Thursday, April 19, 2012

थोड़ा सा चाँद, थोड़ी सी गप्प

पिछले वर्ष हिंदी के जिन बड़े कवियों की जन्म शताब्दी मनाई गई, उनमें से सिर्फ नागार्जुन से मैं दो बार मिला हूँ। पढ़ा थोड़ा बहुत सभी को है, पर इतना नहीं कि कुछ कह-लिख पाऊँ। वैसे भी साहित्य से औपचारिक रूप से न जुड़े होने से इतना समय भी नहीं रहता कि शोध की दृष्टि से साहित्य का अध्ययन कर पाऊँ। बहरहाल, हैदराबाद विश्वविद्यालय ने पिछले साल जब इन कवियों की जन्म शताब्दीपर समारोह किया, तो मुझे भी कुछ कहना था। ज्यादा गंभीर कृतियों से बचते हुए शमशेर की बच्चों के लिए लिखी कविता पर मैंने जो कुछ कहा, उसे बाद में कोशिश कर लिख डाला था। अभी चार दिन पहले उद्भावना का शमशेर स्मृति अंक आया तो यह आलेख मेरे ध्यान में आया।अगर इसमें कोई काम की बात है, तो संदर्भ देते हुए कोई भी इसका इस्तेमाल कर सकता है।
(20 Oct 2014: इस पोस्ट के बाद आलेख 'उद्भावना' और 'साखी' - दो पत्रिकाओं में प्रकाशित हो गया था)

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थोड़ा सा चाँद, थोड़ी सी गप्प 
(अक्तूबर 2011 में हिंदी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय में पढ़ा प्रपत्र)


शमशेर बहादुर सिंह के शब्द कर्म पर चर्चा करने की योग्यता मुझमें नहीं है। पर खुशकिस्मती से मुझे बोलने का मौका मिला है तो मैं उनकी एक ऐसी कविता पर कुछ सोचने समझने और आपसे गुफ्तगू करने की कोशिश कर रहा हूँ, जिस पर ज्यादा कुछ नहीं कहा गया। शमशेर स्वयं इस कविता के शीर्षक 'चाँद से थोड़ी सी गप्पें' के नीचे कोष्ठक में एक तरह से उपशीर्षक रखते हैं, 'एक दस ग्यारह साल की लड़की की बात'। स्पष्ट है कि दस ग्यारह साल की लड़की वयस्क अनुभवों से वंचित है और हम आप इकट्ठे होकर बातचीत करें तो वयस्क बातचीत ही होंगी, यहाँ बच्चों की क्या बिसात!

बांग्ला या मलयालम जैसी भाषाओं को छोड़ दें तो भारतीय भाषाओं में वयस्क साहित्य लिखने वाले बच्चों के लिए कम ही लिखते हैं। शमशेर ने लुइस कैरल के 'एलिस इन वंडरलैंड' का 'आश्चर्यलोक में एलिस' शीर्षक से अनुवाद किया है। भाषा सिंह के संस्मरण से हम यह भी जानते हैं कि वे बच्चों को कहानियाँ सुनाने में माहिर थे। पर बच्चों के लिए मौलिक प्रकाशित कविता यही एक 'चाँद से थोड़ी सी गप्पें' मिलती है।

चाँद के बारे में विश्व की सभी भाषाओं में खूब लिखा गया है। पृथ्वी का यह एकमात्र नैसर्गिक उपग्रह कभी धरती का हिस्सा होता था। इसलिए भी शायद पृथ्वी पर प्राण चंद्रमा से खुद को जुड़ा महसूस करता है। पूरे सौर जगत में मूल ग्रह की तुलना में आकार की दृष्टि से चाँद सबसे बड़ा उपग्रह है। यह तकनीकी बात महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी वजह से चाँद हमें इतना बड़ा दिखता है कि हम वहाँ चरखा कातती बुढ़िया या खरगोश आदि की कल्पना कर सकते हैं । इसीलिए वह रात का वह मुसाफिर है जिससे कभी हम जानना चाहते हैं कि वह हमें बताए कि मेरा कसूर क्या है या कभी और जो प्रेमियों का मुखड़ा बनता है और हम पूछते हैं कि वह क्यों शर्माया।

