Friday, May 11, 2018

साम्यवाद में लोकतांत्रिक स्वरूप विज्ञानधर्मी माँग है।


मार्क्सवाद और विज्ञान : कुछ समकालीन सवाल
-'समकालीन जनमत' में आ रहा लेख'

मार्क्सवाद के कट्टर विरोधी कार्ल पॉपर ने विज्ञान क्या है और क्या नहीं है, इसमें फ़र्क करने को विज्ञान के दर्शन का बड़ा सवाल माना। कुदरत में हो रही एक ही घटना को कई तरह के सिद्धांतों से समझाया जा सकता है, पर इनमें से कौन सा सिद्धांत सही है, इसे कैसे तय करें? पारंपरिक तरीका यह है कि किसी एक घटना से जुड़ी और दूसरी घटनाओं को हम किस हद तक समझ पाते हैं, आगे हो सकने वाली और घटनाओं के बारे में क्या कुछ पहले से कह पाते हैं, प्रयोगों द्वारा वह सही दिखता है या नहीं, इससे पता चलता है कि सही वैज्ञानिक सिद्धांत कौन सा है। पॉपर ने फॉल्सिफिकेशन की प्रस्तावना की। फॉल्स यानी ग़लत और फॉल्सिफिकेशन यानी किसी बात को ग़लत दिखाना। कोई सिद्धांत तभी वैज्ञानिक हो सकता है जब उसे ग़लत साबित करने लायक परिस्थितियों और अवलोकनों की कल्पना की जा सके। मसलन गुरुत्व-आकर्षण का सिद्धांत वैज्ञानिक है, क्योंकि खिड़की से कूदने पर नीचे जाने की बजाय अगर ऊपर जा पाते तो यह सिद्धांत ग़लत साबित हो जाता। ईश्वर के होना वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है, क्योंकि ऐसी कोई स्थिति सोची नहीं जा सकती, जिससे हम इसे ग़लत साबित कर सकें।

जब यूरोप में मार्क्सवाद उरूज पर था, पॉपर ने विरोध करते हुए कहा कि मार्क्स के निष्कर्षों से असंगत किसी घटनाचक्र को मार्क्सवादी चिंतक इस तरह समझाते हैं कि वह मार्क्सवाद के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ नहीं जाता। इसलिए ईश्वर की धारणा की तरह मार्क्सवाद भी वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है, क्योंकि किसी भी स्थिति में मार्क्स के निष्कर्षों को ग़लत नहीं माना जाएगा। स्तालिन-काल के दौरान रूस में जो ज्यादतियाँ हुईं, उसे सही ग़लत जैसा भी बतलाया गया, उससे एक बात बड़े पैमाने पर फैली कि वैज्ञानिक हो या न हो, मार्क्सवाद पर आधारित समाज-व्यवस्था में मानव के सर्वांगीण विकास की संभावना नहीं है। जाहिर है कि पूँजीवाद के दलालों को यह तर्क ठीक लगना ही था। अमेरिका में मैकार्थी-युग में वाम- और तरक्कीपसंद कलाकारों, साहित्यकारों और दीगर चिंतकों को प्रताड़ित करने के लिए इस तर्क का बखूबी से इस्तेमाल किया गया।

पॉपर की आलोचना से मार्क्सवादियों को परेशान नहीं होना चाहिए। परेशानी की जड़ यह हसरत है कि हमें भी वैज्ञानिक मान लिया जाए। जब यह हसरत तीखे तेवर के साथ पेश आती है तो मार्क्सवाद और धार्मिक कट्टरता में फ़र्क नहीं रह जाता है। धर्मांध लोग इस कोशिश में लगे रहते हैं कि उनकी आस्था और मान्यताओं को वैज्ञानिक माना जाए। महज तर्कशील होना ही वैज्ञानिक होने की कसौटी नहीं होती है। वैज्ञानिक तर्कशीलता या साइंटिफिक रेशनालिटी खास तरह की तर्कशीलता है, जिसकी अपनी सीमाएँ और ताकतें हैं। मार्क्स ने आधुनिकता के ढाँचे में रहते हुए तर्क और युक्ति के आधार पर मानव के विकास में आर्थिक संबंधों और वर्ग-संघर्ष की मुख्य भूमिका कोे समझते हुए प्रखर आलोचना तैयार की थी। अंतिम निष्कर्ष वह सपना था जिसमें उन्होंने दुनिया भर के मजदूरों से एक होकर सरमाएदारों की शोषण पर आधारित व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था। यह सपना हमारा सपना है, इसलिए मार्क्सवाद हमारे लिए मानव के विकास का बुनियादी सिद्धांत है। अगर विज्ञान की हर विशेषता को मार्क्स के निष्कर्षों में ढूँढ पाना आसान नहीं है, तो नहीं है, यह परेशानी का सबब नहीं होना चाहिए। ऐतिहासिक संदर्भ यह है कि अपने समकालीन दूसरे चिंतकों की तरह (जैसे आउगस्ते कोम्ते) मार्क्स ने भी समाजवादी समाज के निर्माण पर सोचते हुए विज्ञान पर काफी गहराई से सोचा था और उनके लेखन में विज्ञान का उल्लेख गाहे-बगाहे आता है। सिर्फ इतना ही नहीं, विज्ञान के समाजशास्त्र और जिसे आज एस-टी-एस (विज्ञान और तक्नोलोजी अध्ययन) कहा जाता है, उसके विकास में मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव रहा है।

