Wednesday, June 24, 2015

अपना कुछ चला गया


कुछ लोगों से आत्मीय संबंध उनसे मिलने से पहले ही बन जाता है। प्रफुल्ल 

बिदवई से मेरा संबंध कुछ ऐसा ही रहा। मैं उनसे दो बार ही मिला और सचमुच 

कोई ऐसी बातचीत नहीं हुई कि अंतरंगता का दावा कर सकूँ। पर मन में उनके 

लिए आत्मीय संबंध बढ़ता रहा। मैंने उन्हीं के लेखन में सबसे पहले नरेंद्र मोदी 

के नाम को नरेंद्र मिलेसोविच मोदी लिखा देखा था और मैंने भी कहीं इसका 

बकौल प्रफुल्ल कहते हुए इस्तेमाल किया है। शायद 2004 की अप्रैल की बात 

है, जब मैं पहली बार उनसे मिला। जानते तो पहले से ही थे। पुष्पा भार्गवा ने 

अपनी विज्ञान और समाज नामक संस्था के मंच से विज्ञान और नैतिकता पर 

एक सम्मेलन आयोजित किया था। मैं चंडीगढ़ से इसमें भाग लेने आया था। 

प्रतिभागियों में कुछ नामी-गरामी वैज्ञानिक थे। नार्लीकर पुणे से आए थे। 

नार्लीकर ने अपने भाषण में आरक्षण के खिलाफ बोलना शुरू किया। हिंदुस्तान 

के वैज्ञानिकों की यह खासियत है। अपने क्षेत्र में कुछ परचे छाप कर प्रतिष्ठित 

होते ही उन्हें लगता है कि वे किसी भी विषय पर जो मर्जी बोल सकते हैं। 

नार्लीकर के प्रति हम सबके मन में सम्मान था। ज्योतिर्विज्ञान में उनकी 

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति रही है। जब काफी देर तक वे आरक्षण पर बोलते रहे, मैंने 

प्रफुल्ल से कहा कि क्या किया जाए, कुछ तो कहना होगा। प्रफुल्ल ने खड़े होकर 

नार्लीकर का खंडन किया।


इसके कुछ समय बाद अचिन वनायक के साथ प्रफुल्ल की नाभिकीय मसलों 

पर लिखी किताब आई। मेरी इसमें रुचि थी क्योंकि पोखरण और कारगिल के 

बाद हमलोग चंडीगढ़ और आस-पास के इलाकों में इन मसलों पर चेतना 

फैलाने में लगे थे। मैंने स्थानीय अखबारों में इस विषय पर लेख भी लिखे थे। 

यह उससे आत्मीय संबंध का दूसरा कारण बना।


2010 के आस-पास दिल्ली आया था तो दोस्तों से मिलने इंडिया इंटरनेशनल 

सेंटर गया था। वहाँ प्रफुल्ल से फिर मुलाकात हुई। कुछ देर बातचीत हुई। वह 

दूसरी और आखिरी मुलाकात थी। उसके दो साल बाद कूडांकूलम मसले पर 

उसे नाभिकीय भौतिकी के वैज्ञानिकों से बातें करते देखा। वैज्ञानिक गुस्से में 

फूले बरस रहे थे और प्रफुल्ल शांति से उनकी बातों का खंडन कर रहे थे।



आज फेसबुक पर पढ़ा कि प्रफुल्ल भी गुजर गए। 'भी' इसलिए कि बढ़ती उम्र के 

साथ यही होता है - एक एक कर परिचितों का जाना होता रहता है। हाल में 

मैंने कविता लिखी थी - शायद 'समकालीन भारतीय साहित्य' में आई है:

सहे जाते हैं

हर दूसरे दिन कोई जाते हुए कह जाता है


चुका नहीं अभी हिसाब

तुम भी आओ हम खाता खोले रखेंगे


अपना कुछ चला गया

पहले ऐसा सालों बाद कभी होता था

अब सहता हूँ हर दिन खुद का गुजरना

जड़ गुजरती दिखती कभी तो कभी तना हाथ हिलाता है

एक एक कर सारे प्रेम विलीन हो रहे हैं


सहे जाते हैं खुद के बचे का बचा रहना

छिपाए हुए उन सबको जो गए

और जो जा रहे हैं। 

 

Friday, June 12, 2015

शांति के पक्ष में

आज जनसत्ता में
(पहला पैरा बाद में जोड़ा है)


दुश्मनी नहीं, दोस्ती में ही हित है



प्रधान मंत्री बांग्लादेश के दौरे पर गए, साथ में भारतीय राजनीति में उनकी फिर से मित्र बनी पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी गईं। दशकों से चले आ रहे छिटपुट सीमा विवाद खत्म हुए। किसी ने इस पर ना नुकुर नहीं कि किस को फायदा और किसको नुकसान हुआ। पिछली आधी सदी से भी अधिक समय से जो माहौल रहा है, वैसे लगता तो यही था कि दक्षिण एशिया में ऐसा संभव नहीं है कि शांति से विवाद निपटाएँ जाएँ, पर यह हुआ। यह अच्छी शुरूआत है।



