Friday, August 27, 2010

भाई गौतम तुम भी हमारी फौज में शामिल हो जाओ

प्रिय गौतम, ख़ुशी मेरी कि तुम मेरी कविताएँ पढ़ते हो। तुम्हारी पहली टिप्पणी से वैसे मुझे कोई चोट पहुंचनी नहीं चाहिए क्योंकि हिन्दी रचना संसार में गाली गलौज आम बात है। मैं इससे बचा हुआ हूँ क्योंकि मुझे अभी तक सामान्य कवि लेखक ही माना गया है और मैं तमाम विशेषण जो बाज़ार में चल रहे हैं उनके उपयुक्त नहीं माना गया होऊंगा ।

भाई, तुम मेरी कविताएँ पढ़ते हो तो उनमें क्या पढ़ते हो? मैंने तो आज नहीं, जैसा कि मेरी दस साल पुरानी कविता से तुमने देखा ही होगा (पिछले चिट्ठे में, जिस पर तुमने दूसरी टिप्पणी की है), हमेशा ही जंग विरोधी बातें कही हैं। यह भी मेरी ही सीमा है कि तुमने मेरी रचनाओं में इस बात को पढ़ा नहीं। मेरे पिछले सभी blogs को कभी पढ़ लेना तो भी स्पष्ट हो जायेगा कि मैं तो मनुष्य मनुष्य के बीच हिंसा का कट्टर विरोधी हूँ। खासकर जब यह हिंसा संगठित ढंग से ताकतवरों द्वारा संचालित हो।

मैं देश नामक उस धारणा का भी विरोधी हूँ जिसके नाम पर सैनिकों को जान कुर्बान करनी पड़ती है। एक सैनिक के मरने या घायल होने पर सरकार उसे पुरस्कार दे दे या उसे धन दे दे तो तो उस क्षति कि पूर्ति नहीं होती जो एक बाप या भाई या आजकल माँ या बहन के अचानक दुनिया से कूच कर जाने से या घायल होने से हुई होती है।

मेरे लिए तो देश मेरी ज़मीन, हवा, पानी है। वह कभी खिड़की से दिखने तक सीमित है तो कभी धरती से भी परे न जाने किस अनंत तक फैली है। मुझे पता है कि तुम कहोगे कि इस ज़मीन, हवा पानी को बचाने के लिए ही तो सेना की ज़रुरत है। मैं इनकार नहीं करता कि इस तरह की एक कल्पना ही आज मूर्त रूप से हमारे सामने है कि इंसान इंसान के खिलाफ हिंसक है और बचने के लिए हमें सेनाओं की ज़रुरत है। मैं चाहता हूँ कि एक और कल्पना जो अधिक संभव होनी चाहिए कि इंसान इंसान से प्यार करता है सबको मान्य हो। और मैं देखता हूँ कि अब तक सेनाओं का उपयोग शासकों ने इंसान का नुक्सान करने के लिए ही किया है।

मैं दुबारा यही लिखूंगा कि सेनाएँ हिन्दोस्तान में या पकिस्तान में कहीं भी मानवता की रक्षा करने के लिए नहीं बनाई जातीं। देश नामक अमूर्त कुछ के लिए मरना और कुछ भी हो आखिर है तो मरना ही. इस सत्य की भयावहता अपने आप में ही अमानवीय है - इसलिए जब तनाव तीव्र हो तो सिपाही इधर का हो या उधर का हो, वह एक क्रूर दानव ही होता है. ... हर इंसान में दानव बनने की संभावना होती है - सेनाओं का वजूद इसी संभावना पर टिका है. जब हम किसी एक सेना को दूसरी सेना से बेहतर मानते हैं, हमारे अन्दर भी एक दानव ही बोल रहा होता है.

तो भाई तुम्हारे सैनिक को अलग रख कविता पाठक को सजग करो तो शायद वह तस्वीर देख पाओगे जो हम देखते हैं। तुम्हें तकलीफ तो होगी कि हम तुम्हारे देखी तस्वीरें नहीं देखते या देखना चाहते पर क्या करें अपनी चाहतों से मजबूर हैं। बहुत ज्यादा प्यार की चाहत है भाई, इसलिए हमें मणिपुरी भी और पाकिस्तानी भी सभी से प्यार है। अगर उनमें से कोई मुझसे नफरत करता है तो मैं समझ सकता हूँ कि उनके पीछे क्या वजहें हैं, कभी तुम भी समझने की कोशिश करो तो शायद हमारी देखी तस्वीर देख पाओ, नहीं देखना चाहो तो भी ठीक है। इतना ही कर लो कि जो देख रहे हो वह सब को बतलाते रहो।

