Sunday, October 24, 2010

अरविन्द गुप्ता के बहाने


अरविन्द से मेरी पहली मुलाकात १९७९ में हुई थी. हमलोग आई आई टी कानपुर से आई आई टी बाम्बे के सांस्कृतिक उत्सव मूड इंडिगो में भाग लेने जा रहे थे. मैं हिंदी डीबेट के लिए जा रहा था (और मुझे इसमें पहला पुरस्कार भी मिला था :-) ) उस टीम में कई बढ़िया लोग थे. शास्त्रीय संगीत में भीमसेन जोशी का शिष्य नरेन्द्र दातार था, जो इन दिनों कहीं कनाडा में बसा है. वायोलिन बजाने वाला राजय गोयल मेरा बड़ा ही प्रिय था. पता नहीं इन दिनों वह कहाँ है, मैं उन दिनों स्टूडेंट्स सीनेट का सदस्य था और सीनेट का कन्वीनर एम् टेक का विद्यार्थी संजीव भार्गव हमारे साथ था, जो बाद में जबलपुर में इन्फौर्मेशन टेक्नोलोजी और मेटलर्जी वाले संस्थान का निर्देशक बना. अभी पिछले साल उसका देहांत हो गया.
रास्ते में बी टेक वाले स्टूडेंट्स तरह तरह के खेल खेलते रहे. मैंने उनसे काऊस एंड बुल्स वाला खेल सीखा, आज तक जहां भी जिसको भी मैंने यह खेल सिखाया है, उसको कुछ समय तक तो ज़रूर ही इस खेल का नशा हो जाता है (एक मित्र के साथ डाक के जरिए साल भर हमारा यह खेल चलता रहा जब हम भारत में थे और मित्र अमरीका में!) .
तो शायद पूना के पास कहीं से गाड़ी जा रही थी और किसी स्टेशन से एक निहायत ही विक्षिप्त सा दिखता व्यक्ति डिब्बे में आया. संजीव भार्गव ने परिचय दिया कि वह अरविन्द गुप्ता है और कि वे बी टेक के दौरान क्लासमेट थे. अरविन्द उन दिनों नेल्को में काम कर रहा था. संजीव और अरविन्द मुझसे चारेक साल बड़े रहे होंगे. अरविन्द ने हमें बतलाया कि वह शिक्षा के क्षेत्र में मध्य प्रदेश में काम कर रही संस्था किशोर भारती के साथ जुड़ा है. फिर उसने अपना पिटारा खोला जो उन दोनों छोटा होता था और बहुत बाद में जब इस पिटारे क़ी ख्याति काफी बढ़ चुकी थी, यह काफी बड़ा हो चुका था. फिर उसने उन बच्चों के बारे में बतलाया जो दिनभर सिर्फ पानी पीकर रहते थे - ऐसे बच्चों के लिए वह दियासलाई क़ी बुझी तीलियों और साइकल वाल्व ट्यूब से विज्ञान शिक्षा के लिए काम कर रहा था. मैं यह सब देख कर बहुत परेशान हुआ था. मैं उन दिनों इक्कीस साल का था और इंकलाबी राजनैतिक सोच के अलावा कुछ भी मानने को तैयार न था. अरविन्द ने शायद यह बतलाया था कि वह सस्ते संसाधनों से मकान बनाने वाले लौरी बेकर के साथ काम करने क़ी सोच रहा था. बाद में उसने लौरी बेकर के साथ लम्बा वक़्त गुजारा और अपने इस अनुभव को वह बहुत महत्वपूर्ण मानता है. इसके दो तीन साल बाद इंडिया टूडे में किशोर भारती पर आई एक रिपोर्ट में उसके बारे में मैंने पढ़ा. इस बार मैं इतना प्रभावित हुआ कि सोच लिया कि देश लौटने पर ऐसे संगठनों के साथ जुड़ना है. कई सालों बाद बनखेड़ी में किशोर भारती में ही अरविन्द के साथ फिर मुलाक़ात हुई. तब तक विक्षिप्त भाव काम हो गया था, पर विरागी योगियों जैसी मुद्रा अब भी थी.
एक बार किसी मीटिंग के बाद भोपाल से लौटते हुए मैं और अरविन्द स्टेशन पर फँस गए. घोड़ाडोमरी के पास कहीं किसी दुर्घटना की वजह से ट्रेन सारी रात नहीं आयी. मैं और अरविन्द स्टेशन से बाहर ढाबे में खाना खाने गए. मुझे पेट की चिंता थी कि उस बेकार से दीखते ढाबे की दाल पचेगी या नहीं, पर अरविन्द निश्चिंत होकर खाते रहे और मुझे भी लाचार होकर किसी तरह झेलना पडा. अरविन्द के साथ होने का सुख था, बहुत सारी बातचीत जो अब पूरी तरह याद नहीं, पर स्मृति में वह उत्तेजना है, जो उससे बातें कर होती थी. इसके बाद लगातार संपर्क रहा और इधर उधर मुलाक़ात हो ही जाती थी. एक बार पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, में विशिष्ठ भाषण के लिए हमलोगों ने उसे बुलाया - वह भाषण कम था और बच्चों के लिए मजेदार वर्कशाप ज्यादा था जिसमें बड़ों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया. यह अरविन्द का स्टाइल है. अरविन्द के साथ कुछ काम करने का मौक़ा भी मिला. एक बार रविवारी पत्रिका में मेरी एक कहानी छपी (एक और नरिंदर) तो साथ में अरविन्द का कालम भी था. इस तरह बात चीत होती रहतीपिछले हफ्ते थर्ड वर्ल्ड साइंस अकादमी क़ी सभा के दौरान अरविन्द प्रधान मंत्री से सम्मानित होने के लिए हैदराबाद आया था. इसी अवसर पर हमारे संस्थान में अरविंद को विशिष्ठ व्याख्यान के लिए बुलाया गया. संयोग से हमारे निर्देशक और अरविन्द भी बी टेक में क्लासमेट थेअरविंद ने मिलते ही प्यार से गले लगाया।
अरविन्द ने अपनी जीवन यात्रा और विज्ञान शिक्षा के लिए अनोखे खिलौनों के बारे में बतलाया और बाद में एक वर्कशाप भी क़ी. इस दौरान अपने कई अनोखे अनुभवों को भी हमारे साथ साझा किया. किस तरह शंकर गुहा नियोगी से मिल कर इंकलाबी सोच से ओत प्रोत हुए - ऐसी कई बातें कुछेक नितांत ही निजी बातें जिनको वह बच्चों की तपह हमें सुनाता रहा.अरविन्द के अनगिनत कामों में एक पुस्तक है 'कबाड़ से जुगाड़', जो लाखों की तादाद में प्रकाशित हुई और बँटी है. इन दिनों वह पूना में आई यू सी ए यानी इंटर यूनीवर्सिटी सेंटर फार ऐस्ट्रोनोमी ऐंड ऐस्ट्रोफिज़िक्स में कार्यरत है. उसके वेबसाईट पर उसके काम पर और जानकारी उपलब्ध है. इच्छुक मित्र अवश्य देखें.

