Wednesday, October 17, 2018

ऐसे ही लँगड़ाता रहूँगा

ऐसे ही लँगड़ाते


कितनी ज़िंदगी जीते हो साथ-साथ?

किस-किस में मुस्कराते हो और



किसमें उजागर करते हो घाव

जैसे दाईं टाँग पर जलती सिगरेट का धब्बा

किसमें छिपा रखी हैं डरावनी कथाएँ जो रातों को अक्सर सीने पर बैठती हैं

नाचने-गाने की अलग-अलग अदाओं में कौन सी है नॉर्मल और कौन सी है 

सच के भार से दबी?



समझौते और हताशा छिपे हों या उजागर

सब में बरसातें बहेंगी नदी-नाले भर-भर कर

सारी की सारी खत्म होंगी एक साथ

धरती सबको साथ पालती रही और सबको विदा कहेगी साथ

ऐसे ही लँगड़ात रहूँगा एक से दूसरी पर टिकाए बीत चुके पलों का भार

-(पाठ - 2018)

Monday, October 15, 2018

धरती और आस्मां गुजरे हैं हम से


उम्मीद के पैंतालीस मिनट

तपती रविवार मई की शाम

खोलता हूँ दरवाजे, बरामदे में बाल्टी से पानी छिड़कता हूँ

पड़ोस के घरों से लोग बरामदों में आने लगे हैं

अकेला मैं पानी छिड़कता हूँ, पड़ोसी आश्वस्त हैं

कि वापस ठंडे कमरे में चले जाएँगे



आँखों पर ऐनक कभी ठीक देखने नहीं देती

उम्र है या वक्त है, कहना है मुश्किल

हर तरफ धुँधला सब कुछ

मन सशंक कि यह महज चेतावनी है

मध्यवर्गी इस रिहाइश में

सब कुछ शांत है

शोर है तो पार्क में खेलते बच्चों का है

उल्लास में सराबोर

माँ-बाप बरामदों में दिखते निश्चिंत

कि सब कुछ ठीक है



बच्चों को देख धड़कता है दिल एकबारगी

भूल जाता हूँ वक्त और खो देता हूँ खुद को

एक बार खुद बच्चा बन जाता हूँ



यहाँ सोहनपापड़ी बेचने कोई बूढ़ा नहीं आता

कोई भेल-मूड़ी बेचने नहीं आता

सिक्योरिटी के लोग उनके लिए नहीं हैं

वे इस ओर भटकते ही नहीं

बड़ी सड़क से कहीं और चले जाते हैं



ज़मीं और इंसान इस तरह बँटे हैं

पंछी ढलती शाम यहाँ आस्मान पर गुजरते हैं

जैसे गुजरेंगे वे उन मुहल्लों की छतों से भी ऊपर

जहाँ यहाँ के बच्चे नहीं जाएँगे

और जहाँ के बच्चे अक्सर यहाँ आते हैं

बर्तन माँजने और झाड़ू पोछा करने वाली माँओं के साथ

यह सोचे बिना नहीं रहा जाता

कि धरती पर कितने पंछी बचे हैं



फिलहाल वापस डेस्क पर लौटना है

फाइलें देखनी हैं

वक्तव्य और दृश्य के गड्डमड्ड में लौटना है



बनाने हैं मंज़र

पैंतालीस मिनटों में लड़ाई, उल्लास

कुदरत के हार-जीत के

नपे-तुले एहसास



सजाते चलना है एक के बाद एक

दस्तावेज कि हम भी गुजरे हैं धरती पर

या कि धरती और आस्मां गुजरे हैं हम से



तरक्की हुई है इतनी कि

पिछली सदियों की खो गई साँसों जैसे

नहीं खो जाएँगे हम

हजारों साल बाद हमारी पहचान मौजूद रहने की

उम्मीद है इन पैंतालीस मिनटों में।

लौटने से पहले देखता हूँ नीचे

बच्चे ज़मीं पर अपना इतिहास तराश रहे हैं

जो सयाने हैं वे मिट्टी नहीं चट्टान पर लिख रहे हैं

इतनी दूर से खरोंच की आवाज नहीं आती

और साथ मुड़ती है मुस्कान होंठों पर। 

- 2013 (पाठ - 2018) 

Thursday, October 04, 2018

निश्छल एहसासों की याद


तक्नोलोजी के साथ बूढ़े हुए हैं हम

वह ज़माना याद है?