वैज्ञानिक सिद्धांत का बनना एक लंबी यात्रा है, जिसकी शुरूआत अनुमानों से होती है और अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग वक्तों पर बार-बार दुहराए गए प्रयोगों के द्वारा समझे गए नियमों के बाद सामूहिक सहमति से वैज्ञानिक सिद्धांत तक हम पहुँचते हैं। यह संभव नहीं है कि मानव समाज की एक जैसी प्रतिकृतियाँ बनाकर उन पर प्रयोग कर सकें, इसलिए समाज के बारे में वैज्ञानिक सिद्धांत के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए।

पॉपर को मार्क्सी चिंतन में आलोचनात्मक सोच का अभाव दिखता है। उसे लगा कि मार्क्स महज एक सूत्र गढ़ रहे हैं, जिसमें इतिहास को पिरोते जा रहे हैं। पॉपर आइंस्टाइन के प्रशंसक थे, इसलिए उन्हें हर विवेचन में गणित-भौतिकी (मैथेमेटिकल फिज़िक्स) जैसा खाका चाहिए था। पॉपर को मार्क्स की भविष्य-दृष्टि में वैज्ञानिक विशेषताएँ दिखीं, पर जब घटनाएँ मार्क्स के कहे मुताबिक नहीं हुईं तो मार्क्सवादियों ने नई प्रस्तावनों को साथ उन्हें उचित ठहराया, इससे पॉपर को लगा कि मार्क्सवाद वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं है।

मार्क्सवाद विज्ञान-धर्मी सोच है। यह अंधविश्वासों या अलौकिक ताकतों की कल्पना पर आधारित सोच नहीं है। मार्क्सवाद का विज्ञान-धर्मी होना हमें बदलते वक्त के साथ उस सपने की ओर बढ़ा ले जाता है, जहाँ इंसान बराबरी के आधार पर समाज में जीते हुए अपनी हर तरह की काबिलियत का भरपूर इस्तेमाल कर पाता है। अगर हम माँग करें कि मार्क्स का हर निष्कर्ष वैज्ञानिक हो तो हमें इंसानी जज्बात को भूलना पड़ेगा, क्योंकि विज्ञान का मकसद समाज की बेहतरी भले हो, इंसानी जज्बात की कोई जगह उसमें नहीं है। यह एक ही साथ विज्ञान की सीमा और ताकत है।

मार्क्स के वक्त से अब तक जो सबसे बड़ा बदलाव आया है, वह यह कि हम पहली बार धरती को कई बार तबाह करने के काबिल हो गए हैं। नाभिकीय विस्फोटों को भूल जाएँ, तो रासायनिक प्रदूषण, मौसम का लगातार ग़र्म होते रहना, ओज़ोन की परते में छेद आदि कई ऐसी विनाशक स्थितियाँ हैं, जिनसे हम रूबरू हैं। साथ ही सूचना-विज्ञान में इंकलाबी तरक्की से पीढ़ियों का फ़र्क पहले की तुलना में आज कहीं ज्यादा है। अनपढ़ लोगों के पास मोबाइल फ़ोन का पहुँचना और ह्वाट्स-ऐप जैसे माध्यमों से फासीवादी ताकतों का पूरी ताकत के साथ फिर से उभरना - ये बातें मार्क्स के जमाने में सोची भी न जा सकती थीं।

