Friday, July 27, 2007

बीमारी

कल पेट खराब था, आज गला खराब है। हो सकता है, दोनों एक ही बीमारी की पहचान हों। हमारे यहाँ साफ पीने का पानी तो मिलता नहीं, इसलिए एक फिल्टर लगा रखा है। बाल्टी में पानी भर के उसे पंप से फिल्टर से पास कर साफ करते हैं। उसपर भी बहुत ध्यान देते नहीं, सुस्ती मार जाती है। इसलिए कहीं से मौसमी जीवाणु शरीर में घुस गए हैं। वैसे मुझे लगता है कि कुछेक ऐसे भाई लोग हमेशा से मुझसे मुहब्बत कर बैठे हैं। जब जब भी किसी वजह से शरीर पर ज्यादा बोझ पड़ता है और शरीर थक कर अँगड़ाइयाँ लेता है, ये लोग उछल कूद मचाने लगते हैं। दिन को घर से चालीस किलो मीटर दूर विज्ञान व प्राद्यौगिकी विभाग की सभा में था, शाम लौटे तो सिर, पेट दुख रहा था। बदन में थकान और बीमारी का अहसास। रात को कुछ खाया नहीं और दुखते पेट को सहलाता रहा। सुबह पेट से जरा राहत मिली तो गला खराब है। बदन भी लेटना चाहता है। चलो, यह भी सही। आमतौर से दवा लेता नहीं हूँ, शायद इस बार लेनी पड़े। कई बार मुझे लगता है कि ऐसी बीमारियाँ बीच बीच में होती रहनीं चाहिए। इससे व्यस्त जीवन से अलग कुछ करने का मौका मिलता है; और कुछ नहीं तो लेटे लेटे आदमी कुछ कहानी कविताएँ ही पढ़ लेता है। कल के भाषण की तैयारी में कई दूसरे काम दरकिनार किए हुए थे, अब उनपर हमला करना था। पर बीमारी के बहाने चिट्ठागीरी पर लग गए।

हाल में हिंदी चिट्ठों की दुनिया में काफी तीखापन आया है। पहले मुझे यह बात तंग करती रही कि ज्यादातर सामग्री एक छोटी सी दुनिया में केंद्रित है। फिर हाशिया पर असीमा भट्ट की आलोक धन्वा को तबाह करने के मकसद से लिखी आत्म कथा पढ़ी। पढ़ कर बहुत परेशान हुआ। यह परेशानी जल्दी जानेवाली नहीं। इस पर कोई लंबा विवाद नहीं हुआ, जैसा कि नया ज्ञानोदय प्रसंग में हुआ था। यह कहा जा सकता है कि पाठ को हम कैसे पढ़ते हैं, वह हमारे अपने पूर्वाग्रहों पर निर्भर करता है। असीमा के तीन लेखों के केंद्र में आलोक है, इसको देखने के अलग नज़रिए हो सकते हैं। एक तो सिर्फ यह कि चूँकि हममें से (यानी कि हिंदी में लिखने वालों में से) ज्यादातर लोग सामंती परिवारों से आए पुरुष हैं, इसलिए हम इसे एक नारी का हताश आक्रोश मान रहे हैं। दूसरा यह कि चूँकि हममें से कई लोग नारी अधिकारों के लिए चल रहे आंदोलनों से या तो जुड़े हैं या उनसे सहानुभूति रखते हैं, इसलिए यह लाजिमी है कि हम इस विवाद में आलोक को अपराधी मानकर असीमा के पक्ष में खड़े हों।

मैं उन लोगों में हूँ जो आजीवन किसी न किसी वजह से जीने के लिए संघर्ष करते रहे हैं। मतलब यह नहीं कि हमें भर पेट खाने को नहीं मिला - उस स्थिति से तो बहुत पहले ही निकल चुके थे - पारिवारिक समस्याएँ ऐसी रहीं कि कहीं भी पैर जमा पाना संभव नहीं हुआ। मैं अपने चारों ओर देखता हूँ तो पाता हूँ हमारे जैसे लोग, जो यथास्थिति का विरोध और सामाजिक परिवर्त्तन की किसी परंपरा में जुड़ने की ईमानदार कोशिश में लगे रहे हैं, विवाह उनके लिए तबाही का माध्यम रहा है। अनुभवी लोग ये बात समझते हैं; इसे स्वीकारना काफी ईमानदारी की अपेक्षा रखता है। इसलिए मुझे तकलीफ यह हुई कि असीमा के लेख पोस्ट करने वालों ने यह नहीं सोचा कि आलोक और असीमा कोई ऐरे गैरे नहीं हैं, जिनकी निजी तकलीफों को यूँ उछाला जाए। इसके पहले कि इन्हें पढ़कर सैंकड़ों पाखंडी लोग 'हाय, हाय' करें, हो सकता था कि भले लोग असीमा को कुछ समय दें और अच्छी तरह सोच-विचार कर ही असीमा ये लेख पोस्ट करें। संभव है यह प्रक्रिया हुई हो। हाशिया का मकसद अगर यह था कि लोग इनको पढ़कर समाज में नारी की स्थिति पर कुछ और जागरुक हो जाएँ तो मुझे शक है कि ऐसा वाकई हुआ है। हुआ महज यह है कि अधिकतर लोगों को मजा आ रहा है कि बड़ा क्रांतिकारी कवि बनता था, छोकरी ने खुले बाज़ार नंगा कर दिया। हिंदी का आम बुद्धिजीवी और लेखक इसी मानसिकता से ग्रस्त है। विड़ंबना यह भी है कि हिंदी चिट्ठागीरी में शामिल अधिकतर लोग तो पहली बार आलोक धन्वा का नाम सुन रहे होंगे। यही हिंदी का दुर्भाग्य है - इससे पहले कि हम पाठक को 'ऊपर नील आकाश / नीचे हरी घास' से खींच कर आधुनिक साहित्य तक लाएँ, हम एक दूसरे के कपड़े उतारने लग जाते हैं। ऐसे में दुविधाग्रस्त पाठक भागकर कामायनी और गोदान ढूँढता फिरे तो गलती किसकी?