क्या आपने कभी भारत-चीन विवाद पर चीन का पक्ष जानने की कोशिश की है? पाकिस्तान आखिर क्या कहता है - क्यों उसे भारत से लड़ना है। ऐसा सवाल सुनकर कई लोगों को हँसी आएगी। पाकिस्तान जैसा देश – पिछड़ा हुआ, मुसलमान देश – उसका भी क्या पक्ष होगा। चीन तो खुराफाती है ही, हर किसी के साथ पंगे लेता रहता है - लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश से हमारी सैंकड़ों एकड़ ज़मीनें छीन लीं, उसका पक्ष क्या? कल्पना करें कि आप चीन या पाकिस्तान के नागरिक हों तो ऐसा ही आप भारत के बारे में सोचेंगे। अरे देखो काश्मीर में धौंस जमा रखी है - सिक्किम को खा गया - भारत का क्या पक्ष! अपने यहाँ भगतों को कितनी भी नाराज़गी हो, पर उनके आम लोगों की नज़र में पिछड़ा हुआ तो हमें माना जाता है।



आम लोगों को जानकारी कम होती है, जानकारी पाने के सभी साधन भी उनके पास नहीं होते। पर अच्छे-भले पढ़े लिखे सुविधा-संपन्न लोग जब ऐसी बातें करते हैं कि वो तो दुश्मन मुल्क हैं, तो आश्चर्य होता है। क्या यही इंसान की फितरत है? फिलहाल तो ऐसा ही लगता है। क्या और मुल्कों में भले लोग नहीं होते? तो जवाब होगा - होंगे, पर भले लोगों की कहाँ चलती है - यह बड़े स्तर की राजनीति है जनाब, जीओपॉलिटिक्स – भू-राजनीति की स्ट्रैटिजी यानी रणनीतियाँ होती हैं - यह सब भले लोगों के बस की बात नहीं है।



इंसान में दूसरे के प्रति भला और दुश्मनी का रुख रखने की प्रवृत्तियाँ साथ चलती हैं। इसके वैज्ञानिक कारण भी बतलाए जाते हैं। मानव की प्रजाति को आगे बढ़ाते रहने के लिए हममें जैविक प्रवृत्ति होती है कि हम एक दूसरे को सुरक्षित रखें। यह भलापन या आल्ट्रुइज़्म है। साथ ही सीमित संसाधनों की वजह से स्पर्धा या कंपीटीशन भी चलती रहती है। तो क्या इससे निजात नहीं है? दरअसल पिछले हजारों सालों का इतिहास देखें तो कुल मिलाकर भले पक्ष की जीत दिखती है। हालाँकि चीन या पाकिस्तान से भिड़ लेंगे जैसे कथन के पीछे दरअसल वहशीयाना सोच होती है, पर इसे कहने के लिए हमें तर्क ढूँढने पड़ते हैं। हमें उन मुल्कों को मानवीयता में अपने से पिछड़ा कहना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में हम खुद कितने अमानवीय होते रहते हैं, इसका हिसाब हम नहीं रखते। जो लोग हमारी सोच में विरोधाभासों को सामने रखने की कोशिश करते हैं, उन्हें हम गद्दार कह देते हैं; पाकिस्तान और बांग्लादेश में भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे के पक्ष में कहनेवालों को भी हिंदूपरस्त तक कह दिया जाता है; भारत में आम सोच है कि पाकिस्तान के पक्ष में कहनेवाला तो निश्चित ही कोई मुसलमान होगा जो देश से पहले मजहब को रखता है और चीन को तो बस कम्युनिस्ट ही समर्थन कर सकते हैं।



आम लोग मानते हैं कि सरकारें बड़ी फौजों और मारक शस्त्रों के जरिए हमारी सुरक्षा बरकरार रखेंगी। इसलिए हर मुल्क अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा दुरुस्त फौज बनाए रखने में लगाता है। इन दिनों अमेरिका और चीन क्रमश: करीब 600 और 150 अरब डॉलर प्रति वर्ष खर्च कर सामरिक खाते में निवेश कर रहे देशों की सूची में सबसे ऊपर आते हैं। भारत आठवें नंबर पर है, पर सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के पैमाने में चीन की तुलना में तकरीबन दुगुना खर्च कर रहा है। यह हिसाब सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है। जाहिर है कि कोई भी देश अपने सामरिक खर्च को पूरी तरह उजागर नहीं करता, इसलिए सच यह है कि असल में खर्च कहीं अधिक पैमाने पर हो रहा है। यह सब पैसा कहाँ से आता है? अगर मुल्कों में दुश्मनी न होती तो यह पैसा कहाँ जाता? यह पैसा लोगों की भलाई में जाता, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास आदि बुनियादी क्षेत्रों में लगाया जाता। यहीं समस्या आती है। हमारे अंदर वह शख्स जो पाकिस्तानियों और चीनियों को दुश्मन के अलावा कुछ और नहीं मानना चाहता, वह कहता है कि ऐसा ही है, ज़िंदा रहना है, तो फौज और जंगें तो होती रहेंगीं। ग़रीबी रहेगी, हर कोई पढ़-लिख थोड़े ही सकता है - देश के हित में यह मानना ही पड़ेगा।



