनातें बनती हैं, खत्म होती हैं। किसी भी पल हम किसी एक कायनात में से दूसरे में चले जा सकते हैं।’

मैं देख रहा हूँ, वह हँस रहा है। सड़क पर एक गाय आ गई है और ड्रायवर ने अचानक ब्रेक लगा दिया है।

29

‘रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बाँ कोई न हो’

असल में हम एक फिल्म के किरदार हैं। पटकथा हमारे अभिनय के साथ बदलती रहती है। जो लिखोगे, वह बदल जाएगा। कोई और किरदार पहले लिखी हुई लाइनों पर खचाखच कलम चलाएगा। तुम्हारी कहानी लाल स्याही से काटी जाएगी।

मेरी रूह के गाँव में शोक का माहौल है।
किसी का दर्द हम सुन लें, इतना ही हम कर सकते हैं।
जमकर बारिश। झमाझम। ऐसे में मुझे कविताएं लिखनी चाहिए, पर तय कर चुका हूँ कि कुछ नहीं लिखूँगा।  
30

– चप्पे-चप्पे पर नाकाबंदी है, सब्ज़ा-ओ-गुल पर उन्होंने पतंगों के आकार के ड्रोन बैठा दिए है, वे ढूंढ रहे हैं कि तुम किधर कहाँ किसे ढूंढ रहे हो। तुम डरते-घबराते रेंग-रेंग कर बच निकलने की कोशिश में होते हो, वे हँस रहे होते हैं कि तुम इतनी बातें एक लफ्ज़ मे क्यों नहीं बयाँ करते – ढूँढना।

दोस्त, साथी, आमिगो, सब ढूँढ लिया है तुमने, अब जाओ प्रेम ढूँढो। तम्हें पता नहीं था कि इसीलिए तुम जन्मे हो, इसीलिए तुम मरोगे। जाओ प्रेम ढूँढो। इसीलिए तुम नाचते हो, हँसते-रोते हो, बच्चों के साथ बच्चा और बड़ों के साथ बड़ा बन जाते हो। जाओ, प्रेम ढूँढो, तसल्ली से ढूँढो। यादों में ढूँढो, ढूँढने में ढूँढो। बुल्ले-कबीर के साथ ढूँढो, अकेले ढूँढो, जाओ प्रेम ढूँढो।-


31

– तय करें कि पहला इंकलाब पहाड़ से हो। पहाड़ से इंकलाबी मंत्र नदियों के पानी में घुलकर मैदानों में पहुँचें, मैदानी लोगों के सपने में पहाड़ आएं। तय करें कि हम पहाड़ के साथ खाएं-पिएं। पहाड़ मुर्गा खाए, तो हम मुर्गा खाएं, पहाड़ गाय खाए तो हम गाय खाएं। पहाड़ झपकी ले तो हम उसे जगाएं कि हमें इंकलाब लाना है। पहाड़ झारखंड से सिक्किम तक आए तो हम देर रात बहस करें कि उसे वापस कैसे लौटाएँ, फिलहाल पहाड़ चाय पिए और हम छांग।
– नींद आती है, कहीं दूर से कोई पुकार रहा है कि उठो, पत्थर उठाओ। नींद आती है, नम हवा कान में कह जाती है कि अंटार्कटिका में बर्फ पिघल गई। नींद आती है। हिमालय मेरे बाएं पैर के अंगूठे पर खड़ा हो कर कहता है,काश्मीर का क्या हुआ ? नींद आती है, दनादन सीने पर मुक्के मारता हूँ। पलकें ग़ालिब के काफिर की मिजगाँ हैं, कौन कह सकता है कि उठ जाएँ तो क्या हो जाएगा। नींद आती है।

32

हर कोई मोबाइल में सपने ढूँढता है, धूप निकलते ही सपने भाप बन उड़ते हैं और मोबाइल बजता रहता है। बजते हुए ध्वनियों का तंत्र एक कायनात बनाता है। कायनात में वक्त चलता है शिकारी मानव से शिकारी मानव तक, आदिम ध्वनियां बजती हैं और कविताओं में खून चढ़ता है। कायनात में मानव सोच नहीं पाता, मोबाइल सोचता है। तरह-तरह की मौत की खिचड़ी पकाना कविता का काम रह रह जाता है।

