आइए हाथ उठाएं हम भी

Name: लाल्टू
Location: हैदराबाद, आंध्र प्रदेश, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Sunday, May 18, 2008

गर्मी

तकरीबन एक महीना गर्मी से बहुत परेशान रहे। दफ्तर और घर दोनों ऊपरी मंज़िल पर। संयोग से वर्षों से ऐसा रहा है। अब जिस कमरे में अस्थायी रुप से बैठ रहा हूँ, वहाँ ए सी है तो कम से कम काम के वक्त राहत है। हर कोई कहता है कि गर्मी बढ़ रही है। हैदराबाद में ए सी की ज़रुरत होनी नहीं चाहिए, पर या तो उम्र बढ़ रही है इस वजह से या सचमुच गर्मी बहुत होने की वजह से इस साल परेशानी ज्यादा है। चारों ओर कंक्रीटी जंगल फैल रहा है। बहुत पहले कभी बच्चों के लिए एक कविता लिखी थी, शीर्षक था 'पेड़ों को गर्मी नहीं लगती क्या?' कभी ढूँढ के पोस्ट करेंगे। फिलहाल तो बेटी के ताने सुन रहा हूँ कि बस गर्मी गर्मी रट लगाए हुए हो।

गर्मी ज्यादा हो तो स्वतः अवसाद होता है। जो भी ठीक नहीं है वह कई गुना बेठीक लगने लगता है। स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। कहते ही हैं, ज्यादा गर्मी मत दिखाओ। ऐसे में कभी कभार शाम को ठंडी बयार चल पड़े तो लगता है जन्नत के दौरे पर निकले हैं। ऊपरी मंज़िल होने का यह फायदा है कि बरामदे पर इधर से उधर चलना भी सैर जैसा है। बदकिस्मती से पड़ोस वालों ने मकान पर एक मंजिल और बढ़ा ली है, इसलिए उधर से हवा रुक गई है, फिर भी हवा को बलखाने के लिए कोण मिल ही जाते हैं। और फिर पिछवाड़े में छोटा सा जंगल है, जहाँ ऊँचे पेड़ों के पत्ते सरसराते रहते हैं।

तीन दिनों बाद कुछ हफ्तों के लिए विदेश जाना है। गर्मी से तो राहत मिलेगी, पर यह शाम का मजा मिस करेंगे। और जो अनगिनत लोग इसी गर्मी में मर खप रहे हैं, उनको कैसे भूलें!

आज हिंदू में हर्ष मंदेर का आज हिंदू में हर्ष मंदेर का विनायक सेन पर अच्छा आलेख है।

Thursday, May 15, 2008

विनायक सेन जेल में क्यों है?

विनायक सेन जेल में क्यों है?
- इसलिए कि दो हजार आठ में भी हिंदुस्तान एक पिछड़ा हुआ मुल्क है, जहाँ ढीठ सामंती हाकिमों और अफसरशाही का राज है।
सोचने पर कमाल की बात लगती है कि मामला इतनी दूर तक पहुँच गया कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दबाव आना लाजिमी हो गया।
- इसलिए भी कि जनपक्षधर लोगों में भी एकता नहीं है और काफी हद तक हम सब लोग सामंती सोच से ही ग्रस्त हैं।

जयपुर के धमाकों से हर कोई जैसे खुमारी से जागा है और हमें याद आया है कि क्रिकेट के हंगामे से अलग हिंदुस्तान की सच्चाई कुछ और भी है।
मीडिया में बार बार सवाल उठाया जा रहा है कि जयपुर क्यों? कैसा बेकार सवाल है जैसे कि और कुछ पूछने को नहीं है तो यही पूछ लें।
जैसे कि जयपुर न होकर कोई और शहर होता तो ठीक था।
सोचता हूँ कि आज के युवाओं और बच्चों में भविष्य के लिए क्या उम्मीदें होंगी? आश्चर्य होता है कि सब कुछ अपने नियमं से चलता ही रहता है। एक जमाना वह भी था जब कोई टी वी नहीं था। पता चलता कि शहर में कहीं दंगा हो गया है। लोग अपने मुहल्लों में टिके रहते। चर्चाएँ, बहसें होतीं और लगता जैसे धरती परिधि पर कहीं रुक गई है। अब हम बार बार मृत और घायलों को देखते हैं और मशीन के पुर्जों जैसे वापस क्रिकेट देखने लग जाते हैं।

Monday, May 12, 2008

So how should I presume?