वैसे चाँद के ' चाँद' होने की वजह उसके अपने ऊर्जा स्रोत का न होना भी है। यानी सूरज की तरह उच्च ताप का स्रोत वह नहीं है। वह शीतल है, उसके प्रकाश में जलन नहीं, कोमलता है, दुःखमोचक तरलता है। फिल्मी गीतों से इतर भी साहित्य में चाँद को कवियों, रचनाकारों ने अनगिनत बार बुलाया है। सुकांतो भट्टाचार्या की 'पूर्णिमार चाँद जेनो झोलसानो रूटी' या मंगलेश डबराल की पंक्तियाँ 'चाँद के बारे में अब भी बच्चे कहीं ज्यादा जानते हैं ' होंचाँद हर जगह है। पर बड़ों और बच्चों के लिए चाँद हमेशा ही अलग रहा है, सिवाय शमशेर के। मैं इस बात पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि शमशेर की चाँद से गप्पें दस ग्यारह साल की लड़की की गप्पें तो हैं ही, वो मेरी और आपकी गप्पें भी हैं। वैसे तो हर बड़े में एक बच्चा होता है। पर मैं उस बच्चे की बात महीं कर रहा। मैं 'चंदा मामा दूर के' वाले चाँद से शमशेर के चाँद को अलग कर रहा हूँ।

भाषा सिंह के अनुसार शमशेर इस बात पर बहुत ज्यादा जोर देते थे कि लड़कियाँ मज़बूत बनें और साज-सजावट के चक्कर में न पड़ें। भाषा ने अपने संस्मरण में इस बात पर काफी जोर दिया है। मैं यहाँ कहना चाहूँगा कि बच्चों के लिए बड़ों के मन में जो ताच्छिल्य की भावना होती है, शमशेर उससे अलग उन्हें कहीं और अधिक जगह देना चाहते हैं। इसलिए उनका चाँद चंदा मामा नहीं है, वह वैसा है, जैसे उनकी उन कविताओँ के अन्य बिंब हैं, जिन्हें हम बच्चों के लिए पठनीय नहीं मानते।

मसलन कविता की पंक्तियाँ देखें -
'गोल हैं खूब मगर/ आप तिरछे नज़र आते हैं ज़रा'

यह बाल सुलभ सोच है, ऐसा मानने वाले कम ही होंगे, पर यह है। तिरछापन कई अर्थों को लिए हुए है और ये सभी वही अर्थ नहीं जो आप हम सोचते हैँ। बच्चे कैसे इस तिरछेपन को देखते हैं और कितने आयामों में देखते हैं, यह जानने के लिए हमें उनके साथ समय बिताना पड़ेगा।

'आप पहने हुए हैं कुल आकाश
तारों-जड़ा;'

शमशेर की कई कविताओं में आकाश और अपेक्षाकृत कम रचनाओं में तारों के संदर्भ हैं।

- आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है। (टूटी हुई बिखरी हुई )

- कितनी ऊँची घासें चाँद तारों को छूने को हैं (एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता)

- पूरा आसमान का आसमान है/ एक इंद्रधनुषी ताल (पूरा आसमान का आसमान)

- मोह मीन गगन लोक में बिछल रही (विजयदेव नारायण साही के आलेख में उद्धृत)

- मैं खुले आकाश के मस्तिष्क में हूँ (विजयदेव नारायण साही के आलेख में उद्धृत)



और 'एक पीली शाम' शीर्षक कविता की वह अद्भुत पंक्ति -

'एक पीली शाम
पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता
शान्त
मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल
कृष म्लान हारा-सा
वासना डूबी
शिथिल पल में
स्नेह काजल में
लिए अदभुत रूप कोमलता
अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ
आँसू सांध्य तारक सा
अतल में'

'तारक' जो अतल में है और चाँद जिसने सारा आकाश पहना हुआ है। एक vertical और दूसरा horizontal, मूल बात प्रसार है।

और कई संदर्भ हैं -
'आकाशे दामामा बाजे' में नाभिकीय विस्फोट का आकाश,
'उषा' में प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे / भोर का नभ
' ओ मेरे घर में' तारे दिए मुझे अनगिनती
'गीली मुलायम लटें' में गीली मुलायम लटें/ आकाश / साँवलापन रात का गहरा सलोना
और आगे - नया गहरापन /तुम्हारा /हृदय में /डूबा चला जाता /न जाने कहाँ तक /आकाश-सा /
ओ साँवलेपन /ओ सुदूरपन /ओ केवल /लयगति...



तो 'तिरछे नज़र आते हैं ज़रा' आखिर क्या है?

या 'आप पहने हुए हैं कुल आकाश तारों-जड़ा'; - यह क्या है? इसे पढ़ते हुए वान ख़ोख़ के 'स्टारी नाइट्स' की याद नहीं आती?


