Sunday, June 01, 2014

अपने अपने मेफिस्टो

यह आलेख समयांतर पत्रिका के ताज़ा अंक में प्रकाशित हुआ है -


हमारे अपने मेफिस्टोफिलिस

हंगरी के प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक इस्तवान स्ज़ावो की एक बहुचर्चित फिल्म है - मेफिस्टो। इसमें उन्नीसवीं सदी के जर्मन साहित्यिक गेठे के कालजयी त्रासद नाटक 'फाउस्ट' के खलनायक मेफिस्टोफिलिस के रुपक का इस्तेमाल है। गेठे का मेफिस्टो ईश्वर से बाजी लेता है कि वह एक भले इंसान डॉक्टर फाउस्टस को नैतिकता की राह से हटाकर उसे हैवानियत के अंधकार में ले जाएगा। जर्मन साहित्य के अलावा दीगर पश्चिमी कृतियों में मेफिस्टो का जिक्र गाहे बगाहे शैतान के रूप में आता है। 1981 में बनी अपनी फिल्म में स्ज़ावो ने हेंड्रिक होयफ़गेन नामक एक प्रगतिशील सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता को इसी तरह नात्ज़ी पार्टी के साथ समझौता करता हुआ दिखाया है। होयफ़गेन मेफिस्टोफिलिस के चरित्र का अभिनय करना चाहता है, पर अपनी समझौतापरस्ती में वह फाउस्टस में तबदील होता जाता है। सचमुच का मेफिस्टो एक नात्ज़ी नेता है।
स्ज़ावो की फिल्म आज के संदर्भ में नए अर्थ लेकर आई है। कल के कई जानेमाने प्रगतिशील नाम आज अचानक खेमा बदलते दिखलाई पड़ रहे हैं। क्या ये हमारे फाउस्ट हैं? क्या ये भी मेफिस्टो के शिकार हो रहे हैं?
राजनैतिक दलों में आयाराम गयाराम की प्रवृत्ति पुरानी है, लोगों को इसकी आदत भी है, पर बुद्धिजीवियों में सत्ता बदलते ही गिरगिटी स्वभाव का उजागर होना झटके की तरह लगता है। 2004 के चुनाव में लोकप्रिय वामपंथी जनगीतकार भूपेन हाजारिका ने भाजपा की ओर से चुनाव लड़ा था। वह ऐसा झटका था कि आज तक हमलोग उससे निकल नहीं पाए हैं। पर चूँकि उत्तर-पूर्व मुख्यधारा की राजनीति में कभी भी बड़ी जगह नहीं बना पाया और हाजारिका वह चुनाव हार भी गए, इसलिए वह बात ज्यादा ध्यान न खींच सकी। उन दिनों मैंने 'भू भू हा हा' शीर्षक से एक कविता लिखी थी - दिन ऐसे आ रहे हैं/ सूरज से शिकवा करते भी डर लगता है/ किसी को कत्ल होने से बचाने जो चले थे' सिर झुकाये खड़े हैं/ दिन ऐसे आ रहे हैं//कोयल की आवाज़ सुन टीस उठती/ फिर कोई गीत बेसुरा हो चला/ दिन ऐसे आ रहे हैं//भू भू हा हा।
इधर चुनाव परिणामों के आने के पहले से ही कई लोगों में बदलाव दिखने लगे थे। राजनैतिक नेताओं में ऐसी खेमाबदली कुछ तो साल पहले और कुछ हाल के समय में हुए। इनमें शायद सबसे ज्यादा परेशान करने वाले राजनैतिक पथबदल आक्रामक दलित नेता रामदास अठावले का अपनी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के साथ शिवसेना के साथ गठबंधन में शामिल होना और फिर हाल में पुरानी इंडियन जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष राम राज उर्फ़ उदित राज का भाजपा में आना और राम विलास पासवान के दल का भाजपा के नेतृत्व में राजग में शामिल होना हैं। ये सभी राष्ट्रीय मुक्ति- आंदोलन के महान नेता आंबेडकर के अनुयायी माने जाते हैं और यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि आंबेडकर कभी संघ की विचारधारा का समर्थन करें। चुनावों के दौरान दलितों और पिछड़ों के हित में और सांप्रदायिकता के खिलाफ एक लंबे अरसे से लड़ने वाले स्वामी अग्निवेश ने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में ख़त लिखा। आम लोग जो सिद्धांतों और नैतिकता के आधार पर सार्वजनिक जीवन में इंसान के व्यवहार को मापना चाहते हैं, यह सब बातें उनकी समझ से परे हैं। ऊपर लिखे बड़े झटकों की तुलना में कई लोगों को कमल मित्र चेनॉय और बल्ली सिंह चीमा जैसों का वामपंथी दलों की सदस्यता त्याग कर आआपा जैसे दलों में शामिल होना अपेक्षाकृत कम महत्त्व की बात लगती है, पर सचमुच दोनों एक ही बात हैं। राजनैतिक कार्यकर्त्ताओं में लंबे समय तक संघर्ष करते रह कर भी कुछ भी हाथ न आने का अहसास और उससे उपजती तकलीफ समझ में आती है, हालाँकि ऐसा सच नहीं है कि कुछ भी बदला नहीं होता। संघर्षों से छोटे-बड़े परिवर्तन होते हैं, नया इतिहास बनता है और संघर्ष में शामिल हर कोई लोक-स्मृति में जगह बनाते चलता है।