हल्की ठंडक भरी पठारी हवा।
तपने को तैयार कमरा, अभी अभी बिजली गई है।

खबरें। मानव मूल्य।

नैतिकता।
कछ दिनों पहले किसी ने अरस्तू और अफलातून के संवादों का जिक्र किया था।

-क्या नैतिकता सिखाई जा सकती है। अगर हाँ तो कैसे?

-मै नही जानता कि नैतिकता है क्या, सिखाना तो दूर की बात।

कुछ लोग जबरन मानव मूल्य नामक एक कोर्स पर बहस करते हैं।

जिनका वर्चस्व है, वे चाहते हैं कि वे युवाओं से चर्चा करें कि भला क्या है, बुरा क्या है। विरोध करता हूँ तो कभी औचित्य पर सवाल उठते हैं तो कभी 'प्रोफेसर साहब बहुत विद्वान हैं' सुनता हूँ। सुन लेता हूँ, और समझौतों की तरह यह भी सही।

तकरीबन सौ साल के बाद भी एलियट की पंक्तियाँ ही सुकून देती हैं।

For I have known them all already, known them all:—
Have known the evenings, mornings, afternoons,
I have measured out my life with coffee spoons;
I know the voices dying with a dying fall
Beneath the music from a farther room.
So how should I presume?

मेरी चिंताएँ इतनी विकट हैं कि यह सब बेकार की बहस लगती है। फिलहाल ज़िंदगी और मौत की चिंताएँ हैं। सबको ज़िंदा रहना है। एक दिन और ज़िंदा रहना है।

साइंटिफिक अमेरिकन में आलेख है कि बीस की उम्र के बाद ही मस्तिष्क में सफेद पदार्थ या 'माएलिन' बनने की रफतार में बढ़ोतरी आती है, इसिलए 'वयस्क' निर्णय लेने की क्षमता हमें बीस से पचीस की उम्र तक ही मिल पाती है। पर अनुभव
से 'माएलिन' बनने में तेजी आ सकती है। जिस क्षेत्र का अनुभव अधिक होगा, उसी से जुड़े मस्तिष्क के क्षेत्र में माएलिन ज्यादा बनेगा। 'वयस्क' निर्णय में ज़िंदा रहना भी है। सतही तौर पर पढ़ा जाए तो युवाओं के खिलाफ षड़यंत्र सा लगता है। और इसका फायदा उठाने वाले उठाएँगे भी।

जब तक संभव है, सबको ज़िंदा रहना है। किसी को ज़िंदा रखने की जिम्मेवारी है तो निभाना है।

दोस्त फोन पर कह रहा है कि वह उदास है, हर खबर और अधिक उदासी लाती है। मै बुज़ुर्ग साहित्यकार मित्र को सालों पहले भेजा कार्ड याद करता हूँ (बाद में बच्चों और नवसाक्षरों के लिए संग्रहों मे शामिल गीत) - जीतेंगे, जीतेंगे हम जीतेंगे रे जीतेंगे।
कोई सुनाता है कि कोलकाता की क्रिकेट टीम का नारा है। जैसे पिछले साल टी वी पर किसी लाखों की गाड़ी के विज्ञापन में साठ के दशक का चुराया हुआ सुर था - लिटल हाउसेस आन द हिल टाप दे आल लुक जस्ट द सेम।

रात को न आते आते भी नींद आती है। इंतज़ार करता हूँ नई सुबह का, नई कविता की नई सुबह।

Wednesday, March 26, 2008

इक्कीसी कानून

जब समय कम हो और लग रहा हो कि बहुत वक्त बीत गया, कुछ पोस्ट नहीं किया, तो या तो अपनी कोई प्रकाशित कविता या फिर सुकुमार राय - यही फिलहाल।
तो दोस्तो, आबोल-ताबोल से एक और अनुवाद।


इक्कीसी कानून


शिव ठाकुर के अपने देश,
आईन कानून के कई कलेष।
कोई अगर गिरा फिसलकर,
प्यादा ले जाए पकड़कर।
काजी करता है न्याय-
इक्कीस टके दंड लगाए।

