Sunday, June 17, 2018

इसी के लिए एकजुट होना है


झूठ, और झूठ – खतरा और भी है
(यह लेख कर्नाटक राज्य में हुए चुनावों के परिणाम आने के पहले लिखा था। 'उद्भावना' पत्रिका के ताज़ा अंक में इसके आने की उम्मीद है)

कर्नाटक के चुनाव हो गए। आगे और चुनाव आने वाले हैं। अगले साल की शुरूआत में संसद के चुनाव होने हैं। यह भी कहा जा रहा है कि सरकार इसी साल के आखिर में ही संसद के चुनाव करवा सकती है। एक जमाना था जब चुनाव उत्सव की तरह आते थे। पार्टी समर्थकों के पीछे छोटे बच्चे उछलते कूदले चलते थे। तुतलाती आवाज़ में नारे देते थे। फिर पता नहीं कब जैसे माहौल में ज़हर घुल गया। जगह-जगह से चुनावी प्रचार के दौरान हिंसा की खबरें आने लगीं। पहले प्रचार में प्रार्थी झूठे वादे किया करते थे। अब विरोधियों पर झूठ के हमले होने लगे। झूठ राजनीति का औजार है। कोई औजार जब ज़रूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए तो उसकी धार कम हो जाती है। औजार थोथा पड़ने लगता है। आखिर में वार उल्टे पड़ने लगते हैं। भारतीय झूठ पार्टी का इन दिनों यह हाल है। राजनेता दम लगाकर कहता है - विरोधियों के झूठ का पर्दाफाश करो। लोग समझ जाते हैं कि विरोधी इस वक्त सच बोल रहे हैं। कई बार तो जो कुछ भी ग़लत वह विरोधियों के साथ कर रहा होता है, उसका दावा यह होता है कि विरोधी उसके साथ ऐसा कर रहे हैं। कहते हैं हिटलर की नात्सी पार्टी के साथ प्रोपागांडा मंत्री रहे गोएवेल्स ने कहा था कि अपने अपराधों का भांडा दूसरों के सर फोड़ो। यही हमारे राष्ट्रनेता का मंत्र है। पर हिटलर और गोेबेल्स चले गए तो आज का झूठा कौन सा हमेशा कामयाब होगा। यानी अगर वह कहे कि विरोधी चोर हैं तो अब लोग जान जाते हैं कि वह कह रहा है कि वह खुद चोर है। जब वह दूसरों को गद्दार कह रहा होता है, हम जानते हैं कि वह खुद गद्दार है। कर्नाटक चुनावों के प्रचार में झूठ कहा गया कि फौजी जरनैलों थिमैया और करियप्पा के साथ कांग्रेस और नेहरू सरकार ने बदसलूकी की। लोगों ने जान लिया कि नेहरू ने ठीक इसका उल्टा किया और उनका उचित सम्मान किया।
2014 के चुनावों के पहले मैंने इस चिंता के साथ कई लेख लिखे थे कि नफ़रत की राजनीति बढ़ रही है और संघ परिवार और उनकी पार्टी की राजनीति हमारे अंदर के शैतान को बाहर लाने में जुटी हुई है तो कुछ दोस्तों को एतराज था कि मैं संघ और भाजपा के खिलाफ इतना क्यों लिख रहा हूँ। हो सकता है कि उनमें से कुछ समझ गए होंगे कि जिन मिथ्याओं को वे सच मान रहे थे, वे सच नहीं थे। हमेशा झूठ को सच बनाना आसान काम नहीं है। कई बार दुहराना पड़ता है। पैसा लगाना पड़ता है और प्रचार के लिए झंडाबरदारों के झुंड बनाने पड़ते हैं। लोगों के बीच अपनी बीमारी, यानी नफ़रत फैलानी पड़ती है। यह सब आसान नहीं है। कुछ वक्त तक तो आम लोग जानकारी के अभाव में सीना-पीटू भाषण से प्रभावित हो जाते हैं, पर ऐसा हमेशा होता ही रहे, यह मुमकिन नहीं है।
आम समझ यह होती है कि नेतृत्व का मतलब है देश या समाज को सही दिशा में ले जाना, यानी सामाजिक स्थिरता और आर्थिक तरक्की की ओर ले चलना। पर समाज का मनोवैज्ञानिक चरित्र भी होता है और जनता को भावनात्मक रूप से अपने वश में रखना, इस पर नेताओं को गंभीरता से सोचना पड़ता है। सोशल मीडिया की नई तक्नोलोजी का इस्तेमाल कर झूठ के तूफानी बवंडर से कायर लोगों की हीन भावनाओं को दबंगई और गुंडागर्दी में बदलने में भाजपा के दिग्गज माहिर साबित हुए हैंगुंडों का आधार बनाए रखने के लिए शीर्ष राजनेता घटिया स्तर तक उतर आता है। कर्नाटक चुनावों के प्रचार में छप्पन इंच जी ने विरोधियों को धमकी तक दे डाली। उनके मुख्य-मंत्री के दावेदार ने कहा कि लोगों के हाथ पैर बँधवाकर अपनी पार्टी को वोट डलवाओ तो राष्ट्रनेता ने विरोधियों को सीमा में रहने का फतवा दे डाला। हालात इस कदर नीचे गिर गए हैं कि इस पर अब कुछ लिखना मायने नहीं रखता। गटर में गंदगी है, यह कब तक लिखा जाए।
जिन पर बाक़ी झूठ आसानी से काम नहीं करते हैं, उन पर एक और झूठ लादा जाता है। वह यह कि कोई विकल्प नहीं है। कांग्रेस के जमाने में खूब भ्रष्टाचार हुए, इसलिए। सपा-बसपा आदि के नेता तो मजाक हैं, इसलिए। इसलिए हमें आँखें बंद कर लेनी चाहिए और चाहे मुसलमान मरे या दलित, वोट झूठ पार्टी को ही देना चाहिए। ज्यादातर लोग गंभीरता से सोचने के काबिल नहीं रह गए हैं। उनको यह सब समझ में नहीं आता कि सबसे अनिश्चित स्थिति में, जब सारे सांसद निर्दलीय हों, फिर भी माहौल फिरकापरस्त हिंसा की राजनीति से बेहतर होगा। मुल्क तो सरकारी अमला चलाता है, राजनेता तो अक्सर प्रशासन में अवरोध की तरह पेश आने लगे हैं। अगर अधिकतर सांसद बड़ी पार्टियों के न भी हो, तो कोई खास संकट नहीं आने वाला। आज की घटिया हिंसा और नफ़रत की राजनीति से तो कुछ भी अच्छा होगा। सच यह है कि और भी विकल्प हैं जिन पर सोचना ज़रूरी है। कभी कहा जाता था कि नेहरू गए तो क्या होगा। फिर यह कि कांग्रेस का विकल्प क्या है। देश की जनता ने कई बार दिखलाया है कि विकल्प कई हैं।
