Saturday, December 16, 2006

मकान बदलना है।

संस्थान के अपने मकान अभी कम हैं, आगे बनने वाले हैं।

जुलाई में सामान ले आया तो जल्दी में मकान चाहिए था।

हड़बड़ी में दो बेडरुम वाला मकान लिया। भारत सरकार ने कर्मचारियों के लिए हाउसिंग कॉम्प्लेक्स बनाए हैं, कर्मचारी मकान खरीद कर किराए पर देते हैं। जिस व्यक्ति का मकान है, वह करनाल में कृषि अनुसंधान परिषद के संस्थान में वैज्ञानिक है। उसके स्थानीय मित्र के हाथ मकान था। जिसने पता दिया उसने बतलाया कि सात हजार महीने के लगेंगे। मैंने कहा देंगे। पता चला कि साहब आनाकानी कर रहे हैं। अपने संस्थान के प्रशासनिक अफ्सर रमाना जी ने बातचीत की। पता चला साढ़े सात माँग रहे हैं। मैंने कहा चलो ठीक है। १२ जुलाई को सुबह सामान पहुँच रहा था, ग्यारह बजे चाभी का तय हुआ। सामान पहुँच गया, पर चाभी नहीं। चार बजे जनाब आए और कहा कि आठ चाहिए। रमाना ने फिर बात की औेर पौने आठ पर चाभी मिल गई। दो महीने का अडवांस और जुलाई के बारह दिनों के पैसे। साथ में जो एजेंट था, उसने अपनी फीस के लिए एक महीने का किराया माँगा। सबको नगद चाहिए। सुबह ट्रक वालों को बीस हजार दे चुका था - पता नहीं कैसे कैसे दो ए टी एम का इस्तेमाल कर पैसे दिए। हजार कम पड़ गए तो रमाना ने दे दिए।

रमाना ने बात की कि मसौदा बना कर कापी दी जाए। जनाब बोले ठीक है। फिर कहा कि कुछ लकड़ी का काम बाकी है, वह पूरा करना है। मैंने कहा चलो दो दिन और गेस्ट हाउस सही।

हफ्ता हो गया पर कोई काम नहीं हुआ। आखिर हम मकान में आ ही गए। न कपड़े लटकाने का इंतज़ाम, एक बाथरुम में पानी की टोंटी नहीं। बात की कि मैं लगवा रहा हूँ, किराए से काट लेंगे। महीने के अंत में जनाब पहुँचे और मैं भूल चुका था कि हजार जो कम पड़ गए थे रमाना ने दे दिए थे, मैंने पानी की टोंटी के पैसों का हिसाब कर हजार में से बाकी पैसे दे दिए। जनाब कह गए कि पहली को करनाल में कार्यरत असली मालिक के बैंक अकाउंट में किराया जमा कर दूँ। मसौदा बना कर लाए थे, मेरे हस्ताक्षर ले गए, पर कापी बाद में देने का वायदा कर गए। मैंने कहा कि भई कपड़े लटकाने का इंतज़ाम तो कर दो और बाकी जो लकड़ी का काम था - सब होगा कहकर जनाब दफा।

तो अगस्त में, सितंबर में किराया जमा किया। फोन पर बात की तो जनाब ने कहा कि दशहरे में मालिक आ रहे हैं, सब काम करवा देंगे। मैंने कहा चलो तभी हो जाएगा। मालिक पहुँचे नहीं। मुझे लगा कि लोग जितने गड़बड़ मैं सोच रहा हूँ उससे ज्यादा ही हैं। फिर ध्यान आया कि कोई रसीद नहीं दी। आखिर मैंने तय किया कि मकान बदला जाए। दो महीनों का अग्रिम तो भरा ही हुआ था, अक्तूबर की पहली को पैसे जमा नहीं किए। पंद्रह दिनों तक दूसरी ओर से भी कोई आवाज नहीं। आखिर मैंने ही फोन किया। पता चला मालिक आए- गाँव गए और वापस करनाल। मैंने कहा कि भई मैं तो किराया नहीं दे पा रहा हूँ - कुछ तो बतलाओ मैं खुद ही काम करवा लूँ? बीसेक तारीख तक मालिक का करनाल फून नंबर हासिल किया। घुमाया। कोऊ नहीं उठा रहा। दो चार बार करके थक गया। घंटे बाद अपना फोन बजा। करनाल के मालिक ने बतलाया कि वो नहा रहे हैं। मैंने फरमाया दस मिनटों में संवाद करेंगे। आस निरास भई। दस मिनटों से लेकर जाने कब तक हम लगे रहे। मालिक क्रिंग क्रिंग।

तब तक संस्थान में बात होने लगी कि कुछ मकान लीज़ पर लेकर प्रोफेसरान को दिए जाएँ। आशा का सबेरा!