मैं समझता हूँ कि एक वैचारिक समझ इस कविता से हमें मिलती है - बच्चों के लिए लिखी रचनाएँ भी ऐंद्रिक बोध से जुड़ी होनी चाहिए और वह महज नानसेंस के लिए नानसेंस नहीं होना चाहिए।

'एलिस इन वंडरलैंड' का अनुवाद करने वाले और नियमित रूप से बच्चों को रामायण महाभारत की कथाएँ सुनाने वाले शमशेर के पास कल्पना, सोद्देश्य या बिना किसी उद्देश्य के नानसेंस,- हर तरह के औज़ार उनके पास थे। पर कविता में वह बड़े सेलेक्टिव हैं। यह वह कठिन एस्थेटिक है जो यह माँग रखती है कि किसी एक प्रसंग में सुंदर की कल्पना, बाकी जो कुछ है, उससे असंगत नहीं हो सकती। शमशेर जैसे सौंदर्य के उपासक के लिए यह बात बड़ी अजीब लग सकती है, पर सचमुच यह एक वैज्ञानिक की सौंदर्य-उपासना है। ब्रह्मांड में अनगिनत तारों का होना और चाँद की कलाएँ - ये वैज्ञानिक तथ्य हैं। एक सामान्य व्यक्ति बच्चे से बतियाने के लिए चंदा मामा या ऐसे किसी पारंपरिक बिंब का इस्तेमाल करेगा। ऐसे सामान्य बिंबों का भी अपना महत्त्व है। पर शमशेर की सौंदर्य की खोज ऐसी है, जो तथ्यों के साथ संगति रख कर चलती है। जैसे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने 'इब्न बतूता' को बच्चों के लिए वैसा ही रखा, जैसा कि वह था - रेतीले तूफानों में यात्राएँ करता हुआ, धूल सने नाक-कान रगड़ता हुआ...। इसी तरह शमशेर आकाश, तारों और चाँद को रखते हैं। सृष्टि में मानव का प्रासंगिक मात्र होना, चाँद तारों का उतना ही अर्थवान होना, जितना कि मानव है, ये सभी तत्व एक ऐसी सोच को सामने लाते हैं, जो अपने समय की अग्रगामी सोच थी।

कविता में फिर आगे देखिए -

... हमको बुद्धू ही निरा समझा है!
हम समझते ही नहीं जैसे कि
आपको बीमारी है :
आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं,
और बढ़ते हैं तो बस यानी कि
बढ़ते ही चले जाते हैं- ..



निश्चित ही 'बीमार चाँद', 'सुंदर चाँद', 'मुस्कराता चाँद', 'मुसाफिर चाँद' आदि अन्य प्रचलित बिंबों से कहीं ज्यादा रोचक है। पर क्या यह महज हमारे शब्द-संसार को आगे ले जाता है, या इसमें और भी कोई बात है? क्या चाँद बीमार भी हो सकता है? शमशेर चाँद की कलाओं के आवर्त्ती गुणधर्म की बात कर रहे हैं। अगर यह बीमारी है तो इसका उपचार भी होगा। जब शमशेर यह कविता लिख रहे हैं, अंतरिक्ष विज्ञान में तरक्की चरम पर है। चाँद जैसे ही, पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे, आकार में बहुत छोटे कृत्रिम उपग्रह बनाए जा रहे हैं। अगर ऐसे किसी उपग्रह में हम बैठे हों, जो चाँद की ही गति के साथ संगति रखती आनुपातिक गति से धरती के चारों ओर घूम रहा हो, तो हमें चाँद की कला बदलती नहीं दिखेगी। आज यह महज एक वैज्ञानिक तथ्य है, पर जब शमशेर यह कविता लिख रहे थे, उन दिनों अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के ज़ेहन में यह एक कविता जैसा खयाल था, जो वास्तविकता में मूर्त्त हो रहा था।



...दम नहीं लेते हैं जब तक बि ल कु ल ही
गोल न हो जाएं,
बिलकुल गोल ।
यह मरज आपका अच्छा ही नहीं होने में...



