Monday, April 28, 2014

मेरे मुहल्ले में



मेरे मुहल्ले में मोदी

मुहल्ले में मोदी! अब यह तो कोई शिकवा नहीं हो सकता! मोदी नहीं राहुल गाँधी भी आते तो कौन सा हमारी शटल मुझे पिक अप करने के लिए सुबह खड़ी होती! मुझे फिर भी घूम घाम के गलियों में से जाना होता! वह तो शुक्र है कि लौटते हुए शटल के ड्राइवर को इस तरफ से घर जाना था और वह उस भयंकर चौराहे तक छोड़ गया जहाँ सोलह दिशाओं से गाड़ियाँ आती हैं और हर गाड़ी आठ दिशाओं में जा सकती है। इसी के बारे में मैंने कहीं कविता लिखी है न कि ईश्वर के एक सौ आठ नाम हैं, बाकी बीस यम के धाम!

तो मुहल्ले में मोदी! लौटते हुए एक किलोमीटर चलते हुए सिर्फ एकबार किसी ने रोका और वी आई पी पास माँगा। मैं घबरा गया पर जब उसे कहा कि मैं तो यहीं पीछे रहता हूँ तो उसने जाने दिया। घर पहुँचकर जल्दी से फ्रेश होकर मैं स्टूल उठा कर बैलकनी में आ गया। यहाँ से रैली का मैदान भी दिखता था और गुड बैड नो गवर्नेंस पर कन्नड़ में चल रहा शोर भी सुना पड़ रहा था। आखिर देर से मोदी आए। दूसरे तमाम बड़े लोगों के बाद बंगलौर के भाई बहनों को उन्होंने नमस्कार कहा। फिर उन्होंने भाषण देना शुरू किया। बंगलौर शहर में राम का नाम चल सकता है, पर इतना नहीं। वैसे भी इलाका इलेक्ट्रॉनिक सिटी के बिल्कुल पास है, यहाँ राम कृष्ण अल्लाह रब सब तुरत फुरत की कमाई के लिए याद किए जाते हैं। इसलिए नहीं कि कोई मस्जिद तोड़नी है। तो थोड़ी देर में मोदी बोले कि देश को एक सेवक चाहिए। और उनसे बड़ा सेवक तो कोई है नहीं। इसलिए एक सेवक बनकर वे वोट माँगने आए हैं।
मुझे याद आया कि करीब सवा 12 साल पहले इस सेवक को 'पता ही नहीं था' कि अपनी जान बचाने सौ से ज्यादा लोग एक भूतपूर्व सांसद के घर पहुँच गए थे और वह मरने के पहले तक फन पर फन घुमाए जा रहा था कि उन्हें बचाया जाए! यह सेवक तब क्या कर रहा था? उस सांसद का नाम एहसान जाफरी था और सेवक जानता था कि से नाम मुसलमानों क होते हैं। मैं सोचने लगा कि कौन बेहतर है, सौ साल पहले का नात्सी जिसे यहूदियों के लिए अपनी नफ़रत प्रकट करने में कोई हिचक न थी, या यह सेवक जो यहाँ बातें बन रहा था। कम से कम नात्सी बंदों में इतनी ईमानदारी तो थी कि वे जो सोचते थे, वही कहते थे। यह 56इंच चौड़े सीन वाला तो मुख्य मंत्री बनने के बाद से चालाकी के साथ अपने असली रूप को छिपाए फिरता है।
वोट डालने वालों ने अपना मन तो बना ही लिया है। किसी के कुछ लिखने से क्या बनने बिगड़ने वाला है। फिर भी मैं एक बार कहना चाहता हूँ कि हर कोई उस इंसान एहसान जाफरी के बारे में एक बार सोचे। वह आदमी इस देश की संसद का सदस्य रह चुका था। वह देश के अग्रणी राज्य गुजरात के सबसे बड़े शहर अमदाबाद की खास कॉलोनी गुलबर्ग सोसायटी में रहता था। कई लोगों ने देखा कि उनक जान-माल को खतरा है तो वे जाफरी साहब के घर में सुरक्षा होगी सोचकर वहाँ हुँ गए। कितने ज़िंदा जले थे? कोई कहता है उनहत्तर। यहीं पर हुआ था न कि एक दंपति अपने बच्चे को खो बैठे - सालों बाद इस घटना पर फिल्म भी बनी। एहसान जाफरी जब चीख रहा था, तब कहाँ था यह सेवक?
भारत के सुप्रीम कोर्ट के ूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश वी एन खरे का कहना है कि बेस्ट बेकरी कांड पर एफ आई आर पढ़कर वे जान गए थे कि राज्य के संरक्षण में जन-संहार हुआ था। गुलबर्ग सोसाएटी के जन-संहार पर भी उनका यही मत है। पर सेवक और उनके संघियों को क्या फर्क पड़ता है कि यह कोई साधारण आदमी नहीं कह रहा, यह देश के सबसे सम्माननीय आदमी की रवानी है। और वह अकेले नहीं, उन्हीं जैसे कई और भले लोगों ने यही बातें दुहराई हैं। सेवक जी की सरकार और उनकी खुफिया एजेंसियाँ क्या कर रही हैं - तीस्ता सेतलवाड़ जैसे जो लोग पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन पर झूठे मामले दायर किए जा रहे हैं। बाकी कौन युवा लड़की किस के साथ घूम रही है, यह जानना भी उनकी खास जिम्मेदारी तो है ही।
इस सेवक को और इसके दल के प्रार्थियों का समर्थन करने वाले खुद से पूछें कि क्या वे इन बातों से अंजान हैं? कोई अंजान नहीं है। हर कोई सच्चाई जानता है। तो फिर क्यों इसे समर्थन कर रहे हैं? इसलिए कि मन में कोई आवाज आ रही है कि मुसलमानों को सबक सिखाना है। जी हाँ, इस सेवक को वोट देने वाले अधिकतर वे ही हैं जो अपनी सांप्रदायिक अस्मिता के साथ समझौता कर रहे हैं। नहीं तो इतना कुछ जानकर कैसे कोई ऐसे आदमी को देश के नेतृत्व की जिम्मेदारी दे सकता है! हर कोई जानता है कि किस तरह गोधरा की घटना को नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के एजेंटों की कारवाई बतलाया, कैसे लाशों को अमदाबाद में घुमाया गया, दंगे भड़काए गए। यह वह सेवक है जिसने हमारे अंदर के उस हैवान को जगाया कि बदला लो। सेवक जी राज्य के मुख्य-मंत्री थे। ऐसे सेवक को वोट देने वाले अभी भी उस हैवानियत की जकड़ में ही हैं। बस यही है कि नात्सी समर्थकों में जो ईमानदारी थी कि वे खुले आम नस्लवादी थे, ऐसा इनमें से कुछ ही लोग कर पाते हैं। हो सकता है कि जीत जाएँ तो संविधान को बदल कर ऐसा बना डालें कि बाकी सेवकों को भी ईमानदारी से जहर फैलाने में हिचक न हो। जहाँ तक विकास का सवाल है, उस पर पर्याप्त तथ्य उजागर हो चुके हैं और हर कोई जानता है कि लगातार झूठ का ताना-बाना बुना जा रहा है। गुजरात का स्तर राष्ट्रीय स्तर पर जहाँ 1999 में था, आज उससे कोई अलग नहीं है। बस शोर मचा-मचा कर झूठ को सच कहने की कोशिशें जारी हैं। युवाओं को झूठा सपना दिखलाया जा रहा है कि नवउदारवादी पूँजीवाद भारत को स्वर्ग बना देगा।
यह भारत की नियति है। हर समुदाय में सांप्रदायिकता बढ़ती चली है। हिंदू बहुसंख्यक हैं तो हिंदू सांप्रदायिकता से खतरा ज्यादा है, जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में मुस्लिम बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता ने तबाही मचा रखी है। भारत में नवउदारवादी नीतियों को लागू करते हुए देशी और विश्व-स्तर के सरमाएदारों ने बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता के साथ समझौता कर लिया है। पढ़े लिखे लोग जब इस तरह जानबूझकर देश को अँधेरे की ओर धकेल रहे हैं तो क्या कहा जा सकता है! भले लोग तैयारी करें कि देश की हवा, पानी, मिट्टी, सब कुछ बिकने वाला है। जो ग़रीब और दलित हैं, आदिवासी हैं, उनकी पहले भी शामत थी, अब और तेज़ी से परलोक पहुँचेंगे। राम का नाम लें और भारत महान का मंत्र जपें। सेवक आ रहे हैं। इतिहास, भूगोल, साहित्य – सब कुछ बदलने वाला है। एहसान जाफरियो, मरने के लिए तैयार रहो।