खुशी मेरी यह भी कि मेरे पक्ष में भी एक फौज है और वह छोटी नहीं बहुत भारी फौज है। मैं तो उस फौज का एक साधारण सदस्य हूँ। बहुत दीवानगी है, लोग जान पर खेल कर प्यार की बात करने को मैदान में उतरे हुए हैं। उनको कोई तनखाह नहीं मिलती, वो मेरी जैसी बातें लिख कर खुशी में खोने वाले नहीं, वे कर्मवीर हैं। मैं यही उम्मीद रखूंगा कि तुम भी हमारी फौज में शामिल हो जाओ।

4 comments:

गौतम राजरिशी said...

नमन है सर,

ये तो मेरे लिये इतराने वाली बात हो गयी कि मेरे प्रिय कवि ने मुझे संबोधित कर पूरी की पूरी एक पोस्ट लिख डाली। आपने लिखा कि "तुम्हारी पहली टिप्पणी से वैसे मुझे कोई चोट पहुंचनी नहीं चाहिए क्योंकि हिन्दी रचना संसार में गाली गलौज आम बात है"...लेकिन मैंने तो "संवेदनशील" शब्द के आगे महज एक "कथित" विशेषण जोड़ा था, गाली कहीं से नहीं दी थी और तिस पर भी आपको बुरा लगा उसके लिये अलग से माफी भी माँग ली। आपने तो मेरे तमाम भाई-बंधुओं को दानव और राक्षस की संग्या दे डाली, तनिक तिलमिलाने का हक तो आपके इस अदने-से पाठक का भी बनता है।और बाद के पोस्ट में मेरे "मेजर" रैंक को जिस तरह से विशेषण बना कर प्र्स्तुत कर रहे हैं आप, वो भी स्पष्ट है। हँसी आ गयी अपने प्रिय कवि की इस हरकत पर।

आप कहते हैं कि आप तो मनुष्य-मनुष्य के बीच हिंसा के कट्टर विरोधी हैं और जाहिर है आपकी कविता से भी यही जाहिर होता है...किंतु पहली पोस्ट जिस पर मैंने टिप्पणी की थी और जो आपको गाली सम लगी, उसमें आपका कथन तो मनुष्य-विरोधी प्रतित होता है। नब्बे प्रतिशत सैनिक जब सेना में भर्ती होता है तो वो किसी देशभक्ति के जुनून में नहीं, बल्कि रोजगार और पेट की खातिर शामिल होता है..ठीक उसी तरह जैसे कोई कलर्क या फिर म्युनिसिपैलिटी का कर्मचारी होता है। लेकिन आपने उन तमाम सैनिकों को भी राक्षस की श्रेणी में गिन लिया। मेरी टिप्पणी की वजह भी यही थी कि एक जनकवि इतना संकीर्ण कैसे सोच सकता है....

अपने हिस्से का सच मैं भी यत्र-तत्र बताने की जोहमत करते रहता हूँ सर। अब मेरी लेखनी आपकी तरह सशक्त तो है नहीं और न ही मेरे पास आप जैसा बिम्बों का प्रचूर भंडार है...कभी समय निकाल कर मेरे अदने से ब्लौग पर नजर डालियेगा। कुछ ग़ज़लें और इक्का-दुक्का कहानियाँ हंस, पाखी आदि पत्रिकाओं में छप जाती हैं....हाशिये पर हूं, फिर भी कोशिश करता हूं कि इन दानवों और राक्षसों के पक्ष का सच भी इन ग़ज़लों और कहानियों के माध्यम से बाहर आये। संभव हो तो पाखी के जून अंक में छपी मेरी तुच्छ-सी कहानी पर नजर डालियेगा।