बहरहाल, ठोस राजनैतिक काम से अलग कलम की लड़ाई लड़ने वाले बुद्धिजीवी वर्ग के कुछ लोगों में सत्ता बदलते ही अपने आवरण बदलने की ज़रूरत क्यों दिखती है, यह एक और सवाल है। नई सरकार बनने के बाद से उदारवादी जाने जाने वाले बुद्धिजीवियों में बदले हालात में खुद को ढालने की कोशिशें दिखने लगी हैं। इसे समझना एक तरह से मुश्किल है और साथ ही यह आसान भी है। मुश्किल यूँ कि जिन तर्कों के साथ कोई सैद्धांतिक ज़मीन तैयार करता है, उनको तोड़ कर नए सिद्धांत गढ़ना कैसे संभव हो सकता है, यह आम लोग नहीं समझ पाएँगे। नए रुख को किसी नई नौकरी की तरह नहीं समझाया जा सकता। नए मुहावरे गढ़ने पड़ते हैं या जिन मुहावरों को पहले ग़लत कहकर अपनी जगह बना रहे थे, अब उनको दुबारा ढूँढकर सही का जामा पहनाना पड़ता है। और आसान इसलिए कि हैं तो इंसान ही, इसलिए समझौतापरस्ती कोई बड़ी बात नहीं। हर व्यक्ति के अंदर ही एक मेफिस्टो बैठा है, हालाँकि कहानी में वह किसी और बाहरी रूप में बतलाया गया है। यह हमारी बदकिस्मती है कि भारत में संपन्न वर्गों से आए ऐसे बुद्धिजीवियों की भरमार है। हाल के चुनावों में अनगिनत मीडिया-कर्मियों ने खुद को चाहे-अनचाहे प्रबंधन को बेच दिया। सत्ता परिवर्तन में लगी ताकत का एक बड़ा हिस्सा उन्हीं का था। इनके अलावा कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने चुनावों के पहले और दौरान कुछ लिखा और चुनावों का परिणाम आते ही कुछ और। 'द हूट' नाम की पत्रिका में आलेखों के रंग बदल गए। सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार बुलंद रहने वाली इस पत्रिका ने चुनावों के बाद यह बतलाना शुरू किया कि कैसे प्रबंधन के नए सिद्धांतों का अद्भुत इस्तेमाल कर मोदी और उसके साथियों ने बाजी मार ली। शुद्धब्रत सेनगुप्त ने सही लिखा हैकि बनारस में मोदी का नाटक एक हिट सिनेमा जैसा था, जिसे एक समय प्रगतिशील रिपोर्टों के लिए जाने जाने वाली पत्रिका 'ओपेन मैगाज़ीन' के संपादक प्रसन्नराजन ने एक नाम तक दे डाला है - 'ट्रायम्फ ऑफ द विल'। यह नाम नात्ज़ी प्रोपागंडा के लिए बनी एक फिल्म का था जो नुअरेमबर्ग में 1934 में हिटलर की एक रैली पर बनाई गई थी। 'ओपेन मैगाज़ीन' वही पत्रिका है जहाँ से पहले एक गंभीर पत्रकार हरतोष सिंह बल को निकाला गया था और अभी दो महीने पहले तत्कालीन संपादक मनु जोसेफ ने इस्तीफा दिया था। उसके बाद मोदी समर्थक प्रसन्नराजन संपादक बने। अपने संपादकीय में उन्होंने मोदी की प्रशंसा में शब्दों की फुलझड़ियाँ लगा दी हैं, जिसे शुद्धब्रत ने ठीक ही चुनावी यौन-उत्तेजना कहा है। आखिर एक लोकतांत्रिक चुनाव से सत्ता में आए नेता की प्रशंसा में उसे हिटलर बना डालना बुद्धिजीवियों की अहमन्यता और अहमकपन को दर्शाता है। तो क्या सचमुच ये बुद्धिजीवी अब तक हिटलर का ही इंतज़ार कर रहे थे - यह वाजिब सवाल है। पर यह खतरनाक परिदृश्य सामने ले आता है। वाकई हिटलर और मोदी में कई समानताएँ हैं। 1932 में जर्मनी में हुए आम चुनावों में हिटलर की पार्टी को 66.9% प्रतिशत जर्मन लोगों ने समर्थन नहीं दिया था, पर हिटलर को सत्ता मिली। मोदी की पार्टी को 69% मतदाताओं ने समर्थन नहीं दिया, पर उन को सत्ता मिली है।
राजधानी के बुद्धिजीवी हल्कों में सरगर्म रहने वाले एक भानु प्रताप मेहता ने जब हाल में अपने एक आलेख में लिखा कि मोदी की जीत का मुख्य कारण मीडिया में उसे दानव बनाकर पेश किया जाना है तो पता चला कि पिछले कई वर्षों से चुनावों के पहले तक जनाब लगातार मोदी के खिलाफ मुखर रहे। बकौल रघु करनाड, उनकीटिप्पणियों के कुछ नमूने देखिए – "भाजपा समर्थकों को मान लेना चाहिए कि मोदी की जीत पाकिस्तान की जीत है (2002)”; “गोधरा कांड के सही कारणों का पता नहीं भी चले, मुसलमानों के जनसंहार के कारण अजाने नहीं हैं। यह सुनियोजित क्रूर हिंसा राज्य के समर्थन से की गई थी (2002)¨; “नरेंद्र मोदी के उन्मत्त प्रलाप से लेकर लालू यादव के भ्रामक बकवास तक का सार्वजनिक बहस का सारा ढाँचा ... ऐसा समाज रचता है जहाँ हम यह नहीं जानते कि कब किसकी किस बात पर हम यकीन करें (2002)”; “गोधरा कांड के बाद राज्य-सत्ता के समर्थन से हुए लघु-संख्यकों के जनसंहार से त्रासदी बेइंतहा गहरी हो गई (2005)”; “तोगड़िया और मोदी जैसे चरित्रों में पाकिस्तान और मुसलमानों को लेकर पूर्वग्रह भरा जघन्य और तर्कहीन डर भरा है (2005)”; “इस हिंसा पर जैसा विमर्श धीरे-धीरे विकसित हो रहा है, जिस तरह की शब्दावली इसे बखानने, इसकी व्याख्या करने, इसे उचित ठहराने और इसे नज़रअंदाज़ करने के लिए सामने आ रही है, उससे इस हिंसा के भुला दिए जाने का डर है।"
इसी तरह नए प्रगतिशील चिंतकों में एक बड़े चिंतक, शिव विश्वनाथन, जिन्हें विज्ञान की आलोचना में उनके काम के लिए जाना जाता है, ने चुनावों के ठीक पहले 28 मार्च को 'द हिंदू' मेंअपने एक आलेख में  बनारस में केजरीवाल और मोदी की भिड़ंत पर लिखा था, 'मोदी जिस भारत-इंडिया, हिंदू-मुस्लिम फर्क को थोपना चाहते हैं, बनारस उसे खारिज करता है।' अब मोदी के जीतने पर उनका सुर बदल गया है। 21मईको लिखे एक आलेख में नरेंद्र मोदी द्वारा काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा और फिर उसके बाद गंगा में आरती की बात करते हुए शिव बतलाते हैं कि मोदी जी के होने से यह संदेश मिला कि हमें अपने धर्म से शर्माने की ज़रूरत नहीं है। यह पहले नहीं हो सकता था।