जब साल में किसी खास मौके पर फोटो खिंचवाते थे

अव्वल तो बेवजह खिंचवाते ही न थे

कहीं कोई दरखास्त भरनी होती थी, किसी इम्तहान का ऐडमिट कार्ड

या कॉलेज में भर्ती जैसा कुछ होता था

या जब पहली बार ड्राइविंग लाइसेेस बनाना था

स्टूडियो में फोटोग्राफर सलीके से बैठाकर कभी कॉलर और कभी बाल ठीक 

करता था



सतरह साल की उम्र के फोटो में ऊटी में होटल मालिक की नन्ही बच्ची को कंधे 

पर बिठाया था

क्लास के किसी लड़के ने खींचा था उस कोट में जो दोस्त से उधार लिया पहना 

था

तक्नोलोजी के साथ-साथ बूढ़े हुए हैं हम

पुरानी तस्वीरों में देखता हूँ अपनी झेंपती शक्ल

यू-ट्यूब पर गुलाम अली को चुपके-चुपके वाला जमाना याद है गाते सुनता हूँ

वह बच्ची अब कहाँ पैंतालीस की उम्र का परिवार सँभाल रही होगी

अब तो अपनी बेटी भी बड़ी हो गई है



निश्छल एहसासों की याद सुकून देती है

जब चारों ओर कुछ भी निश्छल नहीं रहा लगता है

हर पल सेल्फी जिए जा रहे इस ज़माने में। 

- (पाठ - 2018) 

Tuesday, October 02, 2018

परमाणु में भूत है


इसलिए जोर से मत कहना







परमाणु में भूत है


इस बात को जोर से मत कहना


क्या पता प्रधान मंत्री ढूँढ निकालें वैशेषिक से कोई स्त्रोत


कि हमारे पुरखों को यह पता था





पुरखों को हर बात पता थी


यह भी कि कभी ऐसा राज आएगा कि कौआ मोती खाएगा


उनको यह तो ज़रूर पता था


कि भूत या भविष्य दोनों वर्तमान से ही बनते हैं


भविष्य में जीते हुए हम भूत के अणुओं को यादृच्छ आकार देते हैं





वाकई परमाणु में भूत है


अब भाषा की वह औकात रही नहीं कि इससे अधिक कह सके


ग़रीब हो भाषा तो ग़रीब होता है उसे जीने वाला


एक ही कायनात में सफर पूरा नहीं कर पाता


तो और कायनातों की क्या सोचे





भूत दौड़ता रहता है कायनात-दर-कायनात


प्यार और नफ़रत के खेल खेलता


हर मुल्क में कभी बुद्ध और कभी मिहिरकुल बाँटता


इसलिए जोर से मत कहना



कि परमाणु में भूत है।


- (पाठ - 2018)



So Do Not Speak Aloud



There is a ghost in the atom


Do not say it loud


You never know


The prime minister may find a shloka in Vaisheshika


And claim that it was known to our ancestors




Our ancestors knew everything


They knew that a day will come when


Broken clocks will be used to know the time


They certainly knew that


The past and the future are made in the present


We live in the future giving random shapes to the past




Indeed there is a ghost in the atom


The language does not have the power to say any more of it


When a language is poor then the one who lives it, is poor


One universe is too large to know it well


Let alone multiverses




The ghost runs from a universe to another


Indulging in love and hate


Placing a Buddha and a Mihirkula in every Nation


So speak not aloud that


There is a ghost in the atom.

