Tuesday, April 06, 2021

लाल्टू तुम वहाँ क्या कर रहे थे

 पागंथांग* में (*गांगतोक के पास)




कायदे से वहाँ किसी और को होना चाहिए था


जिसे याद करते मैं कुछ लिखता


उसकी अकेली सुबह-शामों पर टिप्पणी करता


कि इस उम्र में कहीं भी हो कोई, वह अकेला ही रहता है


बहरहाल वहाँ बेहद ठंड थी, जब मुल्क का बाक़ी हिस्सा सूरज की आग


और एक राष्ट्रीय चुनाव की चोरी में झुलस रहा था



सबसे ऊँची चोटी से नीचे खंदकों में छलाँग लगाने की सोचते


ग़रीब सिपाहियों को देस बड़ा कब होता है गीत सुनाते


ठंड की बारिश में सिकुड़ते


कि हसरतें खत्म न हो जाएँ इस चाहत में तड़पते


डरते-डरते हर पल डरते


कि कभी तो लौटना ही होगा झुलसती धरती पर


कोई उपाय नहीं था कि कहीं विलीन हो सको


हमेशा के लिए छोटी चिड़िया की चीख सीने में समेटे


लाल्टू तुम वहाँ क्या कर रहे थे । (2019, ; कंचनजंघा ई-पत्रिका 2021)



At Pangthang




Normally it should be someone else there

I could remember them

Comment on their life

That at this age, wherever you are, you are alone

Anyway it was pretty cold there, when the rest of the country

was burning in the wrath of the sun

And the hijacking of a National election


Thinking of jumping down into the ditch from the highest peak


Singing the when does a country become great song to poor officers 

of the force

Shivering in the cold rain

Agonising over the wish that desires may prevail 

Afraid, every moment fearful

That I have to return one day to the burning below

There is no way to disappear forever

With the cry of the tiny bird in your heart

What were you doing there, Laltu.

Thursday, April 01, 2021

आज भी इंकलाब  मिलने नहीं आया।

 कोलकाता




रात के चौथे पहर कोलकाता मुझसे बतियाने आता है। थोड़ी देर बाद ट्राम की घंटी 


सुनाई देती है, मैं आँखें खोल कमरे की छत पर छिपकली की तरह लटका उसे 


देखता हूँ, वह रेंगता हुआ मुझे छोड़ चल देता है। हर रात कोई तोहफा मेरे लिए


छोड़ जाता है; मसलन आज उसने ऑर्फन-गंज मार्केट की कहानी रख दी। 


पढ़ते हुए मैं कीचड़ में छपाक सा फिसलता हूँ और मेरे घुटने काँप उठते हैं। ठीक 


उस वक्त निताई भिखमंगा अपनी बीबी के बगल से उठकर सरकता हुआ

 

मानसी का दिन भर का मैला बदन सूँघता है। अँधेरे में 36 नंबर ट्राम घंटी 


बजाते हुए खिदिरपुर आ पहुँचती है।




मैंने उसे कभी डगमगाते नहीं देखा। उसकी चाल मुझे उस हिपस्टर की याद 



दिलाती है, जिसका नाम न्यूयॉर्क है। सड़कें उसके कदमों के नीचे डगमगाती हैं। 




सुबह के थपेड़ों से पिटने के पहले ही मैं सो जाता हूँ। इस बीच दूकानें उवासी लेती



हुई हवाएँ निगलती हैं। ऊपर उलझे हुए टेलीफोन के तार मेरे सपनों में जाग उठते 



हैं। कोलकाता अपने माथे से ओंस की आखिरी बूँदें पोंछता है। कहीं कोई बादल



अचानक नीचे उतरता सिर पर चांटा मार जाता है। वह फिर भी नहीं डगमगाता।



हंँसता भी नहीं, बस अगली रात मुझे कैसा तोहफा देना है, सोचता हुआ गंगा की 



ओर चल देता है। ट्राम की घंटी को बसों-गाड़ियों के घर्र-घर्र आशिक घेर लेते हैं। 



उनकी ओर देखता वह एकबारगी कह उठता है - धस्सालाआज भी इंकलाब 



मिलने नहीं आया। (2010; कंचनजंघा ई-पत्रिका 2021)