Sunday, April 27, 2014

एक मुद्दा भाषा का


इस आलेख का संपादित संस्करण आज के जनसत्ता में आया है। 

फासीवाद उभार का भाषाई पहलू

संसदीय चुनावों में फासीवादी ताकतें पूरा जोर लगा रही हैं कि वे सत्ता हथिया लें। देश-विदेश से आया बेइंतहा सरमाया उनके साथ है, मीडिया का बड़ा हिस्सा उनके साथ है। मीडिया पंडितों ने लोगों की राय के सर्वेक्षण के आधार पर यह घोषणा भी कर दी है कि मोदी जी तो बस आ ही गए। अस्लियत कुछ और है। यह तो लगता है कि कॉंग्रेस और संप्रग की सरकार तो नहीं बनेगी, पर मोदी सरकार के लिए अभी दिल्ली दूर अस्त। और क्या होगा यह तो 16 मई के बाद ही पता चलेगा। अगर किसी तरह इस बार मोदी को रोक भी लिया जाए, यह सवाल पूछना ज़रूरी है कि क्या भारत में फासीवादी उभार रुक जाएगा।

फासीवाद एक सामूहिक मनोरोग है जो अनुकूल ऐतिहासिक परिस्थितियों में सिर उठाता है। पिछले दो दशकों में भारत में लगातार इसकी ताकत बढ़ते रहने के कई कारण हैं। इन कारणों पर बहुत सारे चिंतक विमर्श करते रहते हैं। पर एक कारण ऐसा भी है, जिस पर बातचीत कम हुई है और सुनियोजित ढंग से नहीं हुई है। अगर हम यह देखें कि गत बीस सालों में कौन सी बातें एक जैसी रफ्तार से बढ़ती रही हैं, तो उनमें एक मुद्दा भाषा का होगा।