Monday, October 01, 2018

कुछ है कि


समझ नहीं आता


मुझे भेटकी फ्राई और सालन के साथ रोहू पसंद हैं

अंग्रेज़ी टाइप के फिश फिले या चीनी झींगा स्प्रिंग रोल पसंद हैं

पर हर दिन मछली खाऊँ, ऐसा नहीं हूँ



मीठा ज़रूरत से ज्यादा ले लेता हूँ

आलू अंडे या पकौड़े और मूढ़ी कभी भी खा सकता हूँ

पर दोनों वक्त चावल ही खाऊँ, ऐसा नहीं हूँ



रवींद्रसंगीत और जन-गीत दोनों सुनता हूँ

अदब का शौक जन्मजात है

कथा-उपन्यास खूब पढ़ता हूँ

पर घर-परिवार से उकता जाऊँ, ऐसा नहीं हूँ



मैं तो ऐसा ही हूँ, जैसा हूँ

आम डरपोक-सा पढ़ा-लिखा

इंकलाब के ख़्वाब देखता

दायरों में बँधा-सिमटा हुआ

चुनिंदा अल्फाज़ लिए खेलता कविता करता



पर कुछ है कि तुम्हें इतना चाहता हूँ

और यही काफी है कि

भूल जाऊँ बाक़ी सब कुछ जो पसंद है

और शामिल हो जाऊँ ख़्वाब को सच में बदलने की लड़ाई में।  

- पाठ (2018)
 

Sunday, September 16, 2018

वे हमारी आँखों से देख रहे हैं

आज यह पुरानी कविता दुबारा देखी। याद नहीं कि पहले पोस्ट की है या नहीं। ढूँढने पर देखा कि अक्तूबर 2015 में एक बार पहली चार लाइनें सेरा टीसडेल की कविता के अनुवाद के साथ पोस्ट की हैं। 
आज पूरी कविता पोस्ट कर रहा हूँ। 


देखो, हर ओर उल्लास है

1
पत्ता पत्ते से

फूल फूल से

क्या कह रहा है



मैं तुम्हारी और तुम मेरी आँखों में

क्या देख रहे हैं



जो मारे गए

क्या वे चुप हो गए हैं?



नहीं, वे हमारी आँखों से देख रहे हैं

पत्तों फूलों में गा रहे हैं

देखो, हर ओर उल्लास है।



2



बच्चा सोचता है

कुछ कहता है

देखता है प्राण बहा जाता



चींटी से, केंचुए से बातें करता है

उँगली पर कीट को बैठाकर नाचता है कि

कायनात में कितने रंग हैं

यह कौन हमारे अंदर मौजूद बच्चे का गला घोंट रहा है

पत्ता पत्ते से

फूल फूल से पूछता है

मैं और तुम भींच लेते हैं एक दूजे की हथेलियाँ



जो मारे गए

क्या वे चुप हो गए हैं?



नहीं, वे हमारी आँखों से देख रहे हैं

पत्तों फूलों में गा रहे हैं

देखो, हर ओर उल्लास है।



3



लोग हँस खेल रहे हैं

ऐसा कभी पहले हुआ था



जानने में बहुत देर लगी कि मुल्क कैदखाने में तब्दील हो गया है

धरती पर बहुत सारे लोग तकलीफ में हैं

कि कैसे वे यादों की कैद से छूट सकें

जिनमें उनके पुरखों ने हँसते-खेलते मुल्क को कैदखाना बना दिया था



इसलिए देखो

हमारी हथेलियाँ उठ रही हैं साथ-साथ

मनों में उमंग है

अब हर कोई अखलाक है

हर कोई गौरी, कलबुर्गी, अभिजित रॉय है

हर कोई दमिश्क, अंकारा में है

हर शहर दादरी और बगदाद है

हर प्राण फिलस्तीन है



हमारी मुट्ठियाँ तन रही हैं साथ-साथ

देखो, हर ओर उल्लास है।




 
4



हवा बहती है, मुल्क की धमनियों को छूती हवा बहती है

खेतों मैदानों पर हवा बहती है

लोग हवा की साँय-साँय सुनने को बेताब कान खड़े किए हैं

हवा बहती है, पहाड़ों, नदियों पर हवा बहती है

किसको यह गुमान कि वह हवा पर सवार

वह नहीं जानता कि हवा ढोती है प्यार



उसे पछाड़ती बह जाएगी

यह हवा की फितरत है



सदियों से हवा ने प्यार ढोया है



जो मारे गए

क्या वे चुप हो गए हैं?