नफ़रत की विचारधारा पर आधारित झूठ पार्टी के समर्थक भी अब जानने लगे हैं कि वे झूठ के अंबार पर खड़े हैं, पर अब जो हो सो हो जैसी सोच के साथ वे अपने नेता के साथ हैं। जैसे कोई खेल हो। अपनी टीम के लोग फाउल कर रहे हैं तो क्या, हमारी टीम है तो हम उसी का समर्थन करेंगे। कई तो वाकई बीमार हैं, उन्हें जीवन जाति-धर्मों के बीच महासंग्राम दिखता है, जहाँ हिंसा और नफ़रत के अलावा कुछ नहीं है। उनका इतिहास, भूगोल, सब कुछ नफ़रत की ज़मीं पर खड़ा है। ये कट्टर संघी या तालिबानी हैं। पैसे और संगठन की ताकत से झूठ का तूफान खड़ा कर, विरोधियों में से कइयों को खरीद कर या उन्हें ब्लैकमेल कर चुप करवा कर और चारों ओर आतंक का माहौल पैदा कर संघ किसी तरह चुनाव जीतने के लिए जुट हु है। इसके अलावा ई वी एम मशीनों की कारीगरी का किस को पता है।
संभावना है कि झूठ, पैसा, ब्लैकमेल, आतंक, ई वी एम मशीनें, हर तरह के फूहड़पन के बावजूद संघ-परिवार आगे आने वाले चुनावों में जीत हासिल न कर पाए ऐसी स्थिति में दो बातों की प्रबल संभावना है। एक तो यह कि भारत और पाकिस्तान में जंग छेड़ दी जाएगी और दूसरी यह कि संघ परिवार अपनी सारी ताकत देश भर में फिरकापरस्त दंगे भड़काने में लगा देगा।
सालों पहले मैंने खेद जताया था कि ये लोग इंसान में असुरक्षा की भावना को भड़का कर हिंसात्मक प्रवृत्तियों को जगा रहे हैं, तो अक्सर पाठक फ़ोन कर पूछते कि मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ। एक बार किसी ने कहा कि यह ठीक ही तो है कि 'उन लोगों' को दबाकर रखा जाए। 'वो लोग' बहुत ज्यादा चढ़ गए हैं। मैं फ़ोन पर उस डर और साथ ही दबंगई को सुन रहा था, जिसे जगाने में संघी काबिल हैं। डर जो इंसान को डरे कुत्ते की तरह खूँखार बना देता है। आजकल सीतापुर और कुछ और इलाकों में झुंड में आदमखोर कुत्तों की खबरें आ रही हैं। इनमें से कोई एक कुत्ता हमला नहीं करेगा, पर झुंड में वे आदमखोर बन चुके हैं। दबंगई और दरिंदगी गहरी हीन भावनाओं और कायरता से उपजती हैडर एक ऐसी आदिम प्रवृत्ति है जिससे शरीर में जैव-रासायनिक क्रियाएँ चल पड़ती हैं। जो महज भावनात्मक लगता है, वह कब हमारा जैविक गुण बन जाता है, पता तक नहीं चलता। डर से पसीना ही नहीं छूटता, इससे ऐसी उत्तेजना भी होती है, जो हमें हमलावर बना देती है। दबंगई कायर लोगों में यह एहसास पैदा करती है कि जब तक साथ में और लोग हैं, सत्ता का साथ है, कुछ भी कर लो, धौंस जमाओ, स्त्रियों और बच्चों के साथ हिंसा करो। कई लोगों को एक सा डर होने लगे तो वह सामूहिक राजनैतिक औजार बन जाता है। इसी का फायदा उठाकर संघ परिवार जैसे गुट सत्ता में आते हैं। मनोविज्ञान में इस बात पर शोध हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि सामूहिक गुंडागर्दी के लिए बीमार विचारधारा पर आधारित नेतृत्व, भय में डूबी नुकसानदेह मानसिकता, बड़ी तादाद में लोगों में आहत होने का हसास और बाकी लोगों की सुन्न पड़ गई संवेदनहीन मानसिक दशा कच्चा माल की तरह हैं, जिन्हें सही मौकों पर घुला-मिला कर संकीर्ण सोेच में ग्रस्त नेतृत्व सत्ता हासिल करने के लिए इस्तेमाल करता है।
अपने सामाजिक स्वरूप में एक समूह महज लोगों का हुजूम नहीं होता, बल्कि उसका एक सामूहिक मनोविज्ञान होता है। इसी मनोविज्ञान पर भला या बुरा नेतृत्व भले-बुरे उद्देश्यों के लिए प्रयोग करता है। जैसे एक व्यक्ति में भगवान और शैतान दोनों को जगाया जा सकता है, वैसे ही समुदायों में भी नैतिक संकट के बीज बोए जा सकते हैं और वक्त आने पर उसके ज़हरीले फल तोड़े जा सकते हैं। माना जाता है कि समूह में बड़े संकट अपेक्षा से ज्यादा तेज़ी से आते हैं; दो और दो मिलकर चार नहीं, चार से ज्यादा का प्रभाव दिखलाते हैं। ऐसी स्थिति में शैतान को खुद ज्यादा कोशिश नहीं करनी पड़ती, कायर लोगों क झुंड उसे नेता न कर तबाही करने लगत है। इतिहास में ऐसा होता रहा है, कभी मुल्कों में, कभी धर्म-संप्रदायों में, तो कभी मुक्तिकामी संगठनों में भी।