शाम वहाँ छः बजने तक
छींको तो लगे टिकट
जो छींका टिकट न लेकर,
धम धमा दम, लगा पीठ पर,
कोतवाल नसवार उड़ाए-
इक्कीस दफे छींक मरवाए।

जो किसी का हिला भी दाँत
चार टके जुर्माना माँग
किसी की निकली मूँछ
सौ आने की टैक्स पूछ -
पीठ कुरेदे गर्दन दबाए
इक्कीस सलाम लेता ठुकवाए।

चलते हुए कोई देखे अगर
दाँए बाँए इधर उधर
राजा तक दौड़े खबर
उछलें पल्टन बाजबर
भरी दोपहर धूप खटाए
इक्कीस कड़छी जल पिलाए।

जो लोग कविता करते हैं
उन्हें पिंजड़ों में रखते हैं
पास कानों के नाना सुर में
पढ़ें पहाड़ा सौ मुष्टंडे
बहीखाते मोदी के पकड़ाए
इक्कीस पन्ने हिसाब लगवाए।

वहाँ अचानक रात दोपहर
भरे खर्राटे नींद में अगर
झट जोरों से सिर में रगड़
कसैले बेल में घुला गोबर
इक्कीस चक्कर घुमा घुमाकर
इक्कीस घंटे रखें लटकाकर।

Friday, February 29, 2008

प्रोफेशनल अवसादी और धंधा-ए-अवसाद

मैं अपने आप को प्रोफेशनल अवसादी कह सकता हूँ। करें भी क्या - चारों ओर रुलाने के लिए भरपूर सामग्री है। एक मित्र ने पूछा कि सुखी हो - मैंने लिखा कि सुखी तो नहीं हूँ, पर दुःखों के साथ जीना सीख लिया है। यहाँ तक कि अपने दुःखों के साथ जीते हुए दूसरों को सुख देने में भी सफल हूँ। एक और मित्र का कहना है कि फिर मेरा अवसादी होने का दावा ठीक नहीं है। उसके मुताबिक विशुद्ध अवसादी वही हो सकता है जो दूसरों को रुलाने में सफल है। उस तरह से देखा जाए तो बुश और मोदी में अच्छी प्रतियोगिता हो सकती है कि अवसाद विधा में नोबेल पुरस्कार किस को मिलेगा।

बहरहाल एक साथी अध्यापक ने इस चिंता के साथ कि मेरे अवसाद को अड्डरेस किया जाना चाहिए, मुझे बतलाया कि मुझे अवसाद मोचन के धंधे में जुटी एक कंपनी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम की जानकारी पानी चाहिए। वह खुद अपने किसी बुज़ुर्ग अध्यापक के कहने पर इस कंपनी के चार दिवसीय कार्यक्रम को झेल रहा था। आखिरी दिन यानी मंगलवार की शाम को प्रतिभागियों को कहा गया था कि वे अपने किसी परिचित को साथ लाएँ ताकि इस अद्भुत इन्कलाबी शिक्षा की जानकारी मेहमानों को भी मिल सके।

बहरहाल मैंने अपने उदारवादी होने के निरंतर दावे के मुताबिक मान लिया कि मुझे एक शाम इस जरुरी काम के लिए बितानी चाहिए। दफ्तर से साढ़े पाँच बजे निकले थे। हैदराबाद की गंदी ट्रैफिक से जंग लड़ते हुए हम दोनों वक्त से पहले ही सभागार पहुँचे। यह तो अच्छा था कि पंद्रह मिनट हाथ में थे, इससे एक कप चाय पीने का वक्त मिल गया। साथी ने बाद में बतलाया कि साढ़े सात से शुरु होने वाला सेशन पौने ग्यारह तक चलेगा और राहत के लिए सिर्फ पानी। वैसे उनके चार दिवसीय कार्यक्रम के लिए फीस है साढ़े छः हजार रुपए।

