बस मायूसी ग़ायब है
हाल में 'समालोचन' में प्रकाशित कविताएँ :
1. धरती कभी मायूस होती थी
बाक़ी सब ठीक है
बस मायूसी ग़ायब है।
प्यासी रूह
अनजाने ही चाट लेती है ख़ून सींचीं उँगलियाँ
जो मिट्टी से रगड़े साफ नहीं होतीं
जब बम धमाकों के बीच बसंत और प्रेम की कविताएँ हैं
और मोर्चाबंदी में हैं तरह-तरह के विन्यास
कि लफ्ज़ों को बाँधें
प्यास लगी है
उसे जिसकी दुकान सरकार के कारिन्दों ने तोड़ दी
उसे जो सात की उम्र के पहले हमलावरों की गोलियों से भूनी गई
उसे जो हर कहीं है पिटा या पिटने के इंतज़ार में डरा हुआ
बहुत प्यास लगी है
बस मायूसी ग़ायब है।
हड्डियों में अनगिनत बच्चों का ख़ून जमा है
कभी बादलों के बीच से रोशनी छन कर आती थी
अब सारा आस्मान अँधेरा है
रोशनी दिख कर नहीं दिखती
लफ्ज़ हैरानी विलुप्त हो गया हैै
अचरज कायनात के छोर पर है कि छलाँग लगाए
ईश्वर ने उसे थोड़ी देर के लिए रोक रखा है
ज़माना गूँगे बहरों का है
तो लफ्ज़ों की क्या दरकार
क्या फ़र्क जो लफ्ज़ पैदा न हों तो
ज़ेहन से निकाल दें अल्फ़ाज़
कि रोने की ज़बान बाक़ी न रहे जब कल धरती इधर फूटेगी
बम उस गली पर गिरे हैं आज
तो कल को कौन सी देर है
कोहरा है कि कुहासा
बहस है चारों ओर
और तय है कि
बचेगी नहीं दिल्ली, नहीं बचेगा अमदाबाद
कुदरत के क़ायदे हैं कि
धुआँ उठता है तो फैलता है।
काट-खरोंच भरी चमड़ी परदा बनती है नंगे जिस्म पर
रोशनी अँगड़ाई लेती है
पगली वह गाए भी तो क्या गाए
कवियों ने सारे लफ़्ज़ चुरा लिए
प्यासी रोशनी गुनगुनाती है - मैं हूँ माँ
क़िस्म-क़िस्म के कीड़े मकौड़े उसे गुदगुदाते हैं
प्यास लगी है
बहुत प्यास लगी है
रोशनी अँगड़ाई लेती है
क्या सही क्या ग़लत सोचती
कि बाक़ी सब ठीक है
बस मायूसी
ग़ायब है। आज बेहिस
धरती कभी मायूस होती थी।
2. कुछ तो मेरे जैसा
किसी और वक़्त पूछता तो इसे मामूली सवाल समझता
इस वक़्त जब धरती से तहज़ीबें मिटाने की क़सम ले रहा है कोई
उसका पूछना कि शैतान शब्द में श पर मात्रा है कौन सी
मुझे उलझन में डाल गया है
आखिर आजकल के बच्चों को कहाँ समझ आती हैं मात्राएँ
अपने नामों की पड़ताल कर रहा हूँ
किसमें कौन सी मात्रा है कहाँ पर
क़सम ले रहे शख्स की शक्ल में कुछ तो मेरे जैसा भी है।
3. क्या बचा है तुममें
3.1
पढ़ो लिखो, बोलो, ना बोलो
मूर्त नहीं रह गए तुम।
कोई किताब नहीं हो
