Name: लाल्टू
Location: हैदराबाद, आंध्र प्रदेश, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Tuesday, December 11, 2007

ये लोग न हों तो मेरा जीना ही संभव न हो।

हड्डियाँ चरमरा रही हैं। कल जबकि औपचारिक रुप से मैं बूढ़ा हो गया, उसी दिन संस्थान को अपना स्पोर्ट्स डे करना था। ज़िंदगी में पहली बार शॉटपुट, रीले रेस और ब्रिस्क वाक रेस में हिस्सा लिया। और जिसका अंदाज़ा था वही हुआ। लैक्टिक अम्ल के अणुओं ने तो जोड़ों में खेल दिखाना था, सारे बदन में बुखार सा आया हुआ है। वैसे कल मानव अधिकार दिवस भी था और कल ही के दिन नोबेल पुरस्कार भी दिए जाते हैं।

मेरी एक मित्र जो हर साल बिला नागा मुझे इस दिन बधाई देती है, जब उसका संदेश नहीं आया तो चिंता हुई कि कुछ हुआ तो नहीं। हमउम्र है। अकेली है। नितांत भली इंसान है, धार्मिक प्रवृत्ति की और सोचकर यकीन नहीं होता, तीन बार तलाक शुदा है। तो संक्षिप्त मेल भेजी -क्या हुआ, कहाँ हो। तुरंत जवाब आया - टेलीपैथी से बधाई भेज तो दी थी।

जानकर अच्छा लगा कि कोई टेलीपैथी द्वारा मुझसे संपर्क कर रहा है। अब इस पड़ाव पर आकर यही सहारा होगा। जब भी अवसाद आ घेरेगा, तो खुद को याद दिलाऊँगा कि कोई टेलीपैथी द्वारा मुझसे संपर्क कर रहा है। यह अलग बात है कि दिल जो है चोर, हमेशा ही माँगे मोर।

हद यह कि मुझे बिल्कुल याद नहीं रहता कि किसी को कभी बधाई भेजनी है। इससे नुकसान भी बहुत हुआ है। ऐसे लोगों को जिनको अपनी तरक्की के लिए बीच बीच में बधाई भेजते रहना चाहिए, उनको अनचाहे ही दूर कर लिया है।

पर ये लोग भी अजीब हैं। इन्हें कोई फिक्र नहीं कि यह बंदा ऐसा खड़ूस है कि हमें कभी बधाई नहीं भेजेगा। ये लोग न हों तो शायद मेरा जीना ही संभव न हो।

हर साल इस दिन खुद से कहता रहता हूँ अब से सबके नाम और सही दिन डायरी में नोट कर लो, एक दो बार दो एक जनों के किए भी हैं, पर पता नहीं कहाँ गायब हो जाती हैं ऐसी डायरियाँ!

3 Comments:

Blogger अनिल रघुराज said...

लाल्टू जी, माफ कीजिएगा। आप इतना पहले और इतना अच्छा लिखते हैं, लेकिन मुझे पता ही नहीं चला। आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आया। एक-दो पोस्ट देखी। आपकी संवेदनशीलता काबिले-तारीफ है। इस पोस्ट में टेलीपैथी वाली बात में गजब की पीड़ा है।

7:27 AM, December 11, 2007  
Blogger Pratyaksha said...

हिसाब किताब न भी बराबर हो और देर ही सही टेलीपैथी ज़िंदाबाद और बधाई !

7:55 AM, December 11, 2007  
Blogger उमेश कुमार said...

आप बहाने करते है
अपने दोस्तों के साथ
या
हकीकत कहते हैं
इस आधुनिक युग में
डायरी खो जाए
किसी को विश्वाश नही होता है।

9:45 PM, February 01, 2008  

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