कौन सा धर्म? कैसी शर्म? सच में वह कोई धार्मिक काम नहीं था। वह आरती किसी भी धार्मिकता से बिल्कुल अलग एक विशुद्ध राजनीतिक कदम था। उसमें से उभरता संदेश यही था कि तानाशाह आ रहा है।
नए आलेख में शिव वामपंथियों, उदारवादियों और वैज्ञानिकों को झाड़ पर झाड़ लगाते हैं - 'उदारवादी इस बात को न समझ पाए कि मध्य-वर्ग के लोग तनाव-ग्रस्त हैं और मोदी ने इसे गहराई से समझा।' पहले इन तनावों की वाम की समझ के साथ शिव सहमत थे, पर अब उन्हें वाम एक गिरोह दिखता है, जिसने धर्म को जीने का सूत्र नहीं, बल्कि एक अंधविश्वास ही माना। यह 50 साल पुरानी बहस है कि मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा या कि उसे उत्पीड़ितों की आह माना। आगे वे वाम को एक शैतान की तरह दिखलाते हैं, जिसने संविधान में वैज्ञानिक चेतना की धारणा डाली ताकि धर्म की कुरीतियों और अंधविश्वासों से मुक्ति मिले। रोचक बात यह है कि अंत में वे दलाई लामा को अपना प्रिय वैज्ञानिक कहते हैं। तो क्या वैज्ञानिक में 'वैज्ञानिक चेतना' की भ्रष्ट धारणा नहीं होती! उनके मुताबिक यह धारणा एक शून्य पैदा करती है, और धर्म-निरपेक्षता बढ़ाती है, जिससे ऐसा एक दमन का माहैल बनता है जहाँ आम धार्मिक लोगों को नीची नज़र से देखा जाता है। बेशक विज्ञान को सामाजिक मूल्यों और सत्ता-समीकरणों से अलग नहीं कर सकते, पर यह मानना कि जाति, लिंगभेद आदि संस्थाएँ, जिन्हें धार्मिक आस्था से अलग करना आसान नहीं, विज्ञान उनसे भी अधिक दमनकारी है, ग़लत है। अब शिव का यह भी कहना है कि पिछली सरकार ने चुनावों के मद्देनज़र लघुसंख्यकों की तुष्टि की और इससे बहुसंख्यकों को लगा कि उनके साथ अन्याय हो रहा है। सोचने की बात है कि अगर सच्चर कमेटी की रिपोर्ट जैसे दस्तावेजों से उजागर लघु-संख्यकों के बुरे हालात के मद्देनज़र अगर उनकी तरफ अधिक ध्यान दिया गया तो इससे एक बुद्धिजीवी को क्या तकलीफ? और यह तकलीफ पहले कभी क्यों नहीं हुई?