यह हाल के दशकों में ही हुआ है कि भारत के संपन्न वर्गो ने जबरन अंग्रेज़ी को भारतीय भाषा बना दिया है। आज़ादी के तुरंत बाद अंग्रेज़ी एक कामकाजी भाषा तो थी, पर शायद ही कोई इसे तब भारतीय भाषा कहता हो। अब स्थिति बिल्कुल उलट गई है। संपन्न वर्गों की एक ऐसी श्रेणी है जो यह सुनते ही कि आप अंग्रेज़ी को भारतीय भाषा नहीं मानते, आप पर तरह तरह के आक्षेप लगाएगी कि आप संकीर्ण सोच में फँसे हैं। हालाँकि सचमुच अंग्रेज़ी भारतीय भाषा आज भी नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल संपन्न वर्गों के लोग ही कर पाते हैं। अगर इस आधार पर किसी देश की भाषा तय हो तो उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसी भाषा को आधे से अधिक यूरोपी देशों की भाषा माना जाता। तुर्गेनेव तक ने अपना शुरूआती लेखन फ्रांसीसी भाषा में किया था। ऐसा कोई नहीं कहेगा कि फ्रांसीसी रूस की भाषा थी, पर हमारा देश है कि यहाँ अंग्रेज़ी भारतीय भाषा नहीं है कहते ही चिल्ल-पों मच जाती है। जाहिर है कि आर्थिक दृष्टि से जैसा भी हो, मूल्यों की दृष्टि से भारतीय समाज आज भी मुख्यतः सामंती है। और फासीवाद के उभार में एक ज़रूरी कारण सामंती मूल्यों का वर्चस्व है। संभव है कि विश्व-स्तर पर सूचना लेन-देन की वजह से सौ सालों के बाद अंग्रेज़ी अपने आप एक भारतीय भाषा बन जाए, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। पर जिस तरह आज इसे थोपा गया है, इसकी कीमत समाज को चुकानी पड़ रही है।

आज यह भारत में ही है कि जनसंख्या के उस विशाल वर्ग पर, जो आधुनिक समय की सुविधाओं से वंचित हैं, बौद्धिक विमर्श ऐसी भाषा में होता है जिसका इस्तेमाल उन्हें वंचित स्थिति में रखने के लिए औजार की तरह किया गया है। भारतीय भाषाओं में विमर्श सीमित होते जा रहा है। जैसे-जैसे संपन्न वर्ग भारतीय भाषाओं से विमुख हो रहा है, आर्थिक कारणों से इन भाषाओं की रीढ़ टूटती जा रही है। मसलन हिंदी क्षेत्र के बड़े केंद्र राजधानी दिल्ली से निकलती दर्जनों हिंदी पत्रिकाओं में से एक भी ऐसी नहीं है जो इस एक शहर के बूते पर चल सके। बिहार, उत्तर प्रदेश, आदि राज्यों के ग़रीब पाठकों के चंदे से या सरकारी मदद से ही ये पत्रिकाएँ चल रही हैं। अंग्रेज़ी पत्रिकाओं को इस दयनीय हाल से नहीं गुजरना पड़ता।

हममें से कई लोग मजबूरी में अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते हैं, पर अधिकतर मान चुके हैं कि अंग्रेज़ी के बिना अब कोई राह नहीं। यह बड़ी विड़ंबना है। एक समय था जब तमाम मुसीबतों के बावजूद फारसी और संस्कृत तक में समकालीन यूरोपी कृतियों के अनुवाद उपलब्ध होते थे। होना यह तय था कि समय के साथ इन शास्त्रीय भाषाओं के अलावा बोलचाल की भाषाओं में सामग्री उपलब्ध हो। और तकनीकी तरक्की से यह काम आसान भी होता गया है। पर जापान, चीन के बरक्स हमारे यहाँ बहुत कम ही लोग इस तरह के शोध या तकनीकी-विकास में लगे हैं, जिससे एक से दूसरी भाषाओं में अनुवाद का काम आसानी से हो सके।

भाषा के महत्व पर सापिर, ह्वोर्फ, वायगोत्स्की से लेकर स्टीवेन पिंकर तक अनगिनत विद्वानों ने लिखा है। हमारे देशी विद्वान इनको पढ़ते पढ़ाते हैं और अंग्रेज़ी में हमें बतलाते हैं कि थोपी गई भाषा मनुष्य के सामान्य विकास में बाधा पहुँचाती है और कई तरह की विकृतियाँ पैदा करती है। समझना मुश्किल है कि ऐसे ज्ञान-पापी रातों को सोते कैसे होंगे। हम जो कह रहे हैं निरंतर उसके विपरीत आचरण कर रहे हैं।

