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Location: हैदराबाद, आंध्र प्रदेश, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Wednesday, January 25, 2006

गणतंत्र दिवस मुबारक।

गणतंत्र दिवस मुबारक।

नमन उस संविधान को जो पूरी तरह लागू भले न हुआ हो या जिसे सुविधासंपन्न लोगों के सामूहिक षड़यंत्र ने सफल नहीं होने दिया, पर जो जैसा भी है दीगर मुल्कों के संविधानों से ज्यादा उदार, ज्यादा अग्रगामी और ज्यादा बराबरी के सिद्धांतों पर आधारित है। साथ ही नमन संविधाननिर्माताओं को, खास तौर पर बाबा साहब भीमराव अंबेदकर को जिन्होंने बेहतरीन मानव मूल्यों पर आधारित देश और समाज की कल्पना की।
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एक दिन

जुलूस
सड़क पर कतारबद्ध
छोटे -छोटे हाथ
हाथों में छोटे -छोटे तिरंगे
लड्डू बर्फी के लिफाफे

साल में एक बार आता वह दिन
कब लड्डू बर्फी की मिठास खो बैठा
और बन गया
दादी के अंधविश्वासों सा मजाक

भटका हुआ रीपोर्टर
छाप देता है
सिकुड़े चमड़े वाले चेहरे
जिनके लिए हर दिन एक जैसा
उन्हीं के बीच मिलता
महानायकों को सम्मान
एक छोटे गाँव में
अदना शिक्षक लोगों से चुपचाप
पहनता मालाएँ

गुस्से के कौवे
बीट करते पाइप पर
बंधा झंडा आस्मान में
तड़पता कटी पतंग सा
एक दिन को औरों से अलग करने को।
(१९८९- साक्षात्कारः १९९२)
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भाई प्रतीक,
माफी तो चलो हमने मान ली, पर यह बताओ कि अगर किसी बात के आगे ः-) का संकेत हो, तो उसका मतलब बुरा न मानो होली है जैसा कुछ नहीं होता क्या (तुम्हारी पीढ़ी की भाषा है भई)? मैंने तो अपनी बात के आगे यह लगाया था। शायद यह होली के दिन ही लागू होता हो ः-) ।
वैसे भई छेड़ते तो तुमलोग भी कम नहीं, मैं तो आमतौर से औरों की छेड़खानी का जवाब दे रहा होता हूँ।
यह तो बात ठीक नहीं कि पहले तो खुद छेड़ो और फिर खिंचाई हुई तो मम्मी मम्मी (अब फिर तो नहीं नाराज हो जाओगे भाई! थोड़ा बहुत छेड़ भी लेने दो यार!) मसिजीवी ने तो मुझे क्रेमलिन के मे डे परेड पर सलामी देता लाल सिपाही बना दिया था। पर मैं इतना भी नहीं परेशान हुआ। हालाँकि यह प्राब्लम तो उसी की है न कि हजारों भले लोगों को छोड़ कर उसने दोस्त बनाए हैं ऐेसे जो पाखंडी हैं। तुम तो यार मेरी जरा सी गलती पर ही नाराज हो गए।
वैसे यह बात चली तो एक गंभीर बात मसिजीवी जैसे मित्रों के लिए। भाई लोगों, अपने हर पाखंडी लाल मित्र के अनुपात में एक दस हजार की गिनती तो उनकी है जिन्होंने इंसान की बेहतरी के लिए ज़िंदगियाँ खपा दी हैं - अब सब बातें तो यहाँ लिखी नहीं जा सकतीं। दिल्ली के कालेज अध्यापक को सिर्फ इस प्रमाण के आधार पर एक अदालत ने फाँसी की सजा दी थी कि वह अपने भाई के साथ फ़ोन पर बात करते हुए संभवतः शायद (!) संसद पर आक्रमण के संदर्भ में हँस पड़ा था। इसके बाद निर्जन कारावास और सामाजिक बहिष्कार। शुक्र है कि कई दोस्तों के निरंतर संघर्ष (जिसमें एक बूँद इस पापी का है) और माननीय उच्च अदालत की संजीदगी से वह छूटा। इसलिए भाई पता नहीं किस बात से क्या सजा मिल जाए।

