Sunday, May 03, 2009

चिढ़

चिढ़

मैं चिढ़ता हूँ तो मेरी दुनिया भी चिढ़ती रहती है
मेरी दुनिया को चिढ़ है और दुनियाओं से
मेरी चिढ़ मेरी दुनिया भर की चिढ़ है
दुनिया भर की चिढ़ को सँभालना कोई आसान काम तो नहीं है
मैं हार गया हूँ
अपनी चिढ़ को किसी अदृश्य थाल पर लिए चलता हूँ

तुम बतलाते हो कि मैं चिढ़ कर बोलता हूँ
तो मुझे पता चलता है कि मैं चिढ़ कर बोलता हूँ
मैं किसी और से कहता होऊँगा कि वह चिढ़ कर बोलता है
वह किसी और से
यह सिलसिला चलता ही रहता है
बहुत सारी चिढ़ का पहाड़ ढोते हैं हम सब मिलकर

मैं क्यों चिढ़ता रहता हूँ
ऐसा नहीं कि मैं चिढ़ कर खुश होता हूँ
मैं तो सबसे मीठी बातें करता हूँ
कोई और चिढ़ रहा हो तो उसे भी सहलाता हूँ
तो मैं क्यों चिढ़ता रहता हूँ

ऐसा क्यों नहीं करते कि हम यह सारी चिढ़
इकट्ठी कर अमरीका के राजदूत को या हमारे
मुल्क को पाकिस्तान बनाने में जुटे मोदी सरीखों को दे दें

हो सकता है हमारे उपहार को देख वे खूब हँसें
कम से कम हमारी चिढ़ इस काम तो आएगी

या यूँ करें कि यह सारी चिढ़
किसी सभ्य कवि को दे आएँ
या किसी को जो माँग करता है कि कविता में
गाँव होना ही चाहिए

चिढ़ की पूँजी
बाँटते रहें तो कम नहीं होती
यह बात शीशे से टकराती चिड़ियों से
जानी है मैंने
वही पुरुष चिढ़
बाँटता चला हूँ।
(जनसत्ता - अप्रैल २००९)

4 comments:

विवेक said...

बहुत दिन हो गए आपको पढ़ते...जब भी पढ़ता हूं...अगली बार के लिए तमन्ना पाल लेता हूं...लेकिन हर बार सोचता हूं...क्या आप वही हैं...क्या आपका चंडीगढ़ से कोई रिश्ता है? क्या पंजाब यूनिवर्सिटी में आप रहे हैं कभी?

विनय said...

mind blowing, just superb!

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तख़लीक़-ए-नज़रचाँद, बादल और शाम

प्रदीप कांत said...

ऐसा क्यों नहीं करते कि हम यह सारी चिढ़
इकट्ठी कर अमरीका के राजदूत को या हमारे
मुल्क को पाकिस्तान बनाने में जुटे मोदी सरीखों को दे दें

Sachmuch aisa hi karanaa chahiye.

GopalJoshi said...

reminded me "निदा रस"...