नहीं, वे हमारी आँखों से देख रहे हैं

पत्तों फूलों में गा रहे हैं

देखो, हर ओर उल्लास है।



                                        (जनसत्ता 2015)

Saturday, August 11, 2018

मैं अपनी माँ को भारतीय कैसे सिद्ध करूँ


BBC पंजाबी पर हाल में मेरे इस लेख का अनुवाद (दलजीत अमी द्वारा) 

पोस्ट हुआ है। 


'गंगा आमार माँ, पॉद्दा (पद्मा) आमार माँ' और 'गंगा बहती हो क्यों' जैसे गीतों 

के गायक भूपेन हाजारिका, अपनी मूल भाषा अख्होमिया से ज्यादा बांग्ला में 

गाने के लिए जाने जाते हैं। यह कैसी विड़ंबना है कि असम में कई दशकों से 

वहाँ बस चुके तथाकथित बांग्लादेशियों को निकालने की कोशिशें चल रही हैं,  

और इसे एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बना दिया गया है। इनमें से अधिकतर ग़रीब 

हैं जो विस्थापन की मार झेल नहीं पाएँगे और विस्थापित होने पर जाने के लिए 

कोई जगह उनके पास नहीं है।



मेरी माँ का जन्म आज के बांग्लादेश में हुआ था। 2012 के अगस्त महीने में मैं 

कालामृधा नामक गाँव में पहुँचा जहाँ मेरी माँ जन्मी थी। मुझे जेसोर की 

यूनिवर्सिटी ने कीनोट-अड्रेस के लिए बुलाया था और वहीं से एक अध्यापक 

बाबलू मंडल मुझे कालामृधा ले गए। सत्तर साल पहले माँ के नाना पास के गाँव 

में माध्यमिक स्कूल में प्रधानाध्यापक थे और उनके बड़े भाई हाई स्कूल में 

प्रधानाध्यापक रहे थे। अध्यापकों से बात करने के बाद वह घर ढूँढने निकला 

जहाँ माँ का जन्म हुआ था। पहले तो एक किसान मिला जिसने गैर-दोस्ताना 

रवैया दिखलाया। उसे डर था कि मैं शायद कोई दावा ठोंकने आया हूँ। फिर वह

सही और भला बंदा मिला जिसके साथ माँ के नाना ने ज़मीन की अदला- 

बदली की थी। माँ के पिता यानी मेरे नाना पश्चिमी बंगाल के थे और आज़ादी 

के कई साल पहले ही माँ इस ओर आ गई थी। आज मैं सोचता हूँ कि अगर मुझे

कहीं यह प्रमाणित करना हो कि मेरी माँ भारतीय ही है तो मैं कैसे करूँगा। मेरे 

बापू ने माँ से शादी के कुछ साल पहले एक मुसलमान लड़की से शादी की थी। 

आज़ादी के पहले हुए दंगों के दौरान उस औरत को बापू ने पनाह दी थी या 

ज़बरन उसे घर रख लिया था। एक दिन उस औरत के रिश्तेदार आए और बापू 

की गैर-मौजूदगी में उसे ले गए। बापू ने लंबे अरसे तक अदालत में मुकदमा 

लड़ा, पर न तो वह पत्नी मिली और न ही उनकी बेटी जिसका नाम जसवंत 

कौर रखा गया था। मैंने अक्सर सोचा है कि पाकिस्तान में या बांग्लादेश में कहीं

मेरी वह बड़ी बहन है, पता नहीं ज़िंदा भी है या नहीं।



आज जब असम में ज़बरन एन आर सी में दाखिले को लेकर बवाल छिड़ा हुआ 

