Saturday, August 09, 2008

What have we done

हिरोशिमा पर एक पुराना स्लाइड शो छात्रों ने देखा और चर्चा की। १९९८ के हिंद-पाक नाभिकीय विस्फोटों के बाद मुख्यतः चेन्नई के इंस्टीच्यूट आफ मैथेमेटिकल साइंसेस आदि और बैंगलोर के विभिन्न विज्ञान शोध संस्थानों से वैज्ञानिकों ने मिलकर 'साइंटिस्ट्स अगेंस्ट न्यूक्लीयर वेपन्स' के लिए ये स्लाइड्स तैयार की थीं। शीर्षक था 'हिरोशिमा कैन हैपेन हीयर'। हमलोग चंडीगढ़ में युद्ध विरोधी और हिंद-पाक शांति के आंदोलनों में जुड़ कर प्रयास कर रहे थे। हमलोगों ने इन स्लाइड्स को अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदल कर कई स्कूलों में, सामुदायिक केंद्रों में, गाँवों में दिखलाया। प्रसिद्ध नुक्कड़ नाटक हस्ती गुरशरण सिंह ने भी हमें काफी मदद की और हमलोगों ने जगह जगह नुक्कड़ नाटक किए। यहाँ हैदराबाद में इतने साल बाद उन स्लाइड्स का प्रभाव वैसा ही रहा जैसा उनदिनों देखा था। हिबाकुशा (नाभिकीय विस्फोटों से प्रभावित बच गए लोग) के बयानों और उनके खींचे फोटोग्राफ्स और उनके अंकित तस्वीरों को देखकर भला कौन नहीं प्रभावित होगा। चर्चा के दौरान ऐसी बातें भी सामने आईं कि अगर ईराक के पास नाभिकीय बम होते तो क्या अमरीका की उसपर आक्रमण करने की हिम्मत होती।

यह आम धारणा है कि युद्ध सरदार किसी एक मुल्क के साथ जुड़े होते हैं। सच यह है कि लोगों की स्वाभाविक देशभक्ति को राजनेता अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते हैं और राजनेताओं का इस्तेमाल वे लोग करते हैं जिन्के लिए पैसा और ताकत सबकुछ है। कल्पना करो कि ईराक ने अमरीका के हमले के जवाब में नाभिकीय मिसाइल दाग दिया। युद्ध सरदारों की प्रतिक्रिया क्या होगी? लोग मानते हैं कि आक्रोश होगा, बदले की भावना होगी। मेरा मानना है कि सचमुच व्यापक आक्रोश होगा, पर युद्ध सरदारों को नहीं, उन्हें सिर्फ मजा आएगा। लाखों लोगों का मारा जाना उनके लिए कोई बात नहीं है। उनका कोई देश नहीं है, कोई भी उनका अपना नहीं है। उन्हें बड़ी खुशी होगी कि रास्ता खुल गया है और अब आतिशबाजी शुरू।
नाइन इलेवेन का संदर्भ आया और बात स्पष्ट हुई कि न तो अल कायदा अफगानी संगठन है न ही तालिबान की पैदाइश अमरीका के अलावा कहीं और से हुई है। सब जानते हैं, फिर भी अफगानिस्तान को सपाट करने में कोई कमी न हुई। अमरीका की अर्थ-व्यवस्था शस्त्र बनाने और उनका सौदा करने पर बुरी तरह निर्भर है। ऐसा ही कई दूसरे मुल्कों के साथ भी है। भारत में भी ऐसे निहित स्वार्थों की कमी नहीं जो शस्त्र व्यापार को फायदा का सौदा मानते हैं। नाभिकीय शस्त्र इसी कड़ी में एक और भयंकर कदम है।

बहरहाल मुझे अपनी पुरानी डायरी में १९७७ के पन्नों पर एक कविता दिखी। यह १९४६ में प्रकाशित हरमान हागरडॉन की पुस्तक 'द बॉम्ब दैट फेल आन अमेरिका' से लिया उद्धरण है। नेट सर्च कर मैंने पाया कि यह पुस्तक वाकई काफी प्रसिद्ध है।

"The bomb that fell on Hiroshima fell on America too.


It fell on no city, no munition plants, no docks. It erased no church, vaporized no public buildings, reduced no man to his atomic elements. But it fell, it fell."

"When the bomb fell on America it fell on people.
It didn't dissolve them as it dissolved people in Hiroshima.
It did not dissolve their bodies
But it dissolved something vitally important to the greatest of them and the least.
What it dissolved were their links with the past and with future.
There was something new in the world that set it off forever from what had been.
Something terrifying and big, beyond any conceivable earthly dimensions.......
It made the Earth, that seemed so solid, Main street, that seemed so well paved, a kind of vast jelly, quivering and dividing underfoot.....
What have we done, my country, what have we done?

ढूँढते हुए मुझे एक युद्ध विरोधी उक्तियों की अच्छी साइट यहाँ मिली।

3 comments:

अफ़लातून said...

जो युद्ध के पक्ष में नहीं होंगे

उनका पक्ष नहीं सुना जायेगा

बमों और मिसाइलों के धमाकों में

आत्मा की पुकार नहीं सुनी जायेगी

धरती की धड़कन दबा दी जायेगी टैंकों के नीचे



सैनिक खर्च बढ़ाते जाने के विरोधी जो होंगे

देश को कमजोर करने के अपराधी वे होंगे

राष्ट्र की चिन्ता सबसे ज्यादा उन्हें होगी

धृतराष्ट्र की तरह जो अन्धे होंगे

सारी दुनिया के झंडे उनके हाथों में होंगे

जिनका अपराध बोध मर चुका होगा

वे वैज्ञानिक होंगे जो कम से कम मेहनत में

ज्यादा से ज्यादा अकाल मौतों की तरकीबें खोजेंगे

जो शान्तिप्रिय होंगे मूकदर्शक रहेंगे भला अगर चाहेंगे



जो रक्षा मंत्रालयों को युद्ध मंत्रालय कहेंगे

जो चीजों को सही-सही नाम देंगे

वे केवल अपनी मुसीबत बढ़ायेंगे

जो युद्ध की तैयारियों के लिए टैक्स नहीं देंगे

जेलों में ठूँस दिये जायेंगे

देशद्रोही कहे जायेंगे जो शासकों के पक्ष में नहीं आयेंगे

उनके गुनाह माफ नहीं किये जायेंगे



सभ्यता उनके पास होगी

युद्ध का व्यापार जिनके हाथों में होगा

जिनके माथों पर विजय-तिलक होगा

वे भी कहीं सहमें हुए होंगे

जो वर्तमान के खुले मोर्चे पर होंगे उनसे ज्यादा

बदनसीब वे होंगे जो गर्भ में छुपे होंगे



उनका कोई इलाज नहीं

जो पागल नहीं होंगे युद्ध में न घायल होंगे

केवल जिनका हृदय क्षत-विक्षत होगा ।

- राजेन्द्र राजन
तीन युद्ध विरोधी कविताएं

masijeevi said...

गनीमत हे विवेक की आवाजें अभी कहीं तो बची हैं।

वैसे युद्धोन्‍माद के लिए अब हमने राष्‍ट्र की जरूरत भी खत्‍म कर ली है- खुद देश में भी एक दूसरे के खिलाफ हम इतने ही उन्‍मादी होने लगे हैं।

अनूप शुक्ल said...

अच्छी पोस्ट! कवितायें भी अच्छी लगीं।