पिछली सदियों में सबसे भयंकर जंगें जिन मुल्कों के बीच लड़ी गईं, जिनके लिए हमारे देश के हजारों सिपाहियों ने भी जानें दीं, जैसे फ्रांस और जर्मनी, उन दो मुल्कों के बीच आज कोई ऐसी सरहद नहीं है, जहाँ फौजें खड़ी हों। यह सिर्फ इसलिए नहीं हुआ कि पचास सालों में उनमें सारी दुश्मनी खत्म हो गई, बल्कि इसलिए कि एक ओर तो सरमायादारों को लगा कि खुद लड़ने से अच्छा है कि दीगर और मुल्कों को लड़ाओ और उनको अरबों रुपयों के औजार बेचो और दूसरी ओर आम लोगों में यह समझ बढ़ी कि इंसान हर कहीं एक जैसा है और आपसी दुश्मनी का फायदा उठाकर कुछ लोग अरबों-खरबों कमा रहे हैं। इसलिए उन मुल्कों के आपसी झगड़ों को सुलझाने के लिए विश्व-संस्थाएँ बनी हुई हैं।



तो ये आलमी संस्थाएँ हमारे झगड़ों को क्यों नहीं सुलझा सकतीं। सरहद सही-सही कहाँ है, इसके लिए ज़रूरी कागज़ात विश्व-न्याय-अदालत में पेश किए जाएँ और जो निर्णय हो उसे मान लिया जाए। इसका जवाब यह मिलता है कि यू एन ए या विश्व न्याय-संस्थाओं पर अमेरिका और पश्चिमी मुल्कों का जोर है और वे हमारे हित में निर्णय नहीं देंगी। भारत, चीन, पाकिस्तान, तीनों मुल्कों में यह तर्क चलता है। इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए तो हमें ही कुछ करना होगा। और दुनिया चाहे कुछ भी कहे, हमारी ज़मीन हमें जान से भी प्यारी है।



बेशक दो मुल्कों में आपसी झगड़ों को सुलझाने पर दोनों को कुछ तो नुकसान होगा। पर दोनों को कुछ फायदा भी होगा। हो सकता है एक को दूसरे से थोड़ा ज्यादा फायदा हो जाए। पर अगर इसका नतीजा यह हो कि विपुल परिमाण पैसा मारकाट के खर्चे से हट कर लोगों सी भलाई में लग जाए, हर बच्चे को शिक्षा मिले, सबके लिए साफ पानी मिल सके तो हमें क्या चुनना चाहिए? लगता तो यही है कि हमें शांति के पक्ष में समझौता कर और नुकसान-फायदा जो भी हो, मानकर फौजों पर खर्च न कर विकास पर पैसा लगाना चाहिए। पर ऐसा नहीं होने वाला है। अनुमान यह है कि 2045 तक भारत फौज पर खर्च की सूची में तीसरे नंबर पर आ जाएगा।



जैसे हमारे यहाँ शांति के पक्ष में कुछ आवाज़ें उठती हैं, वैसे ही चीन-पाकिस्तान और दुनिया के सभी मुल्कों में उठती रहती हैं। पर सरकारें समझौते नहीं करतीं और लोगों को लगातार इस भ्रम में रखती हैं कि उनकी सुरक्षा के लिए मारक शक्ति बढ़ाते रहना ज़रूरी है। लोग बहकावे में आ जाते हैं और यह खेल चलता रहता है। छोटी-बड़ी जंगें चलती रहती हैं। सिपाही मारे जाते हैं। हर मुल्क अपने मृत सिपाही को शहीद कहता है और दूसरे को बर्बर। होता यह है कि इंसान बेवजह मारे जाते हैं। उनके बच्चे अनाथ हो जाते हैं। कोई मुआवजा इस नुकसान को भर नहीं सकता है। पर हम इसे सामान्य बात मान कर दुबारा इस खेल में जुट जाते हैं कि हम शहीद – दूसरे खल्लास।



इधर कुछ सालों से आलमी स्तर पर यह समझ बढ़ रही है कि धरती के दिन कम रह गए हैं। इंसानी फितरत ने धरती को रहने लायक नहीं छोड़ा। स्टीफेन हॉकिंग ने कहा है कि इंसान को अब इस धरती से परे कहीं और बस्ती बसाने की सोचना चाहिए क्योंकि धरती अब रहने लायक नहीं है। तो हम किसकी सुरक्षा की बात कर रहे हैं? कौन है जिसने धरती को विनाश के कगार पर ला छोड़ा है? ये वही हुक्मरान हैं जो हमें बतलाते हैं कि उनके झगड़े नॉन-नीगोशिएबल हैं यानी उनके हितों पर, जिन्हें वे देश के हित कहते हैं, कोई समझौता नहीं हो सकता। आश्चर्य इस बात का है कि हर कोई जानता है कि जीवन की समय सीमा है। परंपराओँ में तो इसे क्षणभंगुर कहा जाता है, पर फिर भी लोगों को लगता है कि आने वाले हजारों सालों तक उनके हुक्मरानों के हित देश के हित बने रहेंगे। जबकि आज के पाकिस्तान, चीन और भारत सौ साल पहले भी ऐसे देश नहीं थे, जैसे कि आज हैं। दो सौ साल पहले तो कतई नहीं। आगे कब तक क्या रहेगा, कौन कह सकता है। हमारे देखते-देखते कुछ देश मिल कर एक हो गए तो कुछ टूट कर अलग हो गए। इन प्रक्रियाओं में वहाँ के आम लोगों में कहीं एक दूजे के लिए रंजिश रही, कहीं नहीं रही, कुच समय बाद शांति बहाल हो गई और लोग पहले जैसी या बेहतर ज़िंदगिया जीने लग गए।