रूस और चीन जैसे मुल्कों में जहाँ केंद्रीय योजनाओं के तहत समाज-निर्माण पर जोर दिया गया, तकनीकी तरक्की तेजी से हुई और फिर एक हद तक जाकर उसकी रफ्तार कम हो गई (क्यूबा इसका अपवाद है) , जबकि पूँजीवादी मुल्कों में आलमी स्तर पर हुए शोषण और जंग-लड़ाई पर निर्भर फौजी-असलाह की सौदागरी से इकट्ठा हुए पूँजी की मदद से तकनोलोजी में नवाचार को बढ़ावा मिला। स्पुतनिक युग में रूस में अंतरिक्ष विज्ञान में हुई तरक्की से घबराकर अमेरिका ने विज्ञान की तालीम का बजट कई गुना बढ़ा दिया। बड़े वैज्ञानिकों ने किताबें लिखीं। बुनियादी शोध के लिए माली खपत कई गुना बढ़ी। ग़रीब मुल्कों से शोधार्थियों को बड़ी तादाद में आयात किया गया। नतीजतन पूँजीवादी मुल्कों में तेजी से वैज्ञानिक तरक्की हुई। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि न केवल सैद्धांतिक विज्ञान में, बल्कि तकनोलोजी में नवाचार में भी रूस और पूर्वी यूरोप के मुल्कों में साम्यवाद के शुरूआती दौर में कमाल की बढ़त हुई। दूसरी आलमी जंग तक दुनिया के सबसे बेहतरीन सैद्धांतिक भौतिकशास्त्री रूस और पूर्वी यूरोप में ही थे। बाद के दशकों में कंप्यूटर नेटवर्क आदि में भी बुल्गारिया जैसे मुल्कों में तेजी से तरक्की हुई। विज्ञान के दर्शन में भी निकोलाई बुखारिन और दीगर रूसी चिंतकों का गहरा प्रभाव रहा है। गौरतलब बात है कि केंद्रीय योजनाओं को अपनाने से स्थानीय स्तर पर नवाचार को उस तरह का हौसला नहीं मिल पाया जैसा कि पूँजीवादी मुल्कों में दिखा। साथ ही स्तालिन के दौर में बुनियादी विज्ञान में भी हो रहे बदलावों को शक की नज़रों से देखा गया और विज्ञान के इतिहास पर काम कर रहे मार्क्सवादी दार्शनिकों के लिए कठिन परिस्थितियाँ रहीं। लाइसेंको नामक वैज्ञानिक ने जीनेटिक्स की खोजों को मानने से इनकार कर दिया और सोवियत रूस में जीनेटिक्स पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को तरह-तरह से दंडित किया गया। बुखारिन के विचारों ने क्रिस्टोफर कॉडवेल और बर्नाल जैसे प्रखर चिंतकों को प्रभावित किया, पर वे खुद रूस में अपनी प्रतिष्ठा खोते रहे। भारत में कोसांबी और डी पी चट्टोपाध्याय जैसे दार्शनिक इस प्रभाव में रहे।

ऐसी स्थितियों में साम्यवादी मुल्कों में वैज्ञानिक समुदाय का बड़ा हिस्सा पूँजीवादी मुल्कों में मिलने वाली सुविधाओं और आज़ादी के लिए लालायित हो गया। बड़ी तादाद में वैज्ञानिक भागकर अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के मुल्कों में बसने लगे। इसका फायदा उन मुल्कों को मिलना ही था। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रूस को आर्थिक दलदल में फँसाने की चालें चली गईं। अफग़ानिस्तान में तालिबान जैसी ताकतों को बनाना और उनकी आर्थिक मदद करना इसी षड़यंत्र का हिस्सा था। जल्दी ही रूस और (चीन में भी) साम्यवादी ताकतें कमजोर पड़ने लगीं। अस्सी के दशक में रेगन-थैचर के जमाने में पूँजीवादी मुल्कों में विज्ञान को पीछे धकेलना शुरू हो गया। पर सरमाया और तकनोलोजी में रिश्ते पहले से भी ज्यादा मजबूत हुए। तकनोलोजी में पूँजीवादी प्राथमिकताओं को सामने रखकर हुई तरक्की का लब्बोलुबाब यह निकला कि आज एक ओर आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस (ए आई) यानी कृत्रिम मेधा और क्वांटम कंप्यूटर की बात हो रही है, वहीं बेरोजगारी शिखर पर है और धरती का कुछ पता नहीं कि कब तक रहे।