मैंने तय कर लिया कि अब तो अडवांस ही चलेगा। आखिर करनाल वासी प्रभावित हुए। मैं फून से ई-मेल पर ले आया। जनाब मान गए कि लकड़ी का कुछ काम हम करवा लें और किराए से काट लें। तगादा शुरू कि भई किराया भरो। मैंने अपनी ईमानदारी की दुहाई दी, बतलाया कि करनाल शहर में पुलिस विभाग के प्रबंधन में चल रहे पाश पुस्तकालय में लोग हैं जो मेरी ईमानदारी का प्रमाण-पत्र दे देंगे। बंदे ने कहा कि सैंतीस का हूँ पर मैंने दुनिया देखी है। मैंने जितना पैसा दे चुके उसकी रसीद माँगी। सरकारी कर्मचारी को रसीद का क्या डर? पर है, रसीद का मतलब है आय कर। मेरी मुसीबत यह कि मैं रसीद न लूँ तो किराया भत्ते से मुझे आय कर देना पड़ेगा। मालिक आय कर क्यूँ दे? बहुत सोचकर पत्नी के नाम पर रसीद भेज दी। तगादा जारी कि भई किराया भरो। मैंने सच बतला दिया कि संस्थान मकान लीज़ पर लेने की सोच रहा है। मैं शायद साल के आखिर तक मकान खाली कर दूँगा, पंद्रह दिनों की नोटिस दे दूँगा। मालिक को तो आग लग गई। तब से ई-मेल खोलते ही मुझे हानिकारक विकिरण का खतरा दिखने लगा। अंततः मैंने लिख दिया कि करनैली मालिक, आखिरी ई-मेल पढ़ लो, तमीज़ का कोई कोर्स ले लो (यानी, ऐेसा ही कुछ)।

आखिर बीस नवंबर को एक महीने की नोटिस के साथ दिसंबर के बीस दिनों का किराया जमा कर दिया। मालिक को बड़ी तकलीफ है, कि बीस दिनों का क्यों, पूरे महीने का क्यों नहीं? इसी बीच एक दिन रमाना जी ने संकोच के साथ वो हजार रुपए माँगे, जो कि अपने तईं मैं पानी की टोंटी के पैसों का हिसाब कर बाकी जनाब को दान दे चुका था।

तो दोस्तों, यह थी कहानी मेरे अगले बुधवार को मकान बदलने की। मुझे डर है कि आने वाले दिन भी इतने ही रंगीन होंगे जितने गुजरे हुए हैं। आगामी मालिक ने चेक से पेमेंट लेने से इंकार कर दिया है। यानी नगदी में कारोबार। पिछले दो महीनों से अयप्पा स्वामी की स्तुति में कुछ भक्तों ने सुबह सुबह ध्वनि प्रदूषण के ऐसे रेकार्ड तोड़े हैं कि मैं अधीरता से मकान बदलने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ।

हाल में जीवन विद्या शिविर में सवाल उठा कि पश्चिम के लोग उन गड्ढों में जा ही चुके हैं, जिनमें हम जा रहे हैं, तो मैंने प्रतिवाद किया। सच है कि पश्चिमी मुल्कों में बड़े चोर बड़े हैं, पर मध्य वर्ग की बेईमानी और बदतमीज़ी में हमारे सामने उनकी क्या बिसात!

अंजान भाई का भारत महान है।

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

ये हिंदुस्तान की आम कहानी है। इसलिये भी कि इतनी सी बात के लिये इसे आपने 'अंजान भाई' को थमा दिया। आपका भी है कुछ यह देश!

masijeevi said...

आपके साथ दिली सहानुभूति है।
बन्‍धु आपने पश्चिम की गड्ढोन्‍मुखी अश्‍लीलता के प्रति जो उदारता दिखाई है वह दरियादिली अपनी दिल्‍ली पर विचार करते समय नदारद थी

ज़े बात ठीक नहीं है।

खुदा (अगर कहीं है तो ) आपको अच्‍छा मकान (मालिक) बख्‍शे।