2 comments:

simplyani said...

बड़ा अच्छा लगा सर पढ़ के. उम्र के इस पड़ाव तक आते आते आदमी कितने रिश्तों का धनी हो जाता है. बचपन में जिन लोगों से सम्बन्ध स्थापित हुए हों, उन लोगों की जीवन कथा को अपने सामने घटते हुए देखना... फिर आपके मित्रों की तरह के achievers हों तो बात ही क्या!

मैं भी पचीस तीस साल बाद शायद कहीं लिख रहा हूँगा, कि एक्स के इतने पेटेंट हैं, वाई यहाँ का निदेशक और ज़ेड वहां का सी ई ओ है. मेरे रूम से जो बोतलें बरामद हुई थीं, उनमें से एक -एक इनकी भी थी...

जोशिम said...

बहाने में बड़े नाम निकले / यादें निकलीं- अरविन्द जी पर कबाड़खाना में भी एक पोस्ट थी - (http://kabaadkhaana.blogspot.com/2010/05/blog-post_27.html). उनका काम - बड़े समर्पण जीवट और लगन का काम -. मालूम नहीं था वो प्रो. संगल के साथ के हैं. प्रो संगल हमारे समय CS के HOD थे.

काउज़ एंड बुल्स के अलावा एक ज़माने ब्रिज का भी बड़ा उधम था - रूम मेट का एक घंटा खेलना और चार घंटे बकैती से व्याख्या और गरियाना याद आता है.

हिन्दी डिबेट से याद आया अमूमन आई आई टी कानपुर में हिन्दी का काम कम ही होता था हमारे समय - अधिकतर स्किट में फट्टे बाज़ी तक.

विवेक (८२-८६), अमित (८३-८७) और तपन (८४-८८) कुछ जुझारू रहे थे पत्रिका और कार्यक्रम बनाने में - हॉल ३ में हॉलमैग में हिंदी परिशिष्ट के बाद अमित ने अभिव्यक्ति नाम से एक साइक्लोस्टाइल पत्रिका निकाली थी हिंदी लिट की. फ़िर तपन ने नीहारिका. विवेक के साथ हम लोगों ने पहली बार कल्फेस्ट में हिंदी जैम और हिंदी रैग मैग कार्यक्रम में लगवाए थे, बजट में भी - सीनेट की बजट कमिटी में होने का फायदा - तब बड़ा मज़ा आया था - हिंदी जैम बड़ा लोकप्रिय हुआ था खासकर [ और आज कल ब्लॉग का नाम उसी रैग मैग पर है]

गिरिराज किशोर जी तब थे और एक बार नंदन जी को भी ले कर आये थे. फेस्टिवल में हिन्दी रचनात्मक लेखन का निर्णय वही करते थे.

बहुत दिनों बाद शंकर गुहा नियोगी जी के बारे में पढकर भी अच्छा लगा- उन का सा व्यक्तित्व संकल्प और नेतृत्व - सादा, मेधावी, सरल और मज़बूत जो सामजिक विषमता के बाहरी और अंदरी कारणों को हटाने में एकजुट था, ज़मीन से जुड़ा - अब देखने में कम आता है. एक समय (डल्ली राजहरा के चलते) वे रीवा जेल में रखे गए थे - जब रिहा हुए थे तो जाने से पहले एक दिन हमारे घर भी रहे थे