साथ ही लोकतंत्र की ताकत का सवाल भी है। अगर हमें लगता है कि हमारे लोकतंत्र में ताकत है तो हमें अपने सरकारी पक्ष को आलोचनात्मक नज़रिए से देखने की आदत डालनी चाहिए। इसके लिए ज़रूरी है कि हम उन दीगर मुल्कों के पक्ष को जानने-समझने की कोशिश करें। न तो चीन और न ही पाकिस्तान के साथ हमारे झगड़े ऐसे हैं जिनमें हम पाक-साफ हों। सरकार की ओर से झूठ फैलाने की तमाम कोशिशों के बावजूद आज बहुत सारी जानकारी सूचना के विभिन्न माध्यमों से मिल जाती है। इनमें से हर बात सच हो, यह ज़रूरी नहीं। पर आँख मूँद कर किसी एक को दोषी ठहराना लोकतांत्रिक सोच नहीं कहला सकती। प्रधान मंत्री के विदेश भ्रमणों से कई लोेग खुश होते हैं कि दुनिया में भारत का डंका बज गया, यह दरअसल बचकानी बात है, ठीक वैसी जैसी कि चीन के प्रधानमंत्री के भारत आने पर चीनी देशभगतों को लगता होगा कि अब तो चीन ने भारत के छक्के छुड़ा दिए। हमें यह समझना पड़ेगा कि हमारे हुक्मरानों ने हममें जंगखोरी मानसिकता भर दी है। जैसे हम अपनी ग़रीबी और भुखमरी से परेशान हैं वैसे ही दीगर मुल्कों के भले लोग परेशान हैं। फायदा इसी में है कि हमारे बुद्धिजीवी लोगों को दुश्मनी के सबक न सिखाएँ और यह सच बतलाएँ कि जंगखोरों के खिलाफ दुनिया भर में मुहिम चल रही है। हमारा हित यही है कि हम दुनिया के उन सभी लोगों से हाथ मिलाएँ जो इस मुहिम में शामिल हैं और हम अपनी सरकारों को मजबूर करें कि वे एक दूसरे के झगड़े मिल बैठ कर सुलझाएँ और हमें बेवकूफ बनाना बंद करें। ग़रीब और सताए लोग हर मुल्क में एक जैसी यंत्रणाओं से गुजरते हैं और अब सवाल धरती को बचाए रखने का है। जहाँ भी जालिम सरकारें हैं वह केवल एक मुल्क नहीं, सारी दुनिया के लिए खतरा हैं। विश्व-स्तर पर समस्याओं के समाधान के लिए तैयारी करनी होगी। एक दूसरे की अस्मिता का सम्मान करते हुए सेनाओं पर न्यूनतम निवेश के लिए लड़ाई छेड़नी होगी।



Sunday, May 31, 2015

100 भाषाओं में भी पठनीय सामग्री तैयार करना संभव है


निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
(भोपाल से प्रकाशित 'गर्भनाल' पत्रिका के जून 2015 अंक में प्रकाशित)


भारत में सुविधा-संपन्न वर्गों के सामंती-आधुनिक खिचड़ी स्वरूप के विरोधाभासों में से उपजे संकटों में एक भाषा का संकट है। यह अजीब विड़ंबना है, देखते-देखते भारतीय भाषाएँ विलुप्ति की ओर बढ़ती जा रही हैं और भगतों का सीना पीटना जारी है कि हम ब्रह्मांड की महानतम सभ्यता के वारिस हैं।

भाषा का संकट क्यों खड़ा हुआ और इसके हल क्या हैं, इस पर थोड़ी समझ बनाने की कोशिश हम यहाँ करेंगे। चूँकि हम हिंदी पढ़ते-लिखते हैं, इसलिए यहाँ हिंदी पर ही ज्यादा ध्यान रहेगा, पर संकट की स्थिति में कमोबेश सभी भारतीय भाषाएँ हैं। जाहिर है जिनको अंग्रेज़ी भारतीय भाषा लगती है, उन्हें आगे पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। पर जिन्हें यह ग़लतफहमी है कि देशव्यापी राजभाषा के रूप में अंग्रेज़ी का विकल्प हिंदी या संस्कृत है, उन्हें भी आगे पढ़ने की ज़रूरत नहीं है। पिछली दो सदियों में अंग्रेज़ी शासन में जो सबसे अधिक नुकसानदेह बात दक्षिण एशिया में हुई है, वह यूरोप से आधुनिक राष्ट्र की धारणा का यहाँ आना है। इसकी वजह से मानवीय विकास से हटकर हर मुद्दे को हम राष्ट्रीय चश्मे से देखने लग गए हैं और हर किसी की राष्ट्र के बारे में अंट-शंट धारणा बनती चली है। भाषा का मुद्दा भी इसी भँवर जाल में फँसा है।