है, ये बातें याद करते हुए मैं हैदराबाद में बैठा हूँ। यह शहर एक जमाने में मुस्लिम

बहुसंख्यक इलाका था, आज यहाँ मुसलमानों की संख्या एक तिहाई से कम है।

शहर में उत्तर-भारतीयों की तादाद पिछले दशकों में तेजी से बढ़ी है, जैसे 

बेंगलूरु और दूसरे आई-टी हब माने जाने वाले शहरों में बढ़ी है। बेंगलूरु के बारे

में तो यह माना जाता है कि उत्तर-भारतीयों ने शहर का मिजाज और माहौल ही

बदल दिया है और वहाँ पहले से रहने वाले कन्नड़ और तमिल जैसी ज़ुबान 

बोलने वाले लोग परेशान हैं।


दरअसल जहाँ कहीं भी बेहतर माली माहौल हो, लोग दूसरे इलाकों से वहाँ आते

हैं और अक्सर यह संकट की स्थिति पैदा करता है। ग़रीब लोग ज़िंदा रहने के 

लिए स्थानीय संस्कृति के साथ जीना सीख लेते हैं, पर अपनी विरासत को 

छोड़ते नहीं हैं। जैसे भी हो अपनी मान्यताओं के मुताबिक जीने के लिए ज़मीन 

ढूँढ लेते हैं। जब यह स्थानीय लोगों की बरदास्त के बाहर होने लगता है तो कुछ

ज़बर और कुछ सरकारी हस्तक्षेप से बाहर से आ रहे लोगों पर रोक लग जाती 

है, पर बस चुके लोगों को वहाँ से उखाड़ कर बाहर भेजने की बात नहीं होती है।


असम में 40 लाख लोगों को बाहर भेजने की बात हो रही है, कहाँ - कोई नहीं 

जानता। शुक्र है कि अब तक उनकी स्थिति म्यानमार से खदेड़े गए रोहिंग्या 

मुसलमानों जैसी नहीं है। यह सही है कि राजनैतिक भ्रष्टाचार से लोग परेशान हैं,  
पर इसका समाधान तो बेहतर राजनैतिक नेतृत्व की पहचान कर उसे आगे 

बढ़ाना ही हो सकता है, न कि ग़रीब 'बंगालियों' को खदेड़ना है।



पता नहीं इंसान कब सही मायने में सभ्य बन पाएगा। बांगलादेश के फिल्म 

निर्देशक कैथरीन और तारीक मसूद की बनाई फिल्म 'ओंतोरजात्रा (अंतर्यात्रा)'  
में बेटे की मौत से दुखी एक बुज़ुर्ग अपने किशोर पोते को रात को दूर से सुनाई 

पड़ रहे भजन गाने वालों के बारे में बतलाता है कि वे कभी उड़ीसा से आकर 

चाय बागानों में बस गए मजदूर हैं, जो अब बांग्लादेश के बाशिंदे हैं। निस्तब्ध 

रात में वह आवाज़ हमें सचेत करती है कि इंसान का जीवन कैसा संकटमय है 

और कैसे हम सब परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं। बांग्लादेश बन जाने के
बाद वहाँ बसे बिहारी मुसलमानों के लिए जाने के लिए कोई जगह न रही। 

धीरे-धीरे वे बंगाली समाज का हिस्सा बन गए। दुनिया भर में यह सब हमेशा से 

होता रहा है। खुद अख्होम (असमिया) लोग कुछ ही सदियों में पहले बाहर से 

आकर असम में बसे हैं। यह कैसी इंसानी फितरत है कि हम अपनी जगह पर 

जम जाएँ तो दूसरों का पास में आकर बसना नहीं सह पाते।