हर साँस के रुकने में हमारी भागीदारी है
यह लेख तीन दिनों पहले लिखा था।
चूँकि मुख्यधारा के अखबारों में मेरे लेख अब नहीं छपते
तो एक साथी के कहने पर किसी अखबार के संपादक को इसे भिजवाना था।
अब यह ज़रा outdated हो गया है, तो इसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ।
हर साँस के रुकने में हमारी भागीदारी है
मौजूदा हालात पर कई लोग खूब लिख रहे हैं। कई अखबारों में, पत्रिकाओं में लेख छपते हैं कि हुक़ूमत की अनगिनत तिकड़मों से विपक्ष कमज़ोर ज़रूर हुआ है, पर नागरिकों में बेचैनी और कई स्तरों पर विरोध और प्रतिरोध नहीं रुका है। लिखने को बहुत कुछ है। पर जो बुनियादी सवाल है, वह यह है कि जो कुछ वर्तमान निज़ाम में ग़लत दिखता है, क्या इसमें कोई अचरज या हैरानी लायक बात है? व्यवस्था के क़ायदों का भरपूर फायदा उठाते हुए, लगातार झूठ और फ़रेब का सहारा लेकर एक खास तरह की राजनीति हम पर हावी हो गई है। यह अचानक नहीं हुआ है। लंबे अरसे से छल, बल और कौशल से यह मुमकिन हुआ है।
सचमुच जो हो रहा है, इसमें अचरज लायक कुछ भी नहीं है। तो क्या, सब ठीक है? नहीं, ठीक तो यह क़तई नहीं है और विरोध तो होगा। पर प्रतिरोध सिर्फ नीति-दर-नीति पर नुक़्ताचीनी भर हो तो यह महज बौद्धिक अभ्यास भर रह जाएगा। इतना ही नहीं, ऐसी नुक़्ताचीनी अक्सर हुक़ूमत के हित में ही रहती है, क्योंकि विपक्ष की सारी ऊर्जा इसी में खप जाती है। इसलिए जब घमंड में सराबोर हाक़िम इस स्तर पर उतर आएँ कि हर विरोध पर उनकी आँखें बंद हों, तो सोचना लाज़िमी है कि विरोध में बिखराव के नतीजे क्या हो सकते हैं। मसलन आज देश के युवा छात्रों के एक समूह के साथ एक तक़रीबन बुज़ुर्ग भला-मानस भूख हड़ताल पर क़ायम है और किसी भी दिन खबर आ सकती है कि उसकी साँस रुक गई। बिना किसी आरोप-कागज़ात के जेल में रहते हुई स्टैन स्वामी की मौत जैसी मिसालों से यह ज़ाहिर हो चुका है कि बुज़ुर्गों की मौत पर मौजूदा हुक़ूमत से अफसोस की उम्मीद नहीं है। पर सभ्य समाज की इस पर क्या राय है? क्या सोनम वांग्चुक की मौत हो जाए तो वह ठीक होगा? अगर नहीं, तो हम क्या करें?
ऐसा नहीं कि यह सिर्फ हमारे मुल्क़ की समस्या है। दुनिया के तमाम मुल्क़ों में दमनकारी ताकतों के साथ सभ्य समाज को और असहमति की आवाज़ों को टकराना पड़ता है। जब भी सिविल सोसाइटी खुली जानकारी और जवाबदेही की मांग करती है, तो अक्सर उन्हें असंवेदनशील सरकारों या उनकी तमाम एजेंसियों की ओर से बदनामी, पाबंदियों, फंडिंग पर रोक, डराने-धमकाने और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। इन खतरों के बावजूद, सिविल सोसाइटी के लोग अपनी जगह बनाए रखने और बदलाव की कोशिशों के लिए कई तरह के तरीके अपनाते हैं। हम में से कई लोग समझौतों की ज़िंदगी जीते हुए चुपचाप बदलाव की कोशिश करते रहते हैं। सीधे विरोध को अक्सर बाहरी ताकतों की साजिश कह कर सरकार लोगों को भ्रमित करती है। और आखिर क़ानूनी पाबंदियों से कैसे निपटा जाए? इस के लिए अपने कामकाज के तरीकों में बदलाव कर चुपचाप सुधार के लिए कोशिश करते रहना ही एक रास्ता है। अनगिनत लोग समाज में बेहतरी के लिए लगातार जुटे हुए हैं। सरकार के लिए बेहतर छवि वाले समूहों पर रोक लगाना आसान नहीं है, क्योंकि इससे लोग सवाल करना शुरू करेंगे। कई बार लोग गठबंधन बनाने में कामयाब होते हैं, जैसे कि बांग्लादेश में दो साल पहले हुआ, हालाँकि वहाँ उभरे जन-विद्रोह के नतीजे पर कई सवाल खड़े हो चुके हैं। आज मुख्यधारा की मीडिया पूरी तरह सरकार के साथ है, विशेषज्ञों में से ज़्यादातर या तो डरे हुए हैं या बिक चुके हैं, सरकारी संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम करने की कोई गुंजाइश दिखती नहीं है। वैसे भी अंतरराष्ट्रीय या वैश्विक संस्थाओं से समर्थन का मौजूदा सरकार पर कोई असर नहीं है।