एक तर्क यह है कि भारत की इतनी सारी विविध भाषाओं में काम कर पाना संभव नहीं है। हम ग़रीब हैं और हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। यह झूठ चलता रहता है, जबकि भारत दुनिया में मारक अस्त्रों का सबसे अधिक आयात करने वाला देश है। राष्ट्रीय बजट का एक चौथाई सुरक्षा खाते में जाता है। अगर इस बात को छोड़ भी दें तो भी सवाल यह है कि अंग्रेज़ी के अलावा हम किसी भारतीय भाषा में भी पढ़ते लिखते हैं या नहीं। राज्य स्तर पर स्थानीय भाषा में विमर्श हो और राष्ट्रीय स्तर का विमर्श अंग्रेज़ी में हो, इसमें आज कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हो यह रहा है कि मुद्दों की गहराई तक जाने के लिए पठनीय या शोध सामग्री ढूँढने वाले अधिकतर लोग अंग्रेज़ी के अलावा कुछ पढ़-लिख नहीं रहे। ऐसा करते हुए उन्होंने खुद को ज़मीनी सच्चाइयों से भी काट लिया है और जब स्थितियाँ अपनी समझ से अलग बिगड़ती हुई दिखती हैं तो उन्हें अचंभा होता है। आखिर इसमें आश्चर्य क्या कि जब बहुसंख्यक लोगों के साथ बातचीत के लिए पोंगापंथियों की भरमार है और समझदार लोगों का अभाव है तो देश में फासीवाद का उभार दिखने लगा है।

देश के अधिकतर लोग टीवी देख कर अंग्रेजी की गुटर-गूँ सुन तो लेते हैं पर उन्हें यह भाषा समझ नहीं आती। अंग्रेज़ी में वंचितों के पक्ष में प्रखर भाषण दे रहा विद्वान उनके लिए कुछ तो मनोरंजन का पात्र है, और कुछ अवचेतन में पलते आक्रोश का कारण। यही आक्रोश आखिर फासीवादी विकृतियों में बदलने में मदद करता है। मजेदार बात यह है कि अंग्रेज़ी वाले यह सोचते हैं कि उनकी बहसों को देश गंभीरता से ले रहा है। अरे! जो अंग्रेज़ी समझता ही नहीं, वह इस गुटर-गूँ को क्या समझेगा। भाषा सिर्फ भाषा नहीं होती, हम जो भाषा बोलते हैं, वही हमें परिभाषित करती है। सापिर-ह्वोर्फ ने भाषाई निश्चितता का सिद्धांत दिया था, कि भाषा के अलावा हमारे अस्तित्व में और कुछ अर्थ ही नहीं रखता, जिसे हम दुनिया मानते हैं, उसे भाषा ही हमारे लिए बनाती है - यह शायद कुछ अतिरेक ही था; पर उसके बाद भी तमाम भाषाविदों ने बार-बार चेताया है कि भाषा ही जैविक विकास का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। हमारी विश्व-दृष्टि, जीवन के प्रति हमारा नज़रिया, इनके साथ भाषा का गहरा संबंध है। हम अपनी बात को औरों तक पहुँचाने, सही-ग़लत के बारे में अपनी समझ साझी करने के लिए भाषा का इस्तेमाल करते हैं। यह अकारण नहीं है कि मोदी की भाषा हमारी सांप्रदायिक अस्मिता को जगाने में सफल हो जाती है और गाँधी से लेकर वाम के तमाम समूहों का विमर्श जिसमें लगातार अंग्रेज़ी बढ़ती जा रही है, बड़ी संख्या में लोगों को मुश्किल से छू पा रहा है।

जो लोग देश के सामान्य जन पर बात करते हैं और किसी भी भारतीय भाषा को पढ़ते लिखते नहीं हैं, उन्हें खारिज करना जरूरी है, क्योंकि देश में फासीवाद के उभार का एक कारण वे खुद हैं। कई तो ऐसे हैं कि सिर्फ अंग्रेज़ी में हल्का-फुल्का लिख कर ही स्व-घोषित पंडित बने घूमते हैं। वह कुछ भी कहते हैं तो अंग्रेज़ी मीडिया उसे उछालता है। देशी भाषाओं में मीडिया का प्रबंधन ऐसे ही लोगों के हाथ होने के कारण अक्सर इन भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में अंग्रेज़ी का पिछलग्गूपन दिखता है। कई हिंदी पत्रिकाओं का नाम अंग्रेज़ी में है, वो भी ऐसे लफ्ज़ जो आम आदमी नहीं समझता। सौ साल बाद समाज-शास्त्री और संचार विज्ञान के शोधार्थी इस पर काम करेंगे कि आज का भारतीय बुद्धिजीवी किस तरह की कृत्रिम दुनिया में जी रहा है और इसके कारणों में भाषा का सवाल कितना महत्वपूर्ण है। अंग्रेज़ी लचीली भाषा है, अंग्रेज़ी की शब्दावली बड़ी है; स्वाभाविक है कि अंग्रेज़ी के शब्द भारतीय भाषाओं में आ रहे हैं - यह सब तो ठीक है, पर जो खलिश है, वह यह है कि बकौल गाँधी 'अंतिम जन' को उसकी अपनी भाषा में बात करता कौन दिखता है। जैसे-जैसे विमर्श की धुरी अंग्रेज़ी की तरफ होती चली है, भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दों का संकट भी बढ़ता चला है। आम आदमी ही नहीं बुद्धिजीवियों के लिए भी ये भाषाएँ कठिन होती जा रही हैं और उनके विमर्श में भागीदारी करने वालों का दायरा भी सिमटता जा रहा है। कुल मिलाकर एक अजीब स्थिति है, जिसे कई लोग भारत और इंडिया के दो समांतर दुनिया का नाम देते हैं। देशी भाषा में बातें करते हुए अगर हम महज अंग्रेज़ी का अनुवाद ही कर रहे हैं, तो वह भारत की नहीं, इंडिया की ही भाषा है। धीरे-धीरे भारत कमजोर पड़ता जा रहा है, चुनांचे वह फासीवादियों के चंगुल में फँसता जा रहा है। कई लोग कहेंगे कि यह रैखिक युग्मक (बाइनरी) में फँसी हुई सोच है, पर सचमुच मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह जटिल और साथ ही सामाजिक घटना के रूप में बड़ी सरल सी बात है। अंग्रेज़ी सीखना या बोलना अपने आप में कोई दोष नहीं है, पर भारतीय सामाजिक-राजनैतिक परिदृश्य में कई अंग्रेज़ी वाले एक अलग सत्ता अपना लेते हैं। यह इंग्लिशवाला होना अपने साथ देशी भाषा के प्रति उदासीनता ही नहीं, उपेक्षा का स्वभाव लिए होता है। इंग्लिशवाला होना शासक वर्गों के साथ होना है, आम लोगों से अलग होना है। तो आम लोगों तक पहुँचने के लिए कौन बचा रहेगा? जब तक सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ प्रतिबद्ध सोच रखने वाला कोई है तो ठीक है, जब शासन की मार या अन्य कारणों से ऐसे लोग नहीं हैं तो मैदान संकीर्ण राष्ट्रवाद के लिए खुला है। भाषाओं का कमज़ोर होना सिर्फ मुहावरों का विलुप्त होना नहीं है, यह सामूहिक और निजी अस्मिता का घोर संकट पैदा करता है। इस संकट से निपटने के कई तरीके हो सकते हैं - एक तो यह कि हर स्तर पर स्थानीय भाषाओं में काम हो, कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षा मातृभाषा में हो। इसके विपरीत फासीवाद वह मरीचिका है जो सामयिक रूप से उत्पीड़ित को इस ताकत का आभास देती है कि मेरी बोली में ताकत न हो न सही, पर अपनी भी कोई हस्ती है। जब भाषा में बिखराव होता है, जैसा कि आम लोगों पर बोलते हुए अँग्रेजीदाँ विशेषज्ञों मं दिखता है, तो वह सतही रह जाती है और सवालों का हल नहीं दे पाती। फासीवादी संगठनों में समकालीन विमर्श एकतरफा होता है और उनके अधिकतर कार्यकर्त्ता देशी भाषाओं में पारंगत होते हैं। इस तरह फासीवाद अपनी जड़ें जमाने में सफल होता है।

