Thursday, July 30, 2009

एक दिन में कितने दुःख

एक दिन में कितने दुःख मुझे सहला सकते हैं
मैं शहर के व्यस्त चौराहे पर देखता हूँ
अदृश्य मानव संतान खेल रहे हैं
गिर रहे हैं मोपेड स्कूटरों पर पीछे बैठी सुंदर युवतियों पर
चवन्नी अठन्नी के लिए
मैं नहीं देखता कि मेरे ही बच्चे हैं वह
डाँटता हूँ कहता हूँ हटो
नहीं उतरता सड़क पर सरकार से करने गुहार
कि मेरे बच्चों को बचाओ
मैं बीच रात सुनता हूँ यंत्रों में एक नारी की आवाज
अकेली है वह बहुत अकेली
कोई नहीं है दोस्त उसका
कहता हूँ उसे कि मैं हूँ
भरोसा दिलाता हूँ दूसरों की तरफ से
पर वह है कि न रोती हुई भी रोती चली है
इतनी अकेली इतनी सुंदर वह औरत
रात की रानी सी महकती बिलखती वह औरत
औरत का रोना काफी नहीं है
यह जताने रोता है एक मर्द
जवान मर्द रोता है जीवन की निरर्थकता पर कुछ कहते हुए
भरोसा देता हूँ उसे पढ़ता हूँ वाल्ट ह्विटमैन
'आय सेलीब्रेट माईसेल्फ....'

मुग्ध सुनता है वह एक बच्चे के कवि बनने की कहानी
एक पक्षी का रोना एक प्रेमी का बिछुड़ना
पढ़ते हुए मेरी आँखों से बहते हैं आँसू
हल्की फिसफिसाहट में शुक्रिया अदा करता हूँ कविता का
चलता हूँ निस्तब्ध रात को सड़क पर
कवि का जीवन जीते
बहुत सारे दुःखों को साथ ले जाते हुए। (उद्भावना 2009)

5 comments:

M VERMA said...

अच्छी रचना

डॉ .अनुराग said...

अद्भुत !

विवेक said...

औरत का रोना काफी नहीं...यह जताने रोता है एक मर्द...सचमुच। यह कविता कब की है सर?

प्रदीप कांत said...

मैं नहीं देखता कि मेरे ही बच्चे हैं वह
डाँटता हूँ कहता हूँ हटो
नहीं उतरता सड़क पर सरकार से करने गुहार
कि मेरे बच्चों को बचाओ

आखिर इस व्यवस्था के लिये भी तो ह्मी दोषी हैं

Pramod Singh said...

पढ़े. खड़े-खड़े.