हिंदी प्रदेशों में अठारहवीं सदी के आने तक काव्य-रचना में ब्रज भाषा स्थापित हो चुकी थी। हालाँकि तुलसी ने रामचरितमानस अवधी में लिखा, उनका बाकी अधिकतर काम ब्रज भाषा में था। ब्रज के अलावा सधूक्कड़ी, राजस्थानी आदि का भी प्रचलन था। उत्तरी इलाकों में, दिल्ली से लखनऊ तक, रेख्ता फल फूल रही थी और उन्नीसवीं सदी के बीच तक एक ओर ग़ालिब, मीर आदि की शायरी और दूसरी ओर दिल्ली कॉलेज के विद्वानों के मौलिक लेखन और यूरोपी ज्ञान के अनुवाद से रेखता या उर्दू आधुनिक भाषाओं में सबसे विकसित रूप ले चुकी थी। ब्रज और रेख्ता के मिलेजुले रूप को पहले हिंदवी भी कहा जाता था। उन्नीसवीं सदी के आखिर से यह प्रवृत्ति बढ़ने लगी कि फारसी के शब्द ज्यादा हों तो उर्दू और संस्कृत के शब्द ज्यादा हों तो हिंदी नाम का प्रचलन बढ़ा। सबको मालूम है कि यह सांप्रदायिक विभाजन था और राष्ट्रवाद की सांप्रदायिक धारणा से उपजा था। साक्षरता बहुत कम थी, इसलिए लिपिज्ञान बहुत ही कम लोगों को था। हिंदी और उर्दू में लिपि का फर्क भी तब से शुरू हुआ। पहले किसी भी लिपि में लिखा हो उसे रेख्ता कहा जा सकता था, पर बीसवीं सदी के आने तक यह माना जाने लगा कि हिंदी देवनागरी में और उर्दू फारसी लिपि में ही लिखी जाएगी। इसके बाद उस एक भाषा जिसे हम हिंदुस्तानी-हिंदी-उर्दू कहते हैं, के साथ जो कुछ हुआ, उसके परिणामस्वरूप आज हिंदी प्रदेशों में बच्चे हिंदी नहीं पढ़ना चाहते। हिंदी को लगातार संस्कृतनिष्ठ बनाने की कोशिश बढ़ती रही, जिससे भाषा और जटिल होती चली।

आज़ादी के बाद हिंदी, अंग्रेज़ी के साथ, राजभाषा तो बन गई, पर वह ऐसी भाषा थी, जिसके बारे में फिल्म-अभिनेता अशोक कुमार को कहना पड़ा था, 'अब आप समाचार में हिंदी सुनिए।' हिंदू राष्ट्रवाद ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए कई मिथक गढ़े जो आज तक चलते आ रहे हैं, हालाँकि उनका औचित्य अब कुछ भी नहीं रहा। आज़ादी के बाद की पीढ़ियाँ इन मिथकों के साथ पलीं। इनमें सबसे ग़लत मिथक यह था कि संस्कृत भाषा भारतीय भाषाओं की जननी है। इसमें कोई शक नहीं कि प्राचीन भारत में अधिकतर मीमांसाएँ संस्कृत में रची गईं, क्योंकि जातिप्रथा के साथ संस्कृत का वर्चस्व भी जुड़ा हुआ था। पठन-पाठन करने वाले ब्राह्मण संस्कृत में ही शास्त्र पढ़ते और गढ़ते थे। उत्तर की भाषाएँ ही नहीं, देश की दूसरी भाषाओं में भी धार्मिक रीतियों और ब्राह्मणवाद के जरिए ज़बरन संस्कृत डाली गई और अब यह कहा जाने लगा कि सभी भाषाओं का जन्म संस्कृत से हुआ है। पर जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, संस्कृत पहले से लोक में प्रचलित भाषाओं से इकट्ठी की गई शब्दावली से गढ़ी भाषा थी। कालांतर में भी लगातार शब्द जोड़े गए और खास तौर पर तकनीकी शब्द लगातार गढ़े जाते रहे। पर इन शब्दों को गढ़ने वाले लोगों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उन शब्दों को कोई समझ भी पाएगा या नहीं। अधिकतर तो नए ज्ञान-विज्ञान से परिचित ही नहीं थे। इसलिए आज भी सरकारी कागज़ात में हिंदी में लिखी किसी भी सामग्री को पढ़ने पर आधी से अधिक बातें समझना मुश्किल होता है। तत्सम शब्दों के जानकार राष्ट्रवादी लोग कहेंगे कि ऐसा इसलिए है कि हमें संस्कृत नहीं आती। विड़ंबना यह है कि ऐसा कहते हुए वे मान रहे होते हैं कि संस्कृत हमारी भाषा नहीं है। पर वे इस तरह से कहेंगे नहीं कि संस्कृत का लोक-भाषाओं से संबंध न होना स्पष्ट हो जाए। यह भी अजीब मानसिक रोग है।