सोचने पर लगता है कि आज भी हम अंधकार युग में जी रहे हैं। ऐसे तो इंसान का जीना दूभर हो जाएगा। अगर हम आप कुछ न करें तो हालात वैसे ही हो जाएँगे, जैसे सीरिया, अफग़ानिस्तान जैसे मुल्कों में हैं। हम सचमुच एक खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं और विड़ंबना यह है कि बहुत सारे लोग यह समझते हैं कि यह कोई खास बात नहीं है। जो भी अपने दायरे में सुरक्षित महसूस करता है, उसे लग सकता है कि पॉलिटिक्स तो चलती रहती है; आखिर ऐसा कब था कि कहीं कोई हिंसा न होती हो। इस खतरे को कि ये लोग कभी भी जंग छेड़ सकते हैं, हल्का नहीं लेना चाहिए। अब अगर जंग छिड़े तो कोई नहीं जानता कि वहाँ कहाँ और कब रुकेगी। मोदी सरकार ने पहले ही सुरक्षा के क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए पूरी तरह खोल रखा है। ऐसे निहित स्वार्थों की कमी नहीं जो अपनी मुनाफाखोरी के लिए जंगों पर निर्भर हैं। अमेरिका जैसे मुल्कों के वार्षिक निर्यात का बड़ा हिस्सा असलाह की बिक्री है। अमेरिका में युद्धविरोधी आंदोलन सक्रिय तो है पर इस वक्त वहाँ जगखोरों की सरकार है। हमारे भीतरी खतरे भी कम नहीं। संघ की पूरी राजनीति नफ़रत फैला कर सत्ता हासिल करने की है। आज तक यह सही पता नहीं चला है कि गोधरा कांड में सचमुच क्या हुआ था। इसमें कोई अचरज नहीं होगा अगर कभी यह सिद्ध हो जाए कि वह जान बूझ कर नफ़रत फैलाने के लिए पूर्व-नियोजित ढंग से करवाई वारदात थी। अतीत में संघ के साथ रह चुके कई लोगों ने बयान दिए हैं कि कैसे वे जानबूझकर दंगा फैलाने के लिए खुराफातें किया करते थे। भीष्म साहनी की रचनाओं पर आधारित 'तमस' फिल्म का शुरूआती सीन, जिसमें ओम पुरी ने अभिनय किया था, कौन भूल सकता है। सचेत नागरिकों को हर पल जगे रहना होगा कि कभी भी कुछ हो सकता है। अब तो इन लोगों ने खरबों रुपए भी लूट रखे हैं। ये किसी को भी खरीद सकते हैं, कुछ भी करवा सकते हैं। सिर्फ इतना नहीं कि विधान सभा में महज दो सदस्य होते हुए भी सरकार बना ले सकते हैं, इससे कहीं आगे हिंसा के सभी तरीके भी अपना सकते हैं।
हमारे पास हालात से जूझने के अलावा कोई विकल्प नहीं हैं। एक ओर निश्चित विनाश है, भीतर बाहर हर तरह की जंग लड़ाई का खतरा है, दूसरी ओर इकट्ठे आवाज़ उठाने का, बेहतर भविष्य के सपने के लिए पूरी शिद्दत से जुट जाने का विकल्प है। एक ओर जंगखोरी और लोगों को फिरकापरस्ती में उलझा कर मुल्क की संप्रभुता गिरवी रखी जा रही है, दूसरी ओर हमारे लोगों के लिए बेहतर तालीम और सेहत के मुद्दे हैं। आज हिंदुस्तान जंगी असलाह की आमद पर खर्च करने की सूची में सबसे ऊपर है। फौजी खित्ते में मुल्क की संपदा को लगाने में हम पाँचवें नंबर पर हैं। साथ ही यह विड़ंबना कि मानव विकास आँकड़े में हम 133 वें नंबर पर हैं। हमें लोगों को यह समझाना होगा कि हमारी लड़ाई पाकिस्तान या चीन के लोगों से नहीं है, वहाँ की हुकूमतों से है और साथ ही मध्य-युगीन मानसिकता वाली हमार अपने मुल्क की हुकूमत से है। सरहद पर मरने वाला सिपाही मरता है तो वह किसी मुल्क का भी हो, उसके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। हाकिम नहीं मरते, साधारण सिपाही मरते हैं और उनको शहीद कह कर या उनके परिवार को राहत का पैसा देकर मरे हुए को वापस नहीं लाया जा सकता है। पर हाकिमों की जमात के पास ये सब सोचने की गुंजाइश नहीं है। हमें सोचना होगा कि जंग किसी के भी भले के लिए नहीं है। आज धरती विनाश के कगार पर खड़ी है और संकीर्ण राष्ट्रवादी नज़रिए से हटकर आलमी सोच के साथ हमें तमाम विनाशकारी ताकतों के खिलाफ लड़ना है। अगर सरमाएदारों के बीच मुनाफाखोरी के लिए आलमी समझौते हो सकते हैं तो आम लोगों के बेहतर तालीम और सेहत की सुविधाओं के साथ शांतिपूर्ण ज़िंदगी जीने के लिए समझौते भी हो सकते हैं।
आज इतना हो चुका है कि जब सत्तासीन दल का प्रमुख हमारी देशभक्ति पर सवाल उठाता है, तो लोग समझ ही जाते हैं कि एक गद्दार चीख रहा है और असल देशभक्तों के खिलाफ लोगों को भड़का रहा है। और यह बात सच नहीं है कि कांग्रेस, भाजपा या दीगर क्षेत्रीय दलों के अलावा कोई लोकतांत्रिक विकल्प नहीं है। देश भर में करोड़ों समर्पित लोग बेहतरी के लिए काम कर रहे हैं। इनमें साम्यवादी, समाजवादी, गाँधीवादी, हर तरह के लोग हैं। अव्वल तो इन समर्पित कार्यकर्ताओं को शासन की बागडोर थमानी चाहिए। अगर किसी को शंका भी हो तो किसी भी संसदीय क्षेत्र में बीस प्रार्थियों में से जो सबसे बेहतर है, जो पैसों से नहीं, बल्कि अपनी काबिलियत, कुव्वत और समर्पण की भावना से चुनाव लड़ रहा है, उसकी पहचान करें और उसी को प्रतिनिधि चुनें। जाहिर है कि फिरकापरस्ती और झूठ की बौछार से अपनी पहचान बनाने वाले दलों के प्रार्थी तो ये कतई नहीं होंगे। संघी झूठ प्रचार में यह बात आती रहती है कि भाजपा का विरोध मतलब कांग्रेस का समर्थन है। जाहिर है अब जब मोदी का तिलिस्म रहा नहीं, इस प्रचार का कांग्रेस को बहुत फायदा हुआ है, पर यह बात बिल्कुल बकवास है। संघ की नफ़रत आधारित राजनीति का विरोध करने वाले अधिकतर लोग कांग्रेस की नवउदारवादी आर्थिक नीतियों और फिरकापरस्ती का हमेशा ही विरोध करते रहते हैं। वे लोग भी जो संघ के बढ़ते आतंक से घबराकर कांग्रेस के समर्थन में खड़े हो रहे हैं, दरअस्ल सभी कांग्रेस समर्थक नहीं हैं।
2019 के चुनावों में संघ के लोग जिस हद तक हो सके देश को तबाही की ओर धकेलेंगे। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरुक हर शख्स के लिए लाजिम है कि हम ऐसा न होने दें। इसी के लिए एकजुट होना है और संघर्ष करते रहना है।


