tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post3044431818959315688..comments2008-03-25T23:15:43.045-07:00Comments on आइए हाथ उठाएं हम भी: प्रोफेशनल अवसादी और धंधा-ए-अवसादलाल्टूhttp://www.blogger.com/profile/04044830641998471974noreply@blogger.comBlogger8125tag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-84391406998591262092008-03-25T23:15:00.000-07:002008-03-25T23:15:00.000-07:00लाल्टू जी,बहुत बढिया। लेकिन आपकी परिभाषानुसार तो ब...लाल्टू जी,<BR/><BR/>बहुत बढिया। लेकिन आपकी परिभाषानुसार तो बुश और मोदी दोनो समान रूप से विशद्ध अवसादवादी हैं। अवसाद विधा का नोबेल पुरूस्कार दोनो को सयुक्त रूप से ही मिलेगा। <BR/><BR/>बहरहाल, साढ़े छः हज़ार बचा लेने की बधाई। <BR/><BR/>प्रदीप कान्तPradeephttp://www.blogger.com/profile/09173096601282107637noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-61535201198383631492008-03-08T05:32:00.000-08:002008-03-08T05:32:00.000-08:00लाल्टू भाईउम्मीद से ज़्यादा दिनों बाद ही सही पर रस...लाल्टू भाई<BR/>उम्मीद से ज़्यादा दिनों बाद ही सही पर रसीला लेख आपका पढने को मिला। जब आप दस साल पहले ख़ुद को अवसादी कहा करते थे, तो बात समझ में ठीक से नहीं आती थी। आईएस बनने की चाहत थी, फिर सुखी गृहस्थी बनाने की चाहत थी, कुछ प्रसिद्ध होने की भी लालसा भी थी । अब थोड़ा साँस आना शुरू हुआ है अपने आप से। अवसाद की दो-चार गोलियां रोज़ खा लेता हूँ। कल शाम कॉलेज वालों ने भी एक टीका लगा दिया था। बस काम चल रहा है अब तो। निराशा को सात्विक कहने का भी ड्रामा नहीं कर पा रहा हूँ। उम्मीद की रस्सिओं से झूलने की सज़ा बीच-बीच में आकर फिर पकड़ लेती है। उसका अभी तक कोई इंतजाम नहीं हो पाया। शायद काफिर-गिरी करते-करते वो भी कोई रास्ता छोड़ जाए। आप का सारा ब्लॉग पढ़ के ऐसा लगता है की दो कुह्निओं से पहाड़ तो शायद नहीं हिला पर उसे यह अड़चन तो ज़रूर हो रही होगी की यह भाई साहिब, खुजली करने से बाज़ नहीं आ रहे।Sunil Aggarwalhttp://www.blogger.com/profile/00644421164005859010noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-61721735179035992422008-03-07T20:11:00.000-08:002008-03-07T20:11:00.000-08:00is tarah avsad ki baaten padhne se dil khush ho ja...is tarah avsad ki baaten padhne se dil khush ho jata hai!! par rahe capitalist ke capitalist, sadhe chhe hazaar rupaye bacha liye.<BR/><BR/>rajivlochanmhttp://www.blogger.com/profile/03241397792844096816noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-87775034733705505762008-03-04T04:57:00.000-08:002008-03-04T04:57:00.000-08:00लाल्टू, इन धंधेवालों ने एक अच्छा काम तो किया ही है...लाल्टू, इन धंधेवालों ने एक अच्छा काम तो किया ही है: तुम्हें लिखने के लिये प्रेरित (या मजबूर) किया, और यह क्या कम है?चेतन्noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-32250082893855336422008-02-29T18:20:00.000-08:002008-02-29T18:20:00.000-08:00पैसे बचे सो बचे और उससे ज़्यादा नॉन(?)अवसादी का सर्...पैसे बचे सो बचे और उससे ज़्यादा नॉन(?)अवसादी का सर्टिफिकेट मिला ...बुरा तो बिलकुल नहीं ..धंधा-ए-अवसाद का इतना फायदा तो हुआ !Pratyakshahttp://www.blogger.com/profile/10828701891865287201noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-86724484547835025212008-02-29T13:45:00.000-08:002008-02-29T13:45:00.000-08:00बहुत समय से आपको पढ़ना चाह रही थी परन्तु ना जाने कै...बहुत समय से आपको पढ़ना चाह रही थी परन्तु ना जाने कैसे रह जाता था। शायद जिस दिन आप लिखते हैं उस दिन मैं नेट से परहेज या नेट चलने से परहेज करता रहा होगा ।<BR/>लेख अच्छा लगा । साढ़े छः हजार बचाए रखने के लिए बधाई । <BR/>हैदराबाद का ट्रैफिक जैसा भी हो, मुझे यह शहर बहुत पसंद है । <BR/>घुघूती बासूतीMired Miragehttp://www.blogger.com/profile/06098260346298529829noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-37677262013447327642008-02-29T02:29:00.000-08:002008-02-29T02:29:00.000-08:00इस धंधा-ए-अवसाद से दूर रहना ही बेहतर है। पढ़कर लगा...इस धंधा-ए-अवसाद से दूर रहना ही बेहतर है। पढ़कर लगा जैसे एमवे के किसी सम्मेलन का नज़ारा हो। वैसे जो भी हो, आप लिखते अच्छा हैं।अनिल रघुराजhttp://www.blogger.com/profile/07237219200717715047noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-18449440.post-18438268518346090222008-02-29T01:55:00.000-08:002008-02-29T01:55:00.000-08:00लीजिए पकड़ लिया।। :)पता नहीं कैसे अवसादी हैं आप हम...लीजिए पकड़ लिया।। :)<BR/><BR/>पता नहीं कैसे अवसादी हैं आप हमें तो इस भड़ास अवसाद की रौव्‍वापीटी में आपकी इस पोस्‍ट को पढ़कर मुस्‍कराहट ही आई, अब आप चाहें तो इसे दिल्‍ली वालों का सैडिस्टि‍क होना कह लें।masijeevihttp://www.blogger.com/profile/07021246043298418662noreply@blogger.com