कविता का समर्पित पाठक हूँ और इस बात पे घमंड भी करता हूँ। आप जैसी कविता लिखने का सऊर भले ही न हो मुझे, लेकिन कविता पढ़ने की अच्छी तहजीब है। विश्व पुस्तक मेले में जब आप अपनी "लोग ही चुनेंगे रंग" की प्रतियां यूं ही वितरित कर रहे थे अपने मित्रों और आलोचकों में, जिनमें से कई लोगों ने उसे सरसरी तौर पर देखा भी नहीं होगा अब तक(और ये सच आप भी जानते हैं)...उसी मेले के बाद आपका ये पाठक रिक्शे पर शाहदरा की गलियां छान रहा था शिल्पायन के गुमशुदा दुकान की तलाश में और वहाँ पहुंचने पर ललित जी बताते हैं कि किताब तो है ही नहीं, फैक्टरी से जो किताब मिली वो लाल्टू जी ने बाँटने के लिये उठा ली...शेष प्रतियां एक महीने बाद मिलेगी। मेरी झुंझलाहट का अंदाजा लगा सकते हैं आप। फिर उन्हें एडवांस देकर आया और उनकी कृपा से मेरी प्रति डाक द्वार कश्मीर के इस सुदूर पहाड़ी पर पहुंची। ...तो आपकी कविता इस तरह भी पढ़ी जाती है सर। कई दिनों से "लोग ही चुनेंगे रंग" की समीक्षा ड्राफ्ट में लिख कर रखी हुई जो जल्द ही ब्लौग पर डालने वाला हूँ।

कम-से-कम कविता कैसे पढ़ी जाती वो तो मुझे अपने कवि से नहीं सीखना पड़ेगा। अपने दानवी और राक्षसी क्रिया-कलापों से बचे समय में खुद के लिये कविता से मिलना अलग से रखता हूँ।

आपका निमंत्रण सर-आँखों पर, लेकिन हैरान हूँ कि एक राक्षसी-प्रवृति वाले को आप अपनी फौज में शामिल करना चाहेंगे। क्या महज इसलिये कि वो आपकी कविता पढ़ता है?

अंत में, आपकी ही एक कविता की चंद पंतियाँ याद आ रही हैं। कुछ यूं थी ना:-
"बाहर लू चलने को है
जो कमरे में बंद हैं,
किस्मत उनकी...
कैद में ही सुकून...."

गौतम राजरिशी said...

नमन है सर,

ये तो मेरे लिये इतराने वाली बात हो गयी कि मेरे प्रिय कवि ने मुझे संबोधित कर पूरी की पूरी एक पोस्ट लिख डाली। आपने लिखा कि "तुम्हारी पहली टिप्पणी से वैसे मुझे कोई चोट पहुंचनी नहीं चाहिए क्योंकि हिन्दी रचना संसार में गाली गलौज आम बात है"...लेकिन मैंने तो "संवेदनशील" शब्द के आगे महज एक "कथित" विशेषण जोड़ा था, गाली कहीं से नहीं दी थी और तिस पर भी आपको बुरा लगा उसके लिये अलग से माफी भी माँग ली। आपने तो मेरे तमाम भाई-बंधुओं को दानव और राक्षस की संग्या दे डाली, तनिक तिलमिलाने का हक तो आपके इस अदने-से पाठक का भी बनता है।और बाद के पोस्ट में मेरे "मेजर" रैंक को जिस तरह से विशेषण बना कर प्र्स्तुत कर रहे हैं आप, वो भी स्पष्ट है। हँसी आ गयी अपने प्रिय कवि की इस हरकत पर।

आप कहते हैं कि आप तो मनुष्य-मनुष्य के बीच हिंसा के कट्टर विरोधी हैं और जाहिर है आपकी कविता से भी यही जाहिर होता है...किंतु पहली पोस्ट जिस पर मैंने टिप्पणी की थी और जो आपको गाली सम लगी, उसमें आपका कथन तो मनुष्य-विरोधी प्रतित होता है। नब्बे प्रतिशत सैनिक जब सेना में भर्ती होता है तो वो किसी देशभक्ति के जुनून में नहीं, बल्कि रोजगार और पेट की खातिर शामिल होता है..ठीक उसी तरह जैसे कोई कलर्क या फिर म्युनिसिपैलिटी का कर्मचारी होता है। लेकिन आपने उन तमाम सैनिकों को भी राक्षस की श्रेणी में गिन लिया। मेरी टिप्पणी की वजह भी यही थी कि एक जनकवि इतना संकीर्ण कैसे सोच सकता है....