Friday, May 11, 2018

साम्यवाद में लोकतांत्रिक स्वरूप विज्ञानधर्मी माँग है।


मार्क्सवाद और विज्ञान : कुछ समकालीन सवाल
-'समकालीन जनमत' में आ रहा लेख'

मार्क्सवाद के कट्टर विरोधी कार्ल पॉपर ने विज्ञान क्या है और क्या नहीं है, इसमें फ़र्क करने को विज्ञान के दर्शन का बड़ा सवाल माना। कुदरत में हो रही एक ही घटना को कई तरह के सिद्धांतों से समझाया जा सकता है, पर इनमें से कौन सा सिद्धांत सही है, इसे कैसे तय करें? पारंपरिक तरीका यह है कि किसी एक घटना से जुड़ी और दूसरी घटनाओं को हम किस हद तक समझ पाते हैं, आगे हो सकने वाली और घटनाओं के बारे में क्या कुछ पहले से कह पाते हैं, प्रयोगों द्वारा वह सही दिखता है या नहीं, इससे पता चलता है कि सही वैज्ञानिक सिद्धांत कौन सा है। पॉपर ने फॉल्सिफिकेशन की प्रस्तावना की। फॉल्स यानी ग़लत और फॉल्सिफिकेशन यानी किसी बात को ग़लत दिखाना। कोई सिद्धांत तभी वैज्ञानिक हो सकता है जब उसे ग़लत साबित करने लायक परिस्थितियों और अवलोकनों की कल्पना की जा सके। मसलन गुरुत्व-आकर्षण का सिद्धांत वैज्ञानिक है, क्योंकि खिड़की से कूदने पर नीचे जाने की बजाय अगर ऊपर जा पाते तो यह सिद्धांत ग़लत साबित हो जाता। ईश्वर के होना वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है, क्योंकि ऐसी कोई स्थिति सोची नहीं जा सकती, जिससे हम इसे ग़लत साबित कर सकें।

जब यूरोप में मार्क्सवाद उरूज पर था, पॉपर ने विरोध करते हुए कहा कि मार्क्स के निष्कर्षों से असंगत किसी घटनाचक्र को मार्क्सवादी चिंतक इस तरह समझाते हैं कि वह मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ नहीं जाता। इसलिए ईश्वर की धारणा की तरह मार्क्सवाद भी वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है, क्योंकि किसी भी स्थिति में मार्क्स के निष्कर्षों को ग़लत नहीं माना जाएगा। स्तालिन-काल के दौरान रूस में जो ज्यादतियाँ हुईं, उसे सही ग़लत जैसा भी बतलाया गया, उससे एक बात बड़े पैमाने पर फैली कि वैज्ञानिक हो या न हो, मार्क्सवाद पर आधारित समाज-व्यवस्था में मानव के सर्वांगीण विकास की संभावना नहीं है। जाहिर है कि पूँजीवाद के दलालों को यह तर्क ठीक लगना ही था। अमेरिका में मैकार्थी-युग में वाम- और तरक्कीपसंद कलाकारों, साहित्यकारों और दीगर चिंतकों को प्रताड़ित करने के लिए इस तर्क का बखूबी से इस्तेमाल किया गया।