यहाँ 'मरज' शब्द अनोखा है। उन दिनों, यानी पचास साल पहले, हिंदी कविता में, 'मरज' शब्द शायद ही कहीं आया हो। रोग या मर्ज़ तो हो सकता था, पर 'मरज' अलग है। हर दिन हर हिंदीभाषी यह शब्द इस्तेमाल करता है - यह बात और है। मलयज ने अपने आलेख में शमशेर पर लिखा है - 'अज्ञेय ने भले उन्हें कवियों का कवि बतलाया हो, स्वयं शमशेर की आकांक्षा हमेशा जनता का कवि बनने की रही है - बिना कला की उच्चतम शर्तों से समझौता किए हुए। और जनता का कवि वही बन सकता है जो जनता की भाषा में - उसकी बोलचाल के सहज, सरल, प्रवाहयुक्त, मुहावरों वाली भाषा में - अपने मर्म की बात रखे। शमशेर जी हिंदी की खड़ीबोली में ऐसी भाषा का आधार उर्दू मानते हैं। '
तात्पर्य यह कि शमशेर बच्चों के लिए भी एक नई भाषा और एक नया फार्म गढ़ रहे थे। चंद्रमा पर विजय प्राप्त करना जैसा गौरव गीत या या चंदामामा से बतियाना जैसी लोरियों से अलग कविता - सचमुच कविता की ज़मीन बनाने की सोच रहे थे, ऐसी कविता जो बच्चों के नैसर्गिक विकास से जुड़े। जन्म के उपरांत जीवन क्रमशः व्यक्ति में निहित मानवता के विनाश के खिलाफ संघर्ष की प्रक्रिया है। सामाजिक परवरिश और औपचारिक शिक्षा में बहुत कुछ ऐसा है जो हमें अपनी नैसर्गिक अस्मिता से दूर ले जाता है। इसलिए बच्चों के विकास पर गहराई पर सोचने वाले अनेक चिंतकों ने औपचारिक स्कूली शिक्षा की आलोचना की है। एक सचेत कवि से भी यही अपेक्षित है।
इस बात को आगे बढ़ाते हुए मैं कहना चाहूँगा कि सौंदर्य-बोध से अलग अवचेतन की उन तहों तक जाकर शमशेर या किसी भी कवि को समझने की ज़रूरत है, जहाँ से उसका पाठ वस्तुतः निकला हो सकता है। शमशेर के बारे में पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि एक स्तर के बाद हर कोई उन्हें छोड़ सा जाता है। अपने समकालीन जिन सामाजिक राजनैतिक सवालों से वे जूझ रहे थे, उन सवालों की उपस्थिति जैसे उनकी ज्यादा पढ़ी गई कविताओं में कम ही है, हम यही जान पाते हैं। मेरा मन यह मान नहीं पाता और मैं एक ज़िद के साथ उनमें ऐसी बातें ढूँढता रहता हूँ, जो उन्हें बेहतर जानने वाले खारिज कर देते है। अक्सर कहा जाता है कि अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धता को उन्होंने कविताओं से ज्यादातर दूर ही रखा। पर अगर मूर्त्त वस्तु जगत में अमूर्त्त सौंदर्य को शमशेर ढूँढ लेते थे, तो क्या मूर्त्त सामाजिक सच्चाइयों पर जो अमूर्त्त वैचारिक सवाल उन दिनों साम्यवादी चिंतन के केंद्र में थे, पार्टी के मेंबर होते हुए क्या वे उनसे अछूते रह सकते थे। स्पष्ट है कि किसी भी कवि की हर कविता के प्रति ऐसा आग्रह बचकानी बात होगी, पर शमशेर की कुछ कविताओं में जो शब्द चित्र हैं, क्या उनमें सचमुच हमें ऐसी वैचारिक उलझन की तलाश नहीं करनी चाहिए? वह आदमी जो दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेल रहा है, अपनी शाम को सुबह से मिला रहा है, उसे उलझाते दो बादलों के तार क्या महज सुंदर शब्द चित्र मात्र हैं? जिस तरह मंगलेश जब 'चाँद के बारे में अब भी बच्चे कहीं ज्यादा जानते हैं ' कहते हुए समकालीन सामाजिक राजनैतिक समस्याओं की ओर संकेत कर रहे हैं, उसी तरह शमशेर के सौंदर्य-बोध में कुछ और बात है, जो शायद अभी तक छूटी हुई है।
मैं अपनी बात को स्काटलैंड के कवि Andrew Lang की एक कविता की पंक्तियों से पूरी कर रहा हूँ -
Who suddenly calls to our ken (प्रज्ञा)
The knowledge that should not be there;
Who charms Mr. Stead with the pen,
Of the Prince of the Powers of the Air;
Who makes Physiologists stare -
Is he ghost, is he demon, or elf,
Who fashions the dream of the fair?
It is just the Subconscious Self.
(The Ballade of the Subconscious Self – Andrew Lang)

शमशेर के कविता कर्म में अवचेतन की भूमिका क्या है ? संभवतः इस तरह से देखने पर छूटे हुए शमशेर वापस हम तक लौटेंगे। कहा जा सकता है कि यह ज़िद महज अवचेतन को तलाशने की नहीं है, क्योंकि शमशेर अगर सचमुच जो प्रकट है, उससे अलग कुछ और भी कह रहे हैं, जो विचारधारात्मक है, तो वह अवचेतन कैसा?

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