तो ऐसा है कि हम उन हजारों भले लोगों की तरफ भी देखें। कम से कम इतना तो सीख ही लें कि
(१) एक आदमी के बुरे होने से जिन सिद्धांतों को भुनाकर वह लूट मचाए हुए है, वे बुरे नहीं हो जाते
(२) बहुत ज्यादा ठीक लगने वाले सिद्धांतों को भुनाने वाले लुटेरे बड़ी जल्दी दिखने लगते हैं (इसके विपरीत बहुत बुरे लगने वाले सिद्धांतों का पक्ष ले रहे भले लोग भी अलग दिखते हैं पर भले विचारों को मानने वाले भले लोग कम दिखते हैं)।
(३) सामाजिक और राजनैतिक विचारों की आलोचना करते हुए हमें सामाजिक या सामूहिक संदर्भों में ही सोचना चाहिए - व्यक्तिगत संदर्भ जरुरी तो हैं (पर्सनल इज़ पोलिटिकल - निश्चित) पर उनकी गड़बड़ से व्यक्ति परिभाषित होता है न कि विचार या सिद्धांत।

वैसे अक्सर कई लोगों को ऐसी बातों से परेशानी होती है कि अगर आप बराबरी की बात कर रहे हो तो आपने गाड़ी क्यों ली है या आप शराब क्यों पीते हो। तो दोस्तों मैं भी उन पापियों में से हूँ जिसके पास गाड़ी भी है और जो शराब भी.....। (मसिजीवी को तो यही खाए जा रहा है कि उसने दो हजार रुपए गाड़ी की मरम्मत पर खर्च कर दिए) पर इस वजह से मेरी यह माँग कि औरों के पास भी गाड़ियाँ (अय्याशी नहीं, जरुरतों के लिए) होनी चाहिए गलत नहीं हो जाती। और यह तो बिलकुल ही नहीं कि आधी जनता जो प्राथमिक शिक्षा नहीं ले पा रही, उसे संविधान के सामान्य शिक्षा के सर्वव्यापीकरण (universalisation of elementary education) के निर्देश के मुताबिक शिक्षा मिलनी चाहिए। इत्यादि।

और रही बात पाखंडियों की, इस पर जरा खुल कर बात की जाए। नाम न लो, अ ब स द कह कर ही सही। दिमाग से बात तो निकले। हो सकता है कि हम इस प्रक्रिया में अपने बारे में भी कुछ सीख सकें।

अरे प्रतीक, मैं तो होली की सोच रहा था, कहाँ से कहाँ चला आया!

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8 Comments:

Blogger masijeevi said...

होली के बहाने दामन के दाग छिपाने ....

लाल्‍टू मित्र ।
आपकी तीनों सीख सर माथे- वैसे मैं पहले से ही इनका भरपूर पालन करने की कोशिश करता हूँ कितना सफल हो पाता हूँ यह नहीं कह सकता। इन 'पाखंडियो ' में और भले के साथ भले लोगों में भी मैनें अनेक मित्र पाए हैं ऐसों को भी जानता सराहता हूँ जो आजकल (सिद्धांतों की इस मंदी के दौर में भी) जिंदगी खपा दे रहे हैं। तुम न मानो तो तुम्‍हारी मर्जी पर यकीन जानो वे भी अरुंधती फजीहत में मेरे साथ ही रहे होंगे (यह बात दीगर है कि मेरे पूर्वग्रहों के स्‍वीकार और बिटिया की हीरो वरशिप की तुम्‍हारी मजबूरी के चलते तुम्‍हारी स्थिति मेरी तुलना में कठिन हो जाती है) बराबरी के सिद्धांत से असहमति आज भी पॉलिटिकल सुसाइड ही है पर उसके चैंपियन होने की घोषणा या यह चैंपियनशिप ताज अरुंधति (या इस या उस को) पहनाना मुझे बहुत उचित नहीं जान पड़ता।

वैसे चलते चलते- मैं भी उसी कॉलेज मैं पढ़ाता हूँ जिसमें जीलानी, तथा उस संघर्ष में मेरा भी बूंद भर साथ था ही- लेकिन चलते चलते उस संविधान को फिर नमन करें जो तमाम विक्षतीकरण के बावजूद उस लड़ाई में और अन्‍यथा भी न्‍याय की गुँजाइश छोड़ता है।

रही गाड़ी की बात तो 1997 की मारूति 800 है हेडलाइट ने कल जबाब दे दिया है (2000 में 140 जोड़ लो, इस महीने के 2140 हो गए)

11:52 pm, January 25, 2006  
Blogger Pratyaksha said...

बिलकुल सही !

प्रत्यक्षा

9:55 pm, January 26, 2006  
Blogger लाल्टू said...