राजभाषा अधिनियम को ही लें। 'राजभाषा' तो ठीक है, हालाँकि सच यह है कि हिंदी प्रदेशों में भी हर जगह 'भाषा' शब्द प्रचलित नहीं था; 'नियम' भी ठीक है,'अधिनियम' शब्द कहाँ से आया, यह सवाल करें तो उन सरकारी अफसरों में से भी अधिकतर परेशान हो जाएँगे, जो इस अधिनियम के कागज़ों पर हर रोज हस्ताक्षर करते हैं। कृत्रिम भाषा गढ़ने में यही समस्या है। वैज्ञानिक शब्दावली के साथ भी यह समस्या आती है। एक समय था जब कई लोग सोचते थे कि धीरे-धीरे तत्सम शब्द प्रचलन में आ जाएँगे। इस हठधर्मिता से हुआ यह कि हिंदी में वैज्ञानिक शब्दावली का इस्तेमाल ही धीर-धीरे खत्म हो गया और साथ में हिंदी भाषा भी गायब होती चली। विरला ही कोई वैज्ञानिक होगा जो अपने काम को हिंदी में समझा सकता है। अधिनियम के पूरे टेक्स्ट में जितने शब्द समझ में आते हैं, उससे ज्यादा समझ में नहीं आते हैं। कोई कह सकता है कि यह इसलिए है कि हम कानून के विशेषज्ञ नहीं हैं। तो क्या भाषा के बारे में नियमों को समझने के लिए कानून का विशेषज्ञ होना ज़रूरी है। चार पन्नों में बखाने गए अधिनियम में एक के बाद एक दर्ज़नों शब्द ऐसे हैं, जो किसी कॉलेज के छात्र को भी समझ में नहीं आ सकते - संव्यवहार, प्रवृत्त, अधिसूचना, उपबन्ध, अभिप्रेत, अनुज्ञप्ति, अनुज्ञापत्र,…. शब्द हैं। कई आसान बातों को जानबूझकर कठिन बनाया गया है। जैसे 'पत्र आदि' को संधि कर पत्रादि लिखा गया है, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं है। विदेशी भाषा, अंग्रेज़ी से अनुवाद कर एक कृत्रिम भाषा, संस्कृत में वाक्य रचे गए हैं, जो न केवल अपनी औपचारिक ध्वनि में कृत्रिम लगते हैं, बल्कि हिंदी के मिजाज़ से भी बहुत दूर हैं।

सरकारी कागज़ात में भाषा ऐसी कृत्रिम है कि उस पर चर्चा वक्त की बर्बादी है। ज़रूरी सवाल यह है कि भाषाओं को बचाने के लिए क्या किया जाए। आज़ादी की लड़ाई के दौरान एक उम्मीद यह थी कि आज़ादी के बाद अपनी भाषाओं में काम-काज होगा। चूँकि साक्षरता कम थी और समाज सामंती था, इसलिए इस पर बहुत सोचा न गया था कि शिक्षा किस भाषा में दी जाएगी या उच्चतर ज्ञान किस भाषा में मिल सकेगा। जो एक दर्जन मुख्य भाषाएँ थीं, उन्हीं मेें पढ़ाई लागू की गई। इन भाषाओं को भी अपने मूल रूप से बिगाड़कर तथाकथित संस्कृतनिष्ठ मानक रूप में रखा गया। जैसे जैसे सामंती संपन्न लोग आधुनिक पूँजीवादी संस्कृति का हिस्सा बनते गए, भाषा के बारे में उनका रुख बदलता रहा। आज उन को कोई फर्क पड़ता नहीं कि आम लोगों की भाषा क्या है और किस भाषा में कामकाज से उन्हें सुविधा होगी। आज़ादी के सत्तर साल बाद ऐसा माहौल बना दिया गया है कि अधिकतर लोगों को लगता है कि अंग्रेज़ी के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। न केवल अंग्रेज़ी में पढ़ाई लिखाई देश के अधिकतर लोगों के लिए असंभव ही नहीं, कुछ लोगों को जितनी मिल रही है वह नुकसानदेह है। पहले सवाल उठता था कि इतनी भाषाओं के देश में अंग्रेज़ी के अलावा और विकल्प क्या हो सकता है? इसके विकल्प आज जितने पास हैं, इतना पहले कभी नहीं रहे। अगर हम 100 भाषाओं में भी पठनीय सामग्री तैयार करना चाहें, तो आज यह आसानी से संभव है। आज तक्नोलोजी यहाँ तक पहुँच गई है कि मशीनों की सहायता से बड़ी तेजी से विमर्श और दस्तावेजीकरण किय जा सकते हैं। प्रशिक्षण का काम आसान हो गया है। देश के हर इलाके में प्रबुद्ध और समर्पित कार्यकर्ता हैं जो सामान्य मेहनताने पर भाषाओं में पठनीय सामग्री तैयार करने के लिए राजी हैं।