अँधेरे और रोशनी के दरमियान इक सतह पर खड़े हो, जो दिखता है वह नहीं दिखता है, जो नहीं दिखता है, उसे नहीं दिखना चाहिए कहते हो और झंडा थामे छलांग लगाते हो गहरी खाइयों में।

33

संभावित सच सोचता हुआ डरता हूँ कि जो सोचता हूँ वह सच न हो जाए, तो एेसा क्यों न सोचूं कि कायनात जाए भाड़ में, तबाह हो जाए ताकि किसी सच की संभावना न बचे।

वक्त कैसे बदलता है। एक वक्त था कि कोई अपनी ज़ुबान में बात कर रहा हो तो बहुत मन करता था कि उससे जान-पहचान बढ़ाएं। अब हमज़ुबां लोगों से चिढ़ता हूँ। ‘दारुन, दारुन’ कहते रहेंगे, दूसरी ओर फोन पर दफ्तरी बातचीत । बच्चों से ज्यादा वयस्क शोर मचाते हैं।

34

धूप में बैठे पहाड़ साँसों में भर आता है।
कमाल कि ग़ालिब ने महसूस किया था कि बँधे दायरों में पूरी बात कही नहीं जा सकती।
‘ब-क़द्र-ए-शौक़ नहीं ज़र्फ़-ए-तंगना-ए-ग़ज़ल
कुछ और चाहिए वुसअत मिरे बयाँ के लिए’
वक्त पत्ते सा बहता है, पर थम कर गिरता नहीं। जो थमा नहीं उसे कैसे बाँधोगे? बहते हुए उसके रंग बदलते हैं, उसके आँसू गिर कर पौधों में सफेद ख़ून बन जाते हैं।

क्या कविता में जीवन जो खंडहर बन चुका है, उसका सब कुछ बयान हो सकता है? 

35

क्या वह ऐसे ही भाग गया था जैसे मैं तुम्हारी तलाश में दूर चला आया हूँ। उसने लिखा है कि उसे फिर वहाँ आना था। और वह वहाँ आया। उसे छोड़कर, जिसने उसे ज़िंदगी दी, जो उसकी ज़िंदगी थी। तो क्या मैं भी वैसा ही हो जाऊँगा। तुम जो मेरी हर साँस हो, तुम्हें ढूँढता पहाड़ों में खो जाऊँगा। वह भागा तो वहाँ गया। मैं वहाँ से भाग रहा हूँ और पहाड़ों में तुम्हें तलाशता छिपा हूँ। सुबह में सुबह ढूँढता, रात में रात ढूँढता, हर पल में पल ढूँढता, तुम्हें तलाशता छिपा हूँ। मौसम दर मौसम, किसी एक मौसम और दूसरे के दरमियान, कहीं लटका हुआ तुम्हें तलाशता छिपा हूँ।


36

सुबह से पूरी धूप खिली है। बर्फीली सफेद चोटियाँ चमक रही हैं। इन दिनों को मैं पहाड़ों के सुस्त दिन कहूँ तो ठीक।
– पहाड़ों के ये सुस्त दिन
मन चंगा तन दुरुस्त दिन –
– देर तक धूप से गुफ्तगू । धोए कपड़ों से पानी सोखने के लिए धूप को शुक्रिया। धूप ने मेरी गाल पर गर्म तमाचा जड़ा और कहा कि यह मेरा खेल है। यह भी कि फालतू का शुक्रिया अदा करने के लिए तुझे तमाचा। तू अब अपने खेल से निकल। स्टैंड पर बैठा सुस्ती कर ले। थोड़े ही दिनों में वापस अपने खेल पर जाएगा।
धूप को सौगात देने के लिए मेरे पास कुछ खयाल थे। खयालों में खयाल मैंने धूप को दे दिए। यह बात सिर्फ उस तितली को पता चली, जब उसे गाना सुनाने से रुकते मुझे देखकर बच्ची हँस पड़ी।-
– एक है प्रजाति अनोखे जानवरों की, ये उड़ नहीं सकते, पानी में रह नहीं सकते, छलांग पेड़ पर नहीं लगा सकते, दौड़ने में फिसड्डी, वजन इतना नहीं कि कोई दब जाए, दबाया भी किसी चींटी को तो उसकी चिउँटी से परेशान, साँप डँस ले तो डर से मर जाए। कमाल कि इस प्रजाति ने धरती तबाह करने की ठान ली है। एक दिमाग के बल पर।-