Saturday, April 26, 2014

क्यों चुप हो ?


एक सौ छठी बार

आज मैं
एक सौ छठी बार
बच्चा बनूँगा

चिढाऊँगा सबको
जीभ मोड़ मोड़
आँखें झपक झपक
जब सब हँसते रहेंगे
धीरे धीरे उनकी तस्वीरें
बना रख लूँगा
अपने खयालों में

रात को
जब सब सो जायेंगे
खोल लूँगा
अपने औजारों का बक्सा

चुन चुन
उनकी तस्वीरें
क्षत-विक्षत कर दूँगा
चीखते हुए

क्यों चुप हो ?
क्यों चुप हो ?
(साक्षात्कार - 1987)

Tuesday, April 22, 2014

घुघनी


आज से पैंतालीस साल पहले 22 अप्रैल 1969 में, जब मैं 11 साल का था और आठवीं में पढ़ता था, सी पी आई (एम एल) पार्टी बनी। नक्सलबाड़ी में विद्रोह की घटना को करीब दो साल हो चुके थे। बंगाल में '67 की पहली युक्त फ्रंट सरकार के गिरने और राष्ट्रपति शासन से बाद नई बनी सरकार में वाम की ताकत बढ़ी थी। पर संसदीय प्रणाली में रहकर अपने वादों को जल्दी पूरा करने में वाम दल सफल नहीं हो पा रहे थे। कोलकाता शहर युवा क्रांतिकारियों का गढ़ था। हर दूसरे दिन पता चलता कि किसी दादा (बड़े भाई) को पुलिस पकड़ कर ले गई है। हमलोगों को डराया जाता था कि घर से दूर मत जाना, नक्सल बम फोड़ रहे हैं। कहा जाता था कि लंबे बालों वाले किसी लड़के को देखते ही पुलिस उसके बाल काट देती है।

आम जनता की सहानुभूति नक्सलवादियों के साथ थी। आज जो लोग आआपा के प्रति शहरी मध्य-वर्ग के युवाओं के समर्थन से अचंभित हैं, उनकी कल्पना में नहीं आ सकता कि वह क्या वक्त था। इंकलाब की महक हवा में थी। बस अब कुछ समय में ज़माना बदलने को था। जो विरोध में थे, उनके कई तर्कों में एक था कि चीन भारत को हड़पने को आ रहा है।

न इंकलाब आया न चीन आया। बहुत सारे मेधावी युवा हमेशा के लिए धरती से उड़ गए। कई और कई सालों तक जेलों में पुलिसी बर्बरता का शिकार हुए।

जैसा हर आंदोलन में होता है, उस जुनून के भी कुछ महानायक थे। अपने अनुभव से मैंने जाना है कि हर महानायक अंततः एक साधारण आदमी होता है। हमें महान इंसानों को उनकी साधारणता में ढूँढना चाहिए। किसी को असाधारण मानते हुए हम अपनी जिम्मेदारियों से बच जाते हैं।