सेशन की शुरुआत दिल्ली के व्यापारी से पहचानशिला शिक्षा के अग्रणी बने अधेड़ के भाषण से हुआ। कि कैसे जनाब नहीं नहीं करते भी एक बार इस शिक्षा को ले ही बैठे और तब से जीवन बदल चुका है - जीवन में अवसाद की जगह नहीं बची, पत्नी से संबंध बेहतर हो गए हैं आदि आदि। फिर चार दिनों में लाभ उठा चुके दो लोगों ने - एक युवती और एक अधेड़ ने सुनाया कि उन्हें क्या लाभ पहुँचा। सुंदरी युवती दूर शहर से अपनी चचेरी बहन के कहने पर कालेज की परीक्षाएँ न देकर पहचानशिला शिक्षा के लिए आई थी। अधेड़ ने जाना था कि उसे अपने पिता से बात किए लंबा अवसर गुजर चुका था और इन चार दिनों में ही उसने पिता से फोन पर बात की। सुनते हुए मुझे लगा कि मेरी माँ जो रोती रहती है कि मैं उसे फोन नहीं करता मुझे तुरंत उसे फोन करना चाहिए। पर ऐसा निकम्मा हूँ कि इस बात को पाँच दिन हो गए, अभी भी नहीं किया।

बहरहाल, कई बार तालियाँ बजाने के बाद मेहमानों और प्रतिभागियों को अलग अलग कमरों में बाँट दिया गया। गौरतलब यह कि बड़े करीने से सोच समझके जुट बनाए गए। मैं जरा चिढ़ा कि मेरे समूह में ज्यादातर मेरे जैसे खूसट ही दिख रहे थे। फिर दिल्ली की ही (दिल्ली वैसे भी हर कमाल की बात में सामने होती है - या होता है, बाप रे मसिजीवी फिर पकड़ेगा) नितांत प्रवीणा सचमुच की अध्यापिका का दो घंटे का भाषण सुना। जिन बातों को कभी मैं बचपन में उपन्यास पढ़कर सीख चुका हुँ, उनको वृत्त, त्रिभुज आदि आकारों में उभरते देखा। ज्यामिति में जाना कि भविष्य अतीत से मुक्त नहीं होता है। मुसीबत यह कि गलती से ज्यादा पढ़लिख चुकने की वजह से हमेशा की तरह नौसिखियापन की बौछार से चिढ़ता रहा। किसी वजह से कोई कमरे से निकलता तो पीछे पीछे स्वयंसेवक/विका होता/ती। बहुत सारा समय इस बात में लगा कि इस महान शिक्षा से वंचित मत होवो, साढ़े छः हजार से वंचित हो जाओ। मुझे जोर से भूख लगी थी (अवसादी होने का मतलब यह नहीं कि पेट चुप मार जाए या फिर यही सच कि मेरा दावा गलत है)। अंत में मैं धीरे धीरे निकला और अभी तक अचंभित हूँ कि किसी ने पीछा नहीं किया या बाद में मुझे फोन नहीं किया (नंबर पहले ही लिखवा चुके थे)। फिर सोचा कि ये अवसादमोचन के धंधा करने वाले हैं, इन्हें भी यही लगा होगा कि बंदा अवसादी नहीं है। अब तो सचमुच मुझे सोचना ही पड़ेगा।

वैसे अगर सच ही हर कोई सुखी हो जाए, तो अवसाद मोचन के धंधों में जुटे इन ओझा टाइप्स का क्या होगा? सारे बेकार हो जाएँगे।

पारंपरिक सत्संगों और कथाओं की जगह ले रहे ये नए - जीने की कला, पहचानशिला मंच और तमाम ऐसे धंधे - कोई साढ़े छः हजार में और कोई मुफ्त - इन सबको वर्षों के अध्ययन से प्राप्त मनश्चिकित्सा की कुशलता से बहुत दुश्मनी है। वैसे आधुनिक चिकित्सा-तंत्र से चिढ़ मुझे भी है, पर मेरी चिढ़ सही पेशेवर प्रवृत्तियों के अभाव से है (एक गलाकाटू पेशेवर प्रवृत्ति भी होती है, मैं उसकी बात नहीं कर रहा, मैं कठिन श्रम और ईमानदारी की बात कर रहा हूँ), खुली सोच के व्यापक अभाव से है - न कि ज्ञान और अनुसंधान से। बदकिस्मती से बहुत सारे भले लोग अपनी सोच में इतने संकीर्ण हो गए हैं कि आधुनिक विज्ञान की संरचनात्मक संकीर्णता की तलाश करते करते वे अपने किस्म की ओझागीरी और रुढ़ि रचते जा रहे हैं और खुद को और दूसरों को उनका शिकार बनाते जा रहे हैं।