5 comments:

masijeevi said...

आप आम तौर पर बिना पचाए प्रतिक्रिया नहं देते हैं ऐसा मुझे लगता रहा है- इस बार की प्रतिक्रिया भी सोच विचार कर दी गई होगी ऐसा मानता हूँ। सामान्‍यत: इस प्रकरण पर मैंने प्रतिक्रिया नहीं दी है जबकि निकट के ही लोगों ने इसपर लिखा..लिखना जरूरी था।
पहले तो हाशिया पर ये अचानक अवतरित नहीं हो गई है- आपने पढ़ा ही होगा कि ये कथादेश में है जस की तस, रियाज ने तो विमर्श की सिर्फ कापी पेस्‍ट की है- छपना नहीं चाहिए की चिंता कवि बिरादरी को बड़ी शिद्दत से हो रही है, आप भी कवि हैं, आपको भी है, आपके पास आलोक का फोन आया कि नहीं पता नहीं पर दिल्‍ली में बहुतों को आया- आत्‍महत्‍या की धमकी भी-

जिन्‍होनें आलोक का नाम पहली बार सुना उन्‍हें इस पर बोलने का हक नहीं - उनकी बिसात ही क्‍या है- ये अजीब तर्क श्रंखला हुई।

लोग इसमें रस ले रहे हैं- आपके यह कथन हमें स्वगांभीर्य का विज्ञापन लगा।
'आलोक को तबाह करने का मकसद'- आपको पूरा विश्‍वास है कि आपने इस मकसद का संधान जल्‍दबाजी में नहीं कर लिया ?

अच्‍दे स्‍वास्‍थय के लिए शुभकामनाएं स्‍वीकार करें

अफ़लातून said...

'विवाह तबाही का कारण' ज्यादातर समाज परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध जोड़ों के लिए रहता है- यह तथ्यात्मक रूप से ग़लत है । ऐसे जोड़े सामाजिक-राजनैतिक काम और घरेलू श्रमसाध्य कामों का बँटवारा आपस में कैसे करते हैं इस पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है । मैंने आलोक धन्वा का नाम खूब सुना था और असीमा भट्ट का नहीं सुना था,यह अपने आप में बताता है कि उपर्युक्त बँटवारा अन्यायपूर्ण रहा होगा। और मानप्रतिष्ठा भी सिर्फ़ पुरुष की होती है ? समाज परिवर्तन की किसी भी धारा से जुड़ने के साथ-साथ खुद के और अपनों के जीवन में परिवर्तन की छबि का अक्स यदि नहीं देखा जा सकता तब तो तबाही लाजमी है।

बोधिसत्व said...

लाल्टू जी
आप ने अच्छा लिखा है पर मैं यहाँ किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ।
आशा है आप आनन्द से होंगे।
आपका
बोधिसत्व

लाल्टू said...

मसिजीवीः 'जिन्‍होनें आलोक का नाम पहली बार सुना उन्‍हें इस पर बोलने का हक नहीं - उनकी बिसात ही क्‍या है- ये अजीब तर्क श्रंखला हुई।'

मसिजीवी, जब हम किसी एक पक्ष में खड़े होने को आतुर होते हैं (होना भी चाहिए - अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के खिलाफ) तो अक्सर बातें गलत पढ़-सुन जाते हैं। कुछ कहने वाले की सीमा भी होती है।