Kolkata



It comes to chat with me in the last phase of night. A little later I 


hear the tram bells ringing, With eyes wide open I see it 



hanging upside down from the ceiling like a lizard; it crawls 



away leaving me behind. Every night it leaves a present for  



me; for instance, today it left the story of the Orphangunj 

 


market. I read it and slip splashing in the mud and my knees 



shiver. Right then Nitai the beggar moves from his wife’s 



side and slips away to breathe-in Manasi’s flesh carrying the 


 

day long filth. Number 36 tram arrives at Kidderepore in the 



dark ringing its bells.





I never saw it staggering. Its walk reminds me of the hipster 



called New York. The streets stagger beneath its feet. I fall 


 

asleep before the morning slaps me. In the mean while



shops yawn and breathe-in the wind. My dreams are awake in 



the telephone cables in the sky. Kolkata wipes the last drops  



of dew from its forehead. A cloud droops down at some-



which-where and hits him on the head. Yet it does not stagger. 



It does not smile either, merely walks away towards the 



Ganga wondeing what present it should bring me the next



morning. The Grrrr-Grrrr vehicles as lovers surround the tram 



bells. It looks at them and all of a sudden says, shit man! And today 


 

again Revolution did not turn up.


Friday, February 19, 2021

और तीन कविताएँ

 हाल में फेसबुक पर पोस्ट की कुछ कविताएँ 


नए साल के पहले कविता की हत्या


2021 का नया साल आने को है


कविता की हत्या करते हुए मैं फिर एक बार कहता हूँ


मुझे प्रधान मंत्री पसंद नहीं है


हर जमाने में यह काम कवियों को करना पड़ा है


कि वे सही बात कहने के लिए थोड़ी देर कविता को ज़मींदोज़ रखें


मुझे सिंघु बॉर्डर पर आए कलाकारों के गीत पसंद हैं


हालाँकि सूफी गायक ने कलाकारों की जगह किसान नेताओं पर बात करने को 

कहा है


किसानी पर काले कानून लागू हैं


और ये कानून गू जैसे गंदे हैं


वैसे तो गू गंदा नहीं होता


पर अंग्रेज़ी में मदरफकिंग लॉ-ज़ कहना मुमकिन है


हिन्दी में ऐसा कहने पर मुमकिन है कि संपादक नाराज़ हो जाएँ


मानता हूँ कि मैं डरपोक हूँ


इसलिए सिंघु बॉर्डर पर गीत सुनने जाने की हिम्मत मुझमें नहीं है


वहाँ आज रात 2 डिग्री तक तापमान होगा


गीत सुना सकता हूँ कि हर किसी की तरह किसान को भी जिस्मानी तपिश चाहिए


किसान भी जीना चाहता है




फिलहाल यही कि कविता में पहला लफ्ज़ 2021 होना ज़रूरी था


कि अडाणी-अंबानी-अंग्रेज़ी में गायब हो रहे भारत को याद रहे


कि शैतान का नाम लेते हुए कविता की हत्या ज़रूरी काम बन गया था।




Murdering a poem on New Year’s eve



2021 is round the corner


II Murder a poem and say it again


That I do not like the prime minister


Poets in every age have to do this


To say the right thing they bury poetry under the earth for a 


while


I like the songs that the artistes sing at the Singhu border


Though a Sufi singer has asked us to talk of the farmer 


leaders and not the singers


They have passed laws on farming


And these laws are filthy like shit


.


But of course shit is not filth


You can say motherfucking laws in English


Can’t say the same in Hindi for the editors do mind it


I accept that I am a coward


And I do not have the courage to go to the Singhu border to 

listen to the songs




It will be 2 degrees Celsius there tonight


I can sing that like everyone else the farmer also needs to keep their 

body warm


The farmer too wants to live




For now take it that 2021 must be the first word in the poem


That India of Adani-Ambani-Anglais should remember


That it was imperative to murder poetry thinking of the Satan.