कोई लफ़्ज़ भर नहीं
अपनी रूह सरे आम मरती देख चुके हो
क्या बचा है तुममें
क्या कह सकते हो
किस अंधकूप से निकल किस और में जाते हो
कोई व्याकरण कोई अलजबरा नहीं
निष्क्रिय निष्प्राण
अपने में संक्षिप्त
देख रहे सपने
जाने किस के प्रक्षिप्त।
3.2
जीना यादों का बोझ है
मरी हुई चेतना बेहिस ठोस है
किसको प्यार करते हो
किससे परदा किए हो
कौन सा अँधेरा धकेलता तुम्हें
कैसी बू तुम्हारे बदन से आती
क्या चुग रहे
थके अल्फ़ाज़ सजाते
किसकी रूह है जिसे अपनाते हो
या कि माटी में रेत सा
फिर-फिर पूछते हर सवाल मिटाते हो।
3.3
लिखूँगा
कड़वी बातें लिखूँगा
जब नहीं रहूँगा मेरा लिखा मुझे आगे लिखेगा
रूह के पन्ने फड़फड़ाते रहेंगे
तंगनज़र तंगख़याल होकर लिखूँँगा
कि साफगोई से परेशान हूँ
कि सच ख़ून का सैलाब है
लिखूँगा जब नहीं रहूँगा
इल्म की बातें लिखूँगा जिनमें तड़प है
जिनमें आतंक मेरा नाम है
उदास थमी हुई हवाओं में लिखा जाता
रूह का गला घोटता कलाम है।
4. ख़्वाब था
ख़्वाब था कि उठते ही दिन कुछ अलग सा था
वाक़ई ऐसा न था
दिन तो दिन था, उठना था, सैर को जाना था
भला दिन था, भला दिन था।
काम पर निकले तो ख़याल आया कि बीता कल कोई और दिन था
वाक़ई ऐसा न था
गुलमोहर कि नीम दरख़्त वही थे यतीम
गुफ्तगू करती साँस वैसी ही
खुद को वैसे ही सड़ते देखा
एक अरसा मौत ढोता जिस्म
ख़यालों को दफनाता सुक़ून से लेटने की जगह ढूँढता
दिलो-दिमाग़ में बची खिड़कियाँ बंद करता
लंबी यात्राओं से खुद के पास लौट आता
खुद को बेमौत मरता जाता देखता
हर बार अपना जिस्म कंधों पर उठाए
खुद से तुम कौन हो पूछता।
5. हक़ीक़त का शायर
5.1
हक़ीक़त का शायर
आग और धुँए में
छत पर आ गया है
सूरज भूल चुका है
धरती ढूँढता है
पैमाने गड़बड़ा गए हैं
हर ओर ख़ला है
दो खंभों के बीच
भटकता धरती ढूँढता है।
5.2
हक़ीक़त का शायर
कहीं और होना चाहता है
कोई परवाह न करे कि कहाँ होना चाहता है
बेशक वह किसी और ग्रह से है
मुमकिन है कि उसने कोई नशीली दवा ली है
कि वह मुक्तिबोध के पास होना चाहता है
वह दिल का हल्का होना चाहता है
कि हर पल उसमें से कोई रेलगाड़ी धड़धड़ाती गुजरती न हो
कि उसमें कोई किशोरी ता धिन धा नाचती हो
कि उसकी रीढ़ बनी रहे
भले ही वह घास चर कर जिए
कछुए की चाल चले।
5.3
कविता में संगीत नहीं है तो क्या
क्या वातावरण में संगीत है?
