Friday, December 09, 2022

प्रसंग चुड़ैल

 
अगस्त 2021 में यह फेसबुक पर पोस्ट किया था। आज किसी प्रसंग में दुबारा देखा तो लगा कि यहाँ भी दर्ज़ किया जाए। 

'बदशक्ल चुड़ैलों'

हर बार की तरह इस बार भी 15 अगस्त पर अली सरदार जाफरी का  'कौन आज़ाद हुआ' गीत और वेदी सिन्हा का अद्भुत गायन पर भी पोस्ट काफी शेयर हुए। मेरा बहुत प्रिय गीत है, कई बार दोस्तों के साथ गाया है।  

पिछले साल धीरेश सैनी के कहने पर मैंने हिन्दी में 'अश्वेत' शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति करते हुए एक लेख लिखा था। https://hindi.newslaundry.com/.../george-floyd-death...

हाल में फिर किसी बहस में शामिल होते हुए इसका लिंक मैंने शेयर किया था। लेख अंग्रेज़ी में लिखा जाए तो कई लोग पढ़ते हैं और बातचीत होती है। हिन्दी में आप कितना पढ़े जाएँगे, यह इससे तय होता है कि आप कितने प्रतिष्ठित हैं। और प्रतिष्ठा कौन तय करता है? ...

खैर, उस लेख में ये पंक्तियाँ भी थीं - 

"यह ज़रूरी है कि शब्दों का इस्तेमाल करते हुए हम गंभीरता से सोचें। हमें लग सकता है कि हम तरक्की-पसंद हैं, बराबरी में यकीन रखते हैं और एक छोटी सी बात को बेमतलब तूल देने की ज़रूरत नहीं है। ऐसा सोचते हुए कभी हम व्यवस्था के पक्ष में खड़े हो जाते हैं और भूल जाते हैं कि गैरबराबरी कैसी भी हो, वह नाइंसाफी है और इंसानियत के खिलाफ है। पिछली पीढ़ियों में यह समझ कम थी और अक्सर शक्ल से जुड़े शब्दों का इस्तेमाल बुराई को चिह्नित करने के लिए किया जाता था। एक मिसाल अली सरदार जाफरी के लिखे प्रसिद्ध गीत 'कौन आज़ाद हुआ' का है, जिसमें  'काले बाज़ार में बदशक्ल चुड़ैलों की तरह कीमतें काली दुकानों पर खड़ी रहती हैं' का इस्तेमाल है। हमें सचेत होकर ऐसे लफ्ज़ों से बचना होगा। 'काला धन' जैसी कुछ बातें तुरंत नहीं हटेंगी, पर हो सकता है भविष्य में बेहतर विकल्प निकल आएँ। अंग्रेज़ी में यह कोशिश बेहतर है, क्योंकि सारी दुनिया के तरक्की पसंद लोग इस पर सोचते हैं। हमारे समाज और यहाँ के बुद्धिजीवी अभी तक सामंती मूल्यों की जकड़ में हैं, इसलिए यहाँ लोगों में यह एहसास कम है कि हमारी ज़बानों में ऐसे बदलाव होने चाहिए।" 

मुझे पता है कि इन पंक्तियों में आक्षेप है।  कोई कह सकता है कि इसमें दर्प है, हालाँकि मेरा मक़सद महज सवाल उठाना है। मैंने पिछले सालों में कई दोस्तों को यह बात कही है कि  अली सरदार जाफरी की 'बदशक्ल चुड़ैलों' वाली लाइन हमें नहीं पढ़नी चाहिए। क्या हम 'ढोल गवाँर शूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी' बिना आलोचना के पढ़ते हैं? साहित्यिक और ऐतिहासिक नैतिकता का तकाजा है कि हम लिखे हुए को मिटा नहीं सकते, पर सीता या शंबूक की महिमा पर कहते हुए एक ही साँस में  ताड़ना के अधिकारी तो नहीं कह सकते! 

तो क्या किया जाए। या तो  'बदशक्ल चुड़ैलों' पढ़ते हुए आलोचनात्मक टिप्पणी साथ में हो, या इसे अपने मक़सद मुताबिक इस लाइन को छोड़कर बाक़ी गीत पढ़ा जाए, या अली सरदार जाफरी से माफी माँगते हुए इसकी जगह कोई और लफ्ज़ रखे जाएँ। सचमुच मैं नहीं जानता कि क्या बिल्कुल सही कदम होगा, पर यह समझता हूँ कि 'बदशक्ल चुड़ैलों' लिखते हुए अली सरदार जाफरी अपनी पीढ़ी की सीमाओं में बँधे थे। 

कोई भी महान रचनाकार अपने वक्त की सभी सीमाओं को तोड़ पाए – ऐसी माँग ग़लत है। पर क्या हम जो उस वक्त में नहीं हैं, हमें इस पर सोचना नहीं चाहिए कि क्या सही और क्या ग़लत है? 

