tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-72535849707420184072008-01-13T20:00:00.000-08:002008-01-13T20:05:00.972-08:00साथ रह गए कभी न छूटने वाले इन घावों मेंयह जो गाँव पास से गुज़र रहा है<br />इसमें तुम्हारा जन्म हुआ<br />जब भी यहाँ से गुज़रता हूँ<br />स्मृति में घूम जाती हैं तुम्हारी आँखें<br />बचपन में जिन्हें तस्वीर में देखते ही हुआ सम्मोहित<br /><br />तब से कई बार धरती परिक्रमा कर चुकी सूरज के चारों ओर<br />तुम्हारे शब्द कई बार बन चुके बहस के औजार<br />लंबे समय तक कुछ लोगों ने तुम्हारी पगड़ी पर सोचा<br />छायाचित्रों में तुम नहीं तुम्हारी पगड़ी का होना न होना देखा<br />और हमने जाना कि यह वक्त तुम्हें नहीं तुम्हारे नाम को याद रखता है<br /><br />हमारे वक्त में दुनिया बदलती नहीं किसी के आने-जाने से<br />चिंताएँ, हँसी मजाक, दूरदर्शन, खेलकूद<br />सब चलते रहते हैं<br />ब्रह्मांड के नियमों अनुसार<br />यह छायाओं का वक्त है<br />चित्र हैं छायाओं के जिनसे आँखें निकाल दी हैं वक्त के जादूगरों ने <br /><br />रंग दे बसंती गाते हुए हर कोई सीना ठोकता है<br />और फिर या तो जादूगरों की जंजीरों में गला बँधवा लेता है<br />या दृष्टिहीन छायाओं में खो जाता है<br />गीत गाता हुआ आदमी मूक हो जाता है<br />गाँव के पास से गुज़रते हुए <br />देखता हूँ गाँव अब शहर बन रहा है<br />आस पास जो झंडे लगे हैं<br />वह जिन हवाओं में लहरा रहे हैं<br />उनमें खरीद फरोख्त के मुहावरे हैं <br /><br />बीच सड़क गुज़रते हुए <br />सीने से लगाता हूँ बचपन की स्मृति<br />तमाम मायावी झंडों के बीच आज़ाद लहरा रही है मेरी स्मृति<br />बूँद जो अब होंठों पर खारापन ला चुकी है<br />उँगलियों से उसे समेटता हूँ<br /><br />फिर दिखने लगते हैं परचम <br />जिनमें तुम्हारी आँखें है<br />जो इक अलग तर्ज़ में बसंती रंग में रँग जाती हैं<br />जिस्म में फैले पचास वर्षों में मिले अनगिनत घाव।<br /><br />गाँव पीछे छूट गया<br />साथ रह गए तुम कभी न छूटने वाले इन घावों में।<br /><br /> १४ सितंबर २००७ (उद्भावना - भगत सिंह स्मृति विशेषांक, २००७)<div class="blogger-post-footer"><img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/18449440-7253584970742018407?l=laltu.blogspot.com'/></div>लाल्टूhttp://www.blogger.com/profile/04044830641998471974noreply@blogger.com5