अपने हिस्से का सच मैं भी यत्र-तत्र बताने की जोहमत करते रहता हूँ सर। अब मेरी लेखनी आपकी तरह सशक्त तो है नहीं और न ही मेरे पास आप जैसा बिम्बों का प्रचूर भंडार है...कभी समय निकाल कर मेरे अदने से ब्लौग पर नजर डालियेगा। कुछ ग़ज़लें और इक्का-दुक्का कहानियाँ हंस, पाखी आदि पत्रिकाओं में छप जाती हैं....हाशिये पर हूं, फिर भी कोशिश करता हूं कि इन दानवों और राक्षसों के पक्ष का सच भी इन ग़ज़लों और कहानियों के माध्यम से बाहर आये। संभव हो तो पाखी के जून अंक में छपी मेरी तुच्छ-सी कहानी पर नजर डालियेगा।

कविता का समर्पित पाठक हूँ और इस बात पे घमंड भी करता हूँ। आप जैसी कविता लिखने का सऊर भले ही न हो मुझे, लेकिन कविता पढ़ने की अच्छी तहजीब है। विश्व पुस्तक मेले में जब आप अपनी "लोग ही चुनेंगे रंग" की प्रतियां यूं ही वितरित कर रहे थे अपने मित्रों और आलोचकों में, जिनमें से कई लोगों ने उसे सरसरी तौर पर देखा भी नहीं होगा अब तक(और ये सच आप भी जानते हैं)...उसी मेले के बाद आपका ये पाठक रिक्शे पर शाहदरा की गलियां छान रहा था शिल्पायन के गुमशुदा दुकान की तलाश में और वहाँ पहुंचने पर ललित जी बताते हैं कि किताब तो है ही नहीं, फैक्टरी से जो किताब मिली वो लाल्टू जी ने बाँटने के लिये उठा ली...शेष प्रतियां एक महीने बाद मिलेगी। मेरी झुंझलाहट का अंदाजा लगा सकते हैं आप। फिर उन्हें एडवांस देकर आया और उनकी कृपा से मेरी प्रति डाक द्वार कश्मीर के इस सुदूर पहाड़ी पर पहुंची। ...तो आपकी कविता इस तरह भी पढ़ी जाती है सर। कई दिनों से "लोग ही चुनेंगे रंग" की समीक्षा ड्राफ्ट में लिख कर रखी हुई जो जल्द ही ब्लौग पर डालने वाला हूँ।

कम-से-कम कविता कैसे पढ़ी जाती वो तो मुझे अपने कवि से नहीं सीखना पड़ेगा। अपने दानवी और राक्षसी क्रिया-कलापों से बचे समय में खुद के लिये कविता से मिलना अलग से रखता हूँ।

आपका निमंत्रण सर-आँखों पर, लेकिन हैरान हूँ कि एक राक्षसी-प्रवृति वाले को आप अपनी फौज में शामिल करना चाहेंगे। क्या महज इसलिये कि वो आपकी कविता पढ़ता है?

अंत में, आपकी ही एक कविता की चंद पंतियाँ याद आ रही हैं। कुछ यूं थी ना:-
"बाहर लू चलने को है
जो कमरे में बंद हैं,
किस्मत उनकी...
कैद में ही सुकून...."

गौतम राजरिशी said...

नमन है सर,

ये तो मेरे लिये इतराने वाली बात हो गयी कि मेरे प्रिय कवि ने मुझे संबोधित कर पूरी की पूरी एक पोस्ट लिख डाली। आपने लिखा कि "तुम्हारी पहली टिप्पणी से वैसे मुझे कोई चोट पहुंचनी नहीं चाहिए क्योंकि हिन्दी रचना संसार में गाली गलौज आम बात है"...लेकिन मैंने तो "संवेदनशील" शब्द के आगे महज एक "कथित" विशेषण जोड़ा था, गाली कहीं से नहीं दी थी और तिस पर भी आपको बुरा लगा उसके लिये अलग से माफी भी माँग ली। आपने तो मेरे तमाम भाई-बंधुओं को दानव और राक्षस की संग्या दे डाली, तनिक तिलमिलाने का हक तो आपके इस अदने-से पाठक का भी बनता है।और बाद के पोस्ट में मेरे "मेजर" रैंक को जिस तरह से विशेषण बना कर प्र्स्तुत कर रहे हैं आप, वो भी स्पष्ट है। हँसी आ गयी अपने प्रिय कवि की इस हरकत पर।

आप कहते हैं कि आप तो मनुष्य-मनुष्य के बीच हिंसा के कट्टर विरोधी हैं और जाहिर है आपकी कविता से भी यही जाहिर होता है...किंतु पहली पोस्ट जिस पर मैंने टिप्पणी की थी और जो आपको गाली सम लगी, उसमें आपका कथन तो मनुष्य-विरोधी प्रतित होता है। नब्बे प्रतिशत सैनिक जब सेना में भर्ती होता है तो वो किसी देशभक्ति के जुनून में नहीं, बल्कि रोजगार और पेट की खातिर शामिल होता है..ठीक उसी तरह जैसे कोई कलर्क या फिर म्युनिसिपैलिटी का कर्मचारी होता है। लेकिन आपने उन तमाम सैनिकों को भी राक्षस की श्रेणी में गिन लिया। मेरी टिप्पणी की वजह भी यही थी कि एक जनकवि इतना संकीर्ण कैसे सोच सकता है....