पूँजीवादी मुल्कों में बीसवीं सदी के बीचोबीच वैज्ञानिक शोध के जो ढाँचे (संस्थान आदि) बने, तमाम संकटों के बावजूद उनकी अपनी एक गति रही है और आज ज़हनी साइंस, कंप्यूटर साइंस जैसे कई मोर्चों पर विज्ञान बुलंदी पर है। ऐसा साम्यवादी मुल्कों में बराबर रफ्तार से क्यों नहीं हुआ, यह सोचना ज़रूरी है। दुनिया के दीगर और मुल्कों में तो साम्यवादी आंदोलन परचम गाड़ नहीं पाया है, और छोटी सी जनसंख्या वाले क्यूबा में आखिर कब तक शमा जली रह सकती है, इसलिए सवाल रूस, पूर्वी यूरोप के मुल्क और चीन पर ही आता है। क्या यह सवाल बुनियादी तौर पर मार्क्सवाद और विज्ञान के रिश्ते का सवाल है? जैसे वैज्ञानिक तर्कशीलता की अपनी सीमाएँ हैं, वैसे ही तेजी से बदलते सामाजिक समूहों और उनमें उभरते नए द्वंद्वों पर तुरत-फुरत समझ की अपेक्षा विज्ञानधर्मी मार्क्सवाद से नहीं होनी चाहिए। फिर भी हम अक्सर ऐसी अपेक्षा रखने की ग़लती करते हैं। बीसवीं सदी की शुरूआत में ही यह साफ हो गया था कि विज्ञान में हो रहे क्रांतिकारी बदलावों का असर मानव-मूल्यों पर कैसा होगा, यह जटिल सवाल है और इससे जूझने के लिए हमें भौतिकवाद के बारे में नए ढंग से सोचने की ज़रूरत है। फ्रेडरिख़ एंगेल्स ने 'लुडव्हिघ फॉयरबाख़ और शास्त्रीय जर्मन दर्शन का अंत' लेख में यह लिखा है कि विज्ञान में युगांतरकारी खोज के साथ भौतिकवाद का स्वरूप बदल जाता है। लेनिन ने अपने विरोधियों की भौतिकवाद को पूरी तरह तिलांजलि देने की कोशिश के बरक्स एंगेल्स के इस उद्धरण का इस्तेमाल करते हुए लिखा कि मार्क्सी चिंतन यह माँग करता है कि नई वैज्ञानिक खोजों के साथ भौतिकवाद पर नए सिरे से सोचा जाए। सौ साल बाद जब सूचना क्रांति से दुनिया भर में उथल-पुथल नज़र आती है, यह बात और महत्वपूर्ण हो गई है। लेनिन के शब्दों में 'एंगल्स के भौतिकवाद के फार्म का संशोधन’(revision), उसके स्वाभाविक-दार्शनिक प्रस्तावों का संशोधन न केवल संशोधनवाद’ के मान्य अर्थों में संशोधनवाद नहीं है बल्कि इसके उलट, यह मार्क्सवाद की मांग है।'
मार्क्स को उद्धृत कर वैचारिक विमर्श में लगातार दरारें बढ़ाते वामपंथी बुद्धिजीवी यह भूल जाते हैं कि मार्क्सी सोच मूलतः एक गतिशील विज्ञानधर्मी मानवतावादी सोच है। विज्ञान के दर्शन में यह माना गया है कि अधिकतर वैज्ञानिक प्रचलित या प्रतिष्ठित मान्यताओं के वर्चस्व में ही काम करते हैं। कभी-कभार ही होता है कि ऐसे अवलोकन जो मान्यताओं से संगति नहीं रखते हैं, उन पर विचार करते हुए कुछ वैज्ञानिक इंकलाबी बदलावों की ओर बढ़ पाते हैं। मार्क्स के जीवनकाल में उन तमाम संकटों के बारे में कोई जानकारी या तो उपलब्ध न थी या बहुत ही कम थी, जो बीसवीं सदी में ही पूरी तरह उजागर हुए हैं। पर्यावरण के संदर्भ में विज्ञान की सीमाएँ, लिंगभेद, नस्ल और जाति विषयक समझ, ये तमाम बातें बीसवीं सदी में ही गहराई से सोची समझी गई हैं। पहले जो कुछ सोचा गया था, उस विचार जगत में मार्क्सवाद सबसे अग्रणी भूमिका में था। कई ऐसी बातें मार्क्स और एंगेल्स के लेखन में हैं जिनको आज कहीं बेहतर समझा जा सकता है।
जैसा वैज्ञानिक पद्धति के बारे में माना जाता है, वैसे ही मानव समाज के विकास का एक निश्चित आख्यान गढ़ते हुए मार्क्स ने जिस दर्दनाक उदासीनता की माँग रखी थी, उसके बारे में फिर से सोचना ज़रूरी है। भारत के बारे में सीमित सामग्री पर आधारित अपने महत्त्वपूर्ण आले में मार्क्स ने यह मानते हुए भी कि 'इस बारे में कोई शक नहीं कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद से हिंदुस्तान को पहले की अपेक्षा भिन्न और बेइंतहा गुना कष्ट झेलना पड़ा है', अंततः यह कहा कि 'इंग्लैंड ने जो भी अपराध किए, ऐसा करते हुए उसकी अचेत भूमिका … क्रांति के कर्णधार की रही'। गोएठे की कविता उद्धृत करते मार्क्स ने कहा कि हम पीड़ाओं से दबकर रोते नहीं रह सकते और भविष्य के सुख का ध्यान रखते हुए हमें इस तकलीफ से गुजरना होगा, वह कितनी भी असहनीय क्यों न हो। इस कथन को सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों ने सीमित अर्थ में इस तरह पढ़ा कि मार्क्स भारतीय मानस को यूरोपी ढाँचे में ढालने को बेचैन थे, पर मार्क्स की असली बेचैनी समाजवादी क्रांति लाने की थी। यह देखते