तो दोस्तो, रोने की तो आदत ही है। मेरे साथी ने मुझे बतलाया कि उसके सेशन में भी आगे के अडवांस्ड कोर्स में दाखिला लेना क्यों जरुरी है, यही चलता रहा। और बेचारा मेरे ही जैसा भूख का मारा चुपचाप झेलता रहा। अब वह भी चिढ़ गया है। कोई आश्चर्य है कि मुझे रोना आ रहा है!? यह पूछकर और मत रुलाओ कि क्या उस समझदार साथी ने इस कंपनी को साढ़े छः हजार थमाए थे - मैं जानना नहीं चाहता। इससे भी ज्यादा अत्याचार करना है तो मुझे याद दिला दो कि इस साथी का अध्यापक (जिसके कहने पर वह इस पहचानशिला मंच के प्रपंच में पड़ा) देश की सबसे अग्रणी माने जाने वाली विज्ञान शिक्षण और अनुसंधान संस्था में प्रोफेसर है।

प्रतिभागियों को भूखे रखने के पीछे वैज्ञानिक कारण है। पेट रोएगा तो दिमाग रोएगा और इससे कंपनी का धंधा बढेगा। मैं ऐसा खड्डूस हूँ कि चाहे जितना भूखा मार लो, साढ़े छः हजार हाथ से निकलने न दूँगा। दे ही नहीं सकता भाई। शायद यह गरीबी चेहरे पे दिखती होगी, इसीलिए तो किसी ने पीछा नहीं किया।

Sunday, January 13, 2008

साथ रह गए कभी न छूटने वाले इन घावों में

यह जो गाँव पास से गुज़र रहा है
इसमें तुम्हारा जन्म हुआ
जब भी यहाँ से गुज़रता हूँ
स्मृति में घूम जाती हैं तुम्हारी आँखें
बचपन में जिन्हें तस्वीर में देखते ही हुआ सम्मोहित

तब से कई बार धरती परिक्रमा कर चुकी सूरज के चारों ओर
तुम्हारे शब्द कई बार बन चुके बहस के औजार
लंबे समय तक कुछ लोगों ने तुम्हारी पगड़ी पर सोचा
छायाचित्रों में तुम नहीं तुम्हारी पगड़ी का होना न होना देखा
और हमने जाना कि यह वक्त तुम्हें नहीं तुम्हारे नाम को याद रखता है

हमारे वक्त में दुनिया बदलती नहीं किसी के आने-जाने से
चिंताएँ, हँसी मजाक, दूरदर्शन, खेलकूद
सब चलते रहते हैं
ब्रह्मांड के नियमों अनुसार
यह छायाओं का वक्त है
चित्र हैं छायाओं के जिनसे आँखें निकाल दी हैं वक्त के जादूगरों ने

रंग दे बसंती गाते हुए हर कोई सीना ठोकता है
और फिर या तो जादूगरों की जंजीरों में गला बँधवा लेता है
या दृष्टिहीन छायाओं में खो जाता है
गीत गाता हुआ आदमी मूक हो जाता है
गाँव के पास से गुज़रते हुए
देखता हूँ गाँव अब शहर बन रहा है
आस पास जो झंडे लगे हैं
वह जिन हवाओं में लहरा रहे हैं
उनमें खरीद फरोख्त के मुहावरे हैं

बीच सड़क गुज़रते हुए
सीने से लगाता हूँ बचपन की स्मृति
तमाम मायावी झंडों के बीच आज़ाद लहरा रही है मेरी स्मृति
बूँद जो अब होंठों पर खारापन ला चुकी है
उँगलियों से उसे समेटता हूँ

फिर दिखने लगते हैं परचम
जिनमें तुम्हारी आँखें है
जो इक अलग तर्ज़ में बसंती रंग में रँग जाती हैं
जिस्म में फैले पचास वर्षों में मिले अनगिनत घाव।

