Thursday, December 29, 2016

14. चुपचाप अट्टहास: हवा ने कहीं जाल बिछाया हो



मैं पहाड़ों पर चला तो चट्टानें फट गईं

नदियों का सीना चीर डाला मैंने

समूची धरती पर वनस्पति काँपती

तेजाब बरसता है जहाँ मैं होता हूँ


हर मिथक में एक राजकुमार होता है

वह दरख्तों को उखड़ने से रोकता है

उसकी चाल को हवा सुर में बाँध देती है

जब वह दबोच लेता है मेरे प्राण-पखेरू

मेरे पैरों तले कहीं कुछ ठोस नहीं होता


अब अनगिनत राजकुमार हैं

डरता हूँ

ध्यान से सुनता रहता हूँ

हवा ने कहीं जाल बिछाया हो

मुझे किसी भँवर में डालने को।


I walk on the hills and they split apart

I cleave the rivers

Plants shiver on the Earth

Acid rains where I am


A prince comes in the tale

He saves the trees from being killed

The wind gives chime to his gait

When he catches hold of my soul

I am left with no firm ground below my feet


There are princes too many

I fear

I listen with care

What if the wind laid a snare

to trap me.

1 comment:

Anshul Soni said...

बेहतरीन..