Wednesday, August 06, 2008

खोजते रहो, हर जगह होमो सेपिएन्स

'भारत' की खोज


पता चला कि भजन गायन के लिए साप्ताहिक सभा होती है, अब उसमें विचार विमर्श भी होगा। विमर्श का उद्देश्य 'भारत' की खोज है। बड़ी आशा और उत्सुकता के साथ मैं गया। मुझे भजन अच्छे लगते हैं। पिछले तीस सालों में प्रचलित हुए भौंडी आवाज में सुबह सुबह कुदरती शांति को नष्ट करने वाले, उत्तर भारत के फिल्मी पैरोडियों वाले भजन नहीं, पारंपरिक भक्ति गीत, खास कर अगर राग में बँधे हों, सुन कर अच्छा लगता है। जिस दिन मैं गया, भजन गाए गए। एक भजन में प्रभु को गोप्य कहा गया था, मैंने सवाल उठाया कि ऐसा क्यों तो थोड़ी चर्चा हुई। इसके बाद विचार के लिए चाणक्य श्लोक पढ़े गए। मुसीबत यह थी कि जिस पुस्तक से श्लोक पढ़े जा रहे थे, उसमें श्लोक और उनके हिंदी में अर्थ के अलावा टीका भी थी। यह टीका जिस स्वामी ने लिखी थी, स्पष्ट था कि वह पूर्वाग्रह-ग्रस्त और पुरातनपंथी है। टीका में भिन्न स्रोतों से उद्धरण थे। कुछ पंचतंत्र जैसे स्रोत थे तो कुछ महज लोकोक्ति। तीसरे ही श्लोक में मेरा धैर्य टूटने लगा। मैंने साथियों से कहा कि हमें श्लोक और उनके अर्थ पढ़कर अपने आप चर्चा करनी चाहिए, न कि टीकाकार पर निर्भर करना चाकिए। दुःख यह कि पुनरुत्थानवादी मानसिकता इतनी हावी थी कि दूसरों ने उस टीकाकार के पक्ष में तर्क रखे। मैंने कहा कि परंपरा के प्रति आलोचनात्मक दृष्टि न रखैं तो हम अपने पूर्वजों का अपमान कर रहे हैं, क्योंकि हम उन्हें उनकी मनुष्यता देने से इन्कार कर रहे हैं। एक टीका के अंश पढ़ने पर स्पष्ट हो जाएगा कि मुझे क्यों इतनी हताशा है। चाणक्य ने कहा कि जिस पुरुष के जीवन में 'दुष्टा नारी' की मौजूदगी हो, उसे वन में चले जाना चाहिए। अव्वल तो सोचने की बात यह है कि समझदार लोगों को भारत की खोज के लिए ऐसा हर कुछ पढ़ना क्यों जरुरी लगता है, जो भी सैंकड़ों साल पहले लिखा गया है। चाणक्य के कई उम्दा नीति श्लोक हैं, जिन्हें पढ़ा जाना चाहिए, कुछ छोड़े भी जा सकते हैं। बहरहाल टीकाकार हमें यह समझाता है कि 'दुष्टा नारी' क्या चीज है। पति दिन भर काम कर घर लौटा है और देखता है कि पत्नी ने खाना नहीं बनाया है। वह कहता है 'रे पापिन! तूने खाना क्यों नहीं बनाया है?' पत्नी कहती है, 'मैं क्यों पापिन होऊँ, पापी होगा तेरा बाप?' पति - 'री राँड़, क्या बकवास करती है....' बाकी का हिस्सा लिखकर मैं वक्त जाया नहीं करना चाहता। मेरा खयाल है कि इस तरह की सामग्री प्रकाशित करने वालों को और सामजिक रुप से इसे पढ़ने वालों के लिए ऐसी सजा का प्रावधान होना चाहिए जिससे उनकी वैचारिक समझ सुधरे, यह बेहतर सभ्यता की एक पहचान है। यह जरुरी नहीं कि हम 'हर बाला देवी की प्रतिमा' गाते रहें, पर यह जरुरी है कि हममें औरतों के प्रति स्वस्थ दृष्टि पनपे। देवी और दुष्टा दोनों ही विशेषण आपत्तिजनक हैं। अरे इंसान को इंसान कहो, भारत खोजो पाकिस्तान खोजो, खोजते रहो, हर जगह होमो सेपिएन्स ने ऐसे कारनामे किए हैं, जो खोजने लायक हैं।

देश के एक सक्रिय समाजसेवी के यहाँ आने पर सभा हुई। चूंकि एक समय मैं उसे जानता था तो खुशी मुझे भी थी कि पंद्रह साल बाद मिल रहा हूँ। जिन मुद्दों को लेकर हम परेशान हैं और कठिन परिस्थितियों में जिन पर हमने भी काम किया है, वह और उसके साथी लगातार उन मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं। उसने छात्रों के साथ चर्चा की तो कुछ बातें तंग करती रहीं। मैंने देखा है कि सुविधाओं के साथ पले मध्य-वर्गीय परिवारों में पले लोग जब सामाजिक राजनैतिक क्षेत्र में काम करने आते हैं, तो सच्चाइयों को लेकर उनमें एक तरह की रुमानी प्रवृत्ति होती है। उसके कुछ वक्तव्य थे - गरीब अनपढ़ व्यक्ति पढ़े लिखों से ज्यादा समझदार है। हर व्यक्ति को जितने मर्जी बच्चे पैदा करने की छूट होनी चाहिए। गरीब बच्चे पैदा करते हैं, उन्हें कोई समस्या नहीं है।

यह सब पुरानी बहस है और आश्चर्य होता है कि लोग अभी भी एक या दूसरे छोर पर खड़े होकर बातें करते हैं। ऐसी बेमतलब की बातों से दूसरी जरुरी बातों का वजन कम हो जाता है। जिस तरह ऊपर से थोपी गई विकास की धारणा जन विरोधी है, ऊपर से थोपी गई गरीबी पूजा की सतही समझ भी जन विरोधी है। असली सवाल यह है कि जो भी ऐसा निर्णय लिया जाता है जिससे समूह प्रभावित होता हो, उसमें हर व्यक्ति की भागीदारी कितनी है। कोई सहज उत्तर तो नहीं मिल सकते, जैसा कि बॉब डिलन का पुराना गीत कहता है - द आन्सर इज़ ब्लोइंग इन द विंड।

1 comment:

vijay gaur/विजय गौड़ said...

ब्लागवाणी से मसिजीवी जी के यहां जाना हुआ उन्होंने समोसा खिला, ओह सैमबर्गर खिला कर यहां भेज दिया. अच्छा ही हुआ. नहीं इतना सुन्दर "भजन" सुनने से वंचित रह गये होते भाई. बधाई.