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Location: हैदराबाद, आंध्र प्रदेश, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Monday, October 31, 2005

दीवाली, धोनी और ज़िंदगी की शुभकामनाएं

दीवाली

कल कलकत्ता से आए मित्रों अदिति और देवनाथ के साथ सतरह सेक्टर गया था। दीवाली की रौनक भी और साथ चंडीगढ़ में शरत की लुभावनी शाम भी। इसके ठीक पहले उन्हें लेज़र वैली ले गया। वहाँ तकरीबन कोई न था। सड़कें भी वीरान। प्रकाश इतना कम कि हालांकि सूरज को डूबे अभी आधा घंटा ही हुआ था, फिर भी पार्किंग की जगह देखने में दिक्कत हुई (आँखें भी कमजोर पड़ रही हैं)। मित्र बौद्धिक मिजाज़ के थे। देवनाथ तो बहुत अच्छा गायक भी है। लेज़र वैली का शांत माहौल हमें खूब भाया।

सतरह सेक्टर में हमेशा की तरह भीड़ दिखी। लगा कि शायद उम्मीद से कम है। थोड़ी बहुत शापिंग हमने भी की। जब से मैं चंडीगढ़ आया हूँ दीवाली का त्योहार ही मुझे सबसे अच्छा लगता है। मौसम इन दिनों इतना बढिया होता है, जैसे दीवाली तो बनी ही चंडीगढ़ के लिए है।

ऐसे दिनों में पुरानी बहुत बातें याद आती हैं। कई बार लगता है कि आज के मोबाइल पर दो लाइन या डिजिटल मेसेज भेजने के जमाने में किसको समझ होगी कि वह भी क्या दीवाली होती थी। मैंने कलकत्ता में काली पूजा के त्योहार को ही देखा था। उत्तर भारत की दीवाली तो सबसे पहले चंडीगढ़ में ही देखी थी। कलकत्ता में काली पूजा त्योहारों के महीने का आखिरी पड़ाव होता था। इसके बाद इम्तहानों की तैयारी शुरु होती थी (उन दिनों कलकत्ता में स्कूल की वार्षिक परीक्षाएं नवंबर के आखिर से दिसंबर तक में होती थीं)। इस लिए काली पूजा और हल्की ठंड (जो अब कलकत्ता में बिल्कुल नहीं होती) का अलग ही रोमांच होता था।

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आज तो लगता है कि ज्यादातर लोग धोनी की धुनाई की खबरें ही लिखेंगे। मैच को जिता डालना अपनी जगह और दस छक्के! बल्ले, वई, बल्ले। दो ही दिनों पहले आतंकवादियों की घिनौनी कार्रवाई से जो उदासी छाई थी, उसे धोनी ने धो दिया। इसलिए ऐ मनहूस मौत के सौदागरो, जान लो कि हम ज़िंदा हैं। हम काश्मीर, हम पाकिस्तान में ज़िंदा हैं, हम हिंदुस्तान और दुनिया के दीगर मुल्कों में ज़िंदा हैं, कोई लश्कर, कोई बिन लादेन, कोई बुश हमें खत्म नहीं कर सकता। हम ज़िंदा हैं कि हममें ज़िंदा रहने की गहरी तमन्ना है।

तुम लाशों का कारोबार करने वालो, तुम्हारी खून की होली हमारी ईद और दीवाली नहीं रोक सकती। देखो कि हम ज़िंदा हैं और ज़िंदगी की शुभकामनाएं बाँट रहे हैं।

2 Comments:

Blogger मिर्ची सेठ said...

क्या बात है चंडीगढ़ से आप मिले, इसी बहाने चंडीगढ़ की यादे ताजा हो जाएंगी। जिंदगी के दस साल वहाँ गुजारे हैं देखते हैं जहाज का पंछी कब वापिस जहाज पर आता है

10:28 am, November 01, 2005  
Blogger लाल्टू said...

मिर्ची जी,
मिठाई लेकर जहाज पर चढिएगा।

8:16 pm, November 02, 2005  

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