Friday, November 04, 2016

सिसकियाँ जुगनू बन नाचती हैं


शोकगीत



1


ध्रुव तारा हो या कि उसका चक्कर लगाते रीछ हो


अमावस की रात तुम्हें ढूँढता हूँ


काल की अँधेरी छाया गहराती आती रोशनियों के शहर पर।


जहाँ भी तुम हो, वहाँ जिस ग्रह में आदमी को सपने देखने की आज़ादी है, पता 

चले तो लिखना। तुम्हारा लिखा पुच्छल तारे सा अमावस चीरता दिख 
 
जाएगा; सभी खो गए दोस्त एक साथ गिटार और ढपली बजाते हुए 

मिल जाएँगे ।



पेड़ों के पत्तों के बीच से छन कर आती है रोशनी,


दुखों का भार सीनों पर है, सिसकियाँ जुगनू बन तुम्हारी किरणों 

के चारों ओर नाचती हैं; टपकता आँसू उँगलियों पर लिए छिड़कता हूँ तुम्हारी 

ओर।



2


देर तक इस एहसास में डूबे कि सब कुछ कहीं गहराई में गिरता चला है; हम 

प्रार्थना करने की जगह ढूँढते रहे।


पीछे शैतान के चर उड़ते-दौड़ते आ रहे थे, कर्कश ध्वनियों का नाद था। गिरते 

ही जा रहे थे। खंदकों, गड्ढों में से होते हुए हृदय के प्रेतों को उपहार दे रहे अपने 

क्षत अंग।



3
जीवन दिन के चक्कर काट रहा था। ग्रहों पार से संदेश आते, सुनहरे रंगों वाले 
संदेशों से हम छले जाते। आखिर लौटते वापस वहीं जहाँ फिर कोई खो गया 
होता। इस तरह हमें मात किया शैतान ने, एक-एक कर हमें उठाता चला और 
फौज में भर्ती करता चला।

4
तीन सौ, तीन हज़ार, तीस हज़ार, तीस लाख, तीस करोड़ साल हो गए
सूरज छिपता रहा पश्चिम की ओर,

गर्मी और जाड़ा घूमते एक दूसरे के इर्दगिर्द
छायाएँ चट्टानों पर शोकगीत लिखती रहीं
जंगली फूल उगते रहे दफन हुई जानों पर
धरती ढोती रही अनगिनत दुख
सुंदर विलीन होता किसी और सुंदर में


चट्टानें रिसती रहीं

किसी आज में कोई कल ढूँढते
बिखरते रहे शोकगीत धरती पर।

                                                 - प्रभात खबर (दीपावली विशेषांक) -2016


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