Sunday, January 25, 2015

अदना शख्स बड़ी छलाँगें


अदना पर असाधारण इंसान

(आज 'दैनिक भास्कर' की 'रसरंग' पत्रिका में प्रकाशित)




मोहनदास करमचंद गाँधी की हत्या हुए तकरीबन सत्तर साल होने को हैं। वक्त के साथ गाँधी की छवि और उनका महत्व बदलता रहा है। अपने देश में ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गाँधी को आज महान चिंतक या दार्शनिक माना जाता है। अहिंसा पर उनके खयाल और प्रयोगों की वजह से वे बीसवीं सदी के भारत की अनोखी देन बन गए हैं। मानव के विकास में अगर किसी एक धारणा का महत्व समय के साथ बढ़ा है, वह अहिंसा है।

एक ज़माना था जब गाँधी की गंभीर आलोचना होती थी। नांबूद्रीपाद और हीरेन मुखर्जी जैसे चिंतकों ने आज़ादी की लड़ाई में गाँधी की भूमिका पर और आर्थिक-राजनैतिक ताकतों के बीच उनकी जगह पर किताबें लिखीं। संघ परिवार का दुष्प्रचार भी कुछ हद तक प्रभावी था। उनका कहना है कि गाँधी हिंदुओं के हितों के खिलाफ थे, इसलिए गोडसे का उनको कत्ल करना वाजिब था।

गाँधी की छवि में बड़ा गुणात्मक बदलाव सत्तर के दशक से हुआ। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन के नेता मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने बार-बार उनका नाम लिया और कहा कि वे गाँधी की बतलाई राह पर चल रहे हैं। अस्सी में ऐटेनबोरो की फिल्म 'गाँधी' रिलीज़ हुई। आशीष नंदी, सुधीर कक्कड़ आदि ने गाँधी को मनोवैज्ञानिक नज़रिए से देखा। इतिहासकार सुमित सरकार ने गाँधी की सफल रणनीति को परखा। एक तो गाँधी के बारे में नई समझ बनी तो दूसरी ओर हर कोई गाँधी का नाम लेने लगा। कॉंग्रेस ने तो गाँधी की कमाई करनी ही थी, सत्ता में आने से पहले से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ जुड़ी पार्टी भाजपा भी गाँधी जपने लगी थी।

आज गाँधी ऐसा नमूना बनते जा रहे हैं कि हर छली आदमी उनका फायदा उठाने को लगा है। सत्तासीन दल के लिए कभी वे स्वच्छता के प्रतीक बन जाते हैं तो कभी इसी दल के सहयोगियों के सिर उनके हत्यारे का मंदिर बनाने की धुन सवार हो जाती है। इसी बीच में असली गाँधी खो जाते हैं।

गाँधी को याद करते हुए सबसे पहले हमें जानना चाहिए कि वे एक अदना शख्स थे जिन्होंने अपनी साधारणता से ऊपर उठकर बड़ी छलाँगें लीं। उनकी समझ बौद्धिक कम और ज़ेहनी ज्यादा थी और अपने समय के चिंतकों से अलग ज़िद के साथ ज़ेहनी समझ की राह पर वे चलते चले। ग़लतियाँ कीं और सीखा। अरुंधती राय ने आंबेडकर की 'जाति का विनाश' पुस्तक के नए संस्करण की भूमिका में उनकी कई बुनियादी कमियों का उल्लेख किया है। उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी वर्णाश्रम व्यवस्था के प्रति उनका मोह था। अपनी इसी कमज़ोरी से नई तालीम के बारे में उनकी शुरूआती सोच पिछड़ी थी। आंबेडकर से हुई बहस से सीखते हुए उन्होंने अपनी समझ को सुधारा और सर्वांगीण तालीम के सिद्धांत अपनाए।