विज्ञान में हिन्दी




प्यार में गलबँहियाँ नहीं, प्रेमालिंगन करती है।


काला को कृष्ण, गड्ढे को गह्वर कहती है।


जैसे कृष्ण के मुख-गह्वर में समाई सारी कायनात


गढ़ी गई हिन्दी में खो जाता है विज्ञान।


आस-पास बथेरे* काले गड्ढे हैं , ज़ुबान के, अदब के, इतिहास-भूगोल के

(*बहुतेरे)


(एक वैज्ञानिक ने तस्वीरें छापी हैं और वह एक स्त्री है


अँधेरे गड्ढों में फँसे लोग छानबीन में लगे हैं


कि किन मर्दों का काम इन तस्वीरों को बनाने में जुड़ा है)


ताज़िंदगी इनमें गिरे रहते हैं हम


एक दिन रोशनी आती है


कोई नहीं जानता फिर क्या होता है


इतिहास-भूगोल, विज्ञान, सब विलीन हो जाता है


भटकता रह जाता है प्यार और एक प्यारा काला-गड्ढा।


न बचता है विज्ञान और न हिन्दी बचती है।               - 2019




Hindi in Science




You do not hug with affection, you do the Sanskrit Premalingana


Black is Sanskrit Krishna, a pit is Sanskrit Gahwara


As the legend has that the creation was contained in the mukha-

gahwara of Lord Krishna


So is science lost forever in engineered Hindi.


There are numerous dark holes around, of langauge, of culture and 

of history and geography,


(A scientist, a woman, publishes pictures


Folks trapped in dark holes investigate for male names to go with 


the figures)



We fall and stay trapped in these holes lifelong


One day there is light


No one knows what happens then


History, geography, science, all disappear


Love goes astray and a pretty black hole remains.


Neither science nor Hindi survives.




रज़िया



उसमें पानी या आग


या ज़मीं की प्यास


या पौधों की जड़ें जो ज़मीं में दूर तक समाई हुई थीं


या ख़ून था जो अब तक कहीं मेरे-तुम्हारे जिस्म में बह रहा है




सल्तनत पर काबिज वह इश्क की मारी हुई थी


हिंद की सल्तनत, आलिमों-दानिशमंदों से भरा दरबार


और बीच बहती यमुना पर पूरनमासी का चाँद


और रज़िया और याकूत की धड़कनें




इसे सपना कह सकती हो


हजार साल के बाद और हो भी क्या सकता है




सपना हमारे इर्द-गिर्द चकराता है


औरत और उसका इश्क सरपट दौड़ते हैं




उनके अपने उनका पीछा करते हैं


और तुम तड़पती हो


कि किस अरबी घोड़े पर सवार होकर यमुना से दूर जाए


कैसे अपनी जान बचाए


उसके कपड़े फट गए हैं


वह दौड़ रही है


इसे सपना कह सकती हो




ऐसे सपने में जीना मानीख़ेज़ है


चाँद धीरज के साथ तुम्हें देखता है


साए गहराते जाते हैं


तुम्हारे अंदर रजिया दौड़ती है


इसे सपना कह सकती हो।                (2019)



Razia





In her aqua or fire


Or thirst for the Earth


Or roots of plants reaching deeper


Or may be the blood that flows in bodies yours and mine






Ruling the Sultanate she fell to love


Sultanate of Hind, the court full of the knowledgable and wise


And the full moon over the Yamuna river flowing across


and hearts beating – of Razia and Yaqoot






You could call it a dream


What else could it be after a thousand years






The dream roves around us


The woman and her love run and run






Their own are chasing them


And you feel the pain


Which Arabian horse must she ride to go away from the Yamuna


Oh, how will she save herself






Her clothes are tattered


She runs


You could call it a dream






Life acquires meaning in such dreams


The moon watches you with patience


The shadows get darker


Razia runs within you


You could call it a dream.




(From Wikipedia - Razia's ascension to the throne of Delhi was 


unique not only because she was a woman, but also because the


the support from the general public was the driving force behind 


 her  appointment ... Razia's proximity to an Abyssinian slave ... 


alienated the nobility and clerics and soon provoked open  


rebellion and conspiracy... It is argued that the rumors spread 

 


 by the nobles about her affair with Yaqut were false and was  


done so as to bring about her downfall)