Saturday, November 01, 2014

गो ग बा ब

1989 में सरकारी ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड परियोजना में कई किताबें मध्य प्रदेश के स्कूलों में बच्चों के पढ़ने के लिए प्रकाशित हुई थीं। उसी दौरान अशोक अग्रवाल (जो स्वयं बहुत अच्छे कहानीकार हैं) ने बच्चों के लिए तैयार की गई मेरी कुछ किताबें संभावना प्रकाशन, हापुड़, से निकाली थीं। उपेंद्रकिशोर रायचौधरी की कृति 'गूपी गाईन बाघा बाईन' का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद उनमें से एक किताब थी। बाद में राजेश जोशी के अतिथि संपादन में यह अनुवाद 'समय झरोखा' पत्रिका में प्रकाशित हुआ। उन दिनों मेरी भाषा पर बांग्ला का प्रभाव था। अब पढ़ने पर कई जगह अटपटा लगता है। उस अनुवाद को थोड़ा सुधार कर मैंने कोई डेढ़ साल पहले 'एकलव्य' संस्था को फिर से प्रकाशन के लिए भेजा था। जब भेजा था तो उनकी किसी समिति ने निर्णय लेना था। तो महीने दर महीने गुजर गए और वह निर्णय नहीं आया। ऐसा भी सुलूक हमारे मित्र लोगों से मिलता है। बहरहाल इसी बीच पता चला कि गुलज़ार ने भी इसको अनूदित किया है और बढ़िया डिज़ाइन के साथ किताब निकली है। 

उपेंद्रकिशोर रायचौधरी के पोते सत्यजित राय ने इस कहानी पर फिल्म बनाई थी। अद्भुत फिल्म थी। यहाँ मैं किश्तों में अपने अनुवाद को पेस्ट कर रहा हूँ। 


गोपी गवैया बाघा बजैया

-उपेंद्रकिशोर रायचौधरी



तुम गाना गा सकते हो? मैं एक आदमी की कहानी सुना रहा हूँ, वह एक गाना गा सकता था। उसका नाम था गोपी कंइया, उसके पिता का नाम था कानू कंइया। उसकी एक किराने की दूकान थी। चूँकि गोपी गाना गा सकता था, और उसके गाँव में और कोई कुछ नहीं गा सकता था इसीलिए सभी उसकी खातिर करते और उसे गोपी "गवैया" कहकर पुकारते।

हालाँकि गोपी को एक से अधिक गाना नहीं आता था, उसी एक गाने को वह खूब गाता। उस एक गाने को गाए बिना वह पल भर भी चैन न पाता, उसका दम घुटने लगता। जब वह घर में बैठ कर गाता, उसके पिता की दूकान के सारे ग्राहक दौड़ भागते। जब वह मैदान में गाता, वहाँ बँधी सब गायें रस्सी तोड़कर भाग जातीं। आखिर उसके डर से उसके पिता की दूकान में ग्राहकों ने आना छोड़ दिया, चरवाहे भी मैदानों में गायों को न ले जा पाते। तब एक दिन कानू कंइया ने एक बड़ा बाँस लेकर फटकारते हुए उसे दौड़ भगाया, तो वह दौड़कर मैदान में चला गया; वहाँ कई चरवाहों ने लाठियों से पीछा किया तो वह जंगल में घुस गया और वहाँ जाकर खूब गला साधा।

गोपी के गाँव के पास एक और आदमी रहता था, उसका नाम था पाँचू पंइया। पाँचू के बेटे को ढोलक बजाने का शौक था। ढोलक बजाते-बजाते वह खूब झूमता रहता, सर हिलाता और आँखें तर्राता; दाँत निकालता और भौंहें चढ़ाता। उसके गाँव के लोग यह देखकर मुंह खोलकर खड़े रहते और कहते, ''आहा ! ....हा!! - -- - ---!!!" अंत में जब वो 'हा:, हा:,....हा:, हा:.. !!' कहकर शेर जैसे गुर्रा उठता, तो लोग भागने की जगह न पाकर इधर-उधर धड़-धड़ाम गिर जाते। इस वजह से सब उसे 'बाघा बजैया' कहकर पुकारते। उसका यह  नाम बाघा प्रसिद्ध हो चुका था; उसका असली नाम क्या था, किसी को मालूम नहीं था।

बाघा ढोल बजाता और हर रोज एक ढोलक तोड़ता। अंत में पाँचू के लिए उसके ढोल का खर्च निकाल पाना मुश्किल हो गया। पर बाघा का बजाना बंद हो जाए, यह कैसे हो सकता था? गाँव के लोगों ने पाँचू से कहा - 'तुम नहीं कर पाते तो कोई बात नहीं, हम सब चंदा इक्कठा कर ढोलक का खर्चा दे देंगे। गाँव में ऐसा  उस्ताद हो और उसका बाजा बजाना बंद हो जाए!! ऐसा नहीं होगा।' आखिर सबने तय किया कि मिलकर चंदा इक्कट्ठा कर एक ढोल खरीदकर बाघा को दिया जाएगा, और वह ढोलक और उसकी छाल इतनी मजबूत बनी होगी कि बाघा के हाथों भी जल्दी न टूट पाए।

कुछ और दिन इस तरह बीतते तो कहना मुश्किल है कि क्या होता, पर इसी बीच एक दिन गाँव के सारे लोग इकट्ठे होकर मोट-मोट लट्ठ लिए आकर बाघा से बोले,"मेहरबानी हो भाई साहब! तुम्हें दस हँडिया भर मिठाई देंगे, कहीं और चले जाओ, नहीं तो हम सब पागल हो जाएँगे!" बेचारा बाघा क्या करता ! मजबूर होकर उसे दूसरे एक गाँव जाना पड़ा। वहाँ उसने मुश्किल से दो दिन बिताए थे कि वहाँ के सब लोगों ने मिलकर उसे गाँव से निकाल बाहर किया।