अपने हिस्से का सच मैं भी यत्र-तत्र बताने की जोहमत करते रहता हूँ सर। अब मेरी लेखनी आपकी तरह सशक्त तो है नहीं और न ही मेरे पास आप जैसा बिम्बों का प्रचूर भंडार है...कभी समय निकाल कर मेरे अदने से ब्लौग पर नजर डालियेगा। कुछ ग़ज़लें और इक्का-दुक्का कहानियाँ हंस, पाखी आदि पत्रिकाओं में छप जाती हैं....हाशिये पर हूं, फिर भी कोशिश करता हूं कि इन दानवों और राक्षसों के पक्ष का सच भी इन ग़ज़लों और कहानियों के माध्यम से बाहर आये। संभव हो तो पाखी के जून अंक में छपी मेरी तुच्छ-सी कहानी पर नजर डालियेगा।

कविता का समर्पित पाठक हूँ और इस बात पे घमंड भी करता हूँ। आप जैसी कविता लिखने का सऊर भले ही न हो मुझे, लेकिन कविता पढ़ने की अच्छी तहजीब है। विश्व पुस्तक मेले में जब आप अपनी "लोग ही चुनेंगे रंग" की प्रतियां यूं ही वितरित कर रहे थे अपने मित्रों और आलोचकों में, जिनमें से कई लोगों ने उसे सरसरी तौर पर देखा भी नहीं होगा अब तक(और ये सच आप भी जानते हैं)...उसी मेले के बाद आपका ये पाठक रिक्शे पर शाहदरा की गलियां छान रहा था शिल्पायन के गुमशुदा दुकान की तलाश में और वहाँ पहुंचने पर ललित जी बताते हैं कि किताब तो है ही नहीं, फैक्टरी से जो किताब मिली वो लाल्टू जी ने बाँटने के लिये उठा ली...शेष प्रतियां एक महीने बाद मिलेगी। मेरी झुंझलाहट का अंदाजा लगा सकते हैं आप। फिर उन्हें एडवांस देकर आया और उनकी कृपा से मेरी प्रति डाक द्वार कश्मीर के इस सुदूर पहाड़ी पर पहुंची। ...तो आपकी कविता इस तरह भी पढ़ी जाती है सर। कई दिनों से "लोग ही चुनेंगे रंग" की समीक्षा ड्राफ्ट में लिख कर रखी हुई जो जल्द ही ब्लौग पर डालने वाला हूँ।

कम-से-कम कविता कैसे पढ़ी जाती वो तो मुझे अपने कवि से नहीं सीखना पड़ेगा। अपने दानवी और राक्षसी क्रिया-कलापों से बचे समय में खुद के लिये कविता से मिलना अलग से रखता हूँ।

आपका निमंत्रण सर-आँखों पर, लेकिन हैरान हूँ कि एक राक्षसी-प्रवृति वाले को आप अपनी फौज में शामिल करना चाहेंगे। क्या महज इसलिये कि वो आपकी कविता पढ़ता है?

अंत में, आपकी ही एक कविता की चंद पंतियाँ याद आ रही हैं। कुछ यूं थी ना:-
"बाहर लू चलने को है
जो कमरे में बंद हैं,
किस्मत उनकी...
कैद में ही सुकून...."

गौतम राजरिशी said...

नमन है सर,

ये तो मेरे लिये इतराने वाली बात हो गयी कि मेरे प्रिय कवि ने मुझे संबोधित कर पूरी की पूरी एक पोस्ट लिख डाली। आपने लिखा कि "तुम्हारी पहली टिप्पणी से वैसे मुझे कोई चोट पहुंचनी नहीं चाहिए क्योंकि हिन्दी रचना संसार में गाली गलौज आम बात है"...लेकिन मैंने तो "संवेदनशील" शब्द के आगे महज एक "कथित" विशेषण जोड़ा था, गाली कहीं से नहीं दी थी और तिस पर भी आपको बुरा लगा उसके लिये अलग से माफी भी माँग ली। आपने तो मेरे तमाम भाई-बंधुओं को दानव और राक्षस की संग्या दे डाली, तनिक तिलमिलाने का हक तो आपके इस अदने-से पाठक का भी बनता है।और बाद के पोस्ट में मेरे "मेजर" रैंक को जिस तरह से विशेषण बना कर प्र्स्तुत कर रहे हैं आप, वो भी स्पष्ट है। हँसी आ गयी अपने प्रिय कवि की इस हरकत पर।