पॉपर की आलोचना से मार्क्सवादियों को परेशान नहीं होना चाहिए। परेशानी की जड़ यह हसरत है कि हमें भी वैज्ञानिक मान लिया जाए। जब यह हसरत तीखे तेवर के साथ पेश आती है तो मार्क्सवाद और धार्मिक कट्टरता में फ़र्क नहीं रह जाता है। धर्मांध लोग इस कोशिश में लगे रहते हैं कि उनकी आस्था और मान्यताओं को वैज्ञानिक माना जाए। महज तर्कशील होना ही वैज्ञानिक होने की कसौटी नहीं होती है। वैज्ञानिक तर्कशीलता या साइंटिफिक रेशनालिटी खास तरह की तर्कशीलता है, जिसकी अपनी सीमाएँ और ताकतें हैं। मार्क्स ने आधुनिकता के ढाँचे में रहते हुए तर्क और युक्ति के आधार पर मानव के विकास में आर्थिक संबंधों और वर्ग-संघर्ष की मुख्य भूमिका कोे समझते हुए प्रखर आलोचना तैयार की थी। अंतिम निष्कर्ष वह सपना था जिसमें उन्होंने दुनिया भर के मजदूरों से एक होकर सरमाएदारों की शोषण पर आधारित व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था। यह सपना हमारा सपना है, इसलिए मार्क्सवाद हमारे लिए मानव के विकास का बुनियादी सिद्धांत है। अगर विज्ञान की हर विशेषता को मार्क्स के निष्कर्षों में ढूँढ पाना आसान नहीं है, तो नहीं है, यह परेशानी का सबब नहीं होना चाहिए। ऐतिहासिक संदर्भ यह है कि अपने समकालीन दूसरे चिंतकों की तरह (जैसे आउगस्ते कोम्ते) मार्क्स ने भी समाजवादी समाज के निर्माण पर सोचते हुए विज्ञान पर काफी गहराई से सोचा था और उनके लेखन में विज्ञान का उल्लेख गाहे-बगाहे आता है। सिर्फ इतना ही नहीं, विज्ञान के समाजशास्त्र और जिसे आज एस-टी-एस (विज्ञान और तक्नोलोजी अध्ययन) कहा जाता है, उसके विकास में मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव रहा है।

वैज्ञानिक सिद्धांत का बनना एक लंबी यात्रा है, जिसकी शुरूआत अनुमानों से होती है और अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग वक्तों पर बार-बार दुहराए गए प्रयोगों के द्वारा समझे गए नियमों के बाद सामूहिक सहमति से वैज्ञानिक सिद्धांत तक हम पहुँचते हैं। यह संभव नहीं है कि मानव समाज की एक जैसी प्रतिकृतियाँ बनाकर उन पर प्रयोग कर सकें, इसलिए समाज के बारे में वैज्ञानिक सिद्धांत के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए।

पॉपर को मार्क्सी चिंतन में आलोचनात्मक सोच का अभाव दिखता है। उसे लगा कि मार्क्स महज एक सूत्र गढ़ रहे हैं, जिसमें इतिहास को पिरोते जा रहे हैं। पॉपर आइंस्टाइन के प्रशंसक थे, इसलिए उन्हें हर विवेचन में गणित-भौतिकी (मैथेमेटिकल फिज़िक्स) जैसा खाका चाहिए था। पॉपर को मार्क्स की भविष्य-दृष्टि में वैज्ञानिक विशेषताएँ दिखीं, पर जब घटनाएँ मार्क्स के कहे मुताबिक नहीं हुईं तो मार्क्सवादियों ने नई प्रस्तावनों को साथ उन्हें उचित ठहराया, इससे पॉपर को लगा कि मार्क्सवाद वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है।

मार्क्सवाद विज्ञान-धर्मी सोच है। यह अंधविश्वासों या अलौकिक ताकतों की कल्पना पर आधारित सोच नहीं है। मार्क्सवाद का विज्ञान-धर्मी होना हमें बदलते वक्त के साथ उस सपने की ओर बढ़ा ले जाता है, जहाँ इंसान बराबरी के आधार पर समाज में जीते हुए अपनी हर तरह की काबिलियत का भरपूर इस्तेमाल कर पाता है। अगर हम माँग करें कि मार्क्स का हर निष्कर्ष वैज्ञानिक हो तो हमें इंसानी जज्बात को भूलना पड़ेगा, क्योंकि विज्ञान का मकसद समाज की बेहतरी भले हो, इंसानी जज्बात की कोई जगह उसमें नहीं है। यह एक ही साथ विज्ञान की सीमा और ताकत है।

मार्क्स के वक्त से अब तक जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह यह कि हम पहली बार धरती को कई बार तबाह करने के काबिल हो गए हैं। नाभिकीय विस्फोटों को भूल जाएँ, तो रासायनिक प्रदूषण, मौसम का लगातार ग़र्म होते रहना, ओज़ोन की परते में छेद आदि कई ऐसी विनाशक स्थितियाँ हैं, जिनसे हम रूबरू हैं। साथ ही सूचना-विज्ञान में इंकलाबी तरक्की से पीढ़ियों का फ़र्क पहले की तुलना में आज कहीं ज्यादा है। अनपढ़ लोगों के पास मोबाइल फ़ोन का पहुँचना और ह्वाट्स-ऐप जैसे माध्यमों से फासीवादी ताकतों का पूरी ताकत के साथ फिर से उभरना - ये बातें मार्क्स के जमाने में सोची भी न जा सकती थीं।

रूस और चीन जैसे मुल्कों में जहाँ केंद्रीय योजनाओं के तहत समाज-निर्माण पर जोर दिया गया, तकनीकी तरक्की तेजी से हुई और फिर एक हद तक जाकर उसकी रफ्तार कम हो गई (क्यूबा इसका अपवाद है) , जबकि पूँजीवादी मुल्कों में आलमी स्तर पर हुए शोषण और जंग-लड़ाई पर निर्भर फौजी-असलाह की सौदागरी से इकट्ठा हुए पूँजी की मदद से तकनोलोजी में नवाचार को बढ़ावा मिला। स्पुतनिक युग में रूस में अंतरिक्ष विज्ञान में हुई तरक्की से घबराकर अमेरिका ने विज्ञान की तालीम का बजट कई गुना बढ़ा दिया। बड़े वैज्ञानिकों ने किताबें लिखीं। बुनियादी शोध के लिए माली खपत कई गुना बढ़ी। ग़रीब मुल्कों से शोधार्थियों को बड़ी तादाद में आयात किया गया। नतीजतन पूँजीवादी मुल्कों में तेजी से वैज्ञानिक तरक्की हुई। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि न केवल सैद्धांतिक विज्ञान में, बल्कि तकनोलोजी में नवाचार में भी रूस और पूर्वी यूरोप के मुल्कों में साम्यवाद के शुरूआती दौर में कमाल की बढ़त हुई। दूसरी आलमी जंग तक दुनिया के सबसे बेहतरीन सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री रूस और पूर्वी यूरोप में ही थे। बाद के दशकों में कंप्यूटर नेटवर्क आदि में भी बुल्गारिया जैसे मुल्कों में तेजी से तरक्की हुई। विज्ञान के दर्शन में भी निकोलाई बुखारिन और दीगर रूसी चिंतकों का गहरा प्रभाव रहा है। गौरतलब बात है कि केंद्रीय योजनाओं को अपनाने से स्थानीय स्तर पर नवाचार को उस तरह का हौसला नहीं मिल पाया जैसा कि पूँजीवादी मुल्कों में दिखा। साथ ही स्तालिन के दौर में बुनियादी विज्ञान में भी हो रहे बदलावों को शक की नज़रों से देखा गया और विज्ञान के इतिहास पर काम कर रहे मार्क्सवादी दार्शनिकों के लिए कठिन परिस्थितियाँ रहीं। लाइसेंको नामक वैज्ञानिक ने जीनेटिक्स की खोजों को मानने से इनकार कर दिया और सोवियत रूस में जीनेटिक्स पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को तरह-तरह से दंडित किया गया। बुखारिन के विचारों ने क्रिस्टोफर कॉडवेल और बर्नाल जैसे प्रखर चिंतकों को प्रभावित किया, पर वे खुद रूस में अपनी प्रतिष्ठा खोते रहे। भारत में कोसांबी और डी पी चट्टोपाध्याय जैसे दार्शनिक इस प्रभाव में रहे।