इसके बाद वह जहाँ भी जाता, वहाँ से उसे भगा दिया जाता। आखिर वह सारे दिन मैदानों में घूमने लगा, जब भूख लगती तो अपने गाँव जाकर ढोलक बजता और गाँव के लोग जल्दी-जल्दी उसे कुछ भोजन देकर वहाँ से विदा करते और कहते, "आफत छूटी !" फिर ऐसी हालत हुई कि कोई उसे खाने को ही न दे। "इन बेवकूफों के पास भटकने से तो जंगल में चले जाना ही अच्छा होगा। अधिक से अधिक शेर ही काट खायेगा, पर मैं बजाता तो रहूँगा।" यह सोचकर बाघा ने अपना ढोलक गर्दन पर उठाया और जंगल में चला गया।

अब बाघा बड़े मज़े से रह रहा था, अब उसका बजाना सुनकर कोई लाठियाँ लिए उसे भगाने नहीं आता था। शेर का उसको खाना तो दूर की बात थी, उस वन में शेर -भालू कुछ नहीं थे। बस एक भयंकर जानवर है; बाघा ने आज तक उसे देखा नहीं है, बस दूर से उसकी आवाज़ सुनकर थर-थर काँपता है, और सोचता है, "अरे बाप रे! वह आ गया तो मुझे ढोलक सहित निगल जागा!"

वह भयंकर जानवर और कोई नहीं, वह गोपी गवैया है। बाघा जिस आवाज़ को सुनकर काँपता है, वह दरअसल गोपी के रियाज़ की आवाज़ है। गोपी को भी बाघा के ढोलक बजाने की आवाज़ सुनाई पड़ती और बाघा की तरह वह भी काँपता। आखिर एक दिन उसने सोचा, "इस जंगल में पता नहीं कब यूँ ही जान चली जाएगी, इससे तो अच्छा है कि अभी यहाँ से भाग निकलें।" यह सोचकर गोपी चुपचाप जंगल से निकल पड़ा। निकलते ही उसने देखा कि एक और आदमी एक बहुत बड़ा ढोलक सर पर उठाये उस जंगल से निकल कर आ रहा है। उसे देखकर आश्चर्यचकित हो गोपी ने पूछा, "अरे ! तुम कौन हो ?"
बाघा बोला, "मैं हूँ बाघा बजैया, तुम कौन हो?"
गोपी बोला, "मैं गोपी गवैया हूँ, तुम कहाँ जा रहे हो?"
बाघा बोला, "जहाँ भी जगह मिले, वहीं जाना चाहता हूँ। गाँव के लोग ऐसे गधे हैं, गाना-बजाना उनकी समझ से परे है, इसीलिए ढोल उठाकर जंगल आ गया था। पर भाई, यहाँ एक भयंकर जानवर की आवाज मैंने सुनी है, उसके सामने अगर फँस गया तो जान नहीं बचेगी। इसीलिए भाग जा रहा हूँ।
गोपी बोला, "अरे हाँ ! मैं भी तो एक जानवर की आवाज़ से परेशान होकर भाग रहा था। जरा बतलाओ, तुमने उस जानवर को कहाँ बैठकर चीखते सुना था?"
बाघा बोला, "जंगल के पूर्वी किनारे से, बरगद के नीचे।"
गोपी बोला, "अच्छा, अरे वह तो मेरा ही गायन तुमने सुना है! वह किसी जानवर की आवाज़ थोड़े ही थी? और मैं जिस जानवर की बात कर रहा था, वह जंगल के पश्चिमी किनारे हरड़े के पेड़ के नीचे बैठकर चीखता है।" बाघा ने कहा, "अरे, वह तो मेरे ढोल की आवाज़ है, मैं तो वहीं बैठता था!" अब उनकी समझ में आया कि वे एक दूसरे का गायन और वादन सुनकर ही डर से भागे जा रहे थे। फिर दोनों को खूब हँसी आई! काफी हँस लेने के बाद गोपी बोला, "भाई, जैसे मैं हूँ एक गवैया, वैसे ही तुम हो एक बजैया! अगर हम दोनों मिल जाएँ तो ज़रूर कुछ न कुछ कर पाएगे!" इस बात से बाघा भी बिल्कुल सहमत था। थोड़ी देर बातचीत के बाद उन लोगों ने तय किया कि वे दोनों मिलकर महाराज को गाना सुनाने जाएंगे। इससे महाराज को  बड़ी ख़ुशी मिलेगी, इसमें तो कोई शक नहीं, ऐसा भी हो सकता है कि वे आधा राज्य दे दें और अपनी बेटी के साथ शादी भी करवा दें। गोपी और बाघा के मन यह सोचकर ख़ुशी से फूले न समा रहे थे कि वे महाराज को गाना सुनाने जा रहे हैं। दोनों हँसते-हँसते और नाचते-नाचते एक बहुत बड़ी नदी के तट पर आ पहुंचे। राजबाड़ी जाने के लिए इस नदी को पार करना पड़ता है। नदी में नाव है, पर नाविक पैसे लेकर ही नाव पर चढ़ने देता है। बेचारे जंगल से आ, पैसे कहाँ उनके पास! उन्होने कहा, "भाई, हमारे पास पैसा-वैसा तो नहीं है, पर हम तुम्हें गाना-बजाना सुनाएंगे, हमें उस पार ले चलो।" इस पर नाव की दूसरी सवारियों ने बहुत खुश होकर नाविक से कहा, "हमलोग चंदा इकठ्ठा कर इनका किराया दे देंगे, तुम इन्हें चढ़ा लो।
(आगे अगली पोस्ट में) 

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