तसव्वुर में धुन ला सके
टूटी बिखरी धरती की पीर गा सके
जुगनू की चमक और मोर की धमक
तबाह हो चुके दिलों की नागवार सी झनक
समंदर सी गहरी नहीं, महज तिश्नगी बुझाने भर पानी हो
न गाए सही, पर रुके नहीं, आकाशगंगाओं तक तैर आए
और तुम तक पहुँचे
ऐसी हो तो कहना कि कविता है।
5.4
सारे जंगल कट जाएँ एक फ़कीर तना रहेगा
सारे फूल कुचल दो एक किशोरी न चाहते खिलखिलाएगी
अकेला सही बादल आते मोर पंख फैलाएगा
काली होंगी बूँदे, बारिश होगी
ज़र्द सही, भूला सा पत्ता हवा में उड़ेगा
शहद न होगा, मधुमक्खियाँ नाचने से बाज़ न आएँगी
बसंत न आए
कविता लिखी जाएगी।
6. गाँठें
बर्तन धोने का काम मुझे पसंद नहीं है
अक्सर बर्तन पानी से भरकर रख देता हूँ कि
जब धोऊँ अन्न का चिपका कोई टुकड़ा
आसानी से निकल जाए।
चाय बनाते हुए या ऐसे किसी वक़्त जब रसोई में
चूल्हे के बगल में लगी हौदी के पास खड़ा होता हूँ
जल्दी से कुछेक बर्तन निपटाता हूँ।
इस दौरान दूर से किसी मकान या सड़क बनाने
या मरम्मत में लगे लोगों की आवाज़ें सुनाई पड़ती हैं
सुरीली-बेसुरी धार्मिक चीखें कुदरती क़ायदों से कानों तक आ पहुँचती हैं
नज़र उठाकर खिड़की से जो दिखता है देख लेता हूँ
कोई चिड़िया भूली हुई आ बैठी बैल्कनी में
कबूतर हो तो बर्तन धोना रोक कर श-श् करने लगता हूँ कि भगा सकूँ
अपराध बोध लिए खुद को समझाते कि कितनी बिष्ठाएँ साफ करूँ दिन भर।
अमूमन सारे धो लेता हूँ, बस चाय वाले बर्तन
बाद के लिए छोड़ बढ़ जाता हूँ
वहीं
अपनी आभासी गाँठों में।
7. कविता की बू
आखिर तक पहाड़ रहेंगे
फूटते हुए दिखेंगे खूबसूरत
मैदान न होंगे
पंछी न होंगे
हवा बहेगी
हम तुम से बेखबर
जलती रेत होगी
बू होगी
कविता की बू।
8. मुक्ति-बोध
बारिश से धुल गई है धरती
दूर देश से हवाएँ मुझे छूने आई हैं
मैं 'बेचैन चील' ढूँढता हूँ कविता
अपने अंदर किन सुरंगों में 'पर्यटनशील'।
9. तू लिख
ज़िंदगी के अनगिनत वाक़ियों में यह दर्ज़ रहे कि मैं मूसा को समझा रहा था कि हम हिन्दी-पाकियों को आपस में लड़ना नहीं चाहिए उसकी जल-परी सी दोस्त मुझे नशे में बहकते देख हँस रही थी मूसा लगातार मायूस हो रहा था अगले दिन ख़ुमारी से निकल मैंने क़सम खाई कि कभी पी कर बहस नहीं करूँगा मूसा मुझे गलबँहियों में लेने की सोचता था दर्ज़ रहे कि मैं नासमझ जानता न था जल-परी ने मूसा को सपने में नसीहत दी कि हुक़ूमतें हमारे लड़े बिना टिक नहीं सकतीं बुल्ले शाह की बाबहर तक़रीरें तब तक नहीं तब तक सुन ली थीं जब कर्नाटक की मेरे जैसी पागल एक जल-परी ने जेल जाने के लिए कहा कि भारत माता की जै के साथ पाकियों के मुल्क़ को भी ज़िंदाबाद कह दो धरती माता की जै कहते हुए तब तक दर्ज़नों गाने वालों से सुन चुका था कि बुल्ले को नहीं पता था कि वह कौन है बचपन का कबीर अरसे पहले समझ आ गया था कि जित देखों तित लाल जल-परियों ने रोशनी के टुकड़े बिखेर रखे थे जिनसे वर्तमान नामक साँड़ बौखलाता जाता उम्मीद हमारी कि बौखलाहट से निकल एक दिन प्यार की तलाश में वह खूँटे तक वापस लौटेगा तब जैसा भी वर्तमान हो मैं इश्क़ की ख़ैर माँगूँगा साईं मेरा कोई नहीं दर्ज़ रहे कि प्यार ही मेरा साईं मूसा जल-परी के साथ आएगा मेरा माथा चूमेगा कहेगा तू लिख तू ही साईं तू लिख इसलिए लिखता हूँ।
Labels: कविता


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