ऐसी स्थितियों में साम्यवादी मुल्कों में वैज्ञानिक समुदाय का बड़ा हिस्सा पूँजीवादी मुल्कों में मिलने वाली सुविधाओं और आज़ादी के लिए लालायित हो गया। बड़ी तादाद में वैज्ञानिक भागकर अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के मुल्कों में बसने लगे। इसका फायदा उन मुल्कों को मिलना ही था। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस को आर्थिक दलदल में फँसाने की चालें चली गईं। अफग़ानिस्तान में तालिबान जैसी ताकतों को बनाना और उनकी आर्थिक मदद करना इसी षड़यंत्र का हिस्सा था। जल्दी ही रूस और (चीन में भी) साम्यवादी ताकतें कमजोर पड़ने लगीं। अस्सी के दशक में रेगन-थैचर के जमाने में पूँजीवादी मुल्कों में विज्ञान को पीछे धकेलना शुरू हो गया। पर सरमाया और तकनोलोजी में रिश्ते पहले से भी ज्यादा मजबूत हुए। तकनोलोजी में पूँजीवादी प्राथमिकताओं को सामने रखकर हुई तरक्की का लब्बोलुबाब यह निकला कि आज एक ओर आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस (ए आई) यानी कृत्रिम मेधा और क्वांटम कंप्यूटर की बात हो रही है, वहीं बेरोजगारी शिखर पर है और धरती का कुछ पता नहीं कि कब तक रहे।