37

– चुस्कियों के साथ चाय के प्याले में तुम्हें पीता हूँ। सुबह आवाजें आती हैं कि तीस्ता बुला रही है, खिड़की का पर्दा हटाकर देखता हूँ कि तुम कितना छिपे और कितना उजागर मेरे लिए मुस्करा रहे हो। खबर है कि एंटार्कटिका पिघल रहा है, पर तुम घूप निकलते ही चमक-चौंधियाते रहते हो कि हम भी उस्ताद हैं। तुम्हारे साथ के दिन अब कम रह गए हैं। रोज गिनता हूँ और डरता हूँ कि जब तुमसे दूर चला जाऊंगा तो मेरे अंधेरे को कौन रोशनी देगा। हो सकता है कि अगली सदी में मैं तुम्हारी गोद में लेटते अणुओं में बस जाऊ और तुम्हें पिघलने न देने की तरकीब ढूँढूँ।

चारों तरफ से भयंकर आवाजें आती हैं कि यह प्रजाति गरज रही है। पैरों की थापों से, हाथ, पीठ, जंघाओं से कुचल रही तीस्ता की आवाज़। कितनी धरतियाँ तबाह होंगी, कितने ग्रह-तारे। कितनी ख्वाहिशें पूरी होंगी, कितने डर सुलझ जाएंगे, जब कायनात का यह एहसास, यह होने का, होते रहने का एहसास खत्म हो जाएगा। –

38

साथ जगह-जगह बिताए पिछले दिनों की कहानियां। साथ बैठकर बीयर पी, साथ में तली मछली। तितलियों की प्रजातियों की कहानियां।
सूरज छिपने के बाद थोड़ी देर तक पहाड़ आस्मान और धरती नीले रंग में रंग जाते है। फिर धीरे-धीरे सब कुछ स्याह होता जाता है। यहाँ पंछी ज्यादा नहीं हैं, जो हैं चहचहाते रहते हैं। साथ में झींगुर, मेढक वगैरह हैं। गाय बछड़े अब तक चुप हो गए हैं। मुर्गा-मुर्गीअपने छोटे लकड़ी के घरों में बंद हैं।

बहुत कुछ खो गया है, बीस सुस्त दिन खुद को फरेब के लिए कि खोई दुनिया वापस आ सकती है या कि जो खो गया, वह ग़ैरज़रूरी और खारिज।

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– थकी उदास नींद। जीवन में शिकवा की गुंजाइश नहीं, फिर भी मन यह जीवन बदलना चाहता है। किसी और ग्रह में किसी और प्राण में। कुछ न करने से आती नींद। पूर्वी यूरोप की सत्तर की किसी फिल्म के नायक की तरह यातनाओं में सुबकती नींद। अंजान दुर्घटनाओं से बार-बार टूटती नींद। कुहासे के एहसास को रोम-रोम में पिरोती नींद। ठिठुरती, तड़पती नींद।-

देर रात तक बारिश में भीगते हुए लड़के-लड़कियों का शोरगुल। सुबह चारों ओर कचरा।
रात को फ़ोन की बैटरी मर गई। दुबारा खोलकर लगाया तो चल पड़ी।
सुबह धुंध गहरा है। पहली बार इतना घना धुंध। पहाड़ तो क्या, दस गज दूरी पर कुछ नहीं दिख रहा, पर धीरे-धीरे छँट रहा है।
हर कोई काम पर लग गया है। हर कोई कुछ न कुछ कर रहा है। मेरा निकम्मे बैठे रहना अखरता है।

बहुत हो गया। अब वापस।
पहाड़ हरे, कहीं नीले, बिल्कुल साफ धुले नजर आ रहे हैं। रूई जैसे बादलों के गुच्छे उनके ऊपर मँडरा रहे हैं।

