आइए हाथ उठाएं हम भी

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Location: हैदराबाद, आंध्र प्रदेश, India

बेहतर इंसान बनने के लिए संघर्षरत; बराबरी के आधार पर समाज निर्माण में हर किसी के साथ। समकालीन साहित्य और विज्ञान में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप

Saturday, March 31, 2012

आशिकी में नीली बैंगनी हो चुकी राहें, कविता और क्रांति

एड्रिएन रिच का चले जाना एक युग का अंत है। मैंने बहुत ज्यादा तो नहीं पढ़ा, पर जितना पढ़ा, उससे वे मेरी प्रिय कवि बन गईं। सत्ताईस साल पहले विदेश से लौटते हुए उनकी कविताओं की एक मोटी किताब ले आया था। उन दिनों यहाँ उनको कोई जानता न था। एक बंदे ने किताब ली और बहुत बाद में उसे लौटाने को कहा तो पता चला कि उसने वह किताब कहीं सड़क से ली थी। बाद में एक उनके वैचारिक आलेखों की एक किताब रह गई थी। कभी कभार पढ़ता, फिर वह किताब भी बेटी अपने साथ ले गई। इसलिए इधर कई सालों से उनको पढ़ा न था।

उनकी एक कविता का अनुवाद करने की कोशिश कर रहा हूँः

ड्रीमवुड (सपनकाठ)

टाइपिंग स्टैंड की पुरानी, सस्ती, खुरदरी लकड़ी में
एक ज़मीं का विस्तार है जिसे केवल एक बच्चा
या बच्चे की बढ़ी उम्र की छवि, एक कवि, सपना देखती
एक स्त्री, देखती है, जब कि उसे दिन की आखिरी रीपोर्ट
टाइप करनी चाहिए। अगर यह एक नक्शा होता, जिसे कि
उसे लगता है कि सफर के लिए याद रखना है, तो इसमें धुँधले
रगिस्तानों में विलीन होते ढालू टीले दर टीले, कभी कभार
कहीं हरीतिमा और कदाचित कोई छोटा पोखर दिखते।
अगर यह एक नक्शा होता, तो यह उसके जीवन के
आखिरी पड़ाव का नक्शा होता; विकल्पों का नहीं,
बल्कि एक बड़े विकल्प, जिसे उसने चुना, के भिन्न
स्वरूपों का नक्शा होता। वह ऐसा नक्शा होता,
जिसमें वह अपने सैलानी क्षणों को देख सकती,
उन राहों को जो आशिकी में नीली बैंगनी हो चुकी हैं,
जिनसे वह जान सकती है कि कविता क्रांति नहीं होती,
क्रांति की ज़रूरत को समझने का जरिया होती है। अब
जब ब्रूकलिन गैस कंपनी की थोक में बनाए, थोक में
पर मजबूत और टिकाऊ बने, इस लकड़ी के स्टैंड को
यहाँ यही होना है, इतना सादा इतना हठी स्वप्नचित्र,
तो उसे लगता है कि सपना और काठ जुड़ जाएँ,
और यही कविता है और
यही देर से तैयार की गई रीपोर्ट है।

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Sunday, March 25, 2012

खबर और एक पुरानी कविता

खबर यह कि वाणी से मेरा नया संग्रह आ गया है। मुझे अभी भी प्रति मिली नहीं है, कल परसों मिलने की उम्मीद है।

आवरण लाल रत्नाकर जी का है।
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पाश की स्मृति में लिखी यह कविता शायद पहले भी कभी पोस्ट की है। जिन्होंने न देखी हो, उनके लिए फिर से। यह कविता 1994 में जालंधर के देशभक्त य़ादगार सभागार में पढ़ी थी। गुरशरण भ्रा जी तो आयोजक थे ही, उस बार पंजाबी के कवि लाल सिंह दिल को सम्मानित किया गया था।

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पाश की याद में

चूँकि एक फूल हो सकता है एक सपना
बारिश में भीगी दोपहर
वतन लौटकर गंदी मिट्टी पर भिनभिनाती मक्खियों को
देखने की इच्छा
या महज लेटे लेटे एक और कविता सोच पाना
एक सपना हो सकता है

इसलिए समय समय पर कुचले जाते हैं फूल
उनकी गोलियाँ दनदनाती हैं
मेघदूतों के एक एक टपकते आँसू को चीरकर
वे बसाना चाहते हैं पृथ्वी पर
सूखी आँखों वाली प्रजातियाँ
और चौराहों पर घोषणा होती है निरंतर
ख़बरदार सिर मत उठाना
रेंगते चलो संभव है आसमान दिखते ही
फिर जन्म ले बैठे कोई कविता

वे मशीनों में अपने नकली दाँतों की हँसी बिखेरते आते हैं
सभ्य शालीन कपड़ों में लफ्ज़ों को बाँध आते हैं
वे आते हैं कई कई बार
काले काले चश्मों से अपनी लाल आँखें ढँके आते हैं
उनकी कोशिश होती चप्पा चप्पा ढूँढने की
पेड़ पौधों घास फूस हवा पानी में

जितना ख़तरनाक है हमारे लिए सपनों का मर जाना
उतना ही ख़तरनाक है उनके लिए फिर फिर कविता का जन्म लेना

इसलिए जब कभी कविता खिल उठती है
उनकी नसें फुफकारती हैं काले नागों सी
और बौखलाहट में वे जलाना चाहते हैं चाँदनी रातें
मिट्टी की महक हमें ढँक लेती है
वे जश्न मनाते हैं इस भ्रम में मशगूल कि
एक इंसान नहीं वाकई उसके सपनों का कत्ल किया हो

सदियों बाद कविता फैल चुकी होती है दूर-दूर
दिन में सूरज और रात में तारों में होती है कविता
खेतों खदानों में स्कूलों में
परिवार में संसार में
होती है कविता
असीं लड़ाँगे साथी असीं लड़ाँगे साथी
(इतवारी पत्रिका: 1997)
- 'डायरी में तेईस अक्तूबर' संग्रह में शामिल







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