कथादेश का पाठक-वर्ग हिंदी साहित्य और साहित्यकारों से परिचित है। यह बात हिंदी चिट्ठाकारों के लिए नहीं कही जा सकती। चाहे इसे मेरा घमंड कह लो, मेरा मानना है कि शुरुआत में ज्यादातर लोग ऐसे थे, जिन्हें हिंदी साहित्य की दुनिया के बारे में प्रेमचंद के बाद शिवमंगलसिंह सुमन या नीरज के अलावा ज्यादा कुछ नहीं मालूम था। (अब मुझे पइेंगीं गालियाँ) यह हमलोगों की जिम्मेवारी है कि हम चिट्ठाकारों के इस वर्ग को, जिन्होंने बड़ी शिद्दत से हिंदी ब्लॉगिंग की एक दुनिया बनाई, हिंदी साहित्य की धाराओं और बौद्धिक विमर्श के स्तर से परिचित होने के पहले ही दुविधाओं में न उलझाएँ (वैसे मैं कौन हूँ यह तय करने वाला - सही है)। मैंने यह कतई नहीं कहा कि 'जिन्‍होंने आलोक का नाम पहली बार सुना उन्‍हें इस पर बोलने का हक नहीं'। तुम्हारा ऐसा मानना ठीक नहीं।

जहाँ तक असीमा के लेखों की बात है, उनके केंद्र में आलोक है, नारी-पुरुष का वह द्वंद्व नहीं, जो सामाजिक है। हालाँकि बड़े ही सरलीकृत ढंग से उसने यह कोशिश की है कि बात को व्यापक बनाया जाए: 'अपनी बीवियों पर खुलेआम चरित्रहीनता का आरोप लगानेवाले मर्द बड़ी आसानी से यह भूल जाते हैं कि वे खुद कितनी औरतों के साथ आवारगी कर चुके हैं. नहीं, किसी मर्द में स्वीकार करने की हिम्मत नहीं होती.' आदि। पर यह कोशिश नहीं के बराबार है और तुरंत आलोक पर वापिस आ जाती है। असीमा के पक्ष में साठ के दशक का फेमिनिस्ट नारा हैः 'Personal is political'. (इस बात से मेरी पहली बात कि केंद्र में आलोक है, नारी-पुरुष का वह द्वंद्व नहीं, जो सामाजिक है - कटती है) मैं मानता हूँ कि मुद्दा इतना आसान नहीं है और यह भी सही है कि नारी-पुरुष संबंधों में पीड़ित अधिकतर नारी ही होती है और हमें उसी की सुननी चाहिए जो पीड़ित है। फिर भी सही गलत जो भी हो, मैंने अपनी चिंताएँ रखीं।

आखिर में >अफलातूनः 'विवाह तबाही का कारण' ज्यादातर समाज परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध जोड़ों के लिए रहता है- यह तथ्यात्मक रूप से ग़लत है ।

तथ्य? भाई, Personal is political में तथ्य पेट और पेट के नीचे - गुसलखाने और बिस्तर - हर ओर हैं। इन तथ्यों के अपने अनिश्चितता के सिद्धांत हैं।

>ऐसे जोड़े सामाजिक-राजनैतिक काम और घरेलू श्रमसाध्य कामों का बँटवारा आपस में कैसे करते हैं इस पर काफ़ी कुछ निर्भर करता है ।

आम तौर से इसका मतलब यही होता है कि औरत चुपचाप घर संभालती है - तथ्य यही होता है कि सब ठीक है - पर तथ्य यह होता है कि सब झूठ है ः-)


>मैंने आलोक धन्वा का नाम खूब सुना था और असीमा भट्ट का नहीं सुना था,यह अपने आप में बताता है कि उपर्युक्त बँटवारा अन्यायपूर्ण रहा होगा।

यह क्या बात हुई? अव्वल तो जब तुमने आलोक धन्वा का नाम सुना होगा तब असीमा भट्ट थी ही नहीं, क्रांति थी।

> और मानप्रतिष्ठा भी सिर्फ़ पुरुष की होती है ? समाज परिवर्तन की किसी भी धारा से जुड़ने के साथ-साथ खुद के और अपनों के जीवन में परिवर्तन की छबि का अक्स यदि नहीं देखा जा सकता तब तो तबाही लाजमी है।

अच्छा कहा ठीक कहा - पर यहाँ क्यों कहा मेरी समझ में नहीं आया।

Anonymous said...

Dear Laltu ji,

Aseema bhat's dispatch has atleat generated discussion , otherwise very could muster the courage speak out certain things beyond politically correct language. I liked the manner in which you have placed the debate on: personal is political, but unfortunately comments made by two friends have not tried to take up the debate beyond 'subjective experiences of Aseema bhat' so that it can also address the broader concerns of 'masculanity' and it's multiple 'avtar's' and perhaps there can be possibility of dialogue between feminism and those are exploring humane dimensions of 'masculanity' not as a fix social category rather embeded in caste, class and gender and more other nuances.

Anyway again we thank you all for you and other's for taking up the issue and breaking the silence and flagging the broader questions and concerns of women as an individual and also as a group/community.

Sukhpreet, Ramandeep and Ambuj etc