रात के दुख। दिन के सुख-दुख। 
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बर्फ पिघल रही है। हर दिन सफेद के बीच और काले धब्वे दिखने लगे हैं। कहते हैं कि पहले इससे कहीं ज्यादा दिनों तक पहाड़ बर्फ से ढँके रहते थे, पर अब बर्फ जल्दी पिघलने लगी है।
फिर कहीं जाने की तैयारी है।
– जब धरती छोड़ कर जाओगे, कितनी स्मृतियों का भार ढोओगे? सदियों बाद मिलेंगे क्या रंगीन फोटोग्राफ, डिजिटल कार्ड में सँजोए गीत? अंजान नाम वाले दरख्त, मुर्गी के बच्चे, जब कभी आती बेचैनी, मोह-माया, मिलेंगे दुबारा कभी? कुछ तो टुकड़े दिख ही जाएंगे। क्या सोचोगे तब जब यादों को छिन्न-विच्छिन्न देखोगे ?
सभी स्मृतियाँ बदलती रहती है। बचपन से किशोर और वृद्धवय तक आते-आते स्मृतियाँ नीरस हो जाती हैं। हालांकि कभी-कभी भारी हो कर बरस ही पड़ती है। बादलों की तरह हल्की नहीं होती है।
स्मृतियों को बचा रखने वाले कुछ ढूंढते रहते हैं जो कहीं नहीं होता। उन्हे ढूंढते हुए वे अपने नाक के बाल उखाड़ते रहते हैं। सोच-तड़प कर क्या होगा। स्मृतियों को तो कभी बूढ़ा होना ही था।

बूँदों की रिमझिम बादलों का अलाप है। मल्हार की तोड़ी में द्रुत लय में उमड़ आते हैं बादल। –


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आखिरी दिन और रात। सुबह उठकर कूच करना है। सर्रीयल सा लगता है। अपने सभी अंदरूनी दानवों के रहते भी जीना खूबसूरत है कि यह भी संभव हुआ।
तसल्ली कि मुर्गी के पॉचों चूजे सलामत हैं। एक जो नेवला ले गया, उसका पंचतत्व विलीन वाला किस्सा रह गया।
रात :
तो क्या अपनी अपनी दुनिया से अलग बिताए इन उन्नीस दिनों ने मुझे पहले से बेहतर इंसान बना दिया? कुछ भी नहीं बदला।
जम कर बारिश हो रही है। सोया जाए।
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जिनको छोड़ आया, उनके लिए मैं कौन हूँ। एक अतिथि। बच्ची को घर के बड़े मजाक में पूछते होंगे कि सर चला गया तो तुम किससे खेलोगी। मेरे रहते उसको कोई खास लगाव मुझसे नहीं था। बड़ों की समझ में आ रहा था, कि मुझे उससे लगाव है। सच यह है कि बच्चों के साथ मैं भी थोड़ी देर के बाद थकने लगता हूँ।
लौटकर कुछ दिनों तक ताज़गी रहेगी। तुमसे बात करने के लिए भी कोई तरीका ढूँढना होगा। तुम्हें समझा तो न पाऊँगा कि तुम्हारी तलाश में ही तुमसे दूर गया था।

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आखिर में कायनात वही है जो हमारी चेतना में है। हम जो बनाते हैं, रचते हैं, सारे जीव-निर्जीव, मूर्त-अमूर्त, वही कायनात है। जो यह कायनात है, उसकी व्यथाएँ, यंत्रणाएँ, तकलीफें हैं। उस कायनात का क्या होगा, जो उसकी थी, जिसमें बात यहाँ खत्म हो गई कि वह एक औरत से ज़िंदगी साझी करेगा। क्या उसके बाद उसे ज़रूरी नहीं लगा होगा कि वह अपनी कायनात को कायम रखे, उसी तरह दर्ज़ करे, जैसे इसके पहले की बातों को उसने कायम रखा है?
यह जो मेरा दिमाग हमेशा भारी-सा रहता है, क्या यह इसलिए नहीं कि तुम्हारी तलाश में मैं इतना कमज़ोर पड़ चुका हूँ कि कुछ भी और करता हूँ तो वह माथे पर वजन सा लगता है।
वह उसके जीवन में क्या थी?