आप कहते हैं कि आप तो मनुष्य-मनुष्य के बीच हिंसा के कट्टर विरोधी हैं और जाहिर है आपकी कविता से भी यही जाहिर होता है...किंतु पहली पोस्ट जिस पर मैंने टिप्पणी की थी और जो आपको गाली सम लगी, उसमें आपका कथन तो मनुष्य-विरोधी प्रतित होता है। नब्बे प्रतिशत सैनिक जब सेना में भर्ती होता है तो वो किसी देशभक्ति के जुनून में नहीं, बल्कि रोजगार और पेट की खातिर शामिल होता है..ठीक उसी तरह जैसे कोई कलर्क या फिर म्युनिसिपैलिटी का कर्मचारी होता है। लेकिन आपने उन तमाम सैनिकों को भी राक्षस की श्रेणी में गिन लिया। मेरी टिप्पणी की वजह भी यही थी कि एक जनकवि इतना संकीर्ण कैसे सोच सकता है....

अपने हिस्से का सच मैं भी यत्र-तत्र बताने की जोहमत करते रहता हूँ सर। अब मेरी लेखनी आपकी तरह सशक्त तो है नहीं और न ही मेरे पास आप जैसा बिम्बों का प्रचूर भंडार है...कभी समय निकाल कर मेरे अदने से ब्लौग पर नजर डालियेगा। कुछ ग़ज़लें और इक्का-दुक्का कहानियाँ हंस, पाखी आदि पत्रिकाओं में छप जाती हैं....हाशिये पर हूं, फिर भी कोशिश करता हूं कि इन दानवों और राक्षसों के पक्ष का सच भी इन ग़ज़लों और कहानियों के माध्यम से बाहर आये। संभव हो तो पाखी के जून अंक में छपी मेरी तुच्छ-सी कहानी पर नजर डालियेगा।

कविता का समर्पित पाठक हूँ और इस बात पे घमंड भी करता हूँ। आप जैसी कविता लिखने का सऊर भले ही न हो मुझे, लेकिन कविता पढ़ने की अच्छी तहजीब है। विश्व पुस्तक मेले में जब आप अपनी "लोग ही चुनेंगे रंग" की प्रतियां यूं ही वितरित कर रहे थे अपने मित्रों और आलोचकों में, जिनमें से कई लोगों ने उसे सरसरी तौर पर देखा भी नहीं होगा अब तक(और ये सच आप भी जानते हैं)...उसी मेले के बाद आपका ये पाठक रिक्शे पर शाहदरा की गलियां छान रहा था शिल्पायन के गुमशुदा दुकान की तलाश में और वहाँ पहुंचने पर ललित जी बताते हैं कि किताब तो है ही नहीं, फैक्टरी से जो किताब मिली वो लाल्टू जी ने बाँटने के लिये उठा ली...शेष प्रतियां एक महीने बाद मिलेगी। मेरी झुंझलाहट का अंदाजा लगा सकते हैं आप। फिर उन्हें एडवांस देकर आया और उनकी कृपा से मेरी प्रति डाक द्वार कश्मीर के इस सुदूर पहाड़ी पर पहुंची। ...तो आपकी कविता इस तरह भी पढ़ी जाती है सर। कई दिनों से "लोग ही चुनेंगे रंग" की समीक्षा ड्राफ्ट में लिख कर रखी हुई जो जल्द ही ब्लौग पर डालने वाला हूँ।

कम-से-कम कविता कैसे पढ़ी जाती वो तो मुझे अपने कवि से नहीं सीखना पड़ेगा। अपने दानवी और राक्षसी क्रिया-कलापों से बचे समय में खुद के लिये कविता से मिलना अलग से रखता हूँ।

आपका निमंत्रण सर-आँखों पर, लेकिन हैरान हूँ कि एक राक्षसी-प्रवृति वाले को आप अपनी फौज में शामिल करना चाहेंगे। क्या महज इसलिये कि वो आपकी कविता पढ़ता है?

अंत में, आपकी ही एक कविता की चंद पंतियाँ याद आ रही हैं। कुछ यूं थी ना:-
"बाहर लू चलने को है
जो कमरे में बंद हैं,
किस्मत उनकी...
कैद में ही सुकून...."