पूँजीवादी मुल्कों में बीसवीं सदी के बीचोबीच वैज्ञानिक शोध के जो ढाँचे (संस्थान आदि) बने, तमाम संकटों के बावजूद उनकी अपनी एक गति रही है और आज ज़हनी साइंस, कंप्यूटर साइंस जैसे कई मोर्चों पर विज्ञान बुलंदी पर है। ऐसा साम्यवादी मुल्कों में बराबर रफ्तार से क्यों नहीं हुआ, यह सोचना ज़रूरी है। दुनिया के दीगर और मुल्कों में तो साम्यवादी आंदोलन परचम गाड़ नहीं पाया है, और छोटी सी जनसंख्या वाले क्यूबा में आखिर कब तक शमा जली रह सकती है, इसलिए सवाल रूस, पूर्वी यूरोप के मुल्क और चीन पर ही आता है। क्या यह सवाल बुनियादी तौर पर मार्क्सवाद और विज्ञान के रिश्ते का सवाल है? जैसे वैज्ञानिक तर्कशीलता की अपनी सीमाएँ हैं, वैसे ही तेजी से बदलते सामाजिक समूहों और उनमें उभरते नए द्वंद्वों पर तुरत-फुरत समझ की अपेक्षा विज्ञानधर्मी मार्क्सवाद से नहीं होनी चाहिए। फिर भी हम अक्सर ऐसी अपेक्षा रखने की ग़लती करते हैं। बीसवीं सदी की शुरूआत में ही यह साफ हो गया था कि विज्ञान में हो रहे क्रांतिकारी बदलावों का असर मानव-मूल्यों पर कैसा होगा, यह जटिल सवाल है और इससे जूझने के लिए हमें भौतिकवाद के बारे में नए ढंग से सोचने की ज़रूरत है। फ्रेडरिख़ एंगेल्स ने 'लुडव्हिघ फॉयरबाख़ और शास्त्रीय जर्मन दर्शन का अंत' लेख में यह लिखा है कि विज्ञान में युगांतरकारी खोज के साथ भौतिकवाद का स्वरूप बदल जाता है। लेनिन ने अपने विरोधियों की भौतिकवाद को पूरी तरह तिलांजलि देने की कोशिश के बरक्स एंगेल्स के इस उद्धरण का इस्तेमाल करते हुए लिखा कि मार्क्सी चिंतन यह माँग करता है कि नई वैज्ञानिक खोजों के साथ भौतिकवाद पर नए सिरे से सोचा जाए। सौ साल बाद जब सूचना क्रांति से दुनिया भर में उथल-पुथल नज़र आती है, यह बात और महत्वपूर्ण हो गई है। लेनिन के शब्दों में 'एंगल्स के भौतिकवाद के फार्म का संशोधन’(revision), उसके स्वाभाविक-दार्शनिक प्रस्तावों का संशोधन न केवल संशोधनवाद’ के मान्य अर्थों में संशोधनवाद नहीं है बल्कि इसके उलट, यह मार्क्सवाद की मांग है।'
मार्क्स को उद्धृत कर वैचारिक विमर्श में लगातार दरारें बढ़ाते वामपंथी बुद्धिजीवी यह भूल जाते हैं कि मार्क्सी सोच मूलतः एक गतिशील विज्ञानधर्मी मानवतावादी सोच है। विज्ञान के दर्शन में यह माना गया है कि अधिकतर वैज्ञानिक प्रचलित या प्रतिष्ठित मान्यताओं के वर्चस्व में ही काम करते हैं। कभी-कभार ही होता है कि ऐसे अवलोकन जो मान्यताओं से संगति नहीं रखते हैं, उन पर विचार करते हुए कुछ वैज्ञानिक इंकलाबी बदलावों की ओर बढ़ पाते हैं। मार्क्स के जीवनकाल में उन तमाम संकटों के बारे में कोई जानकारी या तो उपलब्ध न थी या बहुत ही कम थी, जो बीसवीं सदी में ही पूरी तरह उजागर हुए हैं। पर्यावरण के संदर्भ में विज्ञान की सीमाएँ, लिंगभेद, नस्ल और जाति विषयक समझ, ये तमाम बातें बीसवीं सदी में ही गहराई से सोची समझी गई हैं। पहले जो कुछ सोचा गया था, उस विचार जगत में मार्क्सवाद सबसे अग्रणी भूमिका में था। कई ऐसी बातें मार्क्स और एंगेल्स के लेखन में हैं जिनको आज कहीं बेहतर समझा जा सकता है।
जैसा वैज्ञानिक पद्धति के बारे में माना जाता है, वैसे ही मानव समाज के विकास का एक निश्चित आख्यान गढ़ते हुए मार्क्स ने जिस दर्दनाक उदासीनता की माँग रखी थी, उसके बारे में फिर से सोचना ज़रूरी है। भारत के बारे में सीमित सामग्री पर आधारित अपने महत्त्वपूर्ण आले में मार्क्स ने यह मानते हुए भी कि 'इस बारे में कोई शक नहीं कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद से हिंदुस्तान को पहले की अपेक्षा भिन्न और बेइंतहा गुना कष्ट झेलना पड़ा है', अंततः यह कहा कि 'इंग्लैंड ने जो भी अपराध किए, ऐसा करते हुए उसकी अचेत भूमिका … क्रांति के कर्णधार की रही'। गोएठे की कविता उद्धृत करते मार्क्स ने कहा कि हम पीड़ाओं से दबकर रोते नहीं रह सकते और भविष्य के सुख का ध्यान रखते हुए हमें इस तकलीफ से गुजरना होगा, वह कितनी भी असहनीय क्यों न हो। इस कथन को सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने सीमित अर्थ में इस तरह पढ़ा कि मार्क्स भारतीय मानस को यूरोपी ढाँचे में ढालने को बेचैन थे, पर मार्क्स की असली बेचैनी समाजवादी क्रांति लाने की थी। यह देखते हुए कि पूँजीवादी कुविकास का शिकार मानवता का विशाल बहुसंख्यक हिस्सा है, हमें यह सोचना होगा कि हम इस पत्थर के सनम जैसी उदासीनता से कैसे निकलें। अराजकतावाद के प्रति मार्क्सवादी असहिष्णुता को कम करना होगा। सांस्कृतिक पटल पर सरलीकृत मडल काम नहीं करेंगे, सृजनात्मक अराजकता को भरपूर जगह देनी होगी। क्या विज्ञान ऐसी अराजकता को जगह देता है? अगर दार्शनिक फेयराबेंड की सुनें तो अराजकता ही विज्ञान को आगे बढ़ाती है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद तक मार्क्स की यात्रा की शुरूआत भी अराजक मानवतावादी चिंतन से ही हुई थी। सही है कि इस सोच को बेमतलब खींचा जाए तो सौ साल पहले तक विज्ञान के बारे में जो द्वंद्वात्मक समझ बनी थी, उसे बिल्कुल नकारने का खतरा रहता है, और सब कुछ उत्तर-आधुनिक गड्ढे में गिरता हुआ दिखता है, पर इतनी परेशानी की सचमुच कोई वजह नहीं है। विज्ञान के बारे में द्वंद्वात्मक सोच और सामाजिक-राजनैतिक विश्लेषण आज भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
जहाँ तक विज्ञान के पेशे की बात है, नस्ल, जाति और स्त्री प्रश्न पर साम्यवादी मुल्कों में काफी हद तक बेहतर स्थिति रही है। क्यूबा इस मायने में तक़रीबन जन्नत रहा है। पश्चिमी मुल्कों की तुलना में विज्ञान से जुड़े पेशों में रूस और चीन में स्त्रियों की बड़ी भागीदारी रही है। साम्यवाद आने के पहले इन मुल्कों में स्त्रियों की स्थिति बेहद खराब थी। दीगर और मुल्क जहाँ साम्य के विचार का प्रभाव रहा है, केवल पश्चिमी यूरोप ही नहीं, यहाँ तक कि लीबिया, सीरिया और ईराक तक में इन मुद्दों पर काफी तरक्की हुई थी, जिसे हाल की साम्राज्यवादी तबाही ने मटियामेट कर दिया है। सही सवाल यह होना चाहिए कि मार्क्सी पद्धति में इन सवालों से जूझने की कैसी संभावना है। मार्क्सवादियों को यह समझने में लंबा वक्त लगा है कि ये सवाल महज सांस्कृतिक बहिरचना का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये बुनियादी द्वंद्व हैं।
साम्यवाद में लोकतांत्रिक स्वरूप की माँग विज्ञानधर्मी माँग है। वैज्ञानिक शोध तब तक मायने नहीं रखता जब तक कि शोध-पद्धति और निष्कर्षों को वैज्ञानिक समुदाय की स्वीकृति न मिले। सरमाएदार ढाँचों के बीच रहकर काम करने की वजह से जैसी भी इसकी सीमाएँ हों, वैज्ञानिक समुदाय के बड़े तबके ने इसे मान लिया है। साम्यवादी ढाँचे में विज्ञान ही नहीं, साहित्य, कला, सिनेमा, यहाँ तक कि खान-पान और पहनावों तक में भी लोकतांत्रिक राजनीति को स्पेस मिलना चाहिए। एक ही मंच में परस्पर ईमानदारी पर आस्था रखते हुए लगातार बातचीत का माहौल तैयार करना और हाशिए पर पड़े को बीच में लाना, यह करना है। पूँजीवादी विज्ञान और विकास निजी स्वार्थ को सर्वोपरि रखता है, तो मार्क्सवाद के लिए चुनौती है कि निज की आजादी और सृजनात्मक अभिव्यक्ति का सम्मान करते हुए आर्थिक निर्णयों से लेकर सांस्कृतिक धरातल तक, चाहे उसमें धर्म और परंपरा की तलाश ही क्यों न हो, हर स्तर पर समष्टि को महत्त्व दें। इस नए मुहावरे के साथ ही हमें समझना और समझाना होगा कि दुनिया कैसे बुनियादी रूप से बदल चुकी है। सोशल मीडिया और सामान्य रूप से सूचना क्रांति को कैसे समझा जाए, इस पर खुली बहस ज़रूरी है। बदलाव तेजी से हो रहे हैं, पर सही समझ बनाने में काफी वक्त लगेगा।
आखिर में यह बात कि आज कोई भी विचार स्थानीय तौर पर सीमित रह कर मायने नहीं रख सकता। जब धरती विनाश के कगार पर है और जालिम ताकतें वैश्विक तौर पर विज्ञान और तक्नोलोजी का फायदा उठा रही हैं, हमें राष्ट्रवाद पर सीधी चोट पहुँचाती मार्क्स की चिंता को हमेशा सामने रखना पड़ेगा कि - दुनिया के कामगारो, एक हो जाओ। बदलती परिस्थितियों में हमें इसे 'दुनिेया के मजलूमो एक हो जाओ' कह कर आलमी पैमाने पर संघर्ष और निर्माण का ऐसा दर्शन रचना होगा, जिसमें विज्ञान का अराजक मानवीय पक्ष ही सबसे ऊपर हो। तर्कशीलता को छोड़े बिना भी खुलापन हो सकता है, यही कोशिश होनी चाहिए। इसी दिशा में विज्ञान और तक्नोलोजी का भरपूर इस्तेमाल हो। इस खुलेपन को पॉपर के 'खुले समाज' के बनिस्बत तकरीर करते हुए मॉरिस कॉर्नफोर्थ ने 'खुला (स्वच्छंद) दर्शन' कहा है।                 (समकालीन जनमत -2018)