गाँधी के ज्यादातर भक्तों में उनको एक इंसान की जगह अलौकिक कुछ मानने की प्रवृत्ति है। बेशक उनमें ऐसी कोई अलौकिकता नहीं थी। वकालत की औपचारिक पढ़ाई का फायदा उठाने में वे असफल थे। यूरोप में पढ़ाई के दौरान वहाँ हो रही युगांतरकारी घटनाओं के बारे में उनकी सोच या समझ का कोई लेखाजोखा नहीं है। दक्षिण अफ्रीका में शुरुआत में उनकी दृष्टि नस्लवादी थी, जो बाद में बदली। पर भारतीय समाज में रहते हुए संस्कारों को औरों से ज्यादा गंभीरता से लेने के साथ मानव-मूल्यों को लेकर उनमें तीखी बेचैनी थी। इसलिए ऐसी तमाम बातें, जैसे सिगरेट पीना, यौनिकता, आदि, जो औरों को थोड़े वक्त से ज्यादा तंग नहीं करतीं, वे इस पर इतना सोचते थे कि अपनी आत्मकथा और सत्य के साथ प्रयोगों पर लिखते हुए उन्होंने इन बातों का जिक्र किया। यूरोपी आधुनिकता का उन पर असर था और वे ईसाई धारणाओं और पश्चिम के मानवतावादी चिंतकों से गहरे प्रभावित हुए। पर पश्चिमी आधुनिकता में दिखते मानव-मूल्यों की गिरावट बारे में वे बहुत बेचैन थे। उनकी पारंपरिक गाँव-आधारित सामाजिक-आर्थिक संरचना पर लोग बात करते हैं, पर वे स्वयं महज अपनी ज़ेहनी समझ से ही भविष्य के बारे में सोचते थे। 1931 में लंदन के गोलमेज सभा में उन्होंने दावा किया कि उपनिवेश-कालीन अंग्रेज़ी तालीम के प्रसार के पहले भारत में साक्षरता अधिक थी। जब एक शिक्षाविद हार्टोग ने इसका प्रमाण माँगा तो वे नहीं दे पाए। आठ साल तक हार्टोग ने उनसे प्रमाण माँगा, पर गाँधी असफल रहे। पर उनके अनुयायियों ने इस बात को सत्य मानकर आज़ादी के पहले और बाद में मुल्क में तालीम की बदहाली के लिए पूरी तरह उपनिवेश कालीन अंग्रेज़ी प्रशासन को दोषी ठहराया, जबकि सचाई इससे काफी ज्यादा जटिल है।

कई लोग बढ़ती उम्र में अपनी असुरक्षाओं और सोच के धुँधलेपन से परेशान होकर गाँधी में अपनी मुक्ति ढूँढते हैं। अक्सर ऐसे नए मुल्लों में गाँधी के प्रति अंधभक्ति कुछ ज्यादा ही होती है और वे अपनी बहुत सारी ऊर्जा इसमें लगाते हैं कि कैसे गाँधी को एक इंसान के रूप में देखने वालों की खिल्ली उड़ाई जाए। पर सच यह है कि गाँधी एक अदना इंसान ही थे जिन्होंने अपनी समकालीन परिस्थितियों में अनोखी बातें कर दिखलाईं। एक ऐसे समाज में जहाँ गैरबराबरी और धर्मांधता इतना ज्यादा न होती, जितनी कि हमारे यहाँ थी और है, गाँधी शायद उस फलक पर न पहुँच पाते जहाँ वे हैं। पर सिर्फ इतना कहना सरलीकरण और गाँधी के प्रति अन्याय होगा। भारत जैसे एक देश में इतनी बड़ी तादाद में लोगों को नमक आंदोलन में शामिल कर पाना या चरखा कातने की सीख दे पाना कोई आसान काम नहीं है। गाँधी ऐसा कर पाए तो उनकी इस असाधारणता को मानना जरूरी है। लोगों में ज़ेहनी ही सही, आधुनिकता की आलोचना का बीज रोप पाना भी उनका अवदान है। अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखते हुए दूसरे की आस्था का आदर कर पाने की ऐसी सीख उन्होंने दी कि आजतक घोर सांप्रदायिक आदमी को भी सार्वजनिक जीवन में इसे निभाना पड़ता है। नोआखाली और कोलकाता में सांप्रदायिक तनाव के कठिन माहौल में उन्होंने कमाल की दृढ़ता दिखलाई।

एक इंंसान की हत्या ज़ुर्म होता है। ऐसा ज़ुर्म करने वाला मानसिक रोगी ही हो सकता है। हत्यारे को देखने समझने का कोई और तरीका नहीं होता। जब गाँधी की हत्या की गई, उस वक्त वे काफी हद तक असहाय थे। उन्होंने अपने मानवीय मूल्यों को सामने रख कर नए बने मुल्क पाकिस्तान को दिल्ली के नियंत्रण में खजाने का उचित हिस्सा देने की उचित माँग की थी। यह विड़ंबना है कि उनके हत्यारे को महान कहने वाले छल बल कौशल से आज समाज और सत्ता पर हावी हैं।


1 comment:

jyoti dehliwal said...

गांधी जी के बारे में किसी ने सही कहा था कि आने वाली पीढ़ी को यकीं नहीं होगा की ऐसा भी कोई हाड़-मास का इंसान वास्तव में हुआ था!
सुन्दर प्रस्तुति…