बहरहाल। यहाँ एक कहानी पेस्ट कर रहा हूँ, यह 1993 में समकालीन जनमत में छपी थी और कई साथियों को एतराज था कि यह मैंने क्या लिखा। एक ने संपादक को ख़त लिखा था कि लाल्टू आधुनिक लू शुन बनने का ख़्वाब देख रहा है - प्रशंसा नहीं, गुस्से में लिखी गई बात थी। पर जैसा मेरे दूसरे काम के साथ हुआ है, इस कहानी का भी कोई खास नोटिस नहीं लिया गया। इसी शीर्षक से मेरा कहानी संग्रह है, जो 1996 में आया था।

घुघनी

मुहल्ले के लड़के किराए की कुर्सियों पर बैठे गप मार रहे हैं। कैरम खेल खेलकर बोर हो गए हैं। जो ' ब्रिज' खेल रहे थे, वे भी ताश के पत्ते समेट कर अब एक दूसरे को बाबा सहगल से लेकर सुमन के गीतों के बारे में या फिर मोहन बागान – ईस्ट बंगाल के हाल के मैचों के बारे में सुना रहे हैं। सत्यव्रत घोष पूजा मंडप के नीचे एक कुर्सी पर अकेले बैठे हैं, पुराने दिनों की बातें याद आ रही हैं। ज़िंदगी के बासठ सालों में देखी कई पूजाएँ याद आ रही हैं। बचपन के वे दिन, जब अकाल बोधन के अवसर पर नए कपड़े पहनते थे और अब जब खुद नहीं, पर पोती रूना को हर दिन – षष्ठी से दशमी तक पाँच दिन अलग अलग नए कपड़े पहनते देखते हैं। अरे रूना गई कहाँ? यहीं तो बैठी थी! अपनी सुस्त गर्दन हिलाकर सत्यव्रत पीछे की ओर देखते हैं।
रूना एक वृद्ध का हाथ पकड़कर इधर ही आ रही है। वयस्क व्यक्ति का चेहरा जाना पहचाना सा है, पर फिर भी याद नहीं आता। इस मुहल्ले के तो नहीं हैं - कहीं ऐसा न हो कोई रिश्तेदार हो और याद ही नहीं आ रहा कि कौन है - ओफ ! उम्र बढ़ने के साथ साथ दिमाग ऐसा सुस्त होता जा रहा है !
रूना और वह वृद्ध व्यक्ति पास आ गए हैं। सत्यव्रत उनकी ओर देख रहे हैं, रूना कहती है - “ये रहे ठाकुरदा!"
सत्यव्रत 'नमस्कार' करते हैं और होंठों से धीरे से कहते हैं। फिर संकोच के साथ धीरे धीरे कहते हैं - "आप ... पहचान नहीं पा रहा।”
वह वृद्ध हँस रहे हैं। "चारु ... चारु दा ....” अरे ! वही तो हैं - वही दुबली पतली काया ! आँखों में चश्मा ... देखकर लगता है अभी गिर पड़ेंगे पर चारुदा तो...!”
मैं ही हूँ रे ! बहुत सालों के बाद अचानक तेरे पास आने को मन हुआ !”
रूना अपने दादाजी सत्यव्रत की फैलती आँखों को विस्मय से देख रही है, सत्यव्रत हाथ उठा कर कहते हैं, ऊलाल सलाम चारुदा! पर...'
"अरे छोड़ रे! चल जरा अपनी बहू से बोल मेरे लिए अच्छी घुघनी बना दे। छोले की घुघनी वह बढ़िया बनाती है, यह तेरी पोती ने बतला दिया है।”
सत्यव्रत चारुदा को लेकर घर आते हैं। सत्यव्रत की पत्नी दरवाजा खोलती है। शांतश्री सत्यव्रत के साथ दुबले चश्माधारी बुजुर्ग को एक बार देखती हैं और तुरंत कहती हैं - “अरे चारुदा ! तुम ...”
अरे शांतश्री ! सवाल मत करो ! अपनी बहू से कहो जरा मुझे घुघनी खिलाए – बहुत भूख लगी है।”
अरे, बैठिए ..अंदर आइए । ध्रुवा, ओ ध्रुवा ...,” इससे पहले कि वह बहू से सुबह की बनाई घुघनी तश्तरी में डालकर लाने को कहें, अचानक चिंतित होकर शांतश्री पूछती है, ”पर घुघनी में तो मसाला बहुत होगा ...! सुबह की बनी है, बिना मसाले की ताजा बनवा लें तो ठीक रहेगा।”
अरे पागल लड़की ! अब क्या मुझे मसालों से कोई डर है? ला, ला, भूख लगी है और बाद में मुझे पायस भी खिलाना।”
ध्रुवा प्लेट भर छोले रख जाती है। चारुदा प्यार से कहते हैं, ”माँ ! एक हरी मिर्च ले आना!” पानी का ग्लास हाथ में लेकर कहते हैं, ”अब ठंड के दिन आ रहे हैं, फ्रिज का पानी ठीक नहीं। ऐसा करो इसमें आधा ताजा पानी मिला लाओ। और सुनो, चाय मत बनाना, मैं चाय काफी अब नहीं पीता।”
इसी बीच रूना कहीं से एक छोटी डायरी लेकर सामने खड़ी हो गई है। देखते ही सत्यव्रत डाँटते हैं, “अभी नहीं, तू हर किसी को परेशान करने लगी है।"