मसिजीवी,
प्रत्यक्षा, तुम्हें नहीं मुझे सही कह रही हैं। ः-)

वैसे बॉस, इतना उत्तेजित क्यों हो जाते हो, एक सलाम ही तो कहा था, क्या चैंपियनशिप ताज वगैरह पर आ पहुँचे।
संजीदगी से प्रत्यक्षा के सही को आपस में बाँट लें, प्रतीक भी थोड़ा सही, थोड़ा तुम भी
और अरुंधती (मैं ई से ही लिखूँगा क्योंकि सुनने में ठीक लगता है, हालाँकि शब्दरुप के अनुसार भइया तुम ही ठीक हो) भी ठीक है भाई।

सबसे ज्यादा ठीक होने को लेकर लड़ाई हो सकती है, वह सेहरा मैं ही पहन लेता हूँ, क्यों!

11:43 pm, January 26, 2006  
Blogger Pratik said...

लाल्‍टू जी, आपकी बात बिल्‍कुल सही है कि मज़ाक करने का अधिकार सबको है। शायद मैं आपके मज़ाक को समझ नहीं सका, इसीलिये 'मम्‍मी-मम्‍मी' चिल्‍ला बैठा :) और इतनी तल्‍ख प्रतिक्रिया दी। इसलिये माफ़ी आपको नहीं, बल्कि मुझे मांगनी चाहिए। आखिर बालबुद्धि जो ठहरा। फिर भी आपने मुझसे माफ़ी मांग कर अपने बड़प्‍पन का ही परिचय दिया है।

2:08 am, January 27, 2006  
Blogger लाल्टू said...

वैसे इसी बहाने इतनी बातें हो गईं, जैसे जिनको शक था कि मसिजीवी को दो हजार औेर एक सौ चालीस का जोड़ आता है या नहीं, तो प्रत्यक्षा ने हमें बतला दिया कि बिल्कुल सही निकाला है उन्होंने हिसाब। अब इतनी बातों के बाद किसी भी वक्त मुझ पर सामूहिक हमला हो सकता है, मैं मोर्चाबंदी की सोच रहा हूँ।

2:44 am, January 27, 2006  
Blogger masijeevi said...

अब भइया तुम वैज्ञानिक और प्रत्‍यक्षा फाइनेंस सलाहकार इन दो प्रमाणपत्रों के बाद तों अपने हिसाब पर कोई शक नहीं ही होना चाहिए। :)

10:31 am, January 27, 2006  
Blogger लाल्टू said...

अमां मसिजीवी,
मैं चंडीगढ़ को बाय-बाय कहकर हैदराबाद कूच कर रहा हूँ, सोमवार को पौने तीन बजे नई दिल्ली स्टेशन पर हूँगा।
अब पुराना जमाना तो है नहीं कि कहने पर तुम दौड़ कर मिलने आ जाओ, पर मिल सको तो मिलना जरुर। एक तो तुम्हारी भूली शक्ल से दुबारा रुबरु हो लूँगा (रेलवे लाइन पर प्रकाश सीधी रेखा पर चलता है या नहीं, बलॉग पर तुम्हारी तस्वीर देखकर शक होता है।) मैं चंडीगढ़ से जन शताब्दी से आऊँगा। कोच शायद सी-२ है (ए सी चेयर) और फिर ए पी एक्सप्रेस से पाँच पैंतालीस पर रवाना हूँगा (उसका कोच ए-१ - टू टायर ए सी है)। मेरी पाँच साल पुरानी शक्ल सुनील जी के सौजन्य से www.kalpana.it/hindi/lekhan/laltu/index.htm पर है। इसके अलावा रवि रतलामी ने अपनी टिप्पणी में एक लीनक्स फॉर यू मैगजीन का संदर्भ दिया था, वहाँ भी अपन हाल के थोबड़े के साथ मौजूद हैं। मैं खुद अब मुखश्री अपलोड नहीं कर सकता कर्टसी हमारे सर्भर मैनेजर, जिन्होंने इमेजेस ब्लॉक कर दिया है और मेरे चिट्ठा पोस्टिंग के दौरान टूल बारे गायब हो गइल। यह चंडीगढ़ छोड़ने का तीन सौ तैंतालीसवाँ कारण है। बाकी चाहो तो मुझे laltu@pu.ac.in या laltu10@gmail.com पर ई-चिट्ठी भेज सकते हो।

11:48 pm, January 27, 2006  
Blogger प्रदीप ममगाईं said...

Maza aa gaya aapkaa blog dekhkar

1:05 am, January 30, 2006  

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