गाँव पीछे छूट गया
साथ रह गए तुम कभी न छूटने वाले इन घावों में।

१४ सितंबर २००७ (उद्भावना - भगत सिंह स्मृति विशेषांक, २००७)

Saturday, December 22, 2007

चार कविताएँ: 7 दिसंबर 2007

एक दिन हमारे बच्चे हमसे जानना चाहेंगे
हमने जो हत्याएँ कीं उनका खून वे कैसे धोएँ

हताश फाड़ेंगे वे किताबों के पन्ने
जहाँ भी उल्लेख होगा हमारा
रोने को नहीं होगा हमारा कंधा उनके पास
कोई औचित्य नहीं समझा पाएँगे हम
हमारे बच्चे वे बदला लेने को ढूँढेंगे हमें
पूछेंगे सपनों में हमें रोएँ तो कहाँ रोएँ

हर दिन वे जिएँगे स्मृतियों के बोझ से थके
रात जागेंगे दुःस्वप्नों से डर डर
कई कई बार नहाएँगे मिटाने को कत्थई धब्बे
जो हमने उनको दिए हैं
जीवन अनंत बीतेगा हमारी याद के खिलाफ
सोच सोच कर कि आगे कैसे क्या बोएँ।

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कोई भूकंप में पेड़ के हिलने को कारण कहता है
कोई क्रिया प्रतिक्रिया के वैज्ञानिक नियमों की दुहाई देता है
हर रुप में साँड़ साँड़ ही होता है
व्यर्थ हम उनमें सुनयनी गाएँ ढूँढते हैं

साँड़ की नज़रों में
मौत महज कोई घटना है
इसलिए वह दनदनाता आता है
जब हम टी वी पर बैठे संतुष्ट होते हैं
सुन सुन सुंदर लोगों की उक्तियाँ

इसी बीच नंदीग्राम बन जाता है ग्वेरनीका

जीवनलाल जी
यह हमारे अंदर उन गलियों की लड़ाई है
जो हमारी अंतड़ियों से गुजरती हैं।

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दौड़ रहा है आइन्स्टाइन एक बार फिर
इस बार बर्लिन नहीं अहमदाबाद से भागना है

चिंता खाए जा रही है
जो रह गया प्लांक उसकी नियति क्या होगी

अनगिनत समीकरण सापेक्ष निरपेक्ष छूट रहे हैं
उन्मत्त साँड़ चीख रहा कि वह साँड़ नहीं शेर है
किशोर किशोरियाँ आतंकित हैं
प्रेम के लिए अब जगह नहीं
साँड़ के पीछे चले हैं कई साँड़
लटकते अंडकोषों में भगवा टपकता जार जार

आतंकित हैं वे सब जिन्हें जीवन से है प्यार
बार बार पूर्वजों की गलतियों को धो रहे हैं
ड्रेस्डेन के फव्वारों में

दौड़ रहा है आइन्स्टाइन एक बार फिर
इस बार बर्लिन नहीं अहमदाबाद से भागना है।

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ये जो लोग हैं
जो कह देते हैं कि हम इनसे दूर चले जाएँ
क्योंकि हमारे सवाल उन्हें पसंद नहीं
ये लोग सुंदर लोग हैं

अत्याचारी राजाओं के दरबारी सुंदर होते हैं
दरबार की शानोशौकत में वे छिपा रखते हैं
जल्लादों को जो इनके सुंदर नकाबों के पीछे होते हैं

धरती पर फैलता है दुःखों का लावा
मौसम लगातार बदलता है
सुंदर लोग मशीनों के पीछे नाचते हैं
अपने दुःखों को छिपाने की कोशिश करते हैं

सड़कों मैदानों में हर ओर दिखता है आदमी
फिर भी सुंदर लोग जानना चाहते हैं कि मनुष्य क्या है
सुंदर नकाब के पीछे छिपे जल्लाद से झल्लाया प्राणी
हर पल बेचैन हर पल उलझा
सच और झूठ की पहेलियाँ बुनता

ये सुंदर लोग हैं
ये कह देते हैं कि हम इनसे दूर चले जाएँ
क्योंकि हमारे सवाल उन्हें पसंद नहीं
ये लोग सुंदर लोग हैं।

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