दो साल पहले पाकिस्तान की कुछ स्त्री-अभिनेताओं ने ‘चुड़ैल’ सीरीज़ की फिल्म बनाई थी, जहाँ चुड़ैल लफ्ज़ को प्रतिरोध की तरह इस्तेमाल किया गया है, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका के काले लोगों ने साठ के दशक में  'ब्लैक इज़ ब्यूटीफुल' आंदोलन खड़ा किया था।  

वेदी का गाया बार-बार सुनने को मन करता है। पर मैं हताश हूँ कि मेरी आपत्ति को गंभीरता से नहीं लिया गया है। खास तौर पर तरक्कीपसंद दोस्तों में इस सवाल पर उदासीनता तंग करती है।


प्रसंग चुड़ैल : पिछली पोस्ट से निकली और बातें - 

कोई चालीस साल पहले मुझे एरिका जौंग की 'witches’ किताब मिली थी। उम्र का असर होगा कि मैं किताब पर फिदा हो गया था। उन्हीं दिनों जाना था कि स्त्रीवाद का एक पंथ witches यानी डायनों को सेलीब्रेट करता है। यूरोप में जब ईसाई धर्म फैला, तो हर संस्कृति की तरह वहाँ भी स्त्रियों ने पुराने रस्मों-रिवाजों को बचाए रखा, जिनमें पारंपरिक दवा-दारु वगैरह भी शामिल थे। कुछ रिवाज तो स्वीकार कर लिए गए (जैसे बड़े दिन का त्यौहार और सांता क्लॉज़ की किंवदंती), पर स्त्रियों पर कहर बरपा।  हजारों औरतों को डायन कह कर ज़िंदा जलाकर या शूली पर चढ़ा कर मारा गया। 

उस किताब में पहली बार अपनी सबसे पसंदीदा कविताओं में से एक पढ़ी - ऐन सेक्सटन की Her Kind. सरल सी कविता, अद्भुत लय, पर जटिल संदर्भ। इसलिए अनुवाद संभव न था।  ऐन सेक्सटन की कुछ और कविताओं का अनुवाद मैंने किया, जो पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए ।

इतने सालों बाद फिर वह कविता पढ़ी। अब अनुवाद की कोशिश की है। इस कविता पर विकीपीडिया में अलग से एक पन्ना है। https://en.wikipedia.org/wiki/Her_Kind_(poem)

जिनकी रुचि हो संदर्भ वहाँ देख सकते हैं। अंग्रेज़ी में मूल कविता नीचे है।

उस जैसी - ऐन सेक्सटन

(मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद - लाल्टू)

मैं उड़ती फिरी हूँ, भूत-चढ़ी चुड़ैल

जोश में रात की काली हवाओं में भूतहा, 

मैंने झूले हैं झूले, सपनों में टोनहा 

रोशन दर रोशन, सादे-से मकानों के ऊपर, 

बारह मेरी उंगलियाँ, अकेली, पगली

ऐसी औरत भी क्या औरत री, 

मैं उस जैसी ही रही।

मैंने देखी हैं जंगल में पुर-सुकून गुफाएँ

उनमें सजाए मैंने कड़ाही, दस्तकारी, दराजें

अलमारियाँ, रेशम और अनगिनत सामान 

केंचुओं और परियों के लिए खाना पकाया

शिकवे करती, लकीर से भटकों को फिर से सजाया 

ऐसी औरत को ग़लत ही समझा जाता है

मैं उस जैसी ही रही।

गिरफ्तार मैं तेरे छकड़े पर चढ़ी, ओ गाड़ीवान

गुजरते गाँवों के लिए नंगी बाँहें हवा में हिलाईं

पहचान लीं आखिरी रौशन राहें, ज़िंदा रही

जहाँ मेरी जाँघों को डँसती हैं लपटें तेरी जलाई  

और  जहाँ तेरे चक्के रौंदते हैं मेरी पसलियाँ टूटती हैं 

ऐसी औरत मरने से लजाती नहीं

मैं उस जैसी ही रही।

Her Kind - Anne Sexton

I have gone out, a possessed witch,

haunting the black air, braver at night;

dreaming evil, I have done my hitch

over the plain houses, light by light;

lonely thing, twelve-fingered, out of mind.

A woman like that is not a woman, quite.

I have been her kind.

I have found the warm caves in the woods,

filled them with skillets, carvings, shelves,

closets, silks, innumerable goods;

fixed the suppers for the worms and the elves;

whining, rearranging the disaligned.

A woman like that is misunderstood.

I have been her kind.

I have ridden in your cart, driver,

waved my nude arms at villages going by,

learning the last bright routes, survivor

where your flames still bite my thigh

and my ribs crack where your wheels wind.

A woman like that is not ashamed to die.

I have been her kind.

एक प्रसंग और – इन्कलाबी तुर्की शायर नाजिम हिकमत ने अमेरिकी गायक-कलाकार पॉल रोबसन पर कविता लिखी तो 'मेरे नीग्रो भाई' लिखा। उन दिनों नीग्रो ही कहा जाता था। उन्नीसवीं सदी में 'negro' (छोटे 'n' के साथ नीग्रो) के खिलाफ लड़ाई हुई तो ‘Negro' (बड़े ‘N' के साथ) शब्द आया।  बीसवीं सदी में साठ सालों तक यही चलता रहा। फिर उसकी जगह ब्लैक - यह लंबी लड़ाई चली। बाद में एक सिलसिले के बाद इसकी जगह आफ्रीकन-अमेरिकन संबोधन आया। हेमांग विश्वास ने नाज़िम हिकमत के उस गीत का अनुवाद किया तो वहाँ 'नीग्रो भाई'  रखा।  मैंने यह गीत पहले बांग्ला में सुना। कोलकाता यूथ कॉयर ने बांग्ला में इसे बदलकर 'शिल्पी संग्रामी' कर दिया (बांग्ला में कलाकार को शिल्पी कहते हैं)। आज नेट पर  हिकमत की उस कविता का कोई अंग्रेज़ी अनुवाद आसानी से नहीं मिलता जहाँ 'नीग्रो' लफ्ज़ हो। कहीं बिल्कुल हटा दिया गया है तो कहीं , ‘ब्लैक ब्रदर' हो गया है। यानी जब बदलना बहुत ज़रूरी लगे, तो लोगों ने शब्द बदला है। अक्सर किसी गीत में लाइनें जोड़कर या काटकर लोग गाते हैं। जाहिर है, यहाँ नैतिकता का संकट है, सोचने की बात है, पर ऐसा हुआ है।

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