Sunday, November 06, 2005

अभिव्यक्ति और समर्थ

शहर में जो साहित्यिक गतिविधियाँ लगातार होती हैं, उनमें महीने के पहले शनिवार वीरेंद्र मेंहदीरत्ता के घर होने वाली 'अभिव्यक्ति' नामक गोष्ठी प्रमुख है। कई वर्षों से यह गोष्ठी लगातार होती रही है। इस बार निर्मल वर्मा और अमृता प्रीतम पर बात होनी स्वाभाविक थी। निर्मल वर्मा के आखिरी उपन्यास “अंतिम अरण्य“ पर अतुल वीर अरोड़ा ने अच्छा आलेख पढ़ा। मेरा दुर्भाग्य कि न ही मैंने उपन्यास पढ़ा है और न ही समय पर गोष्ठी में पहुँचा, पर आखिरी दो-चार बातें जो सुन पाया, लगा कि अतुल का यह काम महत्वपूर्ण है। इतना सुना नहीं कि न्यायपूर्ण ढंग से कोई टिप्पणी कर सकूँ, इसलिए अगर इसे पढ़कर किसी को इस आलेख के बारे में जिज्ञासा हो तो उन से सीधे संपर्क करें।
इस पाठ के बाद की चर्चा अच्छी नहीं रही। विचारधारा और साहित्यिक व्यक्तित्व आदि पर झगड़ा होता रहा। कितना अच्छा होता अगर उनकी कुछ रचनाएं पढ़ी जातीं। अमृता पर तो कोई बात ही नहीं हुई।
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साहित्य में क्या उत्कृष्ट है, क्या नहीं, इस पर विवाद तो हमेशा ही रहेगा। अधिकतर लोग एक सीमा से अधिक न तो अमूर्त्त चिंतन कर सकते हैं, न ही नवाचार का प्रयास कर सकते हैं। इसलिए बात संप्रेषणीयता और लिखने के मकसद पर आ जाती है। कुछ लोग आज भी सौ साल पहले के अंदाज़ मे ही लिखते रहते हैं। आप लाख समझाइए, वे अपनी शैली जरा भी नहीं बदल सकते। कुछ और लोग कथ्य को कुछ मानते ही नहीं। वे रुप की ही तलाश में रहते हैं। अच्छा है कि मैं साहित्य का नहीं, विज्ञान का अध्यापक हूँ और इन बातों को देखता-सुनता हूँ तो एक अलग ही किस्म के रसास्वादन के साथ। बहरहाल, गोष्ठी में अक्सर ऐसी रचनाएं पढ़ी जाती हैं, जिनका साहित्यिक स्तर बहुत ही निम्न होता है। कई-कई बार इन लोगों को यह बताया गया है कि सिर्फ चरित्र या विषय-वस्तु अच्छी रचना नहीं बनाते। पर ... ... ...
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कभी इसी गोष्ठी में समर्थ से मेरा परिचय हुआ। बदकिस्मती से जिन दिनों सबसे पहले उसका नाम सुना था, कुछ लोगों ने अंग्रेज़ी में लिखी उसकी कविताओं को बहुत तूल दिया हुआ था। अभी स्कूल से निकला ही था, अंबाला में पला, अंग्रेज़ी लिखता भी तो क्या लिखता। मुझे उसके संग्रह की समीक्षा लिखने के लिए भी कहा गया। और मैंने बात अनसुनी कर दी। दो-तीन साल बाद जब गोष्ठी में मैंने उसे समझाया कि अंग्रेज़ी उसकी natural भाषा नहीं है, तो वह माना नहीं। धीरे-धीरे उसकी अंग्रेज़ी भी सुधरी, जयंत महापात्र की 'चंद्रभागा' जैसी कुछ अच्छी पत्रिकाओं में रचनाएं भी छपीं। अब कहा जा सकता है कि वह अंग्रेज़ी में अच्छी कविताएं लिखता है। अब दिल्ली में काम करता है और अंग्रेज़ी के माहौल में है, पर अब छः महीने से अंग्रेज़ी में लिखना बिल्कुल बंद कर दिया है और हिन्दी में लिखता है। शायद किसी भी अच्छे रचनाकार को यह अहसास होगा ही कि अपने परिवेश की बोली में ही बेहतरीन सृजन हो सकता है।
समर्थ ने कल बतलाया कि 'पहल' में उसकी कविताएं आ रही हैं। समर्थ कविता-कर्म को गंभीरता से लेता है। अगर आज की दौड़-भाग में अपने कवि को वह ज़िन्दा रख सके, तो हिन्दी के एक बेहतरीन कवि को आप जान रहे हैं।
'बेहतरीन सृजन' से याद आया। संस्कृत और फारसी के शब्दों (और साथ देशज) का जैसा गड्ड-मड्ड हिन्दी में संभव है और किसी भाषा में शायद ही हो। इस मायने में हिन्दी में लोकतांत्रिक संभावनाएं अनंत हैं।
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कुछ तो मुझे विज्ञान की दुनिया के बारे में भी लिखना चाहिए। चूँकि यह मेरे लिए रोटी से जुड़ी दुनिया है, इसमें मेरी तकलीफें ज्यादा हैं। लिखेंगे, कभी उस पर भी लिखेंगे।

1 comment:

Vinay said...

"अपने परिवेश की बोली में ही बेहतरीन सृजन हो सकता है।"

laakh Take kii baat. aur sRRijan hii kyo.n, sa.nvaad ke baare me.n kyaa kahe.nge.

aapakaa blaa.cg dekhakar ba.Dii khushii huii. bahut achchhaa likhate hai.n.