बिना विस्तार में गए सिर्फ इस अहसास को बढ़ाना कि लघु-संख्यकों का तुष्टीकरण होता है, एक गैर-जिम्मेदाराना रवैया है। होना यह चाहिए कि हम सोचें कि देश में लघु-संख्यकों का हाल इतना बुरा क्यों है कि उनका चुनावों के दौरान फायदा उठाना संभव होता है। उनकी माली और तालीमी हालत इतनी बुरी क्यों है कि उनके बीच से उठने वाली तरक्की-पसंद आवाज़ें दब जाती हैं। पर अब कौन जाने कि मेफिस्टो क्या-क्या कहलाता है? आज तो शिव के नए आलेख में वाम पर लताड़ को पढ़कर लगता है मानो नई सरकार क्या बनी, भारत से स्टालिन का शासन खत्म हुआ!
हमारे समय के ये सारे फाउस्ट अपने अपने मेफिस्टो के जादू के नशे में हैं। इन्हें लगता है कि वे चालाकी से अपना रंग बदल लेंगे और जो इन्हें रंग बदलते पकड़ लेते हैं वे जाएँ भाड़ में। पर हर समझौतापरस्ती आखिर हमें वहीं ले जाती है जहाँ स्ज़ावो का होयफगेन पहुँचता है। एकदिन हम खुद को मेफिस्टो के सामने खड़ा पाते हैं और हमें समझ में नहीं आता कि हम रोएँ तो कैसे रोएँ।






2 comments:

Subhash Gatade said...

Really liked it.
Subhash Gatade

Daljit Ami said...

It is important to call Spade a Spade. Very well written.