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बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Thursday, August 26, 2010

भाई गौतम तुम भी हमारी फौज में शामिल हो जाओ

प्रिय गौतम, ख़ुशी मेरी कि तुम मेरी कविताएँ पढ़ते हो। तुम्हारी पहली टिप्पणी से वैसे मुझे कोई चोट पहुंचनी नहीं चाहिए क्योंकि हिन्दी रचना संसार में गाली गलौज आम बात है। मैं इससे बचा हुआ हूँ क्योंकि मुझे अभी तक सामान्य कवि लेखक ही माना गया है और मैं तमाम विशेषण जो बाज़ार में चल रहे हैं उनके उपयुक्त नहीं माना गया होऊंगा ।

भाई, तुम मेरी कविताएँ पढ़ते हो तो उनमें क्या पढ़ते हो? मैंने तो आज नहीं, जैसा कि मेरी दस साल पुरानी कविता से तुमने देखा ही होगा (पिछले चिट्ठे में, जिस पर तुमने दूसरी टिप्पणी की है), हमेशा ही जंग विरोधी बातें कही हैं। यह भी मेरी ही सीमा है कि तुमने मेरी रचनाओं में इस बात को पढ़ा नहीं। मेरे पिछले सभी blogs को कभी पढ़ लेना तो भी स्पष्ट हो जायेगा कि मैं तो मनुष्य मनुष्य के बीच हिंसा का कट्टर विरोधी हूँ। खासकर जब यह हिंसा संगठित ढंग से ताकतवरों द्वारा संचालित हो।

मैं देश नामक उस धारणा का भी विरोधी हूँ जिसके नाम पर सैनिकों को जान कुर्बान करनी पड़ती है। एक सैनिक के मरने या घायल होने पर सरकार उसे पुरस्कार दे दे या उसे धन दे दे तो तो उस क्षति कि पूर्ति नहीं होती जो एक बाप या भाई या आजकल माँ या बहन के अचानक दुनिया से कूच कर जाने से या घायल होने से हुई होती है।

मेरे लिए तो देश मेरी ज़मीन, हवा, पानी है। वह कभी खिड़की से दिखने तक सीमित है तो कभी धरती से भी परे न जाने किस अनंत तक फैली है। मुझे पता है कि तुम कहोगे कि इस ज़मीन, हवा पानी को बचाने के लिए ही तो सेना की ज़रुरत है। मैं इनकार नहीं करता कि इस तरह की एक कल्पना ही आज मूर्त रूप से हमारे सामने है कि इंसान इंसान के खिलाफ हिंसक है और बचने के लिए हमें सेनाओं की ज़रुरत है। मैं चाहता हूँ कि एक और कल्पना जो अधिक संभव होनी चाहिए कि इंसान इंसान से प्यार करता है सबको मान्य हो। और मैं देखता हूँ कि अब तक सेनाओं का उपयोग शासकों ने इंसान का नुक्सान करने के लिए ही किया है।

मैं दुबारा यही लिखूंगा कि सेनाएँ हिन्दोस्तान में या पकिस्तान में कहीं भी मानवता की रक्षा करने के लिए नहीं बनाई जातीं। देश नामक अमूर्त कुछ के लिए मरना और कुछ भी हो आखिर है तो मरना ही. इस सत्य की भयावहता अपने आप में ही अमानवीय है - इसलिए जब तनाव तीव्र हो तो सिपाही इधर का हो या उधर का हो, वह एक क्रूर दानव ही होता है. ... हर इंसान में दानव बनने की संभावना होती है - सेनाओं का वजूद इसी संभावना पर टिका है. जब हम किसी एक सेना को दूसरी सेना से बेहतर मानते हैं, हमारे अन्दर भी एक दानव ही बोल रहा होता है.

तो भाई तुम्हारे सैनिक को अलग रख कविता पाठक को सजग करो तो शायद वह तस्वीर देख पाओगे जो हम देखते हैं। तुम्हें तकलीफ तो होगी कि हम तुम्हारे देखी तस्वीरें नहीं देखते या देखना चाहते पर क्या करें अपनी चाहतों से मजबूर हैं। बहुत ज्यादा प्यार की चाहत है भाई, इसलिए हमें मणिपुरी भी और पाकिस्तानी भी सभी से प्यार है। अगर उनमें से कोई मुझसे नफरत करता है तो मैं समझ सकता हूँ कि उनके पीछे क्या वजहें हैं, कभी तुम भी समझने की कोशिश करो तो शायद हमारी देखी तस्वीर देख पाओ, नहीं देखना चाहो तो भी ठीक है। इतना ही कर लो कि जो देख रहे हो वह सब को बतलाते रहो।

खुशी मेरी यह भी कि मेरे पक्ष में भी एक फौज है और वह छोटी नहीं बहुत भारी फौज है। मैं तो उस फौज का एक साधारण सदस्य हूँ। बहुत दीवानगी है, लोग जान पर खेल कर प्यार की बात करने को मैदान में उतरे हुए हैं। उनको कोई तनखाह नहीं मिलती, वो मेरी जैसी बातें लिख कर खुशी में खोने वाले नहीं, वे कर्मवीर हैं। मैं यही उम्मीद रखूंगा कि तुम भी हमारी फौज में शामिल हो जाओ।

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