Monday, April 30, 2018

नई केमिस्ट्री का सैक्सोफ़ोन


जुड़ो

1

कायनात में क्यूबिट कलाम लिख रहे हैं। परस्पर प्यार में उलझे हैं सूक्ष्मतम 

कण। हर पल ध्वनि गूँजती है, प्यार तरंगित होता है नीहारिकाओं के पार। हम 

सब इसी गूँज में गूँजते हैं। धरती और आकाश हमारे साथ गूँजते हैं। हम गूँजते हैं 

साम्य के नाद में; कायनात में गूँजती है आज़ादी। यह गूँज हमारी प्रार्थना है,  

सजदा है, क्यूबिट कणों में टेलीपोर्ट होकर कायनात के चक्कर लगा आती है 

गूँज। हमारा प्यार हमारा रब है। हमने मीरा से प्यार किया,

परवीन शाकिर से प्यार किया। हीर और रांझा हम, हम हादिया, इशरत हम। 
हम प्यार, हम प्रेमी। हम आज़ाद, हम आज़ादी। हम समंदर का नील, हम 
प्रतिरोध का लाल। हम खुली हवा की मिठास, हम पंछी लामकां।

2

पढ़ना है, पढ़ाना है। खोखे पर बैठ चाय पीनी है, पर दिमाग को कुंद नहीं होने 

देना है। उदासीन होना है, उदास नहीं होना है। सुर साधना है। कुदरत को 

सुनना है, कुदरत को साधना है। चाँद-सूरज के साथ इस धरती को खूबसूरत 

रहने देना है। सूरज को गिरने नहीं देना, चाँद को भागने नहीं देना है, तारों को 

खगोली चक्कर लगाते रहना है, हर किसी ने प्यार जीना है।



आनंदधाराएं अनंत हैं – परंपरा के कई छोर हैं। सगुन, निरगुन, धम्म, हर दीन 

परंपरा है। गीता पढ़ लो या ग्रंथ साहब; या कोई बाइबिल या कुरान पढ़े। या कि 

चारवाक जिए। कार्बोनेट अणु में समरूपता को पढ़ना जैसे शफाकत अमानत 

अली को सुनना। अ के साथ ब को पढ़ना है। कुछ-कुछ अलग सब। 

सूरज के रहते बादल दिख गए; जैसे संकट में मेरी हिन्दी कमज़ोर पड़ जाए तो 

थोड़ी पंजाबी बोल लूँ! मान लो जिसे बेहतर मानते हो, पर यह वजह नहीं कि 

अलग-थलग रहा जाए।



डर है कि सूरज बिखर रहा है खरबों टुकड़ों में, ज़मीं पर आग धधक रही है हर 

ओर। शैतान के लंबरदार शिश्न पकड़े हर हर घर घर का नारा उछाल रहे हैं कि 

हम डर जाएँ। हम नहीं डरेंगे; हम साथ हैं तो हरी-भरी ज़मीं हमारे साथ है। 

बिना दूरबीन भी दिख जाएँगी किसी और ग्रह की सतह पर हरी सब्जियाँ। या 

कि अंतरिक्ष में किसी धूमकेतु पर राहुल राम नई केमिस्ट्री का सैक्सोफ़ोन बजा 

रहा होगा ।



जुड़ो, लाल के पहरेदारो, लाल पहरेदारो, तरह-तरह की लालिमा से 

जुड़ो। कार्बोनेट अणु, शफाकत अमानत अली, सगुन, निरगुन, धम्म,  

चारवाक, भूगोल, इतिहास, कोई माफ नहीं करेगा 'गर सूरज गिर पड़े

गर चाँद खफा हो जाए।
 
(समकालीन जनमत; 2018)