यानी कुल मिलाकर बात यहीं आ जाती है कि हम क्या करें? जर्मन दार्शनिक हाना आरेंट की एक किताब के एक शीर्षक से एक मुहावरा दुनिया भर में मशहूर हुआ है - बनालिटी ऑफ ईविल। आरेंट ने यह देखा कि नात्सी अपराधी दरअसल चुपचाप, बिना किसी जज़्बाती दिक़्क़त के यहूदी लोगों पर हो रहे ज़ुल्मों को मानते रहे, जैसे कि यह एक आम सी बात थी, इस पर सोचने या परेशान होने लायक कोई बात ही नहीं थी। इसी को उसने ईविल यानी बुराई की तुच्छता या आमफ़हम होना कहा। उसने यह समझाया कि चुप्पी को तटस्थता नहीं बल्कि मिलीभगत माना जाना चाहिए।
यानी कल दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांग्चुक या किसी और युवा छात्र की साँस रुकती है, तो हम इसे महज एक दुखदाई घटना कहकर बरी नहीं हो सकते। हमें समझना होगा कि हुक़ूमत द्वारा की गई ऐसी हत्या में हम भागीदार हैं। यह सही है कि हर कोई विरोध में शामिल नहीं हो सकता है, या हर कोई उन मुद्दों में रुचि नहीं रखता है, जिस के लिए विरोध चल रहा है, पर सामाजिक प्राणी होने की वजह से हम सही-ग़लत जाननेे-समझने को मजबूर हैं। यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि जब ज़ुल्म और नाइन्साफी की इंतहा हो तो हम आवाज़ उठाएँ। हुक़ूमत को यह एक छोटी सी बात लग सकती है कि बार-बार भ्रष्ट सियासी लोगों की वजह से पेपर लीक होने पर लाखों बच्चों की कड़ी मेहनत बेकार गई, पर एक बड़ी तादाद में लोगों को लगता है कि यह ग़लत है और उनको विरोध करने का वाजिब और पूरा हक़ है। सरकार ने किसी भी हाल में टस से मस न होने का फैसला किया है तो सभ्य समाज को आगे आना ही होगा और विरोध कर रहे भूख हड़तालियों की जान बचानी होगी।
एक नामी विश्वविद्यालय में पढ़ा रही एक युवा अध्येता से बात हो रही थी। उसने हाल में ही कहीं कोई मकान खरीदा है। एक साथी ने मज़ाक में कहा कि ये तो संपत्ति वाली हैं। उसने मुर्झाई सी हँसी के साथ कहा - हाँ, घर खरीदना पड़ा, क्योंकि किराए पर घर मिलना आसान नहीं। मेरे बुज़ुर्ग रिश्तेदार जो जज, प्रोफेसर आदि रह चुके हैं, कइयों के नाम वोटर लिस्ट से कट गए हैं। क्या करें? वाक़ई, कोई चार राज्यों में अब तक हुए संशोधनों में कुल पौने छ: करोड़ लोगों से मतदान देने का हक़ छीन लिया गया है। इनमें से ज़्यादातर मुस्लिम हैं, पर बड़ी तादाद में हिन्दू भी हैं। सरकार ने पासपोर्ट तक को नागरिकता का प्रमाण मानने से इन्कार कर दिया है। सौ सालों से कुछ लोग इसी प्रोजेक्ट पर काम करते रहे हैं कि इस मुल्क़ की विविधता को खत्म कर एक जाति, एक भाषा, एक संस्कृति में सीमित किया जाए। आज यह प्रोजेक्ट अपने लक्ष्य को पाने में सफल होता दिख रहा है तो अचरज कैसा? इस बात को समझने की ज़रूरत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी सफल होती है जब हर सचेत नागरिक धोखेबाज़ों और फ़रेबियों को छूट और आज़ादी का फायदा लेने से रोके। ऐसा नहीं है कि सोचने वाले लोगों को इस बारे में पता नहीं था। सब कुछ जानकर भी टुकड़ों में मिलती सत्ता के लालच में आपस में लड़ते हुए तरक़्क़ीपसंद तबकों ने प्रतिगामी ताकतों को आगे बढ़ने दिया। सभ्य समाज की ऐसी तटस्थता आखिरकार हर किसी को चोट पहुँचाएगी।
लोकतांत्रिक तरीकों से एक हद तक लड़ाई लड़ी जा सकती है। सौ साल पहले जर्मनी और इटली में यह हद पार हुई तो लोकतांत्रिक विरोध मुमकिन नहीं रहा। क्या हमारे यहाँ भी आज ऐसी स्थिति है? अगर अभी भी विपक्ष में बिखराव बना रहे, संगठित प्रतिरोध न हो तो शायद यही सच है कि लोकतांत्रिक संघर्ष की अहमियत अब नहीं रही। ऐसी स्थिति में भविष्य कैसा होगा? हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि यहाँ हश्र वैसा न हो जैसा यूरोप में हुआ था। शांतिपूर्ण संगठित लोकतांत्रिक प्रतिरोध की गुंजाइश हमेशा ही रहती है, और यहाँ भी ऐसा ही हो, हमारी यही ख़्वाहिश रहेगी।
Labels: दमन और विरोध, पत्रकारिता


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