हुए कि पूँजीवादी कुविकास का शिकार मानवता का विशाल बहुसंख्यक हिस्सा है, हमें यह सोचना होगा कि हम इस पत्थर के सनम जैसी उदासीनता से कैसे निकलें। अराजकतावाद के प्रति मार्क्सवादी असहिष्णुता को कम करना होगा। सांस्कृतिक पटल पर सरलीकृत मडल काम नहीं करेंगे, सृजनात्मक अराजकता को भरपूर जगह देनी होगी। क्या विज्ञान ऐसी अराजकता को जगह देता है? अगर दार्शनिक फेयराबेंड की सुनें तो अराजकता ही विज्ञान को आगे बढ़ाती है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद तक मार्क्स की यात्रा की शुरूआत भी अराजक मानवतावादी चिंतन से ही हुई थी। सही है कि इस सोच को बेमतलब खींचा जाए तो सौ साल पहले तक विज्ञान के बारे में जो द्वंद्वात्मक समझ बनी थी, उसे बिल्कुल नकारने का खतरा रहता है, और सब कुछ उत्तर-आधुनिक गड्ढे में गिरता हुआ दिखता है, पर इतनी परेशानी की सचमुच कोई वजह नहीं है। विज्ञान के बारे में द्वंद्वात्मक सोच और सामाजिक-राजनैतिक विश्लेषण आज भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
जहाँ तक विज्ञान के पेशे की बात है, नस्ल, जाति और स्त्री प्रश्न पर साम्यवादी मुल्कों में काफी हद तक बेहतर स्थिति रही है। क्यूबा इस मायने में तक़रीबन जन्नत रहा है। पश्चिमी मुल्कों की तुलना में विज्ञान से जुड़े पेशों में रूस और चीन में स्त्रियों की बड़ी भागीदारी रही है। साम्यवाद आने के पहले इन मुल्कों में स्त्रियों की स्थिति बेहद खराब थी। दीगर और मुल्क जहाँ साम्य के विचार का प्रभाव रहा है, केवल पश्चिमी यूरोप ही नहीं, यहाँ तक कि लीबिया, सीरिया और ईराक तक में इन मुद्दों पर काफी तरक्की हुई थी, जिसे हाल की साम्राज्यवादी तबाही ने मटियामेट कर दिया है। सही सवाल यह होना चाहिए कि मार्क्सी पद्धति में इन सवालों से जूझने की कैसी संभावना है। मार्क्सवादियों को यह समझने में लंबा वक्त लगा है कि ये सवाल महज सांस्कृतिक बहिरचना का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये बुनियादी द्वंद्व हैं।
साम्यवाद में लोकतांत्रिक स्वरूप की माँग विज्ञानधर्मी माँग है। वैज्ञानिक शोध तब तक मायने नहीं रखता जब तक कि शोध-पद्धति और निष्कर्षों को वैज्ञानिक समुदाय की स्वीकृति न मिले। सरमाएदार ढाँचों के बीच रहकर काम करने की वजह से जैसी भी इसकी सीमाएँ हों, वैज्ञानिक समुदाय के बड़े तबके ने इसे मान लिया है। साम्यवादी ढाँचे में विज्ञान ही नहीं, साहित्य, कला, सिनेमा, यहाँ तक कि खान-पान और पहनावों तक में भी लोकतांत्रिक राजनीति को स्पेस मिलना चाहिए। एक ही मंच में परस्पर ईमानदारी पर आस्था रखते हुए लगातार बातचीत का माहौल तैयार करना और हाशिए पर पड़े को बीच में लाना, यह करना है। पूँजीवादी विज्ञान और विकास निजी स्वार्थ को सर्वोपरि रखता है, तो मार्क्सवाद के लिए चुनौती है कि निज की आजादी और सृजनात्मक अभिव्यक्ति का सम्मान करते हुए आर्थिक निर्णयों से लेकर सांस्कृतिक धरातल तक, चाहे उसमें धर्म और परंपरा की तलाश ही क्यों न हो, हर स्तर पर समष्टि को महत्त्व दें। इस नए मुहावरे के साथ ही हमें समझना और समझाना होगा कि दुनिया कैसे बुनियादी रूप से बदल चुकी है। सोशल मीडिया और सामान्य रूप से सूचना क्रांति को कैसे समझा जाए, इस पर खुली बहस ज़रूरी है। बदलाव तेजी से हो रहे हैं, पर सही समझ बनाने में काफी वक्त लगेगा।
आखिर में यह बात कि आज कोई भी विचार स्थानीय तौर पर सीमित रह कर मायने नहीं रख सकता। जब धरती विनाश के कगार पर है और जालिम ताकतें वैश्विक तौर पर विज्ञान और तक्नोलोजी का फायदा उठा रही हैं, हमें राष्ट्रवाद पर सीधी चोट पहुँचाती मार्क्स की चिंता को हमेशा सामने रखना पड़ेगा कि - दुनिया के कामगारो, एक हो जाओ। बदलती परिस्थितियों में हमें इसे 'दुनिेया के मजलूमो एक हो जाओ' कह कर आलमी पैमाने पर संघर्ष और निर्माण का ऐसा दर्शन रचना होगा, जिसमें विज्ञान का अराजक मानवीय पक्ष ही सबसे ऊपर हो। तर्कशीलता को छोड़े बिना भी खुलापन हो सकता है, यही कोशिश होनी चाहिए। इसी दिशा में विज्ञान और तक्नोलोजी का भरपूर इस्तेमाल हो। इस खुलेपन को पॉपर के 'खुले समाज' के बनिस्बत तकरीर करते हुए मॉरिस कॉर्नफोर्थ ने 'खुला (स्वच्छंद) दर्शन' कहा है।                 (समकालीन जनमत -2018)