यह स्थिति बदलकर बेहतर हो सकती है, बशर्ते इस दिशा में काम किया जाए। इसके लिए ज़रूरी होगा कि कुछ आर्थिक संसाधन इसमें लगाए जाएँ। पैसा कहाँ से आएगा? राष्ट्रीय बजट में कौन सा हिस्सा है, जिसमें बहुत सारा पैसा लग रहा है। इस वक्त भारत दुनिया का सबसे बड़ा शस्त्र आयात करने वाला देश है। दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान में होड़ लगी हुई है कि एक दूसरे से ज्यादा पैसे सामरिक खाते में लगाएँ। आखिर क्यों? क्योंकि सभी मुल्कों के हुक्मरान एक ही बात कहकर लोगों को बेवकूफ बनाए रखते हैं - वह यह कि हम तो सब अच्छे हैं, दूसरी ओर ज्यादा खतरनाक दुश्मन बैठे हैं। आज दुनिया भर में लोगों को मालूम है कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितनी जंगें लड़ी जाती हैं, वह आम लोगों की नहीं, निहित आर्थिक राजनैतिक हितों की जंगें होती हैं। आम आदमी तो इसमें बेवजह मारे जाते हैं। कोई वजह नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ जैसे कि वर्ल्ड कोर्ट ऑफ जस्टिस या संयुक्तराष्ट्र संघ की संस्थाओं का फायदा उठाकर आपसी विवादों को सुलझाया न जाए। यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है कि इस एक कारण से ही अन्य संकटों के साथ भाषा का संकट भी बढ़ता चला है। अगर हमारे सामरिक खाते में से एक फीसदी खर्च कम करके भाषाओं में सामग्री तैयार करने और मशीनी अनुवाद को बेहतर करने में लगाया जाए तो देश भर में न केवल साक्षरता बढ़ेगी, बल्कि सही मायने में लोकतंत्र आ जाएगा। सबसे पहले चरण में भाषाओं में आपस में बहुत सारी सामग्री मशीनों की मदद से अनूदित की जा सकेगी। यह सही है कि मशीनी अनुवाद का स्तर अभी संतोषजनक नहीं है, पर उसका कारण भी यही है कि इस दिशा में शोध में पर्याप्त निवेश नहीं हो रहा है। अंग्रेज़ी से जापानी जैसी भाषाओं में मशीनी अनुवाद बेहतर स्तर का हो रहा है। मोबाइल फ़ोन जैसी मशीनों की मदद से अंग्रेज़ी और जापानी भाषाएँ बोलने वाले लोग एक दूसरे से आराम से बातचीत कर लेते हैं।

सामरिक मामलों की बात करते ही कइयों को लगता है कि यह तो कपोल-कल्पना है कि इसमें कोई बदलाव आ सकता है। उनको यह सोचना चाहिए कि पिछली सदियों में सबसे भयंकर लड़ाइयाँ लड़ने वाले मुल्क जर्मनी और फ्रांस के बीच आज कोई सीमा नहीं है। हो यह रहा है कि हमारी सीमाओं पर नागरिकों को सिपाही कह कर उनकी हत्याएँ करने के लिए हम उन मुल्कों से औजार खरीदते हैं।

राजभाषा अधिनियम में राज्यों के लिए जो निर्देश हैं या राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और अंग्रेज़ी को अन्य भारतीय भाषाओं से अलग जो विशेष दर्जा देने की कोशिशें हैं, वे पूरी तरह गैर लोकतांत्रिक हैं। इनकी वजह से न केवल हिंदी के प्रति गैर-हिंदीभाषियों के मन में ख़लिश बढ़ी है, अंग्रेज़ीवालों ने इसका फायदा उठाकर दूसरी भाषाओं की तरह हिंदी को नकारने का षड़यंत्र और मजबूत किया है। हिंदी पढ़ने-लिखने वालों को यह समझना होगा कि कृत्रिम संस्कृतीकरण से या दूसरी भारतीय भाषाओं की तुलना में श्रेष्ठता का दावा कर के हिंदी का कोई फायदा तो होगा ही नहीं, इसका नुकसान ज़रूर खूब होगा। होना यह चाहिये कि सिर्फ संविधान में लिखी 25 भाषाओं में ही नहीं, बल्कि भारत की सभी जनभाषाओं में, कम से कम सौ भाषाओं में हर तरह की जानकारी लिखी जानी चाहिए और आज मशीनों के जरिए यह आसानी से संभव है।

अंत में कइयों को यह नागवार गुजरेगा कि खुद साफ और काफी हद तक तत्सम शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मैं तत्सम शब्दों के इस्तेमाल के खिलाफ पैरवी कर रहा हूँ। लेखक की यह सीमा है कि जो भाषा औपचारिक रूप से पढ़ी, उसी में वह बेहतर लिख सकता है। पर लेखक की सीमाओं से सामाजिक राजनैतिक सच्चाइयाँ तय नहीं होतीं। जैसे इंसान की ज़िंदगी में भाषा के महत्व पर ज्यादा तर बातचीत अंग्रेज़ी में होती है, इसका मतलब यह नहीं कि सबको अंग्रेज़ी अपना लेनी चाहिए, बल्कि इसके विपरीत सबको अपनी भाषा के प्रति सजग होना चाहिए।

Thursday, May 28, 2015

ओ आधे दर्जन हाथ


अरे!