रुना अकड़कर कहती है, “नहीं, हमारा अगला अंक तो कल ही निकल रहा है, मुझे आज ही इंटरविउ चाहिए।”
चारुदा हँसकर कहते हें, ”! तुम्हारी मिनी मैगज़ीन के लिए ! क्या तो नाम है - रविवार? हाँ, कल तो रविवार है न?”
सत्यव्रत सोच रहे हैं, उन दिनों अगर चारुदा को इस तरह खिला सकते, तो कितना आनंद आता। तब तो उबली सब्जियाँ और रोहू मछली का झोल, बिल्कुल फीका सा, यही बड़ी मुश्किल से खा पाते थे।
चारुदा मुँह में छोले भरकर कहते जा रहे हैं, “लिखो, लिखो, चारु मजुमदार, जन्म ... जन्म कब हुआ मुझे ही नहीं मालूम ... मौत 28 जुलाई 1972....।”
फिर हँस पड़े हैं चारुदा, “बचपन में मैं आम के पेड़ों पर चढ़ना बहुत पसंद करता था। कई कई दिन तो कहानियों की किताब हाथ में लेकर किसी आम के पेड़ पर चढ़कर डालियों पर लेटे लेटे किताब पढ़ता रहता - घंटों तक। फिर मेरे घरवाले मुझे ढूँढ़ने निकलते।
रूना पूछती है, ”आप स्कूल में फर्स्ट आते थे?”
फर्स्ट ? ऐसी बात तो याद रहनी चाहिए ... शायद नहीं ...स्कूल में फर्स्ट आना तो कोई बड़ी बात नहीं ..।“ चारुदा अचानक चिंतित लगे। रूना फिर पूछती है, ”घुघनी कैसी लगी आपको?”
घुघनी .. अरे वाह! बहुत बढ़िया है। जरा अपनी माँ से कहो कि थोड़ा और दे जाए।”
ध्रुवा खुद ही मुस्कराते हुए घुघनी भरा बर्तन ले आती है और कड़छी से डालती है। चारुदा उसको रोक नहीं रहे। सत्यव्रत परेशान होकर कह बैठते हैं - ”इतना खा लेने दो, फिर और देना।”
चारुदा कहते हैं, “अरे और नहीं - इसके बाद पायस खाऊँगा। तुम्हें याद है, पहली बार जब आया था, तब शांतश्री ने पायस ही खिलाया था, बहुत सारा। तुमने खूब कहा था कि सब्जी बना दें, पर रात के डेढ़ बज चुके थे, पायस पड़ा था और मैंने वही खाया।”
सत्यव्रत को याद नहीं। सत्यव्रत को 1971 के दो दिन ही याद आते हैं, जब चारुदा आए थे और मकान की हर खिड़की पर दो दिनों तक उनके साथी हर क्षण तैनात बैठे थे। तब घर में जो तनाव था, सत्यव्रत को लगता है वैसा फिर हो तो उन्हें तुरंत दिल का दौरा पड़ जाएगा। उन दो दिनों चारु दा सिर्फ उबली सब्जियाँ, सूप, रोहू मछली का फीका झोल, यही निगल सकते थे। और शायद दो दिनों में बिल्कुल न सोकर वे लिखते जा रहे थे - बीच बीच में अपने साथियों से मशविरा करते। सत्यव्रत को घर से निकलने से मना कर दिया गया था। कालेज छुट्टी की दरखास्त भेज दी थी, विभाग के साथी शिक्षक इंद्रजीत बनर्जी हाल पूछने आ बैठे तो शांतश्री ने दरवाज़े से ही कह दिया, “वे तो टालीगंज गए हैं। ” और बैठने को भी नहीं कहा।
दीवार की ओर ताक रहे हैं चारुदा। सामने बरामदे की ओर खिड़की पर अब कोई तैनात नहीं। अब कोई पुलिसवाला वर्दी में भी गुज़र जाए तो किसी को परवाह न होगी। फिर भी ऐसा ख्याल मन में आते ही सत्यव्रत काँप उठे। अपनी परेशानी को छिपाते दीवार पर लगे कैलेंडर को दिखाकर कहते हैं - “यह ध्रुवा ने बनाया है। इनका महिला संगठन है, उनके लिए।”
हाँ, हाँ” और चारुदा लपककर उसकी डायरी लेते हैं, ”मैं यहीं बना देता हूं, तुम चिपका लेना।”
चारुदा ने एक बड़ा मेंढ़क बनया है। एक पेड़ और एक गोल-गाल सा चेहरा पेड़ के ऊपर।
रूना पूछती है, “यह मॉडर्न पेंटिंग है ?”
हां, मॉडर्न है, ठहरो, मैं साइन कर दूँ।” चारुदा साइन करते हैं। सत्यव्रत उत्सुकता छिपा नहीं पाते - करीब आकर देखते हैं - चारुदा ने बड़े स्टाइल से लिखा है- सी एम।
शांतश्री अचानक बोल उठती हैं, “आप हमेशा ही ऐसे थे क्या?”
चारुदा हंसते हैं, “पता नहीं क्या-क्या था रे, मुझे सब थोड़े ही पता है! कई दफा लगता है कि मैं चाहता तो चूनी गोस्वामी की टीम में खेलता। अरे! स्कूल में तो खूब खेला करता था मैं। सेंटर फारवर्ड था...।”