Monday, April 30, 2018

नई केमिस्ट्री का सैक्सोफ़ोन


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1

कायनात में क्यूबिट कलाम लिख रहे हैं। परस्पर प्यार में उलझे हैं सूक्ष्मतम 

कण। हर पल ध्वनि गूँजती है, प्यार तरंगित होता है नीहारिकाओं के पार। हम 

सब इसी गूँज में गूँजते हैं। धरती और आकाश हमारे साथ गूँजते हैं। हम गूँजते हैं 

साम्य के नाद में; कायनात में गूँजती है आज़ादी। यह गूँज हमारी प्रार्थना है,  

सजदा है, क्यूबिट कणों में टेलीपोर्ट होकर कायनात के चक्कर लगा आती है 

गूँज। हमारा प्यार हमारा रब है। हमने मीरा से प्यार किया,

परवीन शाकिर से प्यार किया। हीर और रांझा हम, हम हादिया, इशरत हम। 
हम प्यार, हम प्रेमी। हम आज़ाद, हम आज़ादी। हम समंदर का नील, हम 
प्रतिरोध का लाल। हम खुली हवा की मिठास, हम पंछी लामकां।

2

पढ़ना है, पढ़ाना है। खोखे पर बैठ चाय पीनी है, पर दिमाग को कुंद नहीं होने 

देना है। उदासीन होना है, उदास नहीं होना है। सुर साधना है। कुदरत को 

सुनना है, कुदरत को साधना है। चाँद-सूरज के साथ इस धरती को खूबसूरत 

रहने देना है। सूरज को गिरने नहीं देना, चाँद को भागने नहीं देना है, तारों को 

खगोली चक्कर लगाते रहना है, हर किसी ने प्यार जीना है।



आनंदधाराएं अनंत हैं – परंपरा के कई छोर हैं। सगुन, निरगुन, धम्म, हर दीन 

परंपरा है। गीता पढ़ लो या ग्रंथ साहब; या कोई बाइबिल या कुरान पढ़े। या कि 

चारवाक जिए। कार्बोनेट अणु में समरूपता को पढ़ना जैसे शफाकत अमानत 

अली को सुनना। अ के साथ ब को पढ़ना है। कुछ-कुछ अलग सब। 

सूरज के रहते बादल दिख गए; जैसे संकट में मेरी हिन्दी कमज़ोर पड़ जाए तो 

थोड़ी पंजाबी बोल लूँ! मान लो जिसे बेहतर मानते हो, पर यह वजह नहीं कि 

अलग-थलग रहा जाए।



डर है कि सूरज बिखर रहा है खरबों टुकड़ों में, ज़मीं पर आग धधक रही है हर 

ओर। शैतान के लंबरदार शिश्न पकड़े हर हर घर घर का नारा उछाल रहे हैं कि 

हम डर जाएँ। हम नहीं डरेंगे; हम साथ हैं तो हरी-भरी ज़मीं हमारे साथ है। 

बिना दूरबीन भी दिख जाएँगी किसी और ग्रह की सतह पर हरी सब्जियाँ। या 

कि अंतरिक्ष में किसी धूमकेतु पर राहुल राम नई केमिस्ट्री का सैक्सोफ़ोन बजा 

रहा होगा ।



जुड़ो, लाल के पहरेदारो, लाल पहरेदारो, तरह-तरह की लालिमा से 

जुड़ो। कार्बोनेट अणु, शफाकत अमानत अली, सगुन, निरगुन, धम्म,  

चारवाक, भूगोल, इतिहास, कोई माफ नहीं करेगा 'गर सूरज गिर पड़े

गर चाँद खफा हो जाए।
 
(समकालीन जनमत; 2018)

Monday, February 05, 2018

15 साल पुराना लेख : प्रेम पर पहरा


यूथ प्लस, दैनिक भास्कर, मंगलवार, 15 अप्रैल 2003
प्रेम पर पहरा क्यों ?