15 जुलाई तक मकान बन जाएगा
मेरी नज़रों में सितंबर अक्तूबर
का मैं हूँ

निचली मंज़िल के नए मकान में
खिड़की से देख रहा हूँ
ऊपरी मंज़िल वाले इस मकान
में जून के मैं को

पंखा गर्म हवा के थपेड़े मार रहा है
खिड़की बंद हो या खुली
हवा की आवाज नहीं बदलेगी

तपती ईंटों की दीवारें समवेत गाती रहेंगी
जून का मैं थोड़ी देर आराम करना चाहता हूँ
जग का पानी उत्तेजित अणुओं का धर्म जताता है

प्यास
पानी के अणुओं को अपनाती है
स्नायु के झंकार जून के खयालों में
गुनगुनाते हैं
तपती धूप में काम कर रहे ओ आधे दर्जन हाथ!
ग़र्म ईंट उठा रहे हाथ
मेरी सितंबर-अक्तूबर की ज़िंदगी के लिए तुम्हें धन्यवाद।

दिखता है बंद खिड़की से
घुँघराले बालों वाला बच्चा
बहती लू में खेल रहा है

खुली खिड़की से मेरी आवाज दौड़ती है
सुनो
अरे! बच्चे को धूप से हटा लो।


(रविवार डाट काम : 2011; 'नहा कर नहीं लौटा है बुद्ध' संग्रह में संकलित)

Wednesday, May 27, 2015

क्वार्क किसके बने होते हैं


धरती सीरीज़ की बीच की कविताएं फिर कभी। आज ये अलग मिजाज़ की इस शृंखला की आखिरी कविताएँ। ये सारी कविताएँ पिछले साल 'संवेद' में प्रकाशित हुई थीं। 
 
18. मीमांसा
भूगोल :
द्विआयामी देश-काल में स्त्री पुरुष एकाकार। धर्म-प्रचारक सपने में पहाड़ देखता है।
काला देश सही अनुपात से बहुत छोटा दिखता है, भूगोल राजनीति विज्ञान बनता है।

धरती खोदी आर-पार। काले पैर-गोरे पैर। आँसू गड्डमड्ड।

इतिहास :
1
काले घने बादल। हवाएँ पागल। तूफान का अंदेशा। ऊँचा सिर उठा घास का रेशा।
हारे हुए बार-बार उठ खड़े। लड़े।
2
ज़ुल्म के मातों, हम कैसे ज़ालिम बन जाते। कितने पैगंबर आएँ कि जान पाते।
3
'कोई जंग नेक नहीं होती।' कोई लकीर सच नहीं होती।

विज्ञान :
नाइट्रोजन फास्फोरस। लातिनी रस।
मीठे पानी जैसा इनका हिसाब चला बिगड़। जीवन में गौरैया नहीं बची, किसे खबर।
गर्मियों में ग़र्मी ज्यादा, ठंड में ठंडक। भरभराती कोसी, कावेरी या गंडक।

साहित्य :
कितने रंग, छंद, मर्म।
जाति, जेंडर, धर्म।
अनंत सभ्यताएँ। उल्लास अनंत।

संगीत :
कोई नहीं जानता कि क्वार्क किस चीज़ के बने होते हैं।
कवि ने कोशिश की 'धरती पर रख कान। विस्मय से जाग उठा था गान।'
धरती जानती है।

Saturday, May 23, 2015

नीमबेहोशी में बरकरार


धरती सीरीज़ की और कविताएँ:

 7. बरकरार

दूर तक फैली है तू
मौसम की गंध से तेरा बदन सराबोर
तुझ पर बहती हवा                         दूर तेरी त्वचा पर छलकते समंदर बने
पसीना का नमकीन स्वाद
रंध्रों में लाने को आतुर है

तू बेसुध है मैं बेसुध हूँ
कोई हमें सुध में लाने की बीमार कोशिश में तार-तार करता है तेरा सीना
बम गोले मेरे अंगों के टुकड़े कर रहे हैं

तेरे बदन में नाखून गाड़ तुझे जकड़ कर लेटा हूँ
मेरे हाथों में घास है
सुबह मैना से बात की थी वह पास चक्कर लगाती है
तेरी गंध है चारों ओर

मैं हूँ
तुझसे प्यार करने के लिए ज़िंदा
नीमबेहोशी में बरकरार।


8. बगुले ओ पगले

बगुले ओ पगले
कैसे करूँ तुझे बयाँ
सफेदपोश तू रकीब
गीले इस मौसम में ढो लाया कैसे आँसू रे

आ कि मिल करें प्यार
धरती को
और जितने रकीब हमारे
उनको करें इकट्ठा
कोई फूल कोई पत्ता

निर्लज्ज माशूक धरती
इतने आशिक पाले हुए है

ओ सभ्यता-
आशिकों की फौज धरती से लिपटी रहेगी

चिड़िया चहकेगी, फूल खिलेंगे, पत्ते झूमेंगे
मिलकर हम सब कविताएँ लिखते चलेंगे।