सत्यव्रत का मुँह खुला हुआ है। सामने के दाँत टेढ़े मेढ़े हैं। काले हो चुके हैं। अचानक सिगरेट की तलब होती है। पर बेटे ने घर के अंदर सिगरेट पीने से मना किया हुआ है। पूछते हैं, “चारुदा ! आप सिगरेट पिएँगे?”
ना! वह सब तभी छूट गया था !”
अचानक शांतश्री कहती है, “हमलोग तो इंतजार कर रहे थे कि रविवार को आपको हमारे घर आना था, फिर 16 तारीख को रेडियो पर सुना....।” इतनी पुरानी बातें, शांतश्री को कैसे याद रहती हैं, सत्यव्रत सोच रहे हैं।
चारुदा सुन नहीं रहे ...। बरामदे की ओर दरवाजे पर लगा परदा हवा में उड़ रहा है। उस ओर ताक कर बोल उठे, “उन दिनों वह नया लड़का था, सुभाष भौमिक। अच्छा खेल रहा था... बहुत इच्छा थी कभी उसका खेल देखूं।”
सत्यव्रत अचानक पूछते हैं। "चारुदा, कभी तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि सब कुछ ग़लत हुआ – अगर फिर से करना हो तो...।”
चारुदा टोककर रूना से पूछते हैं, “क्यों, मेंढक ठीक बना? मॉडर्न मेंढक है!”
अरे बहू ! पायस तो खिलाओ !”
चाव से पायस खाते हैं चारुदा।
सत्यव्रत उठकर दूसरे कमरे में जाते हैं। वहाँ मेज पर फाइल है - हाल के कई जन आंदोलनों के परचे, सँभालकर रखे हुए हैं। बेटे के काग़जों से निकालकर उन्होंने अपनी फाइल में रखे हैं। मन हो रहा है चारुदा को दिखलाएँ। पर फाइल उठाकर फिर वापस रख देते हैं। हल्के कदमों से वापस आ जाते हैं। चारुदा रूना से पूछ रहे हैं - “इस बार कितने कपड़े लिए पूजा पर?”
चार... नहीं पाँच... चार फ्राक, एक सलवार कमीज़!”
वाह, सलवार कमीज़ कब पहनोगी?”
नवमी के दिन ... कल वो फूलों वाला फ्रॉक पहनूंगी। देखेंगे ?”
चारुदा रूना का फ्राक देख रहे हैं, कहते हैं, ”अगली दफा मैं तुम्हारे लिए नए किस्म के पकड़े लेकर आऊंगा - क्या चाहोगी तुम?”
रूना उछलकर कहती है, ”जीन्स के पैंट।”
अच्छा,” सत्यव्रत की ओर देखकर पूछते हैं चारुदा, ”कितनी कीमत होगी जीन्स के पैंट की ?”
शांतश्री जवाब देती हैं, “सौ रुपए से कम में तो नहीं मिलेगा।”
चारुदा सोच रहे हैं। क्या सोच रहे हैं - सत्यव्रत खुद अर्थशास्त्र पढ़ाते रहे हैं, पर दो साल हुए रिटायर हो जाने के बाद विषय के बारे में कम ही सोचते हैं। चारुदा मुद्रास्फीति के बारे में सोच रहे होंगे, सत्यव्रत का यह ख्याल बिल्कुल झुठलाकर चारुदा शांतश्री से पूछते हैं, “तुमने कभी जीन्स के पैंट पहने हैं?”
शांतश्री खिलाखिला उठी हैं। ध्रुवा भी। रूना भी हंस रही है। सत्यव्रत सिर झुकाकर उदास बैठे हैं। उन्हें अचानक लग रहा है कि वे रो पड़ेंगे। परेशानी में अपनी गर्दन इधर उधर हिला रहे हैं।
चारुदा उठकर सत्यव्रत के कंधों पर हाथ रखते हैं। "यंगमैन, उठो। तुम्हारे बेटे से मुलाकात नहीं हुई। कोई बात नहीं, इस घुघनी का नशा अब छूटेगा नहीं। अब मैं आता रहूंगा - आज चलूं?”
सत्यव्रत अभी भी सिर झुकाए बैठे हैं। काश वे युवा होते, या कोई छोटा बच्चा... मन हो रहा है शांतश्री के वक्ष में सिर छिपाकर फूट फूटकर रोएँ। या चारुदा के सीने पर मुक्के मार मारकर बिलख उठें।
चारुदा चल पड़े हैं। "तुम लोग बैठो, मैं चलूँ।” शांतश्री दरवाजे तक आती हैं। फिर वे सब बरामदे में आते हैं और चारुदा को जाता हुआ देखते हैं। वे तब तक उन्हें देखते हैं, जब तक कि वे दूर कोने वाले मकान पार कर मुड़ नहीं जाते। फिर चारुदा विलीन हो गए।
सत्यव्रत परदा पकड़े हुए खड़े हैं। अचानक कहते हैं - “बहू, जरा मुझे भी थोड़ी सी घुघनी खिलाओ।”
शातंश्री कहती हैं, “सुबह तो तुम्हारा पेट ढीला जा रहा था!”
सत्यव्रत की आँखों में एक उदास आँसू छलकता है।
(समकालीन जनमत - 1994)