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प्रेम मानव को प्रकृति का सबसे खूबसूरत उपहार है। हर क्रांतिकारी का मूल स्वप्न प्रेम होता है। लगातार प्रेमविहीन हो रहे समाज में प्रेम की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए हम सबको सोचना है।
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क्या किशोर-किशोरियों का सार्वजनिक जगहों पर एक साथ घूमना और परस्पर प्रेम प्रदर्शन करना ठीक है? पंचकूला पुलिस द्वारा बुजुर्गों की शिकायत पर युवाओं को पकड़ने और उनके माता-पिता को बुलाने की घटना से यह बात चर्चा का विषय बनी है। अधिकतर लोग इसे नैतिकता का सवाल मानते हैं, जबकि युवा इसे अक्सर तिल का ताड़ बनाने की मूर्खता मानते हैं।
आज इलैक्ट्रानिक मीडिया पर जैसे दृश्य हम देखते हैं, उसके बाद युवाओं के प्रेम पर सवाल उठाना वाजिब नहीं लगता। अपने घर में बैठकर टीवी पर हर पांच मिनट में चुम्बनों से भरा जांघिया पहना मर्द, कनिष्ठिका उठाए आई वाना डू, कुछ भी हो सकता है के सरकते वस्त्र आदि-आदि देखने में हमें कोई आपत्ति नहीं। यौवन का प्रेम जो कुदरती है,- अरे बाप रे, कुछ हो गया तो? छिः छिः, जहां ये युवा बैठते हैं, हम वहां से गुजर भी नहीं सकते।
जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नंगेज की भरमार है और घटिया, बीमार नंगेज दिखाकर हमारी चाहतों का शोषण करने के लिए अंतड़ियों तक पहुंचती पूंजीवादी व्यवस्था की बौछार हो रही है, तब कोई सरकार, कोई पुलिस परेशान नहीं। यह तो पूंजी निवेश है, साबुन के साथ-साथ दिमाग में कुछ बीमारी भी घुसे तो क्या हुआ। किसी मित्र के साथ खाना मत खाइए, डांस मत कीजिए, बस मौके की ताक में रहिए कि कोई न देखे तो तुरंत अपना लिजलिजा हाथ उसके अंगों पर मारिए। औरत इंसान नहीं महज उपयोग की वस्तु है। यह मानसिकता है।
प्रेम पर रोक लगाकर कुंठित मन पर इलेक्ट्रॉनिक चमक-दमक के साथ औरतों के वस्तुकरण का हमला जारी है। चूंकि प्रेम स्वीकार्य ही नहीं, तो प्रेम के बारे में बात क्या करें? इसलिए जिम्मेदारी से प्रेम निभाने की बातचीत भी नहीं हो सकती। समुचित यौन शिक्षा, गैर जिम्मेदार यौन संबंध के खतरे, एड्स जैसी बीमारियां - कोई बातचीत खुले आम नहीं होगी। छिप-छिप कर बातचीत करें, सही-गलत बातें जानें - हो सकता है संस्कृति के ठेकेदारों को यह ठीक लगता हो, पर सच्चाई यह है कि इससे देश और समाज अंधेरे में डूबता ही जाएगा।
पुरुष-प्रधान समाज में औरतों और बच्चों को सदियों से यौन-शोषण का शिकार बनाया गया है। सुविधा-संपन्न और ताकतवर लोगों ने विपन्न औरतों को, जैसे जमींदारों ने खेत मजूरों को शारीरिक रूप से सताया है। चाहत के पूंजीवादी शोषण का इलेक्ट्रॉनिक स्वरुप उसी कड़ी में औरतों और बच्चों पर जुल्म को बढ़ाता है। प्रेम महज दो लोगों का परस्पर बंधन नहीं, कुंठाग्रस्त और बीमार समाज के खिलाफ विद्रोह भी है। इसीलिए प्रेम-प्रसंग को जीवन में होते देखना समाज के प्रतिष्ठित वर्गों को खतरनाक लगता है। प्रेम की पुनर्प्रतिष्ठा हर विद्रोही का नारा होना चाहिए। इसीलिए कवि जो स्वभाव से ही विद्रोही होते हैं, हमेशा प्रेम-राग में डूबे होते हैं।
हमारे समाज में प्रेम हमेशा ही विवादास्पद रहा है। प्रेमियों की तड़प को अपनी तड़प मान लेना फिल्मों, नाटकों को देखते हुए या कहानी-उपन्यास पढ़ते हुए तो ठीक है, पर अपनी ज़िंदगी में खुद को छोड़कर बाकी सबके प्रेम में खोट ढूंढना हमारी सांस्कृतिक पहचान है। इसलिए अक्सर समझदार लोग भी इस विषय पर बोलते हुए संस्कृति का हवाला देते हैं और ‘ऐसा होगा तो गली-गली में लोग लेटे हुए मिलेंगे,’ जैसी घटिया बातें करते हुए बहस करते हैं। इनमें से कुछेक ने ही फिल्मी ही सही, राधा-कृष्ण की रास-लीलाओं के बारे में देखा-सुना होता है। शंकराचार्य की सौंदर्यलहरी में शिव पार्वती के सौंदर्य की स्तुति तक तो इनकी पहुंच हो नहीं सकती। हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद जैसी लोककथाएं इनकी स्मृति से विलुप्त हो चुकी हैं। प्रेम जैसे ही प्रकृति के अन्य सुंदर अवदानों को नष्ट करने में भी लोग तत्पर रहते हैं। मसलन सुबह के नैसर्गिक सौंदर्य को मंदिर-गुरुद्वारों से यांत्रिक शोर से नष्ट करने में ये संस्कृति और परंपरा की महानता देखते हैं। प्रेम में खोट ढूंढने वाले ये महानुभाव खुद ही इतने बीमार हैं कि इनको धर्म के नाम पर सैकड़ों का खून बहाने में बड़ा आनंद आता है। कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ने का सपना देखती रहे, हम तो मंदिर-मस्जिद के लिए लड़ेंगे।
देशभर में ध्वनि-प्रदूषण के खिलाफ कानून बने हैं। सभी डॉक्टर, सभी वैज्ञानिक आपसे कहेंगे कि ध्वनि-प्रदूषण से अनगिनत बीमारियां होती हैं। कोशिश कीजिये कि पुलिस को सुबह मंदिर-गुरुद्वारों-मस्जिदों से होते ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए कहें। पर पुलिस भला इसे क्यों रोके? लेकिन दो युवा परस्पर स्नेह प्रकट करने पार्क में गए हैं, तो तुरंत पुलिस को यकीन हो जाता है कि यह समाज, देश, संस्कृति व नैतिकता के खिलाफ बहुत बड़ा षड़यंत्र है। युवाओं में अधिकतर, सरकार चुनने वाले अठारह से अधिक उम्र के नागरिक हैं, जिनके संवैधानिक अधिकारों का खुलेआम हनन करने में पुलिस को कोई शर्म नहीं। पूरे प्रदेश में नशीले पदार्थों की ट्रैफिकिंग, धनवानों और राजनैतिक शक्ति संपन्न लोगों के लिए गैर-कानूनी यौन-कर्मियों की ट्रैफिकिंग -- सब लोग जानते हैं ये समस्याएं कितनी गंभीर हैं, पर पुलिस की आंखों के सामने सिर्फ ये युवा हैं, जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र न होने के कारण अभी कमजोर हैं। इसलिए उन्हीं को पकड़कर मां-बाप से वाहवाही क्यों न लूटी जाए।
मां-बाप क्यों चाहते हैं कि उनके बच्चे डेटिंग न करें? इसलिए कि उनमें डर है। जाति-प्रथा की कुरीतियों से ग्रस्त इस समाज में प्रेम विद्रोह का बिगुल बजाता है। इसके अलावा जो बच्चा अपने आप स्नेह संबंध का निर्णय ले सकता है, उस पर नियंत्रण कैसे रखा जाए? खास तौर पर बेटियों के माता-पिता तो इसी चिंता से परेशान रहते हैं कि कुछ हो गया तो शादी कैसे करवाएंगे?
तो आखिर इसका समाधान क्या है? जो प्राकृतिक है - उसे रोका नहीं जा सकता। सही यह है कि माता-पिता और संतान के बीच स्वाभाविक संबंध हों। अपनी चाहतों के बारे में युवाओं को माता-पिता के साथ निडर होकर बातचीत करने की छूट होनी चाहिए। ऐसा होता नहीं है क्योंकि बुजुर्गियत अक्सर ‘हम बेहतर जानते हैं’ का बोझ लिए आती है। पीढ़ियों में ज्ञान के साथ-साथ अहसासों-जज्बातों का जैसा फर्क आज है, ऐसा पहले कभी न था। वैसे भी किशोर वय को पहुंच चुकी संतान को बच्चे जैसा नहीं, मित्र जैसा मानना चाहिए। मां-बाप को अपना अनुभव बांटना चाहिए, न कि उम्र और शक्ति का डंडा बरतना चाहिए।
अगर प्रेम के यौन संबंध में परिणत होने की संभावना है, तो संस्कृति पर खोखला भाषण इसे रोक नहीं सकता। हमें युवाओं को यौन-संबंध की जिम्मेदारियों के बारे में सचेत करना चाहिए। साथ ही उनमें खुली बातचीत का हौसला बढ़ाना चाहिए, ताकि अगर वे किसी समस्या में हों, तो तुरंत उसका उपचार कर सकें। कम उम्र में गर्भ से बचने के लिए यौन-संबंध से परहेज के लिए भी उन्हें समझाया जा सकता है। युवाओं में आवेग और आवेश को बांधने की क्षमता भी होती है, बशर्तें उन्हें यह विश्वास हो कि यह आवश्यक है।
युवाओं को भी अपने माता-पिता की सीमाओं और चिंताओं को समझना चाहिए। मां-बाप ने वर्षों तकलीफें झेलकर संतान को बड़ा किया है। उसके सुरक्षित भविष्य के लिए उनके सही-गलत विचार हैं। रात-रात नींद खोकर उन्होंने बच्चों के बारे में सोचा है। इसलिए उन्हें लगता है कि बच्चे पर, उसकी गतिविधियों पर नियंत्रण का हक उन्हें है। जब बच्चा युवावस्था में आता है, उसे संजीदा तरीके से मां-बाप को समझाना है कि वह बड़ा हो गया है। अपने मां-बाप के साथ मन खोलकर उसे बातें करनी चाहिए। उन मां-बाप से क्या शर्म, जिन्होंने वर्षों बच्चे को गोद में पाला है। मां-बाप सख्ती अपनाते हैं तो धैर्य के साथ उसका विरोध करना है। साथ ही युवाओं को समाज की बदलती मान्यताओं को परखना है। हर बदलती मान्यता ठीक हो, जरुरी नहीं। युवाओं में से असामाजिक तत्वों को पहचान कर उन्हें पुलिस या उचित अधिकारियों को सौंपना भी उनकी अपनी जिम्मेदारी होनी चाहिए। गैर-जिम्मेदाराना हरकतों से न केवल उन पर